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Monday, January 30, 2017

मुलायम की हाँ या ना?

कौन सी खबर सही है?

यूपी में सपा के पारिवारिक घटनाक्रम को शुरू से ही ड्रामे की संज्ञा दी जाती रही। एक तबके को विश्वास था कि यह अखिलेश की बहादुरी और साफ छवि है, जिसकी अंतिम विजय हुई। पर एक तबके का यह कहना था कि यह छवि बनाने का ड्रामा है। जो भी है, पर मीडिया की कवरेज पर ध्यान दें तो यह ड्रामा वहाँ भी नजर आता है। आज के टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है कि मुलायम सिंह ने कहा कि मैं प्रचार नहीं करूँगा। टाइम्स नाउ ने मुलायम सिंह की बाइट भी दिखाई। इसी ग्रुप के हिन्दी अखबार NBT का कहना है कि मुलायम को ये साथ नापसंद है। पर इसी ग्रुप  के अखबार इकोनॉमिक टाइम्स की खबर है कि मुलायम 12 फरवरी से प्रचार करेंगे। अब आपकी इच्छा जिस खबर पर चाहें भरोसा करें। 
Mulayam rejects SP-Cong tie-up, won’t campaign for alliance

LUCKNOW/DELHI: On a day, his son and UP CM Akhilesh Yadav and Congress vice-president Rahul Gandhi showcased the SP-Congress alliance with a road show in Lucknow, SP patriarch Mulayam Singh Yadav struck a discordant note, rejecting the tie-up and refusing to campaign for the new political alignment.
Talking to a news agency in Delhi, Mulayam said SP was capable of winning the election and forming a government on its own and there was no need for any alliance. "We contested the elections alone and we got majority and formed the government," Mulayam said referring to the 2012 assembly polls. Read full story here

आज के इकोनॉमिक टाइम्स की खबर है कि मुलायम सिंह 12 फरवरी से प्रचार करेंगे। 

Mulayam Singh Yadav to start campaigning for Samajwadi Party from February 12
On Flight From Lucknow: SP patriarch Mulayam Singh Yadav has said that he will start campaigning for the party from February 12 once the process of filing nominations is over. Mulayam added the SP government led by his son and Uttar Pradesh Chief Minister Akhilesh Yadav has done good work.
The 75-year-old SP leader was flying to New Delhi from Lucknow on Sunday when ET caught up with him on the flight. In an almost hour-long conversation, Mulayam said he did everything a father could do for his son.
“Sab kuch de diya hai usse. Aakhir beta hai mera. Kissi aur ne yeh nahi kiya hai, (Punjab CM Parkash Singh) Badal ko dekh lijiye (Have given everything to my son. After all, he is my son. Look at Badal. He is 89, but still hasn’t handed over the party to his son. Read full story here

Tuesday, August 30, 2016

जब 2010 में कश्मीर गया था सर्वदलीय शिष्टमंडल

कश्मीर में 52 दिन से लगा कर्फ़्यू हट जाने के बाद ज्यादा बड़ा सवाल सामने है कि अब क्या किया जाए? हिंसा का रुक जाना समस्या का समाधान नहीं है। वह किसी भी दिन फिर शुरू हो सकती है। इसका स्थायी समाधान क्या है? कई महीनों से सुनाई पड़ रहा है कि यह राजनीतिक समस्या है और कश्मीर के लोगों से बात करनी चाहिए। बहरहाल शांति बहाली और सभी पक्षों से वार्ता करने के लिए सभी दलों के प्रतिनिधि 4 सितंबर को कश्मीर जाएंगे। इस दल का नेतृत्व गृहमंत्री राजनाथ सिंह करेंगे। इसके सामने भी सवाल होगा कि किससे करें और क्या बात करें? इसके पहले सन 20 सितम्बर 2010 को इसी प्रकार का एक संसदीय दल कश्मीर गया था। उसने वहाँ किस प्रकार की बातें कीं, यह जानना रोचक होगा। 4 सितम्बर की यात्रा के पहले एक नजर सन 2010 के कश्मीर के हालात पर डालना भी उपयोगी होगा।

इस प्रतिनिधि मंडल की यात्रा की खबर पढ़ें हिन्दू की वैबसाइट में यहाँ। 20 सितम्बर 2010 की यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया की वैबसाइट में छपी है, जिसके मुख्य अंश इस प्रकार हैंः-

All-party delegation in Kashmir interacts with 'open mind'
SRINAGAR: Union Home Minister P Chidambaram on Monday said the all-party delegation has come to Jammu and Kashmir with an 'open mind' and hopes to 'carve out a path for taking the region out of its present cycle of violence'.
"The team has come with an open mind and the main purpose was to interact with people, listen to them patiently," said Chidambaram.
"We are here to listen to your views, we will give you a patient hearing, what you think we need to do, in order to bring to the people of Jammu and Kashmir, the hope and the belief that their honour and dignity and their future are secure as part of India," he added.
PDP President Mehbooba Mufti did not meet the delegation but sent senior leader Nizamuddin Bhatt. who told reporters later 'although we were given just 15 minutes to put our point' , we have told the delegation that "all suggestions from the mainstream or separatist quarters should be considered."

Thursday, June 9, 2016

नाभिकीय अप्रसार और भारत

The New York Times Trips Up on India and the NSG

India must be held accountable for the commitments it made in 2005, when the nuclear deal with the United States was first struck, and not for the sins of others.

The New York Times is free to take whatever position it likes on any issue and if it believes India should not be admitted into the Nuclear Suppliers Group, it has every right to write an editorial advocating ‘No Exceptions for a Nuclear India’.

