Tuesday, May 19, 2026

किसे चाहिए ईमानदारी?

पत्रकारिता या दूसरे शब्दों में कहें, तो ईमानदार पत्रकारिता की ज़रूरत किसे है? पत्रकारों को, उनके संगठनों को, प्रेस क्लबों को, मीडिया-मालिकों को, राजनीतिक दलों को या आम जनता यानी पाठकों और दर्शकों को? सिद्धांततः पत्रकारिता खुद में एक प्रकार की राजनीति है। ऐसी राजनीति जिसका केंद्रीय विषय सार्वजनिक हित है, सत्ता पाना नहीं। सत्ता की राजनीति भी ऐसा ही दावा करती है, पर वह जिन आधारों पर चल रही है, वे संकीर्ण होते जा रहे हैं। पत्रकारिता की जिम्मेदारी है कि वह उन संकीर्ण आधारों पर चोट करे। इसके लिए उसे अपनी साख बनानी होगी।

यह काम पत्रकारिता ने अपने लिए खुद तय नहीं किया है, बल्कि समाज ने तय किया है। शुरूआती पत्रकार ताकतवर राजनेताओं के लिए पैम्फलेट लिखते हुए ही इस धंधे में आए थे। पर आज की लोकतांत्रिक-व्यवस्था में पत्रकार की जरूरत सोसायटी को है, और इस बात में ही तमाम पेच हैं। वोटर को सूचना चाहिए, जिसके आधार पर वह अपनी राय बनाए।

सोलह साल पहले नीरा राडिया ने बड़ी ईमानदारी से अपना काम किया। पता नहीं वे अपने क्लाइंट्स के दृष्टिकोण को किस हद तक मीडिया में ला पाने में कामयाब हुईं, पर इतना तय है कि उन्होंने उसी तरह काम किया जैसी हमारे मीडिया की संरचना है। एक दौर तक इस मीडिया के भीतर कुछ आदर्श थे, जो अब आउटडेटेड हैं। ओल्ड स्टाइल मीडिया माने जो सूचना के गैर-वाजिब इस्तेमाल को तैयार न हो। और नए स्कूल के माने? सवाल है कि क्या सब ऐसे ही रहेगा?

मुझे रसूख चाहिए

कुछ साल पहले मुझे माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल जाने और नए पुराने छात्रों से संवाद करने का मौका मिला। मौका था नए सत्र का आरम्भ, जिसका समारोह था। मैंने सभा में बैठे छात्रों से पूछा- आप पत्रकार क्यों बनना चाहते हैं?  ज्यादातर का जवाब था- सामाजिक जरूरत के लिए। पाठकों को सही जानकारी देने के लिए। एक छात्र ने खड़े होकर कहा, “ मैं पैसे, पहचान और ऊंची पहुंच और रसूख बनाने के लिए पत्रकार बनना चाहता हूं।” पूरे हाउस में ठहाका लगा।

पता नहीं उस छात्र ने वह बात गंभीरता में कही या मजाक में, पर यह महत्वपूर्ण बात थी। सभी न सही कुछ पत्रकार सेलिब्रिटी बन रहे हैं। पैसे, पद औऱ पहचान के लिहाज से वे टॉप पर आने लगे हैं। इसकी कीमत कौन देता है? पत्रकार महात्मा गांधी थे, तिलक भी। महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर राजेंद्र माथुर तक तमाम नाम हैं। उस छात्र का आशय जो भी रहा हो, पर उसने कहा, मैं ताकत चाहता हूँ जिससे लोग डरें।

जमानत पर अलग राय

सोमवार को कथित नार्को-आतंकवाद मामले में एक कश्मीरी व्यक्ति को जमानत देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने शीर्ष न्यायालय में न्यायिक दृष्टिकोणों की विविधता को रेखांकित किया, जिसमें विभिन्न पीठों ने इस जटिल प्रश्न पर अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए कि क्या कड़े गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत जमानत प्रतिबंध संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर हावी हो सकते हैं।

“यदि छोटी बेंचें बड़ी बेंच द्वारा निर्धारित सिद्धांत से सहमत नहीं हो पाती हैं, तो उचित और एकमात्र उपाय यह है कि मामले को माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष एक और बड़ी बेंच के विचारार्थ प्रस्तुत किया जाए। दो न्यायाधीशों की बेंच होने के नाते, हम केए नजीब मामले में तीन न्यायाधीशों के बेंच द्वारा निर्धारित सिद्धांत से बँधे हुए हैं। हम बस इतना ही कहते हैं,” न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने 102 पृष्ठों के अपने फैसले में कहा।

अदालत की चिंता उन मिसालों की श्रृंखला से उपजी है जिनकी उसने जांच की है कि क्या यूएपीए की धारा 43 (डी) (5) की कठोरता - जो जमानत देने पर प्रतिबंध लगाती है - "पिघल जाएगी" जहां लंबे समय तक कारावास और विलंबित परीक्षण संविधान के अनुच्छेद 21 के उल्लंघन की ओर ले जाता है।

भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा 2021 में दिए गए फैसले ने इस मुद्दे पर पालन किए जाने वाले "सही कानून" को स्थापित किया। अदालत ने कहा था कि आपराधिक मुकदमे के अंत की कोई उम्मीद न होने पर लंबे समय से कारावास झेल रहे विचाराधीन अभियुक्त को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।

अदालत ने तब यूएपीए मामलों में जमानत पर सबसे महत्वपूर्ण फैसले - एनआईए बनाम ज़हूर अहमद शाह वटाली मामले में 2019 के फैसले - की समीक्षा की थी। वटाली मामले में दो-न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था कि यूएपीए के तहत जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय अदालतों को राज्य के मामले को उसके गुण-दोषों की जांच किए बिना स्वीकार करना चाहिए।

इंडियन एक्सप्रेस एक्सप्लेंड में पढ़ें विस्तार से

 

बदलते वैश्विक-संदर्भों में भारत की चुनौतियाँ


वैश्विक-राजनीति में हमेशा ही कोई न कोई घटना ऐसी होती रहती है, जो किसी खास इलाके के लिए महत्त्वपूर्ण होती है. पिछले हफ्ते भारत में ‘ब्रिक्स’ विदेशमंत्रियों का सम्मेलन और प्रधानमंत्री का पाँच देशों की यात्रा पर निकलना भी ऐसी ही घटनाएँ हैं.

