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Monday, July 6, 2020

भारत क्या नए शीतयुद्ध का केंद्र बनेगा?


लद्दाख की गलवान घाटी में 15 जून की रात हुए हिंसक संघर्ष के बाद दुबारा कोई बड़ी घटना नहीं हुई है, पर समाधान के लक्षण भी नजर नहीं आ रहे हैं। सन 1962 के बाद पहली बार लग रहा है कि टकराव रोकने का कोई रास्ता नहीं निकला, तो वह बड़ी लड़ाई में तब्दील हो सकता है। दोनों पक्ष मान रहे हैं कि सेनाओं को एक-दूसरे से दूर जाना चाहिए, पर कैसे? अब जो खबरें मिली हैं, उनके अनुसार टकराव की शुरूआत पिछले साल सितंबर में ही हो गई थी, जब पैंगांग झील के पास दोनों देशों के सैनिकों की भिड़ंत हुई थी, जिसमें भारत के दस सैनिक घायल हुए थे।

शुरूआती चुप्पी के बाद भारत सरकार ने औपचारिक रूप से 25 जून को स्वीकार किया कि मई के महीने से चीनी सेना ने घुसपैठ बढ़ाई है। गलवान घाटी में पेट्रोलिंग पॉइंट-14 (पीपी-14) के पास हुई झड़प के बाद यह टकराव शुरू हुआ है। लगभग उसी समय पैंगांग झील के पास भी टकराव हुआ। दोनों घटनाएं 5-6 मई की हैं। उसी दौरान हॉट स्प्रिंग क्षेत्र से भी घुसपैठ की खबरें आईं। देपसांग इलाके में भी चीनी सैनिक जमावड़ा है।

Friday, July 3, 2020

चीन-पाकिस्तान पर नकेल डालने की जरूरत

21 नवंबर 2011 के टाइम का कवर
भारत-चीन सीमा पर गत 16 जून को हुए हिंसक संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच शुरू हुई बातचीत का दौर इन पंक्तियों के प्रकाशन तक किसी न किसी रूप में चल रहा है, पर किसी स्थायी हल के आसार नहीं हैं। वर्तमान घटनाक्रम से हमें दो सबक जरूर सीखने चाहिए। चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। दूसरे घुसपैठ की किसी भी हरकत का उसी समय करारा जवाब देना चाहिए। इसके पहले 1967 में नाथूला और 1986-87 में सुमदोरोंग में करारी कार्रवाइयों के कारण चीन की हिम्मत नहीं पड़ी। लद्दाख में इसबार की घुसपैठ के बाद भारत ने शुरूआती चुप्पी के बाद तीन स्तर पर जवाबी कार्रवाई की है। एक, बड़े स्तर पर सेना की सीमा पर तैनाती। दूसरे, कारोबारी स्तर पर कुछ बड़े फैसले किए, जिनसे चीन को हमारे इरादों का संकेत मिले। तीसरे राजनयिक स्तर पर अपनी बात को दुनिया के सामने रखा और अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल किया है। इस तीसरे कदम का दीर्घकालीन प्रभाव भारत-चीन रिश्तों पर पड़ेगा।


अभी तक का अनुभव है कि चीन के बरक्स भारत की नीति अपेक्षाकृत नरम रही है। बावजूद इसके कि चीन ने भारत में पाक-समर्थित आतंकवाद को खुला समर्थन दिया है। जैशे मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने को प्रस्ताव को पास होने से अंतिम क्षण तक चीन ने रोक कर रखा। एनएसजी की सदस्यता और संरा सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता में अड़ंगे लगाए। अब जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन पर भारतीय संसद के प्रस्ताव पर चीनी प्रतिक्रिया हमारी संप्रभुता पर खुला हमला है। इसे सहन नहीं किया जाना चाहिए। लगता है कि अब हमारी नीति में बदलाव आ रहा है। लद्दाख पर चल रही बातचीत पर काफी कुछ निर्भर करेगा कि हमारी नीति की दिशा क्या होगी। चीनी सेना यदि अप्रेल में हथियाई जमीन छोड़ेगी, तो संभव है कि कड़वाहट ज्यादा न बढ़े। पर चीन यदि अपनी सी पर अड़ा रहा, तो भारत को अपनी नीति में आधारभूत बदलाव करना होगा।


भारतीय विदेश-नीति के बुनियादी तत्वों को स्पष्ट करने की घड़ी भी अब आ रही है। गुट निरपेक्षता की अवधारणा ने लम्बे अरसे तक हमारा साथ दिया, पर आज वह व्यावहारिक नहीं है। आज शीतयुद्ध की स्थिति भी नहीं है और दो वैश्विक गुट भी नहीं है। इसके बावजूद हमें अपने मित्र और शत्रु देशों की दो श्रेणियाँ बनानी ही होंगी। ऑस्ट्रेलिया, जापान, वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देश हैं, जो चीनी उभार की तपिश महसूस कर रहे हैं। हमें उन्हें साथ लेना चाहिए। बेशक हम अमेरिका के हाथ की कठपुतली न बनें, पर चीन को काबू में करने के लिए हमें अमेरिका का साथ लेना चाहिए। इस सवाल को न तो हमें अपने देश की आंतरिक राजनीति की नजर से देखना चाहिए और न अमेरिकी राजनीति के नजरिए से। अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी भी चीन की उतनी ही आलोचक है, जितनी ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी। चीनी अहंकार बढ़ता ही जा रहा है। उसे रोकने के लिए वैश्विक गठबंधन तैयार करने में कोई हमें हिचक नहीं होनी चाहिए। यह नकेल अकेले चीन पर नहीं होगी, बल्कि उसके साथ पाकिस्तान पर भी डालनी होगी। 

