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Monday, October 22, 2018

आजाद हिन्द की टोपी पहन, कांग्रेस पर वार कर गए मोदी

नरेंद्र मोदीइसे नरेंद्र मोदी की कुशल ‘व्यावहारिक राजनीति’ कहें या नाटक, पर वे हर उस मौके का इस्तेमाल करते हैं, जो भावनात्मक रूप से फायदा पहुँचाता है. निशाने पर नेहरू-गांधी ‘परिवार’ हो तो वे उसेखास अहमियत देते हैं. रविवार 21 अक्तूबर को लालकिले से तिरंगा फहराकर उन्होंने कई निशानों पर तीर चलाए हैं.

'आजाद हिंद फौज' की 75वीं जयंती के मौके पर 21 अक्टूबर को लालकिले में हुए समारोह में मोदीजी की उपस्थिति की योजना शायद अचानक बनी. वरना यह लम्बी योजना भी हो सकती थी. ट्विटर पर एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा था कि मैं इस समारोह में शामिल होऊँगा.

कांग्रेस पर वार
इस ध्वजारोहण समारोह में मोदी ने नेताजी के योगदान को याद करने में जितने शब्दों का इस्तेमाल किया, उनसे कहीं कम शब्द उन्होंने कांग्रेस पर वार करने में लगाए, पर जो भी कहा वह काफी साबित हुआ.

उन्होंने कहा, एक परिवार की खातिर देश के अनेक सपूतों के योगदान को भुलाया गया. चाहे सरदार पटेल हो या बाबा साहब आम्बेडकर. नेताजी के योगदान को भी भुलाने की कोशिश हुई. आजादी के बाद अगर देश को पटेल और बोस का नेतृत्व मिलता तो बात ही कुछ और होती.

अभिषेक मनु सिंघवी ने हालांकि बाद में कांग्रेस की तरफ से सफाई पेश की, पर मोदी का काम हो गया. मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने गांधी, आम्बेडकर, पटेल और लाल बहादुर शास्त्री जैसे लोकप्रिय नेताओं को पहले ही अंगीकार कर लिया है. अब आजाद हिन्द फौज की टोपी पहनी है.

Thursday, August 23, 2018

नकारात्मक खबरें और बढ़ता ‘आप’ का क्षरण


अरविंद केजरीवालआम आदमी पार्टी के जन्म के साथ उसके भविष्य को लेकर अटकलों का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह रुकने के बजाय बढ़ता जा रहा है. उसके दो वरिष्ठ नेताओं के ताजा इस्तीफों के कारण कयास बढ़ गए हैं. 
ये कयास पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र, उसकी रीति-नीति, लतिहाव, दीर्घकालीन रणनीति और भावी राजनीति को लेकर हैं. इस किस्म की खबरों के बार-बार आने से पार्टी का पटरा बैठ रहा है.
पार्टी के उदय ने देश में नई राजनीति की सम्भावनाओं को जन्म दिया था. ये सम्भावनाएं ही अब क्षीण पड़ रहीं हैं. उत्साह का वह माहौल नहीं बचा, जो तीन साल पहले था. पार्टी का नेतृत्व खुद बहुत आशावान नहीं लगता.
पैरों में लिपटे भँवर
हाल में पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सात सीटों को लेकर एक सर्वेक्षण कराया है, जिसमें उसने सात में से चार सीटों पर सफल होने की उम्मीद जाहिर की है. यह उसका अपना सर्वे है. यह उसकी मनोकामना है.
पार्टी बताना चाहती है कि हम दिल्ली में सबसे बड़ी ताकत हैं. शायद वह सही है, पर उसे अपना क्षरण भी दिखाई पड़ रहा है. प्रमाण है उसके अपनों का साथ छोड़कर जाना. यह आए दिन का टाटा-बाई-बाई अच्छा संकेत नहीं है.
पार्टी की आशा और निराशा के ज्यादातर सूत्र दिल्ली की राजनीति से जुड़े हैं. उसकी लोकप्रियता की अगली परीक्षा लोकसभा चुनाव में होगी. पर उस चुनाव की तैयारी उसके अंतर्विरोधों को भी बढ़ा रही है. चुनाव लड़ने के लिए साधन चाहिए, जिनके पीछे भागने का मतलब है पुराने साथियों से बिछुड़ना. साथ ही चुनाव जीतने के लिए जाति, धर्म, क्षेत्र और इसी किस्म के दूसरे फॉर्मूलों पर भी चलना है, क्योंकि चुनाव जीतने के लिए वे जरूरी होते हैं. यह सब 'नई राजनीति' की अवधारणा से मेल नहीं खाता.
बीजेपी और कांग्रेस दोनों से पंगा लेने के कारण उसकी परेशानियाँ बढ़ी हैं. उसके आंतरिक झगड़े पहले भी थे, पर अब वे सामने आने लगे हैं. झगड़ों ने उसके पैरों को भँवर की तरह लपेटना शुरू कर दिया है.

