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Monday, July 17, 2017

नए दौर में प्रवेश करती भारतीय राजनीति

राजनीतिक गलियारों में डेढ़-दो महीने की अपेक्षाकृत चुप्पी के बाद आज दो बड़ी राजनीतिक घटनाएं होने जा रहीं हैं, जिनका राजनीति पर असर देखने को मिलेगा. देश के चौदहवें राष्ट्रपति के चुनाव के अलावा संसद का मॉनसून सत्र आज शुरू हो रहा है. सोलहवीं लोकसभा के तीन साल गुजर जाने के बाद यह पहला मौका है, जब 18 विरोधी दल एक सामूहिक रणनीति के साथ संसद में उतर रहे हैं. पिछले मंगलवार को इन दलों ने उप-राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी का नाम तय करने के साथ अपनी भावी रणनीति का खाका भी तय किया है. ये दल अब महीने में कम से कम एक बार बैठक करेंगे. ये बैठकें दिल्ली में ही नहीं अलग-अलग राज्यों में होंगी. ज्यादा महत्वपूर्ण है संसदीय गतिविधियों में इनका समन्वय. राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया अब क्रमशः तेज होगी.

Friday, July 7, 2017

भारतीय भाषाओं को लड़ाने की कोशिश

बंगाल में जड़ें जमाने की कोशिश में भारतीय जनता पार्टी साम्प्रदायिक सवालों को उठा रही है. उसके लिए परिस्थितियाँ अच्छी हैं, क्योंकि ममता बनर्जी ने इस किस्म की राजनीति के दूसरे छोर पर कब्जा कर रखा है. भावनाओं की खेती के अर्थशास्त्र को समझना है तो वोट की राजनीति पढ़ना चाहिए. ऐसी ही खेती का जरिया भाषाएं हैं. कर्नाटक में अगले साल चुनाव होने वाले हैं. उसके पहले वहाँ भाषा को लेकर एक अभियान शुरू हुआ है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस तीन भाषा सूत्र की समर्थक है, पर बेंगलुरु मेट्रो में हिंदी विरोध की वह समर्थक है. साम्प्रदायिक राजनीति का यह एक और रूप है, इसमें सम्प्रदाय की जगह भाषा ले लेती है. भाषा सामूहिक पहचान से जुड़ी है. इस आंदोलन के पीछे अंग्रेजी-परस्त लोग भी शामिल हैं, क्योंकि अंग्रेजी उन्हें 'साहब' की पहचान देने में मददगार है.
इन दिनों बेंगलुरु मेट्रो के सूचना-पटों में अंग्रेजी और कन्नड़ के साथ हिंदी के प्रयोग को लेकर एक आंदोलन चलाया जा रहा है. इस आंदोलन को अंग्रेजी मीडिया ने हवा भी दी है. शहर के कुछ मेट्रो स्टेशनों में हिंदी में लिखे नाम ढक दिए गए हैं. ऐसा ही एक आंदोलन कुछ समय पहले दक्षिण भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों के नाम-पटों में हिंदी को शामिल करने के विरोध में खड़ा हुआ था. हाल में राम गुहा और शशि थरूर जैसे लोगों ने बेंगलुरु मेट्रो-प्रसंग में हिंदी थोपे जाने का विरोध किया है. एक तरह से यह भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाने की कोशिश है. साथ ही अंग्रेजी के ध्वस्त होते किले को बचाने का प्रयास भी.

Thursday, July 6, 2017

डगमग होती विपक्षी एकता

बुधवार को मीरा कुमार ने औपचारिक रूप से पर्चा दाखिल करने के बाद अपने प्रचार-अभियान की शुरूआत कर दी है. उनका कहना है कि यह सिद्धांत की लड़ाई है. संविधान की रक्षा के लिए और देश को साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ में जाने से रोकने के लिए वे खड़ी हुई हैं. वस्तुतः यह सन 2019 के चुनाव में गैर-बीजेपी गठजोड़ का प्रस्थान बिंदु है. देशभर में असहिष्णुता और अल्पसंख्यकों की हत्याओं के खिलाफ आंदोलन खड़ा हो गया है. यह उस राजनीति का पहला अध्याय है, जो राष्ट्रीय स्तर पर उभरेगी.
मीरा कुमार के नामांकन के वक्त 17 दलों के प्रतिनिधि उपस्थित थे. इनके नाम हैं कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद, वाममोर्चा के चार दल, तृणमूल कांग्रेस, राकांपा, नेशनल कांफ्रेंस, डीएमके, झामुमो, जेडीएस, एआईयूडीएफ, केरल कांग्रेस, मुस्लिम लीग. आम आदमी पार्टी इस प्रक्रिया में शामिल नहीं थी, पर वह भी मीरा कुमार के साथ जाएगी. यह प्रभावशाली संख्या है, पर इसके मुख्य सूत्रधार कांग्रेस और वामदल हैं. धर्म-निरपेक्ष राजनीति का काफी बड़ा हिस्सा इस राजनीति से बाहर है.

