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Sunday, February 10, 2013

फाँसी के बाद भी सवाल उठेंगे


अब इस बात पर विचार करने का वक्त नहीं है कि अफज़ल गुरू को फाँसी होनी चाहिए थी या नहीं, पर इतना साफ है कि यह फाँसी केन्द्र सरकार पर बढ़ते दबाव के कारण देनी पड़ी। अजमल कसाब की फाँसी की यह तार्किक परिणति थी। और प्रयाग के महाकुम्भ में धर्मसंसद की बैठक के कारण पैदा हुआ दबाव। सन 2014 के चुनाव के पहले देश में एक बार फिर से भावनात्मक आँधियाँ चलने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। पर उसके पहले पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजोआणा और राजीव गांधी की हत्या में शामिल संतन, मुरुगन और पेरारिवालन की सजाओं के बारे में भी विचार करना होगा। इन सजाओं के भी राजनीतिक निहितार्थ हैं। राजोआणा को फाँसी होने से शिरोमणि अकाली दल की लोकप्रियता पर असर पड़ेगा, जो भारतीय जनता पार्टी का मित्र दल है। और राजीव हत्याकांड के दोषियों को फाँसी का असर द्रमुक पर पड़ेगा, जो यूपीए में शामिल पार्टी है। समाज के किसी न किसी हिस्से की इन लोगों के साथ सहानुभूति है। सरकार दोहरे दबाव में है। एक ओर गुजरते वक्त के साथ उसके ऊपर सॉफ्ट होने का आरोप लगता है, दूसरे न्याय-प्रक्रिया में रुकावट आती है।
पिछले साल तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने एक साथ 35 हत्यारों की फाँसी माफ कर दी, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड था। जिन 35 व्यक्तियों की फाँसी की सजा उम्रकैद में बदली गई है, वे 60 से ज्यादा लोगों की हत्या में दोषी ठहराए गए थे। क्या वह प्रतिभा पाटिल का व्यक्तिगत निर्णय था? ऐसा नहीं है। राष्ट्रपति के निर्णय गृहमंत्री की संस्तुति पर होते हैं। पिछले साल तक सरकार धीरे-धीरे देश में मौत की सजा की समाप्ति की ओर बढ़ रही थी। यों भी सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि फाँसी रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मामले में दी जाए। दुनिया के अधिकतर देश मौत की सज़ा खत्म कर रहे हैं। पर दिल्ली गैंगरेप के बाद मौत की सजा के पक्ष में ज़ोरदार तर्क सामने आए हैं। हालांकि जस्टिस वर्मा समिति ने रेप के लिए मौत की सजा को उचित नहीं माना है, पर सरकार ने जो अध्यादेश जारी किया है, उसमें रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मामले में मौत की सजा को भी शामिल किया है। यहाँ भी राजनीति का दबाव न्याय-तंत्र पर दिखाई पड़ता है। पर हम स्त्रियों के मसले पर नहीं आतंकवादी हिंसा या देश पर हमले की बात कर रहे हैं। ऐसी हिंसा पर मौत की सजा का विरोध करना काफी मुश्किल है। हालांकि कसाब को फाँसी मिलने के बाद यह बात उठी थी कि हमें फाँसी की सज़ा पूरी तरह खत्म कर देनी चाहिए। यह बात उन सिद्धांतवादियों की ओर से आई थी जो मृत्युदंड के खिलाफ हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने जिस रेयर ऑफ द रेयरेस्ट की बात कही है, वह पहली नज़र में अपराध के जघन्य होने की ओर इशारा करता है। पहली नज़र में लगता है कि सामूहिक बलात्कार, क्रूरता और वीभत्सता की कसौटी पर रेयर ऑफ द रेयरेस्ट को परखा जाना चाहिए। क्या इसमें राजनीतिक हिंसा को शामिल नहीं किया जा सकता? राजनीतिक उद्देश्यों से हिंसा में शामिल होने वाले ज्यादा बड़े लक्ष्यों के साथ आते हैं। उनका व्यक्तिगत हित इसमें नहीं होता। पर दूसरे नज़रिए से देखें तो राजनीतिक सज़ा को टालते रहना ज्यादा खतरनाक साबित हुआ है। मसलन सन 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण करके लाहौर ले जाने वाले लोगों की योजना मौलाना मसूद अज़हर, अहमद उमर सईद शेख और मुश्ताक अहमद ज़रगर को रिहा कराने की थी। यदि इन लोगों को समय से मौत की सजा दिलवाकर फाँसी दे दी गई होती तो विमान अपहरण न होता। अपराधियों को छुड़ाने के लिए विमान यात्रियों से लेकर सरकारी अधिकारियों तक को बंधक बनाने की परम्परा दुनिया भर में है। भारत में झारखंड, ओडीसा और बंगाल में सरकार को कई बार नक्सली बंदियों की रिहाई करनी पड़ी। इसके विपरीत कहा जाता है कि राजनीतिक प्रश्नों का हल राजनीति से होना चाहिए। नक्सलपंथ या इस्लामी आतंकवाद एक राजनीतिक सवाल है, उनका बुनियादी हल निकलना चाहिए।
पर कुछ बड़े सवाल अनुत्तरित हैं। क्या अफज़ल गुरू की फाँसी अनिश्चित काल तक टाली जा सकती थी? पर उससे बड़ा सवाल है कि क्या वास्तव में अफ़ज़ल गुरू संसद पर हमले का गुनहगार था? उसका मास्टरमाइंड कौन थाउस हमले के दौरान मारे गए पाँच आतंकवादी कौन थे, वे कहाँ से आए थे? इस मामले में पकड़े गए दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक एसएआर गीलानी की रिहाई के बाद यह सवाल पैदा हुआ था कि क्या अफज़ल गुरू को भी फँसाया गया था? अरुंधती रॉय उसके मामले को फर्ज़ी मानती हैं। उनका कहना है कि अफज़ल ने ऐसा दावा नहीं किया कि वह बिलकुल निर्दोष है, पर इस मामले में पूरी तहकीकात नहीं की गई। 13 दिसम्बर शीर्षक से पेंगुइन बुक्स की एक पुस्तक ज़ारी भी की गई, जिसकी प्रस्तावना अरुंधती रॉय ने लिखी थी। इस किताब में अनेक सवाल उठाए गए थे। सवाल अब भी उठेंगे। श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या में दोषी पाए गए केहर सिंह को दी गई फाँसी की सज़ा के बाद भी ऐसे सवाल उठे थे। सम्भव है आने वाले समय में इस पर कुछ रोशनी पड़े।

