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Wednesday, August 16, 2017

कश्मीरियों को गले लगाने वाली बात में कोई पेच है क्या?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन की दो-तीन खास बातों पर गौर करें तो पाएंगे कि वे 2019 के चुनाव से आगे की बातें कर रहे हैं. यह राजनीतिक भाषण है, जो सपनों को जगाता है. इन सपनों की रूपरेखा 2014 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में और जून 2014 में सोलहवीं संसद के पहले सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण में पेश की गई थी.

मोदी ने 2014 में अपने जिन कार्यक्रमों की घोषणा की थी, अब उन्होंने उनसे जुड़ी उपलब्धियों को गिनाना शुरू किया है. वे इन उपलब्धियों को सन 2022 से जोड़ रहे हैं. इसके लिए उन्होंने सन 1942 की अगस्त क्रांति से 15 अगस्त 1947 तक स्वतंत्रता-संकल्प को रूपक की तरह इस्तेमाल किया है. 

हालांकि मोदी के संबोधन में ध्यान देने लायक बातें कुछ और भी हैं, पर लोगों का ध्यान जम्मू-कश्मीर को लेकर कही गई कुछ बातों पर खासतौर से गया है.

कश्मीरी लोग हमारे हैं, बशर्ते...

Friday, July 14, 2017

‘मोदी संस्कृति’ को चुनौती हैं गोपाल कृष्ण गांधी

प्रशासक, विचारक, लेखक और आंशिक रूप से राजनेता गोपाल कृष्ण गांधी की देश की गंगा-जमुनी संस्कृति के पक्षधर के रूप में पहचान है. उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है उनकी विरासत और विचारधारा. उनके पिता देवदास गांधी थे और माँ लक्ष्मी गांधी, जो राजगोपालाचारी की बेटी थीं. दादा महात्मा गांधी और नाना चक्रवर्ती राजगोपालाचारी.
गोपाल कृष्ण गांधी सामाजिक बहुलता के पुजारी हैं, और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकसित हो रहे राजनीतिक हिन्दुत्व के मुखर विरोधी. विपक्षी दलों ने उन्हें उप-राष्ट्रपति पद के लिए चुनकर यह बताने की कोशिश की है कि भारत जिस सांस्कृतिक चौराहे पर खड़ा है, उसमें वे वैचारिक विकल्प का प्रतिनिधित्व करते हैं. वे मोदी के सामने सांस्कृतिक चुनौती के रूप में खड़े हैं. 

Monday, July 3, 2017

प्रणब के प्रति मोदी की कृतज्ञता क्या कहती है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पिता-तुल्य बताना पहली नजर में सामान्य औपचारिकता लगती है. प्रणब दा के विदा होने की बेला है. ऐसे में औपचारिक बातें ही होती हैं. पर दूसरी नजर में दोनों नेताओं का एक दूसरे की तारीफ करना कुछ बातों की याद दिला देता है.  

रविवार के राष्ट्रपति भवन में एक पुस्तक के विमोचन समारोह में नरेंद्र मोदी ने कहा, जब मैं दिल्ली आया, तो मुझे गाइड करने के लिए मेरे पास प्रणब दा मौजूद थे. मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि मुझे प्रणब दा की उँगली पकड़ कर दिल्ली की जिंदगी में खुद को स्थापित करने का मौका मिला.

Thursday, June 29, 2017

मोदी के इसी बयान का था इंतजार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गो-भक्ति के नाम पर हो रही हत्याओं पर बयान देने में कुछ देर की है. उन्होंने कहा है कि गो-रक्षा के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती. उनके इस बयान का पिछले कुछ समय से इंतजार था. खासतौर से दिल्ली के पास बल्लभगढ़ में एक किशोर जुनैद की हत्या के बाद देश का नागरिक समाज गो-रक्षा के नाम पर हिंसा फैलाने वालों से नाराज है.

ऐसा नहीं कि अतीत में प्रधानमंत्री इस विषय पर कुछ बोले नहीं हैं. उत्तर प्रदेश के दादरी में अखलाक की हत्या से लेकर गुजरात के उना में दलितों की पिटाई तक की उन्होंने आलोचना की. पर अब जरूरत इस बात की है कि वे अपनी बात को कड़ाई से कहें और गो-रक्षा के नाम पर बढ़ती जा रही अराजकता को रुकवाएं. अन्यथा यह घटनाक्रम राजनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित होगा.