Monday, June 29, 2020

सिर्फ फौज काफी नहीं चीन से मुकाबले के लिए

लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ मुठभेड़ के बाद देश के रक्षा विभाग ने एलएसी पर तैनात सैनिकों के लिए कुछ व्यवस्थाओं में परिवर्तन किए हैं। सेना को निर्देश दिए गए हैं कि असाधारण स्थितियों में अपने पास उपलब्ध सभी साधनों का इस्तेमाल करें। खबर यह भी है कि रक्षा मंत्रालय ने सैनिकों के लिए सुरक्षा उपकरण तथा बुलेटप्रूफ जैकेट बनाने वाली कंपनियों से संपर्क किया है और करीब दो लाख यूनिटों का आदेश दिया है। इस बीच पता लगा कि ऐसे उपकरण बनाने वाली बहुसंख्यक भारतीय कंपनियाँ इनमें लगने वाली सामग्री चीन से मँगाती हैं।

क्या हम चीनी सैनिकों से रक्षा के लिए उनके ही माल का सहारा लेंगे? हम यहाँ भी आत्मनिर्भर नहीं हैं? नीति आयोग के सदस्य और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के पूर्व प्रमुख वीके सारस्वत ने चीन से आयात की नीति पर पुनर्विचार करने की सलाह दी है। पीएचडी चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने भी रक्षा सचिव को इस आशय का पत्र लिखा है। बात पहले से भी उठती रही है, पर अब ज्यादा जोरदार तरीके से उठी है।

स्वदेशी कवच

इस सिलसिले में आर्मी डिजाइन ब्यूरो ने ‘सर्वत्र कवच’ नाम से एक आर्मर सूट विकसित किया गया है, जो पूरी तरह स्वदेशी है। उसमें चीनी सामान नहीं लगा है। गत 23 दिसंबर को तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने इसे विकसित करने पर मेजर अनूप मिश्रा को उत्कृष्टता सम्मान भी प्रदान किया था। इस कवच के फील्ड ट्रायल चल रहे हैं, इसलिए फिलहाल हमें चीनी सामग्री वाले कवच भी पहनने होंगे। साथ ही अमेरिका और यूरोप से सामग्री मँगानी होगी, जिसकी कीमत ज्यादा होगी।

Sunday, June 28, 2020

सीमा पर चीन और घर में सियासी शोर!

मंगलवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरकार पर निशाना साधा और सवाल पूछा कि चीन ने जिस जमीन पर कब्जा कर लिया है, उसे वापस कैसे लिया जाएगा? लगता है कि पार्टी ने चीन के साथ वर्तमान तनातनी को लेकर सरकार पर हमले करने की रणनीति तैयार की है। राहुल गांधी ने भी एक वीडियो जारी करके कहा है कि चीन ने लद्दाख के तीन इलाकों में घुसपैठ की है। चीनी घुसपैठ और 20 जवानों की शहादत को लेकर राहुल गांधी लगातार सरकार से तीखे सवाल कर रहे हैं। उन्होंने जापान टाइम्स के एक लेख को ट्वीट कर लिखा है, ‘नरेंद्र मोदी असल में सरेंडर मोदी हैं।’

पार्टी ने शुक्रवार को भारत-चीन सीमा पर शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए ‘शहीदों को सलाम दिवस’ मनाया। इस मौके पर सोनिया गांधी ने वीडियो संदेश के जरिए कहा, देश जानना चाहता है कि अगर चीन ने लद्दाख में हमारी सरजमीन पर कब्जा नहीं किया, तो फिर हमारे 20 सैनिकों की शहादत क्यों और कैसे हुई? मनमोहन सिंह की टिप्पणी भी आई। कुछ फौजी अफसरों की टिप्पणियाँ भी सोशल मीडिया पर प्रकट हुईं, जिनमें सरकार से सवाल पूछे गए हैं। क्या ये टिप्पणियाँ अनायास थीं या किसी ने इशारा करके कराई थीं?

