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Monday, August 10, 2020

बांग्लादेश पर भी चीन का सम्मोहिनी जादू!

 

नवम्बर 2014 में काठमांडू में दक्षेस शिखर सम्मेलन जब हुआ था, एक खबर हवा में थी कि नेपाल सरकार चीन को भी इस संगठन का सदस्य बनाना चाहती है। सम्मेलन के दौरान यह बात भारतीय मीडिया में भी चर्चा का विषय बनी थी। यों चीन 2005 से दक्षेस का पर्यवेक्षक देश है, और शायद वह भी इस इलाके में अपनी ज्यादा बड़ी भूमिका चाहता है। काठमांडू के बाद दक्षेस का शिखर सम्मेलन पाकिस्तान में होना था, वह नहीं हुआ और फिलहाल यह संगठन एकदम खामोश है। भारत-पाकिस्तान रिश्तों की कड़वाहट इस खामोशी को बढ़ा रही है।

इस दौरान भारत ने बिम्स्टेक जैसे वैकल्पिक क्षेत्रीय संगठनों में अपनी भागीदारी बढ़ाई और ‘माइनस पाकिस्तान’ नीति की दिशा में कदम बढ़ाए। पर चीन के साथ अपने रिश्ते बनाकर रखे थे। लद्दाख में घुसपैठ की घटनाओं के बाद हालात तेजी से बदले हैं। पाकिस्तान तो पहले से था ही अब नेपाल भी खुलकर बोल रहा है। पिछले पखवाडे की कुछ घटनाओं से लगता है कि बांग्लादेश को भी भारत-विरोधी मोर्चे का हिस्सा बनाने की कोशिशें हो रही हैं। बावजूद इसके कि डिप्लोमैटिक गणित बांग्लादेश को पूरी तरह चीनी खेमे में जाने से रोकता है। पर यह भी लगता है कि बांग्लादेश सरकार ने भारत से सायास दूरी बनाई है।

Thursday, December 4, 2014

बांग्लादेश पर यू-टर्न एकदम उचित है


मोदी सरकार केवल आर्थिक उदारीकरण के मामले में ही नहीं विदेश नीति और रक्षा नीति में भी पिछली यूपीए सरकार के कदमों पर चल रही है. फर्क केवल तौर-तरीकों का है. व्यक्तिगत रूप से नरेंद्र मोदी का अंदाज़ मुकाबले मनमोहन सिंह के ज्यादा आक्रामक है और ज्यादा खुलकर है. खासतौर से विदेश नीति के मामले में. इधर कांग्रेस ने '6 महीने पार, यू-टर्न सरकार' शीर्षक से जो पुस्तिका जारी की है उसमें सरकार की 22 'पलटियों' का जिक्र किया गया है. इनमें विदेश नीति से जुड़े दो मसले महत्वपूर्ण हैं. पहला सिविल न्यूक्लियर डैमेज एक्ट जिसे लेकर भाजपा ने खूब हंगामा किया गया था. अब मोदी जी इसे नरम करना चाहते हैं ताकि नाभिकीय तकनीक लाने में अड़चनें खड़ी न हों.