Monday, October 22, 2018

आजाद हिन्द की टोपी पहन, कांग्रेस पर वार कर गए मोदी

नरेंद्र मोदीइसे नरेंद्र मोदी की कुशल ‘व्यावहारिक राजनीति’ कहें या नाटक, पर वे हर उस मौके का इस्तेमाल करते हैं, जो भावनात्मक रूप से फायदा पहुँचाता है. निशाने पर नेहरू-गांधी ‘परिवार’ हो तो वे उसेखास अहमियत देते हैं. रविवार 21 अक्तूबर को लालकिले से तिरंगा फहराकर उन्होंने कई निशानों पर तीर चलाए हैं.

'आजाद हिंद फौज' की 75वीं जयंती के मौके पर 21 अक्टूबर को लालकिले में हुए समारोह में मोदीजी की उपस्थिति की योजना शायद अचानक बनी. वरना यह लम्बी योजना भी हो सकती थी. ट्विटर पर एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा था कि मैं इस समारोह में शामिल होऊँगा.

कांग्रेस पर वार
इस ध्वजारोहण समारोह में मोदी ने नेताजी के योगदान को याद करने में जितने शब्दों का इस्तेमाल किया, उनसे कहीं कम शब्द उन्होंने कांग्रेस पर वार करने में लगाए, पर जो भी कहा वह काफी साबित हुआ.

उन्होंने कहा, एक परिवार की खातिर देश के अनेक सपूतों के योगदान को भुलाया गया. चाहे सरदार पटेल हो या बाबा साहब आम्बेडकर. नेताजी के योगदान को भी भुलाने की कोशिश हुई. आजादी के बाद अगर देश को पटेल और बोस का नेतृत्व मिलता तो बात ही कुछ और होती.

अभिषेक मनु सिंघवी ने हालांकि बाद में कांग्रेस की तरफ से सफाई पेश की, पर मोदी का काम हो गया. मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने गांधी, आम्बेडकर, पटेल और लाल बहादुर शास्त्री जैसे लोकप्रिय नेताओं को पहले ही अंगीकार कर लिया है. अब आजाद हिन्द फौज की टोपी पहनी है.

Sunday, October 21, 2018

सबरीमलाई का राजनीतिक संदेश

हाल में हुए अदालतों के दो फैसलों के सामाजिक निहितार्थों को समझने की जरूरत है। इनमें एक फैसला उत्तर भारत से जुड़ा है और दूसरा दक्षिण से, पर दोनों के पीछे आस्था से जुड़े प्रश्न हैं। पिछले कुछ समय में गुरमीत राम रहीम और आसाराम बापू को अदालतों ने सज़ाएं सुनाई। अब बाबा रामपाल को दो मामलों में उम्रकैद की सज़ा सुनाई है। तीनों मामले अपराधों से जुड़े है। पिछले साल अगस्त में जैसी हिंसा राम रहीम समर्थकों ने की, तकरीबन वैसी ही हिंसा उसके पहले मथुरा के जवाहर बाग की सैकड़ों एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा जमाए बैठे रामवृक्ष यादव और उनके हजारों समर्थकों और पुलिस के बीच हिंसक भिड़ंत में हुई थी। बहरहाल बाबा रामपाल प्रकरण में ऐसा नहीं हो पाया।

पिछले हफ्ते केरल के सबरीमलाई (या सबरीमाला) मंदिर में कपाट खुलने के बाद के घटनाक्रम ने देश का ध्यान खींचा है। 12वीं सदी में बने भगवान अयप्पा के इस मंदिर में परम्परा से 10-50 साल की उम्र की स्त्रियों के प्रवेश पर रोक है। हाल में कुछ सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को हटा दिया और सभी महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी। केरल के परम्परागत समाज ने अदालत की इस अनुमति को धार्मिक मामलों में राज-व्यवस्था का अनुचित हस्तक्षेप माना।

Wednesday, October 17, 2018

उत्तर भारत पर प्रदूषण का एक और साया

पिछले कुछ वर्षों का अनुभव है कि जैसे ही हवा में ठंडक पैदा हुई उत्तर भारत में प्रदूषण का खतरा पैदा होने लगता है. पंजाब और हरियाणा के किसान फसल काटने के बाद बची हुई पुआल यानी पौधों के सूखे डंठलों-ठूंठों को खेत में ही जलाते हैं. इससे दिल्ली समेत पूरा उत्तर भारत गैस चैंबर जैसा बन जाता है. मौसम में ठंडक आने से हवा भारी हो जाती है और वह ऊपर नहीं उठती. उधर इसी मौसम में दशहरे और दीपावली के त्योहार भी होते हैं. इस वजह से माहौल धुएं से भर जाता है. इस साल भी वह खतरा सामने है.

