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Tuesday, October 27, 2026

यूरोप की अराजकता ने बजाई खतरे की घंटी


फ्रांस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, बेल्जियम, अल्बानिया, जर्मनी और सर्बिया सहित कई यूरोपीय देशों में महंगाई, बढ़ते जीवन-यापन, आवास की कमी, वेतन संकट और शिक्षा सुधारों को लेकर भारी विरोध प्रदर्शन और अराजकता का माहौल है.

क्या यह किसी बड़े बदलाव का संकेत है? बदलाव कैसा? कुछ पर्यवेक्षकों का अंदेशा है कि इसकी प्रतिक्रिया में इन देशों में दक्षिणपंथी राजनीति की एक और लहर आ सकती है. मूलतः यह लोकतांत्रिक-व्यवस्था में सामाजिक कल्याण से जुड़े प्रश्नों का मसला है. 

पहले इस अराजकता पर एक नज़र डालें. पिछले कुछ समय से महंगाई, शिक्षकों की भारी किल्लत और शिक्षा तथा सार्वजनिक सेवाओं में बजट कटौती के खिलाफ फ्रांस में पेरिस से लेकर मार्सेलिस तक सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं.

सोशल कॉन्ट्रैक्ट का टूटना

अमेरिकी काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के एक विश्लेषण के अनुसार हाल के हफ़्तों में हमने जो देखा है, वह बिल्कुल अलग तरह का लगता है. ये विरोध प्रदर्शन फ्रांस के ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ के पूरी तरह से खत्म होने से पैदा हुए हैं.

फ्रांस में जनता के सड़क पर आने का मतलब है ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ का टूटना, जो ज्याँ-जाक रूसो के 1762 के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट; या राजनीतिक अधिकार के सिद्धांत’ से जुड़ा है.

‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ एक काल्पनिक या मौन समझौता है, जिसमें हर व्यक्ति अपनी प्राकृतिक स्वतंत्रता और अधिकारों को पूरी तरह से समुदाय को सौंप देता है. बदले में उसे नागरिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और समानता मिलती है.

इस विचार ने फ्रांसीसी क्रांति (1789) पर गहरा प्रभाव डाला था. क्रांतिकारियों ने संप्रभुता, समानता और गणतंत्र की अवधारणाओं के लिए रूसो के विचारों का इस्तेमाल किया. फ्रांसीसी राजनीतिक संस्कृति में यह आज भी एक मूल अवधारणा है—नागरिकों और राज्य के बीच का अंतर्निहित समझौता.

Tuesday, October 20, 2026

रूस-अमेरिका और चीन के रिश्तों में बदलाव का भारत पर असर

कार्टून साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट से साभार

वैश्विक-राजनीति का पहिया अचानक उल्टी दिशा में घूमने लगा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक कार्यकारी आदेश पर दस्तखत करके रूसी अर्थव्यवस्था को निशाना बनाने वाले प्रतिबंधों के पैकेज को रोक दिया.

इस फैसले के पहले ट्रंप की रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के साथ हुई वार्ताओं से वैश्विक-संबंधों में आ रहे बदलाव का संकेत मिलने लगा था. अब इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. इसका भारत-अमेरिका रिश्तों पर भी असर पड़ेगा.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार सोमवार को रूस ने को कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग अगले महीने चीन में होने वाले एपेक शिखर सम्मेलन के दौरान एक त्रिपक्षीय बैठक कर सकते हैं.

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने वॉलस्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के बारे में पूछे जाने पर टिप्पणी की, जिसमें कहा गया था कि पुतिन ने यूक्रेन में संघर्ष को समाप्त करने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए ऐसी बैठक का प्रस्ताव रखा था.

ट्रंप की राजनीति

राष्ट्रपति ट्रंप ने जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ लंबी फोन बातचीत के बाद डीजल समझौते की घोषणा की, तो इसे अमेरिका के मध्यावधि चुनावों से पहले पेट्रोलियम की कीमतों को कीमतों में वृद्धि रोकने का एक प्रयास मानकर नज़रंदाज़ किया जा सकता था. पर बात इतनी ही नहीं है.

यह चुनाव परिणाम आने के बाद की राजनीति का संकेत भी है. ट्रंप ने यह फैसला ऐसे समय में किया है, जब यूक्रेन के शहरों पर रूसी हमले तेज़ हो रहे हैं. स्पष्ट है कि ट्रंप को यूरोप और यूक्रेन से दोस्ती की परवाह नहीं है.