Sunday, June 21, 2020

चीनी दुराभिमान टूटना चाहिए


चीन की स्थिति ‘प्यादे से फर्जी’ वाली है। उसे महानता का इलहाम हो गया है। ऐसी गलतफहमी नाजी जर्मनी को भी थी। लद्दाख में उसने धोखे से घुसपैठ करके न केवल भारत का बल्कि पूरी दुनिया का भरोसा खोया है। ऐसा संभव नहीं कि वैश्विक जनमत को धता बताकर वह अपने मंसूबे पूरे कर लेगा। भारत के 20 सैनिकों ने वीर गति प्राप्त करके उसकी धौंसपट्टी को मिट्टी में मिला दिया है। यह घटना इतिहास के पन्नों में इसलिए याद रखी जाएगी, क्योंकि इसके बाद न केवल भारत-चीन रिश्तों में बड़ा मोड़ आएगा, बल्कि विश्व मंच पर चीन की किरकिरी होगी। उसकी कुव्वत इतनी नहीं कि वैश्विक जनमत की अनदेखी कर सके।

वैश्विक मंच के बाद हमें अपनी एकता पर भी एक नजर डालनी चाहिए। भारत-चीन मसले को आंतरिक राजनीति से अलग रखना चाहिए। शुक्रवार को हुई सर्वदलीय बैठक में हालांकि प्रकट रूप में एकता थी, पर कुछेक स्वरों में राजनीतिक पुट भी था। बैठक में प्रधानमंत्री के एक बयान को तोड़-मरोड़कर पढ़ने की कोशिशें भी हुई हैं। प्रधानमंत्री का आशय केवल इतना था, ‘न कोई हमारी सीमा में घुसा हुआ है, न ही हमारी कोई पोस्ट किसी के कब्जे में है।’ बात कहने के तरीके से ज्यादा महत्वपूर्ण उनका आशय है। हमारा लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, पर इस स्वतंत्रता का उद्देश्य भारतीय राष्ट्र राज्य की रक्षा है। उसे बचाकर रखना चाहिए।

Saturday, June 20, 2020

कुछ ज्यादा ही जोश में है चीनी पहलवान


यह मध्यांतर है, अंत नहीं। भारत-चीन टकराव का फौरी तौर पर समाधान निकल भी जाए, पर यह पूरा समाधान नहीं होगा। यह दो प्राचीन सभ्यताओं की प्रतिस्पर्धा है, जिसकी बुनियाद में हजारों साल पुराने प्रसंग हैं। दूर से इसमें पाकिस्तान हमें दिखाई नहीं पड़ रहा है, पर वह है। वह भी हमारे ही अंतर्विरोधों की देन है। साजिश में नेपाल भी शामिल है। गलवान में जो हुआ, उसके पीछे चीन की हांगकांग, ताइवान, वियतनाम और जापान से जुड़ी प्रतिस्पर्धा भी काम कर रही है। लगता है कि चीनी पहलवान कुछ ज्यादा ही जोश में है और सारी दुनिया के सामने ताल ठोक रहा है। यह जोश उसे भारी पड़ेगा।

गलवान टकराव पर 6 जून की बातचीत शुरू होने के ठीक पहले चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपनी पश्चिमी थिएटर कमांड के प्रमुख के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल शु छीलिंग को भेजा था, जो उनके सबसे विश्वस्त अधिकारी है। पता नहीं वे टकराव को टालना चाहते थे या बढ़ाना, पर टकराव के बाद दोनों देशों जो प्रतिक्रिया है, उसे देखते हुए लगता है कि फिलहाल लड़ना नहीं चाहते।

टकराव होगा, पर कहाँ?

दोनों की इस झिझक के बावजूद ऐसे विशेषज्ञों की कमी नहीं, जो मानते हैं कि भारत-चीन के बीच एक बार जबर्दस्त लड़ाई होगी, जरूर होगी। युद्ध हुआ, तो न हमारे लिए अच्छा होगा और न चीन के लिए। चीन के पास साधन ज्यादा हैं, पर हम इतने कमजोर नहीं कि चुप होकर बैठ जाएं। हमारी फौजी ताकत इतनी है कि उसे गहरा नुकसान पहुँचा दे। हमारा जो होगा, सो होगा। जरूरी नहीं कि टकराव अभी हो और यह भी जरूरी नहीं कि हिमालय में हो।

Saturday, June 13, 2020

चीन का मुकाबला कैसे करें?


भारत और चीन के बीच लद्दाख में चल रहा टकराव टल भी जाए, यह सवाल अपनी जगह रहेगा कि चीन से हमारे रिश्तों की दिशा क्या होगी? क्या हम उसकी बराबरी कर पाएंगे? या हम उसकी धौंस में आएंगे? पर पहले वर्तमान विवाद के पीछे चीनी मंशा का पता लगाने को कोशिश करनी होगी। तीन बड़े कारण गिनाए जा रहे हैं। भारत ने वास्तविक नियंत्रण के पास सड़कों और हवाई पट्टियों का जाल बिछाना शुरू कर दिया है। हालांकि तिब्बत में चीन यह काम काफी पहले कर चुका है, पर वह भारत के साथ हुई कुछ सहमतियों का हवाला देकर कहता है कि ये निर्माण नहीं होने चाहिए।
दूसरा कारण है दक्षिण चीन सागर और हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारतीय नौसेना की भूमिका। हम कमोबेश चतुष्कोणीय सुरक्षा व्यवस्था यानी ‘क्वाड’ में शामिल हैं। यों हम औपचारिक रूप से कहते हैं कि यह चीन के खिलाफ नहीं है। इसी 4 जून को भारत और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्रियों ने एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते पर दस्तखत किए हैं, जिसपर चीनी मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अखबार ने चीनी विशेषज्ञ सु हाओ के हवाले से कहा है कि भारत अपनी डिप्लोमैटिक स्वतंत्रता का दावा करता रहा है, पर देखना होगा कि वह कितना स्वतंत्र है।  

