Tuesday, April 21, 2026

स्त्रियों के साथ राजनीतिक-छल ज्यादा चलेगा नहीं


भारत में महिला आरक्षण को लेकर एक साथ कई सवाल हैं। संसद में संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो पाया, या उसे पास कराने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी? ऐसा लगता है कि बीजेपी का इरादा इस मसले को उठाना और विरोधियों को उत्तेजित करना था, ताकि वे शोर मचाएँ। सरकार जानती थी कि उसके साथ दो तिहाई सदस्य नहीं हैं और आज के राजनीतिक हालात में उसे कत्तई आशा नहीं करनी चाहिए थी कि विरोधी राजनीति का कोई धड़ा उसके समर्थन में आता। तब फिर क्यों बिल पेश किया?

भारतीय राजनीति विश्वसनीय नहीं है। इसमें जो कहा जाता है, ज़रूरी नहीं कि वैसा ही हो। फौरी तौर पर यह राजनीतिक तीर था, जो नारी-शक्ति का लाभ उठाने के लिए चलाया गया था। संसद में जब बातें होती हैं, तब उन्हें गाँव-गाँव में सुना जाता है। विरोध में जितना शोर होगा, फायदा उतना ज्यादा होगा। उद्देश्य माहौल बनाने, नैरेटिव रचने या इसे जो भी कहें, उतना ही था। विरोधियों की दिलचस्पी भी कम से कम महिला आरक्षण में नहीं थी। परिसीमन को लेकर भी उनके तर्क विचित्र थे। इससे ज्यादा उनका इरादा भी कुछ नहीं था। बहरहाल इसका विपरीत-प्रभाव भी होगा, जो समूची राजनीति को अपनी चपेट में लेगा।

क्या महिलाओं को समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें छला जा रहा है? यह दीगर सवाल है कि इस विधेयक के परास्त होने का लाभ बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव में मिलेगा या नहीं। असल बात यह है कि देश की राजनीति ने पिछले तीन दशक से नारी-शक्ति को छला है। उसे बहुत ज्यादा छला नहीं जा सकेगा। स्त्रियों की राजनीतिक अभिलाषाएँ आज उस सुप्तावस्था में नहीं हैं, जो नब्बे के दशक में थीं। साफ है कि यह विधेयक राजनीतिक-गतिविधि मात्र थी। जिस तरह से बिल के गिरते ही पोस्टर छपकर आ गए, और राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन की योजना बन गई, वह बताता है कि बीजेपी इसकी तैयारी के साथ आई थी।

सबसे पहले एचडी देवेगौड़ा सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक, 1996 के रूप में 12 सितंबर 1996 को महिला आरक्षण विधेयक, पेश किया था। विधेयक पेश तो हुआ, लेकिन राजनीतिक आम सहमति न बनने और गठबंधन सरकार के भीतर विरोध के कारण इसे संयुक्त संसदीय समिति को भेजना पड़ा और 11वीं लोकसभा भंग होने के साथ ही लैप्स हो गया। देश की राजनीति चाहती, तो देवेगौड़ा का बिल ही पास हो जाता।

सरकार ने इसबार जो विधेयक पेश किया था, वह संसदीय सीटों के परिसीमन पर केंद्रित था। उसके विरोधियों का कहना है कि परिसीमन देश को तोड़ देगा। वे कहते हैं कि 2023 के बिल को लागू करो। 2023 के महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, इसे परिसीमन के बगैर लागू नहीं किया जा सकता। यह कानून विशेष रूप से जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होने की शर्त से बँधा हुआ है। परिसीमन रुकेगा तो आरक्षण भी रुकेगा।

