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Thursday, December 22, 2016

कांग्रेस को भी घायल करेंगे राहुल के तीर

असर करे या न करे, पर राहुल गांधी के लिए सहारा का तीर चलाना मजबूरी बन गया था. दो हफ्ते पहले वे घोषणा कर चुके थे कि उनके पास ऐसी जानकारी है, जो भूचाल पैदा कर देगी. उसे छिपाकर रखना उनके लिए संभव नहीं था. 
देर से दी गई इस जानकारी से अब कोई भूचाल तो पैदा नहीं होगा, पर राजनीति का कलंकित चेहरा जरूर सामने आएगा. जिन दस्तावेजों का जिक्र किया जा रहा है, उनमें कांग्रेस को परेशान करने वाली बातें भी हैं. 

Tuesday, December 20, 2016

राहुल के तेवर इतने तीखे क्यों?

राहुल गांधी के तेवर अचानक बदले हुए नजर आते हैं। उन्होंने बुधवार को नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोलकर माहौल को विस्फोटक बना दिया है। उन्हें विपक्ष के कुछ दलों का समर्थन भी हासिल हो गया है। इनमें तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी शामिल हैं। हालांकि बसपा भी उनके साथ नजर आ रही है, जबकि दूसरी ओर यूपी में कांग्रेस और सपा के गठबंधन की अटकलें भी हैं। बड़ा सवाल फिलहाल यह है कि राहुल ने इतना बड़ा बयान किस बलबूते दिया और वे किस रहस्य पर से पर्दा हटाने वाले हैं? क्या उनके पास ऐसा कोई तथ्य है जो मोदी को परेशान करने में कामयाब हो? 
बहरहाल संसद का सत्र खत्म हो चुका है और राजनीति का अगला दौर शुरू हो रहा है। नोटबंदी के कारण पैदा हुई दिक्कतें भी अब क्रमशः कम होती जाएंगी। अब सामने पाँच राज्यों के चुनाव हैं। देखना है कि राहुल इस दौर में अपनी पार्टी को किस रास्ते पर लेकर जाते हैं।  

Wednesday, December 14, 2016

क्या राहुल के पास वास्तव में कुछ कहने को है?

राहुल गांधी ने विस्फोट भले ही नहीं किया, पर माहौल विस्फोटक जरूर बना दिया है. यह उनकी छापामार राजनीति की झलक है, जिसे उन्होंने पिछले साल के मॉनसून सत्र से अपनाया है. यह संजीदा संसदीय विमर्श का विकल्प नहीं है. वे क्या कहना चाहते हैं और क्या जानकारी उनके पास है, इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए. उन्होंने जिस अंदाज में बातें की हैं, उनसे लगता है कि अब कुछ धमाके और होंगे.

Sunday, October 23, 2016

रीता नहीं, राहुल की फिक्र कीजिए

रीता बहुगुणा जोशी के कांग्रेस से पलायन का निहितार्थ क्या है? एक विशेषज्ञ का कहना है कि इससे न तो भाजपा को फायदा होगा और न कांग्रेस को कोई नुकसान होगा। केवल बहुगुणा परिवार को नुकसान होगा। उनकी मान्यता है कि विजय बहुगुणा और रीता बहुगुणा का राजनीतिक प्रभाव बहुत ज्यादा नहीं है। यह प्रभाव है या नहीं इसका पता उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के चुनावों में लगेगा। मेरी समझ से फिलहाल इस परिघटना को राहुल गांधी के कमजोर होते नेतृत्व के संदर्भ में देखना चाहिए। पार्टी छोड़ने के बाद रीता बहुगुणा ने कहा, कांग्रेस को विचार करना चाहिए कि उसके बड़े-बड़े नेता नाराज़ क्यों हैं? क्या कमी है पार्टी में? क्या कांग्रेस की कार्यशैली में बदलाव आ गया है? यह बात केवल एक नेता की नहीं है। समय बताएगा कि कितने और नेता इस बात को कहने वाले हैं।

Sunday, June 19, 2016

कांग्रेस का आखिरी दाँव

कांग्रेस के पास अब कोई विकल्प नहीं है। राहुल गांधी की सफलता या विफलता  भविष्य की बात है, पर उन्हें अध्यक्ष बनाने के अलावा पार्टी के पास कोई रास्ता नहीं बचा। सात साल से ज्यादा समय से पार्टी उनके नाम की माला जप रही है। अब जितनी देरी होगी उतना ही पार्टी का नुकसान होगा। हाल के चुनावों में असम और केरल हाथ से निकल जाने के बाद डबल नेतृत्व से चमत्कार की उम्मीद करना बेकार है। सोनिया गांधी अनिश्चित काल तक कमान नहीं सम्हाल पाएंगी। राहुल गांधी के पास पूरी कमान होनी ही चाहिए।

राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद अब प्रियंका गांधी को लाने की माँग भी नहीं उठेगी। शक्ति के दो केन्द्रों का संशय नहीं होगा। कांग्रेस अब बाउंसबैक करे तो श्रेय राहुल को और डूबी तो उनका ही नाम होगा। हालांकि कांग्रेस की परम्परा है कि विजय का श्रेय नेतृत्व को मिलता है और पराजय की आँच उसपर पड़ने से रोकी जाती है। सन 2009 की जीत का श्रेय मनमोहन सिंह के बजाय राहुल को दिया गया और 2014 की पराजय की जिम्मेदारी सरकार पर डाली गई।

Friday, June 3, 2016

कई पहेलियों का हल निकालना होगा राहुल को

कांग्रेस पार्टी की जिम्मेदारी अब राहुल गांधी के कंधों पर पूरी तरह आने वाली है. एक तरह से यह मौका है जब राहुल अपनी काबिलीयत साबित कर सकते हैं. पार्टी लगातार गिरावट ढलान पर है. वे इस गिरावट को रोकने में कामयाब हुए तो उनकी कामयाबी होगी. वे कामयाब हों या न हों, यह बदलाव होना ही था. फिलहाल इससे दो-तीन बातें होंगी. सबसे बड़ी बात कि अनिश्चय खत्म होगा. जनवरी 2013 के जयपुर चिंतन शिविर में उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था, तब यह बात साफ थी कि वे वास्तविक अध्यक्ष हैं. पर व्यावहारिक रूप से पार्टी के दो नेता हो गए. उसके कारण पैदा होने वाला भ्रम अब खत्म हो जाएगा.

Sunday, July 19, 2015

‘डायपर-छवि’ से क्या बाहर आ पाएंगे राहुल?

भारतीय राजनीति में इफ्तार पार्टी महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधि के रूप में अपनी जगह बना चुकी है। इस लिहाज से सोनिया गांधी की इफ्तार पार्टी में मुलायम सिंह और लालू यादव का न जाना और राष्ट्रपति की इफ्तार पार्टी में नरेंद्र मोदी का न जाना बड़ी खबरें हैं। बनते-बिगड़ते रिश्तों और गोलबंदियों की झलक पिछले हफ्ते देखने को मिली। पर शुक्रवार को राहुल गांधी के नरेंद्र मोदी पर वार और भाजपा के पलटवार से अगले हफ्ते की राजनीति का आलम समझ में आने लगा है। साफ है कि कांग्रेस अबकी बार भाजपा पर पूरे वेग से प्रहार करेगी। पर अप्रत्याशित रूप से सरकार ने भी कांग्रेस पर भरपूर ताकत से पलटवार का फैसला किया है। इस लिहाज से संसद का यह सत्र रोचक होने वाला है।

Friday, March 20, 2015

क्या ‘मोदी मैजिक’ को तोड़ सकती है कांग्रेस?

सोनिया गांधी ‘सेक्युलर’ ताकतों को एक साथ लाने में कामयाब हुईं हैं. पिछले साल लोकसभा चुनाव के पहले इस किस्म का गठजोड़ बनाने की कोशिश हुई थी, पर उसका लाभ नहीं मिला. राज्यों के विधानसभा चुनावों में इसकी कोशिश नहीं हुई. केवल उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के उपचुनावों में इसका लाभ मिला. उसके बाद दिल्ली के विधानसभा चुनाव में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में यह एकता दिखाई दी. निष्कर्ष यह है कि जहाँ मुकाबला सीधा है वहाँ यदि एकता कायम हुई तो मोदी मैजिक नहीं चलेगा.