दिल्ली में हवा धीरे-धीरे बिगड़ने लगी है. पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, केंद्र सरकारों और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी एजेंसियों के बार-बार हस्तक्षेप के बाद भी हालात जस के तस हैं. किसानों पर जुर्माने लगाने और सज़ा देने की व्यवस्थाएं की गई हैं. वे जुर्माना देकर भी खेतों में आग लगाते हैं. कहीं पर व्यावहारिक दिक्कतें जरूर हैं. बहरहाल मौसम विभाग ने आने वाले दिनों के लिए अलर्ट जारी कर दिया है. अब इंतजार इस बात का है कि हवा कितनी खराब होगी और सरकारें क्या करेंगी.

Sunday, October 14, 2018

‘मीटू’ की ज़रूरत थी

देश में हाल के वर्षों में स्त्री-चेतना की सबसे बड़ी परिघटना थी, दिसम्बर 2012 में दिल्ली-रेपकांड के खिलाफ खड़ा हुआ आंदोलन। इस आंदोलन के कारण भले ही कोई क्रांतिकारी बदलाव न हुआ हो, पर सामाजिक-व्यवस्था को लेकर स्त्रियों के मन में बैठी भावनाएं निकल कर बाहर आईं। ऐसे वक्त में जब लड़कियाँ घरेलू बंदिशों से बाहर निकल कर आ रहीं हैं, उनके साथ होने वाला दुर्व्यवहार बड़े खतरे की शक्ल में मुँह बाए खड़ा है। समय क्या शक्ल लेगा हम नहीं कह सकते, पर बदलाव को देख सकते हैं। इन दिनों अचानक खड़ा हुआ ‘मीटू आंदोलन’ इसकी एक मिसाल है। 

लम्बे अरसे से हम मानते रहे हैं कि फिल्मी दुनिया में स्त्रियों का जबर्दस्त यौन-शोषण होता है। पर ऐसा केवल ‘फिल्मी दुनिया’ में नहीं है, जीवन के हर क्षेत्र में है। और यह बात अब धीरे-धीरे खुल रही है। ‘मीटू आंदोलन’ आंदोलन के पहले से देश में कई मामले अदालतों में चल रहे हैं। खासतौर से मीडिया में कुछ लड़कियों ने आत्महत्याएं की हैं। सिनेमा और मीडिया का वास्ता दृश्य जगत से है। उसे लोग ज्यादा देखते हैं। राजनीति के ‘मीटू प्रसंग’ भी सुनाई पड़ेंगे। वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं, प्रशासनिक सेवाओं, कॉरपोरेट जगत और शैक्षिक संस्थानों से खबरें मिलेंगी।

तब या अब किसी ने इन बातों को सार्वजनिक रूप से उठाया है, तो इसकी तारीफ करनी चाहिए और उस महिला का समर्थन करना चाहिए। पर यह सारी बात का एक पहलू है। इसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को भी समझने की कोशिश करनी चाहिए। ‘मीटू आंदोलन’ यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक वैश्विक अभियान है, जिसके अलग-अलग देशों में अलग-अलग रूप हैं। इसका सबसे प्रचलित अर्थ है कार्यक्षेत्र में स्त्रियों का यौन शोषण। अक्तूबर 2017 में अमेरिकी फिल्म निर्माता हार्वे वांइंसटाइन पर कुछ महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगाए। न्यूयॉर्क टाइम्स और न्यूयॉर्कर ने खबरें प्रकाशित कीं कि एक दर्जन से अधिक स्त्रियों ने वांइंसटाइन पर यौन-विषयक परेशानियाँ पैदा करने, छेड़छाड़, आक्रमण और रेप के आरोप लगाए। इस वाक्यांश को लोकप्रियता दिलाई अमेरिकी अभिनेत्री एलिज़ा मिलानो ने, जिन्होंने हैशटैग के साथ इसका इस्तेमाल 15 अक्टूबर 2017 को ट्विटर पर किया। मिलानो ने कहा कि मेरा उद्देश्य है कि लोग इस समस्या की संजीदगी को समझें। इसके बाद इस हैशटैग का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर करोड़ों लोग कर चुके हैं।

