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Sunday, September 3, 2017

अर्थव्यवस्था और उसके राजनीतिक जोखिम


एकसाथ आई दो खबरों से ऐसा लगने लगा है कि अर्थव्यवस्था चौपट हो रही है और विकास के मोर्चे पर सरकार फेल हो रही है। इस मामले के राजनीतिक निहितार्थ हैं, इसलिए शोर कुछ ज्यादा है। इस शोर की वजह से हम मंदी की ओर बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारणों पर ध्यान देने के बजाय उसके राजनीतिक निहितार्थ पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। कांग्रेस समेत ज्यादातर विरोधी दल नोटबंदी के फैसले को निशाना बना रहे हैं। इस मामले की राजनीति और अर्थनीति को अलग करके देखना मुश्किल है, पर उसे अलग-अलग करके पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।

बुनियादी रूप से केंद्र सरकार ने कुछ फैसले करके जो जोखिम मोल लिया है, उसका सामना भी उसे करना है। बल्कि अपने फैसलों को तार्किक परिणति तक पहुँचाना होगा। अलबत्ता सरकार को शाब्दिक बाजीगरी के बजाय साफ और खरी बातें कहनी चाहिए। जिस वक्त नोटबंदी हुई थी तभी सरकार ने माना था कि इस फैसले का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, पर यह छोटी अवधि का होगा। इन दिनों हम जीडीपी में गिरावट के जिन आँकड़ों पर चर्चा कर रहे हैं, वे नोटबंदी के बाद की दूसरी तिहाई से वास्ता रखते हैं। हो सकता है कि अगली तिहाई में भी गिरावट हो, पर यह ज्यादा लंबी नहीं चलेगी।

Monday, December 26, 2016

मोदी बनाम मूडीज़

मोदी सरकार के ढाई साल पिछले महीने पूरे हो गए. अब ढाई साल बचे हैं. सन 2008-09 की वैश्विक मंदी के बाद से देश की अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर वापस लौटाने की कोशिशें चल रहीं हैं. यूपीए सरकार मनरेगा, शिक्षा के अधिकार और खाद्य सुरक्षा जैसे लोक-लुभावन कार्यक्रमों के सहारे दस साल चल गई, पर भ्रष्टाचार के आरोप उसे ले डूबे. मोदी सरकार विकास के नाम पर सत्ता में आई है. अब उसका मध्यांतर है, जब पूछा जा सकता है कि विकास की स्थिति क्या है?  

Sunday, September 1, 2013

संकट नहीं, हमारी अकुशलता है

मीडिया की कवरेज को देखने से लगता है कि देश सन 1991 के आर्थिक संकट से भी ज्यादा बड़े संकट से घिर गया है। वित्त मंत्री और उनके बाद प्रधानमंत्री ने भी माना है कि संकट के पीछे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के अलावा राष्ट्रीय कारण भी छिपे हैं। राज्यसभा में शुक्रवार को प्रधानमंत्री तैश में भी आ गए और विपक्ष के नेता अरुण जेटली के साथ उनकी तकरार भी हो गई। पर उससे ज्यादा खराब खबर यह थी कि इस साल की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था की संवृद्धि की दर 4.4 फीसदी रह गई है, जो पिछले चार साल के न्यूनतम स्तर पर है। रुपए का डॉलर के मुकाबले गिरना दरअसल संकट नहीं संकट का एक लक्षण मात्र है। यदि हमारी अर्थव्यवस्था निर्यातोन्मुखी होती तो रुपए की कमजोरी हमारे फायदे का कारण बनती। पर हम दुर्भाग्य से आयातोन्मुखी हैं। पेट्रोलियम से लेकर सोने और हथियारों तक हम आयात के सहारे हैं।