क्या इस कांग्रेस भाजपा विरोधी मोर्चे का नेतृत्व कांग्रेस करेगी? पिछले हफ्ते की गतिविधियों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर सोनिया गांधी के नेतृत्व में 14 पार्टियों के नेतृत्व में राष्ट्रपति भवन तक हुआ मार्च कई मानों में प्रभावशाली था, पर इसमें विपक्ष की तीन महत्वपूर्ण पार्टियाँ शामिल नहीं थीं. संयोग है कि तीनों विपक्ष की सबसे ताकतवर पार्टियाँ हैं. अन्नाद्रमुक, बीजू जनता दल और बसपा की अनुपस्थिति को भी समझने की जरूरत है. कह सकते हैं कि मोदी-रथ ढलान पर उतरने लगा है, पर अभी इस बात की परीक्षा होनी है. और अगला परीक्षण स्थल है बिहार.

Sunday, October 26, 2014

कांग्रेस की गांधी-छत्रछाया


पी चिदंबरम के ताज़ा वक्तव्य से इस बात का आभास नहीं मिलता कि कांग्रेस के भीतर परिवार से बाहर निकलने की कसमसाहट है। बल्कि विनम्रता के साथ कहा गया है कि सोनिया गांधी और राहुल को ही पार्टी का भविष्य तय करना चाहिए। हाँ, सम्भव है भविष्य में नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का कोई नेता पार्टी अध्यक्ष बन जाए। इस वक्त पार्टी का मनोबल बहुत गिरा हुआ है। इस तरफ तत्परता से ध्यान देने और पार्टी में आंतरिक परिवर्तन करने का अनुरोध उन्होंने ज़रूर किया। पर यह अनुरोध भी सोनिया और राहुल से है। साथ ही दोनों से यह अनुरोध भी किया कि वे जनता और मीडिया से ज्यादा से ज्यादा मुखातिब हों। इस मामले में उन्होंने भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा अंक दिए हैं।

Sunday, February 2, 2014

राहुल का निर्णायक समय

राहुल गांधी के पास यह बेहतरीन मौका था जब वे अपनी बात को अपने तरीके से देश की जनता के सामने रख सकते थे। कांग्रेस और राहुल ने अपनी छवि बेहतर बनाने के लिए 500 करोड़ रुपए खर्च किए है। पर उसका असर दिखाई नहीं पड़ रहा है। राहुल की सरलता को लेकर सवाल नहीं है। पार्टी की व्यवस्था को रास्ते पर लाने की उनकी मनोकामना को लेकर भी संशय नहीं है। पर वे अभी तक जो भी कह रहे हैं या कर रहे हैं, उसका बेहतर संदेश जनता तक नहीं जा रहा है। अर्णब गोस्वामी के साथ बातचीत में भी उन्होंने नरेंद्र मोदी पर हमला किया और उल्टे 1984 की सिख विरोधी हिंसा का विवाद उनके गले पड़ गया।

सन 1984 और 2002 की हिंसाएं आज भी हमारी राजनीति पर हावी हैं। बेशक इन दोनों घटनाओं के साथ महत्वपूर्ण बातें जुड़ीं हैं। पर राजनीति सिर्फ इतने तक सीमित नहीं रह जाएगी। हमें भविष्य की ओर भी देखना चाहिए। लगता है कि राहुल गांधी कांग्रेस को घेरने वाले जटिल सवालों की गम्भीरता से या तो वे वाकिफ नहीं हैं, वाकिफ होना नहीं चाहते या पार्टी और सरकार ने उन्हें वाकिफ होने नहीं दिया है। पिछले महीने ही कांग्रेस पार्टी ने अंतरराष्ट्रीय पब्लिक रिलेशंस कम्पनी बर्सन-मार्सटैलर और जापानी मूल की विज्ञापन कम्पनी डेंत्सु इंडिया को पार्टी की छवि सुधारने का काम सौंपा है। लगभग 500 करोड़ के बजट के इस काम का परिणाम कुछ समय में देखने को मिलेगा, पर राहुल का पहला इंटरव्यू कोई सकारात्मक संदेश देकर नहीं गया।

Saturday, January 25, 2014

उदारीकरण और भ्रष्टाचार, कैसे लड़ेंगे राहुल?

