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Tuesday, May 10, 2016

उत्तराखंड में जारी रहेगी अस्थिरता

उत्तराखंड की सबसे बड़ी त्रासदी है अनिश्चय। नैनीताल हाईकोर्ट ने कांग्रेस के 9 बागी विधायकों की अर्जी खारिज करके मंगलवार को होने वाले शक्ति परीक्षण को रोचक बना दिया है। विधायकों को उम्मीद थी कि शायद उनकी सदस्यता बहाल हो जाए। उन्हें वोट का अधिकार मिलता तो मुकाबला एकतरफा हो जाता। अदालत के इस फैसले के बाद अस्थिरता और ज्यादा गहरी हो जाएगी। हरीश रावत के पक्ष में यदि बहुमत विधायक वोट डाल भी देंगे तब भी यह कहना मुश्किल है कि अगले साल चुनाव होने तक वे अपने पद पर बने रहेंगे। कांग्रेस की जिस अंदरूनी कलह के कारण यह स्थिति पैदा हुई है, वह आसानी से खत्म होने वाली नहीं है। पहले तो शक्ति परीक्षण में जीतना ही मुश्किल हुआ जा रहा है। पर रावत सरकार जीत भी गई तो नेतृत्व का बने रहना मुश्किल होगा।

Sunday, June 30, 2013

यह तो राष्ट्रीय शर्मिंदगी की घड़ी भी है

उत्तराखंड आपदा ने हमारी अनेक खामियों को उजागर किया है। हमारे पास आधुनिक मौसम विभाग है, आपदा के समय काम करने वाली मशीनरी है, प्रकृति से जुड़ी सुविचारित इंजीनियरी का बंदोबस्त है, काफी बड़ा वैज्ञानिक समुदाय है, जनता से जुड़ी राजनीति है, धार्मिक आस्था से जुड़ी बड़ी जनसंख्या है जो तीर्थ-प्रबंध के लिए साधन जुटाने में पीछे नहीं रहती और इन सबके ऊपर है एक ऊर्जावान मीडिया और संचार व्यवस्था। उत्तराखंड ने इन सबकी पोल एक साथ खोल दी। अब यह हम सब पर है कि इससे कोई सबक लेते हैं या नहीं। भला हो सेना के जवानों का और व्यक्तिगत रूप से राहत में शामिल उन नामालूम लोगों का जिनमें से कई ने दूसरों को बचाने में अपनी जान गँवा दी। पर जो बात परेशान करती है वह है श्रेय लेने की होड़, जो राष्ट्रीय शर्मिन्दा का विषय है। इक्कीसवीं सदी के भारत में ऐसा दिन देखने को मिला जब हमारे भाई-बहनों, माता-पिताओं की लाशें मिट्टी में लिथड़ गईं। बचे लोग भूखे-प्यासे जंगलों में भटकते रहे और हम कुछ नहीं कर पाए।

Tuesday, June 25, 2013

हनुमान मोदी?

हनुमान मोदी

नरेन्द्र मोदी ने क्या किसी चमत्कार से 15000 गुजरातियों को  उत्तराखंड की आपदा से बाहर निकाल लिया? या यह जन सम्पर्क का मोदी स्टाइल है? जब से यह खबर छपी है सब के मन में यह सवाल है। क्या है इस कहानी का सच? टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसका स्पष्टीकरण छापा नहीं। यह खबर मोदी या उनके किसी अफसर को उधृत करके दी नहीं गई। किसी पत्रकार ने इस बात की पुष्टि करने की कोशिश नहीं की कि सच क्या है। बहरहाल जो कुछ उपलब्ध है उसके अंश यहाँ पेश हैं। सबसे पहले वह खबर पढ़ें जिसमें मोदी के कारनामे का उल्लेख हैः-

Modi in Rambo Act, saves 15000

Dehradun: In the two days that Narendra Modi has been in Uttarakhand, he has managed to completely rile not just the Congress government of Vijay Bahuguna but also the administrative staff involved in rescue operations at Kedarnath, Badrinath and Uttarkashi. But above all, he has managed to bring home some 15,000 stranded Gujarati pilgrims. 
    The Gujarat CM, who flew in on Friday evening, held a meeting till late in the night with his crack team of five IAS, one IPS, one IFS and two GAS (Guja
rat Administrative Service) officers. Two DSPs and five police inspectors were also part of his delegation. They sat again with the nitty-gritty of evacuation in a huddle that a senior BJP leader said lasted till 1am on Saturday. Around 80 Toyota Innovas were requisitioned to ferry Gujaratis to safer places in Dehradun as were four Boeings. On Saturday, 25 luxury buses took a bunch of grateful people to Delhi. The efforts are being coordinated by two of the senior-most IAS officers of Gujarat, one currently stationed in Delhi and another in Uttarakhand. ‘Modi model works only for Gujaratis’ पूरी खबर पढ़ें


टाइम्स ऑफ इंडिया के ब्लॉग में प्रशांत पांडे का लेख

A Rambo act by Modi???? Or cheap dirty Politics....

