Thursday, April 27, 2017

भँवर में घिरी आम आदमी पार्टी

यह पहला मौका है, जब एमसीडी के चुनावों ने इतने बड़े स्तर पर देशभर का ध्यान अपनी ओर खींचा. वस्तुतः ये नगरपालिका चुनाव की तरह लड़े ही नहीं गए. इनका आयाम राष्ट्रीय था, प्रचार राष्ट्रीय और परिणामों की धमक भी राष्ट्रीय है. सहज रूप से नगर निगम के चुनाव में साज-सफाई और दूसरे नागरिक मसलों को हावी रहना चाहिए था. ऐसा होता तो बीजेपी के लिए जीतना मुश्किल होता, क्योंकि पिछले दस साल से उसका एमसीडी पर कब्जा होने के कारण जनता की नाराजगी स्वाभाविक थी. पर हुआ यह कि दस साल की एंटी इनकम्बैंसी के ताप से बीजेपी को ‘मोदी के जादू’ ने बचा लिया.
एमसीडी चुनाव की ज्यादा बड़ी खबर है आम आदमी पार्टी की पराजय. सन 2012 तक दिल्ली में बीजेपी और कांग्रेस ही दो प्रमुख दल थे. सन 2013 के अंतिम दिनों में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी एक तीसरी ताकत के रूप में उभरी. पर वह नम्बर एक ताकत नहीं थी. सन 2015 में फिर से हुए चुनाव में वह अभूतपूर्व बहुमत के साथ सामने आई. उस विशाल बहुमत ने ‘आप’ को बजाय ताकत देने के कमजोर कर दिया. एक तरफ जनता के मन में अपेक्षाएं बढ़ी, वहीं पार्टी कार्यकर्ता के मन में सत्ता की मलाई खाने की भूख. पार्टी ने अपने विधायकों को पद देने के लिए 21 संसदीय सचिवों की नियुक्ति की. इससे एक तरफ कानूनी दिक्कतें बढ़ीं, वहीं पंजाब में पार्टी के भीतर मारा-मारी बढ़ी, जहाँ सत्ता मिलने की सम्भावनाएं बन रहीं थीं.

Wednesday, April 26, 2017

वैकल्पिक राजनीति का पराभव

नज़रिया: 'नई राजनीति' पर भारी पड़ा 'मोदी का जादू'

मोदी और केजरीवाल
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एमसीडी के चुनाव परिणामों को दो तरीके से देख सकते हैं. यह मोदी की जीत है और दूसरे अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की हार.
आंशिक रूप से दोनों बातें सही हैं. फिर भी देखना होगा कि दोनों में से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण क्या है.
कई विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी को काम की वजह से नहीं, 'मोदी के जादू' की वजह से जीत मिली.
पर इस जादू ने साल 2015 के विधानसभा चुनाव में काम नहीं किया, जबकि मोदी की अपील उस वक्त आज से कम नहीं थी.
उस वक्त अरविंद केजरीवाल की 'नई राजनीति' मोदी के जादू पर भारी पड़ी थी. आज मोदी का जादू भारी पड़ा है.
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वोटर का मोहभंग

इसका मतलब है कि केजरीवाल का जादू दो साल में रफा-दफा हो गया और मोदी का जादू कायम है.
आज केजरीवाल की 'नई राजनीति' हारी हुई दिखाई पड़ रही है. साल 2015 में उसे सिर पर बिठाने वाली दिल्ली ने इस बार उसे धूल चटा दी.
जैसी ऐतिहासिक वो जीत थी वैसी ही ऐतिहासिक ये हार भी है. दरअसल 'आप' से वोटर का मोहभंग हुआ है.
'आप' इसके लिए ईवीएम को दोष दे रही है, पर यह बात गले नहीं उतरती. आखिर 2015 के चुनाव में भी तो ईवीएम मशीनें थीं.
लगता है कि पार्टी इसे मुद्दा बनाएगी. देखना होगा कि उसकी यह कोशिश उसे कहीं और ज्यादा अलोकप्रिय न बना दे.
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'ईवीएम में गड़बड़ी'

मतदान के दो-तीन दिन पहले अखबारों में प्रकाशित इंटरव्यू में केजरीवाल ने कहा था, "ईवीएम में गड़बड़ी नहीं हुई तो हमें 272 में 200 से ज़्यादा सीटें मिलेंगी."
केजरीवाल की बातों में यकीन नहीं बोल रहा है. पंजाब और गोवा में मिली हार से उनका मनोबल पहले से ही टूटा हुआ है.
एमसीडी की हार अब पार्टी के भीतर की कसमसाहट को बढ़ाएगी.
परिणाम आने के एक दिन पहले सोशल मीडिया पर केजरीवाल का एक वीडियो वायरल हुआ था.
इसमें उन्होंने कहा, "अब अगर हम बुधवार को हारते हैं... नतीजे वैसे ही रहते हैं जैसे कि बीती रात बताए गए हैं, तो हम ईंट से ईंट बजा देंगे... आम आदमी पार्टी आंदोलन की उपज है, इसलिए पार्टी वापस अपनी जड़ों की ओर लौटने से हिचकिचाएगी नहीं."

Sunday, April 23, 2017

राष्ट्रीय राजनीति को कैसे प्रभावित करेेंगे एमसीडी चुनाव परिणाम?

पूरे देश की नजरें क्यों हैं एमसीडी चुनाव पर?