Friday, June 16, 2017

अंतर्विरोधों की शिकार आम आदमी पार्टी

कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल के बीच अविश्वास की अदृश्य दीवार अब नजर आने लगी है. पिछले शनिवार को राजस्थान के कार्यकर्ताओं की सभा में कुमार विश्वास ने जो कुछ कहा, वह पार्टी हाई कमान को तिलमिलाने भर के लिए काफी था. दिल्ली नगर निगम के चुनाव के बाद से कुमार विश्वास पार्टी के साथ अपने मतभेदों को व्यक्त कर रहे हैं. उन्होंने हाल में एक मीडिया इंटरव्यू में पार्टी के ट्वीट कल्चर पर भी टिप्पणी करते हुए कहा, जो लोग ट्विटर को देश समझते हैं, वे ही देश को ट्विटर समझते हैं.
हाल में पार्टी में हुए फेरबदल के बाद कुमार विश्वास को राजस्थान का प्रभार दिया गया है. वहाँ अगले साल विधानसभा चुनाव हैं. राजस्थान इकाई की पहली बैठक में घोषणा की गई कि पार्टी अरविन्द केजरीवाल के चेहरे पर चुनाव नहीं लड़ेगी. बैठक में यह भी कहा गया कि पार्टी महारानी हटाओ अभियान के बजाय पानी, बिजली और बेहतर स्वास्थ्य जैसे मसलों को लेकर चुनाव लड़ेगी. दिल्ली का वर्चस्ववाद नहीं चलाया जाएगा. कार्यकर्ता ही प्रदेश के फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे वगैरह.

Friday, June 9, 2017

‘टेरर फंडिंग’ की वैश्विक परिभाषा भी हो

नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी ने पिछले कुछ दिनों में कश्मीर, दिल्ली और हरियाणा में 40 से ज्यादा जगहों पर छापेमारी करके टेरर फंडिंग के कुछ सूत्रों को जोड़ने की कोशिश की है. हाल में एक स्टिंग ऑपरेशन से यह बात उजागर हुई थी कि कश्मीर की घाटी में हुर्रियत के नेताओं के अलावा दूसरे समूहों को पाकिस्तान से पैसा मिल रहा है. इन छापों में नकदी, सोना और विदेशी मुद्रा के अलावा कुछ ऐसे दस्तावेज भी मिले हैं, जिनसे पता लगता है कि आतंकी नेटवर्क हमारी जानकारी के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़ा है.

एनआईए ने कुछ बैंक खातों को फ़्रीज़ कराया है और कुछ लॉकरों को सील. यह छापेमारी ऐसे दौर में हुई है जब आतंकी फंडिंग पर नजर रखने वाली संस्था द फाइनैंशल एक्शन टास्क फोर्स इस सिलसिले में जाँच कर रही है. हमें इस संस्था के सामने सप्रमाण जाना चाहिए. पिछले कई साल से संयुक्त राष्ट्र में ‘कांप्रिहैंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म’ को लेकर विमर्श चल रहा है, पर टेररिज्म की परिभाषा को लेकर सारा मामला अटका हुआ है. जब तक ऐसी संधि नहीं होगी, हम साबित नहीं कर पाएंगे कि कश्मीरी आंदोलन का चरित्र क्या है.

Wednesday, May 31, 2017

कश्मीर को बचाए रखने में सेना की भूमिका भी है

जनरल बिपिन रावत के तीखे तेवरों का संदेश क्या है? मेजर गोगोई की पहल को क्या हम मानवाधिकार उल्लंघन के दायरे में रखते हैं? क्या जनरल रावत का कश्मीरी आंदोलनकारियों को हथियार उठाने की चुनौती देना उचित है? उन्होंने क्यों कहा कि कश्मीरी पत्थर की जगह गोली चलाएं तो बेहतर है? तब हम वो करेंगे जो करना चाहते हैं। उन्होंने क्यों कहा कि लोगों में सेना का डर खत्म होने पर देश का विनाश हो जाता है? उनके स्वर राजनेता जैसे हैं या उनसे सैनिक का गुस्सा टपक रहा है?