Tuesday, June 20, 2017

रामनाथ कोविंद का चयन बीजेपी का सोचा-समझा पलटवार है

कोविंद को लेकर यह बेकार की बहस है कि वह प्रतिभा पाटिल जैसे ‘अनजाने और अप्रत्याशित’ प्रत्याशी हैंPramod Joshi | Published On: Jun 20, 2017 09:21 AM IST | Updated On: Jun 20, 2017 09:21 AM IST

रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित करने के बाद से एक निरर्थक बहस इस बात को लेकर शुरू हो गई है कि वे क्या प्रतिभा पाटिल जैसे ‘अनजाने और अप्रत्याशित’ प्रत्याशी हैं? उनकी काबिलियत क्या है और इसके पीछे की राजनीति क्या है वगैरह.

भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रत्याशी का नाम अपने दूरगामी राजनीतिक उद्देश्यों के विचार से ही तय किया है, पर इसमें गलत क्या है? राष्ट्रपति का पद अपेक्षाकृत सजावटी है और उसकी सक्रिय राजनीति में कोई भूमिका नहीं है, पर राजेंद्र प्रसाद से लेकर प्रणब मुखर्जी तक सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी राजनीतिक कारणों से ही चुने गए.

Saturday, June 17, 2017

जस्टिस पीएन भगवती: जहांगीरी न्याय के पक्षधर

जस्टिस भगवती का सबसे बड़ा योगदान जनहित याचिकाएं हैं, जिन्हें उन्होंने परिभाषित किया थाजनता के बीच देश की न्याय-व्यवस्था की जो साख बनी है, उसे बनाने में जस्टिस पीएन भगवती जैसे न्यायविदों की बड़ी भूमिका है. वे ऐसे दौर में न्यायाधीश रहे जब देश को जबर्दस्त अंतर्विरोधों के बीच से गुजरना पड़ा. इसके छींटे भी उनपर पड़े. पर उनकी मंशा और न्याय-प्रियता पर किसी को कभी संदेह नहीं रहा.

भारतीय इतिहास में जिस तरह आम आदमी को जहांगीर ने न्याय की घंटियां बजाने का अधिकार दिया था, उसी तरह जस्टिस भगवती ने न्याय के दरवाजे हरेक के लिए खोले. उन्होंने सामान्य नागरिक को सार्वजनिक हित में देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाने की पैरोकारी की और जो अंततः अधिकार बना. 

इस वजह से याद रहेंगे भगवती
व्यवस्था को पारदर्शी बनाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार  के बारे में उनकी सुस्पष्ट राय थी. सन् 1990 में आकाशवाणी पर डॉ राजेंद्र प्रसाद पर दिया गया व्याख्यान जिसने सुना है, उसे वे काफी देर तक याद रखेंगे. अलबत्ता उनका सबसे बड़ा योगदान जनहित याचिकाएं हैं, जिन्हें उन्होंने परिभाषित किया था. उनके दौर में लोक-अदालतों ने त्वरित-न्याय की अवधारणा को बढ़ाया.


सत्तर और अस्सी के दशक भारत में न्यायिक सक्रियता के थे. इस दौर में हमारी अदालतों ने सार्वजनिक हित में कई बड़े फैसले किए. दिसंबर, 1979 में कपिला हिंगोरानी ने बिहार की जेलों में कैद विचाराधीन कैदियों की दशा को लेकर एक याचिका दायर की. इस याचिका के कारण बिहार की जेलों से 40,000 ऐसे कैदी रिहा हुए, जिनके मामले विचाराधीन थे.
अदालतों की न्यायिक सक्रियता की वह शुरुआत थी.

सन् 1981 में एसपी गुप्ता बनाम भारतीय संघ के केस में सात जजों की बेंच में जस्टिस भगवती भी एक जज थे. उन्होंने अपना जो फैसला लिखा उसमें दूसरी बातों के अलावा यह लिखा कि यह अदालत सार्वजनिक हित में मामले को उठाने के लिए यह अदालत औपचारिक याचिका का इंतजार नहीं करेगी, बल्कि यदि कोई व्यक्ति केवल एक चिट्ठी भी लिख देगा तो उसे सार्वजनिक हित में याचिका मान लेगी.
इस फैसले ने पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन को परिभाषित कर दिया. बड़ी बात यह है कि इस व्यवस्था में भारी न्यायिक शुल्क को जमा किए बगैर सुनवाई हो सकती है. अस्सी के दशक के पहले तक न्याय के दरवाजे केवल उसके लिए ही खुले थे, जो किसी सार्वजनिक कृत्य से प्रभावित होता हो.


