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Saturday, January 3, 2015

भारत सौर ऊर्जा पर 100 अरब डॉलर खर्च करेगा

राजस्थान में जयपुर के पास सांभर झील के निकट प्रस्तावित विश्व का सबसे
 बड़ा सौर ऊर्जा प्लांट
रायटर्स की खबर के मुताबिक भारत सरकार ने अगले सात साल में सौर ऊर्जा पर 100 अरब डॉलर के निवेश की योजना बनाई है। लक्ष्य है सौर ऊर्जा की क्षमता एक लाख मेगावाट करना। भारत में सात लाख से 21 लाख मेगावॉट तक सौर बिजली बनाने लायक यानी यूरोपीय देशों के मुकाबले दुगनी धूप उपलब्ध है। हैंडबुक ऑन सोलर रेडिएशन ओवर इंडिया के अनुसार, भारत के अधिकांश भाग में एक वर्ष में 250-300 धूप निकलने वाले दिनों सहित प्रतिदिन प्रति वर्गमीटर 4-7 किलोवाट घंटे का सौर विकिरण प्राप्त होता है। राजस्थान और गुजरात में प्राप्त सौर विकिरण उड़ीसा में प्राप्त विकिरण की अपेक्षा ज्यादा है। देश में 30-50 मेगावाट/ प्रतिवर्ग किलोमीटर छायारहित खुला क्षेत्र होने के बावजूद उपलब्‍ध क्षमता की तुलना में देश में सौर ऊर्जा का दोहन काफी कम है (जो 31-5-2014 की स्थिति के अनुसार 2647 मेगावाट है)। यूपीए सरकार ने सन 2009 में जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन योजना की शुरुआत की थी। यह जलवायु परिवर्तन पर राष्‍ट्रीय कार्य योजना के एक हिस्‍से के रूप में थी। इस मिशन का लक्ष्य 2022 तक 20 हजार मेगावाट क्षमता वाली ग्रिड से जोड़ी जा सकने वाली सौर बिजली की स्‍थापना और 2 हजार मेगावाट के समतुल्‍य गैर-ग्रिड सौर संचालन के लिए नीतिगत कार्य योजना का विकास करना है। इसमें सौर तापीय तथा प्रकाशवोल्टीय दोनों तकनीकों के प्रयोग का अनुमोदन किया गया। इस मिशन का उद्देश्‍य सौर ऊर्जा के क्षेत्र में देश को वैश्विक नेता के रूप में स्‍थापित करना है।

इस दिशा में जो महत्वाकांक्षी कार्यक्रम तैयार किया जा रहा है उसे देखते हुए भारत सौर ऊर्जा के मामले में दुनिया के ज्यादातर देशों से आगे जाना चाहता है। खासतौर से हमें जर्मनी से प्रेरणा मिल रही है, जिसने अपना परमाणु ऊर्जा का कार्यक्रम पूरी तरह समाप्त करने का ऐलान किया है। हाल में हरियाणा सरकार ने बड़े प्लॉटों और मॉल में सौर बिजली संयंत्र लगाना अनिवार्य कर दिया है। पंजाब, दिल्ली और उत्तर प्रदेश सरकारों ने इस मामले में पहल की है। पिछले साल मध्य प्रदेश के नीमच की जावद तहसील के भगवानपुरा (डिकेन) में शुरू हुआ सौर एनर्जी प्लांट एशिया का सबसे बड़ा सौर एनर्जी प्लांट बताया जाता है। इस सबसे बड़ी सौर ऊर्जा परियोजना का शुभारंभ 26 फरवरी 2014 को हुआ था। इसी तरह राजस्थान में सांभर झील इलाके में दुनिया का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा प्लांट लगाया जा रहा है।

