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Monday, May 18, 2026

जलधारा की सफाई का पर्व


आज, हिंदू के पहले पेज पर एक रोचक तस्वीर छपी है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग टोकरियाँ लेकर एक जलधारा की सफाई करते नज़र आ रहे हैं। यह तस्वीर दक्षिण कश्मीर के काजीगुंड के पंजाथ नाग गाँव के लोगों की है, जिन्होंने अपने पूर्वजों की सदियों पुरानी परंपरा को आज भी कायम रखा है। यहाँ धान की रोपाई से पहले झरनों की सफाई के साथ-साथ मछली पकड़ने की प्रतियोगिता होती है।  यह एक स्थानीय पर्व के रूप में उभरा है, जो अब दूसरे गाँवों के लोगों को भी आकर्षित करता है।

अब यहाँ आसपास के करीब 45 समुदायों के लोग एकत्र होकर पानी की सफाई करते हैं और निर्धारित मानकों के भीतर रहते हुए मछलियाँ भी पकड़ते हैं। यह झरना स्थानीय अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है, क्योंकि इससे नीचे की ओर स्थित कई गांवों की सिंचाई होती है और लगभग 25 गाँवों को पीने का पानी मिलता है।

इस झरने और इसके संरक्षण का उल्लेख कल्हण रचित 12वीं सदी के ऐतिहासिक ग्रंथ राज तरंगिणी में भी किया गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पंजाथ अर्थात पाँच हाथ, जो 500 झरनों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें पीर पंजाल की तलहटी पर स्थित झरने भी शामिल हैं। माना जाता है कि एक समय में इस गाँव में 500 से अधिक प्राकृतिक झरने हुआ करते थे।

पंजाथ झरना काजीगुंड के सैकड़ों परिवारों के लिए सिंचाई और पीने के पानी का एक मुख्य स्रोत है। हर साल धान की खेती शुरू होने से पहले स्थानीय निवासी उचित सिंचाई व्यवस्था के लिए गाद और खरपतवार हटाकर जलाशय को साफ करते हैं। इस उत्सव को देखने 50 किलोमीटर दूर से भी लोग आते हैं।

हर साल मई के तीसरे या चौथे सप्ताह में ग्रामीण एक दिन चुनते हैं जब सेब, बादाम और अखरोट के बाग फूलों से भरे होते हैं। 500 मीटर के क्षेत्र में फैले पंजाथ नाग की सफाई करते हैं और मछली पकड़ते हैं। यह एक ऐसी परंपरा है जो उन्हें पूर्वजों से विरासत में मिली है। लोग इस दिन पकड़ी गई मछलियों को घर ले जाते हैं और उस दिन दोस्तों और परिवार के लिए दावत मनाते हैं।

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Thursday, August 18, 2022

The Hindu के हिंदी-प्रेम के पीछे क्या है?

चेन्नई से प्रकाशित अखबार द हिंदू के संपादक सुरेश नंबथ ने गत 15 अगस्त को ट्वीट किया, ‘@the_hindu in Hindi; from today, our editorials will be available in Hindi.’ पहली नज़र में लगा कि शायद यह अखबार हिंदी में भी निकलने वाला है। गौर से देखने पर पता लगता है कि फिलहाल तो ऐसा नहीं है। हो सकता है कि ऐसा करने के बारे में विचार किया जा रहा हो। हुआ यह है कि अखबार की वैबसाइट पर संपादकीय के साथ हिंदी का एक पेज और जोड़ दिया गया है। अंग्रेजी अखबार के संपादकीयों का हिंदी अनुवाद भी अब उपलब्ध हैं।

हिंदू की वैबसाइट पर मैंने इस हिंदी पेज को खोजने की कोशिश की, तो नहीं मिला, पर सुरेश नंबथ ने जो लिंक दिया है, उसके सहारे आप अब तक प्रकाशित सभी संपादकीयों को पढ़ सकते हैं। सुरेश नंब के ट्वीट पर हिंदी के कुछ पाठकों और पत्रकारों ने काफी दिलचस्पी दिखाई और इसका स्वागत किया। यह स्वागत इस अंदाज़ में था कि शायद यह अखबार हिंदी में आने वाला है।

हिंदू से उम्मीदें

ऐसा कभी हो, तो बड़ी अच्छी बात होगी, क्योंकि इसमें दो राय नहीं कि गुणवत्ता के लिहाज से हिंदू अच्छा अखबार है। हिंदी अखबारों की गुणवत्ता का, खासतौर से देश-दुनिया से जुड़ी संजीदा जानकारी का जिस तरह से ह्रास हुआ है, उसके कारण लोगों को हिंदू से उम्मीदें हैं। काफी लोग उसके वामपंथी झुकाव और राजनीतिक-दृष्टिकोण के मुरीद हैं। पर इन बातों के साथ कई तरह के किंतु-परंतु जुड़े हैं।

हिंदी में बंगाल के आनंद बाजार पत्रिका और केरल के मलयाला मनोरमा ग्रुप ने भी प्रवेश करने की कोशिश की है। आनंद बाजार पत्रिका को प्रिंट में तो सफलता नहीं मिली, पर उनका टीवी चैनल जरूर एक हद तक सफल हुआ है। हिंदी में हिंदू के प्रकाशन की संभावना का जिक्र होते ही काफी लोगों का ध्यान गया है। एक जमाने में खबरें आती थीं कि स्टेट्समैन समूह हिंदी में नागरिक नाम से अखबार निकालना चाहता है। ऐसा हुआ नहीं। पर हिंदी वाले अच्छे और संजीदा मीडिया का इंतजार करते रहते हैं।

हिंदी-शहरों में हिंदू

हिंदू तमिल-जीवन और समाज के भीतर से निकला अखबार है, जिसमें हिंदी के प्रति अनुग्रह बहुत कम है, बल्कि हिंदी-विरोधी स्वर उस क्षेत्र में सबसे तीखे हैं। उसका तमिल-संस्करण भी है। वह दक्षिण की दूसरी भाषाओं को छोड़कर हिंदी-संस्करण क्यों निकालना चाहेगा?  वह केरल और तमिलनाडु में सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है। विकीपीडिया के अनुसार, इस समय यह भारत के 11 राज्यों के 21 स्थानों से प्रकाशित होता है। इनमें दक्षिण भारत के छोटे-बड़े शहरों के अलावा दिल्ली, मुंबई, कोलकाता वगैरह भी समझ में आते हैं, पर मोहाली, लखनऊ, इलाहाबाद और पटना के नाम पढ़कर हैरत होती है और इसका मतलब भी समझ में आता है।