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Friday, January 16, 2026

दक्षिण में चुनावी बयार और भाषा की राजनीति


तमिलनाडु में इन दिनों दो फिल्में चर्चा का विषय हैं। एक है फिल्म अभिनेता से राजनेता बने विजय की जन नायकन और दूसरी शिवकार्तिकेयन की पराशक्ति।दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के सुपरस्टार विजय ने करीब डेढ़ साल पहले ‘तमिषगा वेत्री कषगम’ (टीवीके) नाम से पार्टी बनाकर राजनीति में प्रवेश किया है। दूसरी तरफ पराशक्ति अपनी एंटी-हिंदी थीम के कारण चर्चित है। दोनों को फिल्म सेंसर बोर्ड की कुछ आपत्तियों का सामना करना पड़ा है। इस वजह से जन नायकन रिलीज़ नहीं हो पाई, जबकि पराशक्ति करीब बीस बदलाव करके रिलीज़ हो गई है।

तमिल राजनीति में दोनों फिल्मों के गहरे निहितार्थ हैं। हालाँकि विजय पेरियार के रास्ते पर चलने का दावा करते हैं और राज्य की द्रविड़ पार्टियों की भाषा नीति के पक्षधर हैं, पर वे सत्तारूढ़ डीएमके के सामने चुनौती के रूप में उभर कर आना चाहते हैं। उनकी फिल्म की थीम जनता के बीच से उभर कर आए ऐसी ही नेता पर केंद्रित है। इसमें जनता के नायक की अवधारणा, विजय के किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है।  

तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा के कलाकारों का बोलबाला पचास के दशक से ही शुरू हो गया था। वहाँ की ‘कटआउट’ संस्कृति में ‘आसमानी कद’ के राजनेता सिनेमा के पर्दे से आए। तमिलनाडु शायद अकेला ऐसा राज्य है, जहाँ लगातार पाँच मुख्यमंत्री सिनेमा जगत से आए। केवल कलाकारों की बात ही नहीं है, वहाँ की फिल्मों की स्क्रिप्ट में द्रविड़ विचारधारा को डालने का काम भी किया। 1952 की फिल्म ‘पराशक्ति’ ने द्रविड़ राजनीतिक संदेश जनता तक पहुँचाया था। इस फिल्म का स्क्रीनप्ले और संवाद के करुणानिधि ने लिखे थे, जो बाद में राज्य के मुख्यमंत्री बने।

Sunday, January 4, 2026

2026 का भारतीय मन, नए संकल्प-नई ऊर्जा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर के आखिरी हफ्ते में प्रसारित अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कहा था कि 2026 का साल विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। कैसा होगा यह मील का पत्थर? पिछल साल से विश्व-व्यवस्था में बुनियादी बदलावों की शुरुआत हुई ही है। बदलाव इस साल भी जारी रहेंगे, पर भारत के लिए यह साल कैसा होगा? भारत माने यहाँ का जन-गण-मन। भारत के लोग और उनका मन। क्या विश्व की प्राचीनतम सभ्यता, आधुनिकतम सपनों के साथ भविष्य की उड़ान भरने को तैयार है?

ज्योतिषियों की भाषा में दुनिया इस वक्त एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना के बीच से गुज़र रही है। वह है, नेपच्यून का मेष राशि में प्रवेश। नेपच्यून ने 30 मार्च, 2025 को एक नए 14 वर्षीय अध्याय के साथ-साथ एक नए राशिचक्र की शुरुआत कर दी है। 165 वर्षों के बाद उसने मेष राशि में प्रवेश किया है, जो 2039 तक रहेगा। इससे व्यक्तिगत पहचान, नए आदर्शों और आध्यात्मिक खोजों का दौर शुरू हुआ है, जहाँ लोग अपने सपनों को साकार करने और साहसिक कदम उठाने के लिए प्रेरित होंगे। यह ऐसा दौर है, जब साहस हमें पुकारता है। हमारी आकांक्षाएं, महत्वाकांक्षाएं, दृष्टियां, इच्छाएं और रचनात्मकता भीतर से जागती है। फलित ज्योतिष का संदर्भ यहाँ केवल प्रतीक रूप में है, उसका व्यावहारिक अर्थ कुछ भी नहीं है।

हमारे सामूहिक संकल्प

साठ के दशक में हिंदी के लोकप्रिय व्यंग्य लेखक काका हाथरसी ने एक कविता लिखी थी, जन-गण मन के देवता, अब तो आँखें खोल/ महँगाई से हो गया, जीवन डावाँडोल/ जीवन डावाँडोल, ख़बर लो शीघ्र कृपालू/ कलाकंद के भाव बिक रहे बैंगन-आलू। यह कविता हमें अपने आसपास से जोड़ती है और आप इसे हरेक दौर में पसंद कर सकते हैं। यह जनता के की मन की बात है। इसका मतलब यह भी नहीं कि हम निराशावादी हैं, बल्कि यह है कि समाधान चाहते हैं।    

Friday, December 19, 2025

नाभिकीय-ऊर्जा में निजी-क्षेत्र का रास्ता खुला


संसद ने स्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया विधेयक, 2025’ को पारित कर दिया। इसअंग्रेजी नामाक्षरों के आधार पर शांति-विधेयक कहा गया है। हालाँकि कई विपक्षी सांसदों ने विधेयक को संसदीय समिति के पास भेजने की माँग की थी, पर सरकार ने इसे राज्यसभा में चर्चा के लिए भेजकर जल्दी पास कराना उचित समझा। अब यह कानून बन जाएगा। दोनों सदनों की राजनीतिक-बहसों पर ध्यान नहीं दें, तो यह स्पष्ट है कि यह कानून यूपीए सरकार में अमेरिका के साथ हुए न्यूक्लियर-डील का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो अब अमेरिका के साथ संभावित व्यापार-समझौते के साथ भी जुड़ा है।

