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Wednesday, June 24, 2015

दक्षिण एशिया में उप-क्षेत्रीय सहयोग के नए द्वार

सोमवार को चीन ने नाथूला होकर कैलाश मानसरोवर तक जाने का दूसरा रास्ता खोल दिया गया. चीन ने भारत के साथ विश्वास बहाली के उपायों के तहत यह रास्ता खोला है. इस रास्ते से भारतीय तीर्थ यात्रियों को आसानी होगी. धार्मिक पर्यटन के अलावा यहाँ आधुनिक पर्यटन की भी अपार सम्भावनाएं हैं. पर सिद्धांततः यह आर्थिक विकास के नए रास्तों को खोलने की कोशिश है.

Sunday, June 1, 2014

भारत के पड़ोस का महत्व

इस साल मॉनसून के देर से आने का अंदेशा है. बारिश कम हुई या असंतुलित हुई तो खेती-बाड़ी से जुड़े लोगों के सामने संकट पैदा हो जाएगा और अकाल के कारण पूरी अर्थ-व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा. यह खतरा सिर्फ भारत के सिर पर नहीं है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया पर है. खासतौर से भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और अफगानिस्तान इसके शिकार होंगे. हम आतंकवाद को बड़ा खतरा समझते हैं और एक हद तक वह है भी. पर हमारे सामने खतरे दूसरे भी हैं. आतंकवाद और कट्टरपंथ भी अशिक्षा, नासमझी और गरीबी की देन है. इस किस्म के अनेक खतरे हम सब के सामने हैं. पर्यावरण और प्राकृतिक आपदाएं राजनीतिक सीमाओं को नहीं देखतीं. इन आपदाओं के बरक्स हमारे पास ऐसे अनुभव भी हैं जब इंसान ने सामूहिक प्रयास से इन पर काबू पाया. पिछले साल भारत के पूर्वी तट पर आए फाइलिन तूफान के कारण भारी नुकसान का अंदेशा था, पर मौसम विज्ञानियों को अंतरिक्ष में घूम रहे उपग्रहों की मदद से सही समय पर सूचना मिली और आबादी को सागर तट से हटा लिया गया. 1999 के ऐसे ही एक तूफान में 10 हजार से ज्यादा लोग मरे थे. अंतरिक्ष की तकनीक के साथ जुड़ी अनेक तकनीकों का इस्तेमाल चिकित्सा, परिवहन, संचार यहाँ तक कि सुरक्षा में होता. विज्ञान की खोज की सीढ़ियाँ हैं. पर क्या हम इन सीढ़ियों पर चलना चाहते हैं?

Saturday, February 16, 2013

हिन्द महासागर में भारत-विरोधी हवाओं पर ध्यान दें


सिद्धांततः भारत को मालदीव की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, पर वहाँ जो कुछ हो रहा है, उसे बैठे-बैठे देखते रहना भी नहीं चाहिए। पिछले साल जब मालदीव में सत्ता परिवर्तन हुआ था वह किसी प्रकार से न्यायपूर्ण नहीं था। फौजी ताकत के सहारे चुने हुए राष्ट्रपति को हटाना कहीं से उचित नहीं था। और अब उस राष्ट्रपति को चुनाव में खड़ा होने से रोकने की कोशिशें की जा रहीं है। इतना ही नहीं देश का एक तबका परोक्ष रूप से भारत-विरोधी बातें बोलता है। वह भी तब जब भारत उसका मददगार है। दरअसल हमें मालदीव ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया और खासतौर से हिन्द महासागर में भारत-विरोधी माहौल पैदा करने की कोशिशों के बाबत सतर्क रहना चाहिए।  16 फरवरी 2013 के हिन्दी ट्रिब्यून में प्रकाशित मेरा लेखः-
Maldivian army and policemen face supporters of Mohamed Nasheed, who resigned Tuesday from his post as Maldivian President, during a protest in Male on Wednesday.
मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद की गिरफ़्तारी का वॉरंट जारी होने के बाद उनका माले में स्थित भारतीय दूतावास में आना एक महत्वपूर्ण घटना है। पिछले साल फरवरी में जब नाशीद का तख्ता पलट किया गया था तब भारत सरकार ने उस घटना की अनदेखी की थी, पर लगता है कि अब यह घटनाक्रम किसी तार्किक परिणति की ओर बढ़ेगा। शायद हम अभी इस मामले को ठीक से समझ नहीं पाए हैं, पर यह बात साफ दिखाई पड़ रही है कि नाशीद को इस साल वहाँ अगस्त-सितम्बर में होने वाले चुनावों में खड़ा होने से रोकने की पीठिका तैयार की जा रही है। इसके पहले दिसम्बर 2012 में मालदीव सरकार ने भारतीय कम्पनी जीएमआर को बाहर का रास्ता दिखाकर हमें महत्वपूर्ण संदेश दिया था। माले के इब्राहिम नासिर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की देखरेख के लिए जीएमआर को दिया गया 50 करोड़ डॉलर का करार रद्द होना शायद बहुत बड़ी बात न हो, पर इसके पीछे के कारणों पर जाने की कोशिश करें तो हमारी चंताएं बढ़ेंगी। समझना यह है कि पिछले एक साल से यहाँ चल रही जद्दो-जेहद सिर्फ स्थानीय राजनीतिक खींचतान के कारण है या इसके पीछे चीन और पाकिस्तान का हाथ है।