सौर ऊर्जा संयंत्र महंगे होते हैं, पर भारत सरकार को लगता है कि जब बड़े स्तर पर उन्हें लगाया जाएगा तो एक समय के बाद वे सस्ते पड़ेंगे। अनुमान है कि इतने बड़े स्तर पर सौर ऊर्जा प्लांट लगाने से तीन साल के भीतर ताप बिजलीघरों के मुकाबले उनकी लागत का अंतर खत्म हो जाएगा। उनसे उत्पादित बिजली की लागत कम होगी और यह बिजली पर्यावरण-मित्र भी होगी। रायटर की खबर के अनुसार Solar energy in India costs up to 50 percent more than power from sources like coal. But the government expects the rising efficiency and falling cost of solar panels, cheaper capital and increasing thermal tariffs to close the gap within three years.,,,Foreign companies say they are enthused by Modi's personal interest, but red tape is still an issue. "The policy framework needs to be improved vastly. Documentation is cumbersome. Land acquisition is time-consuming. Securing debt funding in India and financial closures is a tough task," said Canadian Solar's Vinay Shetty, country manager for the Indian sub-continent.

पूरी खबर पढ़ें रायटर्स की वैबसाइट पर





Sunday, August 4, 2013

वेंटीलेटर पर लोकतंत्र

हालांकि चार अलग-अलग प्रसंग हैं, पर सूत्र एक है। लगता है हम लोकतंत्र से भाग रहे हैं। या फिर हम अभी लोकतंत्र के लायक नहीं हैं। या लोकतंत्र हमारे लायक नहीं है। या लोकतंत्र को हम जितना पाक-साफ समझते हैं, वह उतना नहीं हो सकता। उसकी व्यावहारिक दिक्कतें हैं। वह जिस समाज में है, वह खुद पाक-साफ नहीं है। दो साल पहले इन्हीं दिनों जब अन्ना हजारे का आंदोलन चल रहा था तब बार-बार यह बात कही जाती थी कि कानून बनाने से भ्रष्टाचार नहीं खत्म नहीं होगा। इसके लिए बड़े स्तर पर सामाजिक बदलाव की जरूरत है। सामाजिक बदलाव बाद में होगा, कानून ही नहीं बना। किसने रोका उसे? और कैसे होगा बदलाव?

Wednesday, February 23, 2011

लड़कियों की मदद करें



गिरिजेश कुमार ने इस बार लड़कियों के विकास और उनके सामने खड़ी समस्याओं को उठाया है। मेरे विचार से भारतीय समाज में सबसा बड़ा बदलाव स्रियों से जुड़ा है। यह अभी जारी । दो दशक पहले के और आज के दौर की तुलना करें तो आप काफी बड़ा बदलाव पाएंगे। लड़कियाँ जीवन के तकरीबन हर क्षेत्र में आगे आ रहीं हैं। शिक्षा और रोजगार में जैसे-जैसे इनकी भागीदारी बढ़ेगी वैसे-वैसे हमें बेहतर परिणाम मिलेंगे। बावजूद इसके पिछले नवम्बर में जारी यूएनडीपी की मानव विकास रपट के अनुसार महिलाओं के विकास के मामले में भारत की स्थित बांग्लादेश और पाकिस्तान से पीछे की है। हम अफ्रीका के देशों से भी पीछे हैं। इसका मतलब यह कि हम ग्रामीण भारत तक बदलाव नहीं पहुँचा पाए हैं। बदलाव के लिए हमें अपने सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक सोच में बदलाव भी करना होगा। 

आधुनिकता की इस दौड में कहाँ हैं लड़कियां?
गिरिजेश कुमार
आज के इस वैज्ञानिक युग में जहाँ हम खुद को चाँद पर देख रहे हैं वहीँ इस 21 वीं शताब्दी की कड़वी सच्चाई यह भी है कि हमारे  देश में  लडकियों के साथ दोहरा व्यवहार किया जाता है | आखिर हम किस युग में जी रहे हैंआधुनिकता की चादर ओढ़े इस देश में आधुनिकता कम फूहड़ता ज्यादा दिखती है किस आधुनिकता  की दुहाई देते हैं हम जब देश की आधी आबादी इससे वंचित है?

