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Monday, October 19, 2020

इस महामारी ने हमें कुछ दिया भी है

कोई आपसे पूछे कि इस महामारी ने आपसे क्या छीना, तो आपके पास बताने को काफी कुछ है। अनेक प्रियजन-परिजन इस बीमारी ने छीने, आपके स्वतंत्र विचरण पर पाबंदियाँ लगाईं, तमाम लोगों के रोजी-रोजगार छीने, सामाजिक-सांस्कृतिक समारोहों पर रोक लगाई, खेल के मैदान सूने हो गए, सिनेमाघरों में सन्नाटा है, रंगमंच खामोश है। शायद आने वाली दीवाली वैसी नहीं होगी, जैसी होती थी। तमाम लोग अपने-अपने घरों में अकेले बैठे हैं। अवसाद और मनोरोगों का एक नया सिलसिला शुरू हुआ है, जिसका दुष्प्रभाव इस बीमारी के खत्म हो जाने के बाद भी बना रहेगा। जो लोग इस बीमारी से बाहर निकल आए हैं, उनके शरीर भी अब कुछ नए रोगों के घर बन चुके हैं।

यह सूची काफी लम्बी हो जाएगी। इस बात पर वर्षों तक शोध होता रहेगा कि इक्कीसवीं सदी की पहली वैश्विक महामारी का मानवजाति पर क्या प्रभाव पड़ा। सवाल यह है कि क्या इसका दुष्प्रभाव ही महत्वपूर्ण है? क्या इस बीमारी ने हमें प्रत्यक्ष या परोक्ष कुछ भी नहीं दिया? बरसों से दुनिया मौसम परिवर्तन की बातें कर रही है। प्राकृतिक दुर्घटनाओं की बातें हो रही हैं, पर ऐसी कोई दुर्घटना हो नहीं रही थी, जिसे दुनिया इतनी गहराई से महसूस करे, जिस शिद्दत से कोरोना ने महसूस कराया है। विश्व-समुदाय की भावना को अब हम कुछ बेहतर तरीके से समझ पा रहे हैं, भले ही उसे लागू करने के व्यावहारिक उपकरण हमारे पास नहीं हैं।

Monday, October 12, 2020

ट्रंप की बीमारी और ‘हैरतंगेज़’ अमेरिकी चुनाव


अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के ठीक एक महीने पहले डोनाल्ड ट्रंप का कोविड-19 पॉज़िटिव-टेस्ट और फिर आश्चर्यजनक तरीके से उनका स्वस्थ हो जाना काफी रोचक प्रकरण है। भगवती चरण वर्मा के शब्दों में, मुला स्वाँग खूब भरयो। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक की खबरें हैं कि उनमें कोरोना के लक्षण अब नहीं हैं। चार दिन से बुखार नहीं आया है। वे अस्पताल से ह्वाइट हाउस वापस आ गए हैं और अब कह रहे हैं कि 15 अक्तूबर को जो बिडेन के मुकाबले मायामी में होने वाली डिबेट में भाग लूँगा।

वॉल स्ट्रीट जरनल की रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप के आसपास जो अधिकारी रहते हैं वे मास्क और आँखों पर गॉगल लगाते हैं, पर ट्रंप मास्क पहनते हैं या नहीं, इसका पता नहीं। डॉक्टरों का कहना है कि अभी उनकी सेहत पर नजर रखनी होगी। पहले प्रशासन ने माना था कि उनकी तबीयत जितनी अच्छी बताई जा रही थी, उससे ज्यादा खराब थी। अब ट्रंप ने एक वीडियो जारी करके कहा है कि कोरोना संक्रमित करके ईश्वर ने मुझे अपना आशीर्वाद दिया है, आयुष्मान भवः।

Monday, October 5, 2020

क्या सेना का सहारा लेंगे ट्रंप?

डोनाल्ड ट्रंप अब अपनी रैलियों में इस बात का जिक्र बार-बार कर रहे हैं कि इसबार के चुनाव में धाँधली हो सकती है। जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आती जा रही है, वैसे-वैसे कयासों की बाढ़ आती जा रही है। यह बात तो पहले से ही हवा में है कि अगर हारे तो ट्रंप आसानी से पद नहीं छोड़ेंगे। डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से कहा जा रहा है कि चुनाव का विवाद अदालत और संसद में भी जा सकता है। और अब अमेरिकी सेना को लेकर अटकलें फिर से शुरू हो गई हैं। अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान, इराक, चीन, सीरिया और सोमालिया में भूमिकाओं को लेकर अटकलें तो चलती ही रहती थीं, पर अब कयास है कि राष्ट्रपति पद के चुनाव में भी उसकी भूमिका हो सकती है।