Thursday, August 16, 2018

‘आप’ में बार-बार इस्तीफे क्यों होते हैं?


आशुतोष, आम आदमी पार्टी, AAP, Aam Aadmi Party, Ashutosh
आम आदमी पार्टी से उसके वरिष्ठ सदस्य आशुतोष का इस्तीफा ऐसी खबर नहीं है, जिसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हों. इस्तीफे के पीछे व्यक्तिगत कारण नजर आते हैं. और समय पर सामने भी आ जाएंगे. अलबत्ता यह इस्तीफा ऐसे मौके पर हुआ है, जब इस पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. एक सवाल यह भी है कि इस पार्टी में बार-बार इस्तीफे क्यों होते हैं?
आशुतोष ने अपने इस्तीफे की घोषणा ट्विटर पर जिन शब्दों से की है, उनसे नहीं लगता कि किसी नाराजगी में यह फैसला किया गया है. दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल ने जिस अंदाज में ट्विटर पर उसका जवाब दिया है, उससे लगता है कि वे इस इस्तीफे के लिए तैयार नहीं थे.
गमसुम इस्तीफा क्यों?
आशुतोष ने अपने ट्वीट में कहा था, हर यात्रा का एक अंत होता है.आपके साथ मेरा जुड़ाव बहुत अच्छा/क्रांतिकारी था, उसका भी अंत आ गया है. इस ट्वीट के तीन मिनट बाद उन्होंने एक और ट्वीट किया, जिसमें मीडिया के दोस्तों से गुज़ारिश की, मेरी निजता का सम्मान करें. मैं किसी तरह से कोई बाइट नहीं दूंगा.
आशुतोष अरविंद केजरीवाल के करीबी माने जाते रहे हैं. पिछले चार साल में कई लोगों ने पार्टी छोड़ी, पर आशुतोष ने कहीं क्षोभ व्यक्त नहीं किया. फिर भी तमाम तरह के कयास हैं. कहा जा रहा है कि पार्टी की ओर से राज्यसभा न भेजे जाने की वजह से वे नाराज चल रहे थे. शायद वे राजनीति को भी छोड़ेंगे वगैरह.  
आम आदमी पार्टी के ज्यादातर संस्थापक सदस्यों की पृष्ठभूमि गैर-राजनीतिक है. ज्यादा से ज्यादा लोग एक्टिविस्ट हैं, पर आशुतोष की पृष्ठभूमि और भी अलग थी. वे खांटी पत्रकार थे और शायद उनका मन बीते दिनों को याद करता होगा.

Tuesday, March 20, 2018

माफ़ियों के बाद अब ‘आप’ का क्या होगा?

