Sunday, August 2, 2026

कॉक्रोच-विद्रोह के तीन चेहरे

 


वायरल युवा-आक्रोश से प्रेरित, कॉक्रोच जनता पार्टी का तेजी से उदय तीन बेहद अलग-अलग व्यक्तियों के कारण हुआ, जिनके कौशल, महत्त्वाकांक्षाओं और राजनीतिक इतिहास ने एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान को एक राष्ट्रीय विरोध में बदल दिया, जिसके परिणामस्वरूप केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा। आज यानी 2 अगस्त 2026 के द हिंदू में तीन व्यक्तियों के जीवन-वृत्त पर रोशनी डाली गई हैं। मैंने इसे हिंदी में अपने पाठकों के लिए तैयार किया है। इसमें कुछ जगहों पर ज़रूरत के हिसाब से अपनी टिप्पणी भी की है, जो इटैलिक्स में है। इसे लिखा है शोभना के. नायर और निखिल एम बाबू ने।

व्यंग्य से लेकर धरने तक, यह छात्रों के उस विरोध आंदोलन की सबसे लोकप्रिय और शायद सबसे आसान व्याख्या है, जिसके परिणामस्वरूप केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह व्याख्या अपनी सरलता में सशक्त प्रतीत होती है। लेकिन यह अपूर्ण है।

अब तक तो सभी को पता ही है कि कहानी क्या है। 15 मई, 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सक्रियता और सोशल मीडिया का सहारा लेने वाले बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉक्रोचों’ से की, जिससे व्यापक विरोध हुआ। इस टिप्पणी को भुनाते हुए, बोस्टन में पढ़ रहे एक भारतीय छात्र अभिजीत दीपके ने अपने जैसे ‘कॉक्रोचों’ के लिए एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन मंच शुरू किया और इस अपमान को असंतुष्ट युवाओं के लिए एक एकजुटता के आह्वान में बदल दिया। पहले 24 घंटों के भीतर ही 50,000 लोगों ने इसमें पंजीकरण कराया। पाँच दिनों के भीतर यह संख्या बढ़कर दस लाख से अधिक हो गई, जबकि इस आंदोलन के इंस्टाग्राम अकाउंट पर 2.2 करोड़ से अधिक फॉलोवर हो गए।

वायरल पोस्ट, फॉलोवरों की बढ़ती संख्या और रंगीन प्रतीकों के पीछे तीन शख्सियतें थीं: अभिजीत दीपके (30), आशुतोष रांका (30) और सौरभ दास (27), जिनकी प्रतिभाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। वे देश के अलग-अलग हिस्सों, अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों से आते हैं और उनके स्वभाव भी काफी भिन्न हैं।

Wednesday, July 29, 2026

सऊदी एटमी-डील से पश्चिम एशिया में होड़ बढ़ेगी


पश्चिम एशिया का अनिश्चय खत्म होकर नहीं दे रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच समझौता-ज्ञापन पर दस्तखत होने के बावज़ूद लड़ाई खत्म नहीं हुई है. दूसरी तरफ राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने पिटारे से नई-नई चीजें निकाल रहे हैं.

पिछले बुधवार को उन्होंने सऊदी अरब के साथ नाभिकीय-सहयोग के समझौते की घोषणा करके खलबली पैदा कर दी है. इस समझौते के तहत अमेरिकी सहयोग से सऊदी अरब अपने असैनिक परमाणु-कार्यक्रम का संचालन कर सकेगा.

यह 30 वर्षीय समझौता नाभिकीय-सहयोग पर तो रोशनी डालता है, लेकिन साथ ही कई महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलावों की ओर इशारा भी कर रहा है.

वेस्टिंगहाउस जैसी कंपनियों का उपयोग करते हुए रियाद को एक दीर्घकालिक अमेरिकी तकनीकी और सुरक्षा ढाँचे में बाँधकर, वाशिंगटन का लक्ष्य खाड़ी में चीन और रूस के बढ़ते राजनयिक और आर्थिक प्रभाव को कम करना है.

Saturday, July 25, 2026

अराजक और हास्यास्पद राजनीति और व्यवस्था बदलने के इरादे


जंतर-मंतर पर सोनल वांगचुक के अनशन, संसद-भवन मार्च और उसके बाद हुई हिंसा ने अंततः इस आंदोलन के राजनीतिक चेहरे पर पड़ी नकाब हटा दी है। बेशक इस आंदोलन के समर्थकों में बड़ी संख्या किशोरों और उनके अभिभावकों की है, जिनका प्रतियोगी परीक्षाओं से भरोसा टूट रहा है। पर इस आंदोलन को चलाने वाली ताकत कहीं और से काम कर रही है। इसमें देश के विरोधी दल भी शामिल हैं, और बुनियादी तौर पर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता हैं, जिनके पुराने नाम की साख अब काफी कम हो चुकी है। किशोरों के प्रति सहानुभूति से ज्यादा इस आंदोलन के पीछे सत्ता-प्राप्ति की उनकी मनोकामना है। जनता के मसलों को लेकर आंदोलन चलाना उनका वैधानिक अधिकार है, ज्यादा बड़ा सवाल है कि संपूर्ण-व्यवस्था में उनकी भूमिका क्या है। अब चूँकि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया है, इसलिए यह देखना रोचक होगा कि आगे क्या होता है। 

पहली नज़र में ऐसा लगता है कि सरकार करीब-करीब उसी रास्ते पर जा रही है, जिसपर 2013 में केंद्र सरकार गई थी। एनडीए सरकार जो समाधान पेश कर रही है, वह है कड़ी सजा। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को एक मसौदा विधेयक को मंजूरी दे दी, जिसमें 10 साल तक की कैद, 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना, त्वरित अदालतों के लिए वैधानिक समर्थन और मामलों की जाँच और मुकदमे के लिए पाँच महीने की समय सीमा का प्रावधान है।

इसके कुछ घंटों बाद, इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार आधी रात को प्रसारित अपने वीडियो पर मिली प्रतिक्रियाओं और सकारात्मक सुझावों के लिए सभी को धन्यवाद दिया, जिसमें उन्होंने सरकार के फैसले की घोषणा की थी। उन्होंने कहा, ‘धन्यवाद दोस्तो। मुझे आधी रात को आप लोगों से बात करने का मौका मिला। मेरे वीडियो पर आपकी प्रतिक्रिया और आपके सकारात्मक सुझावों के लिए आप सभी का धन्यवाद। आपका प्यार ऐसे ही बरसता रहेगा; हमारे रिश्ते और भी मजबूत होते जाएगे। धन्यवाद, धन्यवाद दोस्तो

दोस्त क्या चाहते हैं?