कोई तीसरा व्यक्ति सार्वजनिक हित के मामले को लेकर भी अदालत में नहीं जा सकता था. उस दौर मे जस्टिस पीएन भगवती और जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर जैसे न्यायाधीशों को न्याय के दरवाजे सबके लिए खोलने का श्रेय जाता है.


इस वजह से हुई थी आलोचना
जस्टिस भगवती को पीआईएल और लोक अदालतों के लिए तारीफ मिली तो इमर्जेंसी के दौर में इंदिरा गांधी की तारीफ और उनकी नीतियों के समर्थन की वजह से काफी आलोचना का सामना भी करना पड़ा. सन् 1976 के एडीएम जबलपुर मामले में सुप्रीम कोर्ट के जिन चार सदस्यों ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को नामंजूर कर दिया था, उसमें एक जज वे भी थे. एचआर खन्ना अकेले जज थे, जिन्होंने सरकार के खिलाफ फैसला सुनाया.


भगवती पर ढुलमुल होने का आरोप था. इमर्जेंसी में उन्होंने इंदिरा गांधी की तारीफ की, जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद आलोचना. और जब इंदिरा की वापसी हुई तो उनकी फिर से तारीफ कर दी. शायद उन्हें अपनी गलती मानने में देर नहीं लगती थी. सन् 1976 के बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले में उन्होंने अपनी गलती सन् 2011 में जाकर मान ली.


देश की न्यायिक व्यवस्था को लेकर उनकी राय काफी खुली हुई थी. जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था के पक्ष में वे नहीं थे. एक इंटरव्यू के जवाब में उन्होंने कहा, ‘मैं इसके पक्ष में नहीं हूं. मुझे हकीकत तो नहीं मालूम, लेकिन अफवाहों पर ध्यान दें तो कॉलेजियम में रखे जाने वाले न्यायाधीशों के बीच मोल-भाव होता है. लोग न्यायाधीशों की नियुक्ति के तरीके में भरोसा खोते जा रहे हैं. लिहाजा, इसे बदलना जरूरी हो गया है.’

फर्स्ट पोस्ट में प्रकाशित 

Saturday, April 29, 2017

आम आदमी पार्टी को कौन लाएगा 'बंद कमरे' से बाहर?

युद्धों में पराजित होने के बाद वापिस लौटती सेना के सिपाही अक्सर आपस में लड़ते-मरते हैं. आम आदमी पार्टी के साथ भी ऐसा ही हो तो विस्मय नहीं होगा. एमसीडी चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी के नेता-कवि कुमार विश्वास ने कहा है कि हमारे चुनाव हारने का कारण ईवीएम नहीं बल्कि, लोगों से संवाद की कमी है.

उन्होंने यह भी कहा है कि पार्टी में कई फैसले बंद कमरों में किए गए जिस वजह से एमसीडी चुनाव में सही प्रत्याशियों का चयन नहीं हो पाया. उन्होंने यह भी कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी पर निशाना नहीं साधना चाहिए था.

अभी यह कहना मुश्किल है कि कुमार विश्वास की ये बातें पार्टी के भीतर की स्वस्थ बहस को व्यक्त करती हैं या व्यक्तिगत कड़वाहट को. अरविन्द केजरीवाल ने पार्टी के नए पार्षदों और विधायकों की बैठक में 'अंतर-मंथन' का इशारा भी किया है. उधर नेताओं की अंतर्विरोधी बातें सामने आ रहीं हैं और संशय भी. पार्टी तय नहीं कर पाई है कि क्या बातें कमरे के अंदर तय होनी चाहिए और क्या बाहर.

अचानक ईवीएम को लेकर पार्टी के रुख में बदलाव है. उसकी विचार-प्रक्रिया में यह अचानक-तत्व ही विस्मयकारी है. लगता है विचार सड़क पर होता है और फैसले कमरे के भीतर. महत्वपूर्ण है उसकी विचार-मंथन प्रक्रिया. पार्टी के इतिहास में विचार-मंथन के दो बड़े मौके इसके पहले आए हैं. एक, लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद और दूसरा 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारी विजय के बाद. पार्टी की पहली बड़ी टूट उस शानदार जीत के बाद ही हुई थी. और उसका कारण था विचार-मंथन का प्रक्रिया-दोष.