यह कानून अनायास ही नहीं बनाया गया है। कई कारणों से न्यूक्लियर-डील अपने अभीप्सित उद्देश्यों में पूरी तरह सफल नहीं हो सका। एक बड़ा अड़ंगा, संभावित-दुर्घटना की क्षतिपूर्ति को लेकर था, जिसके लिए 2010 में पास हुए नागरिक दायित्व अधिनियम से विदेशी-आपूर्तिकर्त्ता सहमत नहीं थे। 2008 में, भाजपा ने मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था, जिसका एक कारण यह भी था कि न्यूक्लियर-डील में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था, जिससे क्षतिपूर्ति हो सके।

Wednesday, December 10, 2025

संचार साथी: पहले साख बनाएँ, फिर इस्तेमाल करें


दूरसंचार विभाग ने स्मार्टफोन कंपनियों को संचार साथी एप्लीकेशन को अनिवार्य रूप से प्री-लोड करने के अपना आदेश वापस लेकर अच्छा काम किया है। इसे लागू करने का बेहतर तरीका यही था कि लोगों पर छोड़ दिया जाता कि वे चाहें, तो इसे डाउनलोड कर लें और न चाहें, तो न करें। इसके फायदों को देखते हुए वह खुद ही लोकप्रिय हो जाएगा। हाँ, फायदों की जानकारी लोगों को जरूर दी जानी चाहिए थी। इसे लेकर गोपनीयता और संभावित निगरानी को लेकर चिंताएं पैदा हुई, जिनके पीछे भले ही कोई आधार नहीं रहा होगा, पर वे वाजिब थीं। संचार मंत्रालय ने अब बुधवार को एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा, ‘सरकार ने मोबाइल निर्माताओं के लिए प्री-इंस्टॉलेशन को अनिवार्य नहीं बनाने का निर्णय लिया है।’

मतलब यह भी नहीं है कि सरकार साइबर अपराधों को रोकने की अपनी जिम्मेदारी से हाथ धो ले। वस्तुतः यह साख का सवाल है। पिछले सोमवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने देशभर से सामने आए डिजिटल अरेस्ट के मामलों की देशभर में जाँच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंपी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा, डिजिटल अरेस्ट तेजी से बढ़ता साइबर क्राइम है। इसमें ठग खुद को पुलिस, कोर्ट या सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो/ऑडियो कॉल के जरिए पीड़ितों, खासकर सीनियर सिटिजन को धमकाते हैं और उनसे पैसे वसूलते हैं।

Sunday, November 23, 2025

तमिल राजनीति और केंद्र-राज्य टकराव


सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार 20 नवंबर को राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर स्वीकृति देने के लिए पहले इसी अदालत द्वारा निर्धारित अपनी ही समय-सीमा वापस ज़रूर ले ली, पर असाधारण स्थितियों में राज्यों के लिए अदालत का दरवाज़ा भी खुला रहने दिया है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाले पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि न्यायालय कार्यपालिका की शक्तियों का अतिक्रमण नहीं कर सकता।

न्यायालय ने यह भी कहा है जब कोई राज्यपाल कानून बनाने की प्रक्रिया में ‘लंबी, अस्पष्ट और अनिश्चित’ देरी का कारण बने, तब राज्य सरकार अदालत की शरण ले सकती है। इस तरह से अदालत ने केंद्र और राज्यों के बीच एक जटिल राजनीतिक मुद्दे में नाज़ुक संतुलन बनाने की कोशिश की है। अदालत ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि 8 अप्रैल के फैसले के कारण तमिलनाडु के जिन 10 कानूनों पर राज्यपाल की स्वीकृति मान ली गई थी, उनकी स्थिति क्या होगी। कुछ संविधान विशेषज्ञ मानते हैं कि वे कानून बन चुके हैं और उनकी अधिसूचना गजट में भी हो चुकी है, इसलिए उन्हें स्वीकृत मान लेना चाहिए।

Thursday, November 6, 2025

हैवी लिफ्ट अंतरिक्ष प्रक्षेपण के दरवाज़े खुले


भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 2 नवंबर को, भारतीय नौसेना के लिए जीसैट-7आर का प्रक्षेपण करके अपनी दक्षता को एक बार फिर से साबित किया है। दक्षता इसलिए क्योंकि देश के सबसे शक्तिशाली रॉकेट लॉन्च वेहिकल मार्क-3 (एलवीएम-3) का इसमें इस्तेमाल हुआ था, जिसकी भार वहन क्षमता मोटे तौर पर 4000 किलोग्राम की थी, पर उसने जिस उपग्रह का प्रक्षेपण किया, उसका भार 4,410 किलोग्राम था। भारतीय धरती से प्रक्षेपित यह अब तक का सबसे भारी संचार उपग्रह है।

