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Saturday, September 21, 2019

कश्मीर अब रास्ता क्या है?


जम्मू कश्मीर में पाबंदियों को लगे 47-48 दिन हो गए हैं और लगता नहीं कि निर्बाध आवागमन और इंटरनेट जैसी संचार सुविधाएं जल्द वापस होंगी। सरकार पहले दिन से दावा कर रही है कि हालात सामान्य हैं, और विरोधी भी पहले ही दिन से कह रहे हैं कि सामान्य नहीं हैं। उनकी माँग है कि सारे प्रतिबंध हटाए जाएं और जिन लोगों को हिरासत में लिया गया है, उन्हें छोड़ा जाए। एक तबका है, जो प्रतिबंधों को उचित मानता है और जिसकी नजर में सरकार की रीति-नीति सही है। दूसरा इसके ठीक उलट है। मीडिया कवरेज दो विपरीत तस्वीरें पेश कर रही है। बड़ी संख्या में भारतीय पत्रकार सरकारी सूत्रों के हवाले हैं, दूसरी तरफ ज्यादातर विदेशी पत्रकारों को सरकारी दावों में छिद्र ही छिद्र नजर आते हैं। ऐसे विवरणों की कमी हैं, जिन्हें निष्पक्ष कहा जा सके। पत्रकार भी पोलराइज़्ड हैं।
इस एकतरफा दृष्टिकोण के पीछे तमाम कारण हैं, पर सबसे बड़ा कारण राजनीतिक है। दूसरा है असमंजस। इस समस्या को काफी लोग दो कालखंड में देखते हैं। सन 2014 के पहले और उसके बाद। देश के भीतर ही नहीं वैश्विक मंच पर भी यही बात लागू होती है। वॉशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स और  इकोनॉमिस्ट से लेकर फॉरेन पॉलिसी जैसे जर्नल नरेंद्र मोदी के आगमन के पहले से ही उनके आलोचक हैं। सरकार कहती है कि हम बड़ी हिंसा को टालने के लिए धीरे-धीरे ही प्रतिबंधों को हटाएंगे, तो उसे देखने वाले अपने चश्मे से देखते हैं। विदेशी मीडिया कवरेज को लेकर भारतीय नागरिकों का बड़ा तबका नाराज है।
आवेशों की आँधियाँ
माहौल लगातार तनावपूर्ण है। कोई यह समझने की कोशिश नहीं कर रहा है कि हालात को कैसे ठीक किया जाए और आगे का रास्ता क्या है। इस वक्त दो बातों पर ध्यान देने की जरूरत है। एक, अगले महीने जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित क्षेत्र बनना है। उससे पहले का प्रक्रियाएं कैसे पूरी होंगी। और दूसरी बात है कि इसके आगे क्या? कश्मीर समस्या का स्थायी समाधान यह तो नहीं है, तो फिर आगे क्या? भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में आवेशों के तूफान चलते ही रहते है। कोई नई बात नहीं है। भावनाओं के इन बवंडरों के केंद्र में कश्मीर है। विभाजन का यह अनसुलझा सवाल, दोनों देशों के सामान्य रिश्तों में भी बाधक है।
सवाल है कि 72 साल में इस समस्या का समाधान क्यों नहीं हो पाया? अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद तमाम एकबारगी बड़ी संख्या में लोगों ने समर्थन किया, पर जैसाकि होता है, इस फैसले के विरोधियों ने भी कुछ देर से ही सही मोर्चा संभाल लिया है। भारतीय जनता का बहुमत 370 को हटाने के पक्ष में नजर आता है। इसकी बड़ी वजह यह भी है कि इसे बनाए रखने के पक्षधर यह नहीं बता पाते हैं कि यह अनुच्छेद इतना ही महत्वपूर्ण था, तब कश्मीर में अशांति क्यों पैदा हुई?
 पिछले 72 साल में वहाँ हालात लगातार बिगड़े ही हैं। सन 1947 में पाकिस्तानी कबायलियों ने कश्मीर में जिस किस्म के अत्याचार किए थे, उन्हें देखते हुए पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति नहीं होनी चाहिए थी। सन 1965 में जब अयूब खां ने हजारों रज़ाकारों को ट्रेनिंग देकर कश्मीर में भेजा, तो उन्हें विश्वास था कि कश्मीरी जनता उन्हें हाथों हाथ लेगी, पर ऐसा नहीं हुआ। सन 1971 की लड़ाई में भी नहीं हुआ। पिछले 72 साल में क्या हुआ, जो आज हालात बदले हुए नजर आते हैं? ऐसा केवल दिल्ली में बीजेपी की सरकार के कारण नहीं हुआ है। पत्थर मार आंदोलन तो 2010 में शुरू हो गया था।

Thursday, September 12, 2019

कितने तमाचे खाएगा पाकिस्तान?


संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश के बयान से पाकिस्तान के मुँह पर जोर का तमाचा लहा है। अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाए जाने के बाद से भारतीय राजनय की दिलचस्पी इस मामले पर ठंडा पानी डालने और जम्मू कश्मीर में हालात सामान्य बनाने में है, वहीं पाकिस्तान की कोशिश है कि इसपर वितंडा खड़ा किया जाए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे उठाया जाए। उसका प्रयास है कि कश्मीर की घाटी में हालात सामान्य न होने पाएं। इसी कोशिश में उसने एक तरफ अपने जेहादी संगठनों को उकसाया है, वहीं अपने राजनयिकों को दुनिया की राजधानियों में भेजा है।
पाकिस्तान ने जिनीवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक में इस मामले को उठाकर जो कोशिश की थी वह बेकार साबित हुई है। एक दिन बाद ही संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश के बयान से पाकिस्तान को निराश होना पड़ा है। गुटेरेश का कहना है कि जम्मू-कश्मीर का मसला भारत-पाकिस्तान आपस में बातचीत कर सुलझाएं। उन्होंने इस मसले पर मध्यस्थता करने से इनकार कर दिया है। अब इस महीने की 27 तारीख को संयुक्त राष्ट्र महासभा में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के भाषण होंगे। उसके बाद पाकिस्तान को हंगामा खड़ा करने का कोई बड़ा मौका नहीं मिलेगा। वह इसके बाद क्या करेगा?

Saturday, September 7, 2019

सुरक्षा परिषद क्यों नहीं करा पाई कश्मीर समस्या का समाधान?


अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बनने की रेस में शामिल रह चुके वरिष्ठ सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने पिछले हफ्ते कहा कि कश्मीर के हालात को लेकर उन्हें चिंता है। अमेरिकी मुसलमानों की संस्था इस्लामिक सोसायटी ऑफ़ नॉर्थ अमेरिका के 56वें अधिवेशन में उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी सरकार को इस मसले के समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव का समर्थन में खुलकर समर्थन करना चाहिए। हालांकि बर्न सैंडर्स की अमेरिकी राजनीति में कोई खास हैसियत नहीं है और यह भी लगता है कि वे मुसलमानों के बीच अपना वोट बैंक तैयार करने के लिए ऐसा बोल रहे हैं, पर उनकी दो बातें ऐसी हैं, जो अमेरिकी राजनीति की मुख्यधारा को अपील करती हैं।
इनमें से एक है कश्मीर में अमेरिकी मध्यस्थता या हस्तक्षेप का सुझाव और दूसरी कश्मीर समस्या का समाधान सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के तहत करने की। पाकिस्तानी नेता भी बार-बार कहते हैं कि इस समस्या का समाधान सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के तहत करना चाहिए। यानी कि कश्मीर में जनमत संग्रह कराना चाहिए। आज सत्तर साल बाद हम यह बात क्यों सुन रहे हैं? सन 1949 में ही समस्या का समाधान क्यों नहीं हो गया? भारत इस मामले को सुरक्षा परिषद में संरा चार्टर के अनुच्छेद 35 के तहत ले गया था। जो प्रस्ताव पास हुए थे, उनसे भारत की सहमति थी। वे बाध्यकारी भी नहीं थे। अलबत्ता दो बातों पर आज भी विचार करने की जरूरत है कि तब समाधान क्यों नहीं हुआ और इस मामले में सुरक्षा परिषद की भूमिका क्या रही है?
प्रस्ताव के बाद प्रस्ताव
सन 1948 से 1971 तक सुरक्षा परिषद ने 18 प्रस्ताव भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर पास किए हैं। इनमें प्रस्ताव संख्या 303 और 307 सन 1971 के युद्ध के संदर्भ में पास किए गए थे। उससे पहले पाँच प्रस्ताव 209, 210, 211, 214 और 215 सन 1965 के युद्ध के संदर्भ में थे। प्रस्ताव 123 और 126 सन 1956-57 के हैं, जो इस इलाके में शांति बनाए रखने के प्रयास से जुड़े थे। वस्तुतः प्रस्ताव 38, 39 और 47 ही सबसे महत्वपूर्ण हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है प्रस्ताव 47 जिसमें जनमत संग्रह की व्यवस्था बताई गई थी।

Tuesday, June 27, 2017

कश्मीर पर इंटरनेट सामग्री

कश्मीर को लेकर हाल में इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को मैने एक जगह सूचीबद्ध किया है। यदि आपकी दिलचस्पी इस संग्रह को और बेहतर बनाने में है तो आप इसके कमेंट सेक्शन में लिंक लगा सकते हैं। मैं उन्हें मुख्य आलेख में लगा दूँगा।





Kashmir Questions By AG Noorani

Kashmir talks: Reality & Myth

Post cold war US Policy on Kashmir

Security Council Resolution 47

मुशर्रफ ने कहा, हमने जनमत संग्रह के प्रस्ताव से किनारा कर लिया है
AG Noorani

Arundhati Roy


Kashmir : The unwritten history

Guardian's report on BalochistanCurfew without end


Three generations of Azadi