रूस से डीज़ल आयात की घोषणा के एक दिन बाद, ट्रंप ने यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की को पद से हटाने की माँग शुरू कर दी. वे सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि युद्ध समाप्त करने में ज़ेलेंस्की मुख्य बाधा हैं, पुतिन ही वास्तव में शांति चाहते हैं.

Tuesday, October 13, 2026

अब हूतियों से क्या दो-दो हाथ करेगा मक्का-पैक्ट?

 


अमेरिका-ईरान युद्ध में ठहराव आने के बाद सऊदी अरब और हूती लड़ाकों के बीच लड़ाई में तेजी आ रही है. इस लड़ाई के निहितार्थ वही नहीं हैं, जो ईरान युद्ध के थे.

ईरान की इसमें परोक्ष भूमिका होने की वजह से कई सवाल उठ रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल मक्का रक्षा-समझौते का है, जिसके हालिया फैसले से बड़ी लड़ाई भड़कने का अंदेशा है.

हालाँकि राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि हम हूतियों के खिलाफ कार्रवाई करने पर विचार करेंगे, पर लगता नहीं कि अगले महीने होने वाले चुनाव पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को देखते हुए वे फिलहाल कोई कार्रवाई करेंगे.

ईरान समर्थित हूती मिलिशिया ने शनिवार को सऊदी राजधानी में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मिसाइलों से हमला किया, जिसमें कम से कम 12 लोग मारे गए और 300 से अधिक लोग घायल हो गए हैं.  

इसके बाद रविवार को एक और हमला होने की सूचना है. एक वरिष्ठ हूती प्रवक्ता ने दावा किया कि हमला हमने किया है.

फरवरी में ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल युद्ध शुरू होने के बाद से किसी खाड़ी अरब देश में हुआ यह सबसे घातक हमला था. जवाब में यमन की राजधानी सना के हवाई अड्डे पर सऊदी हमले की सूचना भी है.

Tuesday, September 15, 2026

पश्चिम और भारतीय नज़रिए में ब्रिक्स


ब्रिक्स समूह का दिल्ली शिखर-सम्मेलन जिस मापदंड पर सफल रहा है, वह है ‘नई दिल्ली घोषणा’, जो सर्वानुमति से जारी हो गई. इससे संकेत मिलता है कि ब्रिक्स का काफी समय भू-राजनीति की विसंगतियों को दूर करने में लगा है.  

सम्मेलन में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की उपस्थिति के बावज़ूद पश्चिम एशिया की लड़ाई से संदर्भ में कोई अड़चन नहीं आई. यह डिप्लोमेटिक सफलता है, क्योंकि इसे लेकर कई तरह के अंदेशे थे.

अंतिम घोषणापत्र उस संतुलन को दर्शाता है, जिसमें पश्चिम एशिया में चल रहे युद्धों और तनावों को संबोधित किया गया है, लेकिन किसी एक देश को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं माना गया है.

सम्मेलन के समांतर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की भारत-यात्रा और नरेंद्र मोदी के साथ उनकी वार्ता को भी इन उपलब्धियों में शामिल किया जाएगा, पर वह अपने आप में अलग और विषद विषय है.

भारत ने लगातार अपनी गैर-पश्चिमी पहचान पर बल दिया है. इसकी जटिलता को समझना आसान नहीं है. पश्चिम के राजनीतिक और मानवीय-मूल्यों को भारत भी स्वीकार करता है, लेकिन वह अमेरिका और यूरोप की भू-राजनीति का अनिवार्य हिस्साा बनने से इनकार करता है.  

Tuesday, August 25, 2026

कश्मीर पर गोर का बयान, कहीं कुछ चल रहा है


कश्मीर के बारे में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के एक बयान ने भारत और पाकिस्तान के पर्यवेक्षकों का ध्यान खींचा है. कश्मीर-विवाद के अलावा भारत-अमेरिका रिश्तों के लिहाज से भी यह बयान महत्त्वपूर्ण है.

भारतीय पर्यवेक्षक मानते हैं कि भारत को इस विषय पर आत्यंतिक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करनी चाहिए. बयान के मतलब को समझने का प्रयास अभी किया ही जा रहा है.

सच यह भी है कि किसी राजदूत का बयान अंतिम नहीं होता. यह बयान कोई संधि नहीं है, और न राष्ट्रपति की घोषणा या विदेश विभाग के बयान जैसा आधिकारिक. फिर भी डिप्लोमेसी में शब्दावली और समय का महत्त्व होता है.