कांग्रेस का नया पोस्टर है राहुल जी के नौ हथियार दूर करेंगे भ्रष्टाचार। इन पोस्टरों में नौ कानूनों के नाम हैं। इनमें से तीन पास हो चुके हैं और छह को संसद के अगले अधिवेशन में पास कराने की योजना है। यह पोस्टर कांग्रेस महासमिति में राहुल गांधी के भाषण से पहले ही तैयार हो गया था। राहुल का यह भाषण आने वाले लोकसभा चुनाव का प्रस्थान बिन्दु है। इसका मतलब है कि पार्टी ने कोर्स करेक्शन किया है। हाल में हुए विधानसभा के चुनावों तक राहुल मनरेगा, सूचना और शिक्षा के अधिकार, खाद्य सुरक्षा और कंडीशनल कैश ट्रांसफर को गेम चेंजर मानकर चल रहे थे। ग्राम प्रधान को वे अपने कार्यक्रमों की धुरी मान रहे थे। पर 8 दिसंबर को आए चुनाव परिणामों ने बताया कि शहरों और मध्य वर्ग की अनदेखी महंगी पड़ेगी।

सच यह है कि कोई पार्टी उदारीकरण को राजनीतिक प्रश्न बनाने की हिम्मत नहीं करती। विकास की बात करती है, पर इसकी कीमत कौन देगा यह नहीं बताती। राजनीतिक समझ यह भी है कि भ्रष्टाचार का रिश्ता उदारीकरण से है। क्या राहुल इस विचार को बदल सकेंगे? कॉरपोरेट सेक्टर नरेंद्र मोदी की ओर देख रहा है। दिल्ली में आप की सफलता ने साबित किया कि शहर, युवा, महिला, रोजगार, महंगाई और भ्रष्टाचार छोटे मुद्दे नहीं हैं। 17 जनवरी की बैठक में सोनिया गांधी ने अपनी सरकार की गलतियों को स्वीकार करते हुए मध्य वर्ग से नरमी की अपील की। और अब कांग्रेस के प्रवक्ता बदले गए हैं। ऐसे चेहरे सामने आए हैं जो आर्थिक उदारीकरण और भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्थाओं के बारे में ठीक से पार्टी का पक्ष रख सकें।

Saturday, January 4, 2014

कांग्रेस के पास राहुल के अलावा कोई विकल्प नहीं

 शनिवार, 4 जनवरी, 2014 को 09:40 IST तक के समाचार
राहुल गाँधी
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साफ़ कर दिया है कि वे यूपीए के प्रधानमंत्री पद के अगले उम्मीदवार नहीं होंगे. ऐसे में सवाल उठता है कि भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का मुक़ाबला करने के लिए फिर कांग्रेस के पास कौन है?
अगर यह मान भी लें कि यूपीए सरकार आगे आने वाली है या संभावित है तो सबसे पहले राहुल गाँधी का नाम आएगा. 17 जनवरी को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की बैठक में संभवतः राहुल गाँधी के नाम की घोषणा भी हो जाए.
अगर राहुल गाँधी का नाम घोषित नहीं हुआ, तो किसका नाम सामने आएगा? यह सवाल बहुत सहज इसलिए भी है क्योंकि राहुल गाँधी ने अभी तक कभी भी नहीं कहा है कि वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं.
इससे पहले राहुल गाँधी से जब भी सरकार में आने का आग्रह किया गया, उन्होंने मना ही किया है. ऐसे में संभवतः अंतिम क्षण में राहुल गाँधी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए मना भी कर दें.
ऐसे में कांग्रेस के नेताओं में से एक या दो के नाम ज़ेहन में आते हैं. सबसे पहला नाम है वित्त मंत्री पी चिदंबरम और दूसरा नाम है एके एंटनी. दोनों ही नेता दक्षिण भारत से हैं. एक तमिलनाडु के हैं, तो दूसरे केरल के. हाल ही में चिदंबरम ने ज़ोर देकर कहा था कि कांग्रेस को अब पीएम पद के उम्मीदवार की घोषणा करनी चाहिए. हालाँकि वे यह भी कहते रहे हैं कि मुझे अपनी सीमाएं मालूम हैं.

Monday, November 11, 2013

बूढ़ी कांग्रेस को युवा राजनेताओं को बढ़ाने से रोका किसने है?

कांग्रेस का विरोध माने भाजपा का समर्थन ही नहीं है। और भाजपा से विरोध का मतलब कांग्रेस की समर्थन ही नहीं माना जाना चाहिए। हमने हाल के वर्षों में राजनीति को देखने के चश्मे ऐसे बना लिए हैं कि वयक्ति अनुमान लगाने लगा है कि असल बात क्या है। इसके लिए राजनीतिक शिक्षण भी दोषी है। राज माया के पिछले अंक में मैने नरेन्द्र मोदी के बारे में लिखा था। इस बार राहुल गांधी पर लिखा है। देश के राजनीतिक दलों के अनेक दोष सामाजिक दोष भी हैं, पर हमें सबको देखने समझने की कोशिश भी करनी चाहिए।