प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
आम आदमी पार्टी का जन्म पिछले लोकसभा चुनाव से पहले 2012 में हुआ था. लगता था कि शहरी युवा वर्ग राजनीति में नई भूमिका निभाने के लिए उठ खड़ा हुआ है. वह भारतीय लोकतंत्र को नई परिभाषा देगा.
सारी उम्मीदें अब टूटती नज़र आ रही हैं.
संभव है कि अरविंद केजरीवाल माफी-प्रकरण के कारण फंसे धर्म-संकट से बाहर निकल आएं. पार्टी को क़ानूनी माफियां आसानी से मिल जाएंगी, पर नैतिक और राजनीतिक माफियां इतनी आसानी से नहीं मिलेंगी.
क्या वे राजनीति के उसी घोड़े पर सवार हो पाएंगे जो उन्हें यहां तक लेकर आया है? अब उनकी यात्रा की दिशा क्या होगी? वे किस मुँह से जनता के बीच जाएंगे?
ख़ूबसूरत मौका खोया
दिल्ली जैसे छोटे प्रदेश से एक आदर्श नगर-केंद्रित राजनीति का मौक़ा आम आदमी पार्टी को मिला था.
 उसने धीरे-धीरे काम किया होता तो इस मॉडल को सारे देश में लागू करने की बातें होतीं, पर पार्टी ने इस मौक़े को हाथ से निकल जाने दिया.
उसके नेताओं की महत्वाकांक्षाओं का कैनवस इतना बड़ा था कि उसपर कोई तस्वीर बन ही नहीं सकती थी.
ज़ाहिर है कि केजरीवाल अब बड़े नेताओं के ख़िलाफ़ बड़े आरोप नहीं लगाएंगे. लगाएँ भी तो विश्वास कोई नहीं करेगा.
उन्होंने अपना भरोसा खोया है. पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वह अपनी राजनीति को किस दिशा में मोड़ेगी.
चंद मुट्ठियों में क़ैद और विचारधारा-विहीन इस पार्टी का भविष्य अंधेरे की तरफ़ बढ़ रहा है.
समर्थकों से धोखा
केजरीवाल की बात छोड़ दें, पार्टी के तमाम कार्यकर्ता ऐसे हैं जिन्होंने इस किस्म की राजनीति के कारण मार खाई है, कष्ट सहे हैं.
बहुतों पर मुक़दमे दायर हुए हैं या किसी दूसरे तरीक़े से अपमानित होना पड़ा. वे फिर भी अपने नेतृत्व को सही समझते रहे. धोखा उनके साथ हुआ.
संदेश यह जा रहा है कि अब उन्हें बीच भँवर में छोड़कर केजरीवाल अपने लिए आराम का माहौल बनाना चाहते हैं. क्यों?
बात केवल केजरीवाल की नहीं है. उनकी समूची राजनीति का सवाल है. ऐसा क्यों हो कि वे चुपके से माफी मांग कर निकले लें और बाकी लोग मार खाते रहें?



Sunday, March 18, 2018

अपने ही बुने जाले में फंसते जा रहे हैं केजरीवाल

कार्टून साभार सतीश आचार्य
प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
17 मार्च 2018


सिर्फ़ चार साल की सक्रिय राजनीति में अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी भारतीय इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हो गए हैं. और ऐसे दर्ज़ हुए हैं कि उन पर चुटकुले लिखे जा रहे हैं.


उनका ज़िक्र होने पर ऐसे मकड़े की तस्वीर उभरती है, जो अपने बुने जाले में लगातार उलझता जा रहा है.
इस पार्टी ने जिन ऊँचे आदर्शों और विचारों का जाला बुनकर राजनीति के शिखर पर जाने की सोची थी, वे झूठे साबित हुए. अब पूरा लाव-लश्कर किसी भी वक़्त टूटने की नौबत है. जैसे-जैसे पार्टी और उसके नेताओं की रीति-नीति के अंतर्विरोध खुल रहे हैं, उलझनें बढ़ती जा रही हैं.


ठोकर पर ठोकर
केजरीवाल के पुराने साथियों में से काफ़ी साथ छोड़कर चले गए या उनके ही शब्दों में 'पिछवाड़े लात लगाकर' निकाल दिए गए. अब वे ट्वीट करके मज़ा ले रहे हैं, 'हम उस शख़्स पर क्या थूकें जो ख़ुद थूक कर चाटने में माहिर है!'

अकाली नेता बिक्रम मजीठिया से केजरीवाल की माफ़ी के बाद पार्टी की पंजाब यूनिट में टूट की नौबत है. दिल्ली में पहले से गदर मचा पड़ा है. 20 विधायकों के सदस्यता-प्रसंग की तार्किक परिणति सामने है. उसका मामला चल ही रहा था कि माफ़ीनामे ने घेर लिया है.

मज़ाक बनी राजनीति
सोशल मीडिया पर केजरीवाल का मज़ाक बन रहा है. किसी ने लगे हाथ एक गेम तैयार कर दिया है. पार्टी के अंतर्विरोध उसके सामने आ रहे हैं. पिछले दो-तीन साल की धुआँधार राजनीति का परिणाम है कि पार्टी पर मानहानि के दर्जनों मुक़दमे दायर हो चुके हैं. ये मुक़दमे देश के अलग-अलग इलाक़ों में दायर किए गए हैं.


पार्टी प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज का कहना है कि अदालतों में पड़े मुक़दमों को सहमति से ख़त्म करने का फ़ैसला पार्टी की क़ानूनी टीम के साथ मिलकर किया गया है, क्योंकि इन मुक़दमों की वजह से साधनों और समय की बर्बादी हो रही है. हमारे पास यों भी साधन कम हैं.