अब 13 साल पीछे चलें। 2012 के निर्भया कांड के बाद भारी जनाक्रोश के बीच केंद्र सरकार ने क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2013 पास करा दिया। यह वह कानून है, जिसे जल्दबाज़ी में राजनीतिक व सामाजिक दबाव के तहत पारित गैंगरेप कानून के रूप में मुख्य रूप से याद किया जाता है। इस कानून में गैंगरेप के लिए न्यूनतम 20 साल से लेकर उम्रकैद (शेष प्राकृतिक जीवन) तक की अनिवार्य सजा का प्रावधान किया गया। अदालतों से विशेष कारणों का हवाला देकर न्यूनतम सजा से कम देने का अधिकार छीन लिया गया वगैरह।  

कानूनी विशेषज्ञों का मानना था कि संसद ने बिना किसी व्यापक व शांत-चित्त सार्वजनिक विमर्श के इसे अत्यधिक दबाव में पारित किया। कानून केवल सजा को कठोर बनाने पर केंद्रित था, जबकि पुलिस जाँच में सुधार, फॉरेंसिक क्षमता और त्वरित न्याय की प्रणाली पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम सामने है, न बलात्कार कम हुए और न गैंगरेप। 

पेपर लीक की सजा बढ़ाने का लाभ क्या होगा, यह बाद में पता लगेगा, पर सवाल है कि कॉक्रोच-आंदोलन में शामिल लोग किस उम्मीद से आए हैं? मुझे नहीं लगता कि सामूहिक रूप से कोई एक उम्मीद है। इसके नेताओं के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, पर राजनीतिक दलों के नेताओं के इरादे साफ हैं। वे विरोध करते हुए नज़र आना चाहते हैं। जनता के मन में भी गुस्सा है, वह उसे व्यक्त करना चाहती है। 

Wednesday, July 22, 2026

पाकिस्तान फिर से टूटने का खतरा

बलोच हमलों में महिला आत्मघातियों की संख्या बढ़ रही है। यह है सुमैया कलंदरानी बलोच जिसने 24 जून 2023 को तुरबत में एक सैन्य काफिले पर आत्मघाती हमला किया। हमले के पहले बलोच लिबरेशन आर्मी के ध्वज के सामने खड़े होकर उसने फोटो खिंचवाया।

अशांत बलोचिस्तान में मस्तुंग के पास गुरुवार 16 जुलाई को सुरक्षा काफिले पर हुए हमले में 45 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर है. बलोचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है, जो दो सप्ताह से भी कम समय में सुरक्षा-कर्मियों पर तीसरा बड़ा हमला है.

उपरोक्त जानकारी बलोचिस्तान पोस्ट ने दी है, हालाँकि पाकिस्तानी सेना ने हमले की पुष्टि की, लेकिन मरने वालों की संख्या नहीं बताई. बीएलए के प्र
वक्ता जियंद बलोच ने बताया कि मीडिया को बयान जारी करते समय भी बीएलए के लड़ाकों और पाकिस्तानी सेना के बीच लड़ाई जारी थी, और हताहतों की संख्या बढ़ सकती है.

आर्थिक-गिरावट और आंतरिक-संघर्षों के कारण पाकिस्तान, गंभीर अस्थिरता का सामना कर रहा है. बलोचिस्तान में विद्रोह और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में हो रहे प्रदर्शनों से देश की अखंडता को खतरा पैदा हो गया है. सवाल है कि क्या पाकिस्तान फिर से टूटेगा?

Sunday, July 19, 2026

मेक्सिको का पूरा नाम

उत्तरी और मध्य अमेरिका को जोड़ने वाले इस देश को मानचित्र पर आने के बाद से ही इसे किसी न किसी रूप में ‘मेक्सिको’ के नाम से जाना जाता रहा है। यह शब्द विश्व के पहले आधुनिक एटलस, थियोट्रम ऑर्बिस टेरारम के 1603 के अंग्रेजी संस्करण में भी मिलता है, लेकिन दो सदी से अधिक वर्षों के अपने इतिहास में, इस देश का आधिकारिक नाम कभी मेक्सिको नहीं रहा। इसके बजाय, अमेरिकी क्रांति से प्रेरित होकर, 1824 के देश के संविधान ने हिस्पानी भाषा में एस्टाडोस यूनिडोस मेक्सिकानोस, या संयुक्त मेक्सिकन राज्य (यूनाइटेड मेक्सिकन स्टेट्स) की स्थापना की। दो शताब्दियों के बाद भी, यही देश का आधिकारिक नाम है।

हाल के वर्षों में, देश के सरल नाम को अधिक प्रचलित और प्रचारित करने के प्रयास किए गए हैं। 2012 में, मैक्सिको के तत्कालीन राष्ट्रपति फेलिप काल्डेरोन ने देश के आधिकारिक नाम के रूप में ‘मेक्सिको’ को अपनाने का प्रस्ताव रखा। उस समय काल्डेरोन ने कहा था, ‘अब समय आ गया है कि हम मेक्सिकन अपनी मातृभूमि के नाम की सुंदरता और सरलता को पुनः प्राप्त करें: मेक्सिको, एक ऐसा नाम जिसका उपयोग हम गीत गाते समय करते हैं, एक ऐसा नाम जो हमें पूरी दुनिया में पहचान देता है और जिस पर हमें गर्व है।’ हालांकि, काल्डेरोन के इस प्रयास का कोई परिणाम नहीं निकला। वर्तमान में, राष्ट्रीय नाम, जो हर मेक्सिकन पासपोर्ट पर अंकित है, Mexico के साथ ‘Estados Unidos Mexicanos’ ही है।

इंटरेस्टिंग फैक्ट्स


गांधी के उपवास


देश में माँगें मनवाने के लिए अनशन करने की परंपरा है। आमतौर पर इसे गांधी की परंपरा माना जाता है। बेशक गांधी ने उपवास की परंपरा चलाई, पर इस बात की पड़ताल करें कि क्या गांधी जी ने भारत की आज़ादी के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाने के लिए क्या कोई अनशन किया था? बेशक उन्होंने लंबे स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और कुछ उपवासों के मार्फत उन्होंने ब्रिटिश-सरकार के प्रति विरोध भी दर्ज कराया। उस दौरान कम से कम 18 उपवास रखे, जिन्हें वे आत्मशुद्धि और अहिंसक प्रतिरोध (सत्याग्रह) का सबसे शक्तिशाली हथियार मानते थे।

Wednesday, July 15, 2026

भारत की ‘एक्ट-ईस्ट पॉलिसी’ में नई ऊर्जा का संचार


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले शनिवार को ऑकलैंड से रवाना होते हुए इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के अपने तीन देशों के दौरे का समापन किया. यह एक ऐतिहासिक दौरा था जिसने इस इलाके के देशों के साथ भारत के संबंधों को दीर्घकालिक-साझेदारी के स्तर तक पहुँचाया.

इस यात्रा के महत्व और प्रभाव को समझने के लिए हमें इन तीन देशों के अलावा दक्षिण, दक्षिण पूर्व और सुदूर एशिया के बारे में भी विचार करना होगा.  यह दौरा हिंद-प्रशांत क्षेत्र के भू-राजनीतिक और आर्थिक भविष्य में भारत की उभरती आकांक्षाओं को उजागर करता है. इसलिए भी कि यह क्षेत्र वैश्विक-स्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है.

प्रधानमंत्री की यह यात्रा कोरिया और जापान के नेताओं के साथ उनकी हालिया मुलाकातों के बाद हुई हैं. ये सभी मुलाकातें भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में नई ऊर्जा का संचार करती हैं और इस बात की मान्यता को दर्शाती हैं कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की मध्यम शक्तियों के बीच गहरा सहयोग पारस्परिक आर्थिक और रणनीतिक लाभ संभव है.

तीन देशों की इस यात्रा ने व्यापार, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा, शिक्षा, नवाचार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिणाम दिए, जिससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र और उससे परे एक प्रमुख भागीदार के रूप में भारत की भूमिका मजबूत हुई.

Thursday, July 9, 2026

हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बदलते समीकरणों के बीच मोदी की इंडोनेशिया समेत तीन देशों की यात्रा


वैश्विक-राजनीति में आते बदलाव की रोशनी में पिछले हफ्ते जापानी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड-यात्रा के दूरगामी अर्थ हैं. यह यात्रा 11 जुलाई तक चलेगी.

पिछले साल से अमेरिकी-नीतियों में आए बदलाव के कारण एशिया के देशों ने अपनी भावी नीतियों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है. यह विचार केवल सामरिक-दृष्टि से ही नहीं है, बल्कि इसका काफी बड़ा हिस्सा आर्थिक-सामाजिक सहयोग से जुड़ा है.