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यह पहला मौक़ा है, जब एमसीडी के चुनावों ने इतने बड़े स्तर पर देशभर का ध्यान अपनी ओर खींचा है. वजह है इसमें शामिल तीन प्रमुख दलों की भूमिका. तीनों पर राष्ट्रीय वोटर की निगाहें हैं.
सहज रूप से नगर निगम के चुनाव में साज-सफाई और दूसरे नागरिक मसलों को हावी रहना चाहिए था, पर प्रचार में राजनीतिक नारेबाज़ी का ज़ोर रहा.
सवाल तीन हैं. क्या एमसीडी की इनकम्बैंसी के ताप से बीजेपी को 'मोदी का जादू' बचा ले जाएगा? क्या 'आप' की धाक बदस्तूर है? और क्या कांग्रेस की वापसी होगी?
नतीजे जो भी हों विलक्षण होंगे, क्योंकि दिल्ली का वोटर देश के सबसे समझदार वोटरों में शुमार होता है.
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तीन टुकड़ों में एमसीडी

साल 2012 में जिस वक़्त एमसीडी को तीन टुकड़ों में बाँटा जा रहा था, तब दिल्ली में शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी. उस वक्त विभाजन के पीछे प्रशासनिक कारणों के अलावा राजनीतिक हित भी नजर आ रहे थे.
कांग्रेस को लगता था कि इस तरह से एमसीडी पर क़ाबिज होने के विकल्प बढ़ जाएंगे. पर कांग्रेस को उसका लाभ कभी नहीं मिला.
एमसीडी के साल 1997 से 2012 तक के चार में से तीन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई है.
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साल 2002 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब एमसीडी की 134 में से 107 सीटें कांग्रेस ने जीत कर पहला करारा राजनीतिक संदेश दिया था. उस चुनाव में बीजेपी को केवल 17 सीटें मिलीं थीं.
उसके पहले 1997 के चुनाव में बीजेपी को 79 और कांग्रेस को 45 सीटें मिलीं थीं. साल 2007 के चुनाव में कुल सीटों की संख्या बढ़कर 272 हो गई.

कैसे कायम होगी विपक्षी एकता?

मई 2014 में लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने बजाय आत्ममंथन करने के घोषणा की कि हम बाउंस बैक करेंगे। उस साल नवम्बर के महीने में मोदी सरकार के 6 महीने के कार्यकाल के दौरान विभिन्न मुद्दों पर यू-टर्न लेने का आरोप लगाते हुए बुकलेट जारी की। '6 महीने पार, यू टर्न सरकार' टाइटल वाली इस बुकलेट में विभिन्न मुद्दों पर बीजेपी सरकार की 22 'पलटियों' का जिक्र किया गया था। कांग्रेस को लगता था कि उसने कहीं नारेबाजी में गलती की है। उसके बाद सन 2015 में पार्टी ने आक्रामक होने का फैसला किया। संसद के मॉनसून सत्र में व्यापम और सुषमा स्वराज वगैरह के खिलाफ मोर्चा खोला गया। संसदीय कार्यवाही ठप कर दी गई। उसके बाद से पार्टी की हर कोशिश विफल हो रही है। उसे हाल में एक मात्र सफलता पंजाब में मिली है, पर अकाली-भाजपा सरकार की ‘एंटी इनकम्बैंसी’ को देखते हुए इसे पार्टी नेतृत्व की सफलता नहीं कहा जा सकता।

पिछले साल नवम्बर में की गई नोटबंदी के खिलाफ कांग्रेस और विपक्ष ने हंगामा खड़ा किया, पर वह जनता के मूड को समझने में विफल रहा। सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर कांग्रेसी बयान उल्टे पड़े। अब लालबत्ती हटाने का फैसला तुरुप का पत्ता साबित हो रहा है। भाजपा के बाहर और शायद भीतर भी, मोदी विरोधियों को इंतज़ार है कि एक ऐसी घड़ी आएगी, जब यह विजय रथ धीमा पड़ेगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद मोदी सरकार को सन 2015 में पहले दिल्ली और बाद में बिहार के विधानसभा चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा था। पर इन दो झटकों को छोड़ दें तो और कोई बड़ी विफलता उसे नहीं मिली है। पर उत्तर प्रदेश के परिणामों ने तो गैर-भाजपा विपक्ष के हाथों के तोते उड़ा दिए हैं। उन्हें लगता है कि सन 2019 के चुनाव भी गया बीजेपी की गोद में। हाल में हुए पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद देश के 15 राज्य बीजेपी के झंडे तले आ गए हैं।

क्यों राष्ट्रीय महत्त्व का बन गया है एमसीडी चुनाव?

नज़रिया: दिल्ली एमसीडी चुनाव में किसका पलड़ा भारी


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साल 2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की असाधारण जीत नहीं हुई होती तो आज आज दिल्ली नगर निगम के चुनावों का राष्ट्रीय महत्व नहीं होता.
इसी तरह हाल में अगर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में असाधारण जीत नहीं मिली होती तो एमसीडी के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार सुनिश्चित मान ली जाती. एंटी इनकम्बैंसी बड़ी गहरी है.
फिर भी यहाँ पार्टी जीत गई तो इसका मतलब है कि काम नहीं मोदी का नाम बोलता है. बीजेपी के पार्षदों के काम से जनता खुश नहीं रही. दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी अंदरूनी तौर पर बुरी तरह हिली हुई है. वह तो वैसे ही सिर झुकाकर हार मानने को तैयार नजर आती है.
पर पंजाब में उसकी सरकार बन जाने के बाद एमसीडी के चुनावों में उसकी उम्मीदें बँध गई हैं. राजौरी गार्डन की हार भी कांग्रेस को जीत जैसी खुशनुमा लगी, क्योंकि वह दूसरे नम्बर पर आ गई.
उसे अब लगता है कि आम आदमी पार्टी की घंटी बज गई है. उसका वोट अब कांग्रेस को मिलेगा. एमसीडी में जीतने वाले के साथ-साथ दूसरे नम्बर पर रहना भी महत्वपूर्ण होगा. हो तो यह भी सकता है कि किसी को पूर्ण बहुमत न मिले?

