तमिलनाडु में इन दिनों दो फिल्में चर्चा का विषय हैं। एक है फिल्म अभिनेता से राजनेता बने विजय की ‘जन नायकन’ और दूसरी शिवकार्तिकेयन की ‘पराशक्ति।’ दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के सुपरस्टार विजय ने करीब डेढ़ साल पहले ‘तमिषगा वेत्री कषगम’ (टीवीके) नाम से पार्टी बनाकर राजनीति में प्रवेश किया है। दूसरी तरफ ‘पराशक्ति’ अपनी एंटी-हिंदी थीम के कारण चर्चित है। दोनों को फिल्म सेंसर बोर्ड की कुछ आपत्तियों का सामना करना पड़ा है। इस वजह से ‘जन नायकन’ रिलीज़ नहीं हो पाई, जबकि ‘पराशक्ति’ करीब बीस बदलाव करके रिलीज़ हो गई है।
तमिल राजनीति
में दोनों फिल्मों के गहरे निहितार्थ हैं। हालाँकि विजय पेरियार के रास्ते पर चलने
का दावा करते हैं और राज्य की द्रविड़ पार्टियों की भाषा नीति के पक्षधर हैं, पर
वे सत्तारूढ़ डीएमके के सामने चुनौती के रूप में उभर कर आना चाहते हैं। उनकी फिल्म
की थीम जनता के बीच से उभर कर आए ऐसी ही नेता पर केंद्रित है। इसमें जनता के नायक
की अवधारणा, विजय के किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है।
तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा के कलाकारों का बोलबाला पचास के दशक से ही शुरू हो गया था। वहाँ की ‘कटआउट’ संस्कृति में ‘आसमानी कद’ के राजनेता सिनेमा के पर्दे से आए। तमिलनाडु शायद अकेला ऐसा राज्य है, जहाँ लगातार पाँच मुख्यमंत्री सिनेमा जगत से आए। केवल कलाकारों की बात ही नहीं है, वहाँ की फिल्मों की स्क्रिप्ट में द्रविड़ विचारधारा को डालने का काम भी किया। 1952 की फिल्म ‘पराशक्ति’ ने द्रविड़ राजनीतिक संदेश जनता तक पहुँचाया था। इस फिल्म का स्क्रीनप्ले और संवाद के करुणानिधि ने लिखे थे, जो बाद में राज्य के मुख्यमंत्री बने।