पिछले हफ्ते भारत ने नई दिल्ली में ‘ब्रिक्स’ के विदेशमंत्रियों की बैठक की मेजबानी की और अगले सप्ताह ‘क्वॉड’ के विदेश मंत्रियों मेजबानी और महीने के अंत में भारत-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन का आयोजन भी करेगा. इनमें से हरेक आयोजन भारतीय डिप्लोमेसी के अलग-अलग पहलुओं पर रोशनी डालता है.

‘ब्रिक्स’ और ‘क्वॉड’ को अक्सर वैचारिक रूप से विरोधी संगठनों के रूप में चित्रित किया जाता है. ‘ब्रिक्स’ को पूर्वी देशों द्वारा पश्चिमी वर्चस्व को उखाड़ फेंकने के साधन के रूप में, जबकि ‘क्वॉड’ को चीन के विरुद्ध एक रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में. इस प्रकार के वर्णन दोनों समूहों की अतिरंजना करते हैं.

‘ब्रिक्स’ में टकराव

‘ब्रिक्स’ में ऐसे देश शामिल हैं, जिनके बीच प्रत्यक्ष संघर्ष हैं. ‘क्वॉड’, अपने बढ़ते सहयोग के बावजूद, औपचारिक गठबंधन नहीं है. भारत ने तो ‘क्वॉड’ को सुनियोजित सुरक्षा सहयोग के मंच में बदलने का हमेशा विरोध किया है.

पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की चीन-यात्रा के पीछे भी हमारे लिए कुछ संकेत छिपे हैं. उधर ‘ब्रिक्स’ के सम्मेलन में ईरान और यूएई के मतभेद उभर कर आए, जिनके कारण संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका.

अमेरिका और चीन की वार्ता के केंद्र में भारत भले ही नहीं था, पर दोनों के रिश्ते सुधरे, तो उसका, भारत-अमेरिका और भारत-चीन रिश्तों पर भी प्रभाव पड़ेगा. सवाल है कि क्या रिश्ते सुधरे?

Monday, May 18, 2026

जलधारा की सफाई का पर्व


आज, हिंदू के पहले पेज पर एक रोचक तस्वीर छपी है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग टोकरियाँ लेकर एक जलधारा की सफाई करते नज़र आ रहे हैं। यह तस्वीर दक्षिण कश्मीर के काजीगुंड के पंजाथ नाग गाँव के लोगों की है, जिन्होंने अपने पूर्वजों की सदियों पुरानी परंपरा को आज भी कायम रखा है। यहाँ धान की रोपाई से पहले झरनों की सफाई के साथ-साथ मछली पकड़ने की प्रतियोगिता होती है।  यह एक स्थानीय पर्व के रूप में उभरा है, जो अब दूसरे गाँवों के लोगों को भी आकर्षित करता है।

अब यहाँ आसपास के करीब 45 समुदायों के लोग एकत्र होकर पानी की सफाई करते हैं और निर्धारित मानकों के भीतर रहते हुए मछलियाँ भी पकड़ते हैं। यह झरना स्थानीय अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है, क्योंकि इससे नीचे की ओर स्थित कई गांवों की सिंचाई होती है और लगभग 25 गाँवों को पीने का पानी मिलता है।

इस झरने और इसके संरक्षण का उल्लेख कल्हण रचित 12वीं सदी के ऐतिहासिक ग्रंथ राज तरंगिणी में भी किया गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पंजाथ अर्थात पाँच हाथ, जो 500 झरनों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें पीर पंजाल की तलहटी पर स्थित झरने भी शामिल हैं। माना जाता है कि एक समय में इस गाँव में 500 से अधिक प्राकृतिक झरने हुआ करते थे।

पंजाथ झरना काजीगुंड के सैकड़ों परिवारों के लिए सिंचाई और पीने के पानी का एक मुख्य स्रोत है। हर साल धान की खेती शुरू होने से पहले स्थानीय निवासी उचित सिंचाई व्यवस्था के लिए गाद और खरपतवार हटाकर जलाशय को साफ करते हैं। इस उत्सव को देखने 50 किलोमीटर दूर से भी लोग आते हैं।

हर साल मई के तीसरे या चौथे सप्ताह में ग्रामीण एक दिन चुनते हैं जब सेब, बादाम और अखरोट के बाग फूलों से भरे होते हैं। 500 मीटर के क्षेत्र में फैले पंजाथ नाग की सफाई करते हैं और मछली पकड़ते हैं। यह एक ऐसी परंपरा है जो उन्हें पूर्वजों से विरासत में मिली है। लोग इस दिन पकड़ी गई मछलियों को घर ले जाते हैं और उस दिन दोस्तों और परिवार के लिए दावत मनाते हैं।

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Sunday, May 17, 2026

भारत का सुपरफूड गुड़

उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर का 'जीआई टैग्ड गुड़'

भारत दुनिया के
70 प्रतिशत से ज़्यादा गुड़ का उत्पादन करता है, जिससे वह प्राकृतिक मिठास के मामले में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। देश के गन्ने के कुल उत्पादन का लगभग 20–30 प्रतिशत हिस्सा गुड़ बनाने में इस्तेमाल होता है, जिससे लगभग 25 लाख ग्रामीण लोगों को आजीविका मिली हुई है। इस क्षेत्र में निर्यात में भी काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। 2015–16 से 2024–25 के बीच गुड़ के निर्यात के मूल्य में 106.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जो इसकी बढ़ती अंतरराष्ट्रीय माँग का संकेत है। आयरन, मिनरल्स और जरूरी माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण, गुड़ रिफाइंड चीनी का एक ज़्यादा सेहतमंद विकल्प है। इस बढ़ोतरी को और बढ़ावा देने के लिए, सरकार की कई योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, पीएम सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्योग उन्नयन योजना और एक जिला एक उत्पाद के साथ-साथ जीआई टैगिंग भी अहम भूमिका निभा रही हैं। ये योजनाएं उत्पादों की वैल्यू बढ़ाने, ग्रामीण उद्यमों को मजबूत करने और निर्यात की संभावनाओं को बढ़ाने में मदद कर रही हैं।

 भारत में गुड़ सेक्टर

गुड़, एक पारंपरिक, बिना रिफाइन और प्राकृतिक मीठा पदार्थ है। इसे बिना किसी रसायन का इस्तेमाल किए, गन्ने के रस को गाढ़ा करके बनाया जाता है। इसे अक्सर ‘औषधीय चीनी’ भी कहा जाता है, और पोषक तत्वों के मामले में यह शहद के बराबर होता है। गुड़ का सेवन एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरीबियन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर किया जाता है, जहां इसे अलग-अलग स्थानीय नामों से जाना जाता है। गुड़ को प्राकृतिक रुप से बनाने के पारंपरिक तरीकों और रसायन-मुक्त मीठे पदार्थों के प्रति उपभोक्ताओं की बढ़ती पसंद के कारण इसे काफी महत्व दिया जाता है।