परिवहन मंत्री ऑस्कर फर्नांडिस ने हाल में अचानक एक रोज कहा, राहुल गांधी के अंदर प्रधानमंत्री बनने के पूरे गुण हैं। उनकी देखा-देखी सुशील कुमार शिंदे, पीसी चाको और सलमान खुर्शीद से लेकर जीके वासन तक सबने एक स्वर में बोलना शुरू कर दिया कि राहुल ही होंगे प्रधानमंत्री। पिछले महीने बीजेपी के भीतर नेतृत्व को लेकर जैसी सनसनी थी वैसी तो नहीं, पर कांग्रेस के भीतर अचानक राहुल समर्थन का आवेश अब नजर आने लगा है। यह आवेश अभी पार्टी के भीतर ही है, बाहर नहीं। राहुल के समर्थन की होड़ में कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता। मैक्सिकन वेव की तरह लहरें उठ रहीं हैं और आश्चर्य नहीं कि देखते ही देखते मोहल्ला स्तर तक के नेता राहुल के समर्थन में बयान जारी करने लगें। लगभग उसी अंदाज में जैसे सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के पक्ष में समर्थन की लहर उठती थी। अचानक कहीं से प्रियंका गांधी का नाम सामने आया कि मोदी के मुकाबले कांग्रेस प्रियंका को सामने ला रही है। यह खबर पार्टी के भीतर से आई या किसी विरोधी न फैलाई, पर पूरे दिन यह मीडिया की सुर्खियों में रही।

Monday, January 21, 2013

राहुल के पदारोहण से आगे नहीं गया जयपुर चिंतन


राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनने मात्र से कांग्रेस का पुनरोदय नहीं हो जाएगा, पर इतना ज़रूर नज़र आता है कि कांग्रेस अपनी खोई ज़मीन को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रही है। राहुल चाहेंगे तो वे उन सवालों को सम्बोधित करेंगे जो आज प्रासंगिक हैं। राजनीति में इस बात का महत्व होता है कि कौन जनता के सामने अपनी इच्छा व्यक्त करता है। फिलहाल कांग्रेस के अलावा दूसरी कोई पार्टी दिल्ली में सरकार बनाने की इच्छा व्यक्त नहीं कर रहीं है। सम्भव है कल यह स्थिति न रहे, पर आज बीजेपी यह काम करती नज़र नहीं आती। बीजेपी ने राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनाए जाने पर वंशानुगत नेतृत्व का नाम लेकर जो प्रतिक्रिया व्यक्त की है, वह नकारात्मक है। कांग्रेस यदि वंशानुगत नेतृत्व चाहती है तो यह उसका मामला है। आप स्वयं को उससे बेहतर साबित करें। अलबत्ता कांग्रेस पार्टी ने जयपुर में वह सब नहीं किया, जिसका इरादा ज़ाहिर किया गया था। अभी तक ऐसा नहीं लगता कि यह पार्टी बदलते समय को समझने की कोशिश कर रही है। लगता है कि जयपुर शिविर केवल राहुल गांधी को स्थापित करने के वास्ते लगाया गया था। कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति और देश के लिए उपयुक्त आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों की ज़रूरत है। साथ ही उन नीतियों को जनता तक ठीक से पहुँचाने की ज़रूरत भी है। फिलहाल लगता है कि कांग्रेस विचार-विमर्श से भाग रही है। उसके मंत्री फेसबुक और सोशल मीडिया को नकारात्मक रूप में देख रहे हैं, जबकि सोशल मीडिया उन्हें मौका दे रहा है कि अपनी बातों को जनता के बीच ले जाएं। पर इतना ज़रूर ध्यान रखें कि देश के नागरिक और उनके कार्यकर्ता में फर्क है। नागरिक जैकारा नहीं लगाता। वह सवाल करता है। सवालों के जवाब जो ठीक से देगा, वह सफल होगा। 

Monday, December 17, 2012

एक और 'गेम चेंजर', पर कौन सा गेम?