Thursday, August 29, 2013

यूपीए का आर्थिक राजनीति शास्त्र

देश का राजनीतिक अर्थशास्त्र या आर्थिक राजनीति शास्त्र एक दिशा में चलता है और व्यावहारिक अर्थ व्यवस्था दूसरी दिशा में जाती है। सन 1991 में हमने जो आर्थिक दिशा पकड़ी थी वह कम से कम कांग्रेस की विचारधारात्मक देन नहीं थी। मनमोहन सिंह ने विश्व बैंक के 'वॉशिंगटन कंसेंसस' के अनुरूप ही अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया। वह दौर वैश्वीकरण का शुरूआती दौर था। ऐसा कहा जा रहा था कि भारत इस दौड़ में चीन से तकरीबन डेढ़ दशक पीछे है, जापान और कोऱिया से और भी ज्यादा पिछड़ गया है। बहरहाल तमाम आलोचनाओं के उदारीकरण की गाड़ी चलती रही। एनडीए सरकार भी इसी रास्ते पर चली। सन 2004 में यूपीए सरकार ने दो रास्ते पकड़े। एक था सामाजिक कल्याण पर खर्च बढ़ाने की राह और दूसरी उदारीकरण की गाड़ी को आगे बढ़ाने की राह। 2009 के बाद यूपीए का यह अंतर्विरोध और बढ़ा। आज जिस पॉलिसी पैरेलिसिस का आरोप मनमोहन सिंह पर लग रहा है वह वस्तुतः सोनिया गांधी के नेतृत्व के कारण है। यदि वे मानती हैं कि उदारीकरण गलत है तो प्रधानमंत्री बदलतीं। आज का आर्थिक संकट यूपीए के असमंजस का संकट भी है। यह असमंजस एनडीए की सरकार में भी रहेगा। भारत की राजनीति और राजनेताओं के पास या तो आर्थिक दृष्टि नहीं है या साफ कहने में वे डरते हैं। 

जिस विधेयक को लेकर राजनीति में ज्वालामुखी फूट रहे थे वह खुशबू के झोंके सा निकल गया. लेफ्ट से राइट तक पक्षियों और विपक्षियों में उसे गले लगाने की ऐसी होड़ लगी जैसे अपना बच्चा हो. उसकी आलोचना भी की तो जुबान दबाकर. ईर्ष्या भाव से कि जैसे दुश्मन ले गया जलेबी का थाल. यों भी उसे पास होना था, पर जिस अंदाज में हुआ उससे कांग्रेस का दिल खुश हुआ होगा. जब संसद के मॉनसून सत्र के पहले सरकार अध्यादेश लाई तो वृन्दा करात ने कहा था, हम उसके समर्थक हैं पर हमारी आपत्तियाँ हैं. हम चाहते हैं कि इस पर संसद में बहस हो. खाद्य सुरक्षा सार्वभौमिक होनी चाहिए. सबके लिए समान. मुलायम सिंह ने कहा, यह किसान विरोधी है. नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी कि मुख्यमंत्रियों से बात कीजिए. पर लगता है उन्होंने अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से बात नहीं की. भाजपा के नेता इन दिनों अलग-अलग सुर में हैं. दिल्ली में विधान सभा चुनाव होने हैं और पार्टी संग्राम के मोड में है. बिल पर संसद में जो बहस हुई, उसमें तकरीबन हरेक दल ने इसे चुनाव सुरक्षा विधेयक मानकर ही अपने विचार व्यक्त किए. सोमवार की रात कांग्रेसी सांसद विपक्ष के संशोधनों को धड़ाधड़ रद्द करने के चक्कर में सरकारी संशोधन को भी खारिज कर गए. इस गेम चेंजर का खौफ विपक्ष पर इस कदर हावी था कि सुषमा स्वराज को कहना पड़ा कि हम इस आधे-अधूरे और कमजोर विधेयक का भी समर्थन करते हैं. जब हम सत्ता में आएंगे तो इसे सुधार लेंगे.  

Sunday, August 25, 2013

रुपए की नहीं गवर्नेंस की फिक्र कीजिए

डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत गिरने का मतलब कितने लोग जानते हैं? कितने लोग यह जानते हैं कि यह कीमत तय कैसे होती है? और कितने लोग जानते हैं कि इसका हमारी जिन्दगी से वास्ता क्या है? हम महंगाई को जानते हैं बाजार में चीजों की उपलब्धता को पहचानते हैं और अपनी आय को कम या ज्यादा होने की प्रक्रिया को भी समझते हैं। विश्व की मुद्राओं की खरीद-फरोख्त का बाजार है विदेशी मुद्रा बाजार। दूसरे वित्तीय बाजारों के मुकाबले यह काफी नया है और सत्तर के दशक में शुरू हुआ है। फिर भी कारोबार के लिहाज से यह सबसे बड़ा बाजार है। विदेशी मुद्राओं में प्रतिदिन लगभग चार हजार अरब अमेरिकी डालर के बराबर कामकाज होता है। दूसरे बाजारों के मुकाबले यह सबसे ज्यादा स्थायित्व वाला बाजार है। फिर भी इसमें इन दिनों हो रहे बदलाव से हम परेशान हैं। यह बदलाव लम्बा नहीं चलेगा। एक जगह पर जाकर स्थिरता आएगी। वह बिन्दु कौन सा है यह अगले कुछ दिनों में साफ हो जाएगा।