कुछ महीने पहले देश में चल रहे रंगभेद-विरोधी आंदोलन को काबू में करने के लिए जब ट्रंप ने सेना के इस्तेमाल की धमकी दी थी, तबसे यह बात हवा में है कि अमेरिकी सेना क्या ट्रंप के उल्टे-सीधे आदेश मानने को बाध्य है? बहरहाल गत 24 सितंबर को ट्रंप ने यह कहकर फिर से देश के माहौल को गर्म कर दिया है कि चुनाव में जो भी जीते, सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण नहीं होगा। इतना ही नहीं उसके अगले रोज ही उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि चुनाव ईमानदारी से होने वाले हैं। इसका मतलब क्या है?

Monday, September 28, 2020

अफ़ग़ान-वार्ता से कुछ न कुछ हासिल जरूर होगा


अफग़ानिस्तान में शांति स्थापना के लिए सरकार और तालिबान के बीच बातचीत दोहा में चल रह है। पहली बार दोनों पक्ष दोहा में आमने-सामने हैं। इस वार्ता के दौरान यह बात भी स्पष्ट होगी कि देश की जनता का जुड़ाव किस पक्ष के साथ कितना है। पिछले चार दशकों में यह देश लगातार एक के बाद अलग-अलग ढंग की राज-व्यवस्थाओं को देखता रहा है। कोई भी पूरी तरह सफल नहीं हुई है। इन व्यवस्थाओं में राजतंत्र से लेकर कम्युनिस्ट तंत्र और कठोर इस्लामिक शासन से लेकर वर्तमान अमेरिका-परस्त व्यवस्था शामिल है, जो अपेक्षाकृत आधुनिक है, पर उसका भी जनता के साथ पूरा जुड़ाव नहीं है। इसमें भी तमाम झोल हैं।

पिछले साल हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव के बाद अशरफ गनी के जीतने की घोषणा हुई, पर अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया। अंततः उनके साथ समझौता करना पड़ा और अब्दुल्ला अब्दुल्ला अब राष्ट्रीय सुलह-समझौता परिषद के अध्यक्ष हैं और इस वार्ता में सरकारी पक्ष का नेतृत्व कर रहे हैं। इस सरकार का देश के ग्रामीण इलाकों पर नियंत्रण नहीं है। तालिबान का असर बेहतर है। उनके बीच भी कई प्रकार के कबायली ग्रुप हैं।

अमेरिकी पलायन

पिछले दो दशक से अमेरिका और यूरोप के देश काबुल सरकार का सहारा बने हुए थे, पर वे अब खुद भागने की जुगत में हैं। कहना मुश्किल है कि विदेशी सेना की वापसी के बाद की व्यवस्था कैसी होगी, पर अच्छी बात यह है कि सभी पक्षों के पास पिछले चार दशक की खूंरेज़ी के दुष्प्रभाव का अनुभव है। सभी पक्ष ज्यादा समझदार और व्यावहारिक हैं।

Monday, September 21, 2020

साइबर-सूराखों के रास्ते ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’

इस हफ्ते ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ से जुड़ी दो सनसनीखेज खबरें हैं। सरकार और कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी एक चीनी कंपनी ‘विदेशी निशाने’ नाम से डेटाबेस तैयार कर रही है, जिसमें बड़ी संख्या में दुनियाभर के लोगों पर नजरें रखी जा रहीं हैं। जिन पर निगाहें हैं उनमें भारत के दस हजार से ज्यादा व्यक्ति शामिल हैं। ज्यादातर महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। उनके बारे में चीन क्या जानना चाहता है, क्यों जानना चाहता है ऐसे सवालों के जवाब बाद में मिलेंगे, पर जब इस सिलसिले में पूछताछ की गई तो पूरी वैबसाइट डाउन कर दी गई। इससे लगता है कि इसके पीछे कोई रहस्य जरूर है। कम से कम दुनिया में साइबर शक्ति के बढ़ते इस्तेमाल का पता इससे जरूर लगता है।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ज़ेंज़ुआ डेटा इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी कंपनी की ओर से जिन भारतीयों पर नज़र रखी जा रही है, उनमें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, गांधी परिवार, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, नवीन पटनायक जैसे बड़े नेता, राजनाथ सिंह-पीयूष गोयल जैसे केंद्रीय मंत्री, सीडीएस विपिन रावत समेत कई बड़े सेना के अफसर शामिल हैं। समाज के हरेक वर्ग के लोगों पर चीन की निगाहें हैं।

Monday, September 14, 2020

वैश्विक पूँजी क्या चीनी घर बदलेगी, भारत आएगी?