Tuesday, January 15, 2013

दोनों ओर गरज़ते लाउडस्पीकरों के गोले




हिन्दू में प्रकाशित सुरेन्द्र का कार्टून जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर व्याप्त तनाव को अच्छी तरह व्यक्त करता है। दोनों देशों के लाउडस्पीकर तोप के गोलों का काम कर रहे हैं। यह भी एक सच है कि दोनों देश तनाव के किसी भी मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकते। बहरहाल जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर तनाव का पहला असर हॉकी इंडिया लीग पर पड़ा है। पाकिस्तानी खिलाड़ियों को खेलने से रोक दिया गया है। लगता है कुछ दिन तनाव दूर करने में लगेंगे। हमें इसे स्वीकार करना चाहिए कि हमारा मीडिया तमाम सही मसलों को उठाता है, पर हर बात के गहरे मतलब निकालने के चक्कर में असंतुलन पैदा कर देता है। भारत-पाक मसलों पर तो यों भी आसानी से तनाव पैदा किया जा सकता है। नियंत्रण रेखा पर तनाव कम होने में अभी कुछ समय लगेगा। बेशक हमारे सैनिकों की मौत शोक और नाराज़गी दोनों का विषय है। उससे ज्यादा परेशानी का विषय है सैनिक की गर्दन काटना। यह मध्य युगीन समझ है और पाकिस्तान को अपनी सेना के अनुशासन पर ध्यान देना चाहिए। अलबत्ता इस समय दोनों देशों के बीच झगड़े और तनाव का कोई कारण नहीं है। यह बात अगले दो-तीन हफ्ते में स्पष्ट हो जाएगी। भारत सरकार पर भी लोकमत का भारी दबाव है। 

जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर पिछले दस-बारह दिन से गोलियाँ चल रहीं हैं। भारत के दो सैनिकों की हत्या के बाद से देश में गुस्से की लहर है। सीमा पर तैनात सैनिक नाराज़ हैं। वे बदला लेना चाहते हैं। फेसबुक और ट्विटर पर कमेंट आ रहे हैं कि भारत दब्बू देश है। वह कार्रवाई करने से घबराता है। हालांकि भारत ने पाकिस्तान के सामने कड़े शब्दों में अपना विरोध व्यक्त किया है, पर जनता संतुष्ट नहीं है। सैनिकों की हत्या से ज्यादा फौजी की गर्दन काटने से जनता नाराज़ है। पर हमें समझना होगा कि यह घटना क्या जान-बूझकर की गई है? क्या पाकिस्तानी सेना या सरकार का इसमें हाथ है? या यह स्थानीय स्तर पर नासमझी में हुई घटना है? भारत को एक ज़िम्मेदार देश की भूमिका भी निभानी है। केवल आवेश और भावनाओं से काम नहीं होता।

Monday, July 9, 2012

नया वैश्विक सत्य, उन्माद नहीं सहयोग

दिफाए पाकिस्तान कौंसिल ने रविवार को लाहौर से लांग मार्च शुरू किया है, जिसका उद्देश्य नेटो सेनाओं की रसद सप्लाई पर लगी रोक हटाने के खिलाफ नाराज़गी जताना है। इस बीच अमेरिका ने अफगानिस्तान को गैर-नेटो देशों में अपने सामरिक साझीदारों की सूची में शामिल करके आने वाले समय में इस इलाके के सत्ता संतुलन का संकेत दिया है। पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान को समझ में आने लगा है कि यह वक्त आर्खिक सहयोग का है, टकराव का नहीं, पर वहाँ का कट्टरपंथी तबका इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है

हाल में भारत आए पाकिस्तान के विदेश सचिव जलील अब्बास जीलानी और भारत के विदेश सचिव रंजन मथाई के बीच दो दिन की बातचीत के बाद हुई प्रेस कांफ्रेस में दोनों सचिवों ने मीडिया से अपील की कि वह दोनों देशों के बीच टकराव का माहौल न बनाए। इस बातचीत का मकसद दोनों देशों के बीच रिश्तों को बेहतर बनाना था, जिसमें जम्मू-कश्मीर, आतंकवाद और भरोसा बढ़ाने वाले कदम (सीबीएम) शामिल हैं। दोनों देशों के रिश्ते जिस भावनात्मक धरातल पर हैं, उसमें सबसे बड़ा सीबीएम मीडिया के हाथ में है। जब भी भारत और पाकिस्तान का मैच खेल के मैदान पर होता है मीडिया में ‘आर्च राइवल्स’, परम्परागत प्रतिद्वंदी, जानी दुश्मन जैसे शब्द हवा में तैरने लगते हैं। किसी एक की विजय पर उस देश में जिस शिद्दत के साथ समारोह मनाया जाता है तकरीबन उसी शिद्दत से हारने वाले देश में शोक मनाया जाता है। इसके विपरीत दोनों देशों के बीच की सरकारी शब्दावली पर जाएं तो उसमें काफी बदलाव आ गया है। ताजा संयुक्त वक्तव्य को पढ़ें तो यह फर्क समझ में आएगा। पर दोनों विदेश सचिवों के संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में बातें बार-बार अबू जुंदाल पर जा रहीं थीं। 

Monday, June 11, 2012

अफगानिस्तान को लेकर बढ़ती तल्खियाँ

पिछले हफ्ते भारत-पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संदर्भ में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं। पहली थी अमेरिका के रक्षामंत्री लियन पेनेटा का अफगानिस्तान और भारत का दौरा। और दूसरी थी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की पेइचिंग में हुई बैठक। आप चाहें तो दोनों में कोई सूत्र न ढूँढें पर खोजने पर तमाम सूत्र मिलेंगे। वस्तुतः पेनेटा की भारत यात्रा के पीछे इस वक्त कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं था, सिर्फ अमेरिका की नीति में एशिया को लेकर बन रहे ताज़ा मंसूबों से भारत सरकार को वाकिफ कराना था। इन मंसूबों के अनुसार भारत को आने वाले वक्त में न सिर्फ अफगानिस्तान में बड़ी भूमिका निभानी है, बल्कि हिन्द महासागर से लेकर चीन सागर होते हुए प्रशांत महासागर तक अमेरिकी सुरक्षा के प्रयत्नों में शामिल होना है। अमेरिका की यह सुरक्षा नीति चीन के लिए परेशानी का कारण बन रही है। वह नहीं चाहता कि भारत इतना खुलेआम अमेरिका के खेमे में शामिल हो जाए।

