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Tuesday, April 21, 2026

स्त्रियों के साथ राजनीतिक-छल ज्यादा चलेगा नहीं


भारत में महिला आरक्षण को लेकर एक साथ कई सवाल हैं। संसद में संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो पाया, या उसे पास कराने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी? ऐसा लगता है कि बीजेपी का इरादा इस मसले को उठाना और विरोधियों को उत्तेजित करना था, ताकि वे शोर मचाएँ। सरकार जानती थी कि उसके साथ दो तिहाई सदस्य नहीं हैं और आज के राजनीतिक हालात में उसे कत्तई आशा नहीं करनी चाहिए थी कि विरोधी राजनीति का कोई धड़ा उसके समर्थन में आता। तब फिर क्यों बिल पेश किया?

भारतीय राजनीति विश्वसनीय नहीं है। इसमें जो कहा जाता है, ज़रूरी नहीं कि वैसा ही हो। फौरी तौर पर यह राजनीतिक तीर था, जो नारी-शक्ति का लाभ उठाने के लिए चलाया गया था। संसद में जब बातें होती हैं, तब उन्हें गाँव-गाँव में सुना जाता है। विरोध में जितना शोर होगा, फायदा उतना ज्यादा होगा। उद्देश्य माहौल बनाने, नैरेटिव रचने या इसे जो भी कहें, उतना ही था। विरोधियों की दिलचस्पी भी कम से कम महिला आरक्षण में नहीं थी। परिसीमन को लेकर भी उनके तर्क विचित्र थे। इससे ज्यादा उनका इरादा भी कुछ नहीं था। बहरहाल इसका विपरीत-प्रभाव भी होगा, जो समूची राजनीति को अपनी चपेट में लेगा।

क्या महिलाओं को समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें छला जा रहा है? यह दीगर सवाल है कि इस विधेयक के परास्त होने का लाभ बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव में मिलेगा या नहीं। असल बात यह है कि देश की राजनीति ने पिछले तीन दशक से नारी-शक्ति को छला है। उसे बहुत ज्यादा छला नहीं जा सकेगा। स्त्रियों की राजनीतिक अभिलाषाएँ आज उस सुप्तावस्था में नहीं हैं, जो नब्बे के दशक में थीं। साफ है कि यह विधेयक राजनीतिक-गतिविधि मात्र थी। जिस तरह से बिल के गिरते ही पोस्टर छपकर आ गए, और राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन की योजना बन गई, वह बताता है कि बीजेपी इसकी तैयारी के साथ आई थी।

सबसे पहले एचडी देवेगौड़ा सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक, 1996 के रूप में 12 सितंबर 1996 को महिला आरक्षण विधेयक, पेश किया था। विधेयक पेश तो हुआ, लेकिन राजनीतिक आम सहमति न बनने और गठबंधन सरकार के भीतर विरोध के कारण इसे संयुक्त संसदीय समिति को भेजना पड़ा और 11वीं लोकसभा भंग होने के साथ ही लैप्स हो गया। देश की राजनीति चाहती, तो देवेगौड़ा का बिल ही पास हो जाता।

सरकार ने इसबार जो विधेयक पेश किया था, वह संसदीय सीटों के परिसीमन पर केंद्रित था। उसके विरोधियों का कहना है कि परिसीमन देश को तोड़ देगा। वे कहते हैं कि 2023 के बिल को लागू करो। 2023 के महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, इसे परिसीमन के बगैर लागू नहीं किया जा सकता। यह कानून विशेष रूप से जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होने की शर्त से बँधा हुआ है। परिसीमन रुकेगा तो आरक्षण भी रुकेगा।

Saturday, April 18, 2026

कौन रोक रहा है महिला आरक्षण

अंततः संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो पाया। सरकार भी जानती थी कि उसके साथ दो तिहाई सदस्य नहीं हैं। इसके लिए उसे सभी दलों से बातचीत पहले करनी चाहिए थी। यह फौरी तौर पर राजनीतिक तीर लगता है, जिसके निशाने पर कौन और क्या है, यह अब दिखाई पड़ेगा, पर जिस तरह से बिल के गिरते ही पोस्टर छपकर आ गए, उससे इतना समझ में आता है कि बीजेपी इसका राजनीतिक लाभ उठाने की तैयारी कर चुकी है। तीन दशक के शोर-शराबे के बावज़ूद इस अधिकार के लागू न हो पाने का मतलब क्या निकाला जाए? मुझे लगता है कि हमारी राजनीति नहीं चाहती कि यह जल्द से जल्द लागू हो। इसे वह ज्यादा से ज्यादा देर तक टालना चाहती है।

सच यह है कि देश की राजनीति चाहती, तो देवेगौड़ा का बिल ही पास हो जाता।  फिलहाल उसे रोकने वालों का कहना है कि परिसीमन देश को तोड़ देगा। वे कहते हैं कि 2023 के बिल को लागू कर दो। 2023 के बिल को लागू करने के लिए भी जनगणना और परिसीमन का इंतज़ार करना होगा। 2023 के महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, इसे परिसीमन के बगैर लागू नहीं किया जा सकता। यह कानून विशेष रूप से जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होने की शर्त से बंधा हुआ है। परिसीमन रुकेगा तो आरक्षण भी रुकेगा। 