Friday, November 30, 2012

बड़े राजनीतिक गेम चेंजर की तलाश

हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून
 कांग्रेस पार्टी ने कंडीशनल कैश ट्रांसफर कार्यक्रम को तैयार किया है, जिसे आने वाले समय का सबसे बड़ा गेम चेंजर माना जा रहा है। सन 2004 में एनडीए की पराजय से सबक लेकर कांग्रेस ने सामाजिक जीवन में अपनी जड़ें तलाशनी शुरू की थी, जिसमें उसे सफलता मिली है। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ने उसे 2009 का चुनाव जिताया। उसे पंचायत राज की शुरूआत का श्रेय भी दिया जा सकता है। सूचना के अधिकार पर भी वह अपना दावा पेश करती है, पर इसका श्रेय विश्वनाथ प्रताप सिंह को दिया जाना चाहिए। इसी तरह आधार योजना का बुनियादी काम एनडीए शासन में हुआ था। सर्व शिक्षा कार्यक्रम भी एनडीए की देन है। हालांकि शिक्षा के अधिकार का कानून अभी तक प्रभावशाली ढंग से लागू नहीं हो पाया है, पर जिस दिन यह अपने पूरे अर्थ में लागू होगा, वह दिन एक नई क्रांति का दिन होगा। भोजन के अधिकार का मसौदा तो सरकार ने तैयार कर लिया है, पर उसे अभी तक कानून का रूप नहीं दिया जा सका है। प्रधानमंत्री ने हाल में घोषणा भी की है कि अगली पंचवर्षीय योजना से देश के सभी अस्पतालों में जेनरिक दवाएं मुफ्त में मिलने लगेंगी। सामान्य व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य सबसे बड़ी समस्या है। कंडीशनल कैश ट्रांसफर योजना का मतलब है कि सरकार नागरिकों को जो भी सब्सिडी देगी वह नकद राशि के रूप में उसके बैंक खाते में जाएगी।

Friday, November 16, 2012

चीन एक वैकल्पिक मॉडल भी है


चीनी व्यवस्था को लेकर हम कितनी भी आलोचना करें, दो बातों की अनदेखी नहीं कर सकते। एक 1949 से, जब से नव-चीन का उदय हुआ है, उसकी नीतियों में निरंतरता है। यह भी सही है कि लम्बी छलांग और सांस्कृतिक क्रांति के कारण साठ के दशक में चीन ने भयानक संकटों का सामना किया। इस दौरान देश ने कुछ जबर्दस्त दुर्भिक्षों का सामना भी किया। सत्तर के दशक में पार्टी के भीतर वैचारिक मतभेद भी उभरे। देश के वैचारिक दृष्टिकोण में बुनियादी बदलाव आया। माओ के समवर्ती नेताओं में चाऊ एन लाई अपेक्षाकृत व्यावहारिक थे, पर माओ के साथ उनका स्वास्थ्य भी खराब होता गया। माओ के निधन के कुछ महीने पहले उनका निधन भी हो गया। उनके पहले ल्यू शाओ ची ने पार्टी की सैद्धांतिक दिशा में बदलाव का प्रयास किया, पर उन्हें कैपिटलिस्ट रोडर कह कर अलग-थलग कर दिया गया और अंततः उनकी 1969 में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। उसके बाद 1971 में लिन बियाओ माओ के खिलाफ बगावत की कोशिश में मारे गए। 1976 में माओ जेदुंग के निधन के बाद आए हुआ ग्वो फंग और देंग श्याओ फंग पर ल्यू शाओ ची की छाप थी। कम से कम देंग देश को उसी रास्ते पर ले गए, जिस पर ल्यू शाओ ची जाना चाहते थे। चीन का यह रास्ता है आधुनिकीकरण और समृद्धि का रास्ता। कुछ लोग मानते हैं कि चीन पूँजीवादी देश हो गया है।  वे पूँजीवाद का मतलब निजी पूँजी, निजी कारखाने और बाजार व्यवस्था को ही मानते हैं। पूँजी सरकारी हो या निजी इससे क्या फर्क पड़ता है? यह बात सोवियत संघ में दिखाई पड़ी जहाँ व्यवस्था का ढक्कन खुलते ही अनेक पूँजीपति घराने सामने आ गए। इनमें से ज्यादातर या तो पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हैं या कम्युनिस्ट शासन से अनुग्रहीत लोग। चीनी निरंतरता का दूसरा पहलू यह है कि 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बावजूद चीन की शासन-व्यवस्था ने खुद को कम्युनिस्ट कहना बंद नहीं किया। वहाँ का नेतृत्व लगातार शांतिपूर्ण तरीके से बदलता जा रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि वहाँ पार्टी का बड़ा तबका प्रभावशाली है, केवल कुछ व्यक्तियों की व्यवस्था नहीं है।

Sunday, October 28, 2012

भ्रष्टाचार मूल रोग नहीं, रोग का लक्षण है


यह जो नन्हा है भोला भाला है
खूनीं सरमाए का निवाला है
पूछती है यह इसकी खामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है!

