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Thursday, July 9, 2026

हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बदलते समीकरणों के बीच मोदी की इंडोनेशिया समेत तीन देशों की यात्रा


वैश्विक-राजनीति में आते बदलाव की रोशनी में पिछले हफ्ते जापानी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड-यात्रा के दूरगामी अर्थ हैं. यह यात्रा 11 जुलाई तक चलेगी.

पिछले साल से अमेरिकी-नीतियों में आए बदलाव के कारण एशिया के देशों ने अपनी भावी नीतियों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है. यह विचार केवल सामरिक-दृष्टि से ही नहीं है, बल्कि इसका काफी बड़ा हिस्सा आर्थिक-सामाजिक सहयोग से जुड़ा है.

पिछले हफ्ते जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची और पिछले अप्रैल में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की दिल्ली यात्राओं ने अमेरिका के दो प्रमुख एशियाई सहयोगियों, तोक्यो और सोल में अपने एशियाई संबंधों को व्यापक बनाने की तात्कालिकता को रेखांकित किया था.

प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया-यात्रा और इस दौरान चर्चाओं और समझौतों से भारत और इंडोनेशिया का एक दूरदर्शी एजेंडा झलकता है, जिसमें समुद्री सहयोग, रक्षा उद्योग में साझेदारी, आर्थिक विस्तार, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा पर जोर दिया गया है. इस यात्रा ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री पड़ोसी और रणनीतिक साझेदार के रूप में दोनों देशों के साझा दृष्टिकोण को और पुष्ट किया है.

सामरिक-महत्त्व

भारत का लगभग 40 फीसदी समुद्री व्यापार दुनिया के सबसे व्यस्त जलमार्गों में से एक, मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. और इस रणनीतिक मार्ग के प्रवेश द्वार पर स्थित देश इंडोनेशिया है.

भौगोलिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से इंडोनेशिया की इसमें बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका है. हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के संगम पर स्थित, यह विश्व के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों में से एक है.

प्रधानमंत्री की यह यात्रा, 2018 के बाद उनकी इंडोनेशिया की पहली द्विपक्षीय यात्रा है. यह भारत के समुद्री हितों को सुरक्षित करने, आर्थिक साझेदारी का विस्तार करने और तेजी से प्रतिस्पर्धी होते हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति को मजबूत करने से जुड़ी है.

उनकी 2018 की यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने एक साझा समुद्री दृष्टिकोण का अनावरण किया था, और हालिया चर्चाओं का उद्देश्य उस ढाँचे को आगे बढ़ाना है. वार्ता में आपसी समुद्री क्षेत्र जागरूकता, संपर्क और दोनों देशों के तटरक्षक बलों के बीच सहयोग बढ़ाने जैसे विषय शामिल है.

Tuesday, July 7, 2026

भारत-पाक रिश्तों में ‘अमन’ की आशा-निराशा के मोड़


भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर हाल के दो घटनाक्रमों ने ध्यान खींचा है. एक, दोनों देशों के 117 नागरिकों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शहबाज़ शरीफ के नाम लिखी गई खुली चिट्ठी. दूसरे, दोनों देशों के कुछ लोगों के बीच कोलंबो में हुए संवाद की खबर, जिसे 'ट्रैक-2 वार्ता' बताया जा रहा है. 

इस संवाद को लेकर कई तरह के कयास हैं. वहीं भारत सरकार ने किसी वार्ता में शामिल होने की खबरों का जोरदार खंडन किया है. विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा है कि इस तरह की चर्चा से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है.

जिस बैठक को ट्रैक-2 कहा जा रहा है, वस्तुतः वह आईआईएस-एनईएसए ट्रैक 1.5 साउथ एशिया सिक्योरिटी डायलॉग की सालाना बैठक का 10वाँ संस्करण था. इससे पिछली बैठक पिछले साल जुलाई में हुई थी, ऑपरेशन सिंदूर के सिर्फ़ दो महीने बाद.

डिप्लोमैटिक भाषा में ट्रैक-1, ट्रैक-2 और ट्रैक-1.5 के अलग-अलग अर्थ होते हैं. ट्रैक-1 आधिकारिक वार्ता होती है, ट्रैक 1.5 में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और ग़ैर-सरकारी प्रतिभागी दोनों शामिल होते हैं और ट्रैक-2 प्रभावशाली, लेकिन ग़ैर-सरकारी व्यक्तियों के बीच होता है. पर तीनों 'बैकचैनल' डिप्लोमेसी नहीं हैं.

Tuesday, June 30, 2026

भारत-अमेरिका ट्रेड-डील के आसार और वैश्विक-विखंडन

इलस्ट्रेशन द प्रिंट से साभार

अमेरिका के विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने कहा है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अगले साल के शुरू में भारत का दौरा कर सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार-समझौता होने के करीब है.  

फ्रांस में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान 17 जून को ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच 16 महीनों में हुई पहली मुलाकात से रिश्तों में जमी बर्फ कुछ पिघलती नज़र आ रही है.

पिछले हफ्ते अमेरिकी व्यापार प्रमुख जैमीसन ग्रीअर की भारत यात्रा के बाद भी संकेत मिले हैं कि व्यापार-वार्ता के लिए बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है, और बहुत जल्द ही समझौता हो जाएगा.

भारत उन कुछ देशों में शामिल है, जिनके साथ अमेरिका ने अभी तक व्यापार समझौता नहीं किया है. इसके पहले यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और कई आसियान देशों सहित लगभग एक दर्जन व्यापारिक साझेदारों के साथ वह समझौते कर चुका है.

Tuesday, June 23, 2026

पश्चिम एशिया में करवट-करवट, ‘कभी हाँ, कभी ना’!


पश्चिम एशिया में दीर्घकालीन शांति-स्थापना का सपना, बड़ी तेजी से कभी हाँ और कभी नामें तब्दील हो रहा है. उसकी विसंगतियाँ बार-बार दरवाज़े पर दस्तक दे रही हैं.

इसराइल की खुली बगावत ने समझौते के अंतर्विरोधों को उजागर किया है, जिसकी वजह से शुक्रवार 19 जून को, स्विट्ज़रलैंड में बातचीत नहीं हो पाई, जो दो दिन बाद रविवार को होने पर उम्मीदें पटरी पर वापस भी आ गई हैं.

समझौते के प्रारंभिक प्रारूप पर चूँकि बुधवार को ही राष्ट्रपति ट्रंप और पेज़ेश्कियान के हस्ताक्षर हो गए हैं, इसलिए अब सब कुछ केवल कयास भर नहीं है. फिर भी लेबनान पर ईरान और इसराइल के रुख के बरक्स यह काम टेढ़ी खीर जैसा लगता है.