कश्मीर केवल राजनीतिक समस्या नहीं है, उसका सामरिक आयाम भी है। हथियारबंद लोगों का सामना सेना ही करती है और कर रही है। वहाँ के राजनीतिक हालात सेना ने नहीं बिगाड़े। जनरल रावत को तीन सीनियर अफसरों पर तरजीह देकर सेनाध्यक्ष बनाया गया था। तब रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा था कि यह नियुक्ति बहुत सोच समझ कर की गई है। नियुक्ति के परिणाम सामने आ रहे हैं। सेना ने दक्षिण कश्मीर के आतंक पीड़ित इलाकों में कॉम्बिंग ऑपरेशन चला रखा है। पिछले दो हफ्तों में उसे सफलताएं भी मिली हैं। 

Wednesday, May 24, 2017

‘दीदी’ का बढ़ता राष्ट्रीय रसूख

बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद भी ममता बनर्जी की राष्ट्रीय अभिलाषा दबी-छिपी नहीं है. पिछले साल नवंबर में नोटबंदी के बाद सबसे पहले उसके खिलाफ आंदोलन उन्होंने ही शुरू किया. उनकी पार्टी का नाम अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस है. वे साबित करती रही हैं कि क्षेत्रीय नहीं, राष्ट्रीय नेता हैं. सन 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में मुलायम सिंह के साथ मिलकर अपनी पसंद के प्रत्याशियों के नाम की पेशकश सबसे पहले उन्होंने ही की थी. इस बार भी वे पीछे नहीं हैं. पिछले हफ्ते वे इस सिलसिले में सोनिया गांधी और विपक्ष के कुछ नेताओं से बात करके गईं हैं. राष्ट्रपति पद के चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बाद तीसरे नंबर पर वोट तृणमूल कांग्रेस के पास हैं.

ममता की राजनीति टकराव मोल लेने की है. इस तत्व ने भी उनका रसूख बढ़ाया है. बंगाल में इसी आक्रामक शैली से उन्होंने सीपीएम को मात दी. नरेंद्र मोदी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन की योजना में भी उनकी केंद्रीय भूमिका हो सकती है. बहरहाल हाल में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल के सात नगरपालिका क्षेत्रों में हुए चुनावों की वजह से भी खबरों में हैं. इन चुनावों का राष्ट्रीय राजनीति के साथ कोई बड़ा रिश्ता नहीं है, पर कुछ कारणों से ये चुनाव राष्ट्रीय खबर बने.

Thursday, April 27, 2017

भँवर में घिरी आम आदमी पार्टी

यह पहला मौका है, जब एमसीडी के चुनावों ने इतने बड़े स्तर पर देशभर का ध्यान अपनी ओर खींचा. वस्तुतः ये नगरपालिका चुनाव की तरह लड़े ही नहीं गए. इनका आयाम राष्ट्रीय था, प्रचार राष्ट्रीय और परिणामों की धमक भी राष्ट्रीय है. सहज रूप से नगर निगम के चुनाव में साज-सफाई और दूसरे नागरिक मसलों को हावी रहना चाहिए था. ऐसा होता तो बीजेपी के लिए जीतना मुश्किल होता, क्योंकि पिछले दस साल से उसका एमसीडी पर कब्जा होने के कारण जनता की नाराजगी स्वाभाविक थी. पर हुआ यह कि दस साल की एंटी इनकम्बैंसी के ताप से बीजेपी को ‘मोदी के जादू’ ने बचा लिया.
एमसीडी चुनाव की ज्यादा बड़ी खबर है आम आदमी पार्टी की पराजय. सन 2012 तक दिल्ली में बीजेपी और कांग्रेस ही दो प्रमुख दल थे. सन 2013 के अंतिम दिनों में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी एक तीसरी ताकत के रूप में उभरी. पर वह नम्बर एक ताकत नहीं थी. सन 2015 में फिर से हुए चुनाव में वह अभूतपूर्व बहुमत के साथ सामने आई. उस विशाल बहुमत ने ‘आप’ को बजाय ताकत देने के कमजोर कर दिया. एक तरफ जनता के मन में अपेक्षाएं बढ़ी, वहीं पार्टी कार्यकर्ता के मन में सत्ता की मलाई खाने की भूख. पार्टी ने अपने विधायकों को पद देने के लिए 21 संसदीय सचिवों की नियुक्ति की. इससे एक तरफ कानूनी दिक्कतें बढ़ीं, वहीं पंजाब में पार्टी के भीतर मारा-मारी बढ़ी, जहाँ सत्ता मिलने की सम्भावनाएं बन रहीं थीं.