अली सरदार ज़ाफरी की ये पंक्तियाँ यों ही याद आती हैं। पिछले कुछ साल से देश में आग जैसी लगी है। लगता है सब कुछ तबाह हुआ जा रहा है। घोटालों पर घोटाले सामने आ रहे हैं। हमें लगता है ये घोटाले ही सबसे बड़ा रोग है। गहराई से सोचें तो पता लगता है कि ये घोटाले रोग नहीं रोग का एक लक्षण है। रोग तो कहीं और है।

तीन-चार महीने पहले हरियाणा और पंजाब की यात्रा के दौरान सड़क के दोनों ओर खेतों लगी आग की ओर ध्यान गया। यह आग किसानों ने खुद अपने खेतों में लगाई थी। हमारे साथ एक कृषि विज्ञानी भी थे। उनका कहना था कि पुरानी फसल को साफ करने के इस तरीके के खिलाफ सरकार तमाम प्रयास करके हार गई है। इसे अपराध घोषित किया जा चुका है, अक्सर किसानों के खिलाफ रपट दर्ज होती रहती हैं, पर किसान प्रतिबंध के बावजूद धान के अवशेष जलाकर न सिर्फ पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं, बल्कि अपने खेत की उर्वरा शक्ति को कम करते हैं। कृषि विभाग खेत में फसलों के अवशेष को आग लगाने के खिलाफ जागरूकता अभियान भी चलाता है लेकिन इसके किसानों को बात समझ में नहीं आती। हमारे साथ वाले कृषि वैज्ञानिकों का कहना था कि पुआल जैविक खाद के रूप में भी तब्दील की जा सकती है जिससे जमीन की आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है। लेकिन जागरूकता के अभाव में किसान अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। किसानों का कहना है कि धान की कटाई के बाद किसान गेहूं, सरसों, बरसीम लहसुन, टमाटर, गोभी आदि फसलों की बुआई करनी है। कंबाईन से धान कटाई के बाद काफी पुआल खेत में रह जाते हैं। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि इन अवशेषों में ऐसे जैविक पदार्थ होते हैं, जो खाद का काम करते हैं। इस पर कुछ किसान कहते हैं कि धान के अवशेष रहने पर गेहूं की फसल तो उगाई जा सकती है, लेकिन सब्जियाँ नहीं उगाई जा सकतीं।

Friday, October 26, 2012

कांग्रेस को रक्षात्मक नहीं, आक्रामक बनना चाहिए

नितिन गडकरी संकट में आ गए हैं। उन्हें अब फिर से अध्यक्ष बनाना मुश्किल होगा। उनके लिए यह संकट केजरीवाल ने पैदा किया या कांग्रेस ने या पार्टी के भीतर से ही किसी ने यह अभी समझ में नहीं आएगा, पर राजनीति का खेल चल रहा है। हमारी सब से बड़ी उपलब्धि है लोकतंत्र। और लोकतंत्र को दिशा देने वाली राजनीति। पर राजनीति के अंतर्विरोध लगातार खुल रहे हैं। मीडिया के शोर पर यकीन करें तो लगता है कि आसमान टूट पड़ा है, पर इस शोर-संस्कृति ने मीडिया को अविश्वसनीय बना दिया है। हम इस बात पर गौर नहीं कर रहे हैं कि दुनिया के नए देशों में पनप रहे लोकतंत्रों में सबसे अच्छा और सबसे कामयाब लोकतंत्र हमारा है। इसकी सफलता में राजनीतिक दलों और मतदाताओं दोनों की भूमिका है। बेशक दोनों में काफी सुधार की सम्भावनाएं हैं। फिलहाल कांग्रेस पार्टी पर एक नज़र डालें जो आने वाले समय के लिए किसी बड़ी रणनीति को तैयार करती दिखाई पड़ती है। 

हिमाचल और गुजरात के चुनाव सिर पर हैं और कांग्रेस पार्टी के सामने राजनीतिक मुहावरे खोजने और क्रमशः बढ़ती अलोकप्रियता को तोड़ निकालने की चुनौती है। अरविन्द केजरीवाल ने फिलहाल कांग्रेस और भाजपा दोनों को परेशान कर रखा है। भाजपा ने नितिन गडकरी को दुबारा अध्यक्ष बनाने के लिए संविधान में संशोधन कर लिया था, पर केजरीवाल ने फच्चर फँसा दिया है। शुरू में जो मामूली बात लगती थी वह गैर-मामूली बनती जा रही है। 4 नवम्बर को हिमाचल में मतदान है और वीरभद्र सिंह ने मीडिया से पंगा मोल ले लिया है। कांग्रेस ने फौरन ही माफी माँगकर मामले को सुलझाने की कोशिश की है, पर चुनाव के मौके पर रंग में भंग हो गया। हिमाचल में सोनिया, राहुल और मनमोहन सिंह तीनों अभियान पर निकले हैं। शायद चुनाव के मौके पर कांग्रेस के लिए असमंजस पैदा करने के लिए ही वीरभद्र को उकसाया गया होगा, पर उन्हें उकसावे में आने की ज़रूरतही क्या थी? दोनों पार्टियों के प्रत्याशियों की सूचियाँ देर से ज़ारी हुईं है। सोनिया गांधी के जवाब में नरेन्द्र मोदी भी हिमाचल आ रहे हैं। हिमपात होने लगा है। अचानक बढ़ी ठंड ने प्रदेश के बड़े हिस्से को आगोश में लेना शुरू कर दिया है। हिमाचल के परिणाम से बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं है, पर कांग्रेस को इस समय छोटी-छोटी और प्रतीकात्मक सफलताएं चाहिए। हिमाचल में भी और उससे ज्यादा गुजरात में। हिमाचल और गुजरात दोनों जगह मुकाबला सीधा है। कांग्रेस और भाजपा के बीच। इस वक्त दोनों पार्टियाँ विवादों के घेरे में हैं। इन दो राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियाँ नहीं हैं, पर अगले लोकसभा चुनाव का सबसे बड़ा सवाल है कि क्या राष्ट्रीय दलों की पराजय होने वाली है।