जापान सरकार अपने देश की कंपनियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित कर रही है कि वे चीन से अपने कारोबार को समेट कर भारत, बांग्लादेश या किसी आसियान देश में ले जाएं, तो उन्हें विशेष सब्सिडी दी जा सकती है। इसके पीछे देश के सप्लाई चेन का विस्तार करने के अलावा किसी एक क्षेत्र पर आधारित न रहने की इच्छा है। और गहराई से देखें, तो वैश्विक तनातनी में चीन के बजाय दूसरे देशों के साथ आर्थिक रिश्ते कायम करने की मनोकामना। चीन से विदेशी कंपनियों के हटने पर दो बातों मन में आती हैं। एक, क्या इससे चीनी अर्थव्यवस्था को धक्का लगेगा? और दूसरे क्या हमें इसका कोई फायदा मिलेगा?

चीन के बढ़ते वैश्विक हौसलों के पीछे उसकी बढ़ती आर्थिक शक्ति का हाथ है। तीस साल पहले चीन में वैश्विक पूँजी लग रही थी, पर अब चीनी पूँजी का वैश्वीकरण हो रहा है। एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और यूरोप में भी। चीनी आर्थिक रूपांतरण में उन अमेरिकी कंपनियों की भूमिका है, जिन्होंने अपने सप्लाई चेन को किफायती बनाए रखने के लिए चीन में अपने उद्योग लगाए थे। अब चीन से उद्योग हटेंगे, तो उसका असर क्या होगा? अमेरिका और यूरोप के बाजार चीनी माल मँगाना बंद करेंगे, तो चीन को कितना धक्का लगेगा?

Monday, September 7, 2020

कितनी गहरी है मुस्लिम ब्लॉक में दरार?

बीसवीं सदी में मुस्लिम ब्लॉक कभी बहुत एकताबद्ध नजर नहीं आया, पर कम से कम फलस्तीन के मामले में उसकी एकजुटता नजर आती थी। अब लग रहा है कि वह भी बदल रहा है। इसके समांतर मुस्लिम देशों में दरार पड़ रही है। यह दरार केवल फलस्तीन, इसरायल या कश्मीर के कारण नहीं है। राष्ट्रीय मतभेदों के ट्रिगर पॉइंट के पीछे दीन नहीं, दुनिया है। यानी आर्थिक और सामरिक बातें, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और नेतृत्व हथियाने की महत्वाकांक्षाएं।  

संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख ख़लीफ़ा बिन ज़ायेद ने गत 29 अगस्त को 48 साल पुराने 'इसरायल बहिष्कार क़ानून' को खत्म करने की घोषणा की, तो किसी को हैरत नहीं हुई। इस तरह अरब देशों के साथ इसरायल के रिश्तों में बड़ा बदलाव आ गया है। दुनिया इस बदलाव के लिए तैयार बैठी थी। यूएई की घोषणा में कहा गया है कि इसरायल का बहिष्कार करने के लिए वर्ष 1972 में बना संघीय क़ानून नंबर-15 खत्म किया जाता है। यह घोषणा केवल अरब देशों के साथ इसरायल के रिश्तों को ही पुनर्परिभाषित नहीं करेगी, बल्कि इस्लामिक देशों के आपसी रिश्तों को भी बदल देगी।

Monday, August 31, 2020

क्या अब कोरोना के अंत का प्रारम्भ है?


विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि कोरोनावायरस महामारी 1918 के स्पेनिश फ्लू की तुलना में कम समय तक रहेगी। संगठन के प्रमुख टेड्रॉस गैब्रेसस ने गत 21 अगस्त को कहा कि यह महामारी दो साल से कम समय में  खत्म हो सकती है। इसके लिए दुनियाभर के देशों के एकजुट होने और एक सर्वमान्य वैक्सीन बनाने में सफल होने की जरूरत है। जो संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार जो पाँच छह उल्लेखनीय वैक्सीन परीक्षणों के अंतिम दौर से गुजर रही हैं, उनमें से दो-तीन जरूर सफल साबित होंगी। कहना मुश्किल है कि सारी दुनिया को स्वीकार्य वैक्सीन कौन सी होगी, पर डब्लूएचओ के प्रमुख का बयान हौसला बढ़ाने वाला है।