What it ought not to do is build its argument on faulty analysis, misrepresentation and factual inaccuracies. What follows is a paragraph-by-paragraph explanation of how the newspaper – that I have read and liked for years – has gone wrong, horribly wrong in this editorial.

Para 1
America’s relationship with India has blossomed under President Obama, who will meet with Prime Minister Narendra Modi this week. Ideally, Mr. Obama could take advantage of the ties he has built and press for India to adhere to the standards on nuclear proliferation to which other nuclear weapons states adhere.

Here, the NYT makes a huge assumption: that there are “standards on nuclear proliferation to which other nuclear weapons states adhere” and to which India doesn’t. The ‘other nuclear weapons states’ are the United States, Russia, China, France and Britain (the N-5). The main standard to which the N-5 are meant to adhere is the prescription set out in Article 1 of the Treaty on the Non-Proliferation of Nuclear Weapons (NPT)  to not provide nuclear weapons or knowhow or assistance to non-nuclear weapon states. Article 6 also applies to them but is
non-binding: to “pursue negotiations in good faith on effective measures relating to cessation of the nuclear arms race at an early date and to nuclear disarmament, and on a treaty on general and complete disarmament under strict and effective international control.”

Thursday, May 26, 2016

मोदी सरकार @दो साल

 Prime Minister Narendra Modi and Bharatiya Janata Party President Amit Shah. Credit: Reuters.
मोदी सरकार के दो साल पूरे होने पर राजनीति, प्रशासन और अर्थ-व्यवस्था को एकसाथ आँका जाएगा। राजनीति का मतलब केवल चुनावों में प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। मोदी सरकार की पिछले दो साल में सबसे बड़ी विफलता है अल्पसंख्यकों के मन में बैठा भय। एक बड़ा तबका मानता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का छिपा एजेंडा सामने आ रहा है। मुसलमान वोटर मोदी के नेतृत्व से नाराज है। पार्टी नेतृत्व ने स्थिति को सुधारने की कोशिश भी नहीं की है। बेशक बीजेपी हिन्दू राष्ट्रवाद से जुड़ी पार्टी है। उसे मुसलमानों का एकमुश्त समर्थन मिलने की उम्मीद करनी भी नहीं है, पर देश की प्रशासनिक व्यवस्था हाथ में लेने के बाद उसकी जिम्मेदारी है कि वह मुसलमानों के मन में बैठे डर को दूर करे। 

मोदी सरकार ने 'बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ', 'स्वच्छ भारत', 'मेक इन इंडिया' और 'सबका साथ-सबका विकास' जैसे नारों को लेकप्रिय बनाया। हमें देश को इन भावनाओं से जोड़ने की जरूरत है और इन बातों में नारों की भूमिका होती है। गांधी से लेकर माओ जे दुंग ने अतीत में नारों की मदद से ही अपने सामूहिक अभियान छेड़े थे। पर नारों को जमीन पर व्यावहारिक रूप से उतरना भी चाहिए। वे केवल प्रचारात्मक नारे नहीं हो सकते। जनता की उनमें भागीदारी होनी चाहिए।

मोदी सरकार बनने के बाद केन्द्र सरकार के सचिवालय में काम बढ़ा है। तमाम मंत्री अपना पूरा समय दफ्तरों में लगा रहे हैं। विदेश, बिजली, रेलवे, रक्षा, विदेश व्यापार, उद्योग, परिवहन और इसी तरह के कुछ दूसरे मंत्रालयों में काफी अच्छा काम हुआ है। बड़े नीतिगत बदलाव भी हुए हैं। संयोग से वैश्विक अर्थ-व्यवस्था के लिए खराब समय चल रहा है। इसलिए सबसे बड़ी चुनौती वित्त मंत्रालय के सामने है। आर्थिक उदारीकरण का काम धीमी गति से चल रहा है। यह गति यूपीए के शासन में भी धीमी थी। देश की राजनीतिक ताकतें उदारीकरण का मतलब अपने-अपने तरीके से निकाल रही हैं। मोदी सरकार और उससे पहले मनमोहन सरकार की कोशिश देश में पूँजी निवेश के माहौल को बेहतर बनाने की थी। मनमोहन सरकार को भी बीजेपी के अलावा अपनी ही पार्टी के विरोध का सामना करना होता था।

Friday, May 6, 2016

दिल्ली पुलिस के ऑपरेशन की कवरेज

नवभारत टाइम्स
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 4 मई को बड़ी कामयाबी का दावा किया। उसने बड़ा ऑपरेशन करते हुए 13 व्यक्तियों को हिरासत में लिया है, जिनपर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है। पुलिस का दावा है कि जैश के इस इंडियन मॉड्यूल पर छह महीनों से नजर रखी जा रही थी। इस मामले की कवरेज और उसके संतुलन पर भी ध्यान देना जरूरी होगा।

स्पेशल सेल के स्पेशल सीपी अरविंद दीप के मुताबिक राजधानी क्षेत्र में बहुत दिनों से कोई विस्फोट नहीं हुआ था इसलिए ये भीड़भाड़ वाले इलाके में ये विस्फोट करने वाले थे। समय से ये मॉड्यूल सामने न आता तो दिल्ली में कोई बड़ा धमाका होना पक्का था।  पकड़े गए 13 व्यक्तियों में से साजिद को दिल्ली के चांद बाग से, समीर को यूपी के लोनी से और शाकिर को देवबंद से गिरफ्तार किया गया। इन तीनों को पुलिस ने पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया गया जहां से इनको 10 दिन की पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया।