Wednesday, August 19, 2026

चुनाव बताएँगे ट्रंप और नेतन्याहू की दशा-दिशा


अमेरिका और इसराइल ने 28 फरवरी को ईरान में सत्ता बदलने के मकसद से जो युद्ध शुरू किया था, वह बड़ी नाकामी साबित हुआ है. इससे दुनिया में पैदा हुआ संकट अपनी जगह है, पर अब देखना होगा कि अमेरिका और इसराइल की राजनीति पर उसका क्या प्रभाव पड़ा है.  

इसका पहला अनुमान इस साल अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों और इसराइल के आम चुनावों से लगेगा. हालाँकि डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में दो साल बाकी हैं, पर मध्यावधि चुनावों से उनकी लोकप्रियता का पता ज़रूर लगेगा.

अमेरिका में हरेक चार साल पर राष्ट्रपति, पूरे प्रतिनिधि सदन और उच्च सदन सीनेट के एक तिहाई सदस्यों और राज्यों के गवर्नरों के चुनाव होते हैं. उसके दो साल बाद मध्यावधि चुनाव होते हैं, जिसमें प्रतिनिधि सदन का चुनाव होता है.

प्रतिनिधि सदन का कार्यकाल दो साल का होता है, इसलिए हरेक दो साल में पूरे सदन का नया गठन होता है, साथ ही सीनेट के खाली हो रहे एक तिहाई स्थानों और राज्यों के गवर्नरों के चुनाव होते हैं.

Tuesday, August 4, 2026

बांग्लादेश पर चीनी प्रभाव और भारत से रिश्ते


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन देशों की यात्रा के दौरान कुछ पर्यवेक्षकों ने टिप्पणी की कि, अपनी 'एक्ट-ईस्ट पॉलिसी' के तहत भारत सुदूर-पूर्व के देशों के साथ रिश्ते बनाने के पहले अपने निकटतम पड़ोसी बांग्लादेश के साथ संबंध सुधारने का काम क्यों नहीं करता? अब समय आ रहा है, जब इस सवाल का जवाब मिल सकता है.

भारत ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है. हालांकि, बांग्लादेश सरकार ने इस निमंत्रण पर अभी कोई निर्णय नहीं किया है, पर इससे कुछ संकेत मिलेंगे.

नया फौजी-गठबंधन

इस विषय पर आगे बात करने के पहले एक नई खबर पर भी ग़ौर करना चाहिए. सऊदी अरब ने एक समुद्री-सुरक्षा गठबंधन की घोषणा की है, जिसमें पाकिस्तान, तुर्की और बांग्लादेश समेत 13 देश शामिल हैं.

Wednesday, July 29, 2026

सऊदी एटमी-डील से पश्चिम एशिया में होड़ बढ़ेगी


पश्चिम एशिया का अनिश्चय खत्म होकर नहीं दे रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच समझौता-ज्ञापन पर दस्तखत होने के बावज़ूद लड़ाई खत्म नहीं हुई है. दूसरी तरफ राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने पिटारे से नई-नई चीजें निकाल रहे हैं.

पिछले बुधवार को उन्होंने सऊदी अरब के साथ नाभिकीय-सहयोग के समझौते की घोषणा करके खलबली पैदा कर दी है. इस समझौते के तहत अमेरिकी सहयोग से सऊदी अरब अपने असैनिक परमाणु-कार्यक्रम का संचालन कर सकेगा.

यह 30 वर्षीय समझौता नाभिकीय-सहयोग पर तो रोशनी डालता है, लेकिन साथ ही कई महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलावों की ओर इशारा भी कर रहा है.

वेस्टिंगहाउस जैसी कंपनियों का उपयोग करते हुए रियाद को एक दीर्घकालिक अमेरिकी तकनीकी और सुरक्षा ढाँचे में बाँधकर, वाशिंगटन का लक्ष्य खाड़ी में चीन और रूस के बढ़ते राजनयिक और आर्थिक प्रभाव को कम करना है.

Wednesday, July 22, 2026

पाकिस्तान फिर से टूटने का खतरा

बलोच हमलों में महिला आत्मघातियों की संख्या बढ़ रही है। यह है सुमैया कलंदरानी बलोच जिसने 24 जून 2023 को तुरबत में एक सैन्य काफिले पर आत्मघाती हमला किया। हमले के पहले बलोच लिबरेशन आर्मी के ध्वज के सामने खड़े होकर उसने फोटो खिंचवाया।

अशांत बलोचिस्तान में मस्तुंग के पास गुरुवार 16 जुलाई को सुरक्षा काफिले पर हुए हमले में 45 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर है. बलोचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है, जो दो सप्ताह से भी कम समय में सुरक्षा-कर्मियों पर तीसरा बड़ा हमला है.