Sunday, October 7, 2018

विदेश नीति में बड़े फैसलों की घड़ी

कुछ दिन पहले तक लगता था कि भारत की विदेश नीति की नैया रूस और अमेरिका के बीच संतुलन बैठाने के फेर में डगमग हो रही है। अब रूस के साथ एस-400 मिसाइलों, एटमी बिजलीघरों समेत आठ समझौते होने से लगता है कि हम अमेरिका से दूर जा रहे हैं। ऐसे में अगली गणतंत्र दिवस परेड पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मुख्य अतिथि बनकर आ जाएं तो क्या कहेंगे? भारत की दोनों, बल्कि इसमें चीन को भी शामिल कर लें, तो तीनों के साथ क्या दोस्ती सम्भव है?

क्यों नहीं सम्भव है? हमारी विदेश नीति किसी एक देश के हाथों गिरवी नहीं है। स्वायत्तता का तकाजा है कि हम अपने हितों के लिहाज से रास्ते खोजें। पर स्वायत्तता के लिए सामर्थ्य भी चाहिए। अमेरिका से दोस्ती कौन नहीं चाहता? इसकी वजह है उसकी ताकत। ऐसे ही मौकों पर देश की सामर्थ्य का पता लगता है और इसका प्रदर्शन किया जाना चाहिए।

Saturday, October 6, 2018

बाएं बाजू रूस, दाएं अमेरिका

कुछ दिन पहले तक लगता था कि भारत की विदेश नीति की नैया रूस और अमेरिका के बीच संतुलन बैठाने के फेर में डगमग होती जा रही है। अब लगता है कि हम स्थिरता के धरातल पर वापस लौट रहे हैं। सितम्बर के पहले हफ्ते में भारत और अमेरिका के बीच हुई ‘टू प्लस टू’ वार्ता के ठीक एक महीने बाद रूस के साथ एस-400 मिसाइल प्रणाली को लेकर समझौता हो गया है। यह मिसाइल प्रणाली हवाई हमलों के खिलाफ दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रणाली मानी जाती है। इसे अमेरिकी ‘टर्मिनल हाई अल्टीट्यूड एरिया डिफेंस सिस्टमट (ठाड) या पैट्रियट मिसाइल प्रणाली के मुकाबले किफायती और ज्यादा मारक समझा जा रहा है। सच यह है कि रूसी मिसाइलों, फ्रांसीसी लड़ाकू विमानों, अमेरिकी ड्रोनों और इसरायली रेडारों के सहारे चलने वाली भारतीय रक्षा-नीति अपने आप में अनोखी साबित हो रही है। रक्षा बहरहाल हमें अभी इस समझौते के बाबत अमेरिका की औपचारिक प्रतिक्रिया का इंतजार करना चाहिए। इतना जरूर लगता है कि भारत ने काफी सोच-समझ कर यह फैसला किया है। 
भारत और रूस के बीच 19 वें वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान आठ समझौते हुए हैं। ये समझौते रक्षा, नाभिकीय ऊर्जा, स्पेस और अर्थ-व्यवस्था से जुड़े हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ये समझौते अमेरिका की धमकी के बाद हुए हैं। अमेरिका ने धमकी दी है कि वह उन देशों पर पाबंदी लगाएगा, जो रूसी हथियार खरीदते हैं। पिछले महीने भारत और अमेरिका के बीच पहली बार जब टू प्लस टू वार्ता हुई थी, तब यह सवाल सबसे ऊपर था कि भारत इस मिसाइल प्रणाली को खरीद भी पाएगा या नहीं? 