Sunday, May 31, 2020

चीन पर कसती वैश्विक नकेल


भारत और चीन के रिश्तों में आई तल्खी को केवल वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चल रही गतिविधियों तक सीमित करने से हम सही निष्कर्षों पर नहीं पहुँच पाएंगे। इसके लिए हमें पृष्ठभूमि में चल रही दूसरी गतिविधियों पर भी नजर डालनी होगी। पिछले दिनों जब भारत और नेपाल के बीच सीमा को लेकर विवाद खड़ा हुआ, उसके साथ ही लद्दाख और सिक्किम में चीन की सीमा पर भी हरकतें हुईं। यह सब कुछ अनायास नहीं हुआ है। ये बातें जुड़ी हुई हैं।

सूत्र बता रहे हैं कि लद्दाख क्षेत्र में चीनी सैनिक गलवान घाटी के दक्षिण पूर्व में, भारतीय सीमा के भीतर तक आ गए थे। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के उस पार भी चीन ने अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सैटेलाइट चित्रों से इस बात की पुष्टि हुई है कि टैंक, तोपें और बख्तरबंद गाड़ियाँ चीनी सीमा के भीतर भारतीय ठिकानों के काफी करीब तैनात की गई हैं। सामरिक दृष्टि से पिछले साल ही तैयार हुआ भारत का दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्दी मार्ग सीधे-सीधे चीनी निशाने पर आ गया है।

Saturday, May 30, 2020

भारत-चीन टकराव भावी शीतयुद्ध का संकेत


पिछले हफ्ते जब भारत और नेपाल के बीच सीमा को लेकर विवाद खड़ा हुआ, उसके ठीक पहले भारत-चीन सीमा पर कुछ ऐसी घटनाएं हुईं हैं, जिनसे लगता है सब कुछ अनायास नहीं हुआ है। मई के पहले हफ्ते में दोनों देशों की सेनाओं के बीच पैंगांग त्सो के इलाके में झड़पें हुईं थीं। उसके बाद दोनों देशों की सेनाओं के स्थानीय कमांडरों के बीच बातचीत के कई दौर हो चुके हैं, पर लगता है कि तनाव खत्म नहीं हो पाया है। सूत्र बता रहे हैं कि लद्दाख क्षेत्र में चीनी सैनिक गलवान घाटी के दक्षिण पूर्व में, भारतीय सीमा के तीन किलोमीटर भीतर तक आ गए हैं। इतना ही नहीं चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के उस पार भी अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार सैटेलाइट चित्रों से इस बात की पुष्टि हुई है कि टैंक, तोपें और बख्तरबंद गाड़ियाँ चीनी सीमा के भीतर भारतीय ठिकानों के काफी करीब तैनात की गई हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि पिछले साल ही तैयार हुआ दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्दी मार्ग सीधे-सीधे चीनी निशाने पर आ गया है। 
गलवान क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा और चीनी दावे की रेखा में कोई बड़ा अंतर नहीं है। मोटे तौर पर यह जमावड़ा चीनी सीमा के भीतर है। पर खबरें हैं कि चीनी सैनिक एलएसी के तीन किलोमीटर भीतर तक आ गए थे। चाइनीज क्लेम लाइन (सीसीएल) को पार करने के पीछे चीन की क्या योजना हो सकती है? शायद चीन को भारतीय सीमा के भीतर हो रहे निर्माण कार्यों पर आपत्ति है। यह भी सच है कि इस क्षेत्र में ज्यादातर टकराव इन्हीं दिनों में होता है, क्योंकि गर्मियाँ शुरू होने के बाद सैनिकों की गतिविधियाँ तेज होती हैं। गलतफहमी में भी गश्ती दल रास्ते से भटक जाते हैं, पर निश्चित रूप से चीन के आक्रामक राजनय का यह समय है। इसलिए सवाल पैदा हो रहा है कि आने वाले समय में कोई बड़ा टकराव होगा? क्या यह एक नए शीतयुद्ध की शुरुआत है?