माफियाँ ही माफियाँ
बताते हैं कि जिस तरह मजीठिया मामले को सुलझाया गया है, पार्टी उसी तरह अरुण जेटली, नितिन गडकरी और शीला दीक्षित जैसे मामलों को भी सुलझाना चाहती है. यानी माफ़ीनामों की लाइन लगेगी. पिछले साल बीजेपी नेता अवतार सिंह भड़ाना से भी एक मामले में माफ़ी माँगी गई थी.


केजरीवाल ने उस माफ़ीनामे में कहा था कि एक सहयोगी के बहकावे में आकर उन्होंने आरोप लगाए थे. पार्टी सूत्रों के अनुसार हाल में एक बैठक में इस पर काफ़ी देर तक विचार हुआ कि मुक़दमों में वक़्त बर्बाद करने के बजाय उसे काम करने में लगाया जाए.


सौरभ भारद्वाज ने पार्टी के फ़ैसले का ज़िक्र किया है, पर पार्टी के भीतरी स्रोत बता रहे हैं कि माफ़ीनामे का फ़ैसला केजरीवाल के स्तर पर किया गया है.

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Saturday, January 20, 2018

संकट में आम आदमी पार्टी

पांच साल में सबसे बड़े संकट में फँसी है 'आप'
प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए


आम आदमी पार्टी जितने क़दम आगे बढ़ा रही है, उसे उतनी ज़्यादा दलदली ज़मीन मिल रही है.

उसकी 'विशिष्ट' राजनीति के सामने दिन-ब-दिन ख़तरे खड़े होते जा रहे हैं और हर ख़तरा उसके वज़ूद पर सवालिया निशान लगा रहा है.

विधायकों की सदस्यता को लेकर चुनाव आयोग के फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होने वाले हैं. इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती देने की बातें शुरू हो गई हैं. उधर विशेषज्ञों ने अटकलें लगानी शुरू कर दी हैं कि 20 सीटों के चुनाव कब होंगे? ज़्यादा बड़ा सवाल है कि चुनाव 20 के लिए होंगे या पूरी विधानसभा के लिए?


अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट किया है, ''जब आप सच्चाई और ईमानदारी पर चलते हैं तो बहुत बाधाएँ आती हैं...इतिहास गवाह है कि जीत अंत में सच्चाई की होती है.'' सवाल सच्चाई का है. क्या है सच? सच यह है कि पार्टी के पाँच साल के इतिहास का यह सबसे बड़ा संकट है.


हमदर्दी या प्रतिशोध?

यह परिघटना आम आदमी पार्टी का सफ़ाया भी कर सकती है या उसमें फिर से जान भी डाल सकती है. ऐसा तभी सम्भव होगा, जब वह वोटर को यह समझाने में कामयाब हो कि हमारे साथ अन्याय हुआ है.


उसे हमदर्दी का लाभ मिल भी सकता है, पर देखना होगा कि दिल्ली की जनता का भरोसा क्या अब भी बदस्तूर बना हुआ है. उसे हमदर्दी मिलेगी या प्रतिशोध?


दूसरी ओर यदि अदालती प्रक्रिया से पार्टी यह साबित करने में सफल हुई कि उसके साथ अन्याय हुआ है, तब भी उसे लाभ मिलेगा. फ़िलहाल वह संकट से घिरी हुई नज़र आती है.


दो दिन से यह ख़बर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में घूम रही थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल पूरा होने के पहले संसदीय सचिवों को लेकर बहु-प्रतीक्षित फ़ैसला आ जाएगा. इधर गुरुवार को जीएसटी काउंसिल की तरफ़ से हुई डिनर पार्टी की तस्वीरें नमूदार हुईं.

इन तस्वीरों में वित्तमंत्री अरुण जेटली के साथ अरविंद केजरीवाल समेत 'आम आदमी पार्टी' के कुछ नेता खुशमिज़ाजी के साथ बैठे नज़र आए. इन तस्वीरों को पार्टी के ट्विटर हैंडल पर शेयर भी किया गया.

क्या फिर चुनाव होंगे?
दोनों पक्षों के टकराव को देखते हुए इन तस्वीरों पर कई तरह की अटकलें हैं. सबसे बड़ा कयास इसे लेकर है कि क्या दिल्ली पर एक और चुनाव का साया है? और चुनाव हुआ तो क्या 'आप' इस परीक्षा को पास कर पाएगी?