दुनिया भर में गुड़ के कुल उत्पादन का 70 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा भारत में होता है। इस वजह से भारत दुनिया का सबसे बड़ा गुड़ उत्पादक देश है। देश में गन्ने के कुल उत्पादन का लगभग 20–30 प्रतिशत हिस्सा गुड़ बनाने में इस्तेमाल होता है। यह ग्रामीण भारत के प्रमुख कृषि-प्रसंस्करण उद्योगों में से एक है। इस क्षेत्र की खासियत विकेंद्रित प्रसंस्करण, परिवहन की कम लागत, छोटे पैमाने पर उद्यमिता और कुटीर उद्योग है। इससे लगभग 25 लाख लोगों की आजीविका चलती है।

बढ़ती गुड़ अर्थव्यवस्था

भारत के गुड़ क्षेत्र को गन्ने के भारी उत्पादन का लाभ मिलता है। वर्ष 2024-25 में, गन्ने का कुल उत्पादन 44.49 करोड़ टन (एमटी) रहने का अनुमान था। कुल उत्पादन में उत्तर प्रदेश का योगदान 48.5 प्रतिशत रहा, जिसके बाद महाराष्ट्र (24.1 प्रतिशत) और कर्नाटक (10.5 प्रतिशत) का स्थान था। अन्य उत्पादक राज्यों में गुजरात, तमिलनाडु, बिहार, उत्तराखंड, पंजाब, मध्य प्रदेश और हरियाणा शामिल हैं।

भारत गुड़ और कनफैक्शनरी उत्पादों (जिनमें पारंपरिक भारतीय मिठाइयाँ और टॉफियाँ शामिल हैं) के प्रमुख निर्यातकों में से एक है। वर्ष 2015-16 में, इसका 292.8 मीट्रिक टन निर्यात हुआ जिससे 19.7 करोड़ अमेरिकी डॉलर मिले। वर्ष 2024-25 तक निर्यात बढ़कर 471.9 मीट्रिक टन हो गया जिससे 40.68 करोड़ अमेरिकी डॉलर प्राप्त हुए। इस अवधि के दौरान, मूल्य में लगभग 106.5 प्रतिशत और मात्रा में 61.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।वर्ष 2024-25 में निर्यात के प्रमुख ठिकानों में इंडोनेशिया, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), नाइजीरिया और नेपाल शामिल थे।

Friday, May 15, 2026

एक साथ अनेक लक्ष्यों पर मार करने वाली उन्नत अग्नि मिसाइल


भारत ने गत 8 मई को ओडिशा के डॉ एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेड री-एंट्री वेहिकल (एमआईआरवी) प्रणाली से लैस उन्नत अग्नि मिसाइल का सफल उड़ान परीक्षण किया है। इस मिसाइल का परीक्षण कई विस्फोटकों के साथ किया गया, जिनका लक्ष्य हिंद महासागर क्षेत्र में एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में फैले विभिन्न लक्ष्य थे। यह परीक्षण भारत के रणनीतिक अस्त्र कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो हिंद महासागर क्षेत्र में एक विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में फैले विभिन्न लक्ष्यों तक कई पेलोड पहुंचाने की क्षमता को प्रदर्शित करता है।

इस प्रकार की उन्नत प्रणालियों में महारत हासिल करके, भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि उसकी सेनाएँ प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सबसे आगे रहें, राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता में योगदान देने में सक्षम हों। मिसाइल की एमआईआरवी क्षमता, डेटरेंस टेक्नोलॉजी में एक बड़ी छलाँग है, जो एक ही मिसाइल को एक साथ कई लक्ष्यों पर प्रहार करने की क्षमता का प्रदर्शन करती है। इससे दुश्मन की रक्षा योजना गड़बड़ा जाती है और भारत की द्वितीय-प्रहार की विश्वसनीयता बढ़ जाती है।

Thursday, May 14, 2026

अमेरिका-ईरान ‘अनिर्णीत’ युद्ध


पश्चिम एशिया की लड़ाई को तीन महीने पूरे हो गए हैं, और वह पूरी तरह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। एक महीने से ज्यादा चली ताबड़तोड़ बमबारी से इस इलाके के देशों का काफी नुकसान हुआ है, पर समस्या का कोई स्थायी समाधान नज़र आता दिखाई नहीं पड़ रहा है। अमेरिका और ईरान दोनों ने होर्मुज़ जलसंधि मार्ग को बंद कर रखा है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति ठप्प होने का खतरा पैदा हो गया है। इस दौरान पाकिस्तान में दोनों पक्षों की वार्ता के बाद उसके दूसरे दौर की नौबत ही नहीं आई है। उधर अमेरिका का साथ देने वाले देशों की संख्या कम होती जा रही है।

राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार दावा कर रहे हैं कि हमने ईरान की कमर तोड़ दी है, पर वास्तविकता कुछ और नज़र आती है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिकी इंटेलिजेंस के हवाले से खबर दी है कि, इस महीने की शुरुआत में किए गए गोपनीय आकलन से पता चलता है कि ईरान ने अपने ज्यादातर मिसाइल स्थलों, लॉन्चरों और भूमिगत सुविधाओं तक दोबारा पहुँच हासिल कर ली है, और इस संबंध में ट्रंप प्रशासन द्वारा सार्वजनिक रूप से ईरान की सेना को बिखरी हुई स्थिति में चित्रित करना अमेरिकी खुफिया एजेंसियों द्वारा नीति निर्माताओं को बंद दरवाजों के पीछे बताई जा रही जानकारी से बिल्कुल विपरीत है।

रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के किनारे स्थित अपने 33 मिसाइल स्थलों में से 30 तक परिचालन पहुंच बहाल कर दी है, जिससे संकरे जलमार्ग से गुजरने वाले अमेरिकी युद्धपोतों और तेल टैंकरों को खतरा हो सकता है। इन सूचनाओं से अलग-अलग स्थलों पर हुए नुकसान के स्तर के आधार पर पता लगता है, कि ईरानी इन स्थलों के अंदर मौजूद मोबाइल लॉन्चरों का उपयोग करके मिसाइलों को अन्य स्थानों पर ले जा सकते हैं।