Monday, June 11, 2012

यह अतुल्य भारत का अंत नहीं है

यह भारत की विकास कथा का अंत है। एक वामपंथी पत्रिका की कवर स्टोरी का शीर्षक है। आवरण कथा के लेखक की मान्यता है कि आर्थिक विकास में लगे ब्रेक का कारण यूरोपीय आर्थिक संकट नहीं देश की नीतियाँ हैं। उधर खुले बाजार की समर्थक पत्रिका इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट का शीर्षक है ‘फेयरवैल टु इनक्रेडिबल इंडिया’ अतुल्य भारत को विदा। वामपंथी और दक्षिणपंथी एक साथ मिलकर सरकार को कोस रहे हैं। देश की विकास दर सन 2011-12 की अंतिम तिहाई में 5.3 फीसदी हो गई। पिछले सात साल में ऐसा पहली बार हुआ। पूरे वित्त वर्ष में यह 7 फीसदी से नीचे थी। निर्माण क्षेत्र में यह 3 फीसदी थी जो इसके एक साल पहले 9 फीसदी हुआ करती थी। राष्ट्रीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अप्रेल में 10.4 प्रतिशत हो गया, जो मार्च में 8.8 और फरवरी में 7.7 था। विदेश व्यापार में घाटा एक साल में 56 फीसदी बढ़ गया। विदेशी मुद्रा कोष में लगातार गिरावट हो रही है। जो कोष 300 से काफी ऊपर होता था, वह 25 मई को 290 अरब डॉलर रह गया है। रुपए की कीमत लगातार गिर रही है।

Saturday, June 9, 2012

न इधर और न उधर की राजनीति

मंजुल का कार्टून साभार
ममता बनर्जी ने पेंशन में विदेशी निवेश के प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया है। पिछले गुरुवार को हुई कैबिनेट की बैठक में उदारीकरण के प्रस्ताव सामने ही नहीं आ पाए। सरकार दुविधा में नज़र आती है। अब लगता है कि पहले राष्ट्रपति चुनाव हो जाए, फिर अर्थव्यवस्था की सुध लेंगे। पिछले सोमवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद अचानक सरकार आर्थिक उदारीकरण के अपने एजेंडा को तेज करने को उत्सुक नज़र आने लगी। बुधवार को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े विभागों के मंत्रियों की बैठक में तमाम कामों में तेजी लाने का फैसला हुआ। इस साल तकरीबन साढ़े नौ हजार किमी लम्बे राजमार्गों के निर्माण और 4360 किमी लम्बे राजमार्गों के पुनरुद्धार का काम शुरू होना है। दो नए ग्रीनफील्ड हवाई अड्डों, दो नए बंदरगाहों और कम से कम 18,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन की अतिरिक्त क्षमता का सृजन होना है। बुलेट ट्रेन चलाने के लिए एक नए संगठन की स्थापना होनी है। हजारों लाखों करोड़ की परियोजनाएं पिछले कुछ समय से स्वीकृति के लिए पड़ी हैं। आर्थिक उदारीकरण की राह में आगे बढ़ने के लिए विमानन, इंश्योरेंस, पेंशन और रिटेल से जुड़े फैसले करने की घड़ी आ गई है। डीज़ल और रसोई गैस से सब्सिडी खत्म करने का मौका आ गया है और शायद मनरेगा और खाद्य सुरक्षा बिल जैसे लोक-लुभावन कार्यों से हाथ खींचने की घड़ी भी। क्या यह काम आसान होगा? और क्या सरकार के सामने यही समस्या है? लगता है जैसे केन्द्र सरकार आर्थिक सन्निपात और राजनीतिक बदहवासी में है।

Friday, May 25, 2012

आग सिर्फ पेट्रोल में नहीं लगी है

हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून
भारत में पेट्रोल की कीमत राजनीति का विषय है। बड़ी से बड़ी राजनीतिक ताकत भी पेट्रोलियम के नाम से काँपती है। इस बार पेट्रोल की कीमतों में एक मुश्त सबसे भारी वृद्धि हुई है। इसके सारे राजनीतिक पहलू एक साथ आपके सामने हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि कोई एक राजनीतिक पार्टी ऐसी नहीं है जिसने इस वृद्धि की तारीफ की हो। और जिस सरकार ने यह वृद्धि की है वह भी हाथ झाड़कर दूर खड़ी है कि यह तो कम्पनियों का मामला है। इसमें हमारा हाथ नहीं है। जून 2010 से पेट्रोल की कीमतें फिर से बाजार की कीमतॆं से जोड़ दी गई हैं। बाजार बढ़ेगा तो बढ़ेंगी और घटेगा तो घटेंगी। इतनी साफ बात होती तो आज जो पतेथर की तरह लग रही है वह वद्धि न होती, क्योंकि जून 2010 से अबतक छोटी-छोटी अनेक वृद्धियाँ कई बार हो जातीं और उपभोक्ता को नहीं लगता कि एक मुश्त इतना बड़ा इज़ाफा हुआ है।