Friday, October 12, 2012

तोता राजनीति के मैंगो पीपुल

भारतीय राज-व्यवस्था के प्राण तोतों में बसने लगे हैं। एक तोता सीबीआई का है, जिसमें अनेक राजनेताओं के प्राण हैं। फिर मायावती, मुलायम सिंह, ममता और करुणानिधि के तोते हैं। उनमें यूपीए के प्राण बसते हैं। तू मेरे प्राण छोड़, मैं तेरे प्राण छोड़ूं का दौर है। ये सब तोते सात समंदर और सात पहाड़ों के पार सात परकोटों से घिरी मीनार की सातवीं मंजिल में सात राक्षसों के पहरे में रहते हैं। तोतों, पहाड़ों और राक्षसों की अनंत श्रृंखलाएं हैं, और राजकुमार लापता हैं। तिरछी गांधी टोपी सिर पर रखकर अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में कटी बत्तियाँ जोड़ रहे हैं। हाल में उन्होंने गांधी के हिन्द स्वराज की तर्ज पर एक किताब लिखी है। टोपियाँ पहने  आठ-दस लोगों ने एक नई पार्टी बनाने की घोषणा की है। पिछले 65 साल में भारतीय राजनीति में तमाम प्रतीक और रूपक बदले पर टोपियों और तोतों के रूपक नहीं बदले। इस दौरान हमने अपनी संस्थाओं, व्यवस्थाओं और नेताओं की खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी है। आम आदमी ‘मैंगो पीपुल’ में तब्दील हो गया है। संज़ीदगी की जगह घटिया कॉमेडी ने ले ली है। 

Friday, September 28, 2012

चुनावी नगाड़े और महाराष्ट्र का शोर

ऐसा लगता है कि एनसीपी के ताज़ा विवाद में अजित पवार नुकसान उठाने जा रहे हैं। शरद पवार का कहना है कि यह विवाद सुलझ गया है। यानी अजित पवार का इस्तीफा मंज़ूर और बाकी मंत्रियों का इस्तीफा नामंज़ूर। आज शुक्रवार को मुम्बई में एनसीपी विधायकों की बैठक हो रही है, जिसमें स्थिति और साफ होगी।
नेपथ्य में चुनाव के नगाड़े बजने लगे हैं। तृणमूल कांग्रेस की विदाई के बाद एनसीपी के विवाद के शोर में नितिन गडकरी का संदेश भी शामिल हो गया है कि जल्द ही चुनाव के लिए तैयार हो जाइए। बीजेपी ने एफडीआई को मुद्दा बनाने का फैसला किया है। पिछले महीने कोल ब्लॉक पर बलिहारी पार्टी को यह मुद्दा यूपीए ने खुद आगे बढ़कर दे दिया है। पर व्यापक फलक पर असमंजस है। बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठकों के समांतर यूपीए समन्वय समिति की पहली बैठक गुरुवार को हुई। यह समन्वय समिति दो महीने पहले जुलाई के अंतिम सप्ताह में कांग्रेस और एनसीपी के बीच विवाद को निपटाने का कारण बनी थी। संयोग है कि उसकी पहली बैठक के लिए एक और विवाद खड़ा हो गया है। अब एनसीपी के टूटने का खतरा है और महाराष्ट्र में नए समीकरण बन रहे हैं। वास्तव में चुनाव करीब हैं।