Monday, April 20, 2026

इस्लामाबाद-वार्ता के एक और दौर का मतलब, रास्ता अभी खुला है

स्वचालित राइफल के साथ हमास का एक सैनिक

 इस्लामाबाद में मंगलवार से अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की बातचीत होने जा रही है। इस वार्ता का मतलब यह भी है कि दोनों पक्ष कुछ मसलों पर रियायतें देने को तैयार हैं। अभी यह निष्कर्ष निकाल लेना जल्दबाज़ी होगी कि कौन सा पक्ष पीछे हट रहा है, पर इतना साफ है कि लड़ाई रुकने के बावज़ूद अमेरिका लगातार अपना दबाव बढ़ा रहा है। यह दबाव मूलतः नाभिकीय सामग्री को लेकर है, पर अब होर्मुज़ पर नियंत्रण भी इस दबाव में शामिल हो गया है।

हाल के दिनों में, ट्रंप ने कहा था कि आमने-सामने की बातचीत का एक और दौर होगा और उन्होंने ईरान के साथ शांति समझौते के होने की गारंटी दी थी। लेकिन किसी भी समझौते की शर्तें अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान उनकी सभी माँगों पर सहमत हो गया है, जबकि ईरानी अधिकारी इस बात से पूरी तरह इनकार करते हैं। लेकिन इस सप्ताह आमने-सामने की बातचीत फिर से शुरू करने का निर्णय यह दर्शाता है कि दोनों पक्ष कम से कम समझौते की दिशा में कुछ प्रगति कर रहे हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि रविवार को अमेरिकी नौसेना के एक विध्वंसक पोत ने ईरान के बंदरगाहों की अमेरिकी नाकाबंदी का उल्लंघन करने वाले एक ईरानी मालवाहक जहाज पर हमला कर उसे जब्त कर लिया, जिससे इस सप्ताह समाप्त होने वाले नाजुक युद्धविराम के लिए एक नया खतरा पैदा हो गया है। ट्रंप ने हमले की घोषणा वाइट हाउस के एक अधिकारी द्वारा यह कहे जाने के कुछ घंटों बाद की कि अमेरिका उपराष्ट्रपति जेडी वैंस सहित एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल को पाकिस्तान में शांति वार्ता के लिए भेज रहा है, जबकि ईरानी सरकारी मीडिया ने कहा कि तेहरान अभी तक बैठक के लिए सहमत नहीं हुआ है।

पिछले सप्ताह अमेरिकी सेना ने ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों पर अपनी नाकाबंदी को व्यापक विश्व के जलक्षेत्रों तक बढ़ा दिया, और घोषणा की कि वह खुले समुद्र में किसी भी स्थान या ध्वज की परवाह किए बिना ईरान की सहायता करने वाले किसी भी जहाज की घेराबंदी करेगी।

ईरानी अंतर्विरोध

ब्रिटिश साप्ताहिक इकोनॉमिस्ट ने इस बीच ईरानी नेतृत्व के बीच उभरते अंतर्विरोधों की जानकारी दी है। पता नहीं ये अंतर्विरोध वास्तव में हैं या प्लांट किए गए हैं। बहरहाल पत्रिका की वैबसाइट पर प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि बीते कुछ दिनों में नेतृत्व की जानी-पहचानी उथल-पुथल देखने को मिली है। 17 अप्रैल को ट्रंप ने घोषणा की कि होर्मुज जलडमरूमध्य यातायात के लिए खोल दिया गया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने इसकी पुष्टि की। उसी दिन ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर ( आईआरजीसी ) से जुड़े मीडिया संस्थानों ने अराग़ची की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने जलडमरूमध्य खोलने की शर्तों का उल्लेख नहीं किया।

Saturday, April 18, 2026

कौन रोक रहा है महिला आरक्षण

अंततः संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो पाया। सरकार भी जानती थी कि उसके साथ दो तिहाई सदस्य नहीं हैं। इसके लिए उसे सभी दलों से बातचीत पहले करनी चाहिए थी। यह फौरी तौर पर राजनीतिक तीर लगता है, जिसके निशाने पर कौन और क्या है, यह अब दिखाई पड़ेगा, पर जिस तरह से बिल के गिरते ही पोस्टर छपकर आ गए, उससे इतना समझ में आता है कि बीजेपी इसका राजनीतिक लाभ उठाने की तैयारी कर चुकी है। तीन दशक के शोर-शराबे के बावज़ूद इस अधिकार के लागू न हो पाने का मतलब क्या निकाला जाए? मुझे लगता है कि हमारी राजनीति नहीं चाहती कि यह जल्द से जल्द लागू हो। इसे वह ज्यादा से ज्यादा देर तक टालना चाहती है।