ईरान ने कहा है, होर्मुज़ पर टोल वसूलेंगे, और ट्रंप ने कहा है, कत्तई नहीं. ट्रंप की धमकियाँ लगातार जारी हैं. ऐसी दर्जनों असहमतियाँ हैं, फिर भी लगता है कि समझौता-वार्ता जारी रहेगी.   

Tuesday, June 16, 2026

ईरान-समझौते के अटकते-खटकते निष्कर्ष


अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक-समझौता हो गया है, जिसके तहत 60 तक युद्धविराम लागू रहेगा और होर्मुज़ का रास्ता खुलेगा. समझौते पर दस्तखतों को लेकर अंतिम क्षण तक असमंजस बना रहा, पर अब बताया गया है कि दस्तखत 19 जून को होंगे.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अब हम ईरान की नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त कर देंगे, जो महीनों की बातचीत में सबसे बड़ी सफलता है.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के सरकारी टीवी का कहना है कि तेहरान ने अमेरिका को शांति समझौते को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया.

दोनों पक्षों ने समझौते का विवरण तुरंत जारी नहीं किया है, पर मीडिया में दोनों तरफ से आई बातों में अंतर्विरोध हैं. इसके अलावा ईरान के कट्टरपंथी और इसराइली सरकार अपने-अपने कारणों से नाराज़ हैं।

इस समझौते से दोनों पक्षों के बीच दोस्ती कायम नहीं हो जाएगी. सच यह है कि यह दो दुश्मनों के बीच सीमा रेखाएँ तय करने का समझौता है, जिसकी सफलता या विफलता का फैसला समय करेगा.

Wednesday, June 10, 2026

ट्रंप की पहेलियों और पुतिन के दावों के दौर में भारत


डॉनल्ड ट्रंप की फुलझड़ियों, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बयानों और चीनी गतिविधियों को एक सतह पर रखकर विचार करें, तो भारत की विदेश-नीति को लेकर कुछ सवाल बनते हैं.

एक तरफ गाहे-बगाहे ट्रंप के पहेली जैसे बयान सुनाई पड़ते हैं, वहीं अब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि भारत को अमेरिका के दबाव में आना बंद करना चाहिए. अमेरिका का सूर्यास्त और ब्रिक्स का सूर्योदय होने वाला है.

ईरान-युद्ध की वजह से मिली छूट के कारण रूस से पेट्रोलियम की खरीद में वृद्धि हुई है, पर कहना मुश्किल है कि आने वाले समय में अमेरिका इसे रोकने के लिए किस प्रकार के दबाव डालेगा.

सवाल है कि क्या वास्तव में अमेरिका के सूर्यास्त की घड़ी आ गई है? भारत क्या वास्तव में अमेरिका के दबाव में है? क्या अब हमारी दूरियाँ बढ़ने वाली हैं? ट्रंप कैसी पहेली बूझ रहे हैं? हमें वाइट हाउस प्रशासन की पल में तोला, पल में माशानीति के प्रति सचेत रहना होगा.

देखना यह भी होगा कि ब्रिक्स के मंच पर भारत-रूस और चीन के सहयोग की नई संभावनाएँ क्या हैं? वस्तुतः भारत को न सबके बीच से अपना रास्ता खुद खोजना होगा और स्वतंत्र-नीति का संचालन करना होगा. क्या ऐसा संभव है

फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि भारत किसी ध्रुवीकरण में शामिल नहीं होगा और उसके अमेरिका के साथ रिश्ते बने रहेंगे, जो इस समय भले ही कारोबारी लेन-देन तक सिमट गए हैं. दूसरी तरफ उसे न तो 'अमेरिकी-पिट्ठू' साबित किया जा सकता है और न उसके दबाव में.  

Tuesday, May 19, 2026

बदलते वैश्विक-संदर्भों में भारत की चुनौतियाँ


वैश्विक-राजनीति में हमेशा ही कोई न कोई घटना ऐसी होती रहती है, जो किसी खास इलाके के लिए महत्त्वपूर्ण होती है. पिछले हफ्ते भारत में ‘ब्रिक्स’ विदेशमंत्रियों का सम्मेलन और प्रधानमंत्री का पाँच देशों की यात्रा पर निकलना भी ऐसी ही घटनाएँ हैं.

पिछले हफ्ते भारत ने नई दिल्ली में ‘ब्रिक्स’ के विदेशमंत्रियों की बैठक की मेजबानी की और अगले सप्ताह ‘क्वॉड’ के विदेश मंत्रियों मेजबानी और महीने के अंत में भारत-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन का आयोजन भी करेगा. इनमें से हरेक आयोजन भारतीय डिप्लोमेसी के अलग-अलग पहलुओं पर रोशनी डालता है.

‘ब्रिक्स’ और ‘क्वॉड’ को अक्सर वैचारिक रूप से विरोधी संगठनों के रूप में चित्रित किया जाता है. ‘ब्रिक्स’ को पूर्वी देशों द्वारा पश्चिमी वर्चस्व को उखाड़ फेंकने के साधन के रूप में, जबकि ‘क्वॉड’ को चीन के विरुद्ध एक रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में. इस प्रकार के वर्णन दोनों समूहों की अतिरंजना करते हैं.

‘ब्रिक्स’ में टकराव

‘ब्रिक्स’ में ऐसे देश शामिल हैं, जिनके बीच प्रत्यक्ष संघर्ष हैं. ‘क्वॉड’, अपने बढ़ते सहयोग के बावजूद, औपचारिक गठबंधन नहीं है. भारत ने तो ‘क्वॉड’ को सुनियोजित सुरक्षा सहयोग के मंच में बदलने का हमेशा विरोध किया है.

पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की चीन-यात्रा के पीछे भी हमारे लिए कुछ संकेत छिपे हैं. उधर ‘ब्रिक्स’ के सम्मेलन में ईरान और यूएई के मतभेद उभर कर आए, जिनके कारण संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका.

अमेरिका और चीन की वार्ता के केंद्र में भारत भले ही नहीं था, पर दोनों के रिश्ते सुधरे, तो उसका, भारत-अमेरिका और भारत-चीन रिश्तों पर भी प्रभाव पड़ेगा. सवाल है कि क्या रिश्ते सुधरे?

Wednesday, May 6, 2026

अमीरात के हटने से ‘ओपेक’ में दरार का अंदेशा


पश्चिम एशिया की लड़ाई और करवट लेती वैश्विक-व्यवस्था के दौर में यूएई का ओपेकको छोड़ना, इस बात का संकेत है कि पश्चिम एशिया में केवल तेल की राजनीति में ही नहीं, बल्कि भू-राजनीति में भी बदलाव आ रहा है.