It’s interesting the way Modi jumps into the middle of every incident where the media is present in large numbers! His US based PR agency, APCO, is doing a wonderful job. Much better for sure than the CM himself is doing, considering that he has done pretty much nothing except generate publicity for himself.
Imagine this. The devastation of the floods is in the hills. The roads have been destroyed. Vehicular movement is proving to be impossible. The Army has been deployed like never before (more than 8500 in number). More than 60 army helicopters are being used in a never-before scale rescue operation. There is a food and drinking water supply problem. There is the fear of an epidemic break-out. All that can be done is being done. Yet, what does Modi do? He reaches the fringes, where there is no problem in any case. He deploys 80 Toyota Innovas (Vans….for god’s sakes!) to ferry 7 people per van = 560 people out. But out from where? From where they are already safe! After they have already been rescued! After all the army bravehearts have done their job, the Gujarat CM and PM aspirant of the BJP comes to the spot with his IAS, IPS and GPS officers in tow – and oh yes…. his PR agents as well – to corner the glory! पूरा लेख पढ़ें
मीडिया साइट द हूट में 
A reader asks about the TOI story 'Narendra Modi lands in Uttarakhand, flies out with 15,000 Gujaratis': "Did the paper verify facts such as 80 Innovas? How is it possible to rescue 15,000 Gujaratis from flood affected Uttarkhand in less than two or three days? Or was Modi some new age scientific Hanuman? How did he and his parochial team identify the 15,000 Gujaratis from over  a million people stranded by the floods? On the face of it, the report looks wonderful. But it defies common sense." हनुमान मोदी

रीडिफ डॉट कॉम में भाजपा प्रवक्ता अनिल बलूनी का स्पष्टीकरण
The evacuation of 15,000 Gujarati pilgrims following the visit to rain-devastated Uttarakhand by Chief Minister Narendra Modi has become the talk of the town. While the Bharatiya Janata Party cannot stop singing praises of its newly-appointed Lok Sabha poll campaign chief for this operation, the Congress, on the other hand, has termed it as an act of “opportunism and selfishness”. 
For the BJP unit in Uttarakhand, Modi's rescue mission has come as a shot in the arm. The manner in which the entire operation was planned and executed should be applied as a role model for other states, the party points out. रीडिफ डॉट कॉम पर पूरा पढ़ें


नरेन्द्र मोदी की वैबसाइट पर 15000 यात्रियों का जिक्र नहीं है। उनके अनुसार 6000 गुजराती वापस आ गए हैं।
Addressing a high-level meeting of disaster management here to take stock of the situation in the hill state, he said that about 6,000 pilgrims from Gujarat have already come back, while another 2,500 are on the way and the remaining about 100 persons still stranded there are being contacted for their safe return..नरेन्द्र मोदी की वैबसाइट में पढ़ें

सबसे दिलचस्प है 26 जून के टाइम्स ऑफ इंडिया के सम्पादकीय पेज पर अभीक बर्मन का लेख जिसमें मोदी के दावे का मज़ाक उड़ाया है। दिलचस्प इसलिए कि मोदी ने कब और कहाँ यह दावा किया, इसका कहीं ज़िक्र नहीं है। खबर टाइम्स ऑफ इंडिया ने छापी जिसमें किसी को कोट नहीं किया गया। टाइम्स ने इसका स्पष्टीकरण भी नहीं दिया। अभीक बर्मन का लेख यहाँ पढ़ें

इकोनॉमिक टाइम्स में मधु किश्वर का लेख

Monday, June 24, 2013

पर्यावरण : विज्ञान और राजनीति


डॉ खड्ग सिंह वल्दिया
मानद प्रोफेसर, जेएनसीएएसआर
नदियों के फ्लड वे में बने गाँव और नगर बाढ़ में बह गए. आख़िर उत्तराखंड में इतनी सारी बस्तियाँ, पुल और सड़कें देखते ही देखते क्यों उफनती हुई नदियों और टूटते हुए पहाड़ों के वेग में बह गईं?

जिस क्षेत्र में भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाएँ होती रही हैं, वहाँ इस बार इतनी भीषण तबाही क्यों हुई?