उपरोक्त जानकारी ‘बलोचिस्तान पोस्ट’ ने दी है, हालाँकि पाकिस्तानी सेना ने हमले की पुष्टि की, लेकिन मरने वालों की संख्या नहीं बताई. बीएलए के प्र
वक्ता जियंद बलोच ने बताया कि मीडिया को बयान जारी करते समय भी बीएलए के लड़ाकों और पाकिस्तानी सेना के बीच लड़ाई जारी थी, और हताहतों की संख्या बढ़ सकती है.

आर्थिक-गिरावट और आंतरिक-संघर्षों के कारण पाकिस्तान, गंभीर अस्थिरता का सामना कर रहा है. बलोचिस्तान में विद्रोह और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में हो रहे प्रदर्शनों से देश की अखंडता को खतरा पैदा हो गया है. सवाल है कि क्या पाकिस्तान फिर से टूटेगा?

Wednesday, July 15, 2026

भारत की ‘एक्ट-ईस्ट पॉलिसी’ में नई ऊर्जा का संचार


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले शनिवार को ऑकलैंड से रवाना होते हुए इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के अपने तीन देशों के दौरे का समापन किया. यह एक ऐतिहासिक दौरा था जिसने इस इलाके के देशों के साथ भारत के संबंधों को दीर्घकालिक-साझेदारी के स्तर तक पहुँचाया.

इस यात्रा के महत्व और प्रभाव को समझने के लिए हमें इन तीन देशों के अलावा दक्षिण, दक्षिण पूर्व और सुदूर एशिया के बारे में भी विचार करना होगा.  यह दौरा हिंद-प्रशांत क्षेत्र के भू-राजनीतिक और आर्थिक भविष्य में भारत की उभरती आकांक्षाओं को उजागर करता है. इसलिए भी कि यह क्षेत्र वैश्विक-स्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है.

प्रधानमंत्री की यह यात्रा कोरिया और जापान के नेताओं के साथ उनकी हालिया मुलाकातों के बाद हुई हैं. ये सभी मुलाकातें भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में नई ऊर्जा का संचार करती हैं और इस बात की मान्यता को दर्शाती हैं कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की मध्यम शक्तियों के बीच गहरा सहयोग पारस्परिक आर्थिक और रणनीतिक लाभ संभव है.

तीन देशों की इस यात्रा ने व्यापार, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा, शिक्षा, नवाचार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिणाम दिए, जिससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र और उससे परे एक प्रमुख भागीदार के रूप में भारत की भूमिका मजबूत हुई.

Thursday, July 9, 2026

हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बदलते समीकरणों के बीच मोदी की इंडोनेशिया समेत तीन देशों की यात्रा


वैश्विक-राजनीति में आते बदलाव की रोशनी में पिछले हफ्ते जापानी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड-यात्रा के दूरगामी अर्थ हैं. यह यात्रा 11 जुलाई तक चलेगी.

पिछले साल से अमेरिकी-नीतियों में आए बदलाव के कारण एशिया के देशों ने अपनी भावी नीतियों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है. यह विचार केवल सामरिक-दृष्टि से ही नहीं है, बल्कि इसका काफी बड़ा हिस्सा आर्थिक-सामाजिक सहयोग से जुड़ा है.

पिछले हफ्ते जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची और पिछले अप्रैल में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की दिल्ली यात्राओं ने अमेरिका के दो प्रमुख एशियाई सहयोगियों, तोक्यो और सोल में अपने एशियाई संबंधों को व्यापक बनाने की तात्कालिकता को रेखांकित किया था.

प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया-यात्रा और इस दौरान चर्चाओं और समझौतों से भारत और इंडोनेशिया का एक दूरदर्शी एजेंडा झलकता है, जिसमें समुद्री सहयोग, रक्षा उद्योग में साझेदारी, आर्थिक विस्तार, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा पर जोर दिया गया है. इस यात्रा ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री पड़ोसी और रणनीतिक साझेदार के रूप में दोनों देशों के साझा दृष्टिकोण को और पुष्ट किया है.

सामरिक-महत्त्व

भारत का लगभग 40 फीसदी समुद्री व्यापार दुनिया के सबसे व्यस्त जलमार्गों में से एक, मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. और इस रणनीतिक मार्ग के प्रवेश द्वार पर स्थित देश इंडोनेशिया है.

भौगोलिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से इंडोनेशिया की इसमें बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका है. हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के संगम पर स्थित, यह विश्व के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों में से एक है.