फटाफट राजनीति

गोवा, पंजाब और राजौरी गार्डन में आम आदमी पार्टी की हार ने टी-20 क्रिकेट जैसी फटाफट राजनीति की झलक दिखाई है. कहाँ तो सन 2015 में उम्मीद से कई गुना बड़ी जीत, और कहाँ जमानत जब्त. आम आदमी पार्टी बड़ी उम्मीदें लेकर एमसीडी चुनाव में उतरी थी, पर पहली सीढ़ी में ही धड़ाम होने का अंदेशा खड़ा हो गया है. चुनाव दो-तरफ़ा नहीं, तीन-तरफ़ा हो गया है.

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तीन कोने के चुनाव जोखिम भरे होते हैं. पार्टियों का जोड़-घटाना अपने पक्ष में पड़ने वाले वोटों से ज्यादा खिलाफ पड़ने वाले वोटों पर भी निर्भर करता है. अरविंद केजरीवाल ने चुनाव के ठीक पहले दिल्ली के भाजपा-विरोधी वोटरों से अपील की है कि वे अपना वोट कांग्रेस को देकर उसे बरबाद न करें. यह वैसी ही अपील है जैसी उत्तर प्रदेश के मुसलमान वोटरों से की थी कि वे भाजपा को हराना चाहते हैं तो अपना वोट बँटने न दें.

वीजा प्रतिबंध : एक नया व्यापार युद्ध

वैश्वीकरण भ्रामक शब्द है. प्राकृतिक रूप से दुनिया एक है, पर हजारों साल के राजनीतिक विकास के कारण हमने सीमा रेखाएं तैयार कर ली हैं. ये रेखाएं राजनीतिक सत्ता और व्यापार के कारण बनी थीं. बाजार का विकास बगैर व्यापार के सम्भव नहीं था. दुनिया का कोई भी देश अपनी सारी जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता. राजनीतिक सीमा रेखाओं को पार करके जैसे ही व्यापारियों ने बाहर जाना शुरू किया, कानूनी बंदिशों ने शक्ल लेनी शुरू कर दी. जिस देश से व्यापारी बाहर जाता है, वहाँ की बंदिशें है, जिस देश से होकर गुजरेगा, वहाँ के बंधन हैं और जहाँ माल बेचेगा वहाँ की सीमाएं हैं. व्यापार केवल माल का ही नहीं होता. सेवाओं, पूँजी, मानव संसाधन और बौद्धिक सम्पदा का भी होता है.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने इन सवालों पर सोचना शुरू किया और इन बातों को लेकर लम्बा विमर्श शुरू हुआ. सन 1947 में 23 देशों ने जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड (गैट) पर दस्तखत करके इस वैश्विक वार्ता की पहल की. यह वार्ता 14 अप्रैल 1994 को मोरक्को के मराकेश शहर में पूरी हुई. उसके पहले 1986 से लेकर 1994 गैट के अंतर्गत बहुपक्षीय व्यापार वार्ताएं चलीं, जो लैटिन अमेरिका के उरुग्वाय से शुरू हुईं थीं. इसमें 123 देशों ने हिस्सा लिया और उसके बाद जाकर विश्व व्यापार संगठन की स्थापना हुई. पर वैश्वीकरण का काम इतने भर से पूरा नहीं हो गया. इसके बाद सन 2001 से दोहा राउंड शुरू हुआ, जिसे सन 2004 में पूरा हो जाना चाहिए था, और जो अब तक पूरा नहीं हो सका है.

Sunday, April 16, 2017

सावधान ‘आप’, आगे खतरा है

एक ट्रक के पीछे लिखा था, ‘कृपया आम आदमी पार्टी की स्पीड से न चलें...।’ आम आदमी पार्टी के लिए दिल्ली की राजौरी गार्डन विधानसभा सीट पर हुए उप चुनाव का परिणाम खतरनाक संदेश लेकर आया है। पार्टी इस हार पर ज्यादा चर्चा करने से घबरा रही है। उसे डर है कि अगले हफ्ते होने वाले एमसीडी के चुनावों के परिणाम भी ऐसे ही रहे तो लुटिया डूबना तय है। इसके बाद पार्टी का रथ अचानक ढलान पर उतर जाएगा। लगता है कि ‘नई राजनीति’ का यह प्रयोग बहुत जल्दी मिट्टी में मिलने वाला है।

हाल में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा है कि छह महीने में दिल्ली में एक बार फिर विधानसभा चुनाव होंगे। पता नहीं उन्होंने यह बात क्या सोचकर कही थी, पर यह सच भी हो सकती है। आम आदमी पार्टी का उदय जिस तेजी से हुआ था, वह तेजी उसकी दुश्मन साबित हो रही है। जनता ने उससे काफी बड़े मंसूबे बाँध लिए थे। पर पार्टी सामान्य दलों से भी खराब साबित हुई। उसमें वही लोग शामिल हुए जो मुख्यधारा की राजनीति में सफल नहीं हो पाए थे। हालांकि सन 2015 के चुनाव ने पार्टी को 70 में से 67 विधायक दिए थे, पर अब कितने उसके साथ हैं, कहना मुश्किल है।

Thursday, April 13, 2017

यह आम आदमी पार्टी की उलटी गिनती है

दिल्ली की राजौरी गार्डन विधानसभा सीट पर हुए उप चुनाव के परिणामों से आम आदमी पार्टी की उलटी गिनती शुरू हो गई है. एमसीडी के चुनाव में यही प्रवृत्ति जारी रही तो माना जाएगा कि ‘नई राजनीति’ का यह प्रयोग बहुत जल्दी मिट्टी में मिल गया.