पिछले साल राजौरी गार्डन विधानसभा सीट के चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा था कि छह महीने में दिल्ली में एक बार फिर विधानसभा चुनाव होंगे.

राजौरी गार्डन का परिणाम आने के पहले बवाना के विधायक वेद प्रकाश आम आदमी पार्टी को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. बीजेपी के एक नेता ने तब दावा किया था कि क़रीब एक दर्जन विधायक पार्टी छोड़ेंगे. उन दिनों किसी ने कहा कि 30-35 विधायक नाराज हैं.

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आप की बर्बादी क्यों हुई?

Wednesday, January 3, 2018

आम आदमी पार्टी की एक और करवट

नज़रिया: क्या केजरीवाल की राजनीति में 'अनफ़िट' हैं विश्वास?

कुमार विश्वासइमेज कॉपीरइट@DRKUMARVISHWAS
राज्यसभा की सदस्यता के लिए तीन प्रतिनिधियों के नाम तय करने में चले गतिरोध की वजह से आम आदमी पार्टी के अंतर्विरोध एकबार फिर से खुलकर सामने आ गए हैं.
सवाल है कि क्या पार्टी ने अपने संस्थापकों में से एक कुमार विश्वास से किनाराकशी करने का फ़ैसला अंतिम रूप से कर लिया है?
राज्यसभा के नामांकन 5 जनवरी तक होने हैं. निर्णायक घड़ी नज़दीक है. पार्टी की सूची को अब सामने आ जाना चाहिए. स्वाभाविक रूप से इसमें कुमार विश्वास का नाम पहले नम्बर पर होना चाहिए, पर लगता है कि ऐसा होगा नहीं.
साल 2015 में बनी केजरीवाल सरकार में कुमार का नाम नहीं होने पर प्रेक्षकों का माथा ठनका था. तब कहा गया कि राज्यसभा की तीन सीटों में से एक तो उन्हें मिल ही जाएगी. बहरहाल तब से अब तक यमुना में काफ़ी पानी बह गया और देखते ही देखते कहानी ने ज़बर्दस्त मोड़ ले लिया.
सवाल यह है कि अब क्या होगा? कुमार विश्वास के अलावा राज्यसभा सदस्यता के लिए संजय सिंह, आशुतोष, आशीष खेतान और राघव चड्ढा के नामों की भी चर्चा थी. पर कुमार विश्वास के नाम का मतलब कुछ और है.
कुमार विश्वासइमेज कॉपीरइटइमेज कॉपीरइट@DRKUMARVISHWAS

बाहरी नामों पर रहा ज़ोर

पिछले दो महीनों में पार्टी के अंदरूनी सूत्र तमाम बाहरी नामों का ज़िक्र करते थे, पर कुमार विश्वास का नाम सामने आने पर चुप्पी साध लेते थे.
रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और राम जेठमलानी जैसे नाम उछले. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस टीएस ठाकुर का नाम भी सामने आया. पर कुमार विश्वास के नाम का पूरे भरोसे से ज़िक्र नहीं किया गया.
पार्टी दो कारणों से बाहरी नामों की हवा फैला रही थी. उसकी इच्छा एक 'हैवीवेट' नेता को राज्यसभा में अपना प्रतिनिधि बनाने की है. वह राष्ट्रीय क्षितिज पर अपनी आवाज़ बुलंद करना और पहचान बनाना चाहती है.
पार्टी की रणनीति बीजेपी-विरोधी स्पेस में बैठने की है. दूसरे, ऐसा करके उसका इरादा पार्टी के भीतर के टकराव को भी टालने का था. बहरहाल अब टकराव निर्णायक मोड़ पर है. देखना होगा कि क्या कुमार विश्वास पूरी तरह अलग-थलग पड़ेंगे? या उनकी वापसी की अब भी गुंजाइश है?

Tuesday, November 28, 2017

आम आदमी पार्टी: संशय का शिकार एक अभिनव प्रयोग


आम आदमी पार्टी: कहां से चली, कहां आ गई


प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, 27 नवंबर 2017

इसे आम आदमी पार्टी की उपलब्धि माना जाएगा कि देखते ही देखते देश के हर कोने में वैसा ही संगठन खड़ा करने की कामनाओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया. न केवल देश में बल्कि पड़ोसी देश पाकिस्तान से भी खबरें आईं कि वहाँ की जनता बड़े गौर से आम आदमी की खबरों को पढ़ती है.