Friday, December 17, 2010

बदलता वक्त


कुछ दिन के लिए मै लखनऊ चला गया। वहाँ नवीन जोशी के पुत्र हर्ष के विवाह समारोह में रूपरेखा वर्मा, नरेश सक्सेना,  राजीव लोचन साह, वीरेन्द्र यादव, मुद्राजी, सुनील दुबे, अश्विनी भटनागर, दिलीप अवस्थी, गुरदेव नारायण,  शरत प्रधान, ज्ञानेन्द्र शर्मा, घनश्याम दुबे, रवीन्द्र सिंह, मुदित माथुर, विजय दीक्षित, मुकुल मिश्रा समेत अनेक पुराने मित्रों से मिलने का मौका मिला। लखनऊ में या दिल्ली में मुझे जहाँ भी किसी से बात करने का अवसर मिला हर जगह एक बेचैनी है। इस बेचैनी के पीछे कोई एक कारण नहीं है। इन कारणों पर मैं भविष्य में कभी लिखूँगा। लखनऊ से पोस्ट लिखने का मौका नहीं मिला। आज मैं चीनी प्रधानमंत्री की यात्रा के संदर्भ में कुछ लिख रहा हूँ। साथ ही अपने कुछ पुराने लेखों की कतरनें लगा रहा हूँ जो पोस्ट नहीं कर पाया था।

चीन के संदर्भ में मेरी राय यह है कि हमें और चीन को आपस में समझने में कुछ समय लगेगा। सन 2012 में चीन का नया नेतृत्व सामने आएगा। तब तक भारतीय व्यवस्था भी कोई नया रूप ले रही होगी। 2014 के भारतीय चुनाव एक बड़ा बदलाव लेकर आएंगे। मैं कांग्रेस या गैर-कांग्रेस के संदर्भ में नहीं सोच रहा हूँ। ज्यादातर राजनैतिक दल जिस तरीके से अपराधी माफिया और बड़े बिजनेस हाउसों के सामने नत-मस्तक हुए हैं उससे लगता है कि जनता इन्हें ज्यादा बर्दाश्त नहीं करेगी। बहरहाल..

Thursday, October 7, 2010

मीडिया की भी परीक्षा का मौका है

एशियाड 1982 के मार्च पास्ट में टीमें हिन्दी के अकारादिक्रम से आईं थी। कॉमनवैल्थ गेम्स में ऐसा नहीं हुआ। इसकी एकमात्र वज़ह यह होगी कि गेम्स की नियमावली में साफ लिखा गया है कि टीमें अंग्रेज़ी के अक्षरक्रम से मैदान में आएंगी। पर टीमों के आगे नाम पट्टिका में अंग्रेजी के साथ हिन्दी में भी नाम लगाए जा सकते थे। स्टेडियम में घोषणाएं हिन्दी में की जा सकतीं थीं। दूरदर्शन इसका एकमात्र टीवी प्रसारक था। वहाँ दो एंकरों में से एक हिन्दी में हो सकता था। नाम का परिचय हिन्दी में भी हो सकता है। यह बात सिर्फ यह ध्यान दिलाने के लिए है कि हिन्दी भारत की राजभाषा है और अंग्रेजी काम-चलाने के लिए उसके साथ चल रही है।

व्यावहारिक बात यह है कि सिर्फ हिन्दी से काम नहीं चलता। चूंकि इसका प्रसारण कॉमनवैल्थ देशों में हो रहा था, इसलिए अंग्रेजी वाली बात समझ में आती है, पर स्टेडियम में उपस्थित और टीवी पर प्रसारण देख रही जनता का काफी बड़ा वर्ग हिन्दी जानता था। उस जनता का हिन्दी प्रेम अच्छा होता तो शायद ऐसा नहीं होता, पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के हिन्दी में दो शब्द बोलने पर खुशी की लहर कुछ लोगों ने महसूस की होगी। बीजिंग ओलम्पिक के मार्च पास्ट में टीमों की नाम पट्टिकाओं पर अंग्रेजी के साथ चीनी में भी लिखा था। वहाँ चूंकि अंग्रेजी जानने वाले होते ही नहीं इसलिए ओलिम्पिक के पहले तमाम तरह के लोगों को अंग्रेजी सिखाई गई। हमारे यहाँ भी कॉमनवैल्थ गेम्स के पहले दिल्ली के रेलवे स्टेशन के कुलियों को अंग्रेजी सिखाई गई।