इतिहास लिखने वाले कहते हैं कि महामारियों के अंत दो तरह के होते हैं। एक, चिकित्सकीय अंत। जब चिकित्सक मान लेते हैं कि बीमारी गई। और दूसरा सामाजिक अंत। जब समाज के मन से बीमारी का डर खत्म हो जाता है। कोविड-19 का इन दोनों में से कोई अंत अभी नहीं हुआ है, पर समाज के मन से उसका भय कम जरूर होता जा रहा है। यानी कि ऐसी उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं कि इसका अंत अब जल्द होगा। डब्लूएचओ का यह बयान इस लिहाज से उत्साहवर्धक है।

Tuesday, August 25, 2020

कोरोना-संहारक रामबाण की प्रतीक्षा

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गत 11 अगस्त को घोषणा की कि उनके देश की स्वास्थ्य विनियामक संस्था ने दुनिया की पहली कोरोना वायरस वैक्सीन के इस्तेमाल की अनुमति दे दी है। यह खबर बेहद सनसनीखेज है। इसलिए नहीं कि बहुत बड़ी चीज दुनिया के हाथ लग गई है, बल्कि इसलिए कि ज्यादातर विज्ञानियों ने इस फैसले को खतरनाक बताया है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अभी यह सवाल नहीं है कि यह वैक्सीन कारगर होगी या नहीं, बल्कि चिंता इस बात पर है कि इसके परीक्षण का एक महत्वपूर्ण चरण छोड़ दिया गया है।

विश्व के तमाम देशों को रूसी वैक्सीन से उम्मीदें और आशंकाएं हैं। आखिर रूस इतनी जल्दबाजी क्यों दिखा रहा है? ऐसी ही जल्दबाजी चीन भी दिखा रहा है? ऐसा नहीं कि जल्दी बाजार में आने से किसी देश को ज्यादा आर्थिक लाभ मिल जाएगा। अंततः सफल वही वैक्सीन होगी, जिसकी साख सबसे ज्यादा होगी। और लगता है कि अब वह समय आ रहा है, जब तीसरे चरण को पार करके सफल होने वैक्सीन की घोषणा भी हो जाए। अगले दो-तीन महीने इस लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।

Monday, August 17, 2020

बेरूत विस्फोट : लालफीताशाही की देन

मंगलवार 4 अगस्त को लेबनॉन के बेरूत शहर के बंदरगाह में हुए विस्फोट ने दुनियाभर को हिला दिया है। देश में सरकार विरोधी आंदोलन शुरू हो गया है। पूरे देश में राजनीतिक नेतृत्व के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। नागरिकों के मन में अपनी परेशानियों को लेकर जो गुस्सा भरा है, वह एकबारगी फूट पड़ा है। यह नाराजगी अब शायद राजनीतिक बदलाव के बाद ही खत्म हो पाएगी। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वहाँ की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा है। प्रधानमंत्री हसन दीब ने कहा है कि समय से पहले चुनाव कराए बगैर हम इस संकट से बाहर नहीं निकल पाएंगे। पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच झड़पों के कारण अराजकता का माहौल बन गया है।

Monday, August 10, 2020

बांग्लादेश पर भी चीन का सम्मोहिनी जादू!

 

नवम्बर 2014 में काठमांडू में दक्षेस शिखर सम्मेलन जब हुआ था, एक खबर हवा में थी कि नेपाल सरकार चीन को भी इस संगठन का सदस्य बनाना चाहती है। सम्मेलन के दौरान यह बात भारतीय मीडिया में भी चर्चा का विषय बनी थी। यों चीन 2005 से दक्षेस का पर्यवेक्षक देश है, और शायद वह भी इस इलाके में अपनी ज्यादा बड़ी भूमिका चाहता है। काठमांडू के बाद दक्षेस का शिखर सम्मेलन पाकिस्तान में होना था, वह नहीं हुआ और फिलहाल यह संगठन एकदम खामोश है। भारत-पाकिस्तान रिश्तों की कड़वाहट इस खामोशी को बढ़ा रही है।