इस पार्टी के गठन के पाँच साल पूरे हुए है, पर 'सत्ता' में तीन साल भी पूरे नहीं हुए हैं. उसे पूरी तरह सफल या विफल होने के लिए पाँच साल की सत्ता चाहिए. दिल्ली विधानसभा दूसरे चुनाव में पार्टी की आसमान तोड़ जीत ने इसके वैचारिक अंतर्विरोधों को पूरी तरह उघड़ने का मौका दिया है. उन्हें उघड़कर सामने आने दें.

पार्टी की पहली टूट
उसके शुरुआती नेताओं में से आधे आज उसके सबसे मुखर विरोधियों की कतार में खड़े हैं. दिल्ली के बाद इनका दूसरा सबसे अच्छा केंद्र पंजाब में था. वहाँ भी यही हाल है. पार्टी तय नहीं कर पाई कि क्या बातें कमरे के अंदर तय होनी चाहिए और क्या बाहर. इसके इतिहास में विचार-मंथन के दो बड़े मौके आए थे.

एक, लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद और दूसरा 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारी विजय के बाद. पार्टी की पहली बड़ी टूट उस शानदार जीत के बाद ही हुई थी और उसका कारण था विचार-मंथन की प्रक्रिया में खामी. जब पारदर्शिता के नाम पर पार्टी बनी, उसकी ही कमी उजागर हुई.

उत्साही युवाओं का समूह
'आप' को उसकी उपलब्धियों से वंचित करना भी ग़लत होगा. खासतौर से सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में उसके काम को तारीफ़ मिली है. लोग मानते हैं कि दिल्ली के सरकारी अस्पतालों का काम पहले से बेहतर हुआ है. मोहल्ला क्लीनिकों की अवधारणा बहुत अच्छी है.

दूसरी ओर यह भी सच है कि पार्टी ने नागरिकों के एक तबके को मुफ्त पानी और मुफ्त बिजली का संदेश देकर भरमाया है. ज़रूरत ऐसी सरकारों की है जो बेहतर नागरिकता के सिद्धांतों को विकसित करें और अपनी ज़िम्मेदारी निभाने पर ज़ोर दें. आम आदमी पार्टी उत्साही युवाओं का समूह थी.

'हाईकमान' से चलती पार्टी
इसके जन्म के बाद युवा उद्यमियों, छात्रों तथा सिविल सोसायटी ने उसका आगे बढ़कर स्वागत किया था. पहली बार देश के मध्यवर्ग की दिलचस्पी राजनीति में बढ़ी थी. 'आप' ने जनता को जोड़ने के कई नए प्रयोग किए. जब पहले दौर में इसकी सरकार बनी तब सरकार बनाने का फ़ैसला पार्टी ने जनसभाओं के मार्फत किया था.

उसने प्रत्याशियों के चयन में वोटर को भागीदार बनाया. दिल्ली सरकार ने एक डायलॉग कमीशन बनाया है. पता नहीं इस कमीशन की उपलब्धि क्या है, पर इसकी वेबसाइट पर सन्नाटा पसरा रहता है. 'आप' के आगमन पर वैसा ही लगा जैसा सन् 1947 के बाद कांग्रेसी सरकार बनने पर लगा था. आज यह पार्टी भी 'हाईकमान' से चलती है.

Thursday, November 16, 2017

क्या अयोध्या विवाद का समाधान करेंगे श्री श्री?

नज़रिया: राम मंदिर पर श्री श्री की पहल के पीछे क्या है?
प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
श्री श्री रविशंकर की पहल के कारण मंदिर-मस्जिद मसला एक बार फिर से उभर कर सामने आया है. देखना होगा कि इस पहल के समांतर क्या हो रहा है. और यह भी कि इस पहल को संघ और सरकार के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन है या नहीं.
आमतौर पर ऐसी कोशिशों के वक्त चुनाव की कोई तारीख़ क़रीब होती है या फिर 6 दिसम्बर जिसे कुछ लोग 'शौर्य दिवस' के रूप में मनाते हैं और कुछ 'यौमे ग़म.'
संयोग से इस वक्त एक तीसरी गतिविधि और चलने वाली है.