Friday, September 14, 2012

कांग्रेस पर भारी पड़ेगी राहुल की हिचक

भारतीय राजनीतिक दल खासतौर से कांग्रेस पार्टी जितना विदेशी मीडिया के प्रति संवेदनशील है उतना भारतीय मीडिया के प्रति नहीं है। पिछले दिनों सबसे पहले टाइम मैगज़ीन की ‘अंडर अचीवर’ वाली कवर स्टारी को लेकर शोर मचा, फिर वॉशिंगटन पोस्ट की सामान्य सी टिप्पणी को लेकर सरकार ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। और अब राहुल गांधी को लेकर इकोनॉमिस्ट की और भी साधारण स्टोरी पर चिमगोइयाँ चल रहीं हैं। पश्चिमी मीडिया की चिन्ता भारत के आर्थिक सुधारों पर लगा ब्रेक और कांग्रेस की क्रमशः बढ़ती अलोकप्रियता को लेकर है। सच यह है कि इन सारी कथाओं में बाहरी स्रोतों पर आधारित अलल-टप्पू बातें हैं। खासतौर से इकोनॉमिस्ट की कथा एक भारतीय लेखिका आरती रामचन्द्रन की पुस्तक पर आधारित है। राहुल गांधी के जीवन को ‘डिकोड’ करने वाली यह पुस्तक भी किसी अंदरूनी सूचना के आधार पर नहीं है। इकोनॉमिस्ट ने 'द राहुल प्रॉब्लम' शीर्षक आलेख में कहा है कि राहुल ने "नेता के तौर पर कोई योग्यता नहीं दिखाई है। और और ऐसा नहीं लगता कि उन्हें कोई भूख है। वे शर्मीले स्वभाव के हैं, मीडिया से बात नहीं करते हैं और संसद में भी अपनी आवाज़ नहीं उठाते हैं।" बहरहाल यह वक्त राहुल गांधी और कांग्रेस के बारे में विचार करने का है। कांग्रेस के पास अपनी योजना को शक्ल देने का तकरीबन आखिरी मौका है। राहुल की ‘बड़ी भूमिका’ की घोषणा अब होने ही वाली है।

Sunday, September 2, 2012

रोचक राजनीति बैठी है इस काजल-द्वार के पार

कोल ब्लॉक्स के आबंटन पर सीएजी की रपट आने के बाद देश की राजनीति में जो लहरें आ रहीं हैं वे रोचक होने के साथ कुछ गम्भीर सवाल खड़े करती हैं। ये सवाल हमारी राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था तथा मीडिया से ताल्लुक रखते हैं। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि बीजेपी इस सवाल पर संसद में बहस होने नहीं दे रही है, जो अलोकतांत्रिक है। और बीजेपी कहती है कि संसद में दो-एक दिन की बहस के बाद मामला शांत हो जाता है। ऐसी बहस के क्या फायदा? कुछ तूफानी होना चाहिए।

भारतीय जनता पार्टी की यह बात अन्ना-मंडली एक अरसे से कहती रही है। तब क्या मान लिया जाए कि संसद की उपयोगिता खत्म हो चुकी है? जो कुछ होना है वह सड़कों पर होगा और बहस चैनलों पर होगी। कांग्रेस और बीजेपी दोनों पक्षों के लोग खुद और अपने समर्थक विशेषज्ञों के मार्फत बहस चलाना चाहते हैं। यह बहस भी अधूरी, अधकचरी और अक्सर तथ्यहीन होती है। हाल के वर्षों में संसदीय लोकतंत्र की बुनियाद को अनेक तरीकों से ठेस लगी है। हंगामे और शोरगुल के कारण अनेक बिलों पर बहस ही नहीं हो पाती है। संसद का यह सत्र अब लगता है बगैर किसी बड़े काम के खत्म हो जाएगा। ह्विसिल ब्लोवर कानून, गैर-कानूनी गतिविधियाँ निवारण कानून, मनी लाउंडरिंग कानून, कम्पनी कानून, बैंकिंग कानून, पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटों के आरक्षण का कानून जैसे तमाम कानून ठंडे बस्ते में रहेंगे। यह सूची काफी लम्बी है। क्या बीजेपी को संसदीय कर्म की चिंता नहीं है? और क्या कांग्रेस ईमानदारी के साथ संसद को चलाना चाहती है?

Friday, August 31, 2012

कसाब की फाँसी से हमारे मन शांत नहीं होंगे

जिन दिनों अजमल कसाब के खिलाफ मुकदमा शुरू ही हुआ था तब राम जेठमलानी ने पुणे की एक गोष्ठी में कहा कि इस लगभग विक्षिप्त व्यक्ति को मौत की सजा नहीं दी जानी चाहिए। उनका आशय यह भी था कि किसी व्यक्ति को जीवित रखना ज्यादा बड़ी सजा है। मौत की सजा दूसरों को ऐसे अपराध से विचलित करने के लिए भी दी जाती है। पर जिस तरीके से कसाब और उनके साथियों ने हमला किया था उसके लिए आवेशों और भावनाओं का सहारा लेकर लोगों को पागलपन की हद तक आत्मघात के लिए तैयार कर लिया जाता है। आज पाकिस्तान में ऐसे तमाम आत्मघाती पागल अपने देश के लोगों की जान ले रहे हैं। हाल में कामरा के वायुसेना केन्द्र पर ऐसा ही एक आत्मघाती हमला किया गया। ऐसे पगलाए लोगों को समय सजा देता है। बहरहाल कसाब की फाँसी में अब ज्यादा समय नहीं है। पर फाँसी से जुड़े कई सवाल हैं।

Saturday, August 18, 2012

अपने आप से लड़ता पाकिस्तान

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के करीब कामरा में वायुसेना के मिनहास बेस पर हमला काफी गम्भीर होती स्थितियों की ओर इशारा कर रहा है। पाकिस्तान का यह सबसे बड़ा एयरबेस होने के साथ-साथ यहाँ एटमी हथियार भी रखे गए हैं। जो शुरूआती जानकारी हासिल हुई है उसके अनुसार तकरीबन बारह हमलावर हवाई अड्डे में दाखिल हुए। इनमें से ज्यादातर ने आत्मघाती विस्फोट बेल्ट पहन रखे थे और एक ने खुद को उड़ा भी दिया था। सवाल केवल हवाई अड्डे की सुरक्षा का नहीं है, बल्कि ताकत का है जो इस तरह के हमलों की योजना बना रही है। अभी तक किसी ने इसकी ज़िम्मेदारी नहीं ली है, पर इसके पीछे तहरीके तालिबान पाकिस्तान का हाथ लगता है। इस्लामी चरपंथियों ने इससे पहले भी पाकिस्तान के फौजी ठिकानों को निशाना बनाया है। इनमें सबसे बड़ा हमला मई 2011 में कराची के पास मेहरान हवाई ठिकाने पर हुआ था। उसमें दस फौजी मारे गए थे, पर सबसे बड़ा नुकसान पी-3 ओरियन विमान को हुआ था, जो अत्याधुनिक टोही विमान है, जिसे अमेरिका ने गिफ्ट में दिया था।