इस परिघटना को खाड़ी देशों की आपसी प्रतिद्वंद्विता, सऊदी अरब के साथ बिगड़ते रिश्तों और अमेरिका-इसराइल की नीतियों के परिप्रेक्ष्य में भी पढ़ना होगा.

पहली नज़र में यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के लिए फायदेमंद लगता है, जिन्हें मध्यावधि चुनाव से पहले तेल की कीमतों में कमी की सख्त जरूरत है. ऐसा तभी होगा, जब तेल के दाम गिरेंगे.

लंबे समय से ट्रंप के लिए ओपेकबड़ी समस्या रहा है; उन्होंने बार-बार तेल की कीमतों में वृद्धि के लिए इसे जिम्मेदार ठहराया है. ओपेक से अलग होकर अमीरात ट्रंप का प्रिय बन सकता है.

मोटे तौर पर, यह अमीरात की आत्मकेंद्रित विदेश-नीति की शुरुआत है.  ओपेक कई देशों के सामूहिक का प्रतिनिधि समूह है. अमीरात के फैसले से वह फौरन टूटेगा नहीं, पर कमज़ोर ज़रूर होगा.

इसके पहले भी कुछ देश इस समूह से हटे हैं, पर यूएई इसके सबसे महत्त्वपूर्ण भागीदारों में से एक है, जिसका असर होगा.

अमीरात की नाखुशी

समूह के सदस्यों के लिए मुकर्रर उत्पादन कोटा से अमीरात नाखुश था. वे चाहते हैं कि हमें जितना चाहें उतना खनिज तेल पंप करने की अनुमति होनी चाहिए. उन्हें लगता है कि तेल के कारोबार का अंत होने वाला है, इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा तेल बेचकर कमाई कर ली जाए और उससे भावी अर्थव्यवस्था की नींव डाली जाए.

बेशक इससे तेल के दामों में कमी आएगी, पर अब उत्पादन रोका, तो फँस जाएँगे, क्योंकि दुनिया तेजी से वैकल्पिक ऊर्जा-स्रोतों पर जा रही है और अचानक तेल की माँग डूब जाएगी.

Tuesday, April 14, 2026

‘युद्धविराम’ जो है ही नहीं!


पश्चिम एशिया की लड़ाई में युद्धविराम के बाद इस्लामाबाद में हुई पहली बातचीत के सफल नहीं होने का मतलब यह भी नहीं है कि वह विफल हो गई. ऐसे मसले एक दिन की वार्ता से हल होते भी नहीं हैं.

अब सवाल पूछा जा सकता है कि तब क्या दो हफ्ते बाद लड़ाई फिर से उसी बिंदु से शुरू हो जाएगी, जहाँ पर वह रुकी थी? कोई नहीं कह सकता कि अब क्या होगा. सबसे बड़ी बात है कि लड़ाई रुकी नहीं है, बल्कि उसका तरीका बदला है.

लेबनान में तो लड़ाई चल ही रही है. और ट्रंप की घोषणा के बरक्स अमेरिकी सेंटकॉम ने होर्मुज की नाकाबंदी शुरू कर दी है, जिसके बाद दोनों देशों की सेनाएँ आमने-सामने हैं. यह बात बड़े खतरनाक परिदृश्य को जन्म दे रही है.  

दूसरी तरफ बातचीत भी रुकी नहीं है, किसी न किसी स्तर पर चल ही रही है. ऐसे मसलों के फैसले सोशल मीडिया की पोस्टों और मीडिया के विश्लेषणों से तय नहीं होते हैं, बल्कि बैकरूम वार्ताओं से ही तय होते हैं.

इन बातों के मद्देनज़र तीन-चार प्रत्यक्ष मुद्दे सामने आ चुके हैं, परोक्ष मुद्दे अक्सर कभी सामने नहीं आते. 

हरमूज़ की नाकाबंदी

इस्लामाबाद वार्ता खत्म होने के बाद अमेरिकी सेना ने रविवार को कहा कि वह ‘ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश करने या वहाँ से निकलने वाले’ किसी भी जहाज की नाकाबंदी करेगी. उसके पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग हरमूज़ (या होर्मुज) को पूरी तरह से अवरुद्ध करने की घोषणा की थी.

अब यह नाकाबंदी शुरू हो चुकी है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया पर जारी एक बयान में कहा था कि ईरानी बंदरगाहों पर नाकाबंदी सोमवार को पूर्वी समयानुसार सुबह 10 बजे (यानी भारतीय समयानुसार रात 8.30 बजे) से शुरू होगी. 

इसमें यह भी कहा गया है कि अमेरिकी सेनाएं होर्मुज जलडमरूमध्य से गैर-ईरानी बंदरगाहों तक आने-जाने वाले जहाजों के लिए नौवहन की स्वतंत्रता में बाधा नहीं डालेंगी. एक तरह से यह लड़ाई जारी रहने की घोषणा ही है.

Wednesday, April 1, 2026

कहाँ जाकर रुकेगा पाक-अफ़ग़ान टकराव?


पश्चिम एशिया में युद्ध भड़क के बाद हमारा ध्यान यूक्रेन और अफ़ग़ानिस्तान से हट गया, जबकि वहाँ भी लड़ाइयाँ चल रही हैं. ईरान की लड़ाई रुक भी जाएगी, पर लगता है कि यूक्रेन की लड़ाई और पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान टकराव जल्द खत्म नहीं होगा.

पाकिस्तान ने पिछली 25 मार्च को कहा कि उसकी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ अभियान फिर से शुरू कर दिया है. क्या वजह है कि पाकिस्तान ने इस समय बड़ा फौजी अभियान चलाने का फैसला किया है? क्या इसका संबंध भी ईरान-युद्ध से है? क्या इसके पीछे अमेरिका की सहमति या उसकी ही योजना है?

ऐसे कुछ सवाल भी ज़ेहन में आते हैं. जो बाइडेन के कार्यकाल में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान के मामले में भारत को महत्त्व दिया था, पर इस समय ट्रंप प्रशासन का पाकिस्तान पर पूरा भरोसा है. ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी ने कहा है कि तालिबान हमलों के खिलाफ आत्मरक्षा करने का पाकिस्तान को पूरा अधिकार है.

अस्पताल पर हमला

हाल में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में एक नशा मुक्ति केंद्र पर पाकिस्तानी हवाई हमले में 400 से अधिक लोग मारे गए थे. पाकिस्तान का कहना है कि हमने ये हमले ‘फौजी ठिकानों और आतंकवादी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाते हुए’ किए थे.

बहरहाल ईद के मौके पर तुर्की, कतर और सऊदी अरब के अनुरोध पर युद्ध-विराम की घोषणा की गई थी. इसके बाद इस्लामाबाद में विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक ब्रीफिंग में प्रवक्ता ताहिर अंदराबी ने कहा, यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो जाते.