कई कोशिशें हुईं, लेकिन नतीजा नहीं निकला
पिछले डेढ़ सौ साल से ज़्यादा समय में कम से कम नौ बड़ी कोशिशें मंदिर-मस्जिद मसले के समाधान के लिए हुईं और परिणाम कुछ नहीं निकला. पर इन विफलताओं से कुछ अनुभव भी हासिल हुए हैं.
हल की तलाश में श्री श्री अयोध्या का दौरा कर रहे हैं. उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से मुलाक़ात भी की है.
पृष्ठभूमि में इस मसले से जुड़े अलग-अलग पक्षों से उनकी मुलाक़ात हुई है. कहना मुश्किल है कि उनके पीछे कोई राजनीतिक प्रेरणा है या नहीं.

गुजरात चुनाव और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
गुजरात में कांग्रेस पार्टी ने दलितों, ओबीसी और पाटीदारों यानी हिन्दू जातियों के अंतर्विरोध को हथियार बनाया है जिसका सहज जवाब है 'हिन्दू अस्मिता' को जगाना.
गुजरात में बीजेपी दबाव में आएगी तो वह ध्रुवीकरण के हथियार को ज़रूर चलाएगी. पर अयोध्या की गतिविधियाँ केवल चुनावी पहल नहीं लगती.
गुजरात के चुनाव के मुक़ाबले ज़्यादा बड़ी वजह है सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर 5 दिसम्बर से शुरू होने वाली सुनवाई. इलाहाबाद हाईकोर्ट के सन् 2010 के फ़ैसले के सिलसिले में 13 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं. अब इन पर सुनवाई होगी.
कुछ पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि पार्टी 2019 के पहले मंदिर बनाना चाहती है. कुछ महीने पहले सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट किया था, राम मंदिर का हल नहीं निकला तो अगले साल, यानी 2018 में अयोध्या में वैसे ही राम मंदिर बना दिया जाएगा.

Sunday, June 11, 2017

शाह ने जानबूझकर कहा गांधी को 'चतुर बनिया'

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के महात्मा गांधी  को चतुर बनिया बताने वाले बयान को कांग्रेस ने राष्ट्रीय अपमान बताकर उनसे माफी माँगने को कहा है. लगता नहीं कि अमित शाह ने यह बात अनायास या अनजाने में कही है. इसके बहाने उन्होंने कांग्रेस और गांधी दोनों पर प्रहार कर दिए. वे कहना चाहते थे कि राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस को भंग कर देना चाहिए था, जिसकी गांधी जैसे नेता ने सलाह दी थी. वस्तुतः यह कांग्रेस के प्रति हिकारत पैदा करने की कोशिश है.

Tuesday, May 16, 2017

खामोश क्यों हैं केजरीवाल?

दिल्ली सरकार से हटाए गए कपिल मिश्रा आम आदमी पार्टी के गले की हड्डी साबित हो रहे हैं. पिछले दसेक दिनों में वे पार्टी और व्यक्तिगत रूप से अरविंद केजरीवाल पर आरोपों की झड़ी लगा रहे हैं. और केजरीवाल उन्हें सुन रहे हैं.

आश्चर्य इन आरोपों पर नहीं है. आरोप लगाने से केजरीवाल बेईमान साबित नहीं हो जाते हैं. सवाल है कि केजरीवाल खामोश क्यों हैं? क्या वे इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि कपिल मिश्रा का सारा गोला-बारूद खत्म हो जाए? या उन्हें राजनीति में किसी नए मोड़ का इंतजार है?

Tuesday, May 2, 2017

क्यों खटक रहे हैं बर्तन 'आप' के?

नज़रिया: क्या केजरीवाल पर से उठ गया है कुमार का 'विश्वास'?