Tuesday, March 28, 2017

ट्रंप को लगते शुरूआती झटके

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कामकाज के 100 दिन पूरे नहीं हुए हैं. इतने कम समय में ही वे कई तरह के विवादों में फँसने लगे हैं. स्पष्ट है कि शत्रु उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं. ट्रंप ने मीडिया की भी तल्ख आलोचना की है. इन विवादों की वजह से उनके राजनीतिक एजेंडा को चोट लग रही है. आतंकवाद से लड़ाई की बिना पर उन्होंने पश्चिम एशिया के कुछ देशों के नागरिकों के अमेरिका आगमन पर पाबंदियाँ लगाने की जो कोशिशें कीं, उन्हें अदालती अड़ंगों सा सामना करना पड़ा. हैल्थ-केयर और टैक्स रिफॉर्म के उनके एजेंडा पर भी काले बादल छाए हैं.

Tuesday, March 21, 2017

आर्थिक मैदान में होगी योगी की परीक्षा

योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने की खबर पहली बार में चौंकाती है. पर किसी स्तर पर गहराई से विचार भी किया गया होगा. इतना साफ है कि पार्टी ने भविष्य में ज्यादा खुले एजेंडा के साथ सामने आने का फैसला कर लिया है. मध्य प्रदेश में पार्टी ने उमा भारती को तकरीबन इसी मनोभावना से प्रेरित होकर मुख्यमंत्री बनाया था. वह प्रयोग सफल नहीं हुआ. पर योगी का प्रयोग सफल भी हो सकता है.

Wednesday, March 15, 2017

चुनौती पूँजी निवेश की

पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अपेक्षित सफलता पाने के बावजूद सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक होगी. हाल में केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) ने जब अर्थ-व्यवस्था के नवीनतम आँकड़े जारी किए तब कुछ लोगों की प्रतिक्रिया थी कि आँकड़ों में हेरे-फेर है. वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच ने अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के लिए 7 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर को चौंकाने वाला बताया. इससे पिछली तिमाही में यह दर 7.4 प्रतिशत थी. एजेंसी को उम्मीद है कि भारत की जीडीपी वृद्धि 2016-17 में 7.1 प्रतिशत रहेगी जो 2017-18 और 2018-19 दोनों वित्त वर्ष में बढ़कर 7.7 प्रतिशत तक हो जाएगी.

Wednesday, March 1, 2017

अब मोदी के सामने है राष्ट्रपति-चुनाव की जटिल चुनौती

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम नरेन्द्र मोदी और भाजपा की भावी राजनीति पर बड़ा असर डालने वाले हैं. इसका पहला संकेत राष्ट्रपति चुनाव में दिखाई पड़ेगा. इस साल 25 जुलाई को प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. सवाल है कि क्या बीजेपी राष्ट्रपति पद पर अपना प्रत्याशी बैठा पाएगी? राष्ट्रपति-चुनाव का एक गणित है. उसे देखते हुए एनडीए बहुमत से अभी कुछ दूर है. 11 मार्च को आने वाले परिणाम इस गणित को स्पष्ट करेंगे. पर सवाल केवल गणित का ही नहीं है.

Tuesday, February 21, 2017

रक्षा उद्योगों में आत्मनिर्भरता

बेंगलुरु में हाल में लगे एयरो इंडिया-2017 शो में भारतीय वायुसेना ने पहले स्वदेशी एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम को कमीशन करके रक्षा में स्वदेशीकरण की लम्बी प्रक्रिया में एक बड़ा कदम रखा है। आकाश में किसी भी प्रकार की गतिविधि पर नजर रखने वाले अवॉक्स आज किसी भी वायुसेना की पहली जरूरत है। हालांकि यह उपलब्धि है, पर ह कार्यक्रम अपने समय से तकरीबन छह साल पीछे चल रहा है।