Thursday, March 26, 2026

युद्ध के दुष्प्रभावों से निपटने को तैयार भारत


जिन लोगों को आज से तीन दशक पहले की बातें याद हैं, उन्हें गैस एजेंसियों, सरकारी राशन और चीनी की दुकानों के आगे लगी कतारें भी याद होंगी. पश्चिम एशिया के युद्ध के साथ कुछ यादें ताज़ा हो गई हैं.

उसके पहले चीन युद्ध के बाद देश में खाद्य संकट पैदा हुआ था और हमें काफी समय तक अमेरिकी गेहूँ खाना पड़ा था. शायद वह काफी पुरानी बात हो गई, पर कोविड महामारी तो हाल की बात है, जब शहर-शहर गाँव-गाँव लॉकडाउन के कारण रोज़ी-रोज़गार पर तो संकट आया, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता भी चुनौती बन गई.

पश्चिम एशिया की लड़ाई ने हमें एकबार फिर से चौंकाया है. आपदाएँ किसी भी वक्त आ सकती हैं, पर भारत की विशेषता है कि वह संकटों का सामना आसानी से कर लेता है. आपको समझना ही है, तो इस समय अपने पड़ोसी देशों की स्थिति पर एक बार नज़र ज़रूर डालें.

कहना मुश्किल है कि लड़ाई जल्द खत्म होगी या देर से होगी. इसलिए मानकर चलिए कि समस्याएँ नए रूप में भी आ सकती है. ऐसे में आपके धैर्य, अनुशासन और एकजुटता की सबसे बड़ी ज़रूरत है. भाईचारा बनाकर रखें. बेशक संकट आया है, तो दूर भी होगा.

प्रधानमंत्री का बयान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई को लेकर संसद के दोनों सदनों में भारत के सामने खड़ी 'अप्रत्याशित चुनौतियों' का ज़िक्र करते हुए कहा है कि हम उनका सामना करने में समर्थ हैं. सच यह है कि देश अतीत में ऐसे संकटों का सफलतापूर्वक सामना कर चुका है.

अलबत्ता प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि इस टकराव का असर लंबे समय तक बने रहने की आशंका है. ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि महामारी और युद्ध का आगमन आगे-पीछे हुआ है. कोविड के दौरान भी सप्लाई चेन में संकट पैदा हुआ था और देश ने एकजुटता से उसका मुकाबला किया.

भारत में बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, गैस और उर्वरक जैसी अनेक ज़रूरी चीजें होर्मुज़ जलसंधि मार्ग से आती हैं. युद्ध के बाद से ही वहाँ से जहाज़ों का आना-जाना बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है. बावजूद इसके, हमारी सरकार का प्रयास रहा है कि पेट्रोल-डीज़ल और गैस की सप्लाई बहुत ज़्यादा प्रभावित न हो.

Wednesday, March 18, 2026

ईरान-युद्ध और भारत का ‘डिप्लोमैटिक-कैलकुलेशन’


पश्चिम एशिया की लड़ाई अब तीसरे हफ्ते में है. इसके साथ जुड़े भारत के गहरे हित नज़र आने लगे हैं. वहाँ रहने वाले एक करोड़ भारतीयों के अलावा ऊर्जा आवश्यकताओं, पूँजी निवेश और रक्षा-तकनीक से जुड़े मसलों के कारण भी हमारी दिलचस्पी इस इलाके में रही है और रहेगी.

हमारी विदेश-नीति, सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता और नैतिकता के अलावा सकल राष्ट्रीय हितों से निर्धारित होती है. यह गणित यानी कैलकुलेशन है, जो दीर्घकालीन हितों पर आधारित होता है.  

इस गणित का सहारा सभी देश लेते हैं, और इसी गणित का परिणाम है कि जबर्दस्त फायर वर्क्स के बीच से पेट्रोलियम और एलपीजी के कुछ टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य पार करते हुए भारत आने में कामयाब हुए हैं. यही गणित हमें मुखर होने और कई बार खामोश रहने का सुझाव देता है.

हाल में अमेरिकी प्रशासन ने रूसी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को 30 दिन के लिए निलंबित करने का निर्णय ऐसे ही गणित के तहत ही किया है. ट्रंप के इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार को आकार देने में तेल समृद्ध रूस के महत्त्व के प्रति वाशिंगटन की व्यावहारिक समझ व्यक्त होती है.

Tuesday, March 10, 2026

कब और कैसे खत्म होगा ‘शह और मात’ का खेल?

 


पश्चिम एशिया में पहले से इस बात का इमकान था कि लड़ाई शुरू होने वाली है, पर आज कहना मुश्किल है कि वह कब और कैसे खत्म होगी. चौतरफा बयानबाज़ी से लगता है कि वह आसानी से तो खत्म नहीं होगी.

कुछ भरोसा बैकरूम-विमर्श पर है, जो किसी न किसी स्तर पर चल रहा है. इसमें चीन ने पहल की है. चीनी विदेशमंत्री वांग यी ने अपने 'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' के तहत मध्यस्थता की पेशकश की है.  

'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा अप्रैल 2022 में प्रस्तावित एक सुरक्षा अवधारणा है, जो अविभाज्य सुरक्षा के सिद्धांत पर आधारित है. इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के नेतृत्व वाली व्यवस्था की जवाबी वैश्विक सुरक्षा का ढाँचा तैयार करना है.

गहरी दरारें

इसके पहले भी इस इलाके में 1991 और 2003 में लड़ाई हुई है, पर सही मानों में असली खाड़ी युद्ध इस बार ही हुआ है. फारस की खाड़ी से सटे सभी आठ देश, साथ ही आधा दर्जन से ज़्यादा दूसरे देश भी इसमें शामिल हैं.

लड़ाई रुकी भी, तो इस इलाके की शक्ल और भावनात्मक रिश्ते पहले जैसे नहीं रहेंगे. अब्राहमिक धर्मों और समाज की ऐतिहासिक दरारें और गहरी होंगी.

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने शनिवार को कहा कि हम अब अपने पड़ोसी देशों को तब तक निशाना नहीं बनाएँगे, जब तक कि हमले उनके क्षेत्र से न किए जाएँ. बावज़ूद इसके हमले अभी ज़ारी हैं. शायद पेज़ेश्कियान की बात अपने देश में उतननहीं मानी जाती, जितनी हम समझते हैं.

Tuesday, February 24, 2026

अपने ही ‘चक्रव्यूह’ में घिरने लगा ट्रंप-प्रशासन


अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ़ को अवैध घोषित करके राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की योजना को जहाँ बड़ा धक्का पहुँचाया है, वहीं अमेरिका और दुनिया की अर्थव्यवस्था को लेकर कई तरह की अनिश्चितताओं को जन्म भी दे दिया है.  