सच यह है कि देश की राजनीति चाहती, तो देवेगौड़ा का बिल ही पास हो जाता।  फिलहाल उसे रोकने वालों का कहना है कि परिसीमन देश को तोड़ देगा। वे कहते हैं कि 2023 के बिल को लागू कर दो। 2023 के बिल को लागू करने के लिए भी जनगणना और परिसीमन का इंतज़ार करना होगा। 2023 के महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, इसे परिसीमन के बगैर लागू नहीं किया जा सकता। यह कानून विशेष रूप से जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होने की शर्त से बंधा हुआ है। परिसीमन रुकेगा तो आरक्षण भी रुकेगा। 

बहरहाल सरकार ने उस बिल की अधिसूचना जारी कर दी है। यानी अब उसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू होगी।  सरकार ने गुरुवार शाम को एक अधिसूचना जारी की जिसमें कहा गया कि महिलाओं को 33% आरक्षण प्रदान करने वाला 2023 का अधिनियम 16 ​​अप्रैल को "लागू" हो जाएगा। इस बात पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया कि संशोधित 2026 विधेयक पर लोकसभा में चल रही बहस के बीच 2023 के कानून के प्रावधानों को लागू करने की अधिसूचना क्यों जारी की गई। विपक्ष ने इसे 2023 के कानून को बचाने का एक "हताश प्रयास" बताया। ऐसा इसलिए, क्योंकि संशोधित 2026 विधेयक के सदन से पारित होने को लेकर संशय हैं। पूर्व अधिसूचना में कहा गया था, "यह उस तिथि से लागू होगा जो केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निर्धारित करे।"

जब 2023 का वह बिल पास हो रहा था, तब उसे लेकर जबर्दस्त सर्वानुमति थी। तब भी सवाल था कि इसे फौरन लागू करने से रोका किसने है? कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में कहा, जब सरकार नोटबंदी जैसा फैसला तुरत लागू करा सकती है, तब इतने महत्वपूर्ण विधेयक की याद साढ़े नौ साल बाद क्यों आई? बात तो बहुत मार्के की कही थी। पर जब दस साल तक कांग्रेस की सरकार थी, तब उन्हें किसने रोका था? देश की राजनीति ने रोका था,  उनके अपने सहयोगी दल ही इसके लिए तैयार नहीं थे। 

Tuesday, April 14, 2026

‘युद्धविराम’ जो है ही नहीं!


पश्चिम एशिया की लड़ाई में युद्धविराम के बाद इस्लामाबाद में हुई पहली बातचीत के सफल नहीं होने का मतलब यह भी नहीं है कि वह विफल हो गई. ऐसे मसले एक दिन की वार्ता से हल होते भी नहीं हैं.

अब सवाल पूछा जा सकता है कि तब क्या दो हफ्ते बाद लड़ाई फिर से उसी बिंदु से शुरू हो जाएगी, जहाँ पर वह रुकी थी? कोई नहीं कह सकता कि अब क्या होगा. सबसे बड़ी बात है कि लड़ाई रुकी नहीं है, बल्कि उसका तरीका बदला है.

लेबनान में तो लड़ाई चल ही रही है. और ट्रंप की घोषणा के बरक्स अमेरिकी सेंटकॉम ने होर्मुज की नाकाबंदी शुरू कर दी है, जिसके बाद दोनों देशों की सेनाएँ आमने-सामने हैं. यह बात बड़े खतरनाक परिदृश्य को जन्म दे रही है.  

दूसरी तरफ बातचीत भी रुकी नहीं है, किसी न किसी स्तर पर चल ही रही है. ऐसे मसलों के फैसले सोशल मीडिया की पोस्टों और मीडिया के विश्लेषणों से तय नहीं होते हैं, बल्कि बैकरूम वार्ताओं से ही तय होते हैं.