इस दौरान भारत ने बिम्स्टेक जैसे वैकल्पिक क्षेत्रीय संगठनों में अपनी भागीदारी बढ़ाई और ‘माइनस पाकिस्तान’ नीति की दिशा में कदम बढ़ाए। पर चीन के साथ अपने रिश्ते बनाकर रखे थे। लद्दाख में घुसपैठ की घटनाओं के बाद हालात तेजी से बदले हैं। पाकिस्तान तो पहले से था ही अब नेपाल भी खुलकर बोल रहा है। पिछले पखवाडे की कुछ घटनाओं से लगता है कि बांग्लादेश को भी भारत-विरोधी मोर्चे का हिस्सा बनाने की कोशिशें हो रही हैं। बावजूद इसके कि डिप्लोमैटिक गणित बांग्लादेश को पूरी तरह चीनी खेमे में जाने से रोकता है। पर यह भी लगता है कि बांग्लादेश सरकार ने भारत से सायास दूरी बनाई है।

Monday, August 3, 2020

पीछे क्यों नहीं हट रही चीनी सेना?

प्रधानमंत्री से लेकर रक्षामंत्री तक ने कहा है कि देश की एक इंच जमीन पर भी कब्जा होने नहीं दिया जाएगा, पर तीन महीने से ज्यादा लम्बी कशमकश के बाद कोई नहीं कह सकता कि चीनी सेना की वापसी हो चुकी है। जो बातें सामने आ रही हैं, उनसे लगता है कि चीन ने लम्बा जाल फेंका है। भारत सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी। इस घुसपैठ के समांतर कई परिघटनाएं हुई हैं, जिनका राजनयिक महत्व है। नेपाल तो था ही अब भूटान और बांग्लादेश के साथ रिश्तों में खलिश पैदा करने की कोशिश भी हुई है।

Monday, July 27, 2020

चीन-ईरान समझौते से चोट लगेगी भारत को

ईरान और चीन एक लम्बा सहयोग समझौता करने जा रहे हैं, जिससे वैश्विक समीकरण बदल जाने की संभावना है। चीन और ईरान की योजना के बरक्स यदि यूरोपीय देश निकट या सुदूर भविष्य में अमेरिकी प्रभा-मंडल से बाहर निकल गए, तो दुनिया की सूरत बदल जाएगी। साथ ही पश्चिम एशिया में चीन एक जबर्दस्त ताकत बनकर उभरेगा। ईरान को सऊदी अरब के वर्चस्व को समाप्त करने का मौका मिलेगा। पर ये सब संभावनाएं हैं और इस किस्म की हरेक अटकल के साथ उसके अंतर्विरोध भी जुड़े हैं। यह दो समान वजन वाली ताकतों का समझौता नहीं है। चीन विचारधारा से प्रेरित मूल्यबद्ध देश नहीं है। उसके पीछे अपनी महानता की जुनूनी मनोकामना है।

इलाके में ईरान अकेला ऐसा महत्वपूर्ण देश है, जो अमेरिका के खिलाफ खुलकर खड़ा हो सकता है। ऐसे देश की चीन को जरूरत है। चीन और ईरान दोनों को इस साल डोनाल्ड ट्रंप की पराजय का इंतजार भी है। जो बायडन का संभावित नया निजाम शायद ईरान को भटकने से रोके। ईरान के भीतर एक तत्व ऐसा भी है, जो चीन के दुर्धर्ष ‘आर्थिक अश्वमेध’ को समझता है। समझौते के दायरे में आर्थिक, सांस्कृतिक और सामरिक हर तरह का सहयोग शामिल होगा और यह कम से कम 25 साल के लिए किया जाएगा। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने यह खबर इसी अंदाज में लिखी है कि यह समझौता हो गया है। सबूत के तौर पर एक दस्तावेज भी प्रकाशित किया गया है, जो समझौते का प्रारूप है।

Monday, July 20, 2020

पायलटों पर लगी वैश्विक पाबंदियों से गिरी पाकिस्तान की साख

गरीबी, अशिक्षा और कोरोना जैसी महामारी के दुष्प्रभाव से लड़ते जूझते दक्षिण एशिया में जब भारत और पाकिस्तान के रिश्तों पर नजर डालते हैं, तो बेहद निराशाजनक तस्वीर उभर कर आती है। हाल में खबरें हैं कि पाकिस्तान ने कश्मीर मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए अपने प्रयास बढ़ा दिए हैं। दूसरी तरफ वह एफएटीएफ की काली सूची में जाने से वह इसलिए बच गया, क्योंकि कोरोना के कारण दुनिया के पास इन बातों के लिए वक्त नहीं है। भारत के साथ रिश्तों को सुधारने की बात करने का मतलब पाकिस्तान में पाप माना जाता है, जबकि जरूरत इस बात की है कि दोनों देश मिलकर आर्थिक-सामाजिक बदहाली से लड़ाई लड़ें।