पिछले हफ्ते जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची और पिछले अप्रैल में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की दिल्ली यात्राओं ने अमेरिका के दो प्रमुख एशियाई सहयोगियों, तोक्यो और सोल में अपने एशियाई संबंधों को व्यापक बनाने की तात्कालिकता को रेखांकित किया था.

प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया-यात्रा और इस दौरान चर्चाओं और समझौतों से भारत और इंडोनेशिया का एक दूरदर्शी एजेंडा झलकता है, जिसमें समुद्री सहयोग, रक्षा उद्योग में साझेदारी, आर्थिक विस्तार, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा पर जोर दिया गया है. इस यात्रा ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री पड़ोसी और रणनीतिक साझेदार के रूप में दोनों देशों के साझा दृष्टिकोण को और पुष्ट किया है.

सामरिक-महत्त्व

भारत का लगभग 40 फीसदी समुद्री व्यापार दुनिया के सबसे व्यस्त जलमार्गों में से एक, मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. और इस रणनीतिक मार्ग के प्रवेश द्वार पर स्थित देश इंडोनेशिया है.

भौगोलिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से इंडोनेशिया की इसमें बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका है. हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के संगम पर स्थित, यह विश्व के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों में से एक है.

प्रधानमंत्री की यह यात्रा, 2018 के बाद उनकी इंडोनेशिया की पहली द्विपक्षीय यात्रा है. यह भारत के समुद्री हितों को सुरक्षित करने, आर्थिक साझेदारी का विस्तार करने और तेजी से प्रतिस्पर्धी होते हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति को मजबूत करने से जुड़ी है.

उनकी 2018 की यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने एक साझा समुद्री दृष्टिकोण का अनावरण किया था, और हालिया चर्चाओं का उद्देश्य उस ढाँचे को आगे बढ़ाना है. वार्ता में आपसी समुद्री क्षेत्र जागरूकता, संपर्क और दोनों देशों के तटरक्षक बलों के बीच सहयोग बढ़ाने जैसे विषय शामिल है.

Tuesday, July 7, 2026

भारत-पाक रिश्तों में ‘अमन’ की आशा-निराशा के मोड़


भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर हाल के दो घटनाक्रमों ने ध्यान खींचा है. एक, दोनों देशों के 117 नागरिकों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शहबाज़ शरीफ के नाम लिखी गई खुली चिट्ठी. दूसरे, दोनों देशों के कुछ लोगों के बीच कोलंबो में हुए संवाद की खबर, जिसे 'ट्रैक-2 वार्ता' बताया जा रहा है. 

इस संवाद को लेकर कई तरह के कयास हैं. वहीं भारत सरकार ने किसी वार्ता में शामिल होने की खबरों का जोरदार खंडन किया है. विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा है कि इस तरह की चर्चा से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है.

जिस बैठक को ट्रैक-2 कहा जा रहा है, वस्तुतः वह आईआईएस-एनईएसए ट्रैक 1.5 साउथ एशिया सिक्योरिटी डायलॉग की सालाना बैठक का 10वाँ संस्करण था. इससे पिछली बैठक पिछले साल जुलाई में हुई थी, ऑपरेशन सिंदूर के सिर्फ़ दो महीने बाद.

डिप्लोमैटिक भाषा में ट्रैक-1, ट्रैक-2 और ट्रैक-1.5 के अलग-अलग अर्थ होते हैं. ट्रैक-1 आधिकारिक वार्ता होती है, ट्रैक 1.5 में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और ग़ैर-सरकारी प्रतिभागी दोनों शामिल होते हैं और ट्रैक-2 प्रभावशाली, लेकिन ग़ैर-सरकारी व्यक्तियों के बीच होता है. पर तीनों 'बैकचैनल' डिप्लोमेसी नहीं हैं.

Tuesday, June 30, 2026

भारत-अमेरिका ट्रेड-डील के आसार और वैश्विक-विखंडन

इलस्ट्रेशन द प्रिंट से साभार

अमेरिका के विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने कहा है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अगले साल के शुरू में भारत का दौरा कर सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार-समझौता होने के करीब है.  

फ्रांस में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान 17 जून को ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच 16 महीनों में हुई पहली मुलाकात से रिश्तों में जमी बर्फ कुछ पिघलती नज़र आ रही है.

पिछले हफ्ते अमेरिकी व्यापार प्रमुख जैमीसन ग्रीअर की भारत यात्रा के बाद भी संकेत मिले हैं कि व्यापार-वार्ता के लिए बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है, और बहुत जल्द ही समझौता हो जाएगा.

भारत उन कुछ देशों में शामिल है, जिनके साथ अमेरिका ने अभी तक व्यापार समझौता नहीं किया है. इसके पहले यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और कई आसियान देशों सहित लगभग एक दर्जन व्यापारिक साझेदारों के साथ वह समझौते कर चुका है.

Wednesday, June 24, 2026

युद्ध ने ईरान के गैर-वफादारों को भी मुख्यधारा से जोड़ा

ऐसे दृश्य भी नज़र आने लगे हैं। तेहरान में लोग सड़क पार कर रहे हैं। दो महिलाओं ने नकाब नहीं पहना है।

ईरान की सामाजिक-हलचल पर न्यूयॉर्क टाइम्स की यह रपट पढ़ें
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गुलाबी टॉप और एसिड-वॉश जींस पहने वीडियो में दिख रही युवती ईरान के धार्मिक शासकों की कट्टर समर्थक जैसी बिल्कुल नहीं लग रही थी, जो सिर से पैर तक काले कपड़ों में लिपटी महिलाओं की भीड़ के बीच खड़ी थी। यही तो असल मकसद था।

अपने घुंघराले बालों को कंधों पर बिखेरते हुए, महिला ने कैमरे के सामने कहा, “मैं न तो इस्लामी गणराज्य की समर्थक थी और न ही सर्वोच्च नेता की,” उन्होंने सरकार समर्थक फिल्म निर्माता हुसैन शमागदारी से कहा, जिन्होंने उनके बीच हुई बातचीत को ऑनलाइन प्रकाशित किया। उन्होंने बताया कि फरवरी में अमेरिका और इसराइल  के हमले के बाद, उन्होंने ईरान की कट्टरपंथी सेनाओं की प्रशंसा करना शुरू कर दी, क्योंकि वे दुनिया की दो सबसे शक्तिशाली सेनाओं से लड़ रही थीं।

“अगर क्रांतिकारी गार्ड और बासिजी लड़ाई नहीं लड़ रहे होते, तो हम आज भी यहाँ नहीं होते,” उन्होंने आँसू रोकते हुए कहा और उन्हीं बलों की प्रशंसा की जिन्होंने कभी नकाबपोश महिलाओं और प्रदर्शनकारियों पर अत्याचार किया था। “मैं युद्ध की शुरुआत को याद कर रही हूँ और इस्लामी गणराज्य के बारे में अपने विचारों पर पुनर्विचार कर रही हूँ।”

वीडियो में महिला की पहचान नहीं बताई गई है, और यह स्पष्ट नहीं है कि वह कौन है, यह दूर की बात है कि क्या उसने वास्तव में ईरान की निरंकुश सरकार के बारे में अपना विचार बदल लिया है। हालाँकि, वीडियो से जो बात स्पष्ट है, वह यह है कि ईरान की सरकार और उसके समर्थक एक नए प्रकार के राष्ट्रवाद को जन्म दे रहे हैं, ऐसा राष्ट्रवाद जो उन लोगों को भी गले लगाता है जिन्होंने कभी उसके खिलाफ विद्रोह किया था।

