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Tuesday, October 27, 2020

अमेरिका में 'अर्ली वोटिंग' की आँधी


अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में अब सात दिन रह गए हैं और वहाँ डाक से वोट पड़ने वाले वोटों की आँधी आ गई है। नवीनतम सूचना के अनुसार करीब 6.2 करोड़ वोटर अपने अधिकार का इस्तेमाल कर चुके हैं। अर्ली वोटिंग का एक नया रिकॉर्ड अभी कायम हो चुका है। समय से पहले इतने वोट पहले कभी नहीं पड़े थे। डाक से इतनी भारी संख्या में वोटिंग का मतलब है कि अमेरिकी मतदाता कोरोना के कारण बाहर निकलने से घबरा रहा है।

अमेरिका में वोटरों की संख्या करीब 23 करोड़ है। सन 2016 के चुनाव में करीब 14 करोड़ ने वोट दिया था। पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि इसबार 15 से 16 करोड़ के बीच वोट पड़ेंगे। सामान्यतः अमेरिका में 65 से 70 फीसदी मतदान होता है। सवाल यह भी है कि क्या इसबार 80 फीसदी तक मतदान होगा?  ज्यादा मतदान का फायदा किसे होगा? अभी तक का चलन यह रहा है कि अर्ली वोट में डेमोक्रेट आगे रहते हैं और चुनाव के दिन के वोट में रिपब्लिकन। इसबार जो बिडेन ने लोगों से अपील की है कि वे अर्ली वोट करें। दूसरी तरफ ट्रंप ने डाक से आए वोटों को लेकर अंदेशा व्यक्त किया है।

Wednesday, October 21, 2020

पाँच वजहें जो डोनाल्ड ट्रंप को फिर बना सकती हैं राष्ट्रपति

राष्ट्रपति चुनाव में मतदाता कौन होंगे, इसका अनुमान लगाना एक चुनौती होता है. पिछली बार कुछ चुनावी सर्वे यही अनुमान लगाने में असफल साबित हुए.

डोनाल्ड ट्रंप को बिना कॉलेज डिग्री वाले गोरे अमरीकियों ने बढ़-चढ़कर वोट किया था, जिसका अंदाज़ा नहीं लगाया गया था.

हालाँकि, इस बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने अनुमान लगाया है कि बाइडन का मौजूदा मार्जिन उन्हें 2016 जैसी स्थिति से बचाएगा. लेकिन, 2020 में सर्वे करने वालों के सामने कुछ नई बाधाएँ हैं.

बीबीसी हिंदी पर पढ़ें पांच वजहें जो डोनाल्ड ट्रंप को फिर बना सकती हैं राष्ट्रपति

Saturday, October 10, 2020

कैसे होता है अमेरिका में चुनाव

 


आगामी चुनाव 59 वें चुनाव होंगे, जो हरेक चार साल में होते हैं। मतदाता सीधे राष्ट्रपति को नहीं चुनते, बल्कि 3 नवंबर को मतदाता 538 सदस्यों के एक मतदाता मंडल (इलेक्टोरल कॉलेज) का चुनाव करेंगे, जो 14 दिसंबर 2020 को राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव करेगा। यदि किसी भी प्रत्याशी को 270 या उससे ज्यादा वोट नहीं मिले, तो सबसे ज्यादा वोट पाने वाले तीन प्रत्याशियों में से एक का चुनाव राष्ट्रपति पद के लिए करने की जिम्मेदारी प्रतिनिधि सदन की होगी। उपराष्ट्रपति पद के लिए पहले दो प्रत्याशियों में से किसी एक का चुनाव सीनेट करेगी।

