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Wednesday, April 22, 2026

पाकिस्तान का ‘डिप्लोमैटिक-वज़न’ बढ़ने के मायने


अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ समझौता हुआ, तो उसपर दस्तखत करने मैं ख़ुद इस्लामाबाद जा सकता हूँ. उनकी इस बात से युद्ध को लेकर उनके दृष्टिकोण के अलावा पाकिस्तान के प्रति उनका झुकाव भी नज़र आता है.

मंगलवार को इस्लामाबाद में बातचीत का दूसरा दौर होने जा रहा है, जिसमें कम से कम ट्रंप नहीं आ रहे हैं. इसका मतलब है कि प्रगति तो हुई है, पर अभी समझौते की स्थिति नहीं है.

ब्रिटिश साप्ताहिक इकोनॉमिस्ट ने लिखा है कि ईरानी नेतृत्व के भीतर मतभेद उभर कर सामने आ रहे हैं. पिछले 10-11 अप्रेल को हुई बातचीत में अमेरिकी प्रतिनिधियों से बहस करने के बजाय ईरानी प्रतिनिधियों ने आपस में ही बहस कर डाली. उसे रोकने में ही पाकिस्तानी मध्यस्थों का समय लग गया.

मुनीर-शहबाज़ की तारीफ

जो ध्यान देने वाली बात है, वह यह कि ट्रंप पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की बार-बार तारीफ़ कर रहे हैं. उनकी इस तारीफ़ में भी प्रधानमंत्री के मुकाबले आसिम मुनीर की तारीफ़ का पुट ज्यादा है.

ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए हमें पाकिस्तान के वर्तमान नेतृत्व की संरचना को समझना होगा. आप इतना समझ लें कि ट्रंप की नज़रों में आसिम मुनीर काम के आदमी हैं. वे ट्रंप के फ़ेवरेट हैं. वे पहले भी कह चुके हैं कि मुनीर ईरान को 'ज़्यादातर लोगों से बेहतर' जानते हैं.

इस बात से मुनीर और शरीफ़ साहब और पाकिस्तानी विदेश-नीति के कर्णधार खुश ज़रूर हो सकते हैं, पर पाकिस्तान की राज्य-शक्ति का वज़न नहीं बढ़ेगा. बेशक उसकी डिप्लोमेसी की विज़िबिलिटी बढ़ी है, वज़न नहीं. वज़न तभी बढ़ेगा, जब उसके अपने पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधरेंगे.

शैलियों का अंतर

इस दौरान भारत और पाकिस्तान की डिप्लोमेसी का अंतर स्पष्ट हुआ है. पाकिस्तानी शैली में मौकापरस्ती और जोखिम उठाने का जज़्बाहै. भारत ने इस विवाद के दूरगामी परिणामों को देखते हुए सतर्कता का परिचय दिया है.

इस लड़ाई और उसके बाद की सामरिक-भौगोलिक स्थिति अभी अनिश्चित है. फिलहाल पाकिस्तान प्रासंगिक लग रहा है, सिर्फ वार्ता-स्थल के कारण. वह दोनों पक्षों में से किसी को प्रभावित नहीं कर सकता. उनसे अनुनय-विनय ही कर सकता है. आने वाले समय के आर्थिक और भू-राजनीतिक हालात में वह कहाँ खड़ा होगा, अभी कहना मुश्किल है.

Thursday, December 5, 2019

पश्चिम में खराब क्यों हो रही है भारत की छवि?


जब से जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और 35ए निष्प्रभावी हुए हैं, पश्चिमी देशों में भारत की नकारात्मक तस्वीर को उभारने वाली ताकतों को आगे आने का मौका मिला है। ऐसा अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के दूसरे देशों में भी हुआ है। गत 21 नवंबर को अमेरिका की एक सांसद ने प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश किया है। इस प्रस्ताव में जम्मू-कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघन की निंदा करते हुए भारत-पाकिस्तान से विवादित क्षेत्र में विवाद सुलझाने के लिए बल प्रयोग से बचने की मांग की गई है।
कांग्रेस सदस्य रशीदा टलैब (या तालिब) ने यह प्रस्ताव दिया है। इलहान उमर के साथ कांग्रेस के लिए चुनी गई पहली दो मुस्लिम महिला सांसदों में एक वे भी हैं, जो फलस्तीनी मूल की हैं। सदन में गत 21 नवंबर को पेश किए गए प्रस्ताव संख्या 724 में भारत और पाकिस्तान से तनाव कम करने के लिए बातचीत शुरू करने की मांग की गई है। प्रस्ताव का शीर्षक है, ‘जम्मू-कश्मीर में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन की निंदा और कश्मीरियों के स्वयं निर्णय को समर्थन।’
छवि को धक्का
इस प्रस्ताव का विशेष महत्व नहीं है, क्योंकि इसका कोई सह-प्रायोजक नहीं है। इसे सदन की विदेश मामलों की समिति को आगे की कार्रवाई के लिए भेजा जाएगा, पर अमेरिकी संसद और मीडिया में पिछले तीन महीनों से ऐसा कुछ न कुछ जरूर हो रहा है जिससे भारत की छवि को धक्का लगता है। सामान्यतः पश्चिमी देशों में भारतीय लोकतंत्र की प्रशंसा होती है, पर इन दिनों हमारी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। गत 19 नवंबर को कौंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के एक विमर्श में कश्मीर के बरक्स भारतीय लोकतंत्र से जुड़े सवालों पर विचार किया गया। उसके एक हफ्ते पहले अमेरिकी कांग्रेस के मानवाधिकार संबंधी एक पैनल ने जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा समाप्त करने के बाद की स्थिति पर सुनवाई की। अमेरिकी कांग्रेस की गतिविधियों पर निगाह रखने वाले पर्यवेक्षकों का कहना था कि इसके पीछे पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिकों और पाकिस्तानी प्रतिष्ठान के करीबी लोगों हाथ है और उन्होंने इस काम के लिए बड़े पैमाने पर धन मुहैया कराया है।