फैसले का एक निहितार्थ यह भी है कि वृहत स्तर पर अमेरिकी लोकतंत्र दुनिया पर एकपक्षीय राज करने का समर्थक नहीं है. और यह भी कि व्यापार-समझौते दोतरफा साझेदारी से तय होने चाहिए, एकतरफा अकड़ से नहीं. 

धक्का लगने के बावज़ूद ट्रंप की आक्रामकता में कमी नहीं आई है. उन्होंने फौरन एक नए आधार पर 10 प्रतिशत सार्वभौमिक टैरिफ की घोषणा कर दी, जिसे बाद में बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया है. पर इससे उनकी आर्थिक-रणनीति का लक्ष्य पूरा नहीं होगा.

ट्रंप के आर्थिक एजेंडा के कारण संघीय बजट में एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का छेद पैदा हो गया है. पिछले साल पदभार संभालने के बाद उन्होंने आयकर में भारी कटौती कर दी थी, जिसे लेकर अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी थी कि पहले से ही कर्ज़ में डूबे देश को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.

जवाब में ट्रंप प्रशासन ने व्यापक रणनीति तैयार की, जिसके तहत शेष विश्व से अमेरिकी बाजारों में आने वाली सामग्री पर भारी टैरिफ लगाना शामिल है. इससे दुनियाभर के देशों की आर्थिक-गतिविधियाँ प्रभावित होने के अलावा कुछ बोझ निम्न और मध्यम आय वाले अमेरिकियों पर भी पड़ा, क्योंकि ज़रूरत की चीजें महँगी होने लगीं.   

Wednesday, February 18, 2026

बांग्लादेश की ‘लोकतांत्रिक’ पेचीदगियाँ


शेख हसीना के अपदस्थ होने के 18 महीने बाद, बांग्लादेश में जन-प्रतिनिधि सरकार की स्थापना हो गई है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की भारी जीत के बाद अब वहाँ स्थिरता की उम्मीदें हैं.  

आम चुनाव के साथ संवैधानिक-सुधारों के लिए जनमत संग्रह भी हुआ है. तमाम बदलावों को जनता ने स्वीकार कर लिया है, पर असल सवाल है कि वास्तव में बांग्लादेश का लोकतंत्र कैसा होगा? वहाँ क्या शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण की व्यवस्था कायम हो पाएगी?

नए सांसदों ने शपथ ले ली है, लेकिन संवैधानिक सुधार परिषद को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई है क्योंकि बीएनपी सदस्यों ने सांसदों के रूप में शपथ तो ले ली, लेकिन प्रस्तावित परिषद के सदस्यों के रूप में शपथ नहीं ली. उन्होंने कहा कि संविधान में इस परिषद के लिए पद की शपथ लेने का कोई प्रावधान नहीं है.

यह सब मुहम्मद यूनुस की अस्थायी सरकार की देखरेख में हुआ, जो अपनी घोषणाओं के बावज़ूद बढ़ते सांप्रदायिक उन्माद और आर्थिक बदहाली को रोक नहीं पाई. भारत से रिश्ते बिगाड़ने में भी उसने कसर नहीं छोड़ी.  

दक्षिण एशिया में समावेशी-आधुनिकता और संकीर्ण सांप्रदायिक-प्रवृत्तियों का टकराव बड़ी समस्या है. भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश में होने वाली घटनाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. तीनों के साझा अतीत में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों बातें हैं.

Wednesday, February 11, 2026

ईरान से झगड़े क्या निपटा पाएँगे ट्रंप?


दुनिया भर में धूम-धड़ाके के बाद क्या अब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ईरान के साथ अपने संघर्ष को खत्म करने जा रहे हैं? झगड़े निपटाने के माने क्या? ईरान की हार या बराबरी का समझौता?

बेशक, टकराव खत्म हुआ, तो इस इलाके की बड़ी समस्या खत्म हो जाएगी,  पर क्या ऐसा होगा? पिछले शुक्रवार को ओमान में हुई अप्रत्यक्ष-वार्ता के पहले दौर के बाद दोनों पक्षों ने इसे बहुत अच्छी शुरुआतबताया है.

यह बैठक मिस्र, तुर्की और खाड़ी देशों कोशिशों से तय हुई थी. इन देशों में से कोई भी क्षेत्रीय युद्ध नहीं चाहता. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप प्रशासन भी लड़ाई टालने के लिए ईरान के साथ बात करना चाहता है.

हालाँकि दोनों पक्षों ने संकेत दिया है कि बातचीत के दौर भविष्य में भी होंगे, पर यह स्पष्ट नहीं है कि वार्ता कैसे आगे बढ़ेगी. अमेरिका के काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अध्यक्ष माइकल फ्रोमैन के अनुसार, भविष्य की बातचीत में कई दिक्कतें आएँगी. ट्रंप का मनमौजी स्वभाव है और तयशुदा सौदों को रद्द करने की उनकी आदत है.  

Wednesday, February 4, 2026

पश्चिम एशिया की भूल-भुलैया में भारत


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस महीने संभावित इसराइल-यात्रा से पहले, पिछले शनिवार को अरब विदेश मंत्रियों के साथ दूसरी बैठक की मेजबानी करके भारत ने स्पष्ट कर दिया कि पश्चिम एशिया में हमारी गहरी दिलचस्पी है और इस इलाके के आर्थिक-विकास में हम भी भागीदार हैं.

केवल इस इलाके की बात ही नहीं है, बल्कि विश्व-राजनीति में भी भारत की सक्रिय भूमिका बढ़ने जा रही है. यूके, ईयू और अमेरिका के साथ व्यापार और दीर्घकालीन नीतिगत समझौते होने के बाद यह स्पष्ट होता है कि भारत की अर्थव्यवस्था पश्चिमी देशों के साथ ज्यादा बड़े स्तर पर जुड़ने जा रहा है.

बेहतर तरीके से वैश्विक-संतुलन बनाने में भारत भी महत्त्वपूर्ण किरदार निभाएगा. अरब विदेशमंत्रियों की बैठक की पृष्ठभूमि में डॉनल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस के गठन और उसमें शामिल होने के लिए भारत को प्राप्त आमंत्रण और उसपर चुप्पी पर भी ध्यान देना होगा. अकसर लोगों को लगता है कि भारत ने प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. पश्चिम एशिया की जटिलता को देखते हुए तीखी प्रतिक्रियाएँ संभव नहीं है. संज़ीदा डिप्लोमेसी से ऐसी उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए.