कुछ समय पहले इमरान खान ने ट्वीट किया कि हमने कोरोना महामारी के दौर में नौ हफ्तों में देश के एक करोड़ परिवारों को 120 अरब रुपये की सहायता पहुँचाई है। भारत चाहे, तो हम उसे मदद पहुँचाने का तरीका बता सकते हैं और पैसे से मदद भी कर सकते हैं। उनके इस ट्वीट का पाकिस्तान में ही काफी मजाक बना। दूसरी तरफ खबरें हैं कि पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था नीचे गिरने के नए प्रतिमान स्थापित कर रही है। वहाँ से सत्ता परिवर्तन की अफवाहें भी आती रहती हैं। खासतौर से इमरान खान के नेतृत्व को लेकर सवाल हैं। इसी संदर्भ में ‘माइनस वन’ फॉर्मूला भी चर्चित हुआ है। इसका मतलब है इमरान खान को हटाकर सरकार के वर्तमान स्वरूप को बनाए रखना।

गिरती साख

हाल में देश का बजट पेश हुआ। उसके पहले पेश की गई आर्थिक समीक्षा में चेतावनी दी गई कि नैया डूब रही है। विदेशी कर्जा जीडीपी का 88 फीसदी हो गया है। करीब 60 फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जाने का अंदेशा है। अर्थव्यवस्था लगातार विदेशी कर्ज के सहारे है। कब तक कर्ज मिलेगा? देश की साख वैश्विक मंच पर लगातार गिर रही है। ऐसे में एक खराब खबर नागरिक उड्डयन के क्षेत्र से मिली है। पाकिस्तानी पायलटों के विमान संचालन पर तकरीबन पूरी दुनिया में रोक लग गई है।

Monday, July 13, 2020

संकट में ओली और असमंजस में नेपाल


नेपाल का राजनीतिक संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले तीन महीने का असमंजस निर्णायक मोड़ पर आता दिखाई पड़ रहा है, पर यह मोड़ क्या होगा, यह साफ नहीं है। तीन-चार संभावित रास्ते दिखाई पड़ रहे हैं। एक, ओली अध्यक्ष पद छोड़ दें और प्रधानमंत्री बने रहें। दूसरे वे अध्यक्ष बने रहें और प्रधानमंत्री पद छोड़ें। तीसरा रास्ता है, पार्टी का विभाजन। पार्टी में विभाजन हुआ, तब देश फिर से बहुदलीय असमंजस का शिकार हो जाएगा और नेपाली कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाएगी। इन सब बातों की पृष्ठभूमि में नेपाल पर भारत और चीन के राजनीतिक प्रभाव की भी परीक्षा है। फिलहाल तो यही लगता है कि नेपाल पर चीन का प्रभाव है। इस हफ्ते भारत के निजी समाचार चैनलों पर रोक लगना भी इस बात की गवाही दे रहा है।

विदेश-नीति के मोर्चे पर प्रधानमंत्री केपीएस ओली की सरपट चाल के उलट परिणाम अब सामने आ रहे हैं। पुष्प दहल के साथ समझौता करके क्या वे अपनी सरकार बचा लेंगे? हालांकि यह बात मुश्किल लगती है, पर ऐसा हुआ भी तो यह स्थायी हल नहीं है। ओली साहब के सामने विसंगतियाँ कतार लगाए खड़ी हैं। संकट को टालने में चीनी राजदूत होऊ यांछी के हड़बड़ प्रयास भी चर्चा का विषय बने हैं। उन्होंने दोनों खेमों के नेताओं से मुलाकात करके समाधान की जो कोशिशें कीं, उससे इतना साफ हुआ कि चीन खुलकर नेपाली राजनीति में हस्तक्षेप कर रहा है। उन्होंने 3 जुलाई को राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से भी मुलाकात की, जो खुद इस टकराव में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

चीन-मुखी नीति को लेकर सवाल

औपचारिक शिष्टाचार के अनुसार ऐसी मुलाकातों के समय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को भी उपस्थित रहना चाहिए, पर ऐसा हुआ नहीं। पता नहीं उन्हें जानकारी थी भी या नहीं। इसके पहले होऊ ने अप्रेल और मई में भी हस्तक्षेप करके पार्टी को विभाजन के रास्ते पर जाने से बचाया था। चीन ने भारत के विरुद्ध नेपाली राष्ट्रवाद के उभार का भी लाभ उठाया। नक्शा प्रकरण इसका उदाहरण है। ओली की चीन-मुखी विदेश नीति को लेकर भी अब सवाल उठने लगे हैं। मंगलवार को नेपाली कांग्रेस और जसपा की बैठक शेर बहादुर देउबा के निवास पर हुई, जिसमें विदेश नीति के झुकाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण पर नाराजगी व्यक्त की गई।

Monday, July 6, 2020

भारत क्या नए शीतयुद्ध का केंद्र बनेगा?