प्रधानमंत्री की यह यात्रा, 2018 के बाद उनकी इंडोनेशिया की पहली द्विपक्षीय यात्रा है. यह भारत के समुद्री हितों को सुरक्षित करने, आर्थिक साझेदारी का विस्तार करने और तेजी से प्रतिस्पर्धी होते हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति को मजबूत करने से जुड़ी है.

उनकी 2018 की यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने एक साझा समुद्री दृष्टिकोण का अनावरण किया था, और हालिया चर्चाओं का उद्देश्य उस ढाँचे को आगे बढ़ाना है. वार्ता में आपसी समुद्री क्षेत्र जागरूकता, संपर्क और दोनों देशों के तटरक्षक बलों के बीच सहयोग बढ़ाने जैसे विषय शामिल है.

Tuesday, July 7, 2026

भारत-पाक रिश्तों में ‘अमन’ की आशा-निराशा के मोड़


भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर हाल के दो घटनाक्रमों ने ध्यान खींचा है. एक, दोनों देशों के 117 नागरिकों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शहबाज़ शरीफ के नाम लिखी गई खुली चिट्ठी. दूसरे, दोनों देशों के कुछ लोगों के बीच कोलंबो में हुए संवाद की खबर, जिसे 'ट्रैक-2 वार्ता' बताया जा रहा है. 

इस संवाद को लेकर कई तरह के कयास हैं. वहीं भारत सरकार ने किसी वार्ता में शामिल होने की खबरों का जोरदार खंडन किया है. विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा है कि इस तरह की चर्चा से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है.

जिस बैठक को ट्रैक-2 कहा जा रहा है, वस्तुतः वह आईआईएस-एनईएसए ट्रैक 1.5 साउथ एशिया सिक्योरिटी डायलॉग की सालाना बैठक का 10वाँ संस्करण था. इससे पिछली बैठक पिछले साल जुलाई में हुई थी, ऑपरेशन सिंदूर के सिर्फ़ दो महीने बाद.

डिप्लोमैटिक भाषा में ट्रैक-1, ट्रैक-2 और ट्रैक-1.5 के अलग-अलग अर्थ होते हैं. ट्रैक-1 आधिकारिक वार्ता होती है, ट्रैक 1.5 में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और ग़ैर-सरकारी प्रतिभागी दोनों शामिल होते हैं और ट्रैक-2 प्रभावशाली, लेकिन ग़ैर-सरकारी व्यक्तियों के बीच होता है. पर तीनों 'बैकचैनल' डिप्लोमेसी नहीं हैं.

Tuesday, June 30, 2026

भारत-अमेरिका ट्रेड-डील के आसार और वैश्विक-विखंडन

इलस्ट्रेशन द प्रिंट से साभार

अमेरिका के विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने कहा है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अगले साल के शुरू में भारत का दौरा कर सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार-समझौता होने के करीब है.  

फ्रांस में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान 17 जून को ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच 16 महीनों में हुई पहली मुलाकात से रिश्तों में जमी बर्फ कुछ पिघलती नज़र आ रही है.

पिछले हफ्ते अमेरिकी व्यापार प्रमुख जैमीसन ग्रीअर की भारत यात्रा के बाद भी संकेत मिले हैं कि व्यापार-वार्ता के लिए बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है, और बहुत जल्द ही समझौता हो जाएगा.

भारत उन कुछ देशों में शामिल है, जिनके साथ अमेरिका ने अभी तक व्यापार समझौता नहीं किया है. इसके पहले यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और कई आसियान देशों सहित लगभग एक दर्जन व्यापारिक साझेदारों के साथ वह समझौते कर चुका है.

Tuesday, June 23, 2026

पश्चिम एशिया में करवट-करवट, ‘कभी हाँ, कभी ना’!


पश्चिम एशिया में दीर्घकालीन शांति-स्थापना का सपना, बड़ी तेजी से ‘कभी हाँ और कभी ना’ में तब्दील हो रहा है. उसकी विसंगतियाँ बार-बार दरवाज़े पर दस्तक दे रही हैं.

इसराइल की खुली बगावत ने समझौते के अंतर्विरोधों को उजागर किया है, जिसकी वजह से शुक्रवार 19 जून को, स्विट्ज़रलैंड में बातचीत नहीं हो पाई, जो दो दिन बाद रविवार को होने पर उम्मीदें पटरी पर वापस भी आ गई हैं.

समझौते के प्रारंभिक प्रारूप पर चूँकि बुधवार को ही राष्ट्रपति ट्रंप और पेज़ेश्कियान के हस्ताक्षर हो गए हैं, इसलिए अब सब कुछ केवल कयास भर नहीं है. फिर भी लेबनान पर ईरान और इसराइल के रुख के बरक्स यह काम टेढ़ी खीर जैसा लगता है.