उप-चुनावों के बाकी परिणाम एक तरफ और दिल्ली की राजौरी गार्डन सीट के परिणाम दूसरी तरफ हैं. जिस तरह से 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम नाटकीय थे, उतने ही विस्मयकारी परिणाम राजौरी गार्डन सीट के हैं.

आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसौदिया मानते हैं कि यह हार इसलिए हुई, क्योंकि इस इलाके की जनता जरनैल सिंह के छोड़कर जाने से नाराज थी. यानी पार्टी कहना चाहती है कि यह पूरी दिल्ली का मूड नहीं है, केवल राजौरी गार्डन की जनता नाराज है.

Monday, April 10, 2017

ईवीएम नहीं, निशाने पर चुनाव आयोग की साख है

हाल में भिंड में ईवीएम मशीन को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ उसके पीछे जो बात सामने आ रही है, वह यह कि एक अखबार की अस्पष्ट खबर के कारण संदेश गया कि ईवीएम का कोई भी बटन दबाया गया तब हर बार कमल की पर्ची बाहर निकली। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि ऐसा नहीं हुआ था। बात का बतंगड़ बना था। इसके लिए प्रत्यक्षतः वह अखबार भी जिम्मेदार है, जिसने विवाद बढ़ जाने के बावजूद यह स्पष्ट नहीं किया कि उसके संवाददाता ने क्या देखा। 

चुनाव आयोग और देश के कुछ राजनीतिक दलों के बीच ईवीएम को लेकर विवाद आगे बढ़े उससे पहले सरकार और सुप्रीम कोर्ट को पहल करके कुछ बातों को स्पष्ट करना चाहिए। जिस तरह न्याय-व्यवस्था की साख को बनाए रखने की जरूरत है, उसी तरह देश की चुनाव प्रणाली का संचालन करने वाली मशीनरी की साख को बनाए रखने की जरूरत है। उसकी मंशा को ही विवाद का विषय बनाने का मतलब है, लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट। इस वक्त हो यही रहा है, जनता के मन में यह बात डाली जा रही है कि मशीनों में कोई खराबी है।

Sunday, April 9, 2017

क्या ‘आप’ के अच्छे दिन गए?

पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बाद राष्ट्रीय स्तर पर जिस पार्टी के प्रदर्शन का इंतजार था वह है आम आदमी पार्टी। इंतजार इस बात का था कि पंजाब और गोवा में उसका प्रदर्शन कैसा रहेगा। सन 2015 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव में उसकी अभूतपूर्व जीत के बाद सम्भावना इस बात की थी कि यह देश के दूसरे इलाकों में भी प्रवेश करेगी। हालांकि बिहार विधानसभा के चुनाव में उसने सीधे हिस्सा नहीं लिया, पर प्रकारांतर से महागठबंधन का साथ दिया। उत्तर प्रदेश में जाने की शुरूआती सम्भावनाएं बनी थीं, पर अंततः उसका इरादा त्याग दिया। इसकी एक वजह यह थी कि वह पंजाब और गोवा से अपनी नजरें हटाना नहीं चाहती थी।

सन 2014 के लोकसभा चुनाव में उसे पंजाब में अपेक्षाकृत सफलता मिली थी। यदि उस परिणाम को आधार बनाया जाए तो उसे 33 विधानसभा क्षेत्रों में पहला स्थान मिला था। इस दौरान उसने अपना आधार और बेहतर बनाया था। बहरहाल पिछले महीने आए परिणाम उसके लिए अच्छे साबित नहीं हुए। और अब इस महीने होने वाले दिल्ली नगर निगम चुनावों में इस बात की परीक्षा भी होगी कि सन 2015 की जीत का कितना असर अभी बाकी है। पंजाब में उसकी जीत हुई होती तो दिल्ली में उससे  उत्साह बढ़ता। ऐसा नहीं हुआ।

Sunday, April 2, 2017

राजनीति का बूचड़खाना

उत्तर प्रदेश में अवैध बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवाई होने के बाद से देश में गोश्त की राजनीति फिर से चर्चा का विषय है. प्रत्यक्षतः उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई न्यायसंगत है, क्योंकि इसके पीछे मई 2015 के राष्ट्रीय ग्रीन ट्रायब्यूनल (एनजीटी) के एक आदेश का हवाला दिया गया है. राज्य के पिछले प्रशासन ने इस निर्देश पर कार्रवाई नहीं की थी. एनजीटी ने निर्देश दिया था कि राज्य में चल रहे सभी अवैध बूचड़खानों को तत्काल बंद किया जाए. यदि यह केवल बूचड़खानों के नियमन का मामला है तो इसे कुछ समय लगाकर ठीक किया जा सकता है. पर यह राजनीति का, खासतौर से धार्मिक भावनाओं से जुड़ी राजनीति का, विषय बन जाने के बाद काफी टेढ़ा मसला बन गया है.