सीएमएस-03 (जीसैट-7आर) सैन्य संचार उपग्रह है, जिसका वित्तपोषण पूरी तरह से रक्षा मंत्रालय ने किया है। इसे हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षित, मल्टी-बैंड संचार लिंक प्रदान करने के लिए भारतीय नौसेना के उपयोग के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है। यह उपग्रह पोतों, पनडुब्बियों और विमानों के बीच आवाज, डेटा और वीडियो लिंक के लिए संचार नेटवर्क का काम करेगा। मुख्य मिशन के रूप में इसका काम समुद्री सुरक्षा और निगरानी है। यह पुराने जीसैट-7 (रुक्मिणी) की जगह लेगा, जो 2013 से सेवा में है। जीसैट-7 और जीसैट-7ए देश के समर्पित सैन्य संचार उपग्रह हैं। दिसंबर 2018 में प्रक्षेपित जीसैट-7, मुख्यतः वायुसेना के लिए डिज़ाइन किया गया है। थलसेना आंशिक रूप से इसकी लगभग 30 प्रतिशत क्षमता का उपयोग करती है।

हमारे संचार उपग्रह अपेक्षाकृत भारी होते हैं। इसरो की कोशिश होती है कि एक ही अंतरिक्ष यान में व्यापक कवरेज, उच्च शक्ति और लंबी सेवा अवधि का मेल हो। पूरे देश और आस-पास के समुद्रों की कवरेज के लिए, संचार पेलोड को कई आवृत्ति बैंडों में कई चैनलों की आवश्यकता होती है। इसके लिए कई बड़े एंटेना, उच्च-शक्ति एम्पलीफायर, वेवगाइड, फ़िल्टर, स्विच कई एनालॉग ट्रांसपोंडरों या लचीले डिजिटल प्रोसेसर की आवश्यकता होती है। 12 से 15 साल तक कई किलोवाट बिजली की आपूर्ति के लिए, उपग्रहों में बड़े सौर पैनल, पर्याप्त बड़ी बैटरियाँ और पावर कंडीशनिंग इकाइयाँ होती हैं। इस वजह से वजन बढ़ता है।

चार हजार किलोग्राम से अधिक वज़न वाला जीसैट-7आर इसरो का यह पहला उपग्रह है, जिसे देश की धरती से दूरस्थ भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा में स्थापित किया गया है। इस प्रक्षेपण ने उस बाधा को तोड़ा, जो अपने प्रक्षेपकों की मदद से भारी उपग्रहों के प्रक्षेपण से हमें रोकती थी।

Thursday, October 30, 2025

आगे जाता आसियान और पिछड़ता सार्क


हाल में दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया को लेकर दो तरह की खबरें मिली थीं, जिनसे दो तरह की प्रवृत्तियों के संकेत मिलते हैं। आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्चुअल तरीके से और विदेशमंत्री एस जयशंकर स्वयं उपस्थित हुए थे। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कम्युनिटी विज़न 2045 को अपनाने के लिए आसियान की सराहना की। कम्युनिटी विज़न 2045 अगले बीस वर्षों में इस क्षेत्र को एक समेकित समन्वित विकास-क्षेत्र में तब्दील करने की योजना है।

अपने आसपास के राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह ज़ाहिर होता जा रहा है कि भारत को पूर्व की दिशा में अपनी कनेक्टिविटी का तेजी से विस्तार करना होगा। यह विस्तार हो भी रहा है, पर म्यांमार की अस्थिरता और बांग्लादेश की अनिश्चित राजनीति के कारण कुछ सवाल खड़े हो रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के पाँच देशों (कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम) के साथ सांस्कृतिक और वाणिज्यिक संबंधों को बढ़ावा देने वाले गंगा-मीकांग सहयोग कार्यक्रम में हमें तेजी लानी चाहिए।

अब उस दूसरी खबर की ओर आएँ, जो इस सिलसिले में महत्वपूर्ण है। भारत के सरकारी स्वामित्व वाले भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) ने गत 22 अक्तूबर से अपने पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए बांग्लादेश से इंटरनेट बैंडविड्थ का आयात बंद कर दिया। इस कदम का सीधा असर पूर्वोत्तर की इंटरनेट कनेक्टिविटी पर पड़ेगा, जो अभी तक बांग्लादेश अखौरा बंदरगाह के माध्यम से आयातित बैंडविड्थ पर निर्भर थी।

यह फैसला अचानक नहीं हुआ है। पिछले साल दिसंबर में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने हसीना सरकार के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें भारत के पूर्वोत्तर को बैंडविड्थ की आपूर्ति के लिए बांग्लादेश को ट्रांज़िट पॉइंट के रूप में उपयोग करने की अनुमति दी गई थी। बांग्लादेश टेलीकम्युनिकेशंस रेग्युलेटरी कमीशन (बीटीआरसी) का कहना था कि भारत को ट्रांज़िट पॉइंट देने से क्षेत्रीय इंटरनेट हब बनने की हमारी क्षमता कमज़ोर हो जाएगी।

भारत का पूर्वोत्तर पहले घरेलू फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क का उपयोग करके चेन्नई में समुद्री केबलों के माध्यम से सिंगापुर से जुड़ा हुआ था। चूंकि चेन्नई में लैंडिंग स्टेशन पूर्वोत्तर से लगभग 5,500 किमी दूर है, इसलिए इंटरनेट की गति पर असर पड़ता था।

Friday, October 10, 2025

विदेश-नीति के ‘संतुलन’ की परीक्षा


इस साल पहले टैरिफ और फिर ऑपरेशन सिंदूर को लेकर अमेरिकी रुख में आए बदलाव पर भारत की ओर से कोई तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की गई, पर देश में आक्रोश की लहर थी। शुरू में समझ नहीं आता था, पर अब धीरे-धीरे लगता है कि भारत और अमेरिका के बीच, पिछले दो दशक से चली आ रही सौहार्द-नीति में कोई बड़ा मोड़ आने वाला है। कुछ वर्षों से यह सवाल किया जा रहा है कि भारत एक तरफ रूस और चीन और दूसरी तरफ अमेरिका के बीच अपनी विदेश-नीति को किस तरह संतुलित करेगा? इसे स्पष्ट करने की घड़ी अब आ रही है।