आकलनों के अनुसार, ईरान के पास अभी देश भर में लगभग 70 प्रतिशत मोबाइल लॉन्चर तैनात हैं और उसने युद्ध-पूर्व मिसाइल भंडार का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बरकरार रखा है। इस भंडार में बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं, जो क्षेत्र के अन्य देशों को निशाना बना सकती हैं, और क्रूज मिसाइलों की एक छोटी आपूर्ति भी है, जिनका उपयोग जमीन या समुद्र पर कम दूरी के लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है।

सीधा युद्ध

यों तो लंबे अर्से से इस इलाके में 'छाया युद्ध' चल रहा था, पर 28 फरवरी से शुरू हुए हमलों ने इसे 'छाया युद्ध' से सीधे युद्ध में बदल दिया है। इस दौरान अमेरिकी हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर खामनेई के मारे जाने के बाद तनाव और बढ़ गया है। लड़ाई के दौरान अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमले बोले, तो ईरान और उसके समर्थक हूतियों (यमन), हिज़बुल्ला (लेबनान), और अन्य समूहों ने इसराइल तथा अमेरिकी ठिकानों (कतर, बहरीन, कुवैत) को निशाना बनाया।

राष्ट्र-हित में सोने की अनावश्यक खरीद से बचें


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अपील के बाद अचानक देश में सोने की कीमत और उसकी खरीद को लेकर चर्चा चल निकली है। इस अपील के अर्थ को समझने के पहले हमें सोने के महत्त्व को समझना होगा। दुनिया में डॉलर को सबसे विश्वसनीय मुद्रा समझा जाता है, पर सोना उससे भी ज्यादा विश्वसनीय संपदा है। वैश्विक स्तर पर सोने का कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर के साथ भारतीय रुपये की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव स्थानीय बाजार में सोने की कीमत निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भारत हर साल लगभग 700 से 800 टन सोना बाहर से खरीदता है। इस वजह से यह दुनिया के सबसे बड़े सोना आयात करने वाले देशों में से एक है। सोने का घरेलू उत्पादन काफी कम है। कुल जरूरत का लगभग 90 से 95 प्रतिशत सोना बाहर से खरीदा जाता है। भारतीय कारीगर सोने के जेवर बनाकर उनका निर्यात भी करते हैं, इसलिए कुछ सोना बाहर भी जाता है। सोने के रासायनिक उपयोग भी हैं।

बहरहाल इसकी खरीद का हमारे मुद्राकोष पर सीधा प्रभाव पड़ता है। प्रधानमंत्री ने सोने की खरीद से बचने की सलाह इसीलिए दी है, क्योंकि पश्चिम एशिया की लड़ाई के कारण भारत के सामने ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। हमें पेट्रोलियम आयात करने के लिए विदेशी मुद्रा की ज़रूरत है। इस लड़ाई के कारण हमारे विदेशी मुद्राकोष पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

सराफा में तेजी

भारत के सराफा बाजारों में पिछले कुछ महीनों से तेजी का दौर चल रहा है। प्रधानमंत्री की अपील के अलावा भारत सरकार ने सोने और चाँदी की खरीद पर काबू पाने के लिए 13 मई से सोने और चाँदी के आयात पर 10 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी और 5 प्रतिशत एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस लगाया है।

महँगाई और विदेशी-मुद्रा पलायन रोकने के भारतीय प्रयास


पश्चिम एशिया की लड़ाई का कोई हल नजर नहीं आ रहा है। होर्मुज जलसंधि मार्ग को, अमेरिका और ईरान दोनों ने बंद कर रखा है। इस रास्ते से भारत के 45-55 फीसदी खनिज तेल का आवागमन होता है। भारत के निर्यात पर भी असर पड़ा है। अर्थव्यवस्था पर दबाव नज़र आने लगा है। रुपये और शेयर बाजार की गिरावट ने भी चिंता का माहौल बनाया है।

लड़ाई शुरू होने के बाद से विदेशी मुद्रा भंडार में 38 अरब डॉलर की गिरावट और खनिज तेल की कीमतों के 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहने के कारण बढ़ता दबाव नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से मितव्ययिता का आह्वान किया है, जिसके पीछे कारण है सोने का आयात और विदेश-यात्राओं पर विदेशी मुद्रा का खर्च।

दो वर्षों में सोने का आयात बिल लगभग दोगुना होकर 2025-26 में 72 अरब डॉलर हो गया है। विदेश-यात्रा पर उदारीकृत रेमिटेंस स्कीम के तहत व्यय 2025-26 के पहले 11 महीनों में, इस स्कीम का 57 प्रतिशत यानी कुल 26.34 अरब डॉलर में 15 अरब डॉलर रहा। विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजारों से डॉलर खींच रहे हैं, जिसके कारण मुद्रा भंडार घटकर 691 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। फरवरी में यह भंडार 728.49 अरब डॉलर के सार्वकालिक उच्च स्तर पर था।

Wednesday, May 13, 2026

भारत-पाकिस्तान रिश्ते सुधरते क्यों नहीं?

मरियम नवाज़ की पुत्रवधू
दो साल पहले सितंबर 2024 में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च और सी-वोटर के एक सर्वे के परिणामों की घोषणा की, जिसमें भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों से राय ली गई थी. उसमें एक सवाल था कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते क्या सुधर सकते हैं?

सर्वे में 60 प्रतिशत से अधिक भारतीयों और करीब 50 प्रतिशत पाकिस्तानियों ने माना कि इस दशक में तो कम से कम नहीं सुधरेंगे. कुछ ने कहा, कभी नहीं सुधरेंगे.

सर्वे 2022 में हुआ था, उसके परिणाम 2024 में जारी किए गए थे. विषय था,'बदलती दुनिया में दक्षिण एशिया: विभाजन के 75 साल बाद भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के नागरिक क्या सोचते हैं?'

बातचीत ठप्प

सोशल मीडिया पर एक प्रतिक्रिया पढ़ने को मिली, पाकिस्तान और भारत कभी दोस्त नहीं हो सकते. यह दुश्मनी उन लोगों के लिए फायदे का सौदा है, जिनका धंधा इसी दुश्मनी से चलता है.

ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगाँठ के मौके पर अब यह सवाल मन में आता है कि ऐसी क्या बात है, जो टकराव को इस शिद्दत तक ले आई है? पाकिस्तान हमें अज़ली दुश्मन क्यों मानता है?

पिछले दस साल से दोनों के बीच कोई उच्च-स्तरीय वार्ता नहीं हुई है. 2019 के बाद से दोनों देशों के उच्चायोग बगैर हाई कमिश्नर चल रहे हैं. कारोबारी रिश्ते नहीं के बराबर हैं. ट्रेन बंद, बस बंद और हवाई सेवा भी बंद. सिंधु जल-संधि रद्द कर है. डिप्लोमेसी का लेवल ज़ीरो है.