Sunday, October 20, 2019

मामल्लापुरम से निकले चीनी डिप्लोमेसी के इशारे


चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की यात्रा के ठीक पहले भारतीय और चीनी मीडिया में इस बात को रेखांकित किया गया कि तमिलनाडु के प्राचीन नगर मामल्लापुरम (महाबलीपुरम) का चयन क्यों किया और किसने किया। खबरें थीं कि चीन ने खासतौर से इस जगह को चुना। चीनी डिप्लोमेसी की विशेषता है कि वे संकेतों का सोच-समझकर इस्तेमाल करते हैं। तमिलनाडु के साथ चीन के ईसा की पहली-दूसरी सदी के रिश्ते हैं। छठी-सातवीं सदी में पल्लव राजाओं ने चीन में अपने दूत भेजे थे। सातवीं सदी में ह्वेनसांग इस इलाके में आए थे।
सन 1956 में तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई भी मामल्लापुरम आए थे। क्या चीन ने जानबूझकर ऐसी जगह का चुनाव किया, जो भगवा मंडली के राजनीतिक प्रभाव से मुक्त है? शायद इन रूपकों और प्रतीकों की चर्चा होने की वजह से ही हमारे विदेश मंत्रालय ने सफाई पेश की कि इस जगह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुना था। मोदी ने शी के स्वागत में खासतौर से तमिल परिधान वेष्टी को धारण किया।

Sunday, October 13, 2019

मामल्लापुरम से आगे का परिदृश्य


चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की दो दिन की भारत यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच पैदा हुई कड़वाहट एक सीमा तक कम हुई है। फिर भी इस बातचीत से यह निष्कर्ष नहीं निकाल लेना चाहिए कि हमारे रिश्ते बहुत ऊँचे धरातल पर पहुँच गए हैं। ऐसा नाटकीय बदलाव कभी संभव नहीं। दिसम्बर 1956 में भी चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई इसी मामल्लापुरम में आए थे। उन दिनों हिन्दी-चीनी भाई-भाई का था। उसके छह साल बाद ही 1962 की लड़ाई हो गई। दोनों के हित जहाँ टकराते हैं, वहाँ ठंडे दिमाग से विचार करने की जरूरत है।  विदेश नीति का उद्देश्य दीर्घकालीन राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना होता है।
भारतीय विदेश नीति के सामने इस समय तीन तरह की चुनौतियाँ हैं। एक, राष्ट्रीय सुरक्षा, दूसरे आर्थिक विकास की गति और तीसरे अमेरिका, चीन, रूस तथा यूरोपीय संघ के साथ रिश्तों में संतुलन बनाने की। मामल्लापुरम की शिखर वार्ता भले ही अनौपचारिक थी, पर उसका औपचारिक महत्व है। पिछले साल अप्रेल में चीन के वुहान शहर में हुए अनौपचारिक शिखर सम्मेलन से इस वार्ता की शुरुआत हुई है, जिसका उद्देश्य टकराव के बीच सहयोग की तलाश।
दोनों देशों के बीच सीमा इतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी बड़ी चिंता चीनी नीति में पाकिस्तान की केन्द्रीयता से है। खुली बात है कि चीन न केवल पैसे से बल्कि सैनिक तकनीक और हथियारों तथा उपकरणों से भी पाकिस्तान को लैस कर रहा है। भारत आने के पहले शी चिनफिंग ने इमरान खान को बुलाकर उनसे बात की थी। सही या गलत यह एक प्रकार का प्रतीकात्मक संकेत था। सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता और एनएसजी में चीनी अड़ंगा है। मसूद अज़हर को लेकर चीन ने कितनी आनाकानी की।

Wednesday, October 19, 2016

चीनी मीडिया : व्यापार असंतुलन पर भारत को भौंकने दो

चीन के सरकारी अंग्रेजी अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' के कुछ लेखों ने भारत में पाठकों का ध्यान खींचा है। इस हफ्ते यह तीसरा लेख है जिसपर मेरा ध्यान गया है। इसके लेखक गौरव त्यागी हैं जो भारतीय मूल के हैं, जो चीन में ही रहते हैं। उनके बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, पर उनके लेख की टोन बताती है कि वे चीन को व्यापारिक परामर्श दे रहे हैं। इसका शीर्षक है 'चीनी कम्पनियों को भारत में निवेश करने के बजाय आंतरिक साधनों पर ध्यान देना चाहिए।'  यह  लेख 18 अक्तूबर को प्रकाशित हुआ है।इसमें 'भारतीय अधिकारियों को भौंकने दो' जैसे शब्द संदोह पैदा करते हैं। हैरत होती है कि इतना सतही किस्म का लेख इस तरह की भाषा के साथ चीन के राष्ट्रीय मीडिया में जगह बनाए। हो सकता है कि यह वास्तव में किसी भारतीय ने लिखा हो, पर मुझे संदेह है। इस लेख में गहराई नहीं है और सतही सी जानकारी या खामखयाली पर आधारित लगता है। फिर भी इसे पढ़िए। इससे यह जरूर समझ में आता है कि विदेशी पाठकों को सम्बोधित करने वाले चीन के सरकारी मीडिया का रुख क्या है और क्यों है। लेख के मुख्य अंशों का हिन्दी अनुवाद नीचे पेश हैः-

हाल में भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया में चीनी उत्पादों के बॉयकॉट की बातें काफी प्रकाशित हुई हैं, पर मुझपर यकीन कीजिए मुझे भारतीय समझ से वाकिफ हूँ। यह सिर्फ लफ्फाजी है। कई वजह से भारतीय उत्पाद, चीनी माल से टक्कर नहीं ले सकते।