Saturday, August 4, 2012

नए धमाके, पुराने सवाल


पुणे में एक घंटे के भीतर हुए चार धमाकों का संदेश क्या है? क्या यह नए गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को सम्बोधित हैं? कल ही भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने घोषणा की थी कि पाकिस्तानी नागरिक और कम्पनियाँ भारत में निवेश कर सकेंगी। क्या किसी को सम्बन्ध सामान्य बनाना पसन्द नहीं? या फिर कोई और बात है। किसी ने इसका सम्बन्ध अन्ना हज़ारे के आन्दोलन से जोड़ने की कोशिश भी की है। अटकलबाज़ियों में हमारा जवाब नहीं। किसी ने उत्तरी ग्रिड फेल होने को भी अन्ना आंदोलन को फेल करने की सरकारी साज़िश साबित कर दिया था। बहरहाल पुणे के धमाकों का असर इसीलिए मामूली नहीं मानना चाहिए कि उसमें किसी की मौत नहीं हुई। धमाके करने वाला यह संदेश भी देना चाहता है कि वह बड़े धमाके भी कर सकता था। पर पहले यह निश्चित करना चाहिए कि इसके पीछे किसी पाकिस्तान परस्त गिरोह का हाथ है या कोई और बात है।

Friday, July 20, 2012

राहुल को चाहिए एक जादू की छड़ी

राहुल ने नौ साल लगाए राजनीति में ज्यादा बड़ी भूमिका स्वीकार करने में। उनका यह विचार बेहतर था कि पहले ज़मीनी काम किया जाए, फिर सक्रिय भूमिका निभाई जाए। पर यह आदर्श बात है। हमारी राजनीति आदर्श पर नहीं चलती। और न राहुल किसी आदर्श के कारण महत्वपूर्ण हैं। वे तमाम राजनेताओं से बेहतर साबित होते बशर्ते वे उस कांग्रेस की उस संस्कृति से बाहर आ पाते जिसमें नेता को तमाम लोग घेर लेते हैं। बहरहाल अब राहुल सामने आ रहे हैं तो अच्छा है, पर काम मुश्किल है। नीचे पढ़ें जनवाणी में प्रकाशित मेरा लेख
हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में यूपीए की रणनीति को जितनी आसानी से सफलता मिली है उसकी उम्मीद नहीं थी। इसके लिए बेशक एनडीए का बिखराव काफी सीमा तक ज़िम्मेदार है, पर बिखरा हुआ तो यूपीए भी था। और आज भी कहना मुश्किल है कि आने वाला वक्त यूपीए या दूसरे शब्दों में कहें तो कांग्रेस के लिए आसान होगा। 7 अगस्त को उप राष्ट्रपति पद का चुनाव है और उसके अगले दिन 8 अगस्त से सरकार ने संसद का सत्र बुलाने का आग्रह किया है। उसके बाद अगले एक महीने में राष्ट्रीय राजनीति की कुछ पहेलियाँ बूझी जाएंगी।

Friday, July 6, 2012

सृष्टि की खोज में एक लम्बा कदम

हिग्स बोसोन की खोज निश्चित रूप से इनसान का एक लम्बा कदम है, पर इससे सृष्टि की सारी पहेलियाँ सुलझने वाली नहीं हैं। केवल पार्टिकल फिजिक्स की एक श्रृंखला की अप्राप्त कड़ी मिली है। हमें एक अरसे से मालूम है कि सृष्टि में कुछ है, जिसे हम देख नहीं पा रहे हैं। उसे हमने पा लिया है, भले ही उसे देखना आज भी असम्भव है। क्या इससे एंटी मैटर या ब्लैक मैटर के स्रोत का भी पता लग जाएगा? क्या इससे सृष्टि के जन्म की कहानी समझ में आ जाएगी, कहना मुश्किल है। इसमें दो राय नहीं कि आधुनिक फिजिक्स ने जबर्दस्त प्रगति की है, पर अभी हम ज्ञान की बाहरी सतह पर हैं। प्रायः वैज्ञानिकों की राय एक होती है, क्योंकि वे अपने निष्कर्ष प्रयोगिक आधार पर निकालते हैं। पर सृष्टि से जुड़े अधिकतर निष्कर्ष अवधारणाएं हैं। बिंग बैंग भी एक अवधारणा है वैज्ञानिक समुदाय इस अवधारणा के पक्ष में एकमत नहीं है। खगोलविज्ञान से जुड़े भारतीय वैज्ञानिक जयंत विष्णु नार्लीकर का कहना है कि हिग्स बोसोन को लेकर जो मीडिया ने हाइप बनाया है, उसमें कुछ दोष हैं। लार्ज हेड्रोन कोलाइडर में प्रति कण जो ऊर्जा तैयार की गई वह उस ऊर्जा के अरबवें अंश के हजारवें अंश के बराबर भी नहीं हैं, जो सृष्टि के स्फीति-काल में रही होगी। इसी तरह हम उपलब्ध तकनीक और उपकरणों के सहारे पदार्थ का केवल चार फीसदी ही देख पाते हैं। शेष 96 फीसदी के बारे में अनुमान हैं और उन्हें प्रयोगशाला में साबित नहीं किया जा सकता।