Wednesday, November 9, 2011

भारत-पाक कारोबारी रिश्तों के दाँव-पेच

भारत-पाकिस्तान रिश्तों में किस हद तक संशय रहते हैं, इसका पता पिछले हफ्ते भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देने की घोषणा के बाद लगा। पाकिस्तान की सूचना प्रसारण मंत्री ने बाकायदा इसकी घोषणा की, पर बाद में पता लगा कि फैसला हो ज़रूर गया है पर घोषणा में कोई पेच था। घोषणा सही थी या गलत, भारत का दर्जा बदल गया है या बदल जाएगा। तरज़ीही देश या एमएफएन शब्द भ्रामक है। इसका अर्थ वही नहीं है, जो समझ में आता है। इसका अर्थ यह है कि पाकिस्तान अब हमें उन एक सौ से ज्यादा देशों के बराबर रखेगा जिन्हें एमएफएन का दर्जा दिया गया है। मतलब जिन देशों से व्यापार किया जाता है उन्हें बराबरी की सुविधाएं देना। उनमें भेदभाव नहीं करना।

Friday, November 4, 2011

भारत-पाक रिश्तों में कारोबारी बयार


पाकिस्तान ने अंततः भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा दे दिया। इस बात का फैसला सितम्बर के आखिरी हफ्ते में मुम्बई में दोनों देशों के व्यापार मत्रियों की बातचीत के बाद हो गया था। पर मुम्बई में औपचारिक घोषणा नहीं की गई थी। पाकिस्तान ने दुनिया के सौ देशों को इस किस्म का दर्जा दे रखा है। भारत उसे 1996 में यह दर्जा दे चुका है। विश्व व्यापार संगठन बनने के बाद से दुनियाभर के देश एक-दूसरे के साथ कारोबार बढ़ाने को उत्सुक रहते हैं, पर दक्षिण एशिया के इन दो देशों की राजनीति कारोबार के रास्ते पर चलती तो इस इलाके में खुशहाली की बयार बहती। बहरहाल महत्वपूर्ण बात यह है कि इस फैसले को सेना की स्वीकृति भी प्राप्त है।

Wednesday, December 22, 2010

भारत और पी-5

पी-5 यानी सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य। इन पाँचं के साथ भारत के रिश्तों की लकीरें इस साल के अंत तक स्पष्ट हो गईं हैं। अमेरिका और यूके का एक धड़ा है, जो राजनैतिक रूप से हमारा मित्र है, अनेक अंतर्विरोधों के साथ। इन दोनों देशों को चीन और युरोपीय संघ के साथ संतुलन बैठाने में हमारी मदद चाहिए। हमें इनके साथ रहना है क्योंकि हमें उच्च तकनीक और पूँजी निवेश की ज़रूरत है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में हमें बैठना है तो इनका साथ ज़रूरी है। अभी न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में हमें शामिल होना है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता चाहिए, जी-8 के साथ संतुलन चाहिए। इनके साथ ही आस्ट्रेलिया है, जो प्रशांत क्षेत्र में चीन के बरक्स हमारा मित्र बनेगा।

Sunday, December 19, 2010

भारत-चीन और पाकिस्तान




आज के इंडियन एक्सप्रेस में सी राजमोहन की खबर टाप बाक्स के रूप में छपी है। इसमें बताया गया है कि चीन अब भारत-चीन सीमा की लम्बाई 3500 किमी के बजाय 2000 किमी मानने लगा है। यानी उसने जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह पाकिस्तान का हिस्सा मान लिया है। चीनी नीतियाँ जल्दबाज़ी में नहीं बनतीं और न उनकी बात में इतनी बड़ी गलती हो सकती है। स्टैपल्ड वीजा जारी करने क पहले उन्होंने कोई न कोई विचार किया ही होगा। इधर आप ध्यान दें कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी हर तीन या चार महीने में चीन जा रहे हैं। फौज के अध्यक्ष जनरल कियानी भी चीन का दौरा कर आए हैं। स्टैपल्ड वीजा का मामला उतना सरल नहीं है जितना सामने से नज़र आता है।

Sunday, November 7, 2010

ओबामा का पहला दिन

ओबामा की यात्रा के पहले ही दिन भाजपा की आपत्ति समझ में नहीं आई। मुम्बई में सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम  भारत के उद्योग-व्यापार जगत के साथ संवाद का था। इसके लिए काफी पहले से तैयार फैसलों की घोषणा की गई है। ताज होटल से ओबामा की यात्रा का प्रारम्भ प्रतीक रूप में आतंकवाद-विरोधी वक्तव्य है। राजनैतिक वक्तव्य दिल्ली आने पर ही होना चाहिए। ओबामा बचना भी चाहेंगे तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहीं यह बात उठाएंगे। सुषमा स्वराज खुद ओबामा से मुलाकात करने वाली हैं। किसी विदेशी यात्री की यात्रा शुरू होने के पन्द्रह मिनट के भीतर आलोचनात्मक वक्तव्य जारी करना मुझे बचकाना लगता है।

कल की घोषणाओं में इसरो, भारत डायनैमिक्स और डीआरडीओ पर से टेक्नॉलजी ट्रांसफर की पाबंदियाँ हटने की खबर महत्वपूर्ण है। अब अणु-ऊर्जा विभाग की पाबंदियाँ रह गईं हैं। शायद वे भी खत्म हो जाएंगी। भारत को  न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में प्रवेश मिलने पर इस दिशा में एक कदम और आगे बढ़ेंगे। हालांकि इन सब बातों का फायदा अमेरिका को भी है, पर हमें भी तो है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय समुदाय में हमारी जगह पहले के मुकाबले बेहतर होती जा रही है। अब से दस साल बाद हमारी पोजीशन आज के चीन से बेहतर होगी।