कुमार विश्वास ने माना कि ईवीएम की गड़बड़ी एक मुद्दा हो सकता है लेकिन इसे उठाने का सही मंच कोर्ट और चुनाव आयोग है, जहां जाकर हम अपनी आपत्ति दर्ज कराएं. सवाल है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में हार का सामना कर रही मायावती के बयान के फौरन बाद आम आदमी पार्टी ने भी अचानक इस मसले को क्यों उठाया? क्या इस बात पर विचार किया था कि देश के मध्यवर्ग की प्रतिक्रिया क्या है? और यह भी कि यह आरोप मोदी सरकार पर नहीं, चुनाव आयोग पर है, जिसकी छवि अच्छी है.

Thursday, April 13, 2017

यह आम आदमी पार्टी की उलटी गिनती है

दिल्ली की राजौरी गार्डन विधानसभा सीट पर हुए उप चुनाव के परिणामों से आम आदमी पार्टी की उलटी गिनती शुरू हो गई है. एमसीडी के चुनाव में यही प्रवृत्ति जारी रही तो माना जाएगा कि ‘नई राजनीति’ का यह प्रयोग बहुत जल्दी मिट्टी में मिल गया.

उप-चुनावों के बाकी परिणाम एक तरफ और दिल्ली की राजौरी गार्डन सीट के परिणाम दूसरी तरफ हैं. जिस तरह से 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम नाटकीय थे, उतने ही विस्मयकारी परिणाम राजौरी गार्डन सीट के हैं.

आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसौदिया मानते हैं कि यह हार इसलिए हुई, क्योंकि इस इलाके की जनता जरनैल सिंह के छोड़कर जाने से नाराज थी. यानी पार्टी कहना चाहती है कि यह पूरी दिल्ली का मूड नहीं है, केवल राजौरी गार्डन की जनता नाराज है.

Tuesday, January 31, 2017

अमित शाह की नजर में यह ‘ड्रामा’ चलेगा नहीं

रविवार को जहाँ दिनभर सपा-कांग्रेस के गठबंधन के औपचारिक समारोह से  लखनऊ शहर रंगा रहा, वहीं रात होते-होते भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि यह पारिवारिक ड्रामा इस गठबंधन की रक्षा कर नहीं पाएगा.
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जहाँ सपा-कांग्रेस गठबंधन को नोटबंदी के नकारात्मक प्रभाव से उम्मीदें हैं वहीं बीजेपी के रणनीतिकार अमित शाह को लगता है कि प्रदेश का वोटर पिछले 15 साल की अराजकता और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना फैसला सुनाएगा. उनका दावा है कि पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिल जाएगा.

Saturday, January 21, 2017

अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहेगा संघ

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने आरक्षण के बारे में जो कहा है, वह संघ के परंपरागत विचार के विपरीत नहीं है. संघ लंबे अरसे से कहता रहा है कि आरक्षण अनंतकाल तक नहीं चलेगा. संविधान-निर्माताओं की जो मंशा थी हम उसे ही दोहरा रहे हैं.
इस वक्त सवाल केवल यह है कि मनमोहन वैद्य ने इन बातों को कहने के पहले उत्तर प्रदेश के चुनावों के बारे में सोचा था या नहीं. अमूमन संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी बगैर सोचे-समझे बातें नहीं करते और जो बात कहते हैं वह नपे-तुले शब्दों में होती है. ऐसे बयान देकर वे अपनी उपस्थिति को रेखांकित करने का मौका खोते नहीं हैं.

Friday, January 6, 2017

बजट का विरोध गैर-वाजिब है

भारतीय राजनीति में लोक-लुभावन घोषणाएं ऐसे औजार हैं, जिनका इस्तेमाल हरेक पार्टी करना चाहती है. पर दूसरी पार्टी को उसका मौका नहीं देना चाहती.
केंद्र सरकार ने इस साल सितंबर में सिद्धांततः फैसला कर लिया था कि अब से बजट तकरीबन एक महीना पहले पेश किया जाएगा. यह केवल इस साल की व्यवस्था ही नहीं होगी. भविष्य में वित्त वर्ष भी बदलने का विचार है.
चर्चा तो इस बात पर होनी चाहिए कि यह विचार सही है या गलत. पर हम चर्चा तो दूसरी बातों की सुन रहे हैं.