अंधाधुंध निर्माण की अनुमति देने के लिए सरकार ज़िम्मेदार है. वो अपनी आलोचना करने वाले विशेषज्ञों की बात नहीं सुनती. यहाँ तक कि जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों की भी अच्छी-अच्छी राय पर सरकार अमल नहीं कर रही है.

वैज्ञानिक नज़रिए से समझने की कोशिश करें तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस बार नदियाँ इतनी कुपित क्यों हुईं.

नदी घाटी काफी चौड़ी होती है. बाढ़ग्रस्त नदी के रास्ते को फ्लड वे (वाहिका) कहते हैं. यदि नदी में सौ साल में एक बार भी बाढ़ आई हो तो उसके उस मार्ग को भी फ्लड वे माना जाता है. इस रास्ते में कभी भी बाढ़ आ सकती है.

लेकिन इस छूटी हुई ज़मीन पर निर्माण कर दिया जाए तो ख़तरा हमेशा बना रहता है. बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम पर पढ़ें पूरा लेख



शेखर पाठक
पहाड़ पत्रिका के संपादक

केदारनाथ मंदिर के पट खुलने के दिन मैं वहीं मौजूद था. आज के केदारनाथ को देखकर मेरे मन में पहले वो तस्वीर कौंधी जो 1882 में भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग के निदेशक द्वारा खींची गई थी.

इस तस्वीर में सुंदर प्रकृति से घिरा सिर्फ़ मंदिर दिखता है.

उस तस्वीर की तुलना मैंने आज के केदारनाथ से की जहाँ मंदिर के चारों ओर अतिक्रमण करके मकान बना दिए गए हैं जिसने मंदिर परिसर को भद्दा बना दिया है.

मैने सोचा कि काश इस निर्माण को नियमबद्ध तरीक़े से हर्जाना देकर यहाँ से हटा दिया जाता और मंदिर अपनी पुरानी स्थिति में आ जाता.

कुछ ही दिनो बाद प्रकृति ने केदारनाथ में इंसानी घुसपैठ को अपने तरीक़े से नेस्तनाबूद कर दिया है, लेकिन हमारे पूर्वजों की ओर से बनाए गए स्थापत्य का बेहतरीन नमूना बचा रह गया है. बीबीसी डॉट कॉम पर पूरा लेख पढ़ें


As the massive disaster in flood-stricken Uttarakhand unfolds, Himanshu Upadhyaya draws attention to the glaring inadequacies in disaster management preparedness and risk reduction in the state, as well as the nation, as exposed by recent audits. 
  
21 June 2013. The photographs that Uttarkashi Aapda Prabandh Samiti sent me a few days back are still fresh in memory. When I showed them to a relative, I was asked in a tone of disbelief, “Are you sure these are fresh photographs? The collapsing building looks like what we saw last year in the aftermath of the flash flood.” In these days of 24x7 news channels bringing the footage of unfolding disasters to our drawing rooms, very few journalists would look at a totally unlikely source to write a disaster related story. Yet, once again, while not rushing to ground zero to file a disaster-related human interest story, I have decided to browse through a source that friends often accuse me of being addicted to: Performance Audits by CAG of India on the working of institutions and implementation of Acts.

It has been more than seven years since India passed a Disaster Management Act, 2005 (NDMA) and clearly these cannot be said to be early years of institutions that came into being to facilitate disaster management and preparedness. But when it comes to CAG’s performance audit of the functioning of the NDMA, which entered public domain on 15 March 2013, what lines do we get to read? The performance audit noted that the National Plan for Disaster Management had not been formulated even after six years of enactment of the DM Act. Similarly, it was found that the national guidelines on disaster preparedness and risk reduction developed by NDMA were not adopted and applied by either nodal agencies or the state governments themselves.

Warning signs in Uttarakhand
In the wake of massive floods in Uttarakhand, let’s revisit what the Performance Audit report said in its chapter titled ‘State specific observation on disaster preparedness and risk reduction plans in Uttarakhand.’ The audit noticed that while the State Disaster Management Authority (SDMA) was constituted in October 2007, it had not formulated any rules, regulations, policies and guidelines. Worse still, as on September 2012, the SDMA in Uttarakhand had never met since its constitution for the five year period! Similarly, the State Advisory Committee on Disaster Management met only once after it was constituted in February 2008. The State Executive Committee was formed in January 2008 but had not met even once since its creation!