Saturday, May 9, 2026

टीवीके यानी ‘स्टार्टअप’ राजनीतिक विकल्प

तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव-परिणामों ने देश में एक नए राजनीतिक 'स्टार्टअप' का नाम जोड़ा है। अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी टीवीके का चुनावी पदार्पण बेहद शानदार रहा है। 'स्टार्टअप' शब्द बिजनेस से आया है।  तेजी से बढ़ने वाली कंपनियों को यह नाम दिया जाता है और एक अरब डॉलर से ऊपर का कारोबार करने वाली कंपनी को 'यूनिकॉर्न' कहते हैं। माना जा रहा है कि टीवीके ने रातों-रात भारतीय राजनीति में 'यूनिकॉर्न' बनकर दिखाया है।

तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) ने अपने पहले ही चुनावी मुकाबले के बाद तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी), आम आदमी पार्टी (आप), असम गण परिषद (एजीपी) और वाईएसआर कांग्रेस (वाईएसआरसीपी) जैसी पार्टियों के नक्शे-कदम सफलता हासिल की है। वह बेशक पहले ही राउंड में यूनीकॉर्नबनकर उभरी है, पर पर्यवेक्षक मानते हैं कि उसे अभी कठोर परीक्षा से गुजरना होगा। अभी यह सेमीफ़ाइनल जैसा लगता है। शायद साल-दो साल, नई सरकार आए या फिर से चुनाव कराने पड़ें।

टीवीके के पीछे नौजवानों की ताकत है, जिसे जेन-ज़ी माना जा रहा है। हाल में नेपाल में भी नए नेता जीतकर आए हैं। उस सरकार की स्थिरता को लेकर भी संदेह है। सोशल मीडिया के ज़रिए चुनाव जीतना एक बात है, लेकिन सत्ता के खेल को खेलना दूसरी बात है। इस पीढ़ी को घोषणापत्र पढ़ना, आर्थिक मुद्दों का अध्ययन करना या नेताओं की जवाबदेही का मतलब भी समझना होगा। परंपरागत राजनीति में भी युवा ही आगे आते हैं। पर समाधान झटपट नहीं मिलते और सिनेमा को नायकों की तरह, खासतौर से नहीं।

Thursday, May 7, 2026

संकट के दौर में ऊर्जा-स्वावलंबन का लक्ष्य

इस्लामाबाद में बातचीत के विफल दौर के कारण फिलहाल इस बात की संभावना नहीं है कि पश्चिम एशिया में स्थायी युद्धविराम होगा। इस वजह से भारत के सामने पेट्रोलियम आधारित ऊर्जा-संकट खड़ा हो गया है। यह संकट मुख्य रूप से होर्मुज जलसंधि के रास्ते आने वाली सप्लाई में अवरोध, वैश्विक कीमतों में उछाल और घरेलू उत्पादों, खासकर एलपीजी की कमी के रूप में सामने आया है। हालाँकि पेट्रोल-डीजल का करीब 50-64 दिन का बफर स्टॉक देश के पास है, लेकिन लंबे समय में कीमतें बढ़ सकती हैं। ऐसा महसूस किया जा रहा है कि देश की दीर्घकालीन ऊर्जा-सुरक्षा के लिए 90 दिन का बफर स्टॉक बनाया जाए।

वैश्विक भू-राजनीति ने हमारी आर्थिक सच्चाई को उजागर किया है। सबसे पहले हमें जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक-निर्भरता से छुटकारा पाना होगा। इसके बाद वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना होगा। हमें उन सभी रास्तों की तलाश करनी होगी, जिनसे हम ऊर्जा के क्षेत्र में स्वावलंबी बनें।

यह संकट सिर्फ कीमतों का नहीं, बल्कि आपूर्ति शृंखला टूटने का है, जो रसोई गैस जैसे जरूरी पेट्रोलियम उत्पादों पर सबसे ज्यादा असर डाल रहा है। मार्च 2026 में भारत को एलपीजी की भारी कमी का सामना करना पड़ा। घरेलू बुकिंग 55 लाख से बढ़कर 88 लाख प्रतिदिन हो गई। कुछ शहरों/गाँवों में सिलेंडर की वेटिंग 25-45 दिन तक पहुँच गई।

Wednesday, May 6, 2026

अमीरात के हटने से ‘ओपेक’ में दरार का अंदेशा


पश्चिम एशिया की लड़ाई और करवट लेती वैश्विक-व्यवस्था के दौर में यूएई का ओपेकको छोड़ना, इस बात का संकेत है कि पश्चिम एशिया में केवल तेल की राजनीति में ही नहीं, बल्कि भू-राजनीति में भी बदलाव आ रहा है.

इस परिघटना को खाड़ी देशों की आपसी प्रतिद्वंद्विता, सऊदी अरब के साथ बिगड़ते रिश्तों और अमेरिका-इसराइल की नीतियों के परिप्रेक्ष्य में भी पढ़ना होगा.

पहली नज़र में यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के लिए फायदेमंद लगता है, जिन्हें मध्यावधि चुनाव से पहले तेल की कीमतों में कमी की सख्त जरूरत है. ऐसा तभी होगा, जब तेल के दाम गिरेंगे.

लंबे समय से ट्रंप के लिए ओपेकबड़ी समस्या रहा है; उन्होंने बार-बार तेल की कीमतों में वृद्धि के लिए इसे जिम्मेदार ठहराया है. ओपेक से अलग होकर अमीरात ट्रंप का प्रिय बन सकता है.

मोटे तौर पर, यह अमीरात की आत्मकेंद्रित विदेश-नीति की शुरुआत है.  ओपेक कई देशों के सामूहिक का प्रतिनिधि समूह है. अमीरात के फैसले से वह फौरन टूटेगा नहीं, पर कमज़ोर ज़रूर होगा.

इसके पहले भी कुछ देश इस समूह से हटे हैं, पर यूएई इसके सबसे महत्त्वपूर्ण भागीदारों में से एक है, जिसका असर होगा.

अमीरात की नाखुशी

समूह के सदस्यों के लिए मुकर्रर उत्पादन कोटा से अमीरात नाखुश था. वे चाहते हैं कि हमें जितना चाहें उतना खनिज तेल पंप करने की अनुमति होनी चाहिए. उन्हें लगता है कि तेल के कारोबार का अंत होने वाला है, इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा तेल बेचकर कमाई कर ली जाए और उससे भावी अर्थव्यवस्था की नींव डाली जाए.