कॉमनवैल्थ गेम्स का उद्घाटन समारोह प्रभावशाली था। कम से कम मीडिया ने उसे प्रभावशाली बताया है। यों मीडिया-कवरेज पर जाएं तो अक्सर भ्रम पैदा होता है कि सही क्या है और ग़लत क्या है। गेम्स की जबर्दस्त फ़ज़ीहत के बाद उद्घाटन समारोह को देखते ही मीडिया दंग रह गया। हमारे लोक-संगीत और लोक संस्कृति में इतना दम है कि उसे ढंग से पेश कर दिया जाय तो दंग रह जाना पड़ता है। देश को शोकेस करने के लिए रेलगाड़ी के माध्यम से जो भारत-यात्रा पेश की गई वह रोचक थी। अलबत्ता उसे और वास्तविक बनाया जा सकता था।

हमारा लोकतंत्र सिर्फ नेताओं के भाषणों तक सीमित नहीं है। पंचायत राज, आरटीआई, चुनाव प्रणाली, जनगणना और मीडिया को अच्छे ढंग से शोकेस किया जा सकता था। सॉफ्टवेयर, सर्विस सेक्टर और शिक्षा हमारी एक और उपलब्धि है। लोक-संगीत और लोक-संस्कृति के साथ-साथ हमें आधुनिक भारत को शोकेस करने की ज़रूरत है। इस समारोह की रौनक एयरोस्टैट से बढ़ी, पर यह हमारी इंजीनियरी का कमाल नहीं था। एआर रहमान का गीत न तो उनका और न आधुनिक भारत का श्रेष्ठ लोकप्रिय संगीत था। बेहद औसत दर्जे का और बेमेल गीत साबित हुआ। उसे लम्बा खींचने के लिए जय हो का इस्तेमाल करना पड़ा। एक अखबार ने बॉलीवुड की अपर्याप्त अनुपस्थिति की ओर भी इशारा किया है। वास्तव में बॉलीवुड की इसके मुकाबले कई गुना बेहतर उपस्थिति 2006 के मेलबर्न कॉमनवैल्थ गेम्स में थी।  

कॉमनवैल्थ गेम्स की एक विशेषता उसे दूसरे खेलों से अलग करती है। इसमें देशों के अलावा कुछ ऐसे इलाकों की टीमें हिस्सा लेतीं हैं, जो स्वतंत्र देश नहीं हैं। वेल्स, नॉर्दर्न आयरलैंड, स्कॉटलैंड, तुवालू, वनुआतू, जर्सी, सेंट किट्स, नाउरू, किरिबाती, सेशेल्स, नोरफॉल्क या आइल ऑफ मैन को अपनी रोचक पहचान के साथ भाग लेने का मौका इसी समारोह में मिलता है। उद्घाटन समारोह में भारतीय टीम के बाद किसी टीम का स्वागत गर्मजोशी से हुआ तो वह पाकिस्तान थी। एकबार गुज़र जाने के बाद कैमरे ने दुबारा इस टीम की प्रतिक्रिया पर नज़रे-इनायत नहीं की। कवरेज की क्वालिटी अच्छी थी, दूरदर्शन पर विज्ञापनों की श्रृंखला इतनी लम्बी चलती है कि ऊब होती है। संयोग से बिग बॉस के दरवाजे उसी वक्त खुल रहे थे, इसलिए काफी दर्शक उधर निकल गए। बहरहाल दूरदर्शन को अपने पैर ज़माने का एक मौका इन खेलों के मार्फत मिला है।

जितनी निगेटिव पब्लिसिटी इन गेम्स को मिली है शायद ही किसी दूसरे गेम्स को मिली होगी। खेल गाँव से और स्टेडियमों से अब पॉज़ीटिव खबरें आ रहीं हैं। इससे मीडिया का बचकानापन भी ज़ाहिर होता है। पल-पल में रंग बदलना अधकचरेपन की निशानी है। उद्घाटन समारोह या समापन समारोह का महत्व औपचारिक है। गेम्स की सफलता या विफलता का पैमाना खेल का स्तर और प्रतियोगिताओं के संचालन में है। मीडिया को खेल की गुणवत्ता का आकलन करना चाहिए। इन खेलों में भारतीय टीम को बड़ी संख्या में मेडल मिलने की उम्मीद है। इसकी वजह एक तो अच्छे खिलाड़ियों की अनुपस्थिति है दूसरे कुश्ती और बॉक्सिंग जैसे खेलों में बेहतर तैयारी है।