The state government did not sanction any post for the SDMA, which affected the establishment of the Management Information Service. In 13 districts, for District Emergency Operations Centre, as against the requirement of 117, only 66 posts were filled. The State Disaster Management Plan (SDMP) was still under preparation at the time of the performance audit and it was found that no actionable programmes were prepared for various disasters, even though NDMA guidelines for preparation of SDMP were issued in July 2007. 
इंडिया टुगैदर में पढ़ें पूरा लेख


एक प्रतिक्रिया

1/D-32
JUN 24, 2013
10:02 AM
Although these photos are over 130 years old, but the story was not so very different just 30 years ago.
Those small huts are seen around the temple, are called chhan or chhappar.
First one to build permanent structure here (other than the temple), was GMVN (Garhwal Mandal Vikash Nigam), in late 60's.
After that few rich Panda's of the temple built their own tin sheet houses.
Then somewhere around late 70s and early 80s money started pouring into building new and better facilities everywhere.
Those who are complaining local's were not helpful (and wrongly so), are the one's started destroying the place, economically, socially, morally, environmentally in the fist place.
SANTOSH GAIROLA
HSINCHU, TAIWAN


चारु तिवारी 
10 नवम्बर 2010
उत्तराखंड में एक लोकोक्ति प्रचलित है-“भलि छे सुवा भली छे, भलि बतौनि भलि हे, जस छे सुवा उसि छे।” इसका अर्थ है सुन्दरी की प्रसंशा करते हुये हमेशा कहा जाता रहा कि तू बहुत अच्छी है, सभी बताते हैं वह अच्छी है, लेकिन अपनी जैसी ही है। यह बात उत्तराखंड राज्य के दस वर्ष पूरे होने पर सटीक बैठती है। वह वैसा ही जैसा है। पिछले कुछ सालों में एक उम्मीद जग रही थी कि आने वाले दिनों में शहीदों ने जिस राज्य का सपना देखा था शायद वह समय के साथ साकार हो जायेगा। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में भाजपा-उक्रांद गंठबंधन सरकार ने इस राज्य को भष्ट्राचार और लूट का जो नया उपनिवेश बनाया है उससे अब लोगों की रही-सही उम्मीदें भी टूट गयी है। तमाम सवाल न केवल अपनी जगह खड़े हैं, बल्कि और भयानक रूप से जनता के सामने खड़े हो गये हैं। इस इस साल की जब लोग समीक्षा कर रहे हैं तब प्रदेश भारी प्राकृतिक आपदा की मार से उबरने की छटपटाहट में है। इस आपदा ने यह बताया कि इन दस वर्षों में अनियोजित विकास और मुनाफाखोरों में हाथों में अपनी जल, जंगल और जमीनें सौंपकर राज्य के नीति नियंताओं ने मानवजनित आपदा का रास्ता तैयार किया है। सही मायने में राज्य का यह पहला दशक हमें डराता है। आकांक्षायें की बात तो छोड़िये अब यह पहाड़ के अस्तित्व को नेस्तनाबूत करने का दशक रहा है।
असल में राज्य के लोगों की आकांक्षाओं का यह राज्य बना ही नहीं। उत्तराखंड राज्य आंदोलन को वर्ष 1994 का आंदोलन मानना सबसे बड़ी भूल है। इस आंदोलन से हम लोगों की आकांक्षाओं को नहीं समझ सकते। इसे समझने के लिये हमें उन मूल बातों की ओर जाना होगा जहां से राज्य की बात शुरू हुयी थी। आजादी के आन्दोलन के समय से ही यहां के लोगों में प्राकृतिक संसाध्नों पर हक की बात को प्रमुखता से उठाया था। राष्टीय आंदोलन मे यहां के लोगों की भागीदारी इसी रूप में हुयी। सालम, सल्ट, तिलाड़ी की क्रान्तियां इसी आकांक्षाओं का प्रतीक थी। आजादी के बाद भी जंगलात कानून अंग्रेजों के समय के रहे। लोगों को लगा कि अब भी उनके हक उनसे छीने जा रहे हैं। सत्तर के दशक में इसके प्रतिकार के रूप में जनता आगे आयी। पहाड़ के तमाम जंगल तीस साला एग्रीमेंट पर स्टार पेपर मिल और बिजौरिया को सौंपे जाने लगे इससे लोगों में असंतोष उभरा। आंदोलनों का नया सिलसिला चला। वन बचाओ, चिपको, नशा नहीं दो रोजगार, तराई में भूमिहीनों को जमीन दिलाने का आंदोलन और वन अधिनियम के खिलाफ आंदोलन जनआकांक्षाओं के पड़ाव रहे हैं। बाद में लोगों ने इन तमाम समस्याओं का समाधान अलग राज्य के रूप में देखा। तीस साल तक अनवरत चले आंदोलन में जनाकांक्षायें इन्हीं मुद्दों में इर्द-गिर्द रही। वर्ष 1994 में जब आंदोलन चला तो यह जनाकांक्षाओं के बजाय भावनात्मक रूप में तब्दील हो गया। इस आंदोलन में एक अलग प्रशासनिक टुकड़े की मांग प्रभावी हो गयी। यही कारण के 42 शहादतों के बाद भी राज्य छह साल बाद मिला। इससे स्पष्ट होता है कि सत्ता में बैठे लोगों ने कभी भी जनता की भावनाओं को महत्व नही दिया। दुर्भाग्य से जब राज्य बना तो वह बारी-बारी से दो पहाड़ और राज्य विरोधी ताकतों के हाथों में चला गया। इससे इस बात पर कोई फर्क नहीं पड़ा कि हम उत्तर प्रदेश में हैं अपने राज्य में। पिछले दस साल की उठाकर देख लीजिये पहाड़ तेजी के साथ बिकने लगा है। सत्तर के दशक में बिजौरिया को जंगल बेचे जा रहे थे तब उत्तर प्रदेश में बैठे हुक्मरान इसके बिचौलिये थे अब थापर और जेपी को नदियां बेची जा रही हैं, उसको बेचने वाले अपने ही भगत, नारायण, खंडूडी और निशंक हैं। मुझे सबसे बुनियादी कारण यही लगता है कि हम अब भी जनाकांक्षाओं को परिभाषित नहीं कर पा रहे हैं जिसके मूल में यहां के संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार की भावना निहित है। पूरा लेख पढ़ें यहाँ