ईरान ने कहा है, होर्मुज़ पर ‘टोल’ वसूलेंगे, और ट्रंप ने कहा है, कत्तई नहीं. ट्रंप की धमकियाँ लगातार जारी हैं. ऐसी दर्जनों असहमतियाँ हैं, फिर भी लगता है कि समझौता-वार्ता जारी रहेगी.   

Tuesday, June 16, 2026

ईरान-समझौते के अटकते-खटकते निष्कर्ष


अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक-समझौता हो गया है, जिसके तहत 60 तक युद्धविराम लागू रहेगा और होर्मुज़ का रास्ता खुलेगा. समझौते पर दस्तखतों को लेकर अंतिम क्षण तक असमंजस बना रहा, पर अब बताया गया है कि दस्तखत 19 जून को होंगे.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अब हम ईरान की नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त कर देंगे, जो महीनों की बातचीत में सबसे बड़ी सफलता है.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के सरकारी टीवी का कहना है कि तेहरान ने अमेरिका को शांति समझौते को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया.

दोनों पक्षों ने समझौते का विवरण तुरंत जारी नहीं किया है, पर मीडिया में दोनों तरफ से आई बातों में अंतर्विरोध हैं. इसके अलावा ईरान के कट्टरपंथी और इसराइली सरकार अपने-अपने कारणों से नाराज़ हैं।

इस समझौते से दोनों पक्षों के बीच दोस्ती कायम नहीं हो जाएगी. सच यह है कि यह दो दुश्मनों के बीच सीमा रेखाएँ तय करने का समझौता है, जिसकी सफलता या विफलता का फैसला समय करेगा.

Wednesday, June 10, 2026

ट्रंप की पहेलियों और पुतिन के दावों के दौर में भारत


डॉनल्ड ट्रंप की फुलझड़ियों, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बयानों और चीनी गतिविधियों को एक सतह पर रखकर विचार करें, तो भारत की विदेश-नीति को लेकर कुछ सवाल बनते हैं.

एक तरफ गाहे-बगाहे ट्रंप के पहेली जैसे बयान सुनाई पड़ते हैं, वहीं अब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि भारत को अमेरिका के दबाव में आना बंद करना चाहिए. अमेरिका का सूर्यास्त और ब्रिक्स का सूर्योदय होने वाला है.

ईरान-युद्ध की वजह से मिली छूट के कारण रूस से पेट्रोलियम की खरीद में वृद्धि हुई है, पर कहना मुश्किल है कि आने वाले समय में अमेरिका इसे रोकने के लिए किस प्रकार के दबाव डालेगा.

सवाल है कि क्या वास्तव में अमेरिका के सूर्यास्त की घड़ी आ गई है? भारत क्या वास्तव में अमेरिका के दबाव में है? क्या अब हमारी दूरियाँ बढ़ने वाली हैं? ट्रंप कैसी पहेली बूझ रहे हैं? हमें वाइट हाउस प्रशासन की ‘पल में तोला, पल में माशा’ नीति के प्रति सचेत रहना होगा.

देखना यह भी होगा कि ब्रिक्स के मंच पर भारत-रूस और चीन के सहयोग की नई संभावनाएँ क्या हैं? वस्तुतः भारत को इन सबके बीच से अपना रास्ता खुद खोजना होगा और स्वतंत्र-नीति का संचालन करना होगा. क्या ऐसा संभव है? 

फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि भारत किसी ध्रुवीकरण में शामिल नहीं होगा और उसके अमेरिका के साथ रिश्ते बने रहेंगे, जो इस समय भले ही कारोबारी लेन-देन तक सिमट गए हैं. दूसरी तरफ उसे न तो 'अमेरिकी-पिट्ठू' साबित किया जा सकता है और न उसके दबाव में.  

Tuesday, May 19, 2026

बदलते वैश्विक-संदर्भों में भारत की चुनौतियाँ


वैश्विक-राजनीति में हमेशा ही कोई न कोई घटना ऐसी होती रहती है, जो किसी खास इलाके के लिए महत्त्वपूर्ण होती है. पिछले हफ्ते भारत में ‘ब्रिक्स’ विदेशमंत्रियों का सम्मेलन और प्रधानमंत्री का पाँच देशों की यात्रा पर निकलना भी ऐसी ही घटनाएँ हैं.

पिछले हफ्ते भारत ने नई दिल्ली में ‘ब्रिक्स’ के विदेशमंत्रियों की बैठक की मेजबानी की और अगले सप्ताह ‘क्वॉड’ के विदेश मंत्रियों मेजबानी और महीने के अंत में भारत-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन का आयोजन भी करेगा. इनमें से हरेक आयोजन भारतीय डिप्लोमेसी के अलग-अलग पहलुओं पर रोशनी डालता है.