बहरहाल सरकार ने उस बिल की अधिसूचना जारी कर दी है। यानी अब उसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू होगी।  सरकार ने गुरुवार शाम को एक अधिसूचना जारी की जिसमें कहा गया कि महिलाओं को 33% आरक्षण प्रदान करने वाला 2023 का अधिनियम 16 ​​अप्रैल को "लागू" हो जाएगा। इस बात पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया कि संशोधित 2026 विधेयक पर लोकसभा में चल रही बहस के बीच 2023 के कानून के प्रावधानों को लागू करने की अधिसूचना क्यों जारी की गई। विपक्ष ने इसे 2023 के कानून को बचाने का एक "हताश प्रयास" बताया। ऐसा इसलिए, क्योंकि संशोधित 2026 विधेयक के सदन से पारित होने को लेकर संशय हैं। पूर्व अधिसूचना में कहा गया था, "यह उस तिथि से लागू होगा जो केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निर्धारित करे।"

जब 2023 का वह बिल पास हो रहा था, तब उसे लेकर जबर्दस्त सर्वानुमति थी। तब भी सवाल था कि इसे फौरन लागू करने से रोका किसने है? कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में कहा, जब सरकार नोटबंदी जैसा फैसला तुरत लागू करा सकती है, तब इतने महत्वपूर्ण विधेयक की याद साढ़े नौ साल बाद क्यों आई? बात तो बहुत मार्के की कही थी। पर जब दस साल तक कांग्रेस की सरकार थी, तब उन्हें किसने रोका था? देश की राजनीति ने रोका था,  उनके अपने सहयोगी दल ही इसके लिए तैयार नहीं थे। 

Sunday, September 24, 2023

स्त्री-सशक्तिकरण की दिशा में एक कदम


नारी शक्ति वंदन विधेयक और उसके छह अनुच्छेद गुरुवार को राज्यसभा से भी पास हो गए। जैसी सर्वानुमति इसे मिली है, वैसी बहुत कम कानूनों को संसद में मिली है।  1996 से 2008 तक संसद में चार बार महिला आरक्षण विधेयक पेश किए गए, पर राजनीतिक दलों ने उन्हें पास होने नहीं दिया। 2010 में यह राज्यसभा से पास जरूर हुआ, फिर भी कुछ नहीं हुआ। ऐसे दौर में जब एक-एक विषय पर राय बँटी हुई है, यह आमराय अपूर्व है। पर इसे लागू करने के साथ दो बड़ी शर्तें जुड़ी हैं। जनगणना और परिसीमन। इस वजह से आगामी चुनाव में यह लागू नहीं होगा, पर चुनाव का एक मुद्दा जरूर बनेगा, जहाँ सभी पार्टियाँ इसका श्रेय लेंगी। 

इसकी सबसे बड़ी वजह है, महिला वोट। महिला पहले वोट बैंक नहीं हुआ करती थीं। 2014 के चुनाव के बाद से वे वोट बैंक बनती नज़र आने लगी हैं। केवल शहरी ही नहीं ग्रामीण महिलाएं भी वोट बैंक बन रही हैं। ज़रूरी नहीं है कि इसका श्रेय किसी एक पार्टी या नेता को मिले। सबसे बड़ी वजह है पिछले दो दशक में भारतीय स्त्रियों की बढ़ती जागरूकता और सामाजिक जीवन में उनकी भूमिका। राजनीति इसमें उत्प्रेरक की भूमिका निभाएगी।   

रोका किसने?

इस विधेयक को लेकर इतनी जबर्दस्त सर्वानुमति है, तो इसे फौरन लागू करने से रोका किसने है?  कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में कहा, जब सरकार नोटबंदी जैसा फैसला तुरत लागू करा सकती है, तब इतने महत्वपूर्ण विधेयक की याद साढ़े नौ साल बाद क्यों आई? बात तो बहुत मार्के की कही है। पर जब दस साल तक कांग्रेस की सरकार थी, तब उन्हें किसने रोका था?  सोनिया गांधी ने लोकसभा में सवाल किया, मैं एक सवाल पूछना चाहती हूं। भारतीय महिलाएं पिछले 13 साल से इस राजनीतिक ज़िम्मेदारी का इंतज़ार कर रही हैं। अब उन्हें कुछ और साल इंतज़ार करने के लिए कहा जा रहा है। कितने साल? दो साल, चार साल, छह साल, या आठ साल? 