लद्दाख की गलवान घाटी में 15 जून की रात हुए हिंसक संघर्ष के बाद दुबारा कोई बड़ी घटना नहीं हुई है, पर समाधान के लक्षण भी नजर नहीं आ रहे हैं। सन 1962 के बाद पहली बार लग रहा है कि टकराव रोकने का कोई रास्ता नहीं निकला, तो वह बड़ी लड़ाई में तब्दील हो सकता है। दोनों पक्ष मान रहे हैं कि सेनाओं को एक-दूसरे से दूर जाना चाहिए, पर कैसे? अब जो खबरें मिली हैं, उनके अनुसार टकराव की शुरूआत पिछले साल सितंबर में ही हो गई थी, जब पैंगांग झील के पास दोनों देशों के सैनिकों की भिड़ंत हुई थी, जिसमें भारत के दस सैनिक घायल हुए थे।

शुरूआती चुप्पी के बाद भारत सरकार ने औपचारिक रूप से 25 जून को स्वीकार किया कि मई के महीने से चीनी सेना ने घुसपैठ बढ़ाई है। गलवान घाटी में पेट्रोलिंग पॉइंट-14 (पीपी-14) के पास हुई झड़प के बाद यह टकराव शुरू हुआ है। लगभग उसी समय पैंगांग झील के पास भी टकराव हुआ। दोनों घटनाएं 5-6 मई की हैं। उसी दौरान हॉट स्प्रिंग क्षेत्र से भी घुसपैठ की खबरें आईं। देपसांग इलाके में भी चीनी सैनिक जमावड़ा है।

Monday, June 29, 2020

सिर्फ फौज काफी नहीं चीन से मुकाबले के लिए

लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ मुठभेड़ के बाद देश के रक्षा विभाग ने एलएसी पर तैनात सैनिकों के लिए कुछ व्यवस्थाओं में परिवर्तन किए हैं। सेना को निर्देश दिए गए हैं कि असाधारण स्थितियों में अपने पास उपलब्ध सभी साधनों का इस्तेमाल करें। खबर यह भी है कि रक्षा मंत्रालय ने सैनिकों के लिए सुरक्षा उपकरण तथा बुलेटप्रूफ जैकेट बनाने वाली कंपनियों से संपर्क किया है और करीब दो लाख यूनिटों का आदेश दिया है। इस बीच पता लगा कि ऐसे उपकरण बनाने वाली बहुसंख्यक भारतीय कंपनियाँ इनमें लगने वाली सामग्री चीन से मँगाती हैं।

क्या हम चीनी सैनिकों से रक्षा के लिए उनके ही माल का सहारा लेंगे? हम यहाँ भी आत्मनिर्भर नहीं हैं? नीति आयोग के सदस्य और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के पूर्व प्रमुख वीके सारस्वत ने चीन से आयात की नीति पर पुनर्विचार करने की सलाह दी है। पीएचडी चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने भी रक्षा सचिव को इस आशय का पत्र लिखा है। बात पहले से भी उठती रही है, पर अब ज्यादा जोरदार तरीके से उठी है।

स्वदेशी कवच

इस सिलसिले में आर्मी डिजाइन ब्यूरो ने ‘सर्वत्र कवच’ नाम से एक आर्मर सूट विकसित किया गया है, जो पूरी तरह स्वदेशी है। उसमें चीनी सामान नहीं लगा है। गत 23 दिसंबर को तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने इसे विकसित करने पर मेजर अनूप मिश्रा को उत्कृष्टता सम्मान भी प्रदान किया था। इस कवच के फील्ड ट्रायल चल रहे हैं, इसलिए फिलहाल हमें चीनी सामग्री वाले कवच भी पहनने होंगे। साथ ही अमेरिका और यूरोप से सामग्री मँगानी होगी, जिसकी कीमत ज्यादा होगी।