इस बात पर भी ध्यान दें कि हमारी प्रतियोगिता पाकिस्तान से नहीं है। हालांकि पाकिस्तान हमें निरंतर अपने बराबर खड़ा करने की कोशिश कर रहा है, पर अमेरिका उसे इस्लामी देशों का फ्रंटल स्टेट होने तक का ही महत्व देता है। भारत की उसे आर्थिक-सहयोग के लिए ज़रूरत है। इस रास्ते पर हम चले तो शायद पाकिस्तान भारत के साथ सामरिक प्रतियोगिता की जगह आर्थिक सहयोग के रास्ते पर आए। पाकिस्तान ने युद्धोन्माद और जेहादी राजनीति के कारण अपना काफी नुकसान कर लिया है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के मामले में अमेरिका हमारा सीधे समर्थन नहीं करेगा। सुरक्षा परिषद के सुधार की ज़रूरत आने वाले समय में महसूस की जाएगी। बेशक कुछ विशेषाधिकार-प्राप्त देशों का अलग समूह बनाने की बात समझ में नहीं आती। पर विश्व समुदाय उतना अच्छा समुदाय नहीं है, जितना शब्दकोश का समुदाय शब्द है। भारत और पाकिस्तान हर स्तर पर समान नहीं हैं। और पाकिस्तान भी खुद को मालदीव के बराबर नही गिनेगा। श्रीलंका भी अपने आप को भूटान के बराबर नहीं रखेगा। बहरहाल देखते हैं आगे क्या होता है।

नीचे मैने अनिता जोशुआ की हिन्दू में प्रकाशित रपट को रखा है, जो आज ही छपी है।

From The Hindu 7.11.2010
Don't endorse Indian bid for UNSC seat, says Pakistan

Anita Joshua
ISLAMABAD: Ahead of U. S. President Barack Obama's India visit, Pakistan on Friday warned that any endorsement of the Indian bid for a permanent seat in the United Nations Security Council (UNSC) would have a negative impact on issues relating to peace and security in South Asia.

“Existing anomalies”

This view was articulated by the Foreign Office before the Special Committee of the Parliament on Kashmir. Asked about India's prospects in acquiring a permanent seat in the UNSC and possible U. S. endorsement for such a position, the Foreign Office representatives sought to point out that Pakistan was opposed to expansion in the permanent category and “further perpetuation of existing anomalies.”

Against Charter

Pakistan's contention is that endorsing the candidacy of any one of more States for a permanent seat on the UNSC would be at variance with the spirit of the U.N.Charter and infringes upon the principles of sovereign equality.

“Creating a new class of privileged members, with or without veto, is not an option. The issue of the UNSC's expansion cannot be divorced from the broader questions relating to the restructuring of the global system.”

Consensus

According to the Foreign Office, Pakistan has been consistent on this position. “Such decisions that impact on the global system of inter-State relations based on the Charter require consensus. The spirit and the principles of the Charter should not be compromised, and sovereign equality is a cardinal principle.”

Counter-productive

While the Committee endorsed the government's position that India like any other sovereign State was entitled to develop its own bilateral relations in a manner it deems fit, the Foreign Office — in its briefing on the Obama visit to India — said the U. S. was informed about the need to maintain regional balance in South Asia.

“It is Pakistan's considered view that anything that militates against the regional balance is counter-productive and not in the interest of the region and the world.”

Sunday, October 17, 2010

पाकिस्तान में क्या हो रहा है?

पाकिस्तान के राष्ट्रपति भवन में बैठक
पाकिस्तान में पिछले कुछ दिन से न्यायपालिका और सरकार के बीच तनाव चल रहा है। पिछले हफ्ते गुरुवार की रात सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी ने अचानक सभी जजों की एक बैठक बुलाई। इसमें अंदेशा ज़ाहिर किया गया कि सरकार जजों की बर्खास्तगी वापस लेने के आदेश को खत्म करने जा रही है। ऐसा गलत होगा। दरअसल दिन में टीवी चैनलों पर यह खबर चल रही थी कि सरकार जजों की बहाली का आदेश वापस लेने जा रही है।

चीफ जस्टिस की टिप्पणियाँ अखबारों में छपने के बाद सूचना मंत्री क़मर ज़मां कैड़ा और कानून मंत्री बाबर आवान ने अगले रोज़ स्पष्ट किया कि सरकार की ऐसी मंशा नहीं है। कानून मंत्री ने थोड़ा कड़ाई से कहा कि सरकार को गिराने की कोशिशें की जा रहीं हैं। सामने से सीधी-सादी नज़र आ रहीं चीज़ों के पीछे कुछ गहरी बातें दिखाई पड़ रही हैं। राष्ट्रपति ज़रदारी  को हटाने की मुहिम चलरही है। इसमें अदालत भी सक्रिय है।

चीफ जस्टिस इफ्तिकार चौधरी इन दिनों जनता के छोटे-छोटे मामलों पर सुनवाई करके कभी किसी पुलिस अफसर की तो कभी किसी मंत्री की घिसाई कर रहे हैं। इससे वे लोकप्रिय भी हुए हैं। यह भी सच है कि उनकी बहाली मुस्लिम लीग(नवाज़) की अगुवाई में चले आंदोलन के बाद हुई थी।

पाकिस्तान को लोकतंत्र वैसा ही नहीं है जैसा भारत में है। वहाँ अभी राजनैतिक और संवैधानिक संस्थाएं जन्म ले रहीं हैं। राजनीति वहाँ बदनाम शब्द है, भारत की तरह। सेना की वहाँ राजनैतिक भूमिका है। चीफ जस्टिस की टिप्पणी के बाद राष्ट्रपति भवन में जो बैठक हुई उसमें सेनाध्यक्ष अशफाक परवेज़ कियानी भी शामिल थे। सेना की इस भूमिका पर हमें आश्चर्य हो सकता है, पर पाकिस्तान पहला देश नहीं है, जहाँ राजनीति में सेना की भूमिका है। इंडोनेशिया और बर्मा हमारे पड़ोसी हैं। वहाँ भी सेना की भूमिका है।