‘ब्रिक्स’ और ‘क्वॉड’ को अक्सर वैचारिक रूप से विरोधी संगठनों के रूप में चित्रित किया जाता है. ‘ब्रिक्स’ को पूर्वी देशों द्वारा पश्चिमी वर्चस्व को उखाड़ फेंकने के साधन के रूप में, जबकि ‘क्वॉड’ को चीन के विरुद्ध एक रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में. इस प्रकार के वर्णन दोनों समूहों की अतिरंजना करते हैं.

‘ब्रिक्स’ में टकराव

‘ब्रिक्स’ में ऐसे देश शामिल हैं, जिनके बीच प्रत्यक्ष संघर्ष हैं. ‘क्वॉड’, अपने बढ़ते सहयोग के बावजूद, औपचारिक गठबंधन नहीं है. भारत ने तो ‘क्वॉड’ को सुनियोजित सुरक्षा सहयोग के मंच में बदलने का हमेशा विरोध किया है.

पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की चीन-यात्रा के पीछे भी हमारे लिए कुछ संकेत छिपे हैं. उधर ‘ब्रिक्स’ के सम्मेलन में ईरान और यूएई के मतभेद उभर कर आए, जिनके कारण संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका.

अमेरिका और चीन की वार्ता के केंद्र में भारत भले ही नहीं था, पर दोनों के रिश्ते सुधरे, तो उसका, भारत-अमेरिका और भारत-चीन रिश्तों पर भी प्रभाव पड़ेगा. सवाल है कि क्या रिश्ते सुधरे?

Wednesday, May 6, 2026

अमीरात के हटने से ‘ओपेक’ में दरार का अंदेशा


पश्चिम एशिया की लड़ाई और करवट लेती वैश्विक-व्यवस्था के दौर में यूएई का ‘ओपेक’ को छोड़ना, इस बात का संकेत है कि पश्चिम एशिया में केवल तेल की राजनीति में ही नहीं, बल्कि भू-राजनीति में भी बदलाव आ रहा है.

इस परिघटना को खाड़ी देशों की आपसी प्रतिद्वंद्विता, सऊदी अरब के साथ बिगड़ते रिश्तों और अमेरिका-इसराइल की नीतियों के परिप्रेक्ष्य में भी पढ़ना होगा.

पहली नज़र में यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के लिए फायदेमंद लगता है, जिन्हें मध्यावधि चुनाव से पहले तेल की कीमतों में कमी की सख्त जरूरत है. ऐसा तभी होगा, जब तेल के दाम गिरेंगे.

लंबे समय से ट्रंप के लिए ‘ओपेक’ बड़ी समस्या रहा है; उन्होंने बार-बार तेल की कीमतों में वृद्धि के लिए इसे जिम्मेदार ठहराया है. ‘ओपेक’ से अलग होकर अमीरात ट्रंप का प्रिय बन सकता है.

मोटे तौर पर, यह अमीरात की आत्मकेंद्रित विदेश-नीति की शुरुआत है.  ‘ओपेक’ कई देशों के सामूहिक का प्रतिनिधि समूह है. अमीरात के फैसले से वह फौरन टूटेगा नहीं, पर कमज़ोर ज़रूर होगा.

इसके पहले भी कुछ देश इस समूह से हटे हैं, पर यूएई इसके सबसे महत्त्वपूर्ण भागीदारों में से एक है, जिसका असर होगा.

अमीरात की नाखुशी

समूह के सदस्यों के लिए मुकर्रर उत्पादन कोटा से अमीरात नाखुश था. वे चाहते हैं कि हमें जितना चाहें उतना खनिज तेल पंप करने की अनुमति होनी चाहिए. उन्हें लगता है कि तेल के कारोबार का अंत होने वाला है, इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा तेल बेचकर कमाई कर ली जाए और उससे भावी अर्थव्यवस्था की नींव डाली जाए.

बेशक इससे तेल के दामों में कमी आएगी, पर अब उत्पादन रोका, तो फँस जाएँगे, क्योंकि दुनिया तेजी से वैकल्पिक ऊर्जा-स्रोतों पर जा रही है और अचानक तेल की माँग डूब जाएगी.

Tuesday, April 14, 2026

‘युद्धविराम’ जो है ही नहीं!