इन बातों के मद्देनज़र तीन-चार प्रत्यक्ष मुद्दे सामने आ चुके हैं, परोक्ष मुद्दे अक्सर कभी सामने नहीं आते. 

हरमूज़ की नाकाबंदी

इस्लामाबाद वार्ता खत्म होने के बाद अमेरिकी सेना ने रविवार को कहा कि वह ‘ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश करने या वहाँ से निकलने वाले’ किसी भी जहाज की नाकाबंदी करेगी. उसके पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग हरमूज़ (या होर्मुज) को पूरी तरह से अवरुद्ध करने की घोषणा की थी.

अब यह नाकाबंदी शुरू हो चुकी है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया पर जारी एक बयान में कहा था कि ईरानी बंदरगाहों पर नाकाबंदी सोमवार को पूर्वी समयानुसार सुबह 10 बजे (यानी भारतीय समयानुसार रात 8.30 बजे) से शुरू होगी. 

इसमें यह भी कहा गया है कि अमेरिकी सेनाएं होर्मुज जलडमरूमध्य से गैर-ईरानी बंदरगाहों तक आने-जाने वाले जहाजों के लिए नौवहन की स्वतंत्रता में बाधा नहीं डालेंगी. एक तरह से यह लड़ाई जारी रहने की घोषणा ही है.

Sunday, April 12, 2026

बात हुई, पर बनी नहीं

जेडी वेंस की इस्लामाबाद से वापसी

पश्चिम एशिया की लड़ाई, जितने नाटकीय तरीके से शुरू हुई, उतने ही नाटकीय तरीके से उसका युद्धविराम हुआ। चारों तरफ नाटकों की भरमार नज़र आ रही है। नाटकीय तरीके से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने किसी बाहरी स्रोत से प्राप्त
ड्राफ्ट को अपना कहकर एक्स पर जारी किया। उस सूचना की पर्याप्त फज़ीहत होती, उसके पहले ही शनिवार की शाम इस्लामाबाद वार्ताका नाटकीय पटाक्षेप हो गया। अब इस नाटक के दूसरे अंक की प्रतीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि समस्या जस की तस है। देखना यह भी होगा कि पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता जारी रहेगी या इस शतरंज की बिसात पर कोई नया मोहरा रखा जाएगा।

Wednesday, April 8, 2026

अब अंतरिक्ष में वर्चस्व की चीन-अमेरिका दौड़


अमेरिका ने 2 अप्रैल को चंद्रमा की परिक्रमा करने के लिए आर्टेमिस 2 यान भेजा है, जिसमें चार यात्री सवार है. 54 वर्षों में यह पहली मानवयुक्त चंद्र उड़ान है, जो चंद्रमा के चक्कर लगाकर 10 अप्रैल को पृथ्वी पर लौटेगी.

यह यान एक बार फिर से मनुष्य को चंद्रमा पर उतारने की तैयारी में गया है. उधर चीनी अंतरिक्ष एजेंसी (सीएनएसए) को उम्मीद है कि वह 2030 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतार देगी. चीन पहले ही कई रोबोट चंद्रमा पर भेज चुका है और चंद्र नमूने वापस ला चुका है. 

ये दो समांतर यात्राएँ केवल चंद्रमा तक पहुँचने के लिहाज से महत्त्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि भविष्य के अंतरिक्ष-अनुसंधान में वर्चस्व की कहानी लिखने वाली हैं. पाँच दशक पहले के चंद्र मिशन अमेरिका और सोवियत संघ के बीच श्रेष्ठता की होड़ का हिस्सा थे. यह स्पर्धा अब चीन और अमेरिका के बीच है.

आर्टेमिस 2 का लॉन्च ऐसे वक्त में हुआ है, जब ईरान की लड़ाई चल रही है. पर्यवेक्षक मानते हैं कि इस रेस का आग़ाज़ करके अमेरिका अपने वर्चस्व की याद दिलाना चाहता है. वहीं कुछ मानते हैं कि चीन साबित करना चाहता है कि यह अमेरिकी पराभव का प्रारंभ है.