भारत ने तालिबान, पाकिस्तान, चीन और रूस के साथ मिलकर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के अफ़ग़ानिस्तान स्थित बगराम एयरबेस पर कब्ज़ा करने के प्रयास का विरोध किया है। यह अप्रत्याशित घटना तालिबान के विदेशमंत्री आमिर ख़ान मुत्तक़ी की इस हफ़्ते के अंत में होने वाली भारत-यात्रा से कुछ दिन पहले हुई है। अफगानिस्तान पर मॉस्को प्रारूप परामर्श के प्रतिभागियों द्वारा मंगलवार को जारी संयुक्त बयान में बगराम का नाम लिए बिना यह बात कही गई।

अफ़ग़ानिस्तान पर मॉस्को प्रारूप परामर्श की सातवीं बैठक मॉस्को में अफ़ग़ानिस्तान, भारत, ईरान, क़ज़ाक़िस्तान, चीन, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान के विशेष प्रतिनिधियों और वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर आयोजित की गई थी। बेलारूस का एक प्रतिनिधिमंडल भी अतिथि के रूप में बैठक में शामिल हुआ। इस बैठक में पहली बार विदेशमंत्री अमीर खान मुत्तकी के नेतृत्व में अफगान प्रतिनिधिमंडल ने भी सदस्य के रूप में भाग लिया।

इसके पहले ट्रंप ने कहा था कि तालिबान, देश के बगराम एयर बेस को वाशिंगटन को सौंप दें। सच यह है कि ट्रंप ने ही पाँच साल पहले तालिबान के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसने काबुल से अमेरिका की वापसी का रास्ता साफ किया था। पिछली 18 सितंबर को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने कहा, ‘हमने इसे तालिबान को मुफ्त में दे दिया। अब हमें वह अड्डा वापस चाहिए।’

Friday, May 2, 2025

जम्मू-कश्मीर को ‘पूर्ण-राज्य’ बनाने में देरी


जम्मू-कश्मीर में हालात काफी हद तक सामान्य हो रहे थे कि पहलगाम पर हमला हो गया, जिसके पीछे इरादा यह भी रहा होगा कि राज्य में स्थितियाँ सामान्य होती नज़र नहीं आएँ। हालांकि इस हमले से राज्य के नागरिकों का मनोबल टूटा नहीं है, पर लगता है कि इससे पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने में कुछ विलंब होगा। 

हमले से कुछ हफ़्ते पहले ही जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाक़ात के बाद जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल होने को लेकर उम्मीद जताई थी। उस समय उन्होंने कहा था, हमें लगता है कि सही समय आ गया है, विधानसभा चुनाव हुए छह महीने बीत चुके हैं। शाह यहाँ आए थे, मैंने उनसे अलग से मुलाक़ात की, जो अच्छी रही... मुझे अब भी उम्मीद है कि जम्मू-कश्मीर को जल्द ही अपना राज्य का दर्जा वापस मिल जाएगा।

Saturday, April 12, 2025

संघीय-कशमकश और तमिल राजनीति


तमिलनाडु विधानसभा से पास होने के बावज़ूद दस विधेयकों को रोक कर रखने के राज्यपाल आरएन रवि के फैसले को अवैध करार देते हुए उच्चतम न्यायालय ने एक संवैधानिक पेच को दुरुस्त ज़रूर किया है, पर इससे केंद्र-राज्य संबंधों और राज्यपालों की भूमिका से जुड़ी पहेलियों का हल पूरी तरह अब भी नहीं होगा। हाल के वर्षों में कुलपतियों की नियुक्ति, राज्य विधान परिषदों में नामांकन और राज्यपाल द्वारा पारंपरिक अभिभाषण के संपादन या सदन को बुलाने पर दुर्भाग्यपूर्ण रस्साकशी तो हुई ही है, विधानमंडलों से पारित विधेयकों को मंजूरी देने में देरी या इनकार जैसे कार्य भी हुए हैं। 

इस बार के फैसले से राज्यों की प्रशासनिक स्वायत्तता बढ़ेगी और संवैधानिक पदों का कामकाज नियंत्रित होगा, जिसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ेगा। यह न्यायिक-हस्तक्षेप ऐसे समय में हुआ है, जब गैर-भाजपा दलों द्वारा शासित राज्यों में राज्यपालों और सरकारों के बीच तनाव चरम पर है। इस संवैधानिक सफलता का राजनीतिक श्रेय एमके स्टालिन की डीएमके सरकार को जाता है, पर वहीं मेडिकल प्रवेश के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा ‘नीट’ से छूट हासिल करने में तमिलनाडु सरकार को मुँह की खानी पड़ी है।

Sunday, April 6, 2025

भारत के रोम-रोम में बसे राम

भारत की विविधता में एकता को देखना है, तो उसके पर्वों और त्योहारों पर नज़र डालनी होगी। इनका देश की संस्कृति, अर्थव्यवस्था  और समाज के साथ भौगोलिक परिस्थितियों और मौसम के साथ गहरा रिश्ता है। जिस तरह साल के उत्तरार्ध में पावस की समाप्ति और शरद के आगमन के साथ पूरे देश में त्योहारों और पर्वों का सिलसिला शुरू होता है, उसी तरह सर्दियाँ खत्म होने और गर्मियों की शुरुआत के बीच वसंत ऋतु के पर्व हैं। वसंत पंचमी, मकर संक्रांति, होली, नव-संवत्सर, वासंतिक-नवरात्र, रामनवमी और गंगा दशहरा इन पर्वों का समुच्चय है। 