Saturday, December 31, 2016

ड्रामा था या सच अखिलेश बड़े नेता बनकर उभरे

लाहाबाद में अखिलेश समर्थक एक पोस्टर
अंततः यह सब ड्रामा साबित हुआ. गुरुवार की रात एक अंदेशा था कि कहीं यह नूरा-कुश्ती तो नहीं थी? आखिर में यही साबित हुआ.
मुलायम परिवार के झगड़े का अंत जिस तरह हुआ है, उससे तीन निष्कर्ष आसानी से निकलते हैं. पहला, यह कि यह अखिलेश की छवि बनाने की एक्सरसाइज़ थी. दूसरा, मुलायम सिंह को बात समझ में आ गई कि अखिलेश की छवि वास्तव में अच्छी है. तीसरा, दोनों पक्षों को समझ में आ गया कि न लड़ने में ही समझदारी है.
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि अखिलेश यादव ज्यादा बड़े नेता के रूप में उभर कर सामने आए हैं. और शिवपाल की स्थिति कमजोर हो गई है. टीप का बंद यह कि रामगोपाल यादव ने 1 जनवरी को जो राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन बुलाया था, वह भी होगा.

Thursday, December 22, 2016

कांग्रेस को भी घायल करेंगे राहुल के तीर

असर करे या न करे, पर राहुल गांधी के लिए सहारा का तीर चलाना मजबूरी बन गया था. दो हफ्ते पहले वे घोषणा कर चुके थे कि उनके पास ऐसी जानकारी है, जो भूचाल पैदा कर देगी. उसे छिपाकर रखना उनके लिए संभव नहीं था. 
देर से दी गई इस जानकारी से अब कोई भूचाल तो पैदा नहीं होगा, पर राजनीति का कलंकित चेहरा जरूर सामने आएगा. जिन दस्तावेजों का जिक्र किया जा रहा है, उनमें कांग्रेस को परेशान करने वाली बातें भी हैं. 

Friday, December 16, 2016

नोटबंदी पर बहस से दोनों पक्ष भाग रहे हैं

सरकार और विपक्ष किन सवालों को लेकर एक-दूसरे से पंजा लड़ा रहे हैं?

देश नोटबंदी की वजह से परेशान है. दूसरी ओर एक के बाद एक कई जगहों से लाखों-करोड़ों के नोट बिल्डरों, दलालों और हवाला कारोबारियों के पास से मिल रहे हैं. तब सवाल उठता है कि सरकार और विपक्ष किन सवालों को लेकर एक-दूसरे से पंजा लड़ा रहे हैं?

नोटबंदी का फैसला अपनी जगह है, बैंकिंग प्रणाली कौन से गुल खिला रही है? वह कौन सी राजनीति है, जो जनता के सवालों से ऊपर चली गई है? अब सुनाई पड़ रहा है कि कांग्रेस बजट सत्र जल्द बुलाने का विरोध भी करेगी. दरअसल राजनीति की वरीयताएं वही नहीं हैं, जो जनता की हैं.

कांग्रेस बजट सत्र जल्द बुलाने का विरोध कर सकती है, क्योंकि चुनाव की घोषणा होने के बाद आदर्श आचार संहिता लागू हो जाएगी, जिससे सरकार के पास कई तरह की घोषणाएं करने का मौका नहीं बचेगा. 

हाल में सरकार ने संकेत किया है कि नोटबंदी के कारण आयकर की दरों में कमी की जा सकती है. सवाल नोटबंदी की अच्छाई या बुराई का नहीं, उसकी राजनीति का है. 

Friday, December 9, 2016

‘तीन तलाक’ यूपी ही नहीं, लोकसभा चुनाव तक को गरमाएगा

यूपी के चुनाव के ठीक पहले तीन तलाक के मुद्दे का गरमाना साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाएगा. काफी कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया क्या होती है. यदि सभी दल इसके पक्ष में आएंगे तो इसकी राजनीतिक गरमी बढ़ नहीं पाएगी. चूंकि पार्टियों के बीच समान नागरिक संहिता के सवाल पर असहमति है, इसलिए इस मामले को उससे अलग रखने में ही समझदारी होगी.

