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Sunday, June 23, 2013

यादों का एक सफा, स्याह और सफेद

दो रोज़ बाद इमर्जेंसी के 38 साल पूरे हो जाएंगे। उस दौर को हम कड़वे अनुभव के रूप में याद करते हैं। पर चाहें तो उसे एक प्रयोग के नाम से याद कर सकते हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का एक पड़ाव। वह तानाशाही थी, जिसे लोकतांत्रिक अधिकार के सहारे लागू किया गया था और जिसका जिसका अंत लोकतांत्रिक तरीके से हुआ। इंदिरा गांधी चुनाव हारकर हटीं थीं। या तो वे लोकतांत्रिक नेता थीं या उनकी तानाशाही मनोकामनाएं इतनी ताकतवर नहीं थी कि इस देश को काबू में कर पातीं। इतिहास का यह पन्ना स्याह है तो सफेद भी है। इमर्जेंसी के दौरान भारतीय और ब्रिटिश संसदीय प्रणाली का अंतर स्पष्ट हुआ। हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की ताकत और उनकी प्रतिबद्धता भी उसी आग में तपकर खरी साबित हुई थी। भारत की खासियत है कि जब भी परीक्षा की घड़ी आती है वह जागता है।