पुलिस का दावा है कि साजिद इस स्लीपर सेल का मास्टरमाइंड साजिद है। वह दिल्ली का रहने वाला है। पुलिस का कहना है कि कुछ दिनों पहले घर के बेसमेंट में आईईडी बनाते वक्त धमाका हुआ था। इसमें साजिद के हाथ में चोट लगी थी। इसके बाद से ही वह जांच एजेंसी के रडार पर आ गया था।

पकड़े गए व्यक्तियों के परिवारों और स्थानीय लोगों ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। परिवारवालों का कहना है कि उनके बच्चे बेकसूर हैं। वहीं, स्पेशल सेल का कहना है कि दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल आतंकियों के इस नेटवर्क पर करीब छह महीनों से नजर रख रही थी। इस ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए स्पेशल सेल की 12 टीमें लगाई गईं, जिनमें स्पेशल सेल के 20 टॉप अफसर शामिल हैं।

ज्यादातर अखबारों में यह खबर पुलिस सूत्रों के अनुसार है। कुछ अखबारों ने चांद बाग इलाके में जाकर पकड़े गए व्यक्तियों के परिवारों से भी बात की है। इंटरनेट पर कैचन्यूज ने 5 मई को इस इलाके के लोगों से बात करके भी खबर लगाई है। कैचन्यूज के संवाददाता ने लिखा हैः-

बुधवार की सुबह दिल्ली की तेज गर्मी में एक खबर ने लगभग आग लगा दी. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दावा किया है कि दिल्ली के गोकलपुरी, गाज़ियाबाद के लोनी और सहारनपुर के देवबंद इलाक़ों से तीन लड़को को गिरफ्तार किया है जिनके संबंध पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद से हैं.

सेल ने कुल 13 लड़कों को अलग-अलग इलाकों से हिरासत में लिया था. इनमें छह लड़के गोकलपुरी के चांद बाग़ इलाके के रहने वाले हैं.

स्पेशल सेल का दावा है कि इन लड़कों का जैश से संबंध का पता एजेंसी को 18 अप्रैल को चला था. गिरफ्तारी के बाद स्पेशल सेल ने इनसे पूछताछ की है. इसके बाद सेल ने कहा है कि चांद बाग़ के मुहम्मद साजिद ने पूछताछ में जैश-ए मुहम्मद से अपने संबंध कुबूल कर लिए हैं. 

स्पेशल सेल साजिद को ही इस मॉड्यूल का मुखिया बता रही है. मुहम्मद साजिद से मिली जानकारी और उसके मोबाइल से मिले नंबरों के आधार पर सेल ने बाद में इलाके के पांच और लड़कों को मंगलवार की रात 11 बजे के आसपास चांद बाग़ इलाके से हिरासत में लिया था.
इस मामले को देख रहे वकील एमएस खान का कहना है कि पुलिस ने सिर्फ तीन युवकों को गिरफ्तार किया है. संभव है कि बाकियों को जल्द ही छोड़ दिया जायेगा.

कैच न्यूज़ ने इलाके का दौरा करके गिरफ्तार युवकों की असलियत जानने की कोशिश की. जिन छह लड़कों को चांद बाग़ से पुलिस ने उठाया है. वे सभी तब्लीगी जमात से जुड़े हुए हैं. सभी पांचों वक़्त की नमाज़ के पाबंद, दीन की शिक्षा फैलाना ही इनका काम था.

जमीयत उलमा-ए-हिंद प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कैच न्यूज़ से विशेष बातचीत में कहा है कि वह देवबंद से उठाए गए शाकिर अंसारी और एक अन्य लड़के अजीम को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं. पुलिस हमेशा से इसी तरह लड़कों को फ्रेम करती आई है और बाद में कोर्ट ने उन्हें छोड़ दिया. मदनी ने यह घोषणा भी की कि जमीयत गिरफ्तार सभी लड़कों को कानूनी मदद मुहैया करवाएगी.
स्पेशल सेल ने अभी तक सिर्फ चांद बाग़ के मुहम्मद साजिद, लोनी के समीर अहमद और देवबंद के शाकिर अंसारी की गिरफ्तारी दिखाई है. दिल्ली की सेशन कोर्ट ने इन तीनों से पूछताछ के लिए स्पेशल सेल को 10 दिन की रिमांड दे दी है.
इस खबर पर और ज्यादा पड़ताल करने की कोशिश अभी दिखाई नहीं पड़ी है। हाँ हिन्दी के अखबारों में नवोदय टाइम्स ने भी चाँदबाग इलाके में जाकर बात की है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कवरेज में अभी तक आरोपियों के परिवारों का दृष्टिकोण दिखाई नहीं पड़ा है। हाल में मालेगाँव धमाकों के बाबत हुए फैसले के बाद से इस प्रकार के आरोप लगे हैं कि आतंकी गतिविधियों में मुसलमान नौजवानों को पकड़ा जाता है। इस मामले की तफतीश अभी शुरू ही हुई है, इसलिए मीडिया कवरेज पर ध्यान देना जरूरी होगा कि उसका संतुलन किस प्रकार का है।अभी तक की कवरेज में मीडिया की ओर से पुलिस से प्रति-प्रश्न नहीं किए गए है।