एक बात साफ है कि भारत इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में पिछड़ा है। पूरे देश को जोड़ने के लिए अब भी  सड़कों और राजमार्गों की जरूरत है। भारत बिजली और पानी की भारी किल्लत है। सबसे खराब यह कि देश के हरेक सरकारी विभाग में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार भरा पड़ा है। देश के राजनेता बजाय चीन से रिश्ते बेहतर करने के पश्चिमी देशों पर निहाल हो रहे हैं। अमेरिका किसी का दोस्त नहीं है। चूंकि अमेरिका को चीन के विकास और उसके वैश्विक शक्ति बनने से ईर्ष्या है, इसलिए वह भारत को इस्तेमाल कर रहा है।

Tuesday, October 18, 2016

पाकिस्तान अलग-थलग नहीं पड़ा

डीएनए में मंजुल का कार्टून। मोदी- आतंक का मदरशिप। शी-बहुत आकर्षक।
एलओसी पर भारत के सर्जिकल स्ट्राइक्स से देश के भीतर मोदी सरकार को राजनीतिक रूप से ताकत मिली है। हालांकि इसके राजनीतिक दोहन की भाजपा विरोधियों ने निन्दा की है, पर वे सरकार को इसका श्रेय लेने से रोक भी नहीं सकते। बावजूद इसके पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय राजनय में अलग-थलग करने की मोदी सरकार की कोशिशों को उस हद तक सफलता भी नहीं मिली है, जितना दावा किया जा रहा है।

नरेन्द्र मोदी को ब्रिक्स देशों के गोवा में हुए सम्मेलन में पाकिस्तान के खिलाफ आवाज बुलंद करने का मौका मिला भी। उन्होंने कहा कि हमारा पड़ोसी आतंकवाद की जन्मभूमि है। दुनिया भर के आतंकवाद के मॉड्यूल इसी (पाकिस्तान) से जुड़े हैं। वह आतंकियों को पनाह देता है और आतंकवाद की सोच को भी बढ़ावा देता है। उन्होंने पाकिस्तान को आतंक का 'मदर-शिप' बताया। उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिक्स को इस खतरे के खिलाफ एक सुर में बोलना चाहिए।

मोदी की इस अपील के बावजूद चीन और रूस ने जो रुख अपनाया, उससे हमें निष्कर्ष निकालना चाहिए कि ये देश हमारी समस्या को अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का हिस्सा नहीं मानते है। इतना ही नहीं चीन ने गोवा सम्मेलन के दौरान और उसके बाद साफ-साफ पाकिस्तान के समर्थन में बयान दिए। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने मोदी के बयान के बाद कहा, “We should also address issues on the ground with concrete efforts and a multi-pronged approach that addresses both symptoms and root causes.” यह पाकिस्तान का नजरिया है कि कश्मीर की मूल समस्या का समाधान किए बगैर आतंकवाद की समस्या का समाधान सम्भव नहीं है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने अपने वक्तव्य में आतंकवाद का जिक्र भी नहीं किया।

ब्रिक्स 109 पैराग्राफ के गोवा घोषणापत्र में उड़ी में हमले का नाम लिए बगैर सामान्य सा हवाला दिया गया। दस्तावेज में आतंकवादी गिरोहों के नाम पर ISIL और Jabhat Al-Nursra के नाम हैं, पर लश्करे तैयबा और जैशे मोहम्मद के नाम नहीं हैं। इसपर भारत के आर्थिक मामलों के विदेश सचिव अमर सिन्हा का कहना था कि दोनों पाकिस्तानी संगठन भारत के विरुद्ध केन्द्रित हैं, हम इन संगठनों के नाम जुड़वाने में कामयाब नहीं हो पाए।

Wednesday, June 24, 2015

दक्षिण एशिया में उप-क्षेत्रीय सहयोग के नए द्वार

सोमवार को चीन ने नाथूला होकर कैलाश मानसरोवर तक जाने का दूसरा रास्ता खोल दिया गया. चीन ने भारत के साथ विश्वास बहाली के उपायों के तहत यह रास्ता खोला है. इस रास्ते से भारतीय तीर्थ यात्रियों को आसानी होगी. धार्मिक पर्यटन के अलावा यहाँ आधुनिक पर्यटन की भी अपार सम्भावनाएं हैं. पर सिद्धांततः यह आर्थिक विकास के नए रास्तों को खोलने की कोशिश है.