गुजरात में मतदान का आज दूसरा दौर है। 20 दिसम्बर को हिमाचल और गुजरात के नतीजे आने के साथ-साथ राजनीतिक सरगर्मियाँ और बढ़ेंगी। इन परिणामों से ज्यादा महत्वपूर्ण है देश की राजनीति का तार्किक परिणति की ओर बढ़ना। संसद का यह सत्र धीरे-धीरे अवसान की ओर बढ़ रहा है। सरकार के सामने अभी पेंशन और बैंकिंग विधेयकों को पास कराने की चुनौती है। इंश्योरेंस कानून संशोधन विधेयक 2008 को राज्यसभा में पेश हुआ था। तब से वह रुका हुआ है। बैंकिंग कानून संशोधन बिधेयक, माइक्रो फाइनेंस विधेयक, सिटीजन्स चार्टर विधेयक, लोकपाल विधेयक शायद इस सत्र में भी पास नहीं हो पाएंगे। महिला आरक्षण विधेयक वैसे ही जैसे मैजिक शो में वॉटर ऑफ इंडिया। अजा, जजा कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण का विधेयक राजनीतिक कारणों से ही आया है और उन्हीं कारणों से अटका है। संसद के भंडारागार में रखे विधेयकों की सूची आप एक बार देखें और उनके इतिहास पर आप जाएंगे तो आसानी से समझ में आ जाएगा कि इस देश की गाड़ी चलाना कितना मुश्किल काम है। यह मुश्किल चाहे यूपीए हो या एनडीए या कोई तीसरा मोर्चा, जब तक यह दूर नहीं होगी, प्रगति का पहिया ऐसे ही रुक-रुक कर चलेगा।

Monday, November 5, 2012

राहुल, रिफॉर्म और भैंस के आगे बीन





गारंटी के साथ नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस को इस रैली से फायदा होगा, पर इससे नुकसान भी कुछ नहीं होने वाला। पार्टी के पास अब आक्रामक होने के अलावा विकल्प भी नहीं बचा था। उसकी अतिशय रक्षात्मक रणनीति के कारण पिछले लगभग तीन साल से बीजेपी की राजनीति में प्राण पड़ गए थे, अन्यथा जिस वक्त आडवाणी जी को हटाकर गडकरी को लाया गया था, उसी वक्त बीजेपी ने अपना भविष्य तय कर लिया था। रविवार को जब कांग्रेस रामलीला मैदान में रैली कर रही थी, तब दिल्ली में मुरली मनोहर जोशी कुछ व्यापारियों के साथ भैस के आगे बीन बजा रहे थे। खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को लेकर बीजेपी ने जो स्टैंड लिया है वह नकारात्मक है सकारात्मक नहीं। हमारी राजनीति में कांग्रेस भी ऐसा ही करती रही है। ज़रूरत इस बात की है कि सकारात्मक राजनीति हो। बहरहाल कांग्रेस को खुलकर अपनी बात सामने रखनी चाहिए। यदि राजनीति इस बात की है कि तेज आर्थिक विकास हमें चाहिए ताकि उपलब्ध साधनों को गरीब जनता तक पहुँचाया जा सके तो इस बात को पूरी शिद्दत से कहा जाना चाहिए। गैस के जिस सिलेंडर को लेकर हम बहस में उलझे हैं, उसका सबसे बड़ा उपभोक्ता मध्य वर्ग है। शहरी गरीब आज भी महंगी गैस खरीदते हैं, क्योंकि उनके पास केवाईसी नहीं है। घर के पते का दस्तावेज़ नहीं है। वे अपने नाम कनेक्शन नहीं ले सकते हैं और मज़बूरन छोटे सिलंडरों में बिकने वाली अवैध गैस खरीदते हैं। राहुल गांधी ने जिस सिस्टम की बात कही है, वह वास्तव में गरीबों का सिस्टम नहीं है। आम आदमी की पहुँच से काफी दूर है। पिछले साल दिसम्बर में सरकार ने संसद में Citizen's Charter and Grievance Redressal Bill 2011 पेश किया था। यह बिल समय से पास हो जाता तो नागरिकों को कुछ सुविधाओं को समय से कराने का अधिकार प्राप्त हो जाता। अन्ना हजारे आंदोलन के कारण कुछ हुआ हो या न हुआ हो जनता का दबाव तो बढ़ा ही है। यह आंदोलन व्यवस्था-विरोधी आंदोलन था। कांग्रेस ने इसे अपने खिलाफ क्यों माना और अब राहुल गांधी वही बात क्यों कह रहे हैं?