यों तो हमारा हर दिन पर्व है और यह खास तरह की जीवन-शैली है, जो परंपरागत भारतीय-संस्कृति की देन है। जैसा उत्सव-धर्मी भारत है, वैसा शायद ही दूसरा देश होगा। आप भारत और भारतीयता की परिभाषा समझना चाहते हैं, तो इस बात को समझना होगा कि किस तरह से इन पर्वों और त्योहारों के इर्द-गिर्द हमारी राष्ट्रीय-एकता काम करती है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और अटक से कटक तक कुछ खास तिथियों पर अलग-अलग रूप में मनाए जाने वाले पर्वों के साथ एक खास तरह की अद्भुत एकता काम करती है। वह मकर संक्रांति, नव संवत्सर, पोइला बैसाख, पोंगल, ओणम, होली हो या दीपावली और छठ। 

धार्मिक दृष्टि

यह सप्ताह नव संवत्सर और नवरात्र का था, जिसका समापन रामनवमी के साथ होगा। रामनवमी का त्यौहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है। हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का जन्म पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में हुआ था। इस पर्व के साथ ही माँ दुर्गा के नवरात्र का समापन भी होता है। धार्मिक-दृष्टि से देखें, तो भगवान श्री राम ने भी देवी दुर्गा की आराधना की थी। उनकी शक्ति-पूजा ने उन्हें युद्ध में विजय प्रदान की। इन दो महत्वपूर्ण पर्वों का एक साथ होना उसकी महत्ता को बढ़ा देता है। इसी दिन गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना का आरंभ भी किया था। रामनवमी का व्रत पापों का क्षय करने वाला और शुभ फल प्रदान करने वाला होता है।

धर्मशास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में रावण के अत्याचारों को समाप्त करने तथा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने मृत्यु लोक में श्री राम के रूप में अवतार लिया था। यह धार्मिक-दृष्टि है, पर विश्व-साहित्य में शायद ही कोई ऐसा दूसरा पात्र होगा, जिसकी राम से तुलना की जा सके। यह बहस का विषय है कि राम, ऐतिहासिक पात्र हैं या नहीं, पर इसमें दो राय नहीं कि साहित्य, संस्कृति और समाज में राम अतुलनीय हैं। 

Thursday, March 27, 2025

बेहद ज़रूरी है न्याय-व्यवस्था की साख को बचाना


नेशनल ज्यूडीशियल डेटा ग्रिड के अनुसार इस हफ्ते 26 मार्च तक देश की अदालतों में चार करोड़ 54 लाख से ज्यादा मुकदमे विचाराधीन पड़े थे। इनमें 46.43 लाख से ज्यादा केस 10 साल से ज्यादा पुराने हैं। यह मान लें कि औसतन एक मुकदमे में कम से कम दो या तीन व्यक्ति पक्षकार होते हैं तो देश में करीब 10 से 15 करोड़ लोग मुकदमेबाजी के शिकार हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। सामान्य व्यक्ति के नजरिए से देखें तो अदालती चक्करों से बड़ा चक्रव्यूह कुछ नहीं है। एक बार फँस गए, तो बरसों तक बाहर नहीं निकल सकते। 

सरकार और न्यायपालिका लगातार कोशिश कर रही है कि कम से कम समय में मुकदमों का निपटारा हो जाए। यह तभी संभव है जब प्रक्रियाएं आसान बनाई जाएँ, पर न्याय व्यवस्था का संदर्भ केवल आपराधिक न्याय या दीवानी मुकदमों तक सीमित नहीं है। व्यक्ति को कारोबार का अधिकार देने, मुक्त वातावरण में अपना धंधा चलाने, मानवाधिकारों तथा अन्य अधिकारों की रक्षा के लिए भी उपयुक्त न्यायिक संरक्षण की जरूरत है। उसके पहले हमें अपनी न्याय-व्यवस्था की सेहत पर भी नज़र डालनी होगी, जिसके उच्च स्तर को लेकर कुछ विवाद खड़े हो रहे हैं। 

इस समय सवाल तीन हैं। न्याय-व्यवस्था को राजनीति और सरकारी दबाव से परे किस तरह रखा जाए? जजों की नियुक्ति को पारदर्शी कैसे बनाया जाए? तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि सामान्य व्यक्ति तक न्याय किस तरह से उपलब्ध कराया जाए? अक्सर कहा जाता है कि देश में न्यायपालिका का ही आखिरी सहारा है। पर पिछले कुछ समय से न्यायपालिका को लेकर उसके भीतर और बाहर से सवाल उठने लगे हैं। उम्मीदों के साथ कई तरह के अंदेशे हैं। कई बार लगता है कि सरकार नहीं सुप्रीम कोर्ट के हाथ में देश की बागडोर है। पर न्यायिक जवाबदेही को लेकर हमारी व्यवस्था पारदर्शी नहीं बन पाई है। 