चंद्रमा का महत्त्व

आर्टेमिस मिशन में भारत सहित 50 से अधिक देश शामिल हैं. इसकी टीम अगले दो वर्षों में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की खोज करने के लिए प्रारंभिक कार्य करने का इरादा रखती है. इस इलाके में पानी है और बर्फ के भंडार भी. इससे ऑक्सीजन और हाइड्रोजन का उत्पादन करके रॉकेटों के लिए ईंधन तैयार किया जा सकता है.

आर्टेमिस मिशन के यात्री 2028 में चंद्रमा पर उतरने से पहले जीवन-सहायता प्रणालियों और नेवीगेशन क्षमताओं का परीक्षण करेंगे. इस काम में वे चीन के लक्ष्य से दो साल आगे हैं. चीन का लक्ष्य 2030 में चंद्रमा पर अपने यात्रियों को उतारने का है.

Monday, April 6, 2026

पाँच राज्यों के चुनाव: एनडीए और ‘इंडिया’ दोनों की परीक्षा

यों तो हरेक चुनाव महत्त्वपूर्ण होता है, पर पाँच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की भावी राजनीति के लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण साबित होने वाले हैं। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में कांग्रेस की प्रासंगिकता की एक और परीक्षा होंगी, वहीं बंगाल में बीजेपी की संगठन-क्षमता की परीक्षा होगी। क्या वह तृणमूल कांग्रेस के चक्रव्यूह को इस बार भेद पाएगी? पार्टी के सामने तमिलनाडु और केरल के प्रवेशद्वार को पार करने की परीक्षा भी है। 

2024 के लोकसभा चुनावों में विरोधी इंडिया गठबंधन के मन में एक आस जागी थी। उस आस की भी परीक्षा इन चुनावों में होगी। 2024 के बाद छह में से चार राज्यों में बीजेपी के हाथों शिकस्त खाने के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाले विरोधी दलों के पास नई रणनीति बनाने और नए राजनीतिक मुहावरे गढ़ने का मौका है। कांग्रेस के लिए अब करो या मरो की स्थिति है।

संसद में विपक्षी गठबंधन की तीसरी और चौथी सबसे बड़ी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके को अपनी ताकत को साबित करने का मौका भी अब मिलेगा। वहीं ठंडे पड़ते वाममोर्चे को केरल में कुछ अभूतपूर्व कर दिखाने और बंगाल में कम से कम  हाज़िरी लगाने का एक मौका और मिलेगा। बंगाल और केरल में विरोधी गठबंधन के अंतर्विरोध भी दिखाई पड़ेंगे। बंगाल में जहाँ टीएमसी, कांग्रेस और वामपंथी दल अकेले चुनाव लड़ रहे हैं, और केरल में, जहाँ कांग्रेस और वामपंथी दल आमने-सामने हैं।

कांग्रेस

2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 2014 के बाद के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के रूप में 99 सीटें मिली थीं। इससे उम्मीद जागी थी कि कांग्रेस का पुनरुत्थान हो सकता है। उसके बाद से पार्टी एक भी राज्य का चुनाव नहीं जीत पाई है। हरियाणा और दिल्ली में उसे भाजपा के हाथों हार का सामना करना पड़ा और महाराष्ट्र और बिहार में भाजपा नीत गठबंधन के हाथों।

Friday, April 3, 2026

अंतरिक्ष में चीन और अमेरिका की रेस


अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासाने 2 अप्रैल को ऐतिहासिक आर्टेमिस 2 मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से सुबह 3:54 बजे (भारतीय समयानुसार) एसएलएस रॉकेट के जरिए चार अंतरिक्ष यात्री 10 दिनों की चंद्रमा यात्रा पर निकले हैं। 54 वर्षों में यह पहली मानवयुक्त चंद्र उड़ान है, जो चंद्रमा चक्कर लगाकर 10 अप्रैल को पृथ्वी पर लौटेगी। उधर चीनी अंतरिक्ष एजेंसी (सीएनएसए) को उम्मीद है कि वह 2030 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतार देगी। चीन पहले ही कई रोबोट चंद्रमा पर भेज चुका है और चंद्र नमूने वापस ला चुका है।  