आसिफ अली ज़रदारी पर भ्रष्टाचार के अनेक मामले थे। परवेज़ मुशर्रफ ने उन मामलों को एक आदेश जारी कर खत्म कर दिया। इधर सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को खत्म कर दिया। अब ज़रदारी की गर्दन नापने की कोशिश हो रही है। राष्ट्रपति होने के नाते अभी यह सम्भव नहीं है। किसी न किसी वजह से ऐसा माना जा रहा है कि इफ्तिखार चौधरी न्यायिक सक्रियता को या तो सीमा से ज्यादा खींच रहे हैं या राजनीति में शामिल हो रहे हैं।

आज यानी रविवार को प्रधानमंत्री सैयद युसुफ रज़ा गिलानी देश को संबोधित करने जा रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में कई बातें हुईं हैं। एक अंदेशा है कि सेना कहीं सत्ता न संभाल ले। उधर परवेज़ मुशर्रफ ने राजनीति में आने की घोषणा कर दी है। वे अभी विदेश में हैं। इफ्तिखार चौधरी उन्हें अपना दुश्मन मानते हैं। वहाँ की अदालतों में भी भ्रष्टाचार है। कट्टरपंथी लोग लोकप्रिय हैं। जिन्हें हम आतंकवादी कहते हैं, पाकिस्तान में वे सम्मानित राष्ट्रवादी हैं। उन्हें अदालतों से भी मदद मिलती है। हफीज़ सईद के मामले में आप देख चुके हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय प्रसारण के बाद मामला सुलट जाएगा, पर हालात को देते हुए लगता है कि कोई नया मसला उभरेगा। ज़रूरत इस बात की है कि यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा करे और उसके बाद चुनाव हों और नई सरकार बने। लोकतंत्र की सारी प्रक्रियाएं कई बार सम्पन्न होती हैं तभी वह शक्ल लेता है। बहरहाल ताज़ा मामले पर  डॉन का आज का सम्पादकीय पढ़ेः-



















                                                     Crisis at the SC



BEFUDDLING, bemusing, bizarre — however you described it, it may still not do full justice to what transpired between Thursday evening and Friday afternoon. An alleged ‘plot’ by the government to send the Supreme Court packing was breathlessly released into the 24hour TV-news cycle Thursday evening. The report rapidly metastasised and within hours the SC swung into late-night action and announced a full-court hearing for Friday morning. The government has now been ordered to conduct an inquiry into the circumstances surrounding the news reports and to affix responsibility — the court having made clear it believes there is some truth to the allegations.

Three players are involved in this sordid tale of rumour and intrigue, and all need to reflect on their behaviour. First, the media. That there are tensions between the government and the superior judiciary is undeniable, and if a news organisation has a story of public interest regarding the perceived judiciary-executive ‘clash’ then it has a right, even a duty, to broadcast or publish the story. But there are journalistic responsibilities, too, and those include needing to be reasonably sure of the veracity of allegations that are to be made public. And when the allegations have the potential to irreparably rupture relations between two institutions of the state, the journalistic re sponsibilities increase manifold. Were the appropriate and necessary steps taken to ensure the reports aired on Thursday night reflected the factual position? Was the manner of the coverage in keeping with the ethics of a profession that is supposed to strive to report the news, not make the news?

Next, the judiciary. To be sure, given recent history and the personal price many of the judges of the SC have paid to create an independent judiciary, to some extent it is understandable the justices may feel a heightened sense of pressure and threat to their position. However, a judiciary is supposed to add to the dignity and poise of the state, not add to a sense of national political crisis. Setting aside the matter of intention for a moment, it seems fairly obvious the chances of a government-sponsored move to disband the entire SC succeeding are quite remote. So middle-of-thenight meetings and fullcourt emergency benches are perhaps unnecessary, there being less disruptive ways and means available to the court to ensure its independence.

Finally, the government. Would it harm the government to once in a while take the high road? With emotions running high in the SC yesterday, the responsible, stability-enhancing thing to have done was reassure the court. Alas, common sense appears to be in short supply in Islamabad.


Thursday, September 30, 2010

कश्मीर का ताज़ा हाल

पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के जनमत संग्रह का मुद्दा उठाया है। इसपर भारत के विदेशमंत्री ने जवाब दिया है कि अब तक कई बार हो चुके चुनाव ही जनमत संग्रह की निशानी हैं। यह साफ है कि कश्मीर के मौजूदा माहौल को भड़काने में पाकिस्तान का हाथ है। करगिल की लड़ाई भड़काने वाले परवेज़ मुशर्रफ को बाद में समझ में आ गया था कि यह काम खतरनाक है। अब पाकिस्तानी सेना के जनरल कयानी इसे भड़काना चाहते हैं।

पाकिस्तान को यह भी समझ में आ रहा है कि उसे अमेरिका से वैसा सहयोग नहीं मिलेगा जैसा मिलता रहा है। इसलिए चीन का नया कार्ड खेला है। चीन को भी पाकिस्तान की उसी तरह ज़रूरत है जैसे अमेरिका को है। भारत को इन दोनों का सामना अपने राजनैतिक संकल्प से करना होगा। उसके पहले कश्मीर में हालात को सामान्य करना भी ज़रूरी है।


हिन्दुस्तान में प्रकाशित मेरा लेख पढ़ने के लिए कतरन को क्लिक करें

Thursday, September 23, 2010

कश्मीर पर नई पहल

संसदीय टीम कश्मीर से वापस आ गई है। भाजपा और दूसरी पार्टियों के बीच अलगाववादियों से मुलाकात को लेकर असहमति के स्वर सुनाई पड़े हैं। मोटे तौर पर इस टीम ने अपने दोनों काम बखूबी किए हैं। कश्मीरियों से संवाद और उनके विचार को दर्ज करने का काम ही यह टीम कर सकती थी।

इंडियन एक्सप्रेस ने एक नई जानकारी दी है कि समाजवादी पार्टी के मोहन सिंह ने सबसे पहले अलगाववादियों से मुलाकात का विरोध किया था. मोहन सिंह का कहना था कि हम राष्ट्र समर्थक तत्वों का मनोबल बढ़ाने आए हैं। हमारे इस काम से अलगाववादियों का मनोबल बढ़ता है।