Friday, October 26, 2012

कांग्रेस को रक्षात्मक नहीं, आक्रामक बनना चाहिए

नितिन गडकरी संकट में आ गए हैं। उन्हें अब फिर से अध्यक्ष बनाना मुश्किल होगा। उनके लिए यह संकट केजरीवाल ने पैदा किया या कांग्रेस ने या पार्टी के भीतर से ही किसी ने यह अभी समझ में नहीं आएगा, पर राजनीति का खेल चल रहा है। हमारी सब से बड़ी उपलब्धि है लोकतंत्र। और लोकतंत्र को दिशा देने वाली राजनीति। पर राजनीति के अंतर्विरोध लगातार खुल रहे हैं। मीडिया के शोर पर यकीन करें तो लगता है कि आसमान टूट पड़ा है, पर इस शोर-संस्कृति ने मीडिया को अविश्वसनीय बना दिया है। हम इस बात पर गौर नहीं कर रहे हैं कि दुनिया के नए देशों में पनप रहे लोकतंत्रों में सबसे अच्छा और सबसे कामयाब लोकतंत्र हमारा है। इसकी सफलता में राजनीतिक दलों और मतदाताओं दोनों की भूमिका है। बेशक दोनों में काफी सुधार की सम्भावनाएं हैं। फिलहाल कांग्रेस पार्टी पर एक नज़र डालें जो आने वाले समय के लिए किसी बड़ी रणनीति को तैयार करती दिखाई पड़ती है। 

हिमाचल और गुजरात के चुनाव सिर पर हैं और कांग्रेस पार्टी के सामने राजनीतिक मुहावरे खोजने और क्रमशः बढ़ती अलोकप्रियता को तोड़ निकालने की चुनौती है। अरविन्द केजरीवाल ने फिलहाल कांग्रेस और भाजपा दोनों को परेशान कर रखा है। भाजपा ने नितिन गडकरी को दुबारा अध्यक्ष बनाने के लिए संविधान में संशोधन कर लिया था, पर केजरीवाल ने फच्चर फँसा दिया है। शुरू में जो मामूली बात लगती थी वह गैर-मामूली बनती जा रही है। 4 नवम्बर को हिमाचल में मतदान है और वीरभद्र सिंह ने मीडिया से पंगा मोल ले लिया है। कांग्रेस ने फौरन ही माफी माँगकर मामले को सुलझाने की कोशिश की है, पर चुनाव के मौके पर रंग में भंग हो गया। हिमाचल में सोनिया, राहुल और मनमोहन सिंह तीनों अभियान पर निकले हैं। शायद चुनाव के मौके पर कांग्रेस के लिए असमंजस पैदा करने के लिए ही वीरभद्र को उकसाया गया होगा, पर उन्हें उकसावे में आने की ज़रूरतही क्या थी? दोनों पार्टियों के प्रत्याशियों की सूचियाँ देर से ज़ारी हुईं है। सोनिया गांधी के जवाब में नरेन्द्र मोदी भी हिमाचल आ रहे हैं। हिमपात होने लगा है। अचानक बढ़ी ठंड ने प्रदेश के बड़े हिस्से को आगोश में लेना शुरू कर दिया है। हिमाचल के परिणाम से बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं है, पर कांग्रेस को इस समय छोटी-छोटी और प्रतीकात्मक सफलताएं चाहिए। हिमाचल में भी और उससे ज्यादा गुजरात में। हिमाचल और गुजरात दोनों जगह मुकाबला सीधा है। कांग्रेस और भाजपा के बीच। इस वक्त दोनों पार्टियाँ विवादों के घेरे में हैं। इन दो राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियाँ नहीं हैं, पर अगले लोकसभा चुनाव का सबसे बड़ा सवाल है कि क्या राष्ट्रीय दलों की पराजय होने वाली है।