चीन इस साल अपने नए मेंगझोऊ (ड्रीम शिप) अंतरिक्ष यान की परीक्षण उड़ान आयोजित करने जा रहा है। पुराने शेनझोउ की जगह लेने वाला यह अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्र कक्षा में ले जाएगा। संभव है कि चंद्रमा पर अमेरिकी यात्री पहले उतर जाए, पर इस बात के आसार बन रहे हैं कि स्पेस साइंस में अब अमेरिका के साथ चीन बराबरी के स्तर पर आने की होड़ में है।

अभी इसे बराबरी कहना आसान नहीं है, पर एक क्षेत्र ऐसा है, जिसमें वह अमेरिका के बराबर आ गया है या कुछ आगे निकल गया है। वह है स्पेस नेवीगेशन। चीन के बेइदू ने अमेरिकी जीपीएस को पीछे कर दिया है। इस बात को अमेरिकी विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं। चीन को उम्मीद है कि वह 2035 तक चंद्रमा पर समानव वैज्ञानिक बेस का एक बुनियादी संस्करण तैयार कर लेगा, जिसे इंटरनेशनल ल्यूनर रिसर्च स्टेशन (आईएलआरएस) कहा जाएगा।

यह बेस चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास बनाया जाएगा, जहाँ बर्फ के रूप में पानी मौजूद होने की संभावना है। इस परियोजना में रूस भी चीन के साथ है। दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन ने लगभग 20 अरब डॉलर की लागत से चंद्रमा पर एक बेस बनाने का कार्यक्रम शुरू किया है।

इसके विपरीत, नासा का आर्टेमिस चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम लगातार पिछड़ रहा है। आर्टेमिस 2 समानव फ्लाई बाय यान है, लैंडिंगक्राफ्ट नहीं। कई बार स्थगित होने के बाद 2 अप्रैल को इसका प्रक्षेपण हो पाया। पहली अमेरिकी मानवयुक्त चंद्र लैंडिंग को आर्टेमिस 4 तक टाल दिया गया है, जो 2028 से पहले संभव नहीं। चीन का कार्यक्रम, जो तीन दशकों से अधिक समय से एक एकीकृत योजना पर आधारित है, काफी हद तक उस राजनीतिक उथल-पुथल से अछूता रहा है, जो अमेरिका में तल रही हैं।  

Thursday, April 2, 2026

बंगाल माँगे एक और ‘पोरिबोर्तोन!’

पिछले सात-दशक के घटनाक्रम पर नजर डालें, तो साफ दिखाई पड़ता है कि पश्चिम बंगाल में हिंसा का नाम राजनीति और राजनीति के मायने हिंसा हो गए हैं।  2011 में अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को जबर्दस्त जीत दिलाकर जब ममता बनर्जी सत्ता के रथ पर सवार हुईं थीं, तब उनका ध्येय-वाक्य था ‘पोरिबोर्तोन।’ आज भारतीय जनता पार्टी का भी यही ध्येय-वाक्य है। वे परिवर्तन का नारा लेकर सफल हुई थीं, क्योंकि बंगाल की जनता वामपंथी तौर तरीकों से परेशान हो गई थी। वह बदलाव चाहती थी।

ममता बनर्जी कम से कम तीन कारणों से अपना रौब-दाब कायम रखने में अब तक सफल हुई हैं: एक, जुझारू छवि, दो, कल्याणकारी कार्यक्रम और तीन, सांप्रदायिक झुकाव। अपनी जुझारू छवि क उन्होंने केंद्र से विरोध को जोड़कर रखा है। मतदाता सूचियों में गहन संशोधन की प्रक्रिया का जिस स्तर का विरोध उन्होंने किया है, वह अभूतपूर्व है। इसके अलावा उन्होंने राज्य में केंद्र सरकार द्वारा घोषित कल्याण कार्यक्रमों का प्रवेश वस्तुतः पूरी तरह रोक रखा है।