Saturday, February 11, 2017

संसदीय मर्यादा दो हाथों की ताली

संसदीय मर्यादाओं और राजनीतिक शब्दावली को लेकर गंभीर विमर्श की जरूरत दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। इसकी जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर जो बात कही और उसे लेकर कांग्रेस पार्टी ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की, दोनों से साफ जाहिर है कि ताली एक हाथ से नहीं बज सकती। इस कटुता को रुकना चाहिए। और इसकी जगह गंभीर विमर्श को बढ़ाया जाना चाहिए।
गुजरात में सन 2007 के विधानसभा चुनाव की शुरुआत में सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था। पिछले साल सर्जिकल स्ट्राइक के बाद राहुल गांधी ने खून की दलाली शब्दों का इस्तेमाल किया था। कोई मौका ऐसा नहीं होता, जब राजनीति में आमराय दिखाई पड़ती हो। बेशक सभी दलों के हित अलग-अलग हैं, पर कहीं और कभी तो आपसी सहमति भी होनी चाहिए।

Thursday, February 2, 2017

आर्थिक सुधारों और ग्रामीण विकास पर केंद्रित बजट

इस बजट को देश के चमत्कारिक बदलाव का बजट माना जा सकता है. एक दिन पहले पेश की गई आर्थिक समीक्षा ने बताया था कि इस साल खेती में 4.1 प्रतिशत की दर से संवृद्धि की उम्मीद है. इसके पीछे बेहतर मॉनसून का हाथ भी है. फसल का रकबा भी बढ़ने की सूचनाएं हैं. यानी ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ रहीं है. हालात ठीक रहे तो अगले साल खेती की विकास दर 6 फीसदी होगी. कुछ साल पहले हमारी कृषि विकास दर गिरते-गिरते शून्य तक पहुँचने जा रही थी.
मोदी सरकार की घोषणा है कि सन 2022 तक हम देश के किसानों की आय दुगनी करेंगे. इसके लिए ग्रामीण जीवन में बदलाव लाने की जरूरत होगी. सरकार ने कांट्रैक्ट खेती के कानून में बदलाव करने की घोषणा की है. फसल बीमा योजना में कवरेज को 40 फीसदी बढ़ाया गया है. सॉयल हैल्थ कार्ड के लिए कृषि विज्ञान केंद्रों में मिनी लैब्स बनाने का प्रावधान किया है ताकि किसान वहां जाकर अपनी खेती की जमीन की मिट्टी का टेस्ट कर सकें.

Friday, January 27, 2017

जल्लीकट्टू बनाम आधुनिकता

तमिलनाडु में जल्लीकट्टू आंदोलन ने कई तरह के सवाल खड़े किए हैं. पहला सवाल आधुनिकता और परंपरा के द्वंद्व का है. उससे ज्यादा बड़ा सवाल सांविधानिक मर्यादा का है. मामला सुप्रीम कोर्ट में होने के बावजूद राज्य सरकार ने अध्यादेश लाने की पहल की. इसके पहले जनवरी 2016 में केंद्र सरकार ने कुछ पाबंदियों के साथ जल्लीकट्टू के खेल को जारी रखने की एक अधिसूचना जारी की थी. अदालत ने उस अधिसूचना को न केवल स्थगित किया, बल्कि केंद्र सरकार से अपनी नाराजगी भी जाहिर की थी.

Thursday, January 5, 2017

इन चुनावों पर हावी रहेंगे राष्ट्रीय सवाल

यह साल सन 2019 के पहले चुनाव के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण साल है. चुनाव आयोग ने जिन पांच राज्यों में चुनाव की तारीखें घोषित की हैं उनके अलावा गुजरात और हिमाचल प्रदेश दो राज्य और बचे हैं, जहाँ साल के अंत में चुनाव होंगे. इस साल राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति पद के चुनाव भी होने वाले हैं. इस लिहाज से चुनाव की जो बयार अब बहनी शुरू हुई है वह साल भर बहेगी. केवल बहेगी ही नहीं तमाम नेताओं का राजनीतिक भविष्य लिख कर जाएगी.

स्वाभाविक रूप से विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर होते हैं. चूंकि हर राज्य के अलग-अलग मसले हैं, इसलिए उनके आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर एक राय नहीं बनाई जा सकती. फिर भी इस साल के चुनावों से जुड़े कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब सारे परिणाम आने के बाद ही मिलेंगे.