बेशक इससे तेल के दामों में कमी आएगी, पर अब उत्पादन रोका, तो फँस जाएँगे, क्योंकि दुनिया तेजी से वैकल्पिक ऊर्जा-स्रोतों पर जा रही है और अचानक तेल की माँग डूब जाएगी.

न्यूयॉर्क टाइम्स की टिप्पणी: मोदी के प्रतिद्वंद्वी कहाँ चले गए? भारत पर एक दलीय शासन

 


भारत के पाँच राज्यों में हुए चुनाव के परिणाम आने पर न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित आलेख में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल राज्य चुनावों में अपनी जीत के साथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष-मुक्त भारत के अपने सपने के और करीब पहुँच गए हैं।

यह रिपोर्ट एलेक्स ट्रेवेली और प्रगति केबी ने नई दिल्ली से और हरि कुमार ने कोलकाता से फाइल की है।

जब नरेंद्र मोदी ने एक दशक से भी पहले देश का नेतृत्व करने के लिए पहली बार चुनाव प्रचार किया था, तो उन्होंने ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का नारा लगाया था, और अपने एकमात्र राष्ट्रीय विपक्ष को खत्म करने की योजना बनाई थी।

स्वतंत्र भारत की संस्थापक पार्टी कांग्रेस तब से कमजोर पड़ गई है। 2014 के चुनावों के बाद से यह मुश्किल से ही उबर पाई है, जब राष्ट्रीय संसद में इसकी सीटें 206 से घटकर मात्र 44 रह गईं। इसने राज्य विधानसभाओं पर भी अपनी पकड़ खो दी है और अब केवल चार राज्यों पर इसका नियंत्रण है, जबकि मोदी के सत्तारूढ़ गठबंधन के पास 21 राज्य हैं।

इसके पतन के बाद, भारत भर में क्षेत्रीय पार्टियां श्री मोदी की भारतीय जनता पार्टी और उसके हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे के सबसे महत्वपूर्ण प्रति-संतुलन के रूप में उभरीं। इन पार्टियों के नेता उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में उनके खिलाफ खड़े हो गए। इनमें से दो सबसे करिश्माई और प्रभावशाली नेता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (2011 से) और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन (2021 से) थीं।

इस सप्ताह सुश्री बनर्जी और श्री स्टालिन दोनों की चुनावी हार के साथ, श्री मोदी खुद को ऐसे भारत के नेतृत्व में पहुँच गए हैं, जहाँ उनके विरोधियों के पास लगभग कोई राजनीतिक शक्ति नहीं है। संसद में कांग्रेस के पास कुछ समय के लिए अधिक सीटें रही हैं। लेकिन 1970 के दशक में आपातकाल के दौरान लोकतंत्र के निलंबन के बाद से अब तक के किसी भी समय की तुलना में, श्री मोदी ने भारत को एक नेता वाले राज्य की तरह बना दिया है।

स्वतंत्रता के बाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रतिपादित ‘भारत का विचार’ एक ऐसे राजनीतिक बहुलवाद का आदर्श था जो इस विशाल देश की धर्म, भाषा और संस्कृति की मानवीय विविधता के अनुरूप हो। आजकल, जैसे-जैसे भारत की बची-खुची छोटी पार्टियां लुप्त होती जा रही हैं, वह सपना भाजपा के सौ साल पुराने रूढ़िवादी हिंदू राष्ट्र के दृष्टिकोण के सामने फीका और बेमानी सा लगता है।

भाजपा को हमेशा से अपने सदस्यों की वैचारिक प्रतिबद्धता पर गर्व रहा है। देश भर में समान रूप से वितरित 80 प्रतिशत आबादी वाले हिंदुओं को एकजुट करना पार्टी की रणनीति रही है, जो अनेक जाति समुदायों से संबंध रखते हैं। हाल के दशकों में, इसने किसी भी अन्य राष्ट्रीय पार्टी की तुलना में कहीं अधिक संगठनात्मक अनुशासन हासिल किया है, साथ ही व्यापार-अनुकूल छवि भी बनाई है, जिसने इसे दानदाताओं का चहेता बना दिया है।

Tuesday, May 5, 2026

प्रताप भानु मेहता का लेख


 प्रताप भानु मेहता को मैं अपेक्षाकृत संज़ीदा लेखक के रूप में पढ़ता हूँ। आज के इंडियन एक्सप्रेस में संपादकीय पेज पर उन्होंने लिखा जिसका शीर्षक है

भाजपा की जीत उसकी राजनीतिक ऊर्जा का प्रमाण है, लेकिन यह भारतीय लोकतंत्र पर काली छाया भी है

इस लेख का ब्लर्ब है: कांग्रेस इस बात से खुश हो सकती है कि उसके सभी इंडिया ब्लॉक प्रतिद्वंद्वी दल बिखर गए हैं। लेकिन कांग्रेस न्यूनतम प्रतिरोध करने की स्थिति में भी नहीं है और भाजपा की दुर्धर्षता का मुकाबला करने में असमर्थ है।

 वे लिखते हैं:

भारतीय राजनीति लुप्त होती विशिष्टताओं की कहानी है। दो सबसे मजबूत और स्थायी क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरण धराशायी हो गए हैं। कोलकाता में सत्ता का पतन हो गया है; चेन्नई में दरार पड़ गई है। केरल में हमेशा की तरह सत्ता-विरोधी लहर देखने को मिली है; असम पर भाजपा की पकड़ बरकरार है। ये परिणाम भाजपा की अभूतपूर्व राष्ट्रीय चुनावी शक्ति और हिंदुत्व की वैचारिक श्रेष्ठता को और मजबूत करते हैं। चुनावी राजनीति के इतिहास में मोदी-शाह की जोड़ी की अभूतपूर्व शक्ति को नकारना अनुचित होगा।

बंगाल, जो अपनी विशिष्टता पर गर्व करता था, वहाँ भाजपा ने चुनावी समीकरणों में एक ऐसा बदलाव ला दिया है जो लगभग असंभव था। अपने गौरवशाली इतिहास के संदर्भ में भी, बंगाल में भाजपा की जीत उसकी महत्वाकांक्षा, दृढ़ता और राजनीतिक निर्भीकता के अद्वितीय संयोजन का एक उल्लेखनीय प्रमाण है। यह सचमुच इच्छाशक्ति की जीत है। इसे किसी भी पारंपरिक चुनावी गणित, संस्थागत मर्यादा, भाषा, क्षेत्र या जाति जैसी पहचानों या ममता बनर्जी जैसी दिग्गज हस्ती के प्रभाव ने नहीं रोका है।