कुश्ती देसी खेल है। कॉमनवैल्थ खेलों में कुश्ती के लिहाज़ से हमारा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 1970 के एडिनबरा गेम्स में रहा जहाँ हमारी टीम ने 12 मेडल जीते। इनमें से 9 मेडल कुश्ती में थे। इन 9 में 5 स्वर्ण, 3 रजत और 1 कांस्य पदक था। इस बार हम अकेले कुश्ती में 21 पदक जीतने की आशा रखते हैं। इतने न भी मिलें तब भी जो जीतेंगे वे अब तक के सबसे ज्यादा होंगे। हम नेटबॉल, रग्बी सेवंस और लॉन बॉल में भी पदक जीतने की होड़ में हैं। पर शायद सबसे बड़ी प्रतिष्ठा हॉकी से जुड़ी है। इस साल मार्च में दिल्ली में हुई विश्व कप हॉकी प्रतियोगिता में हमारा प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। यों भी हॉकी की हमारे देश में वैसी ही फज़ीहत हो रही है जैसी कॉमनवैल्थ गेम्स की हुई है। यह हमारी संगठन क्षमता की विफलता को भी ज़ाहिर करता है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तुरत-फुरत फैसले करता है। जल्द नाराज़ होता है और फौरन खुश होता है। तारीफ और आलोचना के लिए अतिवादी शब्दावली का इस्तेमाल करता है। बजाय इसके ठंडे मिजाज़ और गहरे विश्लेषण की ज़रूरत है। अनुभवहीनता या आपसी प्रतियोगिता की लपेट में मीडिया गलतियाँ करता है। पब्लिक स्क्रूटिनी का यह सर्वश्रेष्ठ फोरम अनायास ही पब्लिक स्क्रूटिनी का सबसे महत्वपूर्ण विषय नहीं बना है। उसे ध्यान देना चाहिए कि हमने अपनी व्यवस्था और देश को ही शोकेस नहीं किया है मीडिया को भी शोकेस किया है। कॉमनवैल्थ गेम्स के दौरान हमारी सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक क्षमता, खेल आयोजन में कुशलता, खेलों में दक्षता के साथ, मीडिया कवरेज से लेकर मेहमानवाज़ी तक तमाम बातों की परीक्षा होगी। ऐसे मौके छवि को बनाने या बिगाड़ने के लिए मिलते हैं।  


समाचार फॉर मीडिया डॉट कॉम में प्रकाशित

Thursday, September 2, 2010

देश की छवि कौन बिगाड़ता है?

इधर कॉमनवैल्थ खेलों को लेकर काफी फ़ज़ीहत हो रही है। ज्यादातर निर्माण कार्य़ समय से पीछे हैं। उनमें घपलों की शिकायतें भी हैं। हमारा अराजक मीडिया जब मैदान में उतरता है तो उसका एकसूत्री कार्यक्रम होता है। वह पिल पड़ता है। इसके बाद वह सब कुछ भूल जाता है। जब फ़जीहत ज़्यादा हो गई तो कुछ लोगों ने कहा, देश की प्रतिष्ठा के लिए कुछ कम करो। इसपर मीडिया अचानक खामोश हो गया।

यह सब मीडिया के लिहाज से ही नहीं हो रहा है। जिसे राष्ट्रीय प्रतिष्ठा कहते हैं वह दिखावटी चीज़ नहीं है। हम जापान के लोगों को कर्तव्यनिष्ठ मानते हैं, तो किसलिए? उन्होंने अपने मीडिया से इसका प्रचार तो नहीं किया। प्रतिष्ठा न तो प्रचार से मिलती है और न दुष्प्रचार से बिगड़ती है। हमारी छवि कहीं खराब हो रही है तो उसके सूत्र हमारे काम-काज के तरीके में ही छिपे हैं। उन्हें ठीक करने की ज़रूरत है।

कॉमनवैल्थ गेम्स के लिए पचास हजार करोड़ रुपए तक खर्च करने वाले देश में गरीबों के भोजन, गाँवों की सड़कों, स्कूलों और सरकारी अस्पतालों का क्या हाल है? इससे हमारी प्राथमिकताएं नज़र आती हैं। जो समाज अपने व्यवहार में असंतुलित है वह दुनिया में अच्छी छवि का हकदार क्यों है?