ध्यान दें कि गज़ा क्षेत्र के पुनर्निर्माण में भारत के लोगों और कंपनियों को भी काम मिलेगा. दूसरी तरफ ईरान में चल रहे आंदोलन और उसे लेकर अमेरिकी धमकियों पर भी हमें निगाहें रखनी होंगी. विदेश-नीति केवल नैतिक-आधारों पर नहीं चलती हैं. वे राष्ट्रीय हितों पर आधारित होती है. पश्चिम एशिया की डगर आसान नहीं है, क्योंकि वहाँ हर कदम पर जोखिम हैं, फिर भी भारतीय डिप्लोमेसी वहाँ संतुलित और शालीन तरीके से आगे बढ़ रही है.

Wednesday, January 28, 2026

‘ट्रंप-टैंट्रम’ के बाद यूरोप से ‘मदर ऑफ ऑल डील्स!’

गणतंत्र दिवस की परेड एक तरफ भारत की सांस्कृतिक-विविधता और सामरिक शक्ति का प्रदर्शन करती है, वहीं विदेश-नीति की झलक भी पेश करती है. कम से कम इस साल ऐसा ही हुआ है.

इस साल मुख्य अतिथि के रूप में यूरोपीय संघ को बुलाया गया. यह पहला मौका था, जब 27 देशों के संघ को मुख्य अतिथि बनने का आमंत्रण दिया गया. 27 जनवरी को नई दिल्ली में यूरोपीय संघ के साथ एक व्यापार समझौते पर दस्तखत हो गए.

ईयू का प्रतिनिधित्व, यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय कौंसिल के प्रेसीडेंट एंटोनियो कोस्टा ने किया. उर्सुला वॉन डेर लेयेन, जहाँ जर्मनी की रक्षामंत्री रह चुकी हैं, वहीं भारतीय मूल के कोस्टा पुर्तगाल के पूर्व प्रधानमंत्री हैं.

स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक फोरम में शिरकत करते हुए उर्सुला वॉन डेर लेयेन कह चुकी हैं कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ होने जा रही है.

रक्षा और रणनीतिक भी

यह केवल व्यापार समझौता ही नहीं होगा, बल्कि रक्षा और दूसरे रणनीतिक मसलों पर भी सहमतियाँ बनने जा रही हैं. उर्सुला ने कहा कि यूरोप, अरब प्रायद्वीप के रास्ते महाद्वीप को भारत से जोड़ने वाले एक नए व्यापारिक गलियारे में निवेश करेगा.

Wednesday, January 21, 2026

अमेरिका ने ईरान पर हमले से हाथ क्यों खींचे?

ईरान के सेनाधिकारी

ईरान में करीब तीन हफ्ते से ज्यादा समय तक चला झंझावात पिछले हफ्ते  धीमा पड़ गया. इसके पीछे कई तरह के कयास हैं. यह किसी नए तूफान से पहले का ठहराव है या स्थायी शांति की तैयारी. या फिर साबित यह हुआ कि ट्रंप के बादल गरजते ज्यादा है, बरसते कम है.  

मोटे तौर पर लगता है कि दोनों पक्षों ने हाथ खींचे हैं. खबरें हैं कि ईरानी शासन ने बड़े पैमाने पर दमन करके प्रदर्शनकारियों के हौसले पस्त कर दिए हैं. देश में कई सौ लोगों को सामूहिक रूप से फाँसी देने की तैयारी थी.

फाँसियाँ होतीं, तो टकराव बढ़ जाता, जिससे घबराकर ईरान ने हाथ खींच लिए. ट्रंप ने कहा था, फाँसियाँ हुईं तो अमेरिका हमला बोलेगा. इस बात की पुष्टि करते हुए वॉशिंगटन पोस्ट ने वाइट हाउस के एक अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट छापी है, कि ईरान सरकार के एक संदेश के बाद 'राष्ट्रपति ट्रंप ने हमले के फ़ैसले को रद्द कर दिया.'

अख़बार के मुताबिक़, ईरानी विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची की ओर से ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ़ को भेजे गए संदेश ने माहौल को शांत किया और संकट को टाला. संदेश में कहा गया था कि ईरान सरकार का प्रदर्शनकारियों को फाँसी देने का कोई इरादा नहीं है.

अख़बार ने राजनयिक के हवाले से कहा है कि सऊदी अरब, क़तर, ओमान, मिस्र और यूएई जैसे आसपास के कुछ देशों ने वाइट हाउस से अनुरोध किया कि ईरान पर हमला नहीं किया जाए. जेरूसलम पोस्ट की खबर के अनुसार इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी ट्रंप से कहा कि जल्दबाज़ी में हमला न करें. 

सेना तैयार नहीं थी

दूसरी तरफ ऐसी खबरें भी आईं कि गुरुवार की शाम होते-होते स्पष्ट होने लगा था कि पारा ठंडा हो रहा है. अमेरिका ने क़तर में अपने अल-उदैद एयर बेस पर सुरक्षा अलर्ट का स्तर घटा दिया.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक सूत्र के हवाले से खबर दी कि बुधवार को जिन अमेरिकी लड़ाकू विमानों को इस बेस से हटा लिया गया था, वे अब धीरे-धीरे वापस लौट रहे हैं.

लंदन के अख़बार 'द टेलीग्राफ़' ने ख़बर दी कि अमेरिकी सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी. इस ख़बर के मुताबिक़ ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा टीम को निर्देश दिया कि वे कार्रवाई तभी करें, जब निर्णायक प्रहार की गारंटी दे सकें.

अधिकारियों ने कहा कि वे ऐसी गारंटी नहीं दे सकते और यह भी कहा कि फौजी कार्रवाई करेंगे, तो बड़ी लड़ाई शुरू हो सकती है, जो हफ़्तों तक चल सकती है.

अखबार ने एक और खबर में लिखा, ट्रंप का कोई भरोसा नहीं. उन्होंने मंगलवार को प्रदर्शनकारियों से कहा, मदद रास्ते में है. उसके 24 घंटे बाद वह यह कहते हुए पीछे हट गए कि ईरान सरकार अब अपने विरोधियों को मार नहीं रही है, और गिरफ्तार लोगों को फाँसी नहीं दी जाएगी.

बहरहाल अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन के कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को इस तरफ भेजा है, जिससे लगता है कि वह दबाव बनाकर रखेगा.   

ट्रंप पर आरोप

शनिवार को ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामनेई ने माना कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई हजार लोग मारे गए हैं. अभी तक ईरान सरकार कह रही थी कि आंदोलन की अफवाहें हैं, वास्तविकता कम. अब मौतों को लेकर आधिकारिक स्वीकृति उसकी भयावहता को बताती है.