Wednesday, March 5, 2025

संसदीय-सीटों के परिसीमन पर बहस

परिसीमन के बाद संभावित तस्वीर
केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद से देश के राजनेताओं और विश्लेषकों के एक तबके ने दो-तीन बातों पर ज़ोर देना शुरू कर दिया है। वे कहते हैं कि भारत में संविधान खतरे में है, लोकतंत्र विफल हो रहा है और यह भी कि लोकतंत्र का मतलब चुनाव जीतना भर नहीं होता। लोकतंत्र ही नहीं संघवाद को भी खतरे में बताया जा रहा है। बीजेपी के हिंदू-राष्ट्रवाद की अतिशय केंद्रीय-सत्ता को लेकर भी उनकी आपत्तियाँ हैं। 

इधर तमिलनाडु से हिंदी-साम्राज्यवाद को लेकर बहस फिर से शुरू हुई है, जिसमें संसदीय-सीटों के परिसीमन को लेकर आपत्तियाँ भी शामिल हैं। दक्षिण के नेताओं का तर्क है कि यदि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होगा, तब दक्षिण के राज्य नुकसान में रहेंगे, जबकि जनसंख्या-नियंत्रण में उनका योगदान उत्तर के राज्यों से बेहतर रहा है। उनका सुझाव है कि संसदीय परिसीमन में संघवाद के मूल्यों का अनुपालन होना चाहिए।

परिसीमन से जुड़े इन्हीं सवालों को लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 5 मार्च को चेन्नई में सर्वदलीय बैठक बुलाई है। उन्होंने कहा: तमिलनाडु अपने अधिकारों के लिए बड़ी लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर है। परिसीमन का खतरा दक्षिणी राज्यों पर डैमोक्लीज़ की तलवार की तरह मंडरा रहा है। मानव विकास सूचकांक में अग्रणी तमिलनाडु के सामने गंभीर खतरा खड़ा है। 

Tuesday, January 28, 2025

जगाएँ अपने गणतांत्रिक-सपनों को

रघुवीर सहाय की कविता है: 

राष्ट्रगीत में भला कौन वह/ भारत-भाग्य-विधाता है/ फटा सुथन्ना पहने जिसका/ गुन हरचरना गाता है/ मखमल, टमटम, बल्लम, तुरही/ पगड़ी, छत्र-चँवर के साथ/ तोप छुड़ाकर, ढोल बजाकर/ जय-जय कौन कराता है/ पूरब-पश्चिम से आते हैं/ नंगे-बूचे नरकंकाल/ सिंहासन पर बैठा/ उनके तमगे कौन लगाता है।

हमारे यहाँ हर रोज कोई न कोई पर्व होता है, पर तीन राष्ट्रीय पर्व हैं: स्वतंत्रता दिवस, गांधी जयंती और ‘गणतंत्र दिवस।’ नागरिकों की दृष्टि से तीनों महत्वपूर्ण हैं, पर तीनों में 26 जनवरी खासतौर से नागरिकों का दिन है। स्वतंत्र नागरिकों की अपनी व्यवस्था का नाम है ‘गणतंत्र’। जिस देश के राष्ट्राध्यक्ष को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से नागरिक चुनते हैं। शासन-प्रणाली वह रूप है, जो ‘सार्वजनिक’ है, किसी की ‘निजी-संपत्ति’ नहीं। 

Sunday, January 5, 2025

2025: दुनिया की गति और हमारी प्रगति

देखते ही देखते इक्कीसवीं सदी का 24वाँ साल गुज़र गया और 25वाँ आ गया। जिस सदी को लेकर बड़े-बड़े सपने थे, उसके एक चौथाई साल 2025 में पूरे हो जाएंगे। किधर जा रही है दुनिया और कहाँ खड़े हैं हम? देश की करीब 145 करोड़ की आबादी में पाँच से दस करोड़ लोगों ने 31 की रात नए साल का जश्न मनाकर स्वागत किया। शायद इतने ही लोगों को नए साल के आगमन की जानकारी थी, पर वे जश्न में शामिल नहीं थे। इतने ही लोगों ने सुना कि नया साल आ गया और उन्होंने यकीन कर लिया। फिर भी 100 करोड़ से ज्यादा लोग ऐसे होंगे, जिन्हें किसी के आने और जाने की खबर नहीं थी। उनकी वह रात भी वैसे ही बीती जैसे हमेशा बीतती है-सर्द और अंधेरी।  

नया साल आपके लिए और मेरे लिए कैसा होगा, इसका पता लगाने के दो तरीके हैं। या तो किसी ज्योतिषी की शरण में जाएँ या वैश्विक घटनाक्रम की जटिल गुत्थियों को समझने की कोशिश करें। समझें ही नहीं, भी देखें कि हमारे ऊपर उनका क्या असर होने वाला है। 2020 में जनवरी के महीने में हमें पता नहीं था कि हम खतरे से घिरने वाले हैं। ज्यादा से ज्यादा कुछ लोगों को खबर थी कि चीन में कोई बीमारी फैली है। फैली है, तो हमारी बला से। दो-तीन महीनों के भीतर हमने उस बीमारी को भारत में, और फिर अपने आसपास प्रवेश करते देख लिया। 

Wednesday, January 1, 2025

2024: नए पावर हाउस के रूप में भारत का उदय

राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से 2024 का साल भारत के लिए घटनाओं और उपलब्धियों से भरा रहा। आर्थिक मोर्चे पर भारत का उदय नए पावर हाउस के रूप में हो रहा है, पर साल की सबसे बड़ी गतिविधि राजनीति से जुड़ी थी। 17वीं लोकसभा का कार्यकाल 16 जून 2024 को पूरा हुआ, पर जो परिणाम आए, उनसे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को धक्का लगा। हालांकि नरेंद्र मोदी को लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला, पर अब भारतीय जनता पार्टी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है, बल्कि उसे अपने सहयोगी दलों का सहारा लेना पड़ा है। 