भारत में मांसाहार अवैध नहीं है और न मांस का कारोबार. पर इसके साथ स्वास्थ्य और पर्यावरण के मसले जुड़े हैं, कई तरह की शर्तें भी. उनका पालन होना भी चाहिए. चूंकि हिन्दू धर्म और संस्कृति का शाकाहार से सम्बंध है, इसलिए इस मसले के सांस्कृतिक पहलू भी हैं. देश के अनेक राज्यों में गोबध निषेध है. इन अंतर्विरोधों के कारण इन दिनों उत्तर प्रदेश में मांस के कारोबार को लेकर विवाद खड़ा हुआ है. अब भाजपा शासित कुछ और राज्य बूचड़खानों को लेकर कार्रवाई करने का मन बना रहे हैं.

प्रश्न प्रदेश में योगी का प्रवेश

आदित्यनाथ योगी की सरकार बनने के बाद से दो या तीन बातों के लिए उत्तर प्रदेश का नाम राष्ट्रीय मीडिया में उछल रहा है। एक, ‘एंटी रोमियो अभियान’, दूसरे बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवाई और तीसरे बोर्ड की परीक्षा में नकल के खिलाफ अभियान। तीनों अभियानों को लेकर परस्पर विरोधी राय है। एक समझ है कि यह ‘मोरल पुलिसिंग’ है, जो भाजपा की पुरातनपंथी समझ को व्यक्त करती है। पर जनता का एक तबका इसे पसंद भी कर रहा है। सड़क पर निकलने वाली लड़कियों के साथ छेड़-छाड़ की शिकायतें हैं। पर क्या यह अभियान स्त्रियों को सुरक्षा देने का काम कर रहा है? मीडिया में जो वीडियो प्रसारित हो रहे हैं, उन्हें देखकर लगता है कि घर से बाहर जाने वाली लड़कियों को भी अपमानित होना पड़ रहा है। यह तो वैसा ही है जैसे वैलेंटाइन डे पर हुड़दंगी करते हैं। 

इस अभियान को लेकर मिली शिकायतों के बाद प्रशासन ने पुलिस को आगाह किया है कि चाय की दुकानों में खाली बैठे नौजवानों के साथ सख्ती बरतने और मुंडन करने या मुर्गा बनाने जैसी कार्रवाई से बचे। यह मामला हाईकोर्ट तक गया है और लखनऊ खंडपीठ ने इसे सही ठहराया है। अदालत ने कहा-प्रदेश के नागरिकों के लिए संकेत है कि वे भी अनुशासन के लिए अपने बच्चों को शिक्षित करें। उत्तर प्रदेश से प्रेरणा पाकर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने यहाँ भी ऐसा ही अभियान चलाने की घोषणा की है।

क्या उत्तर देगा योगी का प्रश्न प्रदेश?

सन 2014 के चुनाव से साबित हो गया कि दिल्ली की सत्ता का दरवाजा उत्तर प्रदेश की जमीन पर है। दिल्ली की सत्ता से कांग्रेस के सफाए की शुरुआत उत्तर प्रदेश से ही हुई थी। करीब पौने तीन दशक तक प्रदेश की सत्ता गैर-कांग्रेसी क्षेत्रीय क्षत्रपों के हवाले रही। और अब वह भाजपा के हाथों आई है। क्या भाजपा इस सत्ता को संभाल पाएगी? क्या यह स्थायी विजय है? क्या अब गैर-भाजपा राजनीतिक शक्तियों को एक होने का मौका मिलेगा? क्या उनके एक होने की सम्भावना है? सवाल यह भी है कि क्या उत्तर प्रदेश के सामाजिक चक्रव्यूह का तोड़ भाजपा ने खोज लिया है? ऐसे तमाम सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में छिपे हैं।

भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर एक योगी को बैठाकर बहुत बड़ा प्रयोग किया है। क्या यह प्रयोग सफल होगा? पार्टी अपनी विचारधारा का बस्ता पूरी तरह खोल नहीं रही थी। उत्तर प्रदेश के चुनाव ने उसका मनोबल बढ़ाया है। इस साल गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव और होने वाले हैं। उसके बाद अगले साल कर्नाटक में होंगे। योगी-सरकार स्वस्थ रही तो पार्टी एक मनोदशा से पूरी तरह बाहर निकल आएगी। फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि इस प्रयोग का फौरी परिणाम क्या होगा? क्या उत्तर प्रदेश की जनता बदलाव महसूस करेगी?

Saturday, April 1, 2017

किसके पास है ‘नए भारत’ के सपने का कॉपीराइट?

इसे 'आइडिया ऑफ इंडिया' कहते हैं। अपने अतीत और वर्तमान के आधार पर हम अपने समाज की दशा-दिशा के बारे में सोचते हैैं। कुछ को इसमें राष्ट्रवाद दिखाई पड़ता है और कुछ को अंतरराष्ट्रीयतावाद। पर सपने पूरा समाज देखता है, तभी वे पूरे होते हैं। नेता उन सपनों के सूत्रधार बनते हैं। आधुनिक भारत का सपना आजादी के आंदोलन के दौरान इस देश ने देखना शुरू कर दिया था। क्योंकि आजादी एक सपना थी। पिछले महीने इंडिया टुडे कॉनक्लेव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, आजादी के आंदोलन के कालखंड में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं पर राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं भारी पड़ती थीं। उनकी तीव्रता इतनी थी कि वह देश को सैकड़ों सालों की गुलामी से बाहर निकाल लाई। पर अब समय की मांग है-आजादी के आंदोलन की तरह विकास का आंदोलन- जो व्यक्तिगत आकांक्षाओं का सामूहिक आकांक्षाओं में विस्तार करे और देश का सर्वांगीण विकास हो।

