राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ऐतिहासिक रूप से गैर-पंजीकृत स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करता रहा है। अक्सर उसके विरोधी सवाल उठाते हैं कि वह अपना पंजीकरण क्यों नहीं कराता। विवाद इसके कानूनी दर्जे पर केंद्रित है, जहाँ आलोचक वित्तीय पारदर्शिता और संवैधानिक अनुपालन की माँग करते हैं, वहीं आरएसएस अपने दृष्टिकोण का बचाव करते हुए इसे एक विकेंद्रीकृत, स्व-वित्तपोषित, व्यक्तिगत आंदोलन बताता है।
खासतौर से कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खरगे ने संघ के सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के पंजीकरण के बिना काम करने को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने उसके वित्तपोषण, कर अनुपालन और लेखा-परीक्षा की आवश्यकता का मुद्दा भी उठाया। 13 जून को लिखे एक पत्र में, खरगे ने कहा: ‘आरएसएस के इस पैमाने, प्रभाव और पहुँच के कारण ही इसे पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक अनुपालन के उच्चतम मानकों पर खरा उतरना होगा।’ उन्होंने पिछले साल के अंत में भी आरएसएस के कानूनी अस्तित्व को लेकर इसी तरह के सवाल उठाए थे। उन्होंने पंजीकरण, संगठन संरचना, वित्तपोषण और दान के साथ-साथ संगठन के समग्र कामकाज के बारे में भी पूछा था।
