Showing posts with label राम मंदिर. Show all posts
Showing posts with label राम मंदिर. Show all posts

Tuesday, October 30, 2018

ऐसे तो नहीं रुकेगा मंदिर का राजनीतिकरण


अयोध्या मामले का राजनीतिकरण इस हद तक हो चुका है कि अब मंदिर बने तब और न बने तब भी उसका फायदा बीजेपी को मिलेगा। यह बात उन लोगों को समझ में नहीं आ रही थी, जो अदालत में इसकी सुनवाई में विलंब कराने की कोशिश कर रहे थे। अब इस मामले के राजनीतिक निहितार्थों को देखें और इंतजार करें कि क्या होने वाला है। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस मसले पर अगली सुनवाई जनवरी 2019 में एक उचित पीठ के समक्ष होगी। यह सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं के समूह पर होगी। हाईकोर्ट ने विवादित स्थल को तीन भागों रामलला, निर्मोही अखाड़ा व मुस्लिम वादियों में बांटा था।

गौर करें, तो पाएंगे कि मंदिर मसले पर बीजेपी को अपनी पहलकदमी के मुकाबले मंदिर-विरोधी राजनीति का लाभ ज्यादा मिला है। मंदिर समर्थकों को कानूनी तरीके से जल्द मंदिर बनने की उम्मीद थी, जो फिलहाल पूरी होती नजर नहीं आ रही है। यानी कि अब वे एक नया आंदोलन शुरू करेंगे। इस आंदोलन का असर पाँच राज्यों के और लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। बेशक बीजेपी के नेताओं पर भी दबाव है, पर इससे उन्हें नुकसान क्या होगा? वे कहेंगे हमारे हाथ मजबूत करो। बीजेपी मंदिर मसले को चुनाव का मुद्दा नहीं बना रही थी, तो अब बनाएगी।

क्या अध्यादेश आएगा?

बीजेपी के भीतर से आवाजें आ रहीं हैं कि सरकार अध्यादेश या बिल लाकर मंदिर बनाए। सरसंघ चालक  मोहन भागवत कह चुके हैं कि सरकार को कानून बनाना चाहिए। सुब्रमण्यम स्वामी ने इस माँग का स्वागत किया है। संघ के अलावा विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना की भी यही राय है। अध्यादेश या विधेयक से क्या मंदिर बन जाएगा? राज्यसभा में क्या पर्याप्त समर्थन मिलेगा? नहीं मिला तब भी पार्टी यह कह सकती है कि हमने कोशिश तो की बिल पास भी हो जाए, तो सुप्रीम कोर्ट से भी रुक सकता है। यह सब इतना आसान नहीं है, जितना समझाया जा रहा है। इसका हल सभी पक्षों के बीच समझौते से ही निकल सकता है। 

Saturday, October 27, 2018

क्यों मचा फिर से मंदिर का शोर?


भारतीय जनता पार्टी के लिए राम मंदिर एक औजार है, जिसका इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से होता है। कभी लगता है कि वह इस भारी हथौड़े का इस्तेमाल नहीं करना चाहती और कभी इसे फिर से उठा लेती है। पिछले लोकसभा चुनाव में लगता था कि इस मसले से पार्टी ने किनाराकशी कर ली है। और अब लग रहा है कि वह इसे बड़ा मुद्दा बनाएगी। सुप्रीम कोर्ट में 29 अक्तूबर से इस मामले पर सुनवाई शुरू हो रही है। उधर चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में मंदिर भी मुद्दा बन गया है।

पिछले हफ्ते पुणे के श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई गणपति मंदिर में पूजा करने आए संघ-प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि अयोध्या में शीघ्र मंदिर निर्माण होगा। बताते हैं कि संघ प्रमुख खासतौर से राम-मंदिर और राम-राज्य मनोकामना की पूर्ति के लिए अभिषेक करके गए हैं। इससे पहले वे राम मंदिर पर कानून बनाने की सलाह सरकार को दे चुके हैं।

मंदिर को लेकर उत्साह

उधर छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रचार के लिए आए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, अयोध्या में जल्द बनेगा भव्य राम मंदिर। इसकी शुरुआत हो चुकी है। पिछले कुछ समय से अचानक अध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर मंदिर बनाने की मुहिम में उतरे हैं। साम-दाम-दंड हर तरह से कोशिशें चल रहीं हैं। पिछले डेढ़ सौ साल से ज़्यादा समय में कम से कम नौ बड़ी कोशिशें मंदिर-मस्जिद मसले के समाधान के लिए हुईं और परिणाम कुछ नहीं निकला।