Friday, March 31, 2017

सर्वेश्वर की कहानी 'लड़ाई'

अभी फेसबुक पर किसी का स्टेटस पढ़ा, 'क्या कोई 100 फीसदी सच बोल सकता है?' पता नहीं गांधी जी ने सौ फीसदी सच बोला या नहीं और सत्यवादी हरिश्चंद्र का क्या रिकॉर्ड था, पर व्यावहारिक दुनिया में कई बार सच से ज्यादा जरूरी होता है झूठ बोलना। कई बार सच अमानवीय भी हो सकता है। बरसों पहले मैेने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कहानी 'लड़ाई' पढ़ी थी। शायद अस्सी के दशक की शुरुआत थी। उसके बाद लखनऊ की संस्था दर्पण ने इस कहानी पर एक नाटक बनाया हरिश्चन्नर की लड़ाई। उर्मिल थपलियाल ने उसका निर्देशन किया था। काफी रोचक नाटक था और उसे देश भर में तारीफ मिली। इस कहानी को मूल रूप में पढ़ना चाहिए। इसे मैं नीचे दे रहा हूँ-

आँख खुलते ही उसने निश्चय किया कि वह सत्य के लिए लड़ेगा| न खुद कोई गलत काम करेगा, न दूसरों को करने देगा| इस निश्चय से उसे एक विचित्र प्रकार की शान्ति मिली| अचानक दुनिया छोटी लगने लगी और वह उसके लिए अपने को बड़ा महसूस करने लगा| अपने अंदर एक नयी ताकत उसने पायी| उसे लगा, उसकी कमर सीधी हो गयी है और लटकी हुई गर्दन उठ गयी है| वह ज़्यादा देर लेटा नहीं रह सका| बिस्तरे से कूदकर खड़ा हो गया| मुट्ठियाँ बांधकर और दोनों हाथ ऊपर उठाकर वह चिल्लाया  अब मैं सत्य के लिए लडूंगा|
उसकी आवाज़ सुनकर उसकी स्त्री जो रजाई में सुख की नींद सो रही थी, घबरा गयी| रजाई में से सिर निकालकर उसने पूछा 
यह तुम्हें क्या हो गया है?
मैंने निश्चय किया है कि मैं सत्य के लिए लड़ूंगा| चाहे जो कुछ हो| उसने दृढ़ स्वर में जवाब दिया|
स्त्री ने देखा, उसका चेहरा बदल गया है| आँखें जितना बाहर देख रही हैं, उतना ही भीतर भी देखने लगी हैं| सारी आकृति धनुष की तरह तन गयी है| उसे जाने कैसा डर लगने लगा| वह रजाई में उठकर बैठ गयी|
बाहर काफ़ी धूप निकल आयी थी| दिन चढ़ आया था| उसने दरवाज़ा खोला| सामने बंधा हुआ अखबार पड़ा था| उसने उसे उठाया और जेब से दियासलाई निकालकर उसमें आग लगा दी| अखबार भभककर जल उठा|
यह क्या कर रहे हो? घबराकर स्त्री चिल्लाई|
कुछ नहीं| लड़ाई शुरू हो गयी है| उसने सीधा-सा जवाब दिया|
लोग तुम्हें पागल कहेंगे|
झूठा होने से पागल होना बेहतर है| मैं कायर और ढोंगियों से नफ़रत करता हूँ| अखबार कायर और ढोंगियों की वकालत करते हैं| झूठे हैं| मैं उनसे निपटूंगा? उसने सख्त आवाज़ में कहा|
हाय! यह तुम्हें क्या हो गया है? तुम्हारा दिमाग कैसे खराब हो गया? मुसीबत में ही सही, ज़िंदगी तो किसी तरह कट रही थी| अब कैसे कटेगी? स्त्री की आँखों में आंसू आ गए|
मैं नहीं जानता कैसे कटेगी| पर न मैं खुद कोई गलत काम करूँगा, न दूसरों को करने दूंगा| उसने दोहराया|
फिर घर का क्या होगा? बच्चों का क्या होगा? मेरा क्या होगा? स्त्री ने पूछा|
जो भी हो| झूठ अब नहीं चलेगा| कुछ भी चलाने के लिए उसका सहारा मैं नहीं लूँगा| अब तय हो गया|
जला हुआ अखबार उड़ रहा था| उसकी कालिख उड़-उड़कर चारों ओर फैल रही थी  बाहर गली में, भीतर कमरे में| उसने पास उड़ते एक हल्के फूले हुए बेजान टुकड़े को पैर से दबा दिया| उतनी ज़मीन काली हो गयी|

Tuesday, March 28, 2017

ट्रंप को लगते शुरूआती झटके

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कामकाज के 100 दिन पूरे नहीं हुए हैं. इतने कम समय में ही वे कई तरह के विवादों में फँसने लगे हैं. स्पष्ट है कि शत्रु उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं. ट्रंप ने मीडिया की भी तल्ख आलोचना की है. इन विवादों की वजह से उनके राजनीतिक एजेंडा को चोट लग रही है. आतंकवाद से लड़ाई की बिना पर उन्होंने पश्चिम एशिया के कुछ देशों के नागरिकों के अमेरिका आगमन पर पाबंदियाँ लगाने की जो कोशिशें कीं, उन्हें अदालती अड़ंगों सा सामना करना पड़ा. हैल्थ-केयर और टैक्स रिफॉर्म के उनके एजेंडा पर भी काले बादल छाए हैं.