Sunday, May 17, 2015

चीन के साथ संवाद

नरेन्द्र मोदी की चीन यात्रा का महत्वपूर्ण पहलू है कुछ कठोर बातें जो विनम्रता से कही गईं हैं। भारत और चीन के बीच कड़वाहट के दो-तीन प्रमुख कारण हैं। एक है सीमा-विवाद। दूसरा है पाकिस्तान के साथ उसके रिश्तों में भारत की अनदेखी। तीसरे दक्षिण चीन तथा हिन्द महासागर में दोनों देशों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा। चौथा मसला अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का है। भारत लगातार  आतंकवाद को लेकर पाकिस्तानी भूमिका की शिकायत करता रहा है। संयोग से पश्चिम चीन के शेनजियांग प्रांत में इस्लामी कट्टरतावाद सिर उठा रहा है। चीन को इस मामले में व्यवहारिक कदम उठाने होंगे। पाकिस्तानी प्रेरणा से अफगानिस्तान में भी चीन अपनी भूमिका देखने लगा है। यह भूमिका केवल इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि अफगान सरकार और तालिबान के बीच मध्यस्थता से भी जुड़ी है।   

Thursday, May 14, 2015

चीनी जादूनगरी से क्या लाएंगे मोदी?

अपनी सरकार की पहली वर्षगाँठ के समांतर हो रही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा के अनेक निहितार्थ हैं. सरकार महंगाई, किसानों की आत्महत्याओं और बेरोजगारी की वजह से दबाव में है वहीं वह विदेशी मोर्चे पर अपेक्षाकृत सफल है. चीन यात्रा को वह अपनी पहली वर्षगाँठ पर शोकेस करेगी. देश के आर्थिक रूपांतरण में भी यह यात्रा मील का पत्थर साबित हो सकती है. वैश्विक राजनीति तेजी से करवटें ले रही है. हमें एक तरफ पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्तों को परिभाषित करना है वहीं चीन और रूस की विकसित होती धुरी को भी ध्यान में रखना है.

Sunday, August 31, 2014

भारत-जापान रिश्तों का सूर्योदय

जापान में बौद्ध धर्म चीन और कोरिया के रास्ते गया था। पर सन 723 में बौद्ध भिक्षु बोधिसेन का जापान-प्रवास भारत-जापान रिश्तों में मील का पत्थर है। बोधिसेन आजीवन जापान में रहे। भारत में जापान को लेकर और जापान में भारत के प्रति श्रद्धा का भाव है। बोधिसेन को जापान के सम्राट शोमु ने निमंत्रित किया था। वे अपने साथ संस्कृत का ज्ञान लेकर गए थे और माना जाता है कि बौद्ध भिक्षु कोबो दाइशी ने 47 अक्षरों वाली जापानी अक्षरमाला को संस्कृत की पद्धति पर तैयार किया था। जापान के परम्परागत संगीत पर नृत्य पर भारतीय प्रभाव भी है। पर हम जापानियों को उनकी कर्म-निष्ठा के कारण पहचानते हैं। हाल के वर्षों में चीन ने दुनिया में अपनी धाक कायम की है, पर जापानियों ने उन्नीसवीं सदी के मध्य से ही अपना सिक्का बुलंद कर रखा है।

अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी, फ्रांस समेत तमाम देशों के साथ हमारे रिश्ते रहे हैं, पर दुनिया में एक देश ऐसा है, जिसे लेकर भारतीय जन-मन बेहद भावुक है। हमारे वैदेशिक सम्बन्धों में अनेक ऐसे मौके आए जब जापान ने हमारा विरोध किया, खासतौर से 1998 में एटमी धमाकों के बाद फिर भी हमारे यहाँ जापान की छवि कभी खराब नहीं हुई। आर्थिक प्रगति और पश्चिमी प्रभाव के बाद भी दोनों देशों में परम्परागत मूल्य बचे हैं। दोनों देश देव और असुर को इन्हीं नामों से पहचानते हैं। जापान को हम सोनी, टयोटा, होंडा और सुज़ुकी के कारण भी जानते हैं। दिल्ली की शान मेट्रो के लिए हमें जापान ने आर्थिक मदद दी थी। सुभाष बोस और रासबिहारी बोस जैसे स्वतंत्रता सेनानी भारत-जापान के रिश्तों की कड़ी रहे हैं। जापानी लोग जस्टिस राधा विनोद पाल के मुरीद हैं, जिन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सुदूर पूर्व के लिए बने मिलिटरी ट्रिब्यूनल के सदस्य जज के रूप में दूसरे जजों के खिलाफ जाकर अकेले जापान के पक्ष में फैसला सुनाया था।