Tuesday, October 2, 2018

मजबूरी नहीं, जरूरी हैं गांधी

श्रेष्ठ विचारों की झंडी बनाकर उससे सजावट करने में हमारा जवाब नहीं है। गांधी इसके उदाहरण हैं। लम्बे अरसे तक देश में कांग्रेस पार्टी का शासन रहा। पार्टी खुद को गांधी का वारिस मानती है, पर उसके शासनकाल में ही गांधी सजावट की वस्तु बने। हमारी करेंसी पर गांधी हैं और अब नए नोटों में उनका चश्मा भी है। पर हमने गांधी के विचारों पर आचरण नहीं किया। उनके विचारों का मजाक बनाया। कुछ लोगों ने कहा, मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। लम्बे अरसे तक देश के कम्युनिस्ट नेता उनका मजाक बनाते रहे, पर आज स्थिति बदली हुई है। गांधी का नाम लेने वालों में वामपंथी सबसे आगे हैं।
उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाने और तमाम शहरों की सड़कों को महात्मा गांधी मार्ग बनाने के बावजूद हमें लगता है कि उनकी जरूरत 1947 के पहले तक थी। अब होते भी तो क्या कर लेते?  वस्तुतः गांधी की जरूरत केवल आजादी की लड़ाई तक सीमित नहीं थी। सन 1982 में रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधीने दुनियाभर का ध्यान खींचा, तब इस विषय पर एकबार फिर चर्चा हुई कि क्या गांधी आज प्रासंगिक हैं? वह केवल भारत की बहस नहीं थी। और आज गांधी की उपयोगिता शिद्दत से महसूस की जा रही है।

Monday, October 1, 2018

तीखे अंतर्विरोध और अदालती फैसले


आधुनिकता की ओर बढ़ता हमारा देश कई प्रकार के अंतर्विरोधों से भी जूझ रहा है. पिछले हफ्ते हमारे सुप्रीम कोर्ट ने कम के कम छह ऐसे फैसले किए हैं, जिनके गहरे सामाजिक, धार्मिक, न्यायिक और राजनीतिक निहितार्थ हैं. मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा का कार्यकाल इस हफ्ते खत्म हो रहा है. वे देश के पहले ऐसे मुख्य न्यायाधीश हैं, जिनके खिलाफ संसद के एक सदन में महाभियोग की सूचना दी गई. उसकी दस्तक सुप्रीम कोर्ट में भी हुई. उनके कार्यकाल में कुछ ऐसे मामले आए, जिन्हें लेकर राजनीति और समाज में तीखे मतभेद हैं. इनमें जज लोया और अयोध्या के मामले शामिल हैं.
इस हफ्ते के ज्यादातर फैसलों के भी प्रत्यक्ष और परोक्ष राजनीतिक निहितार्थ हैं. पर दो मामले ऐसे हैं, जो स्त्रियों के अधिकारों और परम्परागत समाज के अंतर्विरोधों से जुड़े हैं. कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया था. लगभग उसी प्रकार का एक फैसला इस हफ्ते व्यभिचार (विवाहेतर सम्बंध) से जुड़ा है. हमारे देश में व्यभिचार आईपीसी की धारा 497 के तहत अपराध है, पर यह धारा केवल पुरुषों पर लागू होती है. इसे रद्द करने की माँग पुरुषों को राहत देने के अनुरोध से की गई थी. अलबत्ता अदालत ने इसे स्त्रियों के वैयक्तिक अधिकार से भी जोड़ा है.  

Sunday, September 30, 2018

पाकिस्तान से निरर्थक डिबेट

पाकिस्तान में इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में बेहतरी की जो उम्मीदें बन रहीं थीं, वे फिर धराशायी हुईं हैं। ऐसा पहले भी होता रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में दोनों विदेशमंत्रियों के भाषणों से यह साफ है। इस सालाना डिबेट से कुछ नहीं होने वाला। वस्तुत: पाकिस्तान को ज्यादा भाव देना बंद करना चाहिए। वह अपने अंतर्वरोधों से खुद गड्ढे में गिरेगा। अगले एक दशक में दुनिया का सीन बदलने जा रहा है। हमें उसके बारे में सोचना चाहिए। आतंकवाद हमारी बड़ी चिंता जरूर है, पर वह हमारी अकेली समस्या नहीं है। जबतक पाकिस्तान में सेना या 'डीप स्टेट' का बोलबाला है, उसके रुख में बुनियादी बदलाव नहीं होगा। महासभा की बैठक के हाशिए पर विदेश मंत्रियों की मुलाकात उम्मीद जरूर थी, पर इस किस्म की बैठकों के लिए भी न्यूनतम सौहार्द का माहौल होना चाहिए। वह नहीं है।