नवोदय टाइम्स की खबर यहाँ देखें

Monday, April 4, 2016

पनामा पेपर्स ने बड़े लोगों की पोल खोली

दुनियाभर के मीडिया में आज पनामा पेपर्स का हल्ला है। इन दस्तावेजों में भारत के महापुरुषों के नाम भी है। भारत  सरकार ने ‘‘पनामा पेपर्स'' के आंकडे लीक होने के मद्देनजर शुरु की जा सकने वाली हर प्रकार की कानूनी जांच में ‘‘पूरा सहयोग'' करने का संकल्प लिया है. पनामा सरकार ने कल एक बयान में कहा, ‘‘पनामा सरकार कोई कानूनी कदम उठाए जाने की स्थिति में हर प्रकार की आवश्यक सहायता या हर प्रकार के अनुरोध में पूरी तरह सहयोग करेगी.''
पनामा आंकडे लीक होने के कारण हुए इन खुलासों से जूझ रहा है कि उसकी एक हाई प्रोफाइल लेकिन गोपनीय विधि फर्म मोस्साक फोंसेका ने कर अधिकारियों से पूंजी को छुपाने में विश्व भर के कई बडे नेताओं और चर्चित हस्तियों की कथित रुप से मदद की। इन लीक आंकडों को कई मीडिया संस्थानों ने दर्शाया है.
भारत में इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दू ने इनका विवरण दिया है।

Indians in Panama Papers list: Amitabh Bachchan, KP Singh, Aishwarya Rai, Iqbal Mirchi, Adani elder brother
Biggest leak of over 11 million documents of Panama law firm features over 500 Indians linked to offshore firms, finds 8-month investigation by a team of The Indian Express led by Ritu Sarin, Executive Editor (News & Investigations).

Monday, January 4, 2016

पठानकोट के बाद

पठानकोट पर हमले के बाद देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रतिक्रिया बेहद आक्रामक रही है, वहीं अखबारों की प्रतिक्रिया संतुलित है। आज के इंडियन एक्सप्रेस का सम्पादकीय है कि बातचीत जारी रहनी चाहिए। बात करना समर्पण नहीं है। अलबत्ता अखबार की सलाह है कि हमें काउंटर टैररिज्म सामर्थ्य को सुधारना चाहिए। आज के हिन्दूटाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स ने  भी तकरीबन यही राय व्यक्त की है। पाकिस्तान के अखबार डॉन का भी यही कहना है। डॉन का यह भी कहना है कि सन 2008 के मुम्बई हमले को लेकर पाकिस्तान की ओर से जो कमी रह गई है उसका नुकसान उसे होगा। 

Indian Express

After Pathankot

Dialogue with Pakistan must go on. But India urgently needs counter-terrorism capacity-building.

Exactly a week after Prime Minister Narendra Modi landed in Lahore, hoping to “turn the course of history”, his ambitious project is being tested by fire. This weekend’s terrorist attack on Pathankot was no surprise; indeed, many in India’s intelligence community had predicted it. Each past effort at peace, after all, has provoked similar strikes. It is too easy, though, to attribute the strike to unnamed spoilers. The more complex truth is that while Pakistan’s all-powerful army seeks to avert a military crisis that would drain its energies at a time of grave internal turmoil, it does not seek normalisation. Pakistan’s army chief, General Raheel Sharif, has made it clear that he will not accept the status-quo on Kashmir. The strike on Pathankot, carried out by the Inter-Services Intelligence’s old client, the Jaish-e-Muhammad, serves a very specific purpose. It signals to Indian policymakers that the Pakistan army can inflict pain, but at a threshold below that which makes it worthwhile for New Delhi to retaliate. Barring reflexive hawks, after all, no one would argue that it makes sense for Delhi to risk even limited conflict after the strike on Pathankot. 

Friday, June 26, 2015

बीबीसी की रपट पर भारतीय प्रतिक्रिया

बीबीसी की एमक्यूएम को भारतीय फंडिंग की 'धमाकेदार' रिपोर्ट पाकिस्तान के मुख्यधारा और सोशल मीडिया पर छाई हुई है. पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तानी सेना और सरकार ने भारत के खुफिया संगठन रॉ पर पाकिस्तान में आतंकवादी गतिविधियाँ चलाने के आरोप लगाए हैं. वे आरोप पाकिस्तानी सरकार ने लगाए थे. बीबीसी की रिपोर्ट का नाम सुनने से लगता है कि यह बीबीसी की कोई स्वतंत्र जाँच रिपोर्ट है, पर यह पाकिस्तानी सरकार के सूत्रों पर आधारित है. पाकिस्तान सरकार के आरोपों को बीबीसी की साख का सहारा जरूर मिला है. भारत सरकार ने इस ख़बर में किए गए दावों को 'पूरी तरह आधारहीन' करार दिया है. एमक्यूएम के एक वरिष्ठ सदस्य ने बीबीसी की ख़बर को 'टेबल रिपोर्ट' क़रार दिया.

बीबीसी वेबसाइट पर इस ख़बर के जारी होते ही पाकिस्तान के मुख्यधारा के चैनलों ने इसे 'ब्रेकिंग न्यूज़' की तरह चलाना शुरू कर दिया और जल्दी ही विशेषज्ञों के साथ लाइव फ़ोन-इन लिए जाने लगे. एक रिपोर्ट में पत्रकारों और विश्लेषकों ने बीबीसी को एक 'विश्वसनीय' स्रोत करार देते हुए कहा कि अगर संस्था (बीबीसी) को लगता कि यह ख़बर ग़लत है तो वह इसे नहीं चलाते.