बीजेपी को सबसे बड़ा धक्का उत्तर प्रदेश में लगा है, जहाँ के कुल 80 क्षेत्रों में से उसे केवल 33 में विजय मिली। समाजवादी पार्टी ने राज्य में 37 सीटों पर जीत हासिल करके भाजपा को दूसरे स्थान पर धकेल दिया। यह अप्रत्याशित था। राहुल गांधी के लिए भी व्यक्तिगत रूप से इसबार का चुनाव लाभकारी रहा। 2019 में उन्हें अमेठी से हार का सामना करना पड़ा था, वहीं इसबार उन्होंने अमेठी से वापसी की। नेहरू-गांधी परिवार की एक अन्य सदस्य प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस साल सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। लोकसभा चुनाव में अमेठी और वायनाड दोनों सीटों पर जीत के बाद राहुल गांधी ने वायनाड की सीट को छोड़ दिया, जहाँ से प्रियंका गांधी जीतकर आईं। 

Monday, March 25, 2024

रंगों के इस पर्व को सार्थक भी बनाएं


पिछला हफ्ता राजनीतिक तूफानों का था तो यह हफ्ता होली का है। गिले-शिकवे मिटाने का पर्व। केवल गिले-शिकवों की बात ही नहीं है, होली हमें ऊँच-नीच की भावनाओं से भी दूर ले जाती है। वह मनुष्य-मात्र की एकता का संदेश देती है। इस दिन हम सबको गले लगाते हैं। उसकी जाति-धर्म, अमीर-गरीबी देखे बगैर। इसका मतलब है हुड़दंग,
मस्ती और ढेर सारे रंग। हम अपने पर्वों और त्योहारों में उस जीवन-दर्शन को खोज सकते हैं, जो हजारों वर्षों की विरासत है।

इसके पहले कि इस विरासत की परिभाषा बदले, उसे अक्षुण्ण बनाने के प्रयास भी होने चाहिए। दुर्भाग्य से होली के साथ भी कुछ फूहड़ बातें जुड़ गईं हैं, जिन्हें दूर करने का प्रयास होना चाहिए। परंपराओं के साथ नवोन्मेष और विरूपण दोनों संभावनाएं जुड़ी होती हैं। आधुनिक जीवन और शहरीकरण के कारण इनके स्वरूप में बदलाव आता है। पर मूल-भावना अपनी जगह है। बाजारू संस्कृति ने इस आनंदोत्सव को कारोबारी रूप दिया है। वहीं कल्याणकारी भावनाएं इसे सकारात्मक रास्ते पर ले जा सकती है, बशर्ते वे कमज़ोर न हों।  

संयोग से होली के इस आनंदोत्सव के दौर के साथ हम लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव भी मना रहे हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा सक्रिय लोकतंत्र है। यह लोकतंत्र यदि 130 करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या के जीवन में खुशहाली लाने का काम करने में कामयाब हो गया, तो यह हमारे लिए सबसे बड़े गौरव की बात होगी। विचार करें कि क्या आप अपने इस पर्व का लोकतंत्र के पर्व को सही रास्ता दिखाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। क्या ऐसा करेंगे?

Sunday, January 7, 2024

2024 संभावनाओं के नए पड़ाव

कैलेंडर की तारीखें बदल जाने मात्र से नया साल अपने से पिछले साल से अलग नहीं हो जाता, बल्कि समय की निरंतरता में वह एक नया पड़ाव होता है। इस लिहाज से पिछली घटनाएं आने वाले समय को परिभाषित करती हैं। पिछले तीन वर्षों की तुलना में यह साल बेहतर उपलब्धियों के साथ शुरू हुआ है। भारत का उदय नए आर्थिक पावर हाउस के रूप में होता दिखाई पड़ रहा है।

शुरुआत जिस माहौल में हो रही है, उससे लगता है कि यह साल जोशो-जुनून से भरा होगा। फिलहाल यह जोशो-जुनून इस साल के चुनावों में दिखाई देगा। 17वीं लोकसभा का कार्यकाल 16 जून 2024 को पूरा होगा। इसका मतलब है कि उसके पहले चुनाव और मतगणना का कार्य पूरा हो जाना चाहिए। इस दृष्टि से चुनाव अप्रैल-मई में होने चाहिए। और इसकी घोषणा मार्च में होनी चाहिए। 2019 के चुनाव का कार्यक्रम 10 मार्च को हुआ था। इसबार भी इसी तारीख के आसपास घोषणा होनी चाहिए।

यह दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव है। चुनाव में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच होगा। इंडिया गठबंधन हालांकि 28 के आसपास दलों को लेकर बना है, पर उसके केंद्र में कांग्रेस पार्टी है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि एनडीए के मुकाबले इंडिया गठबंधन कितनी सीटों पर सीधा मुकाबला करा पाएगा। सीटों का बँटवारा करने की राह में कई तरह के पेच हैं।

Tuesday, December 12, 2023

राजनीति की लोकलुभावन गारंटियाँ


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में विकसित भारत संकल्प यात्रा के लाभार्थियों के साथ वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से बातचीत करने के बाद कहा कि विधानसभा चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया कि मोदी की गारंटी में दम है। गारंटी से उनका आशय उस भरोसे से है, जो उनकी कार्यशैली से जुड़ा है। सिद्धांततः वे लोकलुभावन राजनीति के विरोधी हैं। पिछले साल एक सभा में उन्होंने कहा था कि लोकलुभावन राजनीति के नाम पर मुफ्त की रेवड़ियाँ बाँटने की संस्कृति पर रोक लगनी चाहिए। वे यह बात गुजरात के चुनाव के संदर्भ में कह रहे थे, जहाँ आम आदमी पार्टी भी प्रवेश पाने की कोशिश कर रही थी।