और अब आपदा की राजनीति

उत्तराखंड की आपदा को देखते हुए भाजपा ने यूपीए सरकार के खिलाफ अपना जेल भरो आंदोलन स्थगित कर दिया है। यह आंदोलन 27 मई से 2 जून तक चलना था, पर छत्तीसगढ़ में माओवादी हमले की वजह से स्थगित कर दिया गया था। गोवा में तय हुआ कि इसे जून में चलाया जाएगा। उधर दिग्विजय सिंह ने नरेन्द्र मोदी की उत्तराखंड यात्रा पर उँगली उठाई है। उसके पहले कांग्रेस की ओर से किसी ने तंज मारा था कि गुजरात ने इस आपदा के लिए सिर्फ दो करोड़ रुपए दिए। जवाब में भाजपा की प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कहा, जनता जानना चाहती है कि आज जब उत्तराखंड में राष्ट्रीय आपदा आई है, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी कहां हैं। साथ में यह भी कहा कि विदेश में हैं तो बेहतर हैं वहीं रहें। वैसे भी राष्ट्रीय आपदा या बड़ी घटनाओं के समय राहुल गांधी देश में मौजूद नहीं रहते हैं। दिल्ली गैंगरेप के वक्त भी नहीं थे। मुख्तार अब्बास नकवी ने आरोप लगाया कि यूपीए सरकार के मंत्रियों की गलत बयानबाजी के कारण राहत कार्यों में बाधा आ रही है।

इस बयानबाज़ी की चपेट में गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का यह बयान भी आ गया कि तालमेल न होने से ठीक से राहत का काम नहीं हो पा रहा है। इस बयान को भाजपा ने निशाने पर ले लिया। मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, शिंदे को साफ करना चाहिए कि किन-किन एजेंसियों में तालमेल नहीं है क्योंकि केंद्र व उत्तराखंड में तो कांग्रेस की ही सरकारें हैं। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने आरोप लगाया कि दिल्ली में उनकी कोशिश से जुटाई गई राहत सामग्री को उत्तराखंड सरकार ने लेने से इंकार कर दिया। उनके निजी सहायक के अनुसार दिल्ली से तीन ट्रक सामान उत्तराखंड निवास भेजा गएया लेकिन अफसरों ने कहा कि राहत के लिए सिर्फ चेक या कैश में पैसा ही दे सकते हैं।

Sunday, June 23, 2013

पर्यावरण और लोकविश्वास


'नदी किनारे बसने वालों का परिवार नहीं बचता'




अपना पर्यावरण बचाने के लिए हिमालयी समाजों के अपने परंपरागत तौर-तरीक़े रहे हैं. विशेष रूप से उत्तराखंड में प्रकृति के संरक्षण की समृद्ध परंपरा रही है.

आप ऊपर के इलाक़ों में जाएँ तो पाएँगे कि वहाँ गाँवों के बुज़ुर्ग जंगलों और घाटियों में चलते हुए ऊँची आवाज़ों में बोलने से मना करते हैं. कहा जाता है कि इससे वन देवियाँ नाराज़ हो जाती हैं.