पाकिस्तान के विपरीत भारतीय मीडिया ने इस खबर को कोई तवज्जोह नहीं दी. आमतौर पर भारतीय प्रिंट मीडिया ऐसी खबरों पर ध्यान देता है. खासतौर से हमारे अंग्रेजी अखबारों के सम्पादकीय पेज ऐसे सवालों पर कोई न कोई राय देते हैं. पर आज के भारतीय अखबारों में यह खबर तो किसी न किसी रूप में छपी है, पर सम्पादकीय टिप्पणियाँ बहुत कम देखने को कम मिलीं. हिन्दी अखबार आमतौर पर ज्वलंत विषयों पर सम्पादकीय लिखना नहीं चाहते. आज तो ज्यादातर हिन्दी अखबारों में शहरी विकास पर टिप्पणियाँ हैं जो मोदी सरकार के स्मार्ट सिटी कार्यक्रम पर है. यह विषय प्रासंगिक है, पर इसमें राय देने वाली खास बात है नहीं. दूसरा विषय आज एनडीए सरकार के सामने खड़ी परेशानियों पर है. इस मामले में कुछ कड़ी बातें लिखीं जा सकती थीं, पर ऐसा है नहीं.

बहरहाल बीबीसी की रपट को लेकर आज केवल इंडियन एक्सप्रेस में ही सम्पादकीय देखने को मिला. इसमें दोनों देशों की सरकारों से आग्रह किया गया है कि वे एक-दूसरे से संवाद बढ़ाएं. हालांकि पाकिस्तानी मीडिया में इन दिनों भारत के खिलाफ काफी गर्म माहौल है. वहाँ की सरकार अब वहाँ होने वाली तमाम आतंकवादी गतिविधियों की जिम्मेदारी भारतीय खुफिया संगठन रॉ पर डाल रही है. इस माहौल में जिन अखबारों के सम्पादकीय अपेक्षाकृत संतुलित हैं, वे नीचे पेश हैं-

Friday, April 3, 2015

अखबारों के रीडरशिप सर्वे को लेकर फिर विवाद

इडियन रीडरशिप सर्वे को लेकर देश के बहुसंख्यक प्रकाशनों का विरोध फिर सामने आया है। हिन्दू ने IRS 2014: ‘Stale wine in a new bottle’ में लिखा है कि आईआरएस-2013 की देश के 18 प्रकाशन समूहों ने भर्त्सना की थी। लगभग सभी प्रकाशन समूह इस बार भी नाराज हैं। इसे एक विज्ञापन के रूप में कुछ अखबारों ने आज प्रकाशित किया है। आज के अमर उजाला और जागरण ने भी अपने पहले पेज पर इस आशय की रिपोर्ट छापी हैं। रीडरशिप सर्वे करने वाली संस्था चुनावपूर्व सर्वे और एक्जिट पोल भी संचालित करती है।
अमर उजाला में प्रकाशित रपट
इंडियन रीडरशिप सर्वे में फिर गुमराह करने की कोशिश
अमर उजाला नेटवर्क
नई दिल्ली। इंडियन रीडरशिप सर्वे 2014 ने फिर झूठे आंकड़ों के दम पर पाठकों को गुमराह करने की नाकाम और ओछी कोशिश की है। उसने तीन चौथाई झूठ के साथ एक चौथाई सच मिलाकर नई बोतल में पुरानी शराब पेश कर दी है।

Friday, March 27, 2015

इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है

बिहार के जिस स्कूल में हो रही नकल की फोटो हाल में मीडिया ने प्रचारित की थी उसके बारे में आज के इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। इसके अनुसार 1700 छात्रों के स्कूल में गणित के केवल दो अध्यापक हैं। इस तस्वीर ने हमारी शिक्षा प्रणाली और मीडिया की भी बखिया उधेड़ कर रख दी है। बेशक मीडिया की सनसनी की प्रवृत्ति के कारण यह तस्वीर सामने आई, पर उसकी उदासीनता के कारण ही तो बरसों से यह हो रहा था। बावजूद इसके शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन की खराब स्थिति पर खबरें लगभग न के बराबर आती हैं।

हमारी शिक्षा की वास्तविक तस्वीर शिक्षा से सम्बद्ध वास्तविकता पर नजर रखने वाले संगठन प्रथम के सर्वेक्षणों से उजागर होती है। हम जितनी भयावह स्थिति समझते हैं वह उससे भी ज्यादा भयावह है। दूसरी ओर हमारा मीडिया इस तस्वीर के सनसनीखेज पहलू तक ही सीमित है। पता नहीं किसी और अखबार ने वास्तविकता को सामने लाने की कोशिश की या नहीं पर कम से कम इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता दीपू सेबास्टियन एडमंड्स ने तस्वीर के दूसरे पहलू को भी सामने रखा है। उन अखबारों ने क्या किया जिनके हाथ यह तस्वीर लग गई थी। फोटोग्राफर का नाम तक नहीं दिया गया।

What photo didn't show...
हिन्दू में फोटोग्राफर के बारे में खबर
शिक्षा की गुणवत्ता पर मेरी पुरानी पोस्ट