एक रोचक जानकारी यह है कि संसदीय टीम की मुलाकात हाशिम कुरैशी से भी हुई। हाशिम कुरैशी 30 जनवरी 1971 को इंडियन एयरलाइंस के प्लेन को हाईजैक करके लाहौर ले गया था। वहाँ उसे 14 साल की कैद हुई। सन 2000 में वह कश्मीर वापस आ गया। आज उसके विचार चौंकाने वाले हैं। हालांकि वह कश्मीर में भारतीय हस्तक्षेप के खिलाफ है, पर उसकी राय में भारत और पाकिस्तान में से किसी को चुनना होगा तो मैं भारत के साथ जाऊँगा। उसका कहना है मैने पाक-गिरफ्त वाले कश्मीर में लोगों की बदहाली देख ली है।

मेरा लेख पढ़ने के लिए कतरन पर क्लिक करें

Friday, September 17, 2010

कश्मीर का क्या करें?

मेरे कई दोस्त व्यग्र हैं। वे समझना चाहते हैं कि कश्मीर का क्या हो रहा है। उसका अब क्या करें। हिन्दुस्तान में प्रकाशित अपने लेख पर मैने अपने फेस बुक मित्रों से राय माँगी तो ज्यादातर ने पोस्ट को पसंद किया, पर राय नहीं दी। विजय राणा जो लंदन में रहते हैं, पर भारतीय मामलों पर लगातार सोचते रहते हैं। उन्होंने जो राय दी वह मैं नीचे दे रहा हूँ।

Its' the problem of Islamic fundamentalism - something that we have been self-deludingly reluctant to acknowledge. Two nations theory did not end with the creation of Pakistan. How can a Muslim majority state live with Hindu India. That's how Huriyat thinks. The whole basis of Kashmiriat is Islam, it has no place for Kashmiri Pundits. There have been attempts for years to target Sikhs and now Christians in the Valley. Right from day one Huriyat leaders had a soft corner for Pakistan. Short of Azadi the Huriyat leadership will be quite happy to join Pakistan. Sadly this truth does not fit into our secularist aganda. Thats' why we have closed our eyes to it. Now economic integratioin is the key. Evey Indian state should give at least 1000 jobs to Kashmiri youth. You don't need law for this. Ask private sector to help. Just do special recuritment drive today and give them at least 30,000 jobs per year. Things will change.

विजय जी का यह विचार इस बात को बताता है कि कश्मीर का भारत में विलय हुआ है तो उसे भारत से जोड़ना भी चाहिए। कैसे जोड़ें? उनकी सलाह व्यावहारिक लगती है। तिब्बत में चीन ने पिछले साठ साल में सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव कर दिया है। तिब्बतियों और चीनियों के आपसी विवाह से नई पीढ़ी एकदम अलग ढंग से सोचती है। कश्मीर के नौजवानों को हमने पाक-परस्त लोगों के सामने खुला छोड़ दिया है। उन्हें ठीक से धर्म-निरपेक्ष शिक्षा नहीं मिली। पंडितों को निकालकर बाकायदा एकरंगा समाज बना लिया। नौजवानों के मन में ज़हर भर दिया। अब आज़ादी की बात हो रही है।

मेरे मित्र शरद पांडेय ने मेल भेजी है, ......AGAR AZADI HI.., TO ITANE SAALO MAI JITANA UNHE DIYA GAYA WOH KISI OR STATE KO NAHI,ABHI DO ROJ PAHLE HI, KI UNHE EK BARA PACKAGE AUR..,TO IN SAB BAATO KA KYA MATALB, KYA ISSE..मेरे एक पाठक मनीष चौहान ने मुझे मेल भेजी, ...क्या आप चाहते हैं कि कश्मीर से की तैनाती हटा ली जाये? क्या आप कश्मीर को उसके हाल पर छोड़ देना चाहते हैं? माफ़ कीजिये, कोई भी पार्टी या संगठन कुछ भी मांग करे, सामरिक दृष्टि से वहां स्वायत्तता देना एक नई मुसीबत को आमंत्रण देना होगा ऐसा मेरा मानना है... अच्छा होता, हर बार की तरह आप एक क्लियर स्टैंड रखते...

इस आशय की मेल और भी आई हैं। हमारा क्लियर स्टैंड क्या हो?  अब चूंकि पानी सिर के ऊपर जा रहा है इसलिए एक साफ दृष्टिकोण ज़रूरी है। बेहतर हो कि पूरा देश तय करे कि क्या किया जाय़। 

Thursday, September 16, 2010

कश्मीर पर पहल

कश्मीर पर केन्द्र सरकार की पहल हालांकि कोई नया संदेश नहीं देती, पर पहल है इसलिए उसका स्वागत करना चाहिए। कल रात 'टाइम्स नाव' पर अर्णब गोस्वामी ने सैयद अली शाह गिलानी को भी बिठा रखा था। उनका रुख सबको मालूम है, फिर भी उन्हें बुलाकर अर्णब ने क्या साबित किया? शायद उन्हें तैश भरी बहसें अच्छी लगती हैं। बात तब होती है, जब एक बोले तो दूसरा सुने। गिलानी साहब अपनी बात कहने के अलावा दूसरे की बात सुनना नहीं चाहते तो उनसे बात क्यों करें?

अब विचार करें कि हम कश्मीर के बारे में क्या कर सकते हैं?