चीनी सुपरकंप्यूटर ने अमेरिका को पीछे छोड़ा

लाइनशाइन कंप्यूटर

चीन के एक सुपरकंप्यूटर ने अब दुनिया के सबसे शक्तिशाली सुपरकंप्यूटर के रूप में अमेरिकी कंप्यूटरों को पीछे छोड़ दिया है। 2017 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी चीनी कंप्यूटर ने उस सूची में शीर्ष स्थान हासिल किया है जिसे कभी-कभी किसी देश की तकनीकी क्षमता का मापक माना जाता है।

शेनझेन स्थित लाइनशाइन कंप्यूटर ने मंगलवार को जारी टॉप 500 रैंकिंग में शीर्ष स्थान पर रहे अमेरिकी कंप्यूटर एल कैपिटन (El Capitan) को पीछे छोड़ दिया। लाइनशाइन ने पहली बार इस सूची में जगह बनाई है।

चीन का लाइनशाइन अन्य उच्च-प्रदर्शन वाले कंप्यूटरों से इस मायने में अलग है कि यह कृत्रिम मेधा के लिए आमतौर पर उपयोग किए जाने वाले ग्राफिक्स प्रोसेसर (जीपीयू) के बजाय पूरी तरह से पारंपरिक कंप्यूटर चिप्स (सीपीयू) पर चलता है। सूची के अनुसार, इसे चलाने के लिए लगभग 42.2 मेैगावाट बिजली की आवश्यकता होती है।

Tuesday, June 23, 2026

पश्चिम एशिया में करवट-करवट, ‘कभी हाँ, कभी ना’!


पश्चिम एशिया में दीर्घकालीन शांति-स्थापना का सपना, बड़ी तेजी से कभी हाँ और कभी नामें तब्दील हो रहा है. उसकी विसंगतियाँ बार-बार दरवाज़े पर दस्तक दे रही हैं.

इसराइल की खुली बगावत ने समझौते के अंतर्विरोधों को उजागर किया है, जिसकी वजह से शुक्रवार 19 जून को, स्विट्ज़रलैंड में बातचीत नहीं हो पाई, जो दो दिन बाद रविवार को होने पर उम्मीदें पटरी पर वापस भी आ गई हैं.

समझौते के प्रारंभिक प्रारूप पर चूँकि बुधवार को ही राष्ट्रपति ट्रंप और पेज़ेश्कियान के हस्ताक्षर हो गए हैं, इसलिए अब सब कुछ केवल कयास भर नहीं है. फिर भी लेबनान पर ईरान और इसराइल के रुख के बरक्स यह काम टेढ़ी खीर जैसा लगता है.

ईरान ने कहा है, होर्मुज़ पर टोल वसूलेंगे, और ट्रंप ने कहा है, कत्तई नहीं. ट्रंप की धमकियाँ लगातार जारी हैं. ऐसी दर्जनों असहमतियाँ हैं, फिर भी लगता है कि समझौता-वार्ता जारी रहेगी.   

Saturday, June 20, 2026

रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स में महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा

एडिनबर्ग के प्रतिष्ठित रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स (RCSEd) में महर्षि सुश्रुत की कांस्य प्रतिमा गत 19 जून को स्थापित की गई है। शल्य चिकित्सा (Surgery) और विशेष रूप से प्लास्टिक सर्जरी के जनक के रूप में उनके अतुलनीय योगदान को सम्मानित करने के लिए इसे कॉलेज के ऐतिहासिक प्रांगण में जगह दी गई है।

महर्षि सुश्रुत की इस प्रतिमा को कॉलेज के भीतर एक विशेष समारोह में स्थापित किया गया। प्राचीन भारतीय चिकित्सक सुश्रुत को ईसा पूर्व छठी शताब्दी (लगभग 2800 साल पहले) का ‘शल्य चिकित्सा का जनक’ (Father of Surgery) माना जाता है। आयुर्वेद के महान ग्रंथ 'सुश्रुत संहिता' में लगभग 300 प्रकार की शल्य चिकित्साओं और 125 से अधिक सर्जिकल उपकरणों का विस्तृत वर्णन है। कटी हुई नाक या कान को जोड़ने के लिए उनके द्वारा विकसित की गई स्किन-फ्लैप तकनीक (राइनोप्लास्टी) को आज भी आधुनिक चिकित्सा में 'इंडियन मैथड' कहा जाता है।

एडिनबर्ग के अलावा, ऑस्ट्रेलिया के रॉयल ऑस्ट्रेलियन कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स (RACS) (मेलबर्न) में भी सुश्रुत की एक संगमरमर की प्रतिमा (1.2 मीटर ऊँची और 550 किलो वजनी) स्थापित है।


Friday, June 19, 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंजीकरण क्यों नहीं कराता?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ऐतिहासिक रूप से गैर-पंजीकृत स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करता रहा है। अक्सर उसके विरोधी सवाल उठाते हैं कि वह अपना पंजीकरण क्यों नहीं कराता। विवाद इसके कानूनी दर्जे पर केंद्रित है, जहाँ आलोचक वित्तीय पारदर्शिता और संवैधानिक अनुपालन की माँग करते हैं, वहीं आरएसएस अपने दृष्टिकोण का बचाव करते हुए इसे एक विकेंद्रीकृत, स्व-वित्तपोषित, व्यक्तिगत आंदोलन बताता है।

खासतौर से कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खरगे ने संघ के सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के पंजीकरण के बिना काम करने को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने उसके वित्तपोषण, कर अनुपालन और लेखा-परीक्षा की आवश्यकता का मुद्दा भी उठाया। 13 जून को लिखे एक पत्र में, खरगे ने कहा: ‘आरएसएस के इस पैमाने, प्रभाव और पहुँच के कारण ही इसे पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक अनुपालन के उच्चतम मानकों पर खरा उतरना होगा।’ उन्होंने पिछले साल के अंत में भी आरएसएस के कानूनी अस्तित्व को लेकर इसी तरह के सवाल उठाए थे। उन्होंने पंजीकरण, संगठन संरचना, वित्तपोषण और दान के साथ-साथ संगठन के समग्र कामकाज के बारे में भी पूछा था। यों प्रियांक खरगे से भी पूछा जा सकता है कि देश में इतने साल कांग्रेस पार्टी की सरकार रही, उसने इस बात पर ज़ोर क्यों नहीं दिया?

पहाड़ के जलस्रोत

प्यास बुझाते हुए: उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में रानीधारा नौला पर स्थित एक आउटलेट से स्कूली बच्चे 
अपनी बोतलों में पानी भर रहे हैं।

रविवार 24 मई के हिंदू में मुझे कुमाऊँ के नौलों (जल मंदिरों) पर एक फीचर देखने को मिला, तो अचानक कुछ पुरानी खुशबुओं के साथ यादें ताज़ा हो उठीं। 1961 की गर्मियों में मेरा नौलों, धारों और स्रोतों से पहला परिचय हुआ था।

1961 की गर्मियों में मुझे पहली बार कुमाऊँ के पहाड़ देखने का मौका मिला। अपनी दादी के साथ पहले मैं रानीखेत आया। चाचा के घर कैंटूनमेंट में मॉल रोड पर बने के डबल डेकर घर में रहना एक नया अनुभव था। उस वक्त हम मथुरा में रहते थे। लंबे अरसे तक मैं बीमारियों से घिरा रहा, इसलिए मेरे बाबू ने सोचा पहाड़ जाकर कुछ समय रहने से सेहत में सुधार होगा।

मथुरा के कैंट स्टेशन से हम आगरा फोर्ट एक्सप्रेस पर बैठे, जिसने अगली सुबह हमें काठगोदाम पहुँचाया। वहाँ से उत्तर प्रदेश रोडवेज़ की बस से रानीखेत। रानीखेत का घर चीड़ के पेड़ों से घिरा हुआ था। हरेक सुबह घर के नीचे वाली सड़क से होकर सेना के जवान कवायद करते हुए परेड ग्राउंड की ओर जाते थे, आल्मा ग्राउंड। शाम को लौटते।