हिन्दुस्तान में प्रकाशित मेरा लेख पढ़ने के लिए कतरन पर क्लिक करें

Sunday, August 15, 2010

आज़ादी

चौसठवां स्वतंत्रता दिवस भी वैसा ही रहा जैसा होता रहा है। प्रधानमंत्री का रस्मी भाषण, ध्वजारोहण, देश भक्ति के गीत वगैरह -वगैरह। इधर एसएमएस भेजने का चलन बढ़ा है। बधाई देने की रस्म अदायगी बढ़ी है। यह दिन क्या हमको कुछ सोचने का मौका नहीं देता? अच्छा या बुरा क्या हो रहा है यह सोचने को प्रेरित नहीं करता? 


जिससे पूछिए वह निराश मिलेगा। देश से, इसके नेताओं से, अपने आप से। क्या हमारे पास खुश होने के कारण नहीं हैं? हमने कुछ भी हासिल नहीं किया?  बहरहाल मैं गिनाना चाहूगा कि हमने क्या हासिल किया। क्या खोया, उसे मैं क्या गिनाऊं। तमाम लोग गिना रहे हैं। 


इस गिनाने को मैं पहली उपलब्धि मानता हूँ। हम लोग अपनी बदहाली को पहचानने तो लगे हैं। हम क्या खो रहे हैं, यह समझने लगे हैं। शिक्षा और संचार के और बेहतर होने पर हम और शोर सुनेंगे। यह खोना नहीं पाना है। ये लोग जवाब माँगेंगे। आज नहीं माँगते हैं तो कोई बात नहीं कल माँगेंगे।


हमारी प्रतिरोध-प्रवृत्ति बढ़ी है। इस बात का रेखांकित होना उपलब्धि है। 


राज-व्यवस्था जनता से दूर होने लगी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसी बुनियादी चीजों से भाग रही है। भाग कर कहाँ जाएगी। जनता उसे खींचकर मैदान में ले आएगी। शिक्षा अगर स्कूल में नहीं मिली तो अशिक्षा हमें आगे बढ़ने से रोकेगी। यह चक्र थोड़ा लम्बा चलेगा, पर राज-व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं पाएगी। 


टेलीकम्युनिकेशंस का फायदा बिजनेस वालों से ज्यादा जनता को मिलेगा। सारा देश जुड़ रहा है। जानकारियाँ बहुत जल्द यात्रा करतीं हैं। जानकारियाँ देने वाले यानी मीडियाकर्मी बहुत ज्यादा समय तक मसाला-चाट खिलाकर नहीं चलेंगे। दो-चार साल यह भी सही। 


जनसंख्या बढ़ रही है। जागरूक जनसंख्या बढ़ रही है। अब ढोर-डंगर नहीं जागरूक नागरिक बढ़ रहे हैं। वे सवाल पूछेंगे। निराशा की कोई सीमा होती है। हमें अपनी निराशा का सहारा लेना चाहिए। इस निराशा से लड़कर ही तो आप उम्मीदों के पर्वतों को जीतेंगे। 


पर ये उम्मीदें तब तक पूरी नहीं होंगी, जब तक आप अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगे। 


क्या आप जागरूक नागरिक हैं?


क्या आप अपनी शिकायत शिकायतघर में करते हैं?


क्या आप रिश्वत देने के बजाय रिश्वत लेने वाले की गर्दन दबोचना पसंद करते हैं?


क्या आप चार पेड़ कहीं लगाकर उन्हें पानी देते हैं, किसी गरीब बच्चे को पढ़ाते हैं?