Tuesday, June 23, 2020

अफगान शांति-वार्ता और भारतीय डिप्लोमेसी की परीक्षा

कोरोना महामारी, अमेरिका में चल रहे अश्वेत-प्रदर्शनों और भारत-चीन टकराव के बीच एक अच्छी खबर है कि अफग़ानिस्तान में शांति स्थापना के लिए सरकार और तालिबान के बीच बातचीत का रास्ता साफ हो गया है। पहली बार दोनों पक्ष दोहा में आमने-सामने हैं। केवल कैदियों की रिहाई की पुष्टि होनी है, जो चल रही है। क़तर के विदेश मंत्रालय के विशेष दूत मुश्ताक़ अल-क़ाहतानी ने अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ ग़नी से काबुल में मुलाकात के बाद इस आशय की घोषणा की।

पिछले कुछ हफ्तों में सबसे पहले अफ़ग़ानिस्तान सरकार के सत्ता संघर्ष में अशरफ ग़नी और अब्दुल्ला अब्दुल्ला के धड़ों के बीच युद्धविराम हुआ, फिर सभी पक्षों ने समझौते की दिशा में सोचना शुरू किया। गत 23 मई को तालिबान ने ईद के मौके पर तीन दिन के युद्धविराम की घोषणा की। हालांकि हिंसक घटनाएं उसके बाद भी हुई हैं, पर कहना मुश्किल है कि उनके पीछे तालिबान, इस्लामिक स्टेट या अल कायदा किसका हाथ है।

संदेह फिर भी कायम

अमेरिकी सेना ने भी कम से कम दो जगहों, पश्चिमी फराह और दक्षिणी कंधार क्षेत्र में हवाई हमलों की घोषणा की है। चूंकि अमेरिकी निगहबानी खत्म होने जा रही है, इसलिए सवाल यह भी है कि क्या अफीम की खेती का कारोबार फिर से शुरू होगा, जो कभी तालिबानी कमाई का एक जरिया था। इन सब बातों के अलावा तालिबान की सामाजिक समझ, आधुनिक शिक्षा और स्त्रियों के प्रति उनके दृष्टिकोण को लेकर भी संदेह हैं।

Sunday, June 14, 2020

लोकतांत्रिक महा-दुर्घटना के मुहाने पर अमेरिका


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक तरफ कोरोना वायरस की मार से पीड़ित हैं कि जॉर्ज फ़्लॉयड के प्रकरण ने उन्हें बुरी तरह घेर लिया है। आंदोलन से उनकी नींद हराम है। क्या वे इस साल के चुनाव में सफल हो पाएंगे? चुनाव-पूर्व ओपीनियन पोल खतरे की घंटी बजा रहे हैं। ऐसे में गत 26 मई को ट्रंप ने एक ऐसा ट्वीट किया, जिसे पढ़कर वह अंदेशा पुख्ता हो रहा है कि चुनाव हारे तो वे राष्ट्रपति की कुर्सी नहीं छोड़ेंगे। यानी नतीजों को आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे। और इससे अमेरिका में सांविधानिक संकट पैदा हो जाएगा। 

Monday, June 8, 2020

लपटों से घिरा ट्रंप का अमेरिका


लम्बे अरसे से साम्यवादी कहते रहे हैं, पूँजीवाद हमें वह रस्सी बनाकर बेचेगा, जिसके सहारे हम उसे लटकाकर फाँसी देंगे। इस उद्धरण का श्रेय मार्क्स, लेनिन, स्टैलिन और माओ जे दुंग तक को दिया जाता है और इसे कई तरह से पेश किया जाता है। आशय यह कि पूँजीवाद की समाप्ति के उपकरण उसके भीतर ही मौजूद हैं। पिछली सदी के मध्यकाल में मरणासन्न पूँजीवाद और अंत का प्रारम्भ जैसे वाक्यांश वामपंथी खेमे से उछलते रहे। हुआ इसके विपरीत। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया को लगा कि अंत तो कम्युनिज्म का हो गया।

उस परिघटना के तीन दशक बाद पूँजीवाद का संकट सिर उठा रहा है। अमेरिका में इन दिनों जो हो रहा है, उसे पूँजीवाद के अंत का प्रारम्भ कहना सही न भी हो, पश्चिमी उदारवाद के अंतर्विरोधों का प्रस्फुटन जरूर है। डोनाल्ड ट्रंप का उदय इस अंतर्विरोध का प्रतीक था और अब उनकी रीति-नीति के विरोध में अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिकों का आंदोलन उन अंतर्विरोधों को रेखांकित कर रहा है। पश्चिमी लोकतंत्र के सबसे पुराने गढ़ में उसके सिद्धांतों और व्यवहार की परीक्षा हो रही है।