Tuesday, March 17, 2015

'आप' पर छिटपुट विमर्श

आम आदमी पार्टी की रीति-नीति पर जब भी बात होती है ज्यादातर व्यक्तियों पर केंद्रित रहती है। या उसके आंतरिक लोकतंत्र या आंदोलनकारी भूमिका पर। टीवी पर बातचीत बिखरी रहती है और अखबारों, खासतौर से हिन्दी अखबारों की दिलचस्पी विमर्श पर बची नहीं। अलबत्ता पिछले हफ्ते 14 मार्च को प्रभात खबर ने अपने एक पेज इस मसले को दिया, जिसमें घटनाक्रम का क्रमबद्ध विवरण और कुछ दृष्टिकोण दिए गए हैं। इनमें सुहास पालशीकर का दृष्टिकोण ध्यान खींचता है। उन्हें लगता है कि यह भी दूसरे दलों की तरह सामान्य पार्टी बनकर रह गई है। अभी कहना मुश्किल है कि इसकी राह क्या होगी, पर यह पार्टी दूसरे दलों जैसी नहीं होगी, यह मानने का कारण भी सामने नहीं आ रहा है। खासतौर से आंतरिक लोकतंत्र को लेकर, क्योंकि यदि वैचारिक स्तर पर मतभेद होंगे तो उनका निपटारा भी लोकतांत्रिक तरीके से ही होगा। बहरहाल इस दौरान 'आप' से जुड़ी कुछ सामग्री आपके सामने पेश है, जिसमें क्रिस्टोफर जैफरलॉट का एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख भी है। ईपीडब्ल्यू में आनन्द तेलतुम्बडे और एक्सप्रेस में प्रकाशित प्रताप भानु मेहता के आलेख भी पढ़ने योग्य हैं, जो दिल्ली विधानसबा चुनाव में 'आप' की विजय के संदर्भ में लिखे गए हैं।

A Victory of Possibilities
Pratap Bhanu Mehta

...The second challenge and opportunity is this: It was fashionable to portray the AAP as unleashing another populist class war, fiscally imprudent and insensitive to growth. This was a gross exaggeration unleashed by those who were engaging in class warfare anyway. But the central challenge facing India is how to create cultures of negotiation around important issues where we do not oscillate between cronyism and populism. All the important issues facing us — pricing water and electricity, managing land and environment, access to health and education — have been stymied by this oscillation. Even now, the fog of obfuscation and false choices in these areas is threatening our future. Creating credible and inclusive negotiation on these issues is the central task. In India, the rich have evaded accountability by raising the spectre of class warfare, and the poor have been cheated by populism. There has to be a liberal critique of oligarchy at the top, and a social democratic critique of populism at the bottom. We hope the AAP is the harbinger of this change.

Read Full Article here

Something borrowed

Written by Christophe Jaffrelot | Published on:March 14, 2015 12:00 am

The current tensions in the AAP, particularly those which have led to Prashant Bhushan and Yogendra Yadav being voted out of its political affairs committee, may be better understood if one realises that the party lies at the intersection of traditions that have their own potential and contradictions. The AAP has inherited the legacy of two major political traditions in India, Gandhian and socialist. This is not the first time that a political movement has combined both. In the 1970s, Jayaprakash Narayan had tried to do the same. But the challenges that Arvind Kejriwal faces are of a different magnitude.

Sunday, March 15, 2015

‘आप’ का जादू भी हवा हो सकता है

आम आदमी पार्टी को लेकर फिलहाल सवाल यह नहीं है कि वह अपने नेताओं के मतभेदों को किस प्रकार सुलझाएगी। बल्कि यह है कि वह भविष्य में किस प्रकार की राजनीति करेगी। दिल्ली में उसकी सफलता का जो फॉर्मूला है क्या वही बाकी जगह लागू होगा? वह व्यक्ति आधारित पार्टी है या विचार आधारित राजनीति की प्रवर्तक? अरविन्द केजरीवाल व्यक्तिगत आचरण के कारण लोकप्रिय हुए हैं या उनके पास कोई राजनीतिक योजना है? बहरहाल देखना यह है कि पार्टी अपने वर्तमान संकट से किस प्रकार बाहर निकलेगी। सुनाई पड़ रहा है कि 28 मार्च को राष्ट्रीय परिषद की बैठक में ‘बागियों’ को पार्टी से निकाला जाएगा।

अभी तक पार्टी का विभाजन नहीं हुआ है। क्या विभाजन होगा? हुआ तो किस आधार पर? और टला तो उसका फॉर्मूला क्या होगा? और क्या भविष्य में फिर टकराव नहीं होगा? ‘आप’ के विफल होने पर बड़ा धक्का कई लोगों को लगेगा। उनको भी जिन्होंने उसमें नरेंद्र मोदी के उभार के खिलाफ वैकल्पिक राजनीति की आहट सुनी थी। दूसरे राज्यों में उसके विस्तार की सम्भावनाओं को भी ठेस लगेगी। थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि व्यावहारिक राजनीति के लिए ऐसे बहुत से काम करने पड़ते हैं, जो खुले में अटपटे लगते हैं। जैसे कि राष्ट्रपति शासन के दौरान दिल्ली में सरकार बनाने की कोशिश करना। या मुस्लिम सीटों के बारे में फैसले करना। आम आदमी पार्टी से लोग इन बातों की उम्मीद नहीं करते थे। इसलिए कि उसने अपनी बेहद पवित्र छवि बनाई थी। इन अंतर्विरोधों से पार्टी बाहर कैसे निकलेगी?

Monday, March 9, 2015

बलात्कार को लेकर भारत के खिलाफ क्या कोई वैश्विक साजिश है?