1. सभी पक्षों से बात करने का आह्वान करें। कोई न आए तो बैठे रहें।
2. सर्वदलीय टीम को भेजने के बाद उम्मीद करें कि टीम कोई रपट दे। रपट कहे कि कश्मीरी जनता से बात करो। फिर जनता से कहें कि आओ बात करें। वह न आए तो बैठे रहें।
3. उमर अब्दुल्ला की सरकार की जगह पीडीपी की सरकार लाने की कोशिश करें। नई सरकार बन जाए तो इंतजार करें कि आंदोलन रुका या नहीं। न रुके तो बैठे रहें।
4.उम्मीद करें कि हमारे बैठे रहने से आंदोलनकारी खुद थक कर बैठ जाएं।

इस तरह के दो-चार सिनारियो और हो सकते हैं, पर लगता है अब कोई बड़ी बात होगी। 1947 के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जे की सबसे बड़ी कोशिश 1965 में की थी। उसके बाद 1989 में आतंकवादियों को भेजा। फिर 1998 में करगिल हुआ। अब पत्थरमार है। फर्क यह है कि पहले कश्मीरी जनता का काफी बड़ा हिस्सा पाकिस्तानी कार्रवाई से असहमत होता था। अब काफी बड़ा तबका पाकिस्तान-परस्त है। गिलानी इस आंदोलन के आगे हैं तो उनके पीछे कोई समर्थन भी है। हम उन्हें निरर्थक मानते हैं तो उन्हें किनारे करें, फिर देखें कि कौन हमारे साथ है। उसके बाद पाकिस्तान के सामने स्पष्ट करें कि हम इस समस्या का पूरा समाधान चाहते हैं। यह समाधान लड़ाई से होना है तो उसके लिए तैयार हो जाएं। जिस तरीके से अंतरराष्ट्रीय समुदाय बैठा देख रहा है उससे नहीं लगता कि पाकिस्तान पर किसी का दबाव काम करता है।

एलओसी पर समाधान होना है तो देश में सर्वानुमति बनाएं। उस समाधान पर पक्की मुहर लगाएं। गिलानी साहब को पाकिस्तान पसंद है तो वे वहाँ जाकर रहें, हमारे कश्मीर से जाएं। अब आए दिन श्रीनगर के लालचौक के घंटाघर पर हरा झंडा लगने लगा है। यह शुभ लक्षण नहीं है।

इसके अलावा कोई समाधान किसी को समझ में आता है उसके सुझाव दें।

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Thursday, September 9, 2010

चीन से दोस्ती

भारत और चीन के रिश्ते हजारों साल पुराने हैं, पर उतने अच्छे नहीं हैं, जितने हो सकते थे। आजादी के बाद भारत का लोकतांत्रिक अनुभव अच्छा नहीं रहा। व्यवस्था पर स्वार्थी लोग हावी हो गए। इससे पूरे सिस्टम की कमज़ोर छवि बनी। पर यह होना ही था। जब तक हमारे सारे अंतर्विरोध सामने नहीं आएंगे तब तक उनका उपचार कैसे होगा। 


चीन के बरक्स तिब्बत के मसले पर हमने शुरू से गलत नीति अपनाई। तिब्बत किसी लिहाज से चीन देश नहीं है।  चीन आज कश्मीर को विवादित क्षेत्र मानता है, क्योंकि पाकिस्तानी तर्क उसे विवादित मानता है। पर तिब्बत के मामले में सिर्फ तकनीकी आधार पर उसने कब्जा कर लिया और सारी दुनिया देखती रह गई। तिब्बत के पास अपनी सेना होती तो क्या वह आज चीन के अधीन होता। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ज्यादा से ज्यादा उसे विवादित क्षेत्र मानता जैसा पाकिस्तानी हमलावरों के कारण कश्मीर बना दिया गया है। 


भारत को चीन से दोस्ती रखनी चाहिए। यह हमारे और चीन दोनों के हित में है, पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सामरिक कारणों से हमारा प्रतिस्पर्धी है। वह पाकिस्तान का सबसे अच्छा दोस्त है। और हमेशा रहेगा। तमाम देश खुफिया काम करते हैं। चीन के सारे काम खुफिया होते हैं। उसने और उत्तरी कोरिया ने पाकिस्तान के एटमी और मिसाइल प्रोग्राम में मदद की है। यह भारत-विरोधी काम है। भारत जैसे विशाल देश के समाज में अंतर्विरोध भी चीनी विशेषज्ञों ने खोज लिए हैं। यह भी पाकिस्तानी समझ है। चीन की भारत-नीति में पाकिस्तानी तत्व हमेशा मिलेगा। 

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Sunday, August 29, 2010

मुकाबला है भारत और चीन का

अचानक भारत और चीन को लेकर भारतीय मीडिया में सरगर्मी दिखाई पड़ रही है। शनिवार को इंडियन एक्सप्रेस ने अमेरिका के संटर फॉर इंरनेशनल पॉलिसी के डायरेक्टर सैलिग एस हैरिसन का न्यूयॉर्क टाइम्स में प्राशित लेख छापा। इसमें बताया गया है कि पाकिस्तान अपने अधीन कश्मीर में चीनी सेना के लिए जगह बना रहा है। चीन के सात हजार से ग्यारह हजार फौजी वहाँ तैनात हैं। इस इलाके में सड़कें और सुरंगें बन रहीं हैं, जहाँ पाकिस्तानियों का प्रवेश भी प्रतिबंधित है। यह बात आज देश के दूसरे अखबारों में प्रमुखता से छपी है।

चीन इस इलाके पर अपनी पकड़ चाहता है। समुद्री रास्ते से पाकिस्तान के ग्वादार नौसैनिक बेस तक चीनी पोत आने में 16 से 25 दिन लगते हैं। कश्मीर के गिलगित इलाके से सड़क बन जाएगी तो यह रास्ता सिर्फ 48 घंटे का रह जाएगा। हैरिसन के अनुसार चीन 22 सुरंगें बना रहा है। इसके अलावा रेल लाइन भी बिछाई जा रही है। चीनी सेना के लिए स्थायी आवास बनाए गए हैं।

यह लेख अमेरिका के नीति निर्धारकों का ध्यान इस ओर खीचने के लिए है कि चीन ने न सिर्फ कश्मीर में बल्कि इस पूरे इलाके में अपनी पहुँच बना ली है। यह भी कि पाकिस्तान अमेरिका को नहीं चीन को अपना दोस्त मानता है। पश्चिमी मीडिया भारत अधिकृत कश्मीर में जन-आंदोलनों को दबाले की खबरें तो छापता है, पर कश्मीर के गिलगित और बल्तिस्तान क्षेत्र में जन-आंदोलनों को कुचलने की खबरें नहीं आतीं।