आयतुल्ला खामनेई ने देश में हताहतों, विनाश और उथल-पुथल के लिए डॉनल्ड ट्रंप को सीधे दोषी ठहराया. उन्होंने कहा, ईरानी राष्ट्र को हुई क्षति और बदनामी के लिए हम उन्हें अपराधी मानते हैं.

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, इस उत्पात में अमेरिकी राष्ट्रपति व्यक्तिगत रूप से शामिल थे. उन्होंने प्रदर्शनकारियों को संदेश भेजा कि हम आपको फौजी मदद देंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति खुद इस देशद्रोह में शामिल हैं. यह आपराधिक कृत्य हैं.

खामनेई के इस आरोप के जवाब में ट्रंप ने फिर कहा कि ईरान को आयतुल्ला के लंबे शासन को समाप्त करते हुए नए नेतृत्व की तलाश करनी चाहिए. वे देश के विनाश और जनता के विरुद्ध ऐसी हिंसा के प्रयोग के दोषी हैं, जैसी पहले कभी नहीं हुई.

अमेरिका ईरान पर सैनिक कार्रवाई करेगा या नहीं, इसके बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा, फिलहाल उन्होंने अच्छा काम यह किया है कि 800 से अधिक लोगों को फाँसी देने का फैसला रोक दिया है.

कनेक्टिविटी बहाल

अब खबरें आ रही हैं कि ईरान ने आंशिक रूप से इंटरनेट कनेक्टिविटी बहाल कर दी. अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी मेहर ने कहा कि कुछ उपयोगकर्ता ऑनलाइन वापस आ गए हैं, एसएमएस सेवाएँ फिर से शुरू हो गई हैं.

इंटरनेट निगरानी समूह नेटब्लॉक्स ने कहा कि 200 घंटे से अधिक समय तक लगभग पूरी तरह बंद रहने के बाद कनेक्टिविटी कुछ बेहतर हुई है, लेकिन यह सामान्य के लगभग दो प्रतिशत पर है.

ईरानी विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची ने कहा है कि विदेश से से निर्देशित हो रहे आतंकवादी अभियानों को रोकने के मक़सद से इंटरनेट को बंद किया गया है, पर उन्होंने या सरकार ने यह नहीं बताया है कि इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह कब वापस आएँगी.

मीडिया रिपोर्टों से ऐसा संकेत भी मिला है कि ईरानी अधिकारी इसे स्थायी रूप से प्रतिबंधित करने या चीन की तरह नियंत्रित करने की योजना बना रहे हैं.

ईरान इस समय दुनिया की सबसे खराब मुद्रास्फीति का सामना कर रहा है, जो 50 प्रतिशत से अधिक और खाद्य सामग्री के मामले में 70 प्रतिशत है. उसकी मुद्रा डॉलर के मुकाबले 80 प्रतिशत से अधिक गिर गई है.

आंदोलन का क्या होगा?

सवाल है कि क्या ईरान के भीतर आंदोलन चलेगा या खत्म हो जाएगा? अमेरिका के तमाम पर्यवेक्षकों का कहना है कि अमेरिका को सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, बल्कि आंदोलन के प्रभाव को देखना चाहिए. ट्रंप प्रशासन को यह नहीं मान लेना चाहिए कि ईरान सरकार इस विस्फोट को दबा लेगी.

आंदोलन और हिंसा के बाद स्थितियाँ चाहे, जिस दिशा में जाएँ, राज-व्यवस्था वैसी ही नहीं रहेगी, जैसी अभी तक चल रही थी. इसके पहले 1953 और 1979 में ईरान ने दो बड़े बदलाव देखे

1979 के पिछले बदलाव में ईरान के लोग तीन बड़े आदर्शों को लेकर खड़े हुए थे: आज़ाद राज व्यवस्था, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और सामाजिक न्याय. उस क्रांति को फ्रांस की राज्यक्रांति, रूस की बोल्शेविक क्रांति और चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद विश्व की सबसे महान क्रांतियों में गिना जाता है.

रसूख में कमी

पिछले कुछ वर्षों से देश में सरकारी रसूख कम हुआ है. विरोध के स्वर तेज हुए हैं. सितंबर 2022 में महिलाओं के लिए देश के ड्रेस कोड का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार ईरानी-कुर्द महिला महसा अमिनी की हिरासत में मौत के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए. उनके दमन के लिए सरकार ने सख्ती का सहारा लिया था.

क्या अब वही सख्ती काम करेगी? खबरें हैं कि लोगों के मन से अब डर निकल गया है. पर क्या वे निर्णायक जीत हासिल कर पाएँगे? या सरकारी दमन के भय से पूरी तरह दब जाएँगे? सरकार के समर्थन में भी रैलियाँ हुई हैं.

ज्यादा बड़ा सवाल है कि क्या सत्ता परिवर्तन होगा? मान लिया अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप से परिवर्तन हो भी जाए, तो उसके बाद क्या होगा? अमेरिका दूध का जला है. क्या गारंटी है कि ईरान में भी वैसी ही अराजकता पैदा नहीं होगी, जैसी इराक, लीबिया और अफगानिस्तान में हो गई?

सरकारी कामयाबी?

दूसरी तरफ क्रूरता के सहारे विरोध को दबाने में सरकार कामयाब हो भी जाए, तब भी उसके पास आम ईरानियों के जीवन स्तर में सुधार करने और महिलाओं के बीच जन्म लेते विरोध का कोई व्यावहारिक समाधान नहीं है. इस आंदोलन के छींटे कमोबेश पश्चिम एशिया के कुछ और देशों पर भी पड़ेंगे.  

ईरान में सर्वोच्च सत्ता 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता आयतुल्ला खामनेई के हाथों में है. वे अपने सबसे वफादार बलों से घिरे हुए हैं, जिनमें इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर भी शामिल है. उसका ईरान की अर्थव्यवस्था, राजनीति और सुरक्षा पर दबदबा है.

आंदोलनकारियों का कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं है. इस दौरान पुरानी राजशाही के पक्ष में भी नारे लगे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप से ईरान में हस्तक्षेप करने का आह्वान करने वालों में निर्वासित पूर्व युवराज रज़ा पहलवी भी शामिल हैं, जिनके पिता को 1979 की इस्लामी क्रांति में ईरान के शाह के पद से हटा दिया गया था.

शांतिपूर्ण परिवर्तन?

समझदार लोगों का मानना ​​है कि स्थायी परिवर्तन तभी आ सकेगा, जब वह शांतिपूर्ण होगा, और देश के भीतर से ही हो. लोगों में बदलाव की इच्छा है, पर कैसा बदलाव? कुछ लोग परिचित या पुराने प्रतीकों की ओर लौट रहे हैं. सिंह और सूर्य वाले ईरान के क्रांति-पूर्व ध्वज एक बार फिर सड़कों पर दिखाई देने लगे हैं.