संसद में इसबार हुई बहस के दौरान कुछ सदस्यों ने जनगणना और सीटों के परिसीमन की व्यवस्थाओं में संशोधन के लिए प्रस्ताव रखे, पर वे ध्वनिमत से इसलिए नामंजूर हो गए, क्योंकि किसी ने उनपर मतदान कराने की माँग नहीं की। सीधा अर्थ है कि ज्यादातर सदस्य मानते हैं कि जब सीटें बढ़ जाएंगी, तब महिलाओं को उन बढ़ी सीटों में अपना हिस्सा मिल जाएगा। कांग्रेस ने भी मत विभाजन की माँग नहीं की। जब आप दिल्ली-सेवा विधेयक पर मतदान की माँग कर सकते हैं, तो इस विधेयक को फौरन लागू कराने के लिए मत-विभाजन की माँग क्यों नहीं कर पाए? खुशी की बात है कि मंडलवादी पार्टियों ने इसे स्वीकार कर लिया। कांग्रेस ने ओबीसी कोटा की माँग की, जबकि इसके पहले वह इसके लिए तैयार नहीं थी।

Wednesday, March 13, 2019

स्त्रियों को टिकट देने में हिचक क्यों?

http://www.rashtriyasahara.com/epaperpdf//13032019//13032019-md-hr-10.pdf
ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने घोषणा की है कि हम एक तिहाई सीटें महिला प्रत्याशियों को देंगे। प्रगतिशील दृष्टि से यह घोषणा क्रांतिकारी है और उससे देश के दूसरे राजनीतिक दलों पर भी दबाव बनेगा कि वे भी अपने प्रत्याशियों के चयन में महिला प्रत्याशियों को वरीयता दें। उधर ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव में 41 फीसदी टिकट महिलाओं को दिए हैं। दोनों घोषणाएं उत्साहवर्धक हैं, पर दोनों लोकसभा के लिए हैं। ओडिशा में विधानसभा चुनाव भी हैं, पर उसमें टिकट वितरण का यही फॉर्मूला नहीं होगा। बंगाल में अभी चुनाव नहीं हैं, इसलिए कहना मुश्किल है कि विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की रणनीति क्या होगी। बहरहाल दोनों घोषणाएं सही दिशा में बड़ा कदम हैं। 
सत्रहवें लोकसभा चुनाव में देश के 90 करोड़ मतदाताओं को भाग लेने का मौका मिलेगा, इनमें से करीब आधी महिला मतदाता हैं। पर व्यावहारिक राजनीति इस आधार पर नहीं चलती। आने दीजिए पार्टियों की सूचियाँ, जिनमें पहलवानों की भरमार होगी। राजनीति की सफलता का सूत्र है विनेबिलिटीयानी जीतने का भरोसा। यह राजनीति पैसे और डंडे के जोर पर चलती है। पिछले लोकसभा चुनाव के परिणामों के विश्लेषण से एक बात सामने आई कि युवा और खासतौर से महिला मतदाताओं ने चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह भूमिका इसबार के चुनाव में और बढ़ेगी, पर राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी आज भी कम है। कमोबेश दुनियाभर की राजनीति पुरुषवादी है, पर हमारी राजनीति में स्त्रियों की भूमिका वैश्विक औसत से भी कम है। सामान्यतः संसद और विधानसभाओं में महिला सदस्यों की संख्या 10 फीसदी से ऊपर नहीं जाती।

Friday, March 8, 2019

राजनीति के दरवाजे से बाहर क्यों हैं स्त्रियाँ?

http://inextepaper.jagran.com/2059095/Kanpur-Hindi-ePaper,-Kanpur-Hindi-Newspaper-InextLive/08-03-19#page/14/1
बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में भारत के तकनीकी-आर्थिक रूपांतरण के समांतर सबसे बड़ी परिघटना है सामाजिक जीवन में लड़कियों की बढ़ती भागीदारी. सत्तर के दशक तक भारतीय महिलाएं घरों तक सीमित थीं, आज वे जीवन के हर क्षेत्र में मौजूद हैं. युवा स्त्रियाँ आधुनिकीकरण और सामाजिक रूपांतरण में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहीं हैं. भूमिका बढ़ने के साथ उनसे जुड़े सवाल भी खड़े हुए हैं. पिछले साल जब मी-टू आंदोलन ने भारत में प्रवेश किया था, तब काफी स्त्रियों ने अपने जीवन के ढके-छिपे पहलुओं को उजागर किया. न जाने कितने तथ्य अभी छिपे हुए हैं.

यत्र नार्यस्तु...के देश में स्त्रियों के जीवन की जमीन बहुत कठोर है. उन्हें अपनी जगह बनाने में जबर्दस्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. फिर भी वे इनका मुकाबला करते हुए आगे बढ़ रहीं हैं. दिसम्बर, 2012 में दिल्ली रेप कांड के बाद स्त्री-चेतना में विस्मयकारी बदलाव हुआ था. लम्बे अरसे से छिपा गुस्सा एकबारगी सामने आया. यह केवल स्त्रियों का गुस्सा नहीं था, पूरे समाज की नाराजगी थी. उस आंदोलन की अनुगूँज शहरों, कस्बों, गाँवों और गली-मोहल्लों तक में सुनाई पड़ी थी. उस आंदोलन से बड़ा बदलाव भले नहीं हुआ, पर सामाजिक जीवन में एक नया नैरेटिव तैयार हुआ.