ममता की पराजय पर कोलकाता के टेलीग्राफ की एक विश्लेषणात्मक टिप्पणी

 

टेलीग्राफ के पहले पेज को काफी लोग ध्यान से पढ़ते हैं।
आज का पेज
मीडिया की राष्ट्रीय कवरेज अपनी जगह है, पर बंगाल के चुनाव पर कोलकाता के टेलीग्राफ की कवरेज पर मैं खासतौर से ध्यान देता हूँ। टेलीग्राफ की पूरी कवरेज मेरी नज़र में उत्कृष्ट होती है, पर राज्य की राजनीति और उसके बरक्स राष्ट्रीय राजनीति में मुझे ऑब्जेक्टिविटी कम और व्यावसायिक समझदारी ज्यादा दिखाई पड़ती है, जो बात पूरे देश के मुख्यधारा भी बराबरी से लागू होती है। टेलीग्राफ की दूसरी विशेषता उसके मीम जैसी कवरेज है, जो कुछ लोगों को रचनात्मकता लगती है। मैं उसे रचनात्मकता की दृष्टि से नहीं देखता, बल्कि कई बार वह मर्यादा की सीमाओं को लाँघती है। बहरहाल इस विषय पर किसी दूसरे मौके पर बात करेंगे। आज बंगाल के परिणामों की कवरेज पर बात करें।

टेलीग्राफ की वैबसाइट पर मुझे एक पीस दिखाई पड़ा, जिसमें उन पाँच कारणों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है, जो भाजपा की जीत और तृणमूल की पराजय के पीछे हो सकते हैं। ऐसा ही एक पीस इंडियन एक्सप्रेस में भी देखने को मिला है। आज के टेलीग्राफ के संपादकीय को भी ध्यान से पढ़ने की ज़रूरत है। 

टेलीग्राफ में सौरज्या भौमिक के इस आइटम में कहा गया है: सत्ता विरोधी लहर (यानी भ्रष्टाचार) से लेकर महिलाओं की सुरक्षा और नौकरियों को लेकर चिंता तक, विधानसभा चुनाव 2026 के परिणाम के कई संकेतक मौजूद हैं। जैसा कि कहावत है, बीती बातों को समझना हमेशा आसान होता है, और इस सटीक परिप्रेक्ष्य में, बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

यहां पाँच ऐसे कारक दिए गए हैं जिन्होंने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के अप्रत्याशित पतन में योगदान दिया हो सकता है।

1.सत्ता विरोधी लहर (मुख्यतः भ्रष्टाचार के कारण)

टेलीग्राफ का आज का
संपादकीय

सत्ता में आने के पंद्रह वर्षों में, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने एक बहुआयामी राजनीतिक पथ प्रस्तुत किया, जिसमें शुरुआती विकास की गति से लेकर बाद के विवादों तक सब कुछ शामिल था। अपने पहले कार्यकाल में, टीएमसी ने कुछ मायनों में 1977 में सत्ता में आई वाम मोर्चा सरकार के शुरुआती वर्षों की झलक दिखाई। इसका पूरा ध्यान ग्रामीण विकास पर केंद्रित था। राज्य के भीतरी इलाकों के बड़े हिस्से में, बुनियादी ढाँचे, सड़कों, पुलियों और पुलों, में सुधार परिवर्तन के स्पष्ट संकेत बन गए।

यहाँ तक ​​कि कोलकाता भी पहले से ज्यादा साफ हो गया था।

बदलते ग्रामीण बंगाल की कहानी लोकप्रिय हुई, जिससे टीएमसी को कोलकाता में अपने पारंपरिक शहरी आधार से परे समर्थन जुटाने में मदद मिली। आने वाले वर्षों में व्यापक कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से इस विस्तार को और मजबूती मिली।

कन्याश्री, स्वस्थ साथी और सबुज साथी जैसी योजनाओं ने पार्टी की पहुँच को व्यापक बनाया, जिससे ग्रामीण और अर्ध-शहरी समुदायों में इसकी जड़ें और गहरी हो गईं।

2010 के दशक के मध्य तक, टीएमसी कोलकाता-केंद्रित पार्टी से बंगाल भर में मजबूत जमीनी उपस्थिति वाली पार्टी के रूप में सफलतापूर्वक परिवर्तित हो चुकी थी। हालांकि, इस सुदृढ़ीकरण के दौर के साथ-साथ कई आरोप भी लगे, जिन्होंने सरकार की छवि को धूमिल करना शुरू कर दिया।

सारदा चिट फंड घोटाला और नारदा स्टिंग ऑपरेशन ने भ्रष्टाचार के सवालों को सामने ला दिया, जबकि ‘सिंडिकेट राज’ और जबरन वसूली के लगातार आरोपों ने शासन और राजनीतिक संस्कृति के बारे में चिंताओं को बढ़ा दिया।

इन समस्याओं के बावजूद, एक एकजुट विपक्ष की अनुपस्थिति का मतलब था कि चुनावी चुनौतियाँ सीमित रहीं। इसका आंशिक कारण कथित राजनीतिक धमकियों और हिंसा का माहौल था,

टीएमसी ने 2016 और 2021 दोनों विधानसभा चुनावों में शानदार जीत हासिल की, हालांकि 2019 के लोकसभा चुनावों में उसकी लोकप्रियता में गिरावट आई। लेकिन 2021 के जनादेश के बाद के वर्षों में, कथित अनियमितताओं की एक शृंखला ने जाँच को और भी तेज कर दिया।

शिक्षक भर्ती घोटाले, राशन वितरण घोटाले, नगरपालिका भर्ती अनियमितताओं और कोयला और पशु तस्करी के मामलों की जांच के परिणामस्वरूप एक राज्य मंत्री और कई विधायकों सहित वरिष्ठ हस्तियों को गिरफ्तार किया गया।

Monday, May 4, 2026

मारियो मिरांडा

 

कार्टूनिस्ट मारियो मिरांडा के 100वें जन्मदिन 2 मई के मौके पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक विशेष पेज निकाला है। आरके लक्ष्मण की तरह टाइम्स हाउस के मारिया मिरांडा ने भी भारतीय कार्टूनिंग में अपना स्थान बनाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया, इलस्ट्रेटेड वीकली और फिल्मफेयर जैसी पत्रिकाओं में अपने काम के लिए मशहूर हुए मारियो की जीवन की झलक दिखाने वाली शैली लोगों के रोजमर्रा के जीवन के बहुआयामी दृष्टिकोण को दर्शाती थी। खासतौर से गोवा और मुंबई के लोगों के उनके चित्र हमेशा जीवंत और विविधता से भरे होते थे, जिनमें से प्रत्येक का अपना एक अलग व्यक्तित्व दिखाई पड़ता था।

1926 में जन्मे मारियो को रेखाचित्रों और व्यंग्य चित्रों से गहरा लगाव था। वे लोटोलिम स्थित अपने घर की दीवारों का अभ्यास करते थे! मारियो ने कभी चित्रकला का औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था। उन्होंने 1930-1940 के दशक में अपने शुरुआती दिनों में कुछ जेब खर्च कमाने के लिए अपने दोस्तों के लिए छोटे, प्यारे चित्रों वाले व्यक्तिगत पोस्टकार्ड बनाना शुरू कर दिया, जिसके लिए उन्हें थोड़ी सी रकम मिल जाती थी।

Friday, May 1, 2026

चुनाव, गरीबी और 'रेवड़ी-चर्चा!'