Monday, March 27, 2017

अब माइक्रो-आतंकी खतरा

पिछले बुधवार को लंदन के वेस्टमिंस्टर इलाके में आतंकी कार्रवाई करके इस्लामी चरमपंथियों ने आतंक फैलाने की जो कोशिश की उसकी गहराई तक जाने की जरूरत है। आतंकी रणनीतिकारों ने कम से कम जोखिम लेकर ज्यादा से ज्यादा पब्लिसिटी हासिल कर ली। उनका यही उद्देश्य था। अमेरिका में 9/11 हमले के बाद आतंकवादियों ने उच्च तकनीक की मदद ली थी। उसका तोड़ वैश्विक पुलिस व्यवस्था ने निकाल लिया। तकनीकी इंटेलिजेंस और हवाई अड्डों की सुरक्षा व्यवस्था में सुधार करके उनकी गतिविधियों को काफी सीमित कर दिया था। अब आतंकवादी जिस रास्ते पर जा रहे हैं उसमें मामूली तकनीक का इस्तेमाल है। इसे विशेषज्ञ माइक्रो-आतंकवाद बता रहे हैं।

लंदन पर हुए हमले के एक दिन बाद बेल्जियम के एंटवर्प शहर में लगभग इसी अंदाज में एक व्यक्ति ने अपनी कार भीड़ पर चढ़ा दी। इस घटना में भी कई लोग घायल हुए और हमलावर पकड़ा गया है। आतंक की इस नई रणनीति पर गौर करने की जरूरत है। लंदन का यह हमला पिछले आठ महीने में पाँचवाँ बड़ा हमला है, जिसमें मोटर वाहन का इस्तेमाल किया गया है।

Tuesday, March 21, 2017

आर्थिक मैदान में होगी योगी की परीक्षा

योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने की खबर पहली बार में चौंकाती है. पर किसी स्तर पर गहराई से विचार भी किया गया होगा. इतना साफ है कि पार्टी ने भविष्य में ज्यादा खुले एजेंडा के साथ सामने आने का फैसला कर लिया है. मध्य प्रदेश में पार्टी ने उमा भारती को तकरीबन इसी मनोभावना से प्रेरित होकर मुख्यमंत्री बनाया था. वह प्रयोग सफल नहीं हुआ. पर योगी का प्रयोग सफल भी हो सकता है.

Monday, March 20, 2017

अब राष्ट्रपति-चुनाव की रस्साकशी

पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों के कारण नरेन्द्र मोदी और भाजपा की बढ़ी हुई ताकत का पहला संकेत इस साल राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के चुनाव में दिखाई पड़ेगा. अगले साल राज्यसभा के चुनाव से स्थितियों में और बड़ा गुणात्मक बदलाव आएगा. इस साल 25 जुलाई को प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. राष्ट्रपति चुनाव की रस्साकशी कई मानों में रोचक और निर्णायक होगी.

Sunday, March 19, 2017

बैसाखियों पर कांग्रेस

गोवा और मणिपुर में कांग्रेस से भाजपा में आए विधायकों को पुरस्कार मिले हैं। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भी मिलेंगे। दिग्विजय सिंह इसे खरीदना कहते हैं, पर भारतीय राजनीति में यह प्रक्रिया लम्बे अरसे से चल रही है। संयोग से कांग्रेस पार्टी ही इसकी प्रणेता है। देश की राजनीति के ज्यादातर मुहावरे उसके नाम हैं। गोवा में कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका गोवा फॉरवर्ड पार्टी ने दिया है। उसके तीन विधायक भाजपा सरकार के मंत्री बन गए हैं। तीनों कांग्रेस से आए हैं। तीनों के खिलाफ कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किए थे, क्योंकि उसे लगता था कि चुनाव के बाद ये लोग काम आएंगे। ऐसा नहीं हुआ। यह बात केवल गोवा में ही नहीं देशभर में कांग्रेस की दुर्दशा को रेखांकित करती है।

Wednesday, March 15, 2017

चुनौती पूँजी निवेश की

पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अपेक्षित सफलता पाने के बावजूद सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक होगी. हाल में केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) ने जब अर्थ-व्यवस्था के नवीनतम आँकड़े जारी किए तब कुछ लोगों की प्रतिक्रिया थी कि आँकड़ों में हेरे-फेर है. वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच ने अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के लिए 7 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर को चौंकाने वाला बताया. इससे पिछली तिमाही में यह दर 7.4 प्रतिशत थी. एजेंसी को उम्मीद है कि भारत की जीडीपी वृद्धि 2016-17 में 7.1 प्रतिशत रहेगी जो 2017-18 और 2018-19 दोनों वित्त वर्ष में बढ़कर 7.7 प्रतिशत तक हो जाएगी.