Thursday, June 18, 2026

अमेरिका और ईरान के 14-सूत्री समझौते का पाठ

अमेरिका और ईरान के बीच शुक्रवार को जिस समझौता ज्ञापन पर आधिकारिक रूप से हस्ताक्षर होने की उम्मीद है, उसमें 60 दिनों के विस्तारित युद्धविराम की शर्तें निर्धारित की जाएँगी, जिससे आगे की बातचीत के लिए समय मिल सकेगा।

14-सूत्री समझौते के पुराने पाठ के कुछ मीडिया आउटलेट्स में लीक होने के कुछ घंटों बाद, एक वरिष्ठ अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारी ने ज्ञापन पढ़कर सुनाया, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से और बिना किसी शुल्क के फिर से खोलने और ‘लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों की समाप्ति’ सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई प्रतिबद्धताओं की रूपरेखा दी गई है।

समझौते में कहा गया है कि ईरान कभी नाभिकीय-अस्त्र विकसित नहीं करेगा। यह वादा ईरान ने पहले भी किया है। समझौते में यह भी कहा गया है कि अमेरिका और ईरान, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के निरीक्षकों की देखरेख में, ईरान के मौजूदा संवर्धित पदार्थों के भंडार को ‘साइट पर ही कम से कम करने की पद्धति’ से नष्ट करेंगे।

इस समझौते से संकेत मिलता है कि तेहरान को ईरान के ‘पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास’ के लिए 300 अरब डॉलर के विकास कोष का लाभ मिल सकता है, बशर्ते वह अंतिम समझौते में निर्धारित प्रतिबद्धताओं को पूरा करे। वार्ता में ईरान पर लगे सभी अमेरिकी प्रतिबंधों को ‘सहमत समय-सारणी के अनुसार’ हटाने की योजना भी तय की जाएगी।

एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अमेरिकी टीम ईरान के साथ हुए समझौते और उससे अपेक्षित अपेक्षाओं को लेकर पूरी तरह से सचेत है, और ज़रूरत पड़ने पर राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, सैन्य कार्रवाई फिर से शुरू करने के लिए तैयार हैं। अधिकारी ने कहा, ‘अगर ईरान वाकई में वह सब करेगा, जो वह कह रहा है...तो यह एक ज़बरदस्त समझौता होगा।’ उन्होंने आगे कहा, ‘आप कह सकते हैं कि समझौता ज्ञापन अंतिम है... लेकिन जब तक कोई पूर्ण और बाध्यकारी समझौता नहीं हो जाता, तब तक दोनों पक्षों में से कोई भी किसी भी समय इससे पीछे हट सकता है।’ 

14-सूत्री समझौता ज्ञापन इस प्रकार है:

1— संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान तथा वर्तमान युद्ध में उनके सहयोगी इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करके लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों की तत्काल और स्थायी समाप्ति की घोषणा करते हैं, और वचन देते हैं कि वे अब से एक-दूसरे के विरुद्ध कोई युद्ध या सैन्य अभियान शुरू नहीं करेंगे, एक-दूसरे के विरुद्ध बल प्रयोग या धमकी से बचेंगे तथा लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता सुनिश्चित करेंगे। अंतिम समझौता लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध की स्थायी समाप्ति तथा इस अनुच्छेद के अन्य प्रावधानों की पुष्टि करेगा।

मायने का वायदा


अक्सर जब मैं लिखता हूँ, कुछ शब्द अटकते हैं। बहुत से तो इस समय याद नहीं आ रहे हैं, दो पर ध्यान गया है। एक है वायदा और दूसरा मायने। दोनों को वादा और माने या मानी भी लिखा जाता है। फिल्मी गीत है, जो वादा किया, वो निभाना पड़ेगा। वहीं गुड़ के वायदा बाजार में उतार-चढ़ाव आता रहता है। सभी प्रचलन में हैं, पर जैसे ही लिखने का समय आता है, मन पूछता है कि सही क्या है?

वायदा

हिंदी शब्दसागर में वायदा शब्द नहीं, वादा मिला। वृहत् हिंदी कोश में भी वायदा नहीं, वादा मिला, जो अरबी मूल का शब्द माना गया है। शब्दसागर के अनुसार, वादा vādā संज्ञा पुं॰ [अ॰ वाइदह] (१) नियत समय या घड़ी। यानी यह अरबी मूल का शब्द है। वहीं इस कोश में एक और शब्द है, वादाशिकनी vādāśikanī [संज्ञा स्त्री] [फ़ा॰] प्रतिज्ञा भंग। वादखिलाफी [को॰], जो फारसी मूल का शब्द है। वर्धा के शब्दकोश में, वायदा (फ़ा.) [सं-पु.] 1. वचन; इकरार; वादा 2. प्रतिज्ञा। वहाँ वादा भी है। वादा (अ.) [सं-प.] 1. वचन; प्रतिज्ञा; इकरार; (प्रॉमिस) 2. कर्ज अदा करने का वक्त। फर्क केवल फ़ारसी और अरबी का है। मैंने और ज्यादा कोश नहीं देखे, अलबत्ता लगता है कि विलंब से वायदा शब्द को हिंदी में स्वीकार कर लिया गया है।

मायने

हिंदी शब्दसागर में मायने शब्द नहीं, माने मिला। माने mānē संज्ञा पुं॰ [अं॰ मानी] अर्थ। मतलब। आशय। वृहत् हिंदी कोश में माने और मायने दोनों नहीं मिले। मानी मिला, मतलब, अभिप्राय और हेतु के अर्थ में। संस्कृत मूल के अर्थ में स्वाभिमानी, नापने का पात्र, चक्की के ऊपर वाले पाट की लकड़ी वगैरह हैं। मराठी शब्द रत्नाकर में मायना मिला। वहाँ भी मानी का अर्थ स्वाभिमानी है। वर्धा को कोश में भी मानी का मतलब स्वाभिमानी, चक्की और कुदाल के बेंट  वगैरह है। उसमें माने या मायने नहीं है।

 

Wednesday, June 17, 2026

नेटक्रांति के सांस्कृतिक-राजनीतिक निहितार्थ


करीब एक दशक पहले नए दौर का सूत्र था नेट-साक्षरता। यानी इंटरनेट पटु होना सामान्य साक्षरता का हिस्सा बना। सिद्धांत थी कि जो इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाएगा वही सजग नागरिक है। वजह साफ थी। जीवन से जुड़ा ज्यादातर कार्य-व्यवहार इंटरनेट के मार्फत होने लगा था। इसका व्यावसायिक महत्व बढ़ा। इस तकनीक ने जीवन को पारदर्शी बनाया और लोकतंत्र को सार्थक बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया।

नेट के विस्तार के साथ-साथ कुछ अंतर्विरोधी बातें भी सामने आई हैं, जिनके बीज पत्रकारिता के करीब चार सौ से ज्यादा वर्षों के इतिहास में भी देखे जा सकते हैं। इसकी वजह दो बातें हैं, तकनीक और पूँजी। इंटरनेट की सार्वजनिक जीवन में भूमिका होने के बावजूद इसका विस्तार निजी पूँजी की मदद से हो रहा है। निजी पूँजी मुनाफे के लिए काम करती है।

सूचना-प्रसार केवल व्यावसायिक गतिविधि नहीं है। वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था है। जानकारी पाना या देना, कनेक्ट करना और जाग्रत विश्व के संपर्क में रहना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। इंटरनेट के सहारे यह काम आसानी से हो सकता है।

