प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अपील के बाद अचानक देश में सोने की कीमत और उसकी खरीद को लेकर चर्चा चल निकली है। इस अपील के अर्थ को समझने के पहले हमें सोने के महत्त्व को समझना होगा। दुनिया में डॉलर को सबसे विश्वसनीय मुद्रा समझा जाता है, पर सोना उससे भी ज्यादा विश्वसनीय संपदा है। वैश्विक स्तर पर सोने का कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर के साथ भारतीय रुपये की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव स्थानीय बाजार में सोने की कीमत निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारत हर साल लगभग 700 से 800 टन सोना बाहर से
खरीदता है। इस वजह से यह दुनिया के सबसे बड़े सोना आयात करने वाले देशों में से एक
है। सोने का घरेलू उत्पादन काफी कम है। कुल जरूरत का लगभग 90 से 95 प्रतिशत सोना
बाहर से खरीदा जाता है। भारतीय कारीगर सोने के जेवर बनाकर उनका निर्यात भी करते
हैं, इसलिए कुछ सोना बाहर भी जाता है। सोने के रासायनिक उपयोग भी हैं।
बहरहाल इसकी खरीद का हमारे मुद्राकोष पर सीधा
प्रभाव पड़ता है। प्रधानमंत्री ने सोने की खरीद से बचने की सलाह इसीलिए दी है,
क्योंकि पश्चिम एशिया की लड़ाई के कारण भारत के सामने ऊर्जा संकट पैदा हो गया है।
हमें पेट्रोलियम आयात करने के लिए विदेशी मुद्रा की ज़रूरत है। इस लड़ाई के कारण
हमारे विदेशी मुद्राकोष पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
सराफा में तेजी
भारत के सराफा बाजारों में पिछले कुछ महीनों से तेजी का दौर चल रहा है। प्रधानमंत्री की अपील के अलावा भारत सरकार ने सोने और चाँदी की खरीद पर काबू पाने के लिए 13 मई से सोने और चाँदी के आयात पर 10 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी और 5 प्रतिशत एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस लगाया है।