आगामी चुनाव में वे भवानीपुर सीट से खड़ी हुई हैं, जहाँ उनके मुकाबले बीजेपी के सुवेंदु अधिकारी खड़े हैं, जिन्होंने 2021 में उन्हें नंदीग्राम से अपमानजनक हार दी थी। इस वर्ष रमज़ान और नवरात्र एक साथ थे। दोनों प्रत्याशियों ने अपने अभियान की शुरुआत अपने-अपने सांकेतिक तरीकों से की। ममता बनर्जी कोलकाता के रेड रोड पर ईद-उल-फ़ित्र की नमाज में शामिल हुईं, और सुवेंदु अधिकारी कालीघाट मंदिर गए।

ममता बनर्जी के पिछले 15 साल के कार्यकाल को देखें, तो यह बात आसानी से समझ में आ जाएगी। इनमें से पहले से चली आ रही कुछ बातों को उन्होंने अपनाया और कुछ का आविष्कार किया। उनकी राजनीति की शुरुआत शहरों से हुई थी। बंगाल के शहरों में रहने वाला मध्य वर्ग, वामपंथी राजनीति से आजिज़ आ गया था। वही मध्यवर्ग आज ममता से नाराज़ नजर आता है, क्या गाँवों में भी यही स्थिति है?

अब जब विधानसभा चुनाव सिर पर आ गए हैं, सवाल किया जा रहा है कि क्या भारतीय जनता पार्टी, राज्य में एक और बड़े परिवर्तन की सूत्रधार बनेगी? क्या परिस्थितियाँ 2011 जैसी हैं? वामपंथी दलों के 34 साल के शासन की अभेद्य नज़र आने वाली दीवार को ममता ने तोड़ा था। अब ममता के शासन के भी 15 साल हो रहे हैं। क्या उनकी विदाई होगी? क्या ऐसा संभव है?

Wednesday, April 1, 2026

कहाँ जाकर रुकेगा पाक-अफ़ग़ान टकराव?


पश्चिम एशिया में युद्ध भड़क के बाद हमारा ध्यान यूक्रेन और अफ़ग़ानिस्तान से हट गया, जबकि वहाँ भी लड़ाइयाँ चल रही हैं. ईरान की लड़ाई रुक भी जाएगी, पर लगता है कि यूक्रेन की लड़ाई और पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान टकराव जल्द खत्म नहीं होगा.

पाकिस्तान ने पिछली 25 मार्च को कहा कि उसकी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ अभियान फिर से शुरू कर दिया है. क्या वजह है कि पाकिस्तान ने इस समय बड़ा फौजी अभियान चलाने का फैसला किया है? क्या इसका संबंध भी ईरान-युद्ध से है? क्या इसके पीछे अमेरिका की सहमति या उसकी ही योजना है?

ऐसे कुछ सवाल भी ज़ेहन में आते हैं. जो बाइडेन के कार्यकाल में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान के मामले में भारत को महत्त्व दिया था, पर इस समय ट्रंप प्रशासन का पाकिस्तान पर पूरा भरोसा है. ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी ने कहा है कि तालिबान हमलों के खिलाफ आत्मरक्षा करने का पाकिस्तान को पूरा अधिकार है.

अस्पताल पर हमला

हाल में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में एक नशा मुक्ति केंद्र पर पाकिस्तानी हवाई हमले में 400 से अधिक लोग मारे गए थे. पाकिस्तान का कहना है कि हमने ये हमले ‘फौजी ठिकानों और आतंकवादी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाते हुए’ किए थे.

बहरहाल ईद के मौके पर तुर्की, कतर और सऊदी अरब के अनुरोध पर युद्ध-विराम की घोषणा की गई थी. इसके बाद इस्लामाबाद में विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक ब्रीफिंग में प्रवक्ता ताहिर अंदराबी ने कहा, यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो जाते.