छोटे काम कीजिए बड़े काम अपने आप हो जाएंगे। आप कमज़ोर नहीं ताकतवर हैं। 

Tuesday, August 10, 2010

हॉकी में हम नवें स्थान पर

भारत में हॉकी महासंघ का झगड़ा चल रहा है। वहीं एफआईएच ने नई विश्व रैंकिंग ज़ारी की है जिसमें भारतीय टीम नौवें स्थान पर है। पाकिस्तान से एक स्थान नीचे। 
रैंकिंग क्रम इस प्रकार हैः-
पुरुष
1. ऑस्ट्रेलिया     2620 पॉइंट
2. जर्मनी            2370
3. नीदरलैंड         2213
4. इंग्लैंड             2047
5. स्पेन               2040
6. कोरिया            1888
7. न्यूज़ीलैंड         1610
8. पाकिस्तान       1410
9. भारत               1280
10. कनाडा            1221  
11. अर्जेंटीना         1187
12. द अफ्रीका        1180
13 बेल्जियम         1148
14. चीन                 1053
15. मलेशिया          1039
16. जापान              0928

सम्पूर्ण हॉकी रैंकिंग



Friday, August 6, 2010

हमारे ग़म और हमारी खुशियाँ

आज तीन तरह की खबरों पर ध्यान जा रहा है। तीनों हमें कुछ न कुछ सोचने को मज़बूर करती हैं। इनमें हमारी कमज़ोरी ज़ाहिर होती है और ताकत भी।


कॉमनवैल्थ गेम्सः अपने देश में अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता कराने के पीछे मोह इस बात का होता है कि हमारी प्रसिद्धि देश के बाहर हो। हम रोल मॉडल बनें। बाहरी देश के पर्यटक और दर्शक हमारे यहाँ आएं। साथ ही व्यापारी और उद्यमी आएं। यहाँ पैसा लगाएं। कारोबार करें। हमारा विकास हो उन्हें भी फायदा मिले। पर कॉमनवैल्थ गेम्स बाद में होंगे। उसके पहले कैसा बखेड़ा खड़ा हो गया है। तीन चीजें साफ नज़र आ रहीं हैं, जो हमारी इज्जत में बट्टा लगाएंगीः-


1. कोई भी काम समय से नहीं हुआ। पिछले रविवार को खेलमंत्री एम एस गिल ने भारतीय मीडिया से कहा, आप फॉज़ीटिव खबरें क्यों नहीं लिखते? इस बीच बीबीसी के किसी रिपोर्टर ने लंदन में 2012 में होने वाले ओलिम्पिक की तैयारी को अपने कैमरे में शूट करके दिखाया। सारे स्टेडियम तैयार हैं। हमारे यहाँ आधे से ज्यादा काम बाकी है। कहाँ है पॉज़ीटिव की गुंजाइश?
2.  काम की क्वालिटी बेहद खराब है। पानी बह रहा है। छतें चू रही हैं। रेलिंगें अभी से उखड़ रहीं हैं।
3. करीब-करीब सारे काम की लागत दस गुना तक बढ़ गई है। ऊपर से भ्रष्टाचार के आरोप। 


दिल्ली शहर ने पिछले दस साल में मेट्रो का निर्माण देखा। वह निर्माण कॉमनवैल्थ के निर्माण से कहीं ज्यादा था। एक-एक चीज़ समय से बनी। लोगों को पता भी नहीं लगा। हर चीज़ अपनी लागत पर बनी। आज दिल्ली में रिक्शे वाला भी कहता है, इससे बेहतर था श्रीधरन को यह काम दे देते। हम बेहतर काम कर सकते हैं, पर कर नहीं पाते।


सुना है इन खेलों में एआर रहमान और कैटरीना कैफ के कार्यक्रम पर 75 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। हमने शायद अपनी पूरी टीम की तैयारी पर इसका चौथाई भी खर्च नहीं किया होगा। बहरहाल जो भी है हास्यास्पद है। 


कश्मीरः मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला कल श्रीनगर के शेरे कश्मीर अस्पताल में घायलों का हाल-चाल पता करने गए। दिल्ली के अखबारों में श्रीनगर का जो विवरण आ रहा है उसके अनुसार आंदोलन में महिलाएं आगे आ गईं हैं। इसका मतलब है कि आंदोलन बहुत दूर तक पहुँच गया है। 