बीबीसी से कीर्तीश भट्ट का कार्टून साभार

पाँच राज्यों में चुनाव-परिणाम क्या आएँगे, इसे लेकर अटकलें लगाना मीडिया और नेताओं का शगल है। खाली बैठे लोगों को बहसबाजी के लिए विषय मिल जाते हैं। एक अरसे से मैंने इन बहसों से बचना शुरू कर दिया है। मुझे लगता है कि इनके चक्कर में जाने-अनजाने कुछ महत्त्वपूर्ण बातों की अनदेखी हो जाती है। बहरहाल, दो बातों ने मुझे इन चुनावों के साथ संदर्भ जोड़ने को प्रेरित किया है। एक, खातों में सीधे नकद धनराशि का जाना और दूसरे देश में अलग-अलग जगहों पर असंगठित कामगारों की नाराज़गी।  

यह नाराज़गी केवल नोएडा में ही नहीं है। नोएडा की परिघटना सनसनी के रूप में सामने आई, इसलिए उसे मीडिया में जगह मिल गई। इसमें शामिल कर्मचारी स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और उनसे जुड़ी कंपनियों से जुड़े हैं। इन कंपनियों को 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव्स दिए गए हैं। इन्होंने करोड़ों अरबों का मुनाफा भी कमाया है। राज्य सरकारों ने इन आंदोलनों को शांत करने के लिएगाजर और छड़ी दोनों का इस्तेमाल किया। पुलिस कार्रवाई भी की और वेतन में वृद्धि करके रियायतें भी दी हैं।

नोएडा की परिघटना ने देश का ध्यान इस नई समस्या की ओर खींचा है। इसके पहले ज़ोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट और ई-बिजनेस समूहों के माल को घर-घर पहुँचाने वाले गिग वर्कर्स की समस्याएँ सामने आईं। ऐसे ही समस्याएँ ओला, ऊबर और रैपिडो वगैरह के लिए काम करने वालों की हैं। ये शहरी गरीब हैं। भारत में लंबे अरसे तक गरीबी को हम गाँवों में तलाशते रहे, पर धीरे-धीरे वह शहरों में आती जा रही है, इसे आप बढ़ता शहरीकरण कह सकते हैं।

शहरी गरीब

बेशक ये वैसे नितांत गरीब नहीं हैं, जिन्हें गरीबी की रेखा के नीचे रखा जाता है, पर ये भी गरीब हैं। कोविड-काल में प्रवासी मज़दूरों के रूप में इनकी व्यथा दिखाई और सुनाई पड़ी थी। उसके बाद से किसी न किसी रूप में बार-बार सामने आ रही है। ये कामगार गैर-वाजिब बातें नहीं कर रहे हैं। एक मजदूर परिवार को शहरों में रहने के लिए अब किराए पर 5,000-6,000 रुपये, खाने पर 8,000-10,000 रुपये और पेट्रोल पर 3,000-4,000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। बिजली, परिवहन, फोन, स्कूल फीस या दवाइयों के खर्च के बिना ही यह कुल खर्च 20,000 रुपये हो जाता है। वे केवल गुजारे लायक आय की माँग कर रहे हैं।

ऊर्जा-आत्मनिर्भरता की राह में बड़ा कदम


भारत ने अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में हाल में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्वदेशी डिजाइन से निर्मित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने 6 अप्रैल को सफलतापूर्वक अपनी प्रथम क्रिटिकैलिटी प्राप्त की, जो नाभिकीय चेन रिएक्शन की शुरुआत है। यह प्रोटोटाइप एफबीआर 500 मेगावॉट विद्युत (एमडब्लूई) रिएक्टर है, जिसे भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (भाविनी) ने तमिलनाडु के कल्पक्कम नाभिकीय परिसर में निर्मित किया है।

यह तकनीक नाभिकीय ऊर्जा में यूरेनियम पर निर्भरता कम करेगी। इस उपलब्धि के साथ, भारत अपने तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण में प्रवेश कर गया है, जिसकी परिकल्पना डॉ होमी जहाँगीर भाभा ने की थी। वैश्विक स्तर पर भी यह महत्त्वपूर्ण परिघटना है। इसके पूर्ण संचालन में आने के बाद, रूस के बाद भारत, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का संचालन करने वाला, दुनिया का दूसरा देश बन जाएगा।

ईरान-युद्ध के आर्थिक दुष्प्रभावों के साथ, दुनिया भर के देश ऊर्जा सुरक्षा की तलाश में हैं। ज्यादातर देश कोयले और पेट्रोलियम के रूप में फॉसिल फ्यूल के सहारे हैं, पर अब उनके खत्म होने का समय है। वैसे भी उनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव को देखते हुए विकल्पों की तलाश चल रही है। पनबिजली, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे विकल्पों की तुलना में नाभिकीय ऊर्जा सबसे आगे है, क्योंकि बड़े स्तर पर वही जरूरत पूरी कर सकती है। उसके साथ भविष्य के तकनीकी विकास भी जुड़े हैं, जो नए विकल्पों को खोलेंगे।

अमेरिका के वैज्ञानिकों ने हाल में संलयन (फ्यूज़न) ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त घोषणा की है। व्यावसायिक रूप से इस पद्धति से बिजली बनाने में अभी कई दशक लगेंगे, पर भविष्य में यह ऊर्जा का विश्वसनीय स्रोत साबित होगा। यह बिजली भी परमाणु के नाभिकीय में छिपे ऊर्जा स्रोत पर आधारित होगी, पर अभी प्रचलित विखंडन पर आधारित नाभिकीय ऊर्जा से एकदम अलग और सुरक्षित होगी।