Saturday, November 18, 2017

चुनाव के अलावा कुछ और भी जुड़ा है अयोध्या-पहल के साथ

अयोध्या मसले पर अचानक चर्चा शुरू होने के पीछे कारण क्या है? पिछले कुछ साल से यह मसला काफी पीछे चला गया था। इस पर बातें केवल औपचारिकता के नाते ही की जाती थीं। सन 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद से न्याय व्यवस्था ने भी इस दिशा में सक्रियता कम कर दी थी। तब यह अचानक सामने क्यों आया?
अयोध्या पर चर्चा की टाइमिंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभाओं के चुनाव सामने हैं। गुजरात में कांग्रेस पार्टी ने दलितों, ओबीसी और पाटीदारों यानी हिन्दू जातियों के अंतर्विरोध को हथियार बनाया है, जिसका सहज जवाब है हिन्दू अस्मिता को जगाना। गुजरात में बीजेपी दबाव में आएगी तो वह ध्रुवीकरण के हथियार को जरूर चलाएगी। पर अयोध्या की गतिविधियाँ केवल चुनावी पहल नहीं लगती।
भाजपा का ब्रह्मास्त्र
सन 2018 में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव भी होंगे। कर्नाटक में कांग्रेस ने कन्नड़ अस्मिता और लिंगायतों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। इसलिए लगता है कि बीजेपी अपने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल करने जा रही है। यह बात आंशिक रूप से सच हो सकती है। शायद चुनाव में भाजपा को मंदिर की जरूरत पड़ेगी, पर यह केवल वहीं तक सीमित नहीं लगता। हाँ इतना लगता है कि इस अभियान के पीछे भाजपा का हाथ भी है, भले ही वह इससे इनकार करे।

Thursday, November 16, 2017

क्या अयोध्या विवाद का समाधान करेंगे श्री श्री?

नज़रिया: राम मंदिर पर श्री श्री की पहल के पीछे क्या है?
प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
श्री श्री रविशंकर की पहल के कारण मंदिर-मस्जिद मसला एक बार फिर से उभर कर सामने आया है. देखना होगा कि इस पहल के समांतर क्या हो रहा है. और यह भी कि इस पहल को संघ और सरकार के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन है या नहीं.
आमतौर पर ऐसी कोशिशों के वक्त चुनाव की कोई तारीख़ क़रीब होती है या फिर 6 दिसम्बर जिसे कुछ लोग 'शौर्य दिवस' के रूप में मनाते हैं और कुछ 'यौमे ग़म.'
संयोग से इस वक्त एक तीसरी गतिविधि और चलने वाली है.

कई कोशिशें हुईं, लेकिन नतीजा नहीं निकला
पिछले डेढ़ सौ साल से ज़्यादा समय में कम से कम नौ बड़ी कोशिशें मंदिर-मस्जिद मसले के समाधान के लिए हुईं और परिणाम कुछ नहीं निकला. पर इन विफलताओं से कुछ अनुभव भी हासिल हुए हैं.
हल की तलाश में श्री श्री अयोध्या का दौरा कर रहे हैं. उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से मुलाक़ात भी की है.
पृष्ठभूमि में इस मसले से जुड़े अलग-अलग पक्षों से उनकी मुलाक़ात हुई है. कहना मुश्किल है कि उनके पीछे कोई राजनीतिक प्रेरणा है या नहीं.

गुजरात चुनाव और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
गुजरात में कांग्रेस पार्टी ने दलितों, ओबीसी और पाटीदारों यानी हिन्दू जातियों के अंतर्विरोध को हथियार बनाया है जिसका सहज जवाब है 'हिन्दू अस्मिता' को जगाना.
गुजरात में बीजेपी दबाव में आएगी तो वह ध्रुवीकरण के हथियार को ज़रूर चलाएगी. पर अयोध्या की गतिविधियाँ केवल चुनावी पहल नहीं लगती.
गुजरात के चुनाव के मुक़ाबले ज़्यादा बड़ी वजह है सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर 5 दिसम्बर से शुरू होने वाली सुनवाई. इलाहाबाद हाईकोर्ट के सन् 2010 के फ़ैसले के सिलसिले में 13 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं. अब इन पर सुनवाई होगी.
कुछ पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि पार्टी 2019 के पहले मंदिर बनाना चाहती है. कुछ महीने पहले सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट किया था, राम मंदिर का हल नहीं निकला तो अगले साल, यानी 2018 में अयोध्या में वैसे ही राम मंदिर बना दिया जाएगा.