Sunday, March 12, 2017

भाजपा की बदली भाग्य-रेखा

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी की असाधारण जीत के कारणों का विश्लेषण अभी लम्बे समय तक चलेगा, पर एक बात साफ है कि विरोधी दलों ने यह समझने की कोशिश नहीं की है कि ऐसा हो क्यों रहा है। वे शुद्ध रूप से जातीय और साम्प्रदायिक जोड़-तोड़ के भीतर समस्या का समाधान देख रहे हैं। वे नहीं समझ पा रहे हैं कि वे जिसे समाधान समझ रहे हैं, वह उनकी समस्या है। 
इस जीत का अनुमान नरेन्द्र मोदी को था या नहीं था, कहना मुश्किल है, पर यह अनुमान से कहीं बड़ी है। नरेन्द्र मोदी बहुत बड़े ब्रांड के रूप में उभरे हैं। यह देश मजबूत, दृढ़ और तेजी से फैसला करने वाले नेता को पसंद करता है। जो नेता इस रास्ते पर चलना चाहता है उसके लिए रास्ते भी बना देता है। ऐसा इंदिरा गांधी के साथ हुआ और अब मोदी के साथ हो रहा है। सामान्य वोटर यह मानता है कि कोई काम कर सकता है तो वह मोदी है। 
मोदी के आगमन के दस साल पहले से कांग्रेस पार्टी ने देश के प्रधानमंत्री पद को निरीह और अशक्त बनाकर अपनी राह में जो काँटे बोए थे, वे उसे अनंत काल तक परेशान करेंगे। बहरहाल मोदी के नेतृत्व पर भारी विश्वास के जोखिम भी हैं, पर उन्हें उभरने में वक्त लगेगा। फिलहाल उनकी यह जीत गुजरात और हिमाचल में होने वाले चुनाव के संदर्भ में पार्टी के आत्मविश्वास को बढ़ाएगी। अब जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में भी भाजपा की ताकत बढ़ गई है। सबसे बड़ी बात 2019 के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश ने अपना दरवाजा भाजपा के लिए खोल दिया है।  

Monday, March 6, 2017

लोकतंत्र का भ्रमजाल

पिछले हफ्ते देश के आर्थिक विकास के तिमाही परिणाम आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि अर्थव्यवस्था को सुधारने के मामले में हारवर्ड वालों को हार्ड वर्क वालों ने पछाड़ दिया. मोदी ने जीडीपी के ताजा आंकड़ों के हवाले से बताया कि नोटबंदी के बावजूद अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी नहीं पड़ी. एक तरफ वे हैं जो हारवर्ड की बात करते हैं और दूसरी तरफ यह गरीब का बेटा है जो हार्ड वर्क से देश की अर्थव्यवस्था बदलने में लगा है.
मोदी ने यह बात चुनाव सभा में कही. उनके भाषणों में नाटकीयता होती है. वोटर को नाटकीयता पसंद भी आती है. पर चुनाव नाटक नहीं है. चुनाव से जुड़ा विमर्श असलियत को सामने नहीं लाता, बल्कि भरमाता है. चिंता की बात है कि चुनाव के प्रति वोटर की नकारात्मकता बढ़ी है. उसे जीडीपी के आँकड़ों को पढ़ना नहीं आता. राजनीति की जिम्मेदारी है कि उसका मतलब समझाए.  

Sunday, March 5, 2017

अतिशय चुनाव के सामाजिक दुष्प्रभाव

बिहार में नरेन्द्र मोदी के प्रति नाराजगी जताने के लिए उनकी तस्वीर पर जूते-चप्पल चलाए गए। इस काम के लिए लोगों को एक मंत्री ने उकसाया था। उधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक पदाधिकारी कुंदन चंद्रावत ने केरल के मुख्यमंत्री पिनारी विजयन का सिर काटकर लाने वाले को इनाम देने की घोषणा की थी, जिसपर उन्हें संघ से निकाल दिया गया है। हाल में कोलकाता की एक मस्जिद के इमाम ने नरेन्द्र मोदी के सिर के बाल और दाढ़ी मूंड़ने वाले को इनाम देने की घोषणा की थी। ये मौलाना इससे पहले तसलीमा नसरीन की गर्दन पर भी इनाम घोषित कर चुके थे।

Wednesday, March 1, 2017

अब मोदी के सामने है राष्ट्रपति-चुनाव की जटिल चुनौती

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम नरेन्द्र मोदी और भाजपा की भावी राजनीति पर बड़ा असर डालने वाले हैं. इसका पहला संकेत राष्ट्रपति चुनाव में दिखाई पड़ेगा. इस साल 25 जुलाई को प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. सवाल है कि क्या बीजेपी राष्ट्रपति पद पर अपना प्रत्याशी बैठा पाएगी? राष्ट्रपति-चुनाव का एक गणित है. उसे देखते हुए एनडीए बहुमत से अभी कुछ दूर है. 11 मार्च को आने वाले परिणाम इस गणित को स्पष्ट करेंगे. पर सवाल केवल गणित का ही नहीं है.

Sunday, February 26, 2017

नोटबंदी भी एक कसौटी है

हाल के वर्षों में यह नजर आया है कि स्थानीय निकायों के चुनाव भी राज्य और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति और जनमत को व्यक्त करते हैं। बंगाल और केरल की राजनीति में यह प्रवृत्ति पहले से देखने को मिलती थी, क्योंकि वामपंथी दल हरेक स्तर पर विचारधारा के साथ सक्रिय रहते हैं। इन राज्यों में ग्राम सभा स्तर तक राजनीतिक दल पहुँच चुके हैं, जबकि एक अरसे तक देश में इस बात पर जोर दिया जाता था कि स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व राजनीति पहचान के आधार पर नहीं होना चाहिए क्योंकि वहाँ विचारधारा की जगह स्थानीय मुद्दे होते हैं। ये परिणाम स्थानीय निकाय स्तर तक पार्टी के संगठन और नेतृत्व की क्षमता के संकेतक भी होते हैं।