हम ऊँचाई में पड़ने वाले बुग्यालों में जूते पहनकर नहीं जाते थे. मौसम से पहले ब्रह्म कमल और फेन कमल जैसे सुंदर फूलों को नहीं तोड़ने की परंपरा रही है.

मनपाई बुग्याल से रुद्रनाथ के रास्ते पर एक बार हम पशुपालकों के छप्परों में उनके साथ रहे. ऐसी ऊंचाई वाली जगहों पर ब्रह्म कमल और फेन कमल पाया जाता है. इसका दवा के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है.

पूर्णमासी को नंदा देवा या वन देवी की पूजा की जाती है. उसके बाद सुबह ही कमल को तोड़ा जाता है. पशुपालकों के पास कोई दवा तो होती नहीं है. वे दर्द से राहत के लिए कमल की राख पेट पर मलते हैं.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम मे पढ़ें पूरा लेख

प्रलय का शिलालेख

अनुपम मिश्र

सन् 77 की जुलाई का तीसरा हफ्ता। चमोली जिले की बिरही घाटी में आज एक अजीब सी खामोशी है। यों तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा है और इस कारण अलकनंदा की सहायक नदी बिरही का जलस्तर भी बढ़ता जा रहा है। उफनती पहाड़ी नदी की तेज आवाज पूरी घाटी में टकरा कर गूंज भी रही है।

फिर भी चमोली-बद्रीनाथ मोटर सड़क से बाईं तरफ लगभग 22 किलोमीटर दूर 6500 फुट की ऊंचाई पर बनी इस घाटी के 13 गांवों के लोगों को आज सब कुछ शांत सा लग रहा है। आज से सिर्फ सात बरस पहले ये लोग प्रलय की गर्जना सुन चुके थे, देख चुके थे। इनके घर, खेत व ढोर इस प्रलय में बह चुके थे। उस प्रलय की तुलना में आज बिरही नदी का शोर इन्हें डरा नहीं रहा था। कोई एक मील चौड़ी और पांच मील लंबी इस घाटी में चारों तरफ बड़ी-बड़ी शिलाएं, पत्थर, रेत और मलबा भरा हुआ है, इस सब के बीच से किसी तरह रास्ता बना कर बह रही बिरही नदी सचमुच बड़ी गहरी लगती है।

अमर उजाला में पढ़ें पूरा लेख

हमारे लालच की शिकार हुई गंगा

वंदना शिवा के भाषण के अंश

देहरादून में जन्मी वंदना शिवा का नाम पर्यावरण आंदोलन के बड़े नेताओं में गिना जाता है। उन्होंने पर्यावरण व वैश्वीकरण पर करीब बीस किताबें लिखी हैं। इलाहाबाद में ‘शक्ति और प्रकृति’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने लोगों से गंगा को बचाने का आह्वान किया। भाषण के अंश:

जीवन की प्रेरणा
यह मां गंगा की प्रेरणा है कि आज हम सब यहां एकत्र हुए हैं। गंगा सिर्फ एक नदी नहीं है, यह एक आध्यात्मिक प्रेरणा है। आज गंगा के प्रदूषण पर बहस हो रही है। हम सब जानते हैं कि प्रकृति कभी प्रदूषण नहीं फैलाती है। गंगा में गंदगी फैलाने वाले हम ही हैं। हम विकास की गलतफहमी में गंगा को बरबाद करने पर तुले हैं। गंगा तो हमेशा से अविरल व निर्मल रही है। हमने बांध के नाम पर गंगा के रास्ते में रुकावटें पैदा कीं। बांध बिल्कुल कोलेस्ट्रॉल की तरह है। जैसे कोलेस्ट्रॉल हमारी सेहत के लिए ठीक नहीं है, वैसे ही बांध गंगा की सेहत के लिए ठीक नहीं है। उद्गम स्थल से तो गंगा निर्मल ही बहती है, यह तो हम इंसान हैं, जो गंगा में गंदगी फेंककर इसे मैला कर देते हैं।
हिन्दुस्तान में पढ़ें पूरा आलेख

आपदा के प्रकोप से बच सकते हैं हम

राधिका मूर्ति स्विट्जरलैंड में ‘डिजास्टर रिस्क मैनेजमेंट’ विशेषज्ञ हैं। फिजी में पली-बढ़ी राधिका का पालन-पोषण ऐसे इलाकों में हुआ जहां अक्सर तूफान और सुनामी आया करते हैं। उनका मानना है कि इंसान सजग रहे तो प्राकृतिक आपदाओं को कम किया जा सकता है। पेश हैं उनके एक भाषण के अंश:

प्रकृति का कहर

मुझे आज भी अपने स्कूल का वह पहला दिन याद है। हम सब बच्चे खाली जमीन पर बैठे थे। ऊपर खुला आसमान था। हमारे पीछे दीवार के रूप में बस एक टेंट लगा था। टेंट के उस पार था तूफान का खौफनाक मंजर। तब मैं बहुत छोटी थी, इसलिए तूफान की त्रासदी का अंदाजा नहीं था। लेकिन बड़े होने पर पता चला कि कितना मुश्किल होता है प्रकृति के कहर से जूझना। मेरा पालन-पोषण फिजी में हुआ। फिजी दुनिया भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। यहां के खूबसूरत समुद्री किनारे, विशाल ताड़ के पेड़ और लोगों केमुस्कुराते चेहरे पर्यटकों को खींच लाते हैं। लेकिन इन लुभावने नजारों के बीच कुछ डरावनी और दिल दहलाने वाली प्रकृति की लीलाएं भी हैं जिनसे हम अक्सर रूबरू होते हैं। तूफान, बाढ़ और भूस्खलन के रूप में डरावने  वाले प्रकृति के रौद्र से लड़ना आसान नहीं होता। सच कहूं तो बचपन में हमारे लिए तूफान और बाढ़ की घटनाएं दिलचस्प किस्से हुआ करते थे। लेकिन धीरे-धीरे मुझे इनकी गंभीरता का अहसास हुआ। मैं अपने माता-पिता की समझदारी और हौंसले को सलाम करती हूं जिन्होंने मुझे ऐसी आपदाओं के कहर से बचाकर रखा।

मानव व्यवहार

प्राकृतिक आपदाओं के लिए मानव व्यवहार कितना जिम्मेदार है? जब मैंने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काम शुरु किया तो कई अहम बातें सामाने आईं। सबसे बड़ी बात यह है कि बहुत सारे लोग प्राकृतिक आपदा को ईश्वर का प्रकोप समझते हैं। उनका मानना है कि बाढ़ और तूफान के जरिए ईश्वर हम इंसानों को हमारे पापों के लिए सजा देते हैं। जाहिर है ऐसे में हमारे लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि हमारी किन हरकतों की वजह से प्रकृति को नुकसान हो रहा है और हम खुद को कैसे आपदाओं के कहर से बचा सकते हैं। हमें आपदाओं की असली वजहों को समझना होगा।

हिन्दुस्तान में पढ़ें पूरा आलेख


प्रकृति के बारे में वैज्ञानिक दृष्टि बनाएं

हालांकि हम प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के खतरों के बारे में एक अरसे से बहस करते रहे हैं, पर उत्तराखंड के हादसे ने पहली बार इतनी गम्भीरता से इस सवाल को उठाया है। और उतनी ही गम्भीरता से इस बात को रेखांकित किया है कि व्यवस्था ऐसे हादसों का सामना करने को तैयार नहीं है।

इस साल मॉनसून समय से काफी पहले आ गया है। मॉनसून आने के ठीक पहले महाराष्ट्र सहित देश के कुछ हिस्से सूखे का सामना कर रहे थे। अचानक पता लगा है कि भारतीय उप महाद्वीप में औसत तापमान चार डिग्री बढ़ गया है। ये बातें इशारा कर रहीं हैं कि अपने आर्थिक विकास और प्राकृतिक संतुलन पर गम्भीरता सेविचार करें।

उत्तराखंड का हादसा क्या केवल अतिवृष्टि के कारण हुआ? अतिवृष्टि तो पहले भी होती रही है। और भविष्य में भी होगी। अतिवृष्टि ने मौसम के बदलाव की ओर संकेत किया है तो भारी संख्या में मौतों ने आपदा प्रबंधन की पोल खोली है। हादसे में मरने वालों की संख्या अभी तक बताई जा रही आधिकारिक संख्या से कहीं ज्यादा और कई गुना ज्यादा है। इसका दुष्प्रभाव सारे अनुमानों से ज्यादा भयावह है।

मदद करने वाली एजेंसियों और सरकार ने इसकी शिद्द्त को समझने में देर की। फिर भी जल्दबाज़ी में निष्कर्ष निकालने के बजाय हमें उन बातों पर ध्यान देने की कोशिश करनी चाहिए जो इसके पीछे हो सकती हैं। साथ ही उन कदमों पर विचार करना चाहिए जो उठाए जाने चाहिए।