निर्भया मामले को लेकर बीबीसी की डॉक्यूमेट्री पर पाबंदी के विरोध में मेरे एक लेख का लिंक फेसबुक पर प्रकाशित करने पर कई पाठकों की प्रतिक्रिया से लगा कि वे इस देश की प्रतिष्ठा का प्रश्न मानते हैं। एक पाठक ने लिखा, 'जोशी जी कभी अपने समाज और देश के हित में भी सोचें। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि देश के खिलाफ बोलने लगें।'  इस आशय के विचार उन सब लोगों ने व्यक्त किए हैं जो डॉक्यूमेंट्री पर पाबंदी लगाने के पक्षधर हैं। मेरी धारणा शुद्ध रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल्यों पर आधारित है। मैं मानता हूँ कि यह स्वतंत्रता हमारे समाज के हित में है। 

इधर नीति सेंट्रल वैबसाइट ने एक विश्लेषण पेश किया है कि  क्या वजह है कि भारत में रेप की एक घटना सारी दुनिया में चर्चा का विषय बन जाती है। दिल्ली में एक कैब में हुआ बलात्कार न्यूयॉर्क टाइम्स की सुर्खी बन जाता है। वह भी तब जब दुनिया में बलात्कार के मामलों में भारत का स्थान काफी नीचा यानी 94 वें स्थान पर है, जबकि अमेरिका का नम्बर 14वाँ है। नीति सेंट्रल का विश्वास है कि यह सब वैश्विक ईसाई समुदाय से भारत के नाम पर चंदा वसूली के वास्ते हो रहा है। इस लेख के अनुसार भारत धर्मांतरण अभियान का महत्वपूर्ण देश है। इसने अपनी बात के पक्ष में वील ऑफ टियर्स फिल्म का हवाला भी दिया है।   

यह इस बात का एक दूसरा पहलू है। मेरे पास इस आरोप की पुष्टि या खंडन करने के आधार नहीं हैं और न मैं इस आरोप का समर्थन करता हूँ। बीबीसी की फिल्म पर पाबंदी लगाने के लिए यह उचित आधार भी नहीं है। अलबत्ता इस बात को पढ़ने और छानबीन करने लायक मानता हूँ। यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि नीति सेंट्रल, मीडिया क्रुक्स और अंग्रेजी दैनिक पायनियर बीजेपी के पक्षकार हैं। मैं यह भी नहीं कहता कि बीजेपी के पक्ष को पढ़ा या सुना नहीं जाना चाहिए। हमें अपनी जानकारी का स्तर बढ़ाना चाहिए और ऑब्जेक्टिव तरीके से चीजों को देखना चाहिए। इस विषय पर और भी पढ़ना चाहें तो कुछ लिंक नीचे दिए हैं।

नीति की साइट पर इस विषय को लेकर विश्लेषण

Saturday, March 7, 2015

मीडिया में इंडियाज़ डॉटर

Surendra's Cartoon in The Hindu
India's Daughter: activists asking for postponement give legitimacy to illegal censorship
In their letter dated March 5, 2015 to NDTV, a group of activist lawyers and civil liberties campaigners have listed 13-odd reasons for requesting the channel to postpone the broadcast of Leslee Udwin’s film India’s Daughter till the Supreme Court delivers its verdict on the appeals lodged by those convicted and sentenced to death for committing the December 2012 Delhi gang rape. They state that the documentary’s centre-point is the interview with Mukesh Singh, one of the convicts on death row, in which he protests his innocence by asserting that the now-deceased victim was solely responsible for her plight; in fact, he nonchalantly claims that she deserved to be taught a lesson. According to them, this inculpatory statement could seriously prejudice his chances of escaping the hangman’s noose when the Supreme Court hears his appeal.
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'इंडियाज़ डॉटर' पर क्या कहते हैं लोग?

दिसंबर 2012 में दिल्ली में एक छात्रा के साथ हुए गैंगरेप और उसकी हत्या पर बनी डॉक्यूमेंट्री पर भारत में भी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं.

Sunday, March 1, 2015

बजट पर मीडिया

मोदी सरकार के आम बजट को लेकर अखबारों की कवरेज इस बार काफी मतभ्रम की शिकार नजर आई। हिन्दी अखबार तो यों ही ज्यादातर शाब्दिक बाजीगरी का सहारा लेते रहे हैं, अंग्रेजी के अखबार भी फीके नजर आए। अलबत्ता अखबारों के सम्पादकीय पेजों पर बजट को समझने की कोशिश की गई है। अमर उजाला के पहले सफे के शीर्षक और सम्पादकीय पेज की सामग्री में विसंगति दिखाई पड़ती है। नवभारत टाइम्स विश्वकप क्रिकेट के प्रोमो 'मौका-मौका' से प्रभावित है। हिन्दुस्तान ने अपने ही कई साल पुराने क्रिकेट के रूप का इस्तेमाल किया है।  इन कोशिशों में विषय को समझने की गम्भीरता नजर नहीं आती। बजट पर मीडिया का नजरिया पेश हैः-  

Thursday, February 12, 2015

राजस्थान से आई यह निराली बधाई

11 फरवरी के राजस्थान पत्रिका, जयपुर के पहले पेज के जैकेट पर निराला विज्ञापन प्रकाशित हुआ। इसमें दिल्ली के विधान सभा चुनाव में 3 सीटें जीतने पर भाजपा को बधाई दी गई है। यह बधाई प्रतियोगिता परीक्षाओं से जुड़ी किताबें छापने वाले एक प्रकाशन की ओर से है। प्रकाशन के लेखक नवरंग राय, रोशनलाल और लाखों बेरोजगार विद्यार्थियों की ओर से यह बधाई दी गई है। इसमें ड़क्टर से राजनेता बने वीरेंद्र सिंह से अनुरोध किया गया है कि वे राजस्थान में आम आदमी पार्टी का नेतृत्व करें और उसे नए मुकाम पर पहुँचाएं। पिछले लोकसभा चुनाव में वीरेंद्र सिंह आम आदमी पार्टी के टिकट पर लड़े थे। 

Wednesday, February 11, 2015

'आप' की जीत पर अखबारों की कवरेज

Sunday, February 1, 2015

किरण बेदी पहली आईपीएस हैं या नहीं?