Monday, May 6, 2013

इस स्टूडियो-उन्माद को भी बन्द कीजिए


अच्द्दा हुआ कि लद्दाख में चीनी फौजों की वापसी के बाद तनाव का एक दौर खत्म हुआ, पर यह स्थायी समाधान नहीं है। भारत-चीन सीमा उतनी अच्छी तरह परिभाषित नहीं है, जितना हम मान लेते हैं। दूसरे हम पूछ सकते हैं कि हमारी सेना अपनी ही सीमा के अंदर पीछे क्यों हटी? इस सवाल का जवाब बेहतर हो कि राजनयिक स्तर पर हासिल किया जाए। पिछले हफ्ते कई जगह कहा जा रहा था कि भारत सॉफ्ट स्टेट है। सरकार ने शर्मनाक चुप्पी साधी है। बुज़दिल, कायर, दब्बू, नपुंसक। खत्म करो पाकिस्तान के साथ राजनयिक सम्बन्ध। तोड़ लो चीन से रिश्ते। मिट्टी में मिला दी हमारी इज़्ज़त। इस साल जनवरी में जब दो भारतीय सैनिकों की जम्मू-कश्मीर सीमा पर गर्दन काटे जाने की खबरें आईं तब लगभग ऐसी प्रतिक्रियाएं थीं। और फिर जब लद्दाख में चीनी घुसपैठ और सरबजीत सिंह की हत्या की खबरें मिलीं तो इन प्रतिक्रयाओं की तल्खी और बढ़ गई। टीवी चैनलों के शो में बैठे विशेषज्ञों की सलाह मानें तो हमें युद्ध के नगाड़े बजा देने चाहिए। सरबजीत का मामला परेशान करने वाला है, पर मीडिया ने उसे जिस किस्म का विस्तार दिया वह अवास्तविक है। हम भावनाओं में बह गए। सच यह है कि जब सुरक्षा और विदेश नीति पर बात होती है तो हम उसमें शामिल नहीं होते। उसे बोझिल और उबाऊ मानते हैं। और जब कुछ हो जाता है तो बचकाने तरीके से बरताव करने लगते हैं। हमने 1965, 1971 और 1999 की लड़ाइयों में पाकिस्तान के साथ राजनयिक रिश्ते नहीं तोड़े तो आज तोड़ने वाली बात क्या हो गईहम बात-बात पर इस्रायली और अमेरिकी कार्रवाइयों का जिक्र करते हैं। क्या हमारे पास वह ताकत है? और हो भी तो क्या फौरन हमले शुरू कर दें? किस पर हमले चाहते हैं आप?  बेशक हम राष्ट्र हितों की बलि चढ़ते नहीं देख सकते, पर हमें तथ्यों की छान-बीन करने और बात को सही परिप्रेक्ष्य में समझना भी चाहिए। 

Sunday, April 28, 2013

चीनी रिश्तों की जटिलता को समझिए


भारत और चीन के बीच जितने अच्छे रिश्ते व्यापारिक धरातल पर हैं उतने अच्छे राजनीतिक मसलों में नहीं हैं। लद्दाख का विवाद कोई बड़ी शक्ल ले सके पहले ही इसका हल निकाल लिया जाना चाहए। पर उसके पहले सवाल है कि क्या यह विवाद अनायास खड़ा हो गया है या कोई योजना है। हाल के वर्षों में चीन के व्यवहार में एक खास तरह की तल्खी नज़र आने लगी है। इसे गुरूर भी कह सकते हैं। यह गुरूर केवल भारत के संदर्भ में ही नहीं है। उसके अपने दूसरे पड़ोसियों के संदर्भ में भी है। जापान के साथ एक द्वीप को लेकर उसकी तनातनी काफी बढ़ गई थी। दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज को लेकर वियतनाम के साथ उसके रिश्तों में तल्खी आ गई है। संयोग से भारत भी उस विवाद में शामिल है। दक्षिणी चीन सागर में अधिकार को लेकर चीन का वियतनाम, फिलीपींस, ताइवान, ब्रुनेई और मलेशिया के साथ विवाद है। चीन इस पूरे सागर पर अपना दावा जताता है जिसका पड़ोसी देश विरोध करते है। चीन के सबसे अच्छे मित्रों में पाकिस्तान का नाम है। यह इसलिए है कि हमारा पाकिस्तान के साथ विवाद है या पाकिस्तान ने चीन का साथ इसलिए पकड़ा है कि वह भविष्य में भी हमारा प्रतिस्पर्धी रहेगा, कहना मुश्किल है। 

चीनी घुसपैठ गम्भीर है, चिंतनीय नहीं

चीनी के साथ हमारा सीमा विवाद जिस स्तर का है उसके मुकाबले पाकिस्तान के साथ विवाद छोटा है, बावजूद इसके चीन के साथ हमारे रिश्तों में वैसी कड़वाहट नहीं है जैसी पाकिस्तान के साथ है। बुनियादी तौर पर पाकिस्तान का इतिहास 66 साल पुराना है और चीन का कई हजार साल पुराना। वह आज से नहीं हजारों साल से हमारा प्रतिस्पर्धी है। यह प्रतिस्पर्धा पिछले कुछ सौ साल से कम हो गई थी, क्योंकि भारत और चीन दोनों आर्थिक शक्ति नहीं रहे। पर अब स्थिति बदल रही है। बेशक हमारे सीमा विवाद पेचीदा हैं, पर दोनों देश उन्हें निपटाने के लिए लम्बा रास्ता तय करने को तैयार हैं। चीन हमें घेर रहा है या हम चीन की घेराबंदी में शामिल हैं, यह बात दोनों देश समझते हैं। फिर भी लद्दाख में चीनी घुसपैठ किसी बड़े टकराव का कारण नहीं बनेगी। चीन इस वक्त जापान के साथ टकराव में है और भारत से पंगा लेना उसके हित में नहीं।