टाइम्स ऑफ इंडिया में आरती जेरथ की रिपोर्ट के अनुसार अली शाह गीलानी चाहते हैं कि जनमत संग्रह हो जिसमें कश्मीर के नागरिक तय करें कि उन्हें पाकिस्तान और भारत में किसके साथ रहना है। लगता नहीं कि यह जनमत संग्रह करा पाना सम्भव है। गीलानी पाक-परस्त हैं। यह भी सच है कि इस वक्त घाटी में उनकी बात सुनी जा रही है, पर समूचा नेतृत्व एक नहीं है। सीमा के दोनों ओर कई तरह के सुर हैं। पाक अधिकृत कश्मीर के भीतर पाकिस्तान विरोधी लोग भी हैं।


भारतीय संसद समूचे कश्मीर को अपना मानते हुए प्रस्ताव पास कर चुकी है। यों आजतक जितने भी फॉर्मूले सामने आए हैं, उनमें से किसी को मानने की परिस्थिति नहीं है। 


रतन टाटाः टाटा उद्योग समूह के प्रमुख रतन टाटा ने काम से अवकाश लेने का फैसला किया है। अब उनके उत्तराधिकारी को चुना जाएगा। इसके लिए पाँच सदस्यों की एक कमेटी बनाई गई है। इस कमेटी में रतन टाटा खुद शामिल नहीं हैं। 


रतन टाटा के कार्यकाल में टाटा ने अंतरराष्ट्रीय उद्योग समूह के रूप में अपना स्थान बना लिया है। इस संस्था में अब खानदान नहीं काम महत्वपूर्ण है। इस संस्था की खासियत है कि इसके 66 फीसदी शेयर उन ट्रस्टों के पास हैं, जो सार्वजनिक हित में काम करते हैं। इन ट्रस्टों को यह रकम टाटा परिवार के लोगों ने ही दी थी। 


जैसे मैने शुरू में श्रीधरन का नाम लिया था वैसे ही टाटा समूह का नाम लिया जा सकता है। कर्तव्य परायणता, कुशलता और सुव्यवस्था के मानक भी हमारे पास अपने हैं। अकुशलता, बेईमानी और भ्रष्टाचार के तो हैं ही। इनमें हम किसे आगे बढ़ने देते हैं, यह इस देश लोगों के हाथ में हैं। 



Wednesday, July 14, 2010

छोटी बातें और मिलावटी गवर्नेंस

हत्याओं, आगज़नी और इसी तरह के बड़े अपराधों को रोकना बेशक ज़रूरी है, पर इसका मतलब यह नहीं कि छोटी बातों से पीठ फेर ली जाय। सामान्य व्यक्ति को छोटी बातें ज्यादा परेशान करती हैं। सरकारी दफ्तरों में बेवजह की देरी या काम की उपेक्षा का असर कहीं गहरा होता है। हाल में लखनऊ के रेलवे स्टेशन पर एक फर्जी टीटीई पकड़ा गया। कुछ समय पहले गाजियाबाद में फर्जी आईएएस अधिकारी पकड़ा गया। दिल्ली मे नकली सीबीआई अफसर पकड़ा गया। जैसे दूध में मिलावट है वैसे ही सरकार भी मिलावटी लगती है।

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Wednesday, June 16, 2010

क्या खेल सामाजिक बदलाव भी कर सकते हैं?

खेल हमारी ऊर्जा, हमारे विचार और सामूहिक अभियान का सबसे अच्छा उदाहरण है। एक स्वस्थ समाज खेल में भी स्वस्थ होना चाहिए। खेलों को सिर्फ मनोरंजन नहीं मानना चाहिए। वे मनोरंजन भी देते हैं। मनोरंजन की भी हमारे विकास में भूमिका है। मूलतः खेल हमें अनुशासित, आत्म विश्वासी और स्वाभिमानी बनाते हैं। समाज के पिछड़े वर्गों को भागीदारी देकर हम उन्हें खेल के मार्फत अपनी सामर्थ्य दिखाने का मौका दे सकते हैं। लड़कियों को आगे लाने मे खेल की जबर्दस्त भूमिका। आज के हिन्दुस्तान में प्रकाशित मेरा लेख इसी विषय पर केन्द्रित है।




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यू ट्यूब पर देखिए यह फिल्म जो इस धारणा को पुष्ट करती है।