सोशल मीडिया पर खबरें हैं कि किरण बेदी पहली महिला आईपीएस अधिकारी नहीं हैं। इसके पक्ष में एक अखबारी कतरन लगाई है। वास्तव में तथ्य क्या है यह बाद की बात है एक तथ्य यह सामने आया कि इंटरनेट पर ऐसी साइट्स जो अखबारों की फर्जी कतरनें तैयार करती हैं। नीचे मैं वह कतरन लगा रहा हूँ जो सोशल मीडिया में वायरल हुई है साथ ही उसी अंदाज में बनाई गई कतरनें भी हैं। इन्हें देख कर अंदाज लगाया जा सकता है कि सुरजीत कौर वाली कतरन भी फर्जी है। अलबत्ता सच क्या है इसकी छानबीन होनी चाहिए। अखबारों की कतरनें तैयार करने वाली एक साइट का यूआरएल इस प्रकार है

Tuesday, January 27, 2015

गणतंत्र दिवस पर मोदी की छाप

गणतंत्र दिवस परेड पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छाप सायास या अनायास दिखाई पड़ी। जिनमें से कुछ हैं:-

मेक इन इंडिया का मिकेनिकल शेर
प्रधानमंत्री जन-धन योजना की झाँकी
बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ झाँकी
गुजरात की झाँकी में पटेल की प्रतिमा
आयुष मंत्रालय की झाँकी
बुलेट ट्रेन की प्रतिकृति
स्वच्छ भारत की अपील करता स्कूली बच्चों का समूह नृत्य
कार्यक्रम में बराक ओबामा सहित तमाम अतिथि अपने हाथों में छाते छामे नजर आए। किसी को पहले से इस बात का अंदेसा नहीं था। शायद अगले साल से विशिष्ट अतिथियों के मंच के ऊपर शीशे की छत लगेगी।

आज दिल्ली के कुछ  अखबार प्रकाशित हुए हैं जिनसे कार्यक्रम की रंगीनी के अलावा मीडिया की दृष्टि भी नजर आती है। आज की कुछ कतरनें

नवभारत टाइम्स

इंडियन एक्सप्रेस

Thursday, January 8, 2015

रोमन हिन्दी के बारे में चेतन भगत की राय

आज यानी 8 जनवरी के दैनिक भास्कर में चेतन भगत ने रोमन हिन्दी के बारे में एक लेख लिखा है। इस लेख को पढ़कर अनेक लोगों की प्रतिक्रिया होगी कि चेतन भगत के लेख को गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। यह प्रतिक्रिया या दंभ से भरी होती है या नादानी से भरी। जो वास्तव में उपस्थित है उससे मुँह मोड़कर आप कहाँ जाएंगे? भाषा अपने बरतने वालों के कारण चलती या विफल होती है, विशेषज्ञों के कारण नहीं। विशेषज्ञता वहाँ तक ठीक है जहाँ तक वह वास्तविकता को ठीक से समझे। बहरहाल आपकी जो भी राय हो, यदि आप इस लेख को पढ़ना चाहें तो यहाँ पेश हैः-

हमारे भारतीय समाज में हमेशा चलने वाली एक बहस हिंदी बनाम अंग्रेजी के महत्व की रही है। वृहद स्तर पर देखें तो इस बहस का विस्तार किसी भी भारतीय भाषा बनाम अंग्रेजी और किस प्रकार हमने अंग्रेजी के आगे स्थानीय भाषाओं को गंवा दिया इस तक किया जा सकता है। यह राजनीति प्रेरित मुद्‌दा भी रहा है। हर सरकार हिंदी के प्रति खुद को दूसरी सरकार से ज्यादा निष्ठावान साबित करने में लगी रहती है। नतीजा ‘हिंदी प्रोत्साहन’ कार्यक्रमों में होता है जबकि सारे सरकारी दफ्तर अनिवार्य रूप से हिंदी में सर्कुलर जारी करते हैं और सरकारी स्कूलों की पढ़ाई हिंदी माध्यम में रखी जाती है।

इस बीच देश में अंग्रेजी लगातार बढ़ती जा रही है। बिना प्रोत्साहन कार्यक्रमों और अभियानों के यह ऐसे बढ़ती जा रही है, जैसी पहले कभी नहीं बढ़ी। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि इसमें कॅरिअर के बेहतर विकल्प हैं, समाज में इसे अधिक सम्मान प्राप्त है और यह सूचनाओं व मनोरंजन की बिल्कुल नई दुनिया ही खोल देती है तथा इसके जरिये नई टक्नोलॉजी तक पहुंच बनाई जा सकती है। जाहिर है इसके फायदे हैं।

नव संवत्सर और नवरात्र आरम्भ के मौके पर सुबह से मोबाइल फोन पर शुभकामना संदेश आने लगे। पहले मकर संक्रांति, होली-दीवाली, ईद और नव वर्ष संदेश आए। काफी संदेश हिन्दी में हैं, खासकर मकर संक्रांति और नवरात्रि संदेश तो ज्यादातर हिन्दी में हैं। और ज्यादातर हिन्दी संदेश रोमन लिपि में।
मोबाइल फोन पर चुटकुलों, शेर-ओ-शायरी और सद्विचारों के आदान-प्रदान का चलन बढ़ा है। संता-बंता जोक तो हिन्दी में ही मज़ा देते हैं। रोमन के इस्तेमाल से हिन्दी और अंग्रेजी की मिली-जुली भाषा भी विकसित हो रही है। क्या ऐसा पहली बार हो रहा है?