Friday, June 22, 2012

पाकिस्तान में बिखरता लोकतंत्र

हिन्दू में केशव का कार्टून
पाकिस्तान में नागरिक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सीधे-सीधे स्वीकार करके टकराव को टालने की कोशिश की है, पर इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था के पुष्ट होने के बजाय बिखरने के खतरे ज्यादा पैदा हो गए हैं। संवैधानिक संस्थाओं के बीच टकराव की नौबत नही आनी चाहिए थी, पर लगता है कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीति के बीच फर्क करने वाली ताकतें मौजूद नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला किया है उसकी याचिका देश को राजनीतिक दलों ने ही की थी। 26 अप्रेल को जब सुप्रीम कोर्ट ने गिलानी को दोषी पाने के बाद उन्हें प्रतीकात्मक सजा दी थी और सदस्यता खत्म करने का फैसला न करके यह निर्णय कौमी असेम्बली की स्पीकर पर छोड़ दिया था। उस वक्त तक लग रहा था कि विवाद अब तूल नहीं पकड़ेगा। अदालत ने अब अपने फैसले को बदल कर दो संदेह पैदा कर दिए हैं। पहला यह कि गिलानी के बाद जो दूसरे प्रधानमंत्री आएंगे उन्हें भी आदेश थमाया जाएगा कि आसिफ अली ज़रदारी के खिलाफ स्विट्ज़रलैंड की अदालतों में मुकदमे फिर से शुरू कराने की चिट्ठी लिखो। वे चिट्ठी नहीं लिखेंगे तो उनके खिलाफ भी अदालत की अवमानना का केस चलाया जाएगा। दूसरा अंदेशा यह है कि कहीं देश की न्यायपालिका सेना के साथ-साथ खुद भी सत्ता के संचालन का काम करना तो नहीं चाहती है। ऐसे मौकों पर टकराव टालने की कोशिश होती है पर यहाँ ऐसा नहीं हो रहा है, बल्कि व्यवस्था की बखिया उधेड़ी जा रही है।

Friday, June 15, 2012

यह राजनीतिक समुद्र मंथन है

हिन्दू सें सुरेन्द्र का कार्टून
कांग्रेस ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री को पद पर बनाए रखने की घोषणा करने के बाद एक बड़ी कयासबाजी को रोक दिया है। राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से सफाई देना ज़रूरी था। कांग्रेस अभी तक ममता बनर्जी से सीधे टकराव को टालती आ रही है। हो सकता है कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के वास्ते उसे टकराव लेना पड़े। ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम को पहले ही नामंजूर कर दिया था। कम से कम स्वीकार तो नहीं किया था। बल्कि वे मीरा कुमार का नाम सुझा भी चुकी थीं। पर बुधवार की शाम जब अचानक उन्होंने और मुलायम सिंह यादव ने तीन नए नाम सामने रखे तो राष्ट्रीय राजनीति को धक्का लगा। सबसे ज्यादा विस्मय मनमोहन सिंह के नाम को लेकर था। क्या उन्होंने उनके नाम की पेशकश के पहले आगा-पीछा सोचा था? सवाल उनके राष्ट्रपति बनने से ज्यादा प्रधानमंत्री पद छोड़ने का था। इसीलिए संशय यही हुआ कि कहीं ममता ने सोनिया गांधी से मशवरा करके तो यह पेशकश नहीं की है? पर अब सवाल कुछ और हैं। क्या यह ममता बनर्जी की राजनीति है या कुछ और बात है? क्या यह राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति है या कुछ और है? ममता बनर्जी के दिमाग में ये तीन नाम थे तो उन्होंने सोनिया गांधी को सीधे ही क्यों नहीं बता दिए? ऐसी घोषणा प्रेस कांफ्रेंस में करने का मतलब क्या है? क्या इतनी बड़ी बातें अचानक मुलायम सिंह से छोटी सी मुलाकात के बाद उनके दिमाग में आ गईं? आज के ज़माने में जब मोबाइल फोन से लेकर वीडियो कांफ्रेंसिग तक आम बातें हैं, तब क्या इन औपचारिक मुलाकातों के बाद ही बड़े फैसले होते हैं?

Saturday, June 9, 2012

न इधर और न उधर की राजनीति

मंजुल का कार्टून साभार
ममता बनर्जी ने पेंशन में विदेशी निवेश के प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया है। पिछले गुरुवार को हुई कैबिनेट की बैठक में उदारीकरण के प्रस्ताव सामने ही नहीं आ पाए। सरकार दुविधा में नज़र आती है। अब लगता है कि पहले राष्ट्रपति चुनाव हो जाए, फिर अर्थव्यवस्था की सुध लेंगे। पिछले सोमवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद अचानक सरकार आर्थिक उदारीकरण के अपने एजेंडा को तेज करने को उत्सुक नज़र आने लगी। बुधवार को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े विभागों के मंत्रियों की बैठक में तमाम कामों में तेजी लाने का फैसला हुआ। इस साल तकरीबन साढ़े नौ हजार किमी लम्बे राजमार्गों के निर्माण और 4360 किमी लम्बे राजमार्गों के पुनरुद्धार का काम शुरू होना है। दो नए ग्रीनफील्ड हवाई अड्डों, दो नए बंदरगाहों और कम से कम 18,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन की अतिरिक्त क्षमता का सृजन होना है। बुलेट ट्रेन चलाने के लिए एक नए संगठन की स्थापना होनी है। हजारों लाखों करोड़ की परियोजनाएं पिछले कुछ समय से स्वीकृति के लिए पड़ी हैं। आर्थिक उदारीकरण की राह में आगे बढ़ने के लिए विमानन, इंश्योरेंस, पेंशन और रिटेल से जुड़े फैसले करने की घड़ी आ गई है। डीज़ल और रसोई गैस से सब्सिडी खत्म करने का मौका आ गया है और शायद मनरेगा और खाद्य सुरक्षा बिल जैसे लोक-लुभावन कार्यों से हाथ खींचने की घड़ी भी। क्या यह काम आसान होगा? और क्या सरकार के सामने यही समस्या है? लगता है जैसे केन्द्र सरकार आर्थिक सन्निपात और राजनीतिक बदहवासी में है।