इसी रविवार को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने एक कार्यक्रम में कहा कि समाज में जिस तथाकथित मुफ्त उपहार की ‘अंधी दौड़’ देखने को मिल रही है, उसकी राजनीति खर्च करने संबंधी प्राथमिकताओं को विकृत कर देती है। बहरहाल इन दिनों गारंटी शब्द इतना लोकप्रिय हो रहा है कि इसबार भाजपा ने छत्तीसगढ़ के लिए अपने घोषणापत्र को 'मोदी की गारंटी' नाम दिया। मध्य प्रदेश में बीजेपी की जीत के पीछे ‘लाड़ली बहना’ योजना का हाथ बताया जा रहा है। इस योजना के तहत मध्य प्रदेश सरकार महिलाओं को हर महीने 1,250 रुपये देती है।

मोदी की भाजपा ने ही नहीं, हाल में हुए चुनावों में कांग्रेस ने चार राज्यों में और तेलंगाना में बीआरएस ने भी गारंटियों की झड़ी लगा दी। इन वायदों में एलपीजी सिलेंडर रिफिल पर भारी सब्सिडी, स्त्रियों को हर महीने धनराशि वगैरह-वगैरह शामिल हैं। इस साल मई हुए में कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को मिली सफलता के पीछे पाँच गारंटियों की बड़ी भूमिका थी। पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में गृह ज्योति, गृह लक्ष्मी, अन्न भाग्य, युवा निधि एवं शक्ति की पाँच गारंटियाँ दी थीं। गृह ज्योति के तहत 200 यूनिट निशुल्क बिजली, गृह लक्ष्मी में परिवार की मुखिया को दो हजार रुपये, अन्न भाग्य में दस किलोग्राम अनाज, युवा निधि में बेरोजगार स्नातकों को तीन हजार और डिप्लोमाधारियों को डेढ़ हजार रुपये महीने, शक्ति योजना के तहत महिलाओं को राज्य भर में सरकारी बसों में निशुल्क यात्रा की सुविधा की गारंटी थी।  

Sunday, October 22, 2023

सांस्कृतिक-विविधता में एकता के वाहक हमारे पर्व और त्योहार

भारत की विविधता में एकता को देखना है, तो उसके पर्वों और त्योहारों पर नज़र डालें। नवरात्र की शुरूआत के साथ ही चौमासे का सन्नाटा टूट गया है। माहौल में हल्की सी ठंड आ गई है और उसके साथ बढ़ रही है मन की उमंग। बाजारों में रौनक वापस आ गई है। घरों में साज-सफाई शुरू हो गई है। नई खरीदारी शुरू हो गई है। वर्षा ऋतु की समाप्ति के साथ भारतीय समाज सबसे पहले अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए पितृ-पक्ष मनाता है। उसके बाद पूरे देश में त्योहारों और पर्वों का सिलसिला शुरू होता है, जो अगली वर्षा ऋतु आने के पहले तक चलता है। जनवरी-फरवरी में वसंत पंचमी, फिर होली,  नव-संवत्सर, अप्रेल में वासंतिक-नवरात्र, रामनवमी, गंगा दशहरा, वर्षा-ऋतु के दौरान रक्षा-बंधन, जन्‍माष्‍टमी, शिव-पूजन, ऋषि पंचमी, हरतालिका तीज, फिर शारदीय नवरात्र, करवाचौथ, दशहरा और दीपावली।

हमारा हर दिन पर्व है। यह खास तरह की जीवन-शैली है, जो परंपरागत भारतीय-संस्कृति की देन है। जैसा उत्सव-धर्मी भारत है, वैसा शायद ही दूसरा देश होगा। इस जीवन-चक्र के साथ भारत का सांस्कृतिक-वैभव तो जुड़ा ही है, साथ ही अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका भी इसके साथ जुड़ी है। आधुनिक जीवन और शहरीकरण के कारण इसके स्वरूप में बदलाव आया है, पर मूल-भावना अपनी जगह है। यदि आप भारत और भारतीयता की परिभाषा समझना चाहते हैं, तो इस बात को समझना होगा कि किस तरह से इन पर्वों और त्योहारों के इर्द-गिर्द हमारी राष्ट्रीय-एकता काम करती है।

अद्भुत एकता

कश्मीर से कन्याकुमारी तक और अटक से कटक तक कुछ खास तिथियों पर अलग-अलग रूप में मनाए जाने वाले पर्वों के साथ एक खास तरह की अद्भुत एकता काम करती है। चाहें वह नव संवत्सर, पोइला बैसाख, पोंगल, ओणम, होली हो या दीपावली और छठ। इस एकता की झलक आपको ईद, मुहर्रम और क्रिसमस के मौके पर भी दिखाई पड़ेगी। दीपावली के दौरान पाँच दिनों के पर्व मनाए जाते हैं। नवरात्र मनाने का सबका तरीका अलग-अलग है, पर भावना एक है। गुजरात में यह गरबा का पर्व है और बंगाल में दुर्गा पूजा का। उत्तर भारत में नवरात्र व्रत और रामलीलाओं का यह समय है। देवोत्थान एकादशी के साथ तमाम शुभ कार्य शुरू हो गए हैं।