इस मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी का बीजेपी और शिवसेना ने स्पष्ट रूप से समर्थन किया है. कांग्रेस ने भी उसका स्वागत किया है. लेकिन कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने अदालत से धर्म के मामले में दखलअंदाजी न करने की अर्ज की है. ऐसी टिप्पणियाँ आती रहीं तो बेशक यह मामला यूपी के चुनाव को गरमाएगा.

दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया है, "मैं बड़ी विनम्रतापूर्वक अदालतों से अनुरोध करना चाहूंगा कि उन्हें धर्म और धर्मों के रीति रिवाज में दखलंदाजी नहीं करना चाहिए.” दरअसल सवाल ही यही है कि यदि कभी मानवाधिकारों और सांविधानिक उपबंधों और धार्मिक प्रतिष्ठान के बीच विवाद हो, तब क्या करना चाहिए. दिग्विजय सिंह यदि कहते हैं कि धार्मिक प्रतिष्ठान की बात मानी जानी चाहिए, तब उन्हें इस सलाह की तार्किक परिणति को भी समझना चाहिए. इस प्रकार की टिप्पणियाँ करके वे बीजेपी के काम को आसान बना देते हैं.

Tuesday, December 6, 2016

बेहद अप्रत्याशित और अपने आप में अचंभा थीं जयललिता जयराम

जयललिता जयराम को आधुनिक लोकतंत्र के जबर्दस्त अंतर्विरोधी व्यक्तित्व और भारतीय राजनीति की विस्मयकारी बातों के रूप में लंबे समय तक याद किया जाएगा. इसमे दो राय नहीं कि वे जीवट वाली नेता रहीं हैं. यह भी सच है कि तमिलनाडु देश के सबसे प्रगतिशील राज्यों में शामिल है. कार्य संस्कृति और उत्पादकता के मामले में दक्षिण के इस राज्य का जवाब नहीं.

Saturday, December 3, 2016

ड्रामा बनाम ड्रामा, आज मुरादाबाद में होगी आतिशबाजी

बीजेपी की परिवर्तन यात्राओं और नरेंद्र मोदी की रैलियों ने उत्तर प्रदेश में चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के पहले ही माहौल को रोचक और रंगीन बना दिया है. इन रैलियों की मदद से नरेंद्र मोदी एक ओर वोटर का ध्यान खींच रहे हैं, वहीं दिल्ली के रंगमंच पर तलवारें भाँज रहे अपने विरोधियों को जवाब भी दे रहे हैं.
ये रैलियाँ इंदिरा गांधी की रैलियों की याद दिलाती हैं, जिनमें वे अपने विरोधियों की धुलाई करती थीं. इस बात की उम्मीद है कि आज की मुरादाबाद रैली में मोदी अपने विरोधियों के नाम कुछ करारे जवाब लेकर आएंगे. पहले सर्जिकल स्ट्राइक और फिर नोटबंदी को लेकर पार्टी पर हुए हमलों का जवाब मोदी अपनी इन रैलियों में दे रहे हैं.

Wednesday, November 9, 2016

काले धन पर सरकार का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

2014 के चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी ने कहा था कि विदेश में 400 से 500 अरब डॉलर का भारतीय कालाधन विदेशों में जमा है. विदेश में जमा काला धन अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मकड़जाल में फंस कर रह गया. इस वजह से मोदी सरकार को जवाब देते नहीं बनता है. काले धन का मसला राजनीति और गवर्नेंस दोनों से जुड़ा है. हाल में भारत सरकार ने अघोषित आय को घोषित करने की जो योजना 1 जून 2016 से लेकर 30 सितंबर 2016 तक के लिए चलाई थी वह काफी सफल रही.

योजना की समाप्ति के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया कि अघोषित आय घोषणा योजना के माध्यम से 64,275 लोगों ने 65 हजार 250 करोड़ रुपए की संपत्ति घोषित की. सवाल है कि क्या 64 हजार लोगों के पास ही अघोषित आय है? फिर भी ये अब तक की सबसे बड़ी अघोषित आय थी. पर अनुमान है कि इससे कहीं बड़ी राशि अभी अघोषित है. नोटों को बदलने की योजना आजादी के बाद काले धन को बाहर निकालने की शायद सबसे बड़ी कोशिश है. इसके मोटे निहितार्थ इस प्रकार हैं-