Friday, June 1, 2012

राजनीति में लू-लपट का दौर

हिन्दू में केशव का कार्टून
हमारे यहाँ दूसरे की सफेद कमीज़ सामान्यतः ईर्ष्या का विषय होती है। इसलिए हर सफेद कमीज़ वाले को छींटे पड़ने का खतरा रहता है। राजनीति यों भी छींटेबाजी का मुकाम है। इस लिहाज से देखें तो क्या अन्ना हजारे की टीम द्वारा प्रधानमंत्री पर लगाए गए आरोप छींटेबाज़ी की कोशिश हैं? पिछले कई महीनों से खामोश बैठी अन्ना टोली इस बार नई रणनीति के साथ सामने आई है। उसने प्रधानमंत्री सहित कुछ केन्द्रीय मंत्रियों पर आरोप लगाए हैं। ये आरोप पहले भी थे, पर अन्ना-टोली का कहना है कि अब हमारे पास बेहतर साक्ष्य हैं।

दूसरे मंत्रियों की बात छोड़ दें तो प्रधानमंत्री पर जो आरोप लगाए गए हैं वे सन 2006 से 2009 के बीच कोयला खानों के 155 ब्लॉक्स के बारे में हैं जिन्हें बहुत कम फीस पर दे दिया गया। उस दौरान कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री के अधीन था। पहली नज़र में यह बात महत्वपूर्ण लगती है। खासतौर से कुछ महीने पहले एक अखबार में सीएजी की रपट इस अंदाज़ में प्रकाशित हुई थी कि कोई बहुत बड़ा घोटाला सामने आया है। सीएजी की ड्राफ्ट रपट में 10.67 लाख करोड़ के नुकसान का दावा किया गया था। इस लिहाज से यह टूजी मामले से कहीं बड़ा मामला है। पर क्या यह घोटाला है? क्या इसमें प्रधानमंत्री की भूमिका है? क्या इसके आधार पर कोई अदालती मामला बनाया जा सकता है? इन सब बातों पर विचार करने के बजाय सीधे प्रधानमंत्री को आरोप के घेरे में खड़ा करना उचित नहीं है। इसके साथ ही उनके लिए प्रयुक्त शब्द भी सामान्य मर्यादाओं के खिलाफ हैं।

Friday, May 25, 2012

आग सिर्फ पेट्रोल में नहीं लगी है

हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून
भारत में पेट्रोल की कीमत राजनीति का विषय है। बड़ी से बड़ी राजनीतिक ताकत भी पेट्रोलियम के नाम से काँपती है। इस बार पेट्रोल की कीमतों में एक मुश्त सबसे भारी वृद्धि हुई है। इसके सारे राजनीतिक पहलू एक साथ आपके सामने हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि कोई एक राजनीतिक पार्टी ऐसी नहीं है जिसने इस वृद्धि की तारीफ की हो। और जिस सरकार ने यह वृद्धि की है वह भी हाथ झाड़कर दूर खड़ी है कि यह तो कम्पनियों का मामला है। इसमें हमारा हाथ नहीं है। जून 2010 से पेट्रोल की कीमतें फिर से बाजार की कीमतॆं से जोड़ दी गई हैं। बाजार बढ़ेगा तो बढ़ेंगी और घटेगा तो घटेंगी। इतनी साफ बात होती तो आज जो पतेथर की तरह लग रही है वह वद्धि न होती, क्योंकि जून 2010 से अबतक छोटी-छोटी अनेक वृद्धियाँ कई बार हो जातीं और उपभोक्ता को नहीं लगता कि एक मुश्त इतना बड़ा इज़ाफा हुआ है।

Friday, May 18, 2012

क्रिकेट को धंधा बनने से रोकिए

आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग की खबरे आने के बाद बीसीसीआई को पारदर्शी बनाने की ज़रूरत है। उसके खाते आरटीआई के लिए खुलने चाहिए और साथ ही आईपीएल के तमाशे को कड़े नियमन के अधीन लाया जाना चाहिए। ऐसा नहीं हुआ तो यह मसला तमाम बड़े घोटालों की तरह सरकार के गले की हड्डी बन जाएगा। आईपीएल ने जिस तरह की खेल संस्कृति को जन्म दिया है वह खतरनाक है। उससे ज्यादा खतरनाक है इसकी आड़ में चल रही आपराधिक गतिविधियाँ जिनका अभी अनुमान ही लगया जा सकता है। खेल मंत्री अजय माकन ने ठीक माँग की है कि बीसीसीआई खुद को आईपीएल से अलग करे। अभी जिन पाँच खिलाड़ियों पर कार्रवाई की गई है वह अपर्याप्त है, क्योंकि सम्भव है कि इसमें अनेक मोटी मछलियाँ सामने आएं।