Thursday, November 10, 2016

ट्रम्प से ज्यादा महत्वपूर्ण है अमेरिकी सिस्टम


अमेरिकी मीडिया के कयास के विपरीत डोनाल्ड ट्रम्प का जीतना कुछ लोगों को विस्मयकारी लगा, जिसकी जरूरत नहीं है। अमेरिकी चुनाव की प्रक्रिया ऐसी है कि ज्यादा वोट जीतने वाला भी हार सकता है। यदि वे हार भी जाते तो उस विचार की हार नहीं होती, जो इस चुनाव के पीछे है। लगभग कुछ दशक की उदार अमेरिकी व्यवस्था के बाद अपने राष्ट्रीय हितों की फिक्र वोटर को हुई है। कुछ लोग इसे वैश्वीकरण की पराजय भी मान रहे हैं। वस्तुतः यह अंतर्विरोधों का खुलना है। इसमें किसी विचार की पूर्ण पराजय या अंतिम विजय सम्भव नहीं है। अमेरिका शेष विश्व से कुछ मानों में फर्क देश है। यह वास्तव में बहुराष्ट्रीय संसार है। इसमें कई तरह की राष्ट्रीयताएं बसती हैं। हाल के वर्षों में पूँजी के वैश्वीकरण के कारण चीन और भारत का उदय हुआ है। इससे अमेरिकी नागरिकों के आर्थिक हितों को भी चोट लगी है। ट्रम्प उसकी प्रतिक्रिया हैं। क्या यह प्रतिक्रिया गलत है? गलत या सही दृष्टिकोण पर निर्भर है। पर यह प्रतिक्रिया अस्वाभाविक नहीं है। दुनिया के ऐतिहासिक विकास की यह महत्वपूर्ण घड़ी है। अमेरिकी चुनाव की खूबसूरती है कि हारने के बाद प्रत्याशी विजेता को समर्थन देने का वायदा करता है और जीता प्रत्याशी अपने आप को उदार बनाता है। ट्रम्प ने चुनाव के बाद इस उदारता का परिचय दिया है। अमेरिकी प्रसासनिक व्यवस्था में राष्ट्रपति बहुत ताकतवर होता है, पर वह निरंकुश नहीं हो सकता। अंततः वह व्यवस्था ही काम करती है। 
अमेरिका में राष्ट्रपति पद का जैसा चुनाव इस बार हुआ है, वैसा कभी नहीं हुआ। दोनों प्रत्याशियों की तरफ से कटुता चरम सीमा पर थी। अल्ट्रा लेफ्ट और अल्ट्रा राइट खुलकर आमने-सामने थे। डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में अभी कुछ भी कहना मुश्किल है, सिवाय इसके कि वे धुर दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी राष्ट्रपति साबित होंगे। पर सबसे बड़ा खतरा यह है कि उनके ही कार्यकाल में अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था पहले नम्बर से हटकर दूसरे नम्बर की बनने जा रही है।

Saturday, May 21, 2016

बीजेपी के प्रभा मंडल का विस्तार

इस चुनाव को बंगाल में ममता दीदी की विस्मयकारी और जयललिताअम्मा की अविश्वसनीय जीत के कारण याद रखा जाएगा। पर इन चुनाव परिणामों की बड़ी तस्वीर है बीजेपी के राष्ट्रीय फुटप्रिंट का विस्तार। उसके लिए पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार खुल गया है। वह असम की जीत को देशभर में प्रचारित करेगी। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने पूरे परिणाम आने के पहले ही इस बात को जाहिर भी कर दिया। असम के बाद पार्टी ने बंगाल में पहले से ज्यादा मजबूती के साथ पैर जमाए हैं। और केरल में उसने प्रतीकात्मक, पर प्रभावशाली प्रवेश किया है।

Tuesday, May 10, 2016

उत्तराखंड में जारी रहेगी अस्थिरता

उत्तराखंड की सबसे बड़ी त्रासदी है अनिश्चय। नैनीताल हाईकोर्ट ने कांग्रेस के 9 बागी विधायकों की अर्जी खारिज करके मंगलवार को होने वाले शक्ति परीक्षण को रोचक बना दिया है। विधायकों को उम्मीद थी कि शायद उनकी सदस्यता बहाल हो जाए। उन्हें वोट का अधिकार मिलता तो मुकाबला एकतरफा हो जाता। अदालत के इस फैसले के बाद अस्थिरता और ज्यादा गहरी हो जाएगी। हरीश रावत के पक्ष में यदि बहुमत विधायक वोट डाल भी देंगे तब भी यह कहना मुश्किल है कि अगले साल चुनाव होने तक वे अपने पद पर बने रहेंगे। कांग्रेस की जिस अंदरूनी कलह के कारण यह स्थिति पैदा हुई है, वह आसानी से खत्म होने वाली नहीं है। पहले तो शक्ति परीक्षण में जीतना ही मुश्किल हुआ जा रहा है। पर रावत सरकार जीत भी गई तो नेतृत्व का बने रहना मुश्किल होगा।