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Sunday, September 27, 2020

संजीदगी पर हावी राजनीतिक शोर

हाल में सम्पन्न हुआ संसद का मॉनसून सत्र पिछले दो दशकों का सबसे छोटा सत्र था। महामारी के प्रसार को देखते हुए यह स्वाभाविक भी था, पर इस जितने कम समय के लिए इसका कार्यक्रम बनाया गया था, उससे भी आठ दिन पहले इसका समापन करना पड़ा। बावजूद इसके संसदीय कर्म के हिसाब से यह सत्र काफी समय तक याद रखा जाएगा। इस दौरान लोकसभा ने निर्धारित समय की तुलना में 160 फीसदी और राज्यसभा ने 99 फीसदी काम किया। इन दस दिनों के लिए दोनों सदनों के पास 40-40 घंटे का समय था, जबकि लोकसभा ने करीब 58 घंटे और राज्यसभा ने करीब 39 घंटे काम किया। यह पहली बार हुआ जब सत्र के दौरान कोई अवकाश नहीं था। दोनों सदनों ने अपने दस दिन के सत्र में 27 विधेयक पास किए और पाँच विधेयकों को वापस लेने की प्रक्रिया पूरी की गई। इन विधेयकों में 11 ऐसे थे, जिन्होंने जून में जारी किए गए अध्यादेशों का स्थान लिया। 

इस सत्र की जरूरत इसलिए भी थी, क्योंकि तमाम संसदीय कर्म अधूरे पड़े थे। इस सत्र के शुरू होने के पहले संसद के पास पहले से 46 विधेयक लंबित थे। इनके अलावा नए 22 विधेयक इस सत्र में लाए जाने थे। कुछ अध्यादेशों के स्थान पर विधेयकों को लाना था और कुछ विधेयकों को वापस लेना था। हमारी प्रशासनिक-व्यवस्था सफलता के साथ तभी चल सकती है, जब संसदीय कर्म कुशलता के साथ सम्पन्न होता रहे। संसदीय बहस, प्रश्नोत्तर और ध्यानाकर्षण प्रस्ताव सुनने में मामूली बातें लगती हैं, पर ये बातें ही लोकतंत्र को सफल बनाती हैं।

Saturday, November 21, 2015

गठबंधन-चातुर्य और राजनीति का महा-मंथन

इस साल संसद का मॉनसून सत्र सूखा रहा। पूरे सत्र में सकारात्मक संसदीय कर्म ठप रहा। अब शीत सत्र सामने है। इसमें क्या होने वाला है? सरकार क्या अपने विधेयकों को पास करा पाएगी? क्या वह भारतीय राजनीति के ज्वलंत सवालों का ठीक से जवाब देगी? दूसरी ओर सवाल यह भी है कि क्या विपक्ष एक होकर किसी नई राष्ट्रीय ताकत को तैयार करेगा? बिहार विधान सभा के चुनाव परिणामों से उत्साहित विपक्ष क्या अपनी एकता को संसद में भी साबित करेगा? भाजपा-विरोधी इस राजनीति का नेतृत्व कौन करेगा? यह एकता क्या भविष्य के विधान सभा चुनावों में भी देखने को मिलेगी? 

बिहार-परिणाम के विश्लेषक अब भी इस गुत्थी से उलझे पड़े हैं कि भाजपा की पराजय के पीछे महागठबंधन का जातीय-साम्प्रदायिक गणित था या उसकी असहिष्णु राजनीति। भविष्य की राजनीति का रिश्ता इस सवाल से जुड़ा है। और पूरे देश की राजनीति सोशल इंजीनियरी से जुड़ी है। इस जातीय गणित की अगली महा-परीक्षा अब 2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव में होगी। महागठबंधन बिहार की परिस्थितियों से मेल खाता था। देखना होगा कि दूसरे राज्यों में वह किस रूप में बनेगा। और यह भी कि उसका नेतृत्व कौन करेगा?   

बिहार में एनडीए की विफलता और महागठबंधन की सफलता से कांग्रेस प्रफुल्लित जरूर है, पर आने वाले समय में उसके सामने नेतृत्व की चुनौती खड़ी होगी। अब वह जमाना नहीं रहा जब शेर के नेतृत्व में जंगल के सारे जानवर लाइन लगाकर चलते थे। अब सबकी महत्वाकांक्षाएं हैं। जेडीयू का नेतृत्व नीतीश कुमार को नए राष्ट्रीय नेता के रूप में खड़ा करना चाहता है। नीतीश कुमार का शपथ ग्रहण समारोह इसीलिए विपक्ष की एकता के महा-सम्मेलन जैसा बन गया। पर उसके अंतर्विरोध भी छिपे हैं। महागठबंधन के आलोचकों को लालू-नीतीश दोस्ती की दीर्घायु को अब भी लेकर संदेह है।
बिहार में महागठबंधन बनाने में नीतीश कुमार की कोशिशों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। पर जेडीयू की निगाह गैर-कांग्रेस विपक्ष पर है। पार्टी के महासचिव केसी त्यागी ने हाल में कहा है कि जदयू, तृणमूल और आम आदमी पार्टी कई मुद्दों पर समान विचारों वाले हैं और देश में सहयोगात्मक संघवाद को मजबूत करने का समय आ गया है। इस संघवाद को जोड़ने लायक लम्बा धागा कांग्रेस या भाजपा के पास ही है। अतीत में इसमें वाम मोर्चा की भूमिका रही है, जो अभी पृष्ठभूमि में है। वामपंथी सामने आए तो इस मोर्चे के अंतर्विरोध मुखर होंगे।