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Friday, August 28, 2020

केवल अभिनय

बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह यानी बर्लिनेल ने फैसला किया है कि अगले साल के संस्करण के अभिनय वर्ग के इसके पुरस्कार लिंग-निरपेक्ष होंगे। यानी महिला और पुरुष वर्ग के अलग-अलग पुरस्कार नहीं होंगे। सर्वश्रेष्ठ लीड अभिनय का एक पुरस्कार होगा। भले ही वह महिला को मिले या पुरुष को। इसी तरह सहायक अभिनय का पुरस्कार भी होगा। ये दोनों पुरस्कार अभी तक लिंग-सापेक्ष थे। यह घोषणा लैंगिक समानता के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। अभिनय को महिला और पुरुष वर्ग में बाँटने की प्रवृत्ति खत्म होगी, तो हम लैंगिक संवेदनशीलता के दूसरे महत्वपूर्ण सवालों की तरफ देख पाएंगे।

बर्लिनेल दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म समारोह माना जाता है और सबसे प्रगतिशील भी। जीवन के दूसरे क्षेत्रों की तरह संस्कृति में भी विभाजन या वर्गीकरण के साथ कई किस्म की असमानताएं शुरू होती हैं। यों एक दृष्टि यह भी है कि हाशिए के वर्गों के लिए अलग पुरस्कारों का वर्ग भी होना चाहिए। मसलन वैश्विक स्तर पर अश्वेत फिल्मकारों के अलग पुरस्कार वगैरह, पर अंततः हमें लैंगिक-सापेक्षता को छोड़ना चाहिए। आखिरकार महाश्वेता देवी, निर्मल वर्मा, केदारनाथ सिंह और कृष्णा सोबती को उनके लेखन के आधार पर ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया। पुरुष लेखक या महिला लेखक के रूप में नहीं। पत्रकारिता के पुलिट्जर पुरस्कार लिंग-निरपेक्ष होते हैं। अच्छे रिपोर्टर या फोटोग्राफर का फैसला लैंगिक आधार पर करने से गुणात्मक पैमाने बदल जाते हैं। इस लिहाज से यह अच्छा फैसला है।

Wednesday, February 23, 2011

लड़कियों की मदद करें



गिरिजेश कुमार ने इस बार लड़कियों के विकास और उनके सामने खड़ी समस्याओं को उठाया है। मेरे विचार से भारतीय समाज में सबसा बड़ा बदलाव स्रियों से जुड़ा है। यह अभी जारी । दो दशक पहले के और आज के दौर की तुलना करें तो आप काफी बड़ा बदलाव पाएंगे। लड़कियाँ जीवन के तकरीबन हर क्षेत्र में आगे आ रहीं हैं। शिक्षा और रोजगार में जैसे-जैसे इनकी भागीदारी बढ़ेगी वैसे-वैसे हमें बेहतर परिणाम मिलेंगे। बावजूद इसके पिछले नवम्बर में जारी यूएनडीपी की मानव विकास रपट के अनुसार महिलाओं के विकास के मामले में भारत की स्थित बांग्लादेश और पाकिस्तान से पीछे की है। हम अफ्रीका के देशों से भी पीछे हैं। इसका मतलब यह कि हम ग्रामीण भारत तक बदलाव नहीं पहुँचा पाए हैं। बदलाव के लिए हमें अपने सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक सोच में बदलाव भी करना होगा। 

आधुनिकता की इस दौड में कहाँ हैं लड़कियां?
गिरिजेश कुमार
आज के इस वैज्ञानिक युग में जहाँ हम खुद को चाँद पर देख रहे हैं वहीँ इस 21 वीं शताब्दी की कड़वी सच्चाई यह भी है कि हमारे  देश में  लडकियों के साथ दोहरा व्यवहार किया जाता है | आखिर हम किस युग में जी रहे हैंआधुनिकता की चादर ओढ़े इस देश में आधुनिकता कम फूहड़ता ज्यादा दिखती है किस आधुनिकता  की दुहाई देते हैं हम जब देश की आधी आबादी इससे वंचित है?