कुमार विश्वासइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
अंदेशा सही साबित हो रहा है. लगातार दो-तीन हारों ने आम आदमी पार्टी के दबे-छिपे अंतर्विरोधों को खोलना शुरू कर दिया है. अमानतुल्ला खान को पार्टी की राजनीतिक मामलों की कमेटी से हटाने के बाद वह तपिश जो भीतर थी, वह बाहर आने लगी है.
पार्टी के 37 विधायकों ने मुख्यमंत्री और पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल को चिट्ठी लिखकर माँग की है कि अमानतुल्ला को पार्टी से बाहर किया जाए.
इस चिट्ठी से साबित होता है कि पार्टी के भीतर कुमार विश्वास का दबदबा है. शायद इसी वजह से उनकी कड़वी बातों को पार्टी ने सहन किया.
कुमार विश्वास जिन बातों को उठा रहे हैं, वे आम आदमी पार्टी के अंतर्विरोधों की तरफ इशारा करती हैं. पार्टी में 'सॉफ्ट राष्ट्रवादी' से लेकर 'अति-वामपंथी' हर तरह के तत्व हैं. कांग्रेस की तरह. यह उसकी अच्छाई है कि उसकी वैचारिक दिशा खुली है. और यही उसकी खराबी भी है.
लगता नहीं कि अंतर्विरोधी तत्वों को जोड़कर रखने वाली समझदारी वह विकसित कर पाई है. पार्टी ने भाजपा-विरोधी स्पेस को हासिल करने के लिए ऐसी शब्दावली को अपनाया, जो भाजपा-विरोधी है.
सर्जिकल स्ट्राइक के बाद अरविंद केजरीवाल ने भी घुमा-फिराकर मोदी सरकार से सबूत माँगे थे.

कौन हैं विरोधी ताकतें ?

अरविंद केजरीवालइमेज कॉपीरइटTWITTER
अन्ना हजारे का आंदोलन जब चल रहा था तब मंच से 'वंदे मातरम' का नारा भी लगता था, जो अब कांग्रेस के मंच से भी नहीं लगता. पर जैसे-जैसे आम आदमी पार्टी का विस्तार हुआ, उसकी राष्ट्रवादी राजनीति सिकुड़ी.

Wednesday, April 26, 2017

वैकल्पिक राजनीति का पराभव

नज़रिया: 'नई राजनीति' पर भारी पड़ा 'मोदी का जादू'

मोदी और केजरीवाल
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एमसीडी के चुनाव परिणामों को दो तरीके से देख सकते हैं. यह मोदी की जीत है और दूसरे अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की हार.
आंशिक रूप से दोनों बातें सही हैं. फिर भी देखना होगा कि दोनों में से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण क्या है.
कई विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी को काम की वजह से नहीं, 'मोदी के जादू' की वजह से जीत मिली.
पर इस जादू ने साल 2015 के विधानसभा चुनाव में काम नहीं किया, जबकि मोदी की अपील उस वक्त आज से कम नहीं थी.
उस वक्त अरविंद केजरीवाल की 'नई राजनीति' मोदी के जादू पर भारी पड़ी थी. आज मोदी का जादू भारी पड़ा है.
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वोटर का मोहभंग

इसका मतलब है कि केजरीवाल का जादू दो साल में रफा-दफा हो गया और मोदी का जादू कायम है.
आज केजरीवाल की 'नई राजनीति' हारी हुई दिखाई पड़ रही है. साल 2015 में उसे सिर पर बिठाने वाली दिल्ली ने इस बार उसे धूल चटा दी.
जैसी ऐतिहासिक वो जीत थी वैसी ही ऐतिहासिक ये हार भी है. दरअसल 'आप' से वोटर का मोहभंग हुआ है.
'आप' इसके लिए ईवीएम को दोष दे रही है, पर यह बात गले नहीं उतरती. आखिर 2015 के चुनाव में भी तो ईवीएम मशीनें थीं.
लगता है कि पार्टी इसे मुद्दा बनाएगी. देखना होगा कि उसकी यह कोशिश उसे कहीं और ज्यादा अलोकप्रिय न बना दे.
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'ईवीएम में गड़बड़ी'

मतदान के दो-तीन दिन पहले अखबारों में प्रकाशित इंटरव्यू में केजरीवाल ने कहा था, "ईवीएम में गड़बड़ी नहीं हुई तो हमें 272 में 200 से ज़्यादा सीटें मिलेंगी."
केजरीवाल की बातों में यकीन नहीं बोल रहा है. पंजाब और गोवा में मिली हार से उनका मनोबल पहले से ही टूटा हुआ है.
एमसीडी की हार अब पार्टी के भीतर की कसमसाहट को बढ़ाएगी.
परिणाम आने के एक दिन पहले सोशल मीडिया पर केजरीवाल का एक वीडियो वायरल हुआ था.
इसमें उन्होंने कहा, "अब अगर हम बुधवार को हारते हैं... नतीजे वैसे ही रहते हैं जैसे कि बीती रात बताए गए हैं, तो हम ईंट से ईंट बजा देंगे... आम आदमी पार्टी आंदोलन की उपज है, इसलिए पार्टी वापस अपनी जड़ों की ओर लौटने से हिचकिचाएगी नहीं."