इमरान खान के पत्र की प्रतिक्रिया में भारत ने विदेशमंत्रियों की मुलाकात को स्वीकार कर भी लिया था, पर तीन पुलिसकर्मियों के अपहरण और उनकी हत्या और फिर बीएसएफ के एक जवान की गर्दन काटने की खबर आने के बाद देश में गुस्से की लहर दौड़ना स्वाभाविक था। इस धूर्तता का पता गत 24 जुलाई को पाकिस्तान के डाक-तार विभाग विभाग द्वारा जारी 20 डाक टिकटों की एक सीरीज से भी लगता है। इन डाक टिकटों में कश्मीर की गतिविधियों को रेखांकित किया गया है। इनमें एक डाक टिकट बुरहान वानी का स्वतंत्रता सेनानी के रूप में महिमामंडन करता है, जबकि भारत उसे आतंकवादी मानता है। ज़ाहिर है कि पाकिस्तान कश्मीर में अपनी गतिविधियों को सही मानता है। इन बातों को देखते हुए यदि भारत सरकार बातचीत की पहल करेगी, तो उसे देश की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा। पाकिस्तान कश्मीर में अपनी गतिविधियाँ बढ़ाकर बातचीत का दबाव बनाना चाहता है। उसकी दिलचस्पी कश्मीर में है, सहयोग, सद्भाव और कारोबार में नहीं। बातचीत किसी न किसी स्तर पर हमेशा चलती है और भविष्य में भी चलेगी, पर उसका समारोह तभी मनेगा जब उसका माहौल होगा।

भाषणों की कड़वाहट बताती है कि रिश्तों में बेहतरी की उम्मीद निरर्थक है। अलबत्ता भारत को वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति को बेहतर बनाना चाहिए। हम मजबूत नहीं होंगे, तो प्रतिस्पर्धी हमें आँखें दिखाएंगे। सुषमा स्वराज ने पर्यावरण रक्षा के वैश्विक प्रयासों और उनमें भारत की भूमिका का जिक्र किया और संरा सुरक्षा परिषद में अपनी दावेदारी का भी। उन्होंने कहा, पाकिस्तान न सिर्फ आतंकवाद को बढ़ावा देता है बल्कि वह इसे नकारता भी है। पाकिस्तानी विदेशमंत्री ने कहा, शांति तब तक नहीं होगी जब तक संयुक्त राष्ट्र के समझौतों के तहत समाधान नहीं होता। सुषमा स्वराज ने कहा, 91/1 का मास्टरमाइंड तो मारा गया, लेकिन 26/11 का मांस्टरमाइंड पाकिस्तान में छुट्टा घूम रहा है। सवाल है कि दुनिया क्या चाहती है? अमेरिका पर हमला आतंकवाद, तो हमपर हमला क्या है? जैशे मोहम्मद और लश्करे तैयबा क्या हैं? हम चाहते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक संधि हो। दुनिया आतंकवाद का रोना तो रोती है, पर उसकी परिभाषा तक तय नहीं करती। रास्ता एक है, पहले दुनिया हमारा महत्व माने, फिर आगे बात करें।

बदलते समाज के फैसले

सुप्रीम कोर्ट के कुछ बड़े फैसलों के लिए पिछला हफ्ता याद किया जाएगा। इस हफ्ते कम के कम छह ऐसे फैसले आए हैं, जिनके गहरे सामाजिक, धार्मिक, न्यायिक और राजनीतिक निहितार्थ हैं। संयोग से वर्तमान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के कार्यकाल का यह अंतिम सप्ताह भी था। उनका कार्यकाल इसलिए महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि वे देश के पहले ऐसे मुख्य न्यायाधीश हैं, जिनके खिलाफ संसद के एक सदन में महाभियोग की सूचना दी गई और यह मामला सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर भी गया। उनके कार्यकाल में कुछ ऐसे मामले आए, जिन्हें लेकर राजनीति और समाज में तीखे मतभेद हैं। इनमें जज लोया और अयोध्या के मामले शामिल हैं। ये बदलते भारतीय समाज के अंतर्विरोध हैं, जो अदालती फैसलों में नजर आ रहे हैं।

Tuesday, September 18, 2018

मोदी के ‘स्वच्छाग