हाल में भारत के लेफ्टिनेंट जनरल बीएस जसवाल को चीनी वीज़ा न मिलने पर विवाद चल ही रहा ता कि यह खबर आ गई। आज इंडियन एक्सप्रेस ने चीन के पीपुल्स डेली की वैबसाइट के पीपुल्स फोरम के कुछ डिस्कशन का हवाला देकर खबर छापी है। इनमें भारत पर चीन के सम्भावित हमले को लेकर एक वोटिंग भी है। इनका परिणाम क्या होगा, यह अभी कहना मुश्किल है, पर कुछ बात है ज़रूर।

हाल में भारतीय मीडिया में इकॉनॉमिस्ट के एक लेख की चर्चा थी जिसमे भारत को कछुआ और चीन को खरगोश का रूपक दिया गया था।इकोनॉमिस्ट ने इनके बीच की जोर-आज़माइश को  कॉण्टेस्ट ऑफ द सेंचुरी घोषित किया है।  इसपर टेलिग्राफ में पीटर फोस्टर का लेख छपा है। इसे पीपुल्स डेली के फोरम ने उद्धृत करके बहस चलाई है। पीटर फोस्टर ने लिखा है कि चीन के मीडिया में भारत को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता, जबकि भारत में चीन को बहुत ज्यादा महत्व दिया जाता है। पीटर फोस्टर इन दिनों पेइचिंग में तैनात हैं। इसके पहले वे दिल्ली में रह चुके हैं। वे दोनों देशों के माहौल को बेहतर जानते हैं। बहरहाल दोनों देशों की सभ्यताएं हजारों साल पुरानी हैं। इसमें दोस्ती भी है और प्रतिद्वंदिता भी।

Wednesday, August 25, 2010

भारत-जापान रिश्ते

भारत और जापान के बीच एटमी सहयोग की बातचीत लम्बे अर्से से चली आ रही है, पर हाल के दिनों में इसमें तेजी आई है। इसके पीछे जापान की अपनी आर्थिक दुश्वारियाँ ज्यादा हैं। बहरहाल तमाम अंदेशों के बावज़ूद ऐसा लगता है कि इस साल के अंत में जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जापान जाएंगे तब भारत-जापान न्यूक्लियर संधि हो जाएगी। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों के बनने और बिगड़ने की गति आसानी से नज़र नहीं आता।

भारत-जापान रिश्तों के भविष्य में और प्रगाढ़ होने की अच्छी खासी सम्भावनाएं हैं। इसके पीछे भौगोलिक यथार्थ, सामरिक और आर्थिक ज़रूरतें हैं। यों तो आज कोई किसी या शत्रु या मित्र नहीं है, पर कुछ मित्र अपेक्षाकृत ज्यादा सहज होते हैं। जापान हमारा अपेक्षाकृत सहज मित्र है।


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विश्लेषण आईडीएसए की टिप्पणी

Thursday, August 19, 2010

कश्मीर के बारे में हम कितना सोचते हैं

हमारा जितना अनुभव आज़ादी का है लगभग उतना लम्बा अनुभव कश्मीर को लेकर तल्खी का है। यह समस्या आज़ादी के पहले ही जन्म लेने लगी थी। चूंकि हमारा विभाजन धार्मिक आधार पर हो रहा था, इसलिए कश्मीर सबसे बड़ी कसौटी था। साबित यह होना था कि क्या कोई मुस्लिम बहुल इलाका धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र का हिस्सा हो सकता है। या  मुस्लिम जन-संख्या किसी न किसी रोज़ अपने लिए मुस्लिम राज्य को स्वीकार कर लेगी।

इस पोस्ट में मैं उस पृष्ठभूमि को नहीं दे पाऊँगा, जो कश्मीर समस्या से जुड़ी है। पर मेरे विचार से भारत और पाकिस्तान के बीच किसी रोज यह समस्या दोनों की रज़ामंदी से सुलझ गई तो इस उप महाद्वीप के अंतर्विरोध अच्छी तरह खुलेंगे। एक विचार यह है कि इस समस्या के समाधान के बाद पाकिस्तान का कट्टरपंथी समुदाय दूसरी समस्या उठाएगा। यदि वह समस्या नहीं उठाएगा तो उसका वज़ूद खतरे में होगा। क्योंकि पाकिस्तान के भीतर काफी बड़े इलाके के लोगों को लगता है कि पाकिस्तान बना ही क्यों।

हमारे लिए कश्मीर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हमें भी साबित करना है कि हमारी धर्म निरपेक्ष व्यवस्था में एक मुस्लिम बहुल प्रदेश भी सदस्य है। समूचा कश्मीर उसमें होता तो बात ही क्या थी। बहरहाल आज श्रीनगर घाटी में तीन चौथाई से ज्यादा लोग भारत को अपना नहीं मानते। इसमें किसका दोष है, इसका विश्लेषण मैं नहीं कर रहा। हाँ इतनी मेरी समझ है कि 1950 में जनमत संग्रह होता तो कश्मीरी लोग भारत में रहना पसंद करते। कम से कम घाटी के लोगों में नाराज़गी नहीं थी। थी भी तो पाकिस्तानी रज़ाकारों से थी, जिन्होंने कश्मीरियों को सताया था।

आज हालात फर्क हैं। पर जिनके मंसूबे कश्मीर को भारत से अलग करने के हैं उन्हें समझ लेना चाहिए कि वे कश्मीर को भारत से अलग नहीं करा पाएंगे। यह पूरे देश की अस्मिता का सवाल है। समूचा देश किसी भी हद तक जाकर लड़ने को तैयार हो जाएगा। समाधान देश के लोगों की मर्जी से होगा। बेहतर हो हम सब सोचें कि हम कैसा समाधान चाहेंगे।

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