Friday, June 21, 2013

ग्लोबल वॉर्मिंग ने बदला मॉनसून का स्‍वरूप


भारत के लिए चेतावनी है भीषण बाढ़ : ग्रीनपीस

पिछले दिनों हुइ मूसलाधार बारिश से भारत के उत्तरी राज्यों में बाढ़ की तबाही और विश्‍व बैंक की ओर से जारी रिपोर्ट- पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ग्रीनपीस ने भारत सरकार से अपील की है कि वह जलवायु परिवर्तन के चलते हो रही आपदाओं को गंभीरता से ले क्योंकि भारत और दक्षिण एशिया क्षेत्र में इसके जलवायु परिवर्तन का असर बेहद चौंकाने वाला हो सकता है।

ग्रीनपीस की जलवायु और ऊर्जा मामलों की कैंपेन मैनेजर विनूता गोपाल कहती हैं, “तापमान में 4 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी भारत सहन नहीं कर सकता। उत्तरी भारत में बाढ़ और महाराष्ट्र के सूखा यह दर्शाता है कि हमारे मानसून का जीवन ख़तरे में है. विकास और संपन्नता के नाम पर जीवाश्म ईंधनों का जमकर दोहन किया जा रहा है, लेकिन तेजी से इनका विपरीत असर देखने को मिल रहा है। अगर हम जलवायु परिवर्तन को नजरअंदाज करते रहे तो अल्प अवधि के लिए होने वाले आर्थिक लाभ का कोई मूल्य नहीं होता। इससे हम कई दशक पीछे चले जाते हैं और लाखों लोग गरीबी की चपेट में आ जाते हैं।”

वर्ल्ड बैंक की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से जल संसाधनों पर पड़ने वाले विपरीत असर से ऊर्जा सुरक्षा पर संकट गहराता जा रहा है। भारत अपनी ऊर्जा संबंधी जरूरतों के लिए थर्मल और हाइड्रो प्वार प्लांट पर निर्भर है। नए पावर प्लांटों में करीब 80 फ़ीसदी प्लांट कोयले से चलने वाले हैं और महाराष्ट्र में इस साल के सूखे के चलते थर्मल प्वार प्लांट को चलाने के लिए जलापूर्ति का होना मुश्किल दिख रहा है। इसके अलावा इलाके के लोगों के सामने पेय जल और सिंचाई का संकट भी है।

महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के वर्धा और वेनगंगा नदी पर ग्रीनपीस के अध्ययन से ये बात पहले ही सामने आ चुकी है कि सामान्य बारिश के बावजूद इलाके के थर्मल पावर प्लांटों में हर कुछ साल बाद जलापूर्ति का संकट होता है और इसके चलते उन्हें बंद करने की नौबत आ जाती है।

विनूता गोपाल कहती हैं, “कोयले पर बढ़ती हमारी निर्भरता की कीमत ना केवल पर्यावरण को चुकानी पड़ी रही है बल्कि स्थानीय समुदायों पर इसका असर पड़ रहा है और कोयलते के बढ़ते आयात से अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। अधकचरे जीवाश्म ईंधनों पर निवेश को कम कर और अक्षय ऊर्जा और ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल करने संबंधी क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा दें तो हम अपनी ऊर्जा संबंधी जरूरतों को हासिल कर सकते हैं. इतना ही नहीं इससे वायुमंडल का तापमाना 2 डिग्री सेल्सियस तक नीचे लाने में मदद मिलेगी। इसके जरिए हम जलवायु परविर्तन के भयावह परिणामों पर अंकुश लगा सकते हैं।”

विनूता गोपाल ने उम्मीद जताई है कि वर्ल्ड बैंक अब इस दिशा में पहल करेगा और अपनी ऊर्जा क्षेत्र में अपने अनुदान का पूरा हिस्सा अक्षय ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने के लिए जारी करेगा जिसेस गरीबों को वास्तविकता में मदद मिल पाए।

यह जाहिर है कि अक्षय ऊर्जा का विकल्प ही ऊर्जा संकट का समाधान और सतत विकास का रास्ता है। ऐसे में सरकार को इस दिशा में पहल करनी होगी। भारत सरकार को 2020 तक अपनी कुल ऊर्जा का 20 फ़ीसदी हिस्सा अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र से हासिल करने को राष्ट्रीय लक्ष्य बनाना चाहिए। वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस कम करने के लिए दुनिया को साफ सुथरी ऊर्जा के इस्तेमाल की ओर तेजी से कदम बढ़ाने की जरूरत है।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें 
विनुता गोपाल, जलवायु व ऊर्जा  अभियान संचालक ग्रीनपीस, +919845535418]vinuta.gopal@greenpeace.org
सीमा जावेद, मीडिया अधिकारी, +919910059765seema.javed@greenpeace.org

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