Friday, September 14, 2012

कांग्रेस पर भारी पड़ेगी राहुल की हिचक

भारतीय राजनीतिक दल खासतौर से कांग्रेस पार्टी जितना विदेशी मीडिया के प्रति संवेदनशील है उतना भारतीय मीडिया के प्रति नहीं है। पिछले दिनों सबसे पहले टाइम मैगज़ीन की ‘अंडर अचीवर’ वाली कवर स्टारी को लेकर शोर मचा, फिर वॉशिंगटन पोस्ट की सामान्य सी टिप्पणी को लेकर सरकार ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। और अब राहुल गांधी को लेकर इकोनॉमिस्ट की और भी साधारण स्टोरी पर चिमगोइयाँ चल रहीं हैं। पश्चिमी मीडिया की चिन्ता भारत के आर्थिक सुधारों पर लगा ब्रेक और कांग्रेस की क्रमशः बढ़ती अलोकप्रियता को लेकर है। सच यह है कि इन सारी कथाओं में बाहरी स्रोतों पर आधारित अलल-टप्पू बातें हैं। खासतौर से इकोनॉमिस्ट की कथा एक भारतीय लेखिका आरती रामचन्द्रन की पुस्तक पर आधारित है। राहुल गांधी के जीवन को ‘डिकोड’ करने वाली यह पुस्तक भी किसी अंदरूनी सूचना के आधार पर नहीं है। इकोनॉमिस्ट ने 'द राहुल प्रॉब्लम' शीर्षक आलेख में कहा है कि राहुल ने "नेता के तौर पर कोई योग्यता नहीं दिखाई है। और और ऐसा नहीं लगता कि उन्हें कोई भूख है। वे शर्मीले स्वभाव के हैं, मीडिया से बात नहीं करते हैं और संसद में भी अपनी आवाज़ नहीं उठाते हैं।" बहरहाल यह वक्त राहुल गांधी और कांग्रेस के बारे में विचार करने का है। कांग्रेस के पास अपनी योजना को शक्ल देने का तकरीबन आखिरी मौका है। राहुल की ‘बड़ी भूमिका’ की घोषणा अब होने ही वाली है।

Friday, July 20, 2012

राहुल को चाहिए एक जादू की छड़ी

राहुल ने नौ साल लगाए राजनीति में ज्यादा बड़ी भूमिका स्वीकार करने में। उनका यह विचार बेहतर था कि पहले ज़मीनी काम किया जाए, फिर सक्रिय भूमिका निभाई जाए। पर यह आदर्श बात है। हमारी राजनीति आदर्श पर नहीं चलती। और न राहुल किसी आदर्श के कारण महत्वपूर्ण हैं। वे तमाम राजनेताओं से बेहतर साबित होते बशर्ते वे उस कांग्रेस की उस संस्कृति से बाहर आ पाते जिसमें नेता को तमाम लोग घेर लेते हैं। बहरहाल अब राहुल सामने आ रहे हैं तो अच्छा है, पर काम मुश्किल है। नीचे पढ़ें जनवाणी में प्रकाशित मेरा लेख
हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में यूपीए की रणनीति को जितनी आसानी से सफलता मिली है उसकी उम्मीद नहीं थी। इसके लिए बेशक एनडीए का बिखराव काफी सीमा तक ज़िम्मेदार है, पर बिखरा हुआ तो यूपीए भी था। और आज भी कहना मुश्किल है कि आने वाला वक्त यूपीए या दूसरे शब्दों में कहें तो कांग्रेस के लिए आसान होगा। 7 अगस्त को उप राष्ट्रपति पद का चुनाव है और उसके अगले दिन 8 अगस्त से सरकार ने संसद का सत्र बुलाने का आग्रह किया है। उसके बाद अगले एक महीने में राष्ट्रीय राजनीति की कुछ पहेलियाँ बूझी जाएंगी।

Friday, November 11, 2011

राहुल गांधी को लेकर कुछ किन्तु-परन्तु

एक बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि राहुल गांधी भविष्य में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता होंगे। इसी विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि यह कब होगा और वे किस पद से इसकी शुरूआत करेंगे। पिछले दिनों जब श्रीमती सोनिया गांधी स्वास्थ्य-कारणों से विदेश गईं थीं, तब आधिकारिक रूप से राहुल गांधी को पार्टी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अन्ना-आंदोलन के कारण वह समय राहुल को प्रोजेक्ट करने में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सका। बल्कि उस दौरान अन्ना को गिरफ्तार करने से लेकर संसद में लोकपाल-प्रस्ताव रखने तक के सरकारी फैसलों में इतने उतार-चढ़ाव आए कि बजाय श्रेय मिलने के पार्टी की फज़ीहत हो गई। राहुल गांधी को शून्य-प्रहर में बोलने का मौका दिया गया और उन्होंने लोकपाल के लिए संवैधानिक पद की बात कहकर पूरी बहस को बुनियादी मोड़ देने की कोशिश की। पर उनका सुझाव को हवा में उड़ गया। बहरहाल अब आसार हैं कि राहुल गांधी को पार्टी कोई महत्वपूर्ण पद देगी। हवा में यह बात है कि 19 नवम्बर को श्रीमती इंदिरा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर वे कोई नई भूमिका ग्रहण करेंगे।