निर्वाचक मंडल

चुनाव राष्ट्रपति का नहीं उसके निर्वाचकों का होता है। कैलिफोर्निया से सबसे ज्यादा 55 निर्वाचक आते हैं और वायोमिंग, अलास्का और नॉर्थ डकोटा (और वॉशिंगटन डीसी) से सबसे कम तीन-तीन। चुनाव की पद्धति यह है कि जब किसी प्रत्याशी को किसी राज्य में बहुमत मिल जाता है, तो उस राज्य के सभी निर्वाचक उसके खाते में आ जाते हैं। मसलन यदि टेक्सास से रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत मिला, तो राज्य से रिपब्लिकन पार्टी के सभी 38 निर्वाचक जीत जाएंगे। फिर भी दो राज्य मेन और नेब्रास्का ऐसे हैं, जो प्रत्याशियों को मिले वोटों के अनुपात में निर्वाचकों की संख्या तय करते हैं। प्रत्याशियों की रणनीति स्विंग स्टेट्स को जीतने की होती है। स्विंग स्टेट्स मतलब जिनका रुख साफ नहीं है। यदि किसी राज्य का पलड़ा किसी तरफ भारी है, तो वहाँ अपने वोट बढ़ाने से कोई फायदा नहीं।

Monday, June 8, 2020

लपटों से घिरा ट्रंप का अमेरिका


लम्बे अरसे से साम्यवादी कहते रहे हैं, पूँजीवाद हमें वह रस्सी बनाकर बेचेगा, जिसके सहारे हम उसे लटकाकर फाँसी देंगे। इस उद्धरण का श्रेय मार्क्स, लेनिन, स्टैलिन और माओ जे दुंग तक को दिया जाता है और इसे कई तरह से पेश किया जाता है। आशय यह कि पूँजीवाद की समाप्ति के उपकरण उसके भीतर ही मौजूद हैं। पिछली सदी के मध्यकाल में मरणासन्न पूँजीवाद और अंत का प्रारम्भ जैसे वाक्यांश वामपंथी खेमे से उछलते रहे। हुआ इसके विपरीत। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया को लगा कि अंत तो कम्युनिज्म का हो गया।

उस परिघटना के तीन दशक बाद पूँजीवाद का संकट सिर उठा रहा है। अमेरिका में इन दिनों जो हो रहा है, उसे पूँजीवाद के अंत का प्रारम्भ कहना सही न भी हो, पश्चिमी उदारवाद के अंतर्विरोधों का प्रस्फुटन जरूर है। डोनाल्ड ट्रंप का उदय इस अंतर्विरोध का प्रतीक था और अब उनकी रीति-नीति के विरोध में अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिकों का आंदोलन उन अंतर्विरोधों को रेखांकित कर रहा है। पश्चिमी लोकतंत्र के सबसे पुराने गढ़ में उसके सिद्धांतों और व्यवहार की परीक्षा हो रही है।

Sunday, December 29, 2019

विदेशमंत्री जयशंकर ने अमेरिका में क्यों की प्रमिला जयपाल की अनदेखी?


नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जितनी लहरें देश में उठ रही हैं, तकरीबन उतनी ही विदेश में भी उठी हैं। भारतीय राष्ट्र-राज्य में मुसलमानों की स्थिति को लेकर कई तरह के सवाल हैं। इस सिलसिले में अनुच्छेद 370 और 35ए को निष्प्रभावी बनाए जाने से लेकर पूरे जम्मू-कश्मीर में संचार-संपर्क पर लगी रोक और अब नागरिकता कानून के विरोध में शिक्षा संस्थानों तथा कई शहरों में हुए विरोध प्रदर्शनों की गूँज विदेश में भी सुनाई पड़ी है। गत 18 से 21 दिसंबर के बीच क्वालालम्पुर में इस्लामिक देशों का शिखर सम्मेलन अपने अंतर्विरोधों का शिकार न हुआ होता, तो शायद भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सुर्खियाँ बन चुकी होतीं।
हुआ क्या था?
सवाल यह है कि भारत अपनी छवि को सुधारने के लिए राजनयिक स्तर पर कर क्या कर रहा है? यह सवाल भारत में नहीं अमेरिका में उठाया गया है। भारत और अमेरिका के बीच ‘टू प्लस टू’ श्रृंखला की बातचीत के सिलसिले में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और विदेशमंत्री एस जयशंकर अमेरिका गए हुए थे। गत 18 अक्तूबर को दोनों देशों ने इसके तहत सामरिक और विदेश-नीति के मुद्दों पर चर्चा की। इसी दौरान जयशंकर ने कई तरह के प्रतिनिधियों से मुलाकातें कीं। इनमें एक मुलाकात संसद की फॉरेन अफेयर्स कमेटी के साथ भी होनी थी, जिसमें डेमोक्रेटिक पार्टी की सांसद प्रमिला जयपाल का नाम भी था।

Thursday, November 10, 2016

ट्रम्प से ज्यादा महत्वपूर्ण है अमेरिकी सिस्टम


अमेरिकी मीडिया के कयास के विपरीत डोनाल्ड ट्रम्प का जीतना कुछ लोगों को विस्मयकारी लगा, जिसकी जरूरत नहीं है। अमेरिकी चुनाव की प्रक्रिया ऐसी है कि ज्यादा वोट जीतने वाला भी हार सकता है। यदि वे हार भी जाते तो उस विचार की हार नहीं होती, जो इस चुनाव के पीछे है। लगभग कुछ दशक की उदार अमेरिकी व्यवस्था के बाद अपने राष्ट्रीय हितों की फिक्र वोटर को हुई है। कुछ लोग इसे वैश्वीकरण की पराजय भी मान रहे हैं। वस्तुतः यह अंतर्विरोधों का खुलना है। इसमें किसी विचार की पूर्ण पराजय या अंतिम विजय सम्भव नहीं है। अमेरिका शेष विश्व से कुछ मानों में फर्क देश है। यह वास्तव में बहुराष्ट्रीय संसार है। इसमें कई तरह की राष्ट्रीयताएं बसती हैं। हाल के वर्षों में पूँजी के वैश्वीकरण के कारण चीन और भारत का उदय हुआ है। इससे अमेरिकी नागरिकों के आर्थिक हितों को भी चोट लगी है। ट्रम्प उसकी प्रतिक्रिया हैं। क्या यह प्रतिक्रिया गलत है? गलत या सही दृष्टिकोण पर निर्भर है। पर यह प्रतिक्रिया अस्वाभाविक नहीं है। दुनिया के ऐतिहासिक विकास की यह महत्वपूर्ण घड़ी है। अमेरिकी चुनाव की खूबसूरती है कि हारने के बाद प्रत्याशी विजेता को समर्थन देने का वायदा करता है और जीता प्रत्याशी अपने आप को उदार बनाता है। ट्रम्प ने चुनाव के बाद इस उदारता का परिचय दिया है। अमेरिकी प्रसासनिक व्यवस्था में राष्ट्रपति बहुत ताकतवर होता है, पर वह निरंकुश नहीं हो सकता। अंततः वह व्यवस्था ही काम करती है। 
अमेरिका में राष्ट्रपति पद का जैसा चुनाव इस बार हुआ है, वैसा कभी नहीं हुआ। दोनों प्रत्याशियों की तरफ से कटुता चरम सीमा पर थी। अल्ट्रा लेफ्ट और अल्ट्रा राइट खुलकर आमने-सामने थे। डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में अभी कुछ भी कहना मुश्किल है, सिवाय इसके कि वे धुर दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी राष्ट्रपति साबित होंगे। पर सबसे बड़ा खतरा यह है कि उनके ही कार्यकाल में अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था पहले नम्बर से हटकर दूसरे नम्बर की बनने जा रही है।

Wednesday, October 23, 2013

शटडाउन अंकल सैम

प्रसिद्ध पत्रिका इकोनॉमिस्टने लिखा है, आप कल्पना करें कि किसी टैक्सी में बैठे हैं और ड्राइवर तेजी से चलाते हुए एक दीवार की और ले जाए और उससे कुछ इंच पहले रोककर कहे कि तीन महीने बाद भी ऐसा ही करूँगा। अमेरिकी संसद द्वारा अंतिम क्षण में डैट सीलिंग पर समझौता करके फिलहाल सरकार को डिफॉल्ट से बचाए जाने पर टिप्पणी करते हुए पत्रिका ने लिखा है कि इस लड़ाई में सबसे बड़ी हार रिपब्लिकनों की हुई है। डैमोक्रैटिक पार्टी को समझ में आता था कि अंततः इस संकट की जिम्मेदारी रिपब्लिकनों पर जाएगी। उन्होंने हासिल सिर्फ इतना किया कि लाभ पाने वालों की आय की पुष्टि की जाएगी। पर क्या डैमोक्रेटों की जीत इतने भर से है कि बंद सरकार खुल गई और डिफॉल्ट का मौका नहीं आया? वे हासिल सिर्फ इतना कर पाए कि डैट सीलिंग तीन महीने के लिए बढ़ा दी गई। अब तमाशा नए साल पर होगा। यह संकट यों तो अमेरिका का अपना संकट लगता है, पर इसमें भविष्य की कुछ संभावनाएं भी छिपीं हैं। अमेरिकी जीवन की महंगाई हमारे जैसे देशों के लिए अच्छा संदेश लेकर भी आई है। कम से कम स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में हम न केवल विश्व स्तरीय है, बल्कि खासे किफायती भी हैं। इसके पहले अमेरिका में आर्थिक प्रश्नों पर मतभेद सरकार के आकार, उसके ख़र्चों और अमीरों पर टैक्स लगाने को लेकर होते थे, पर इस बार ओबामाकेयर का मसला था।