पश्चिम एशिया की लड़ाई में युद्धविराम के बाद इस्लामाबाद में हुई पहली बातचीत के सफल नहीं होने का मतलब यह भी नहीं है कि वह विफल हो गई. ऐसे मसले एक दिन की वार्ता से हल होते भी नहीं हैं.

अब सवाल पूछा जा सकता है कि तब क्या दो हफ्ते बाद लड़ाई फिर से उसी बिंदु से शुरू हो जाएगी, जहाँ पर वह रुकी थी? कोई नहीं कह सकता कि अब क्या होगा. सबसे बड़ी बात है कि लड़ाई रुकी नहीं है, बल्कि उसका तरीका बदला है.

लेबनान में तो लड़ाई चल ही रही है. और ट्रंप की घोषणा के बरक्स अमेरिकी सेंटकॉम ने होर्मुज की नाकाबंदी शुरू कर दी है, जिसके बाद दोनों देशों की सेनाएँ आमने-सामने हैं. यह बात बड़े खतरनाक परिदृश्य को जन्म दे रही है.  

दूसरी तरफ बातचीत भी रुकी नहीं है, किसी न किसी स्तर पर चल ही रही है. ऐसे मसलों के फैसले सोशल मीडिया की पोस्टों और मीडिया के विश्लेषणों से तय नहीं होते हैं, बल्कि ‘बैकरूम वार्ताओं’ से ही तय होते हैं.

इन बातों के मद्देनज़र तीन-चार ‘प्रत्यक्ष’ मुद्दे सामने आ चुके हैं, ‘परोक्ष’ मुद्दे अक्सर कभी सामने नहीं आते. 

हरमूज़ की नाकाबंदी

इस्लामाबाद वार्ता खत्म होने के बाद अमेरिकी सेना ने रविवार को कहा कि वह ‘ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश करने या वहाँ से निकलने वाले’ किसी भी जहाज की नाकाबंदी करेगी. उसके पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग हरमूज़ (या होर्मुज) को पूरी तरह से अवरुद्ध करने की घोषणा की थी.

अब यह नाकाबंदी शुरू हो चुकी है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया पर जारी एक बयान में कहा था कि ईरानी बंदरगाहों पर नाकाबंदी सोमवार को पूर्वी समयानुसार सुबह 10 बजे (यानी भारतीय समयानुसार रात 8.30 बजे) से शुरू होगी. 

इसमें यह भी कहा गया है कि अमेरिकी सेनाएं होर्मुज जलडमरूमध्य से गैर-ईरानी बंदरगाहों तक आने-जाने वाले जहाजों के लिए नौवहन की स्वतंत्रता में बाधा नहीं डालेंगी. एक तरह से यह लड़ाई जारी रहने की घोषणा ही है.

Wednesday, April 1, 2026

कहाँ जाकर रुकेगा पाक-अफ़ग़ान टकराव?


पश्चिम एशिया में युद्ध भड़क के बाद हमारा ध्यान यूक्रेन और अफ़ग़ानिस्तान से हट गया, जबकि वहाँ भी लड़ाइयाँ चल रही हैं. ईरान की लड़ाई रुक भी जाएगी, पर लगता है कि यूक्रेन की लड़ाई और पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान टकराव जल्द खत्म नहीं होगा.

पाकिस्तान ने पिछली 25 मार्च को कहा कि उसकी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ अभियान फिर से शुरू कर दिया है. क्या वजह है कि पाकिस्तान ने इस समय बड़ा फौजी अभियान चलाने का फैसला किया है? क्या इसका संबंध भी ईरान-युद्ध से है? क्या इसके पीछे अमेरिका की सहमति या उसकी ही योजना है?

ऐसे कुछ सवाल भी ज़ेहन में आते हैं. जो बाइडेन के कार्यकाल में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान के मामले में भारत को महत्त्व दिया था, पर इस समय ट्रंप प्रशासन का पाकिस्तान पर पूरा भरोसा है. ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी ने कहा है कि तालिबान हमलों के खिलाफ आत्मरक्षा करने का पाकिस्तान को पूरा अधिकार है.

अस्पताल पर हमला

हाल में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में एक नशा मुक्ति केंद्र पर पाकिस्तानी हवाई हमले में 400 से अधिक लोग मारे गए थे. पाकिस्तान का कहना है कि हमने ये हमले ‘फौजी ठिकानों और आतंकवादी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाते हुए’ किए थे.

बहरहाल ईद के मौके पर तुर्की, कतर और सऊदी अरब के अनुरोध पर युद्ध-विराम की घोषणा की गई थी. इसके बाद इस्लामाबाद में विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक ब्रीफिंग में प्रवक्ता ताहिर अंदराबी ने कहा, यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो जाते.