पहलवी ने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया है कि वे ईरान में राजशाही को बहाल नहीं करना चाहते. उनका दावा है कि वे एक ऐसे परिवर्तन का नेतृत्व करना चाहते हैं जो ईरान को लोकतंत्र की ओर ले जाए.

दो हफ्ते पहले, जब देश की मुद्रा के तीव्र अवमूल्यन के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे थे, तब अधिकारियों ने उनकी शिकायतों को जायज़ माना था, पर अब वे उन्हें आतंकवादी बता रहे हैं. पिछले दो हफ्तों में, शहरों के बाज़ारों और विश्वविद्यालयों में छोटे-छोटे प्रदर्शन एक बड़े जनांदोलन में बदल गए हैं.

सरकारी समझदारी

28 दिसंबर को, तेहरान में आयातित इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वाले व्यापारी देश की करेंसी के अचानक और तेज़ अवमूल्यन से हैरान रह गए. उन्होंने अपनी दुकानें बंद कर दीं और हड़ताल पर चले गए, और बाज़ार के अन्य व्यापारियों से भी उनका साथ देने का आह्वान किया.

सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया त्वरित और समझौते वाली थी. राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने व्यापारियों से बातचीत करने का वादा किया. आम लोगों की तकलीफों को कम करने के लिए हरेक के बैंक खाते में लगभग सात डॉलर का नया भत्ता जमा किया गया, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ. चीजों की कीमतें और बढ़ गईं और प्रदर्शनों की लहर और तेज़ हो गई.

पश्चिम एशिया के अन्य देशों के मुकाबले ईरानी जनता, सुशिक्षित, जागरूक और अनुशासित है. यह दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में एक है.

ईरानी क्रांति

1979 की ईरानी क्रांति ने पहलवी राजवंश का अंत किया और आयतुल्ला खुमैनी को नए धर्मतंत्र का प्रमुख बनाया. वहाँ सर्वोच्च नेता धार्मिक इमाम होते हैं, पर शासन एक निर्वाचित राष्ट्रपति चलाता है.

उस क्रांति का उद्देश्य अमेरिकी प्रभुत्व को समाप्त करना, राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देना और संपदा के वितरण के लिए एक निष्पक्ष प्रणाली स्थापित करना था.

क्रांति के 47 वर्षों के बाद, ईरान के बहुत से नागरिक नई व्यवस्था को उन आदर्शों के वाहक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विफलता के रूप में देखते हैं. इस दौरान राजनीतिक और नागरिक स्वतंत्रताएँ कम हो गईं. उनकी जीवनशैली और व्यक्तिगत पसंद भी निगरानी और दमन की शिकार हो गई.

नए ईरान ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ शुरू से ही रंजिश मोल ले ली. अपने नाभिकीय-कार्यक्रम के कारण वह विवादों में घिर गया और फिर इराक, लेबनॉन, सीरिया और फलस्तीन में पैर फँसा दिए. इससे उसकी अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा.

पश्चिमी हस्तक्षेप

अंतिम बादशाह शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी अमेरिका और इसराइल के करीबी सहयोगी थे. तख्त पर उनकी वापसी भी अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से हुई थी, जिन्होंने 1953 में ईरान के लोकतांत्रिक पद्धति से चुने गए प्रधानमंत्री मुहम्मद मुसद्देक़ का तख्ता-पलट कराया था.

इस क्रिया की प्रतिक्रिया होनी थी. जनता के मन में विरोध ने जन्म ले लिया था. परिणाम यह हुआ कि ईरान में इस्लामिक-क्रांति ने जन्म लिया, जिसके कारण 1979 में आयतुल्ला खुमैनी की वापसी हुई.

1979 की क्रांति में वामपंथियों ने भी शाह के शासन के खिलाफ एकजुट विपक्ष का हिस्सा बनकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें मार्क्सवादी और वामपंथी इस्लामी समूह शामिल थे. क्रांति के बाद आयतुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में वामपंथियों को दबा दिया गया. उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेल दिया, जिसके बाद धार्मिक सत्तावादी शासन स्थापित हुआ.

वर्तमान राजव्यवस्था का सिद्धांत है ‘विलायत-ए-फ़कीह.’ यानी फ़कीह (इस्लामी न्यायविद) का संरक्षण, जो शिया वैचारिक-आधारशिला से जुड़ा है. मौजूदा वली-ए-फ़कीह (संरक्षक न्यायविद-गार्डियन ज्यूरिस्‍ट) आयतुल्ला अली खामनेई हैं. सवाल है कि क्या वे ऐसी व्यवस्था कायम कर पाएँगे, जो सर्वस्वीकृत हो?

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित

Tuesday, January 13, 2026

अनायास नहीं है ट्रंप की ग्रीनलैंड में दिलचस्पी


वेनेजुएला में सैनिक हस्तक्षेप के बाद डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि अपने देश के हित में हमें नेटो सहयोगी डेनमार्क से ग्रीनलैंड को भी हासिल करना होगा. उनके इस सुझाव या धमकी से यूरोपीय नेता नाराज़ और किंचित भयभीत भी हैं.

सवाल है कि वे इसे कैसे हासिल करेंगे? समझाकर, खरीद कर या फौजी कार्रवाई की धमकी देकर? यूरोप के देशों को यूक्रेन की विश्वसनीय सुरक्षा के लिए अमेरिका की ज़रूरत है, पर ग्रीनलैंड की संप्रभुता का उल्लंघन भी उन्हें स्वीकार नहीं.

इस पृष्ठभूमि में, यूरोपीय नेताओं ने मंगलवार 6 जनवरी को पेरिस में वरिष्ठ अमेरिकी वार्ताकारों के साथ मुलाकात की, जिसमें यूक्रेन में शांति समझौते से जुड़े मसलों पर विचार किया.

यूरोपीय चिंताएँ

इससे एक दिन पहले इन्हीं देशों में से कुछ ने एक संयुक्त बयान जारी किया था, जिसमें डेनमार्क के साथ एकजुटता व्यक्त की गई थी. हालाँकि उस बयान में वाशिंगटन की स्पष्ट आलोचना नहीं थी, पर कुछ चिंताएँ प्रकट हो रही थीं.

यूरोप और अमेरिका की एकता के बाहरी दिखावे के बावजूद ऐसा लग रहा है कि साम्राज्यवादी युग में ट्रंप की अचानक वापसी को लेकर चिंताएँ हैं. वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन मानने वाले यूरोप के लोग अमेरिकी राष्ट्रपति की सैन्य कार्रवाई से भयभीत हैं.