Thursday, September 13, 2012

अमेरिका विरोध की हिंसक लहर

हमले के बाद बेनग़ाज़ी में अमेरिकी दूतावास के भीतर का दृश्य

कुछ साल पहले डेनमार्क के कार्टूनिस्ट को लेकर इस्लामी दुनिया में नाराज़गी फैली थी। तकरीबन वैसी ही नाराज़गी की शुरुआत अब हो गई लगती है। अमेरिका में शूट की गई एक साधारण सी फिल्म जून के महीने में हॉलीवुड के छोटे से सिनेमाघर में दिखाई गई। इसका नाम है 'इनोसेंस ऑफ मुस्लिम्स'। इसकी कुछ क्लिप्स जब अरबी में अनूदित करके यू ट्यूब पर लगाई गई, तब मिस्र और लीबिया वगैरह में आग भड़क उठी।

इस फिल्म के कई पहलू हैं। पहली बात यह कि यह एक सस्ती सी घटिया फिल्म है।फिल्म के कलाकारों का कहना है कि इसमें इस्लाम को लेकर कहे गए संवाद अलग से डब किए गए हैं। हमें नहीं पता था कि फिल्म में क्या चीज़ किस तरह दिखाई जा रही है। अभी फिल्म के निर्माता सैम बेसाइल का अता-पता नहीं लग पाया है। इतना ज़रूर है कि इसके पीछे इस्लाम विरोधी लोगों का हाथ है।

फिल्म के पीछे कौन है, क्या है से ज्यादा महत्वपूर्ण यह देखना है कि इसका असर क्या है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इसका समर्थन भी नहीं किया जाना चाहिए। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में दो-तीन कारणों से नहीं रखा जा सकता। 1.यह किसी ऐसे बिन्दु को नहीं उठाती, जो इनसानियत के ऊँचे मूल्यों से जुड़ा है। 2.इसके कारण दुनिया के मुसलमानों की भावनाओं को ठेस लगी है।3.इसका उद्देश्य सम्प्रदायों के बीच वैमनष्य बढ़ाना है। इस प्रकार की सामग्री दो वर्गों के बीच कटुता बढ़ाती है और इसका लक्ष्य कटुता बढ़ाना ही है।

पर इस फिल्म के कारण पश्चिम एशिया में अल कायदा से हमदर्दी रखने वाली प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि मिस्र में विरोध शांतिपूर्ण तरीके से हुआ है, पर लीबिया में बाकायदा हथियारों के साथ विरोध हुआ है। इसका मतलब है कि लीबिया में अमेरिका विरोधी तत्व मौज़ूद हैं। सन 2005 में डेनिश कार्टूनों के बाद हिंसा इंडोनेशिया से लेकर अफगानिस्तान और मोरक्को तक फैल गई थी। उसमें 200 से ज्यादा लोग मरे थे।

इस फिल्म को यू ट्यूब में डालने और अरबी अनुवाद करने के पीछे भी किसी की योजना हो सकती है या नहीं भी हो सकती है, पर सोशल साइट्स की भूमिका पर विचार करने की ज़रूरत भी है। मीडिया की भड़काऊ प्रवृत्ति लगातार किसी न किसी रूप में प्रकट हो रही है।  इस किस्म की फिल्मों के बनाने की निन्दा भी की जानी चाहिए।

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