Tuesday, June 16, 2026

मतदाता, नागरिकता और ‘डेमोग्राफिक चेंज’


गत 8 जून को ‘इंडिया गठबंधन ने पाँच-सूत्री प्रस्ताव पारित किया, जिसमें एक यह भी है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा जाएगा। यह गठबंधन एसआईआरको ‘वोट चोरी’ मानता है। इसके कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को लेकर चुनाव-आयोग को क्लीन-चिट दी है। प्रश्न है कि ऐसे में पत्र लिखने से मिलेगा क्या? यह व्यक्तिगत मसला नहीं है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का कहना है, हम इसे ‘वोट लूट’ की कोशिश मानते हैं। भारत में घुसपैठ और नागरिकता रजिस्टर पिछले कई दशकों से बहस में हैं और यह बहस अब मतदाता सूची की बहस के साथ जुड़ गई है। एसआईआर के देश में दो दौर हो चुके हैं और तीसरा शुरू हो गया है। पहला दौर मुख्यतः बिहार-केंद्रित था, जो जून से सितंबर 2025 तक चला। 27 अक्तूबर से दूसरा दौर शुरू हुआ, जिसमें उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल समेत, नौ राज्य और तीन केंद्र-शासित क्षेत्र शामिल थे।

गत 14 मई को निर्वाचन आयोग ने एसआईआर के तीसरे दौर की भी घोषणा कर दी, जिसमें सोलह राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों को कवर किया गया है। इसके पूरा होने के बाद जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश को छोड़कर पूरे देश में यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। इसके साथ इस प्रक्रिया से जुड़ी बहस नए सिरे से शुरू होगी, जिसकी अनुगूँज संसद के मॉनसून सत्र में सुनाई पड़ेगी।

ईरान-समझौते के अटकते-खटकते निष्कर्ष


अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक-समझौता हो गया है, जिसके तहत 60 तक युद्धविराम लागू रहेगा और होर्मुज़ का रास्ता खुलेगा. समझौते पर दस्तखतों को लेकर अंतिम क्षण तक असमंजस बना रहा, पर अब बताया गया है कि दस्तखत 19 जून को होंगे.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अब हम ईरान की नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त कर देंगे, जो महीनों की बातचीत में सबसे बड़ी सफलता है.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के सरकारी टीवी का कहना है कि तेहरान ने अमेरिका को शांति समझौते को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया.

दोनों पक्षों ने समझौते का विवरण तुरंत जारी नहीं किया है, पर मीडिया में दोनों तरफ से आई बातों में अंतर्विरोध हैं. इसके अलावा ईरान के कट्टरपंथी और इसराइली सरकार अपने-अपने कारणों से नाराज़ हैं।

इस समझौते से दोनों पक्षों के बीच दोस्ती कायम नहीं हो जाएगी. सच यह है कि यह दो दुश्मनों के बीच सीमा रेखाएँ तय करने का समझौता है, जिसकी सफलता या विफलता का फैसला समय करेगा.

Sunday, June 14, 2026

'सभी मनुष्य समान हैं', इस वाक्य में क्या महिलाएं भी शामिल हैं?


न्यूयॉर्कटाइम्स में पारुल सहगल के लेख का हिंदी अनुवाद

5 नवंबर, 1872 को न्यूयॉर्क के रोचेस्टर में, 15 अमेरिकी महिलाएँ एक अपराध को अंजाम देने के लिए अपने घर से निकलीं। उनकी 50 वर्षीय नेता को, जो अपनी शांत और अडिग निगाहों के लिए प्रसिद्ध थी, उसी महीने गिरफ्तार किया गया था। उसने अपने अपराध से इनकार नहीं किया था। और  एक साल बाद अपने मुकदमे में जज के सामने दिए बयान में, उसने अन्य महिलाओं से आह्वान किया, ‘ठीक वैसा ही करो जैसा मैंने किया है, मानव निर्मित, अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक कानूनों के खिलाफ विद्रोह करो।’

मतदान करने के लिए सूज़न बी एंथनी की गिरफ्तारी ठीक उसी तरह हुई जैसा उन्होंने और उनकी साथी मताधिकार समर्थकों ने चाहा था, जिससे उनके आंदोलन को प्रचार मिला और यह बात उनके आंदोलन की परीक्षा साबित हुई। एंथनी ने मुकदमे से पहले भाषण देने के लिए कई जगहों का दौरा किया और घोषणा की कि अब धैर्य का समय समाप्त हो गया है। उन्होंने 14वें संशोधन का हवाला देते हुए अपने श्रोताओं से इसकी भाषा और तर्क का गहन अध्ययन करने का आग्रह किया। और फिर उन्होंने अपनी बात को बहुत ही सरल शब्दों में कहा।

1873 के भाषण में उन्होंने कहा: अब सिर्फ एक बात तय होनी बाकी रह गई है, क्या स्त्रियाँ व्यक्ति (इनसान) हैं​​​​​​? (The only question left to be settled, now, is: Are women persons?)

यह बात बहुत साफ और बहुत मजबूत है। खासकर आखिरी शब्द ध्यान खींचता है। एंथनी ने ‘लोगों’ की जगह ‘व्यक्तियों’ का इस्तेमाल किया है क्योंकि वह संविधान के सटीक शब्दों का प्रयोग कर रही थीं: ‘संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मे या प्राकृतिक रूप से नागरिकता प्राप्त सभी व्यक्ति’, जो इसके अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं, संयुक्त राज्य अमेरिका और उस राज्य के नागरिक हैं जहाँ वे रहते हैं। कोई भी राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगा या लागू नहीं करेगा जो संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिकों के विशेषाधिकारों या स्वतंत्रताओं को कम करे।’

यदि एंथनी जैसी महिलाएं व्यक्ति थीं, तो वे नागरिक भी थीं। और यदि वे नागरिक थीं, तो न्यूयॉर्क जैसे किसी भी राज्य के कानूनों को उनके विशेषाधिकारों या उन्मुक्तियों (Immunities) को, जैसे कि मतदान के अधिकार को, कम नहीं करना चाहिए।

एंथनी द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे मामले में यह महत्वपूर्ण बिंदु था, जिसके के दूरगामी परिणाम होने थे।

महिलाओं के मताधिकार के लिए संघर्ष अमेरिकी इतिहास के सबसे लंबे और सबसे कठिन संघर्षों में से एक था। इसे शराब लॉबी के भयंकर विरोध का सामना करना पड़ा, जिन्हें डर था कि मताधिकार प्राप्त महिलाएं शराबबंदी के पक्ष में मतदान करेंगी; उद्योगपतियों को यह भी डर था कि वे बाल श्रम कानूनों के पक्ष में तर्क देंगी; और मताधिकार विरोधी महिलाओं के विशाल और शक्तिशाली समूह ने भी इसका विरोध किया।

Wednesday, June 10, 2026

ट्रंप की पहेलियों और पुतिन के दावों के दौर में भारत


डॉनल्ड ट्रंप की फुलझड़ियों, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बयानों और चीनी गतिविधियों को एक सतह पर रखकर विचार करें, तो भारत की विदेश-नीति को लेकर कुछ सवाल बनते हैं.

एक तरफ गाहे-बगाहे ट्रंप के पहेली जैसे बयान सुनाई पड़ते हैं, वहीं अब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि भारत को अमेरिका के दबाव में आना बंद करना चाहिए. अमेरिका का सूर्यास्त और ब्रिक्स का सूर्योदय होने वाला है.

ईरान-युद्ध की वजह से मिली छूट के कारण रूस से पेट्रोलियम की खरीद में वृद्धि हुई है, पर कहना मुश्किल है कि आने वाले समय में अमेरिका इसे रोकने के लिए किस प्रकार के दबाव डालेगा.

सवाल है कि क्या वास्तव में अमेरिका के सूर्यास्त की घड़ी आ गई है? भारत क्या वास्तव में अमेरिका के दबाव में है? क्या अब हमारी दूरियाँ बढ़ने वाली हैं? ट्रंप कैसी पहेली बूझ रहे हैं? हमें वाइट हाउस प्रशासन की पल में तोला, पल में माशानीति के प्रति सचेत रहना होगा.

देखना यह भी होगा कि ब्रिक्स के मंच पर भारत-रूस और चीन के सहयोग की नई संभावनाएँ क्या हैं? वस्तुतः भारत को न सबके बीच से अपना रास्ता खुद खोजना होगा और स्वतंत्र-नीति का संचालन करना होगा. क्या ऐसा संभव है

फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि भारत किसी ध्रुवीकरण में शामिल नहीं होगा और उसके अमेरिका के साथ रिश्ते बने रहेंगे, जो इस समय भले ही कारोबारी लेन-देन तक सिमट गए हैं. दूसरी तरफ उसे न तो 'अमेरिकी-पिट्ठू' साबित किया जा सकता है और न उसके दबाव में.  

Monday, June 8, 2026

फुटबॉल के जुनून का मेला


आगामी 11 जून से 2026 का फीफा विश्व कप शुरू हो रहा है, जो 19 जुलाई तक चलेगा। रविवार, 19 जुलाई को न्यू जर्सी के मेटलाइफ स्टेडियम में फाइनल मैच होगा। यह विश्व कप पहली बार तीन देशों के 16 शहरों में आयोजित किया जाएगा: संयुक्त राज्य अमेरिका में 11, मैक्सिको में तीन और कनाडा में दो।

मैक्सिको में उद्घाटन समारोह मैक्सिको सिटी स्टेडियम में होगा, जो विश्व कप के तीन संस्करणों की मेजबानी करने वाला पहला स्थल बनकर इतिहास रच देगा, इसके अलावा ग्वाडालाजारा और मॉन्टेरी में भी मैच होंगे। ये मैच कनाडा के दो स्थानों, टोरंटो और वैंकूवर में खेले जाएँगे। मुख्य मेजबान अमेरिका है। उसके यहाँ एटलांटा, बोस्टन, डलेस, ह्यूस्टन, कैनसस सिटी, लॉस एंजेलस, मायामी, न्यूयॉर्क या न्यू जर्सी, फिलाडेल्फ़िया, सैन फ्रांसिस्को या सांता क्लारा और सिएटल में आयोजित किए जाएँगे।

यह विश्व कप का 23वां संस्करण है। पहली बार इसमें 48 टीमें भाग लेंगी, जो चार साल पहले कतर में भाग लेने वाली टीमों की तुलना में 16 अधिक हैं। इससे यह इतिहास का सबसे बड़ा विश्व कप बन जाएगा, जिसमें मैचों की संख्या बढ़कर 104 हो जाएगी, और यह पहली बार तीन देशों में आयोजित किया जाएगा।

उत्तरी अमेरिका में हो रहे इस विश्व कप के बारे में कुछ बातें जानना जरूरी है।

बारह समूह

नए प्रारूप में चार-चार टीमों के 12 समूह होंगे। प्रत्येक समूह से शीर्ष दो टीमें और शीर्ष आठ तृतीय स्थान पर रहने वाली टीमें नॉकआउट चरण में प्रवेश करेंगी। अंक, गोल अंतर और कुल गोल तीसरे स्थान के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के निर्धारण के मुख्य मापदंड होंगे। यह दौर 39 दिनों तक चलेगा, जो कतर के 29 दिनों और 2014 और 2018 संस्करणों के 32 दिनों से 10 दिन अधिक है।

उद्घाटन समारोह गुरुवार, 11 जून को मैक्सिको सिटी के ऐतिहासिक एज़्टेका स्टेडियम में मैक्सिको और दक्षिण अफ्रीका के बीच एक मैच के साथ आयोजित किया जाएगा। उद्घाटन दिवस से लेकर शनिवार, 27 जून तक 17 दिनों में कुल 72 समूह चरण के मैच आयोजित किए जाएंगे।

इसके बाद 32 टीमों का पहला दौर (28 जून-3 जुलाई), फिर 16 टीमों का दूसरा दौर (4-7 जुलाई), क्वार्टर फाइनल (9-11 जुलाई), सेमीफाइनल (14-15 जुलाई) और अंत में तीसरे स्थान के लिए मुकाबला (18 जुलाई) होगा।

चूंकि फीफा स्टेडियमों के लिए पहले से मौजूद वाणिज्यिक नामों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है, इसलिए 2026 विश्व कप के आयोजन स्थलों का नाम मेजबान शहर के नाम पर रखा जाएगा।

चूँकि मैच चार अलग-अलग टाइम जोन में और 4,500 किलोमीटर तक की दूरी पर स्थित स्थानों पर खेले जाएँगे, इसलिए मैच कुल 13 अलग-अलग समय पर शुरू होंगे। अमेरिका महाद्वीप होगा विश्व कप का सबसे आसानी से आनंद ले सकेगा, क्योंकि सभी मैच दोपहर 1 बजे आधिकारिक सीटी बजने से लेकर आधी रात को खेल समाप्त होने तक अपने-अपने स्थानों पर आयोजित किए जाएँगे। अर्जेंटीना, उरुग्वाय और ब्राजील के अधिकतर हिस्सों में, यदि वे दिन के आखिरी मैच देखना चाहते हैं, तो उन्हें कुछ मामलों में सुबह 4 बजे के बाद तक जागना पड़ेगा।

अन्य महाद्वीपों के लिए समय अलग-अलग होगा। यूरोप में, ज्यादातर मैच शाम 6 बजे से अगले दिन सुबह 5 बजे के बीच खेले जाएँगे। पूर्वी एशिया और ओसनिया में, ये मैच मुख्य रूप से सुबह के समय दिखाई पड़ेंगे।

कौन जीतेगा?

खिलाड़ियों और प्रशंसकों के लिए, यहाँ तक कि पूरे देशों के लिए भी, विश्व कप जीतना एक परम आनंद है। विश्व कप कौन जीतेगा, इससे बेहतर सवाल यह है: किसे जीतना चाहिए? साप्ताहिक इकोनॉमिस्ट ने इस सवाल का रोचक तरीके से जवाब देने की कोशिश की है। उसके अनुसार, विश्व कप अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एक शाखा है। यह मेजबान देशों के शक्ति-प्रदर्शन का एक साधन है और एक प्रकार की सौम्य-डिप्लोमेसी। मैदान में कई मुकाबले ऐसे होते हैं, जैसे युद्ध का मैदान हो। जैसे, 2022 में ईरान बनाम अमेरिका हुआ था। कुछ टीमें भविष्य की आशा का प्रतीक बनती हैं, जैसे कि डिएगो माराडोना के नेतृत्व वाली अर्जेंटीना टीम, जिसने 1986 में, सैन्य तानाशाही के अंत के कुछ ही समय बाद, जीत हासिल की थी। कमजोर टीमों की चौंकाने वाली जीत यह आशा जगाती है कि शायद सौम्य और विनम्र लोग ही अंतिम विजेता बनेंगे।

सवाल है कि इस विश्व कप का विजेता कौन होना चाहिए? यहाँ कौन होगा कि बात नहीं है, बल्कि यह है कि किसे विजेता बनना चाहिए? वस्तुतः 48 प्रतिस्पर्धी टीमों में से आधी या उससे अधिक के जीतने की कोई संभावना नहीं है। उन्हें हटा दें। इसके बाद, निष्पक्षता और रोमांच के लिए, उन आठ देशों को भी हटा दें जो पहले जीत चुके हैं। इंग्लैंड को भी, जिसकी एकमात्र जीत 60 साल पहले हुई थी। इससे ज्यादातर दावेदार बाहर हो जाते हैं। शेष में से, प्रमुख दावेदार दो श्रेणियों में आते हैं।

पहले समूह में ऐसे साहसी छोटे देश हैं जिनमें जनसंख्या के अंतर को मात देने की प्रतिभा है। जैसा कि साइमन कूपर ने अपने मनोरंजक संस्मरण ‘वर्ल्ड कप फीवर’ में लिखा है, यह टूर्नामेंट एक उलटी-सीधी वैश्विक रैंकिंग प्रस्तुत करता है जिसमें अमेरिका ‘एक पिछड़ी हुई टीम है और चीन का तो कोई नामोनिशान भी नहीं है’। उनकी टीम, नीदरलैंड्स, एक छोटा सा देश है जो तीन फाइनल में पहुँच चुका है और इसबार उसके पास जीतने का अच्छा मौका है। फिर भी, जैसा कि कूपर स्वीकार करते हैं, नीदरलैंड्स पहले से ही एक खुशहाल और सफल देश है; उसे फुटबॉल की कोई गहरी ज़रूरत या जुनून नहीं है जिसे दूर करने की उसे ज़रूरत हो।

स्वतंत्र राज्य के रूप में अपने 35 वर्षों में, क्रोआसिया (जनसंख्या: 40 लाख से कम) ने आश्चर्यजनक रूप से तीन सेमीफाइनल तक का सफर तय किया है। क्रोआसियाई पत्रकार अलेक्जेंडर होलिगा के अनुसार, फुटबॉल एक ऐसा दुर्लभ क्षेत्र है जिसमें उनका देश कह सकता है, ‘हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ देशों में से हैं।’ हालांकि, कुल मिलाकर देखा जाए तो सबसे योग्य दावेदार पुर्तगाल है, जिसने कम उपलब्धियाँ हासिल की हैं और लंबे समय तक इंतजार किया है, साथ ही तानाशाही और आर्थिक संकट का सामना भी किया है।

फुटबॉल लेखक मिगुएल परेरा इस खेल के प्रति पुर्तगाल के जुनून के बारे में कहते हैं, ‘पुर्तगाल एक जुनूनी देश है।’ एक ऐसा देश जिसने महान खिलाड़ी तो दिए हैं लेकिन विश्व स्तर पर शीर्ष टीम नहीं, वहाँ जीत ‘अत्यंत आनंद और उल्लास’ का संचार करेगी।

दूसरे योग्य समूह में वे बड़े, फुटबॉल प्रेमी देश शामिल हैं जो हमेशा से ही टूर्नामेंट में पिछड़ते रहे हैं। उदाहरण के लिए, जापानी प्रशंसक आज भी 2018 के रोस्तोव की हार का शोक मनाते हैं, जब उनकी टीम ने बेल्जियम के खिलाफ 2-0 की बढ़त गँवा दी थी, और 1993 के दोहा की हार का भी, जब इराक के एक गोल ने उन्हें टूर्नामेंट से बाहर कर दिया था। जापान में रहने वाले पत्रकार डैन ओर्लोविट्ज़ का मानना ​​है कि टीम का विकास जापान के विश्व के साथ एकीकरण को दर्शाता है। अगर जापान जीतता है तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। हालाँकि, एक कारण यह है कि बेसबॉल जापान का सबसे बड़ा खेल है, फुटबॉल नहीं। इसी वजह से अमेरिका भी इस प्रतियोगिता में भाग लेने के योग्य नहीं है।

किसी भी अफ्रीकी देश ने विश्व कप नहीं जीता है। अफ़्रीका के सबसे मजबूत दावेदारों में से एक सेनेगल, कर्ज़ संकट के राजनीतिक नतीजों में फँसा हुआ है। लेकिन, फ्रांस 24 के संवाददाता एलिमाने नडाओ कहते हैं, ‘जब भी राष्ट्रीय टीम खेलती है, हर कोई राजनीतिक समस्याओं को भूल जाता है।’ विश्व कप का उसका सबसे यादगार पल 2002 में पूर्व औपनिवेशिक शक्ति फ्रांस पर 1-0 की जीत थी; गोल करने वाले खिलाड़ी ने कॉर्नर फ्लैग के पास टीम के साथ डांस किया था। अगर वह जीत जाता है, तो देश ‘एक हफ्ते या एक महीने’ तक जश्न मनाएगा।

फिर मोरक्को की बात आती है, जो चार साल पहले सेमीफाइनल तक पहुँचा था। मोरक्को वर्ल्ड न्यूज़ के सह-संस्थापक और राजनीतिक सलाहकार समीर बेनिस कहते हैं कि इससे मोरक्को की प्रतिष्ठा को काफी फायदा हुआ और यह साबित हुआ कि देश ‘विश्व मंच पर अपनी चमक बिखेर सकता है’। बेनिस कहते हैं, ‘जब टीम खेल रही होती है, तो मोरक्को में सब कुछ थम सा जाता है। हर कोई मैच देख रहा होता है और जीत के लिए प्रार्थना कर रहा होता है।’ लेकिन अफ़्रीका के लिए यह गौरवशाली पल 2030 में और भी अधिक सुखद हो सकता है, जब मोरक्को मेजबान देशों में से एक होगा।

 कुल मिलाकर, लैटिन अमेरिकी देश ऐसे हैं, जहाँ पहली बार जीत मिलने पर सबसे अधिक लोगों को सबसे अधिक खुशी मिलेगी। कोलंबिया में राष्ट्रपति चुनाव का तनावपूर्ण माहौल है; दैनिक समाचार पत्र एल टिएम्पो के रिकार्डो एविला कहते हैं कि फुटबॉल ‘देश में एकता का मुख्य कारक’ है। लेकिन जीत का सबसे अधिक महत्व मैक्सिको में होगा, जो 13.3 करोड़ आबादी वाला फुटबॉल का दीवाना देश है। स्तंभकार और पॉडकास्टर लियोन क्राउज़ मज़ाक में कहते हैं, ‘हम सभी आवर लेडी ऑफ ग्वाडालूप में विश्वास करते हैं, लेकिन हमारा एकमात्र सच्चा धर्म फुटबॉल है।’ वे आगे कहते हैं कि अमेरिका में रहने वाले लाखों मैक्सिकन लोगों के लिए, यह टीम उनकी मातृभूमि से आखिरी जुड़ाव है। जीत ‘उस देश के लिए चमत्कार कर देगी जिसने कई कठिनाइयों का सामना किया है’, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गई आलोचना भी शामिल है । कल्पना कीजिए कि वे मैक्सिको के कप्तान को ट्रॉफी प्रदान कर रहे हैं।

तीन बार के चैंपियन पेले ने ब्राज़ील को कप उठाते हुए देखने के अनुभव को याद करते हुए कहा, ‘भावनाओं की ऐसी तीव्रता मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी।’ इसबार इसे कौन महसूस करेगा? वास्तव में, सबसे संभावित विजेता फ्रांस और स्पेन हैं। फिर भी, एक खराब रेफरी या एक गलत पेनल्टी किक के कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ सकता है। अगर 19 जुलाई को होने वाले फाइनल में मैक्सिको पुर्तगाल से खेले और उसे हरा दे, तो यह एक रोमांचक और रोमांचक मुकाबला होगा। ऐसा हो सकता है। बहरहाल जब तक आखिरी सीटी नहीं बजती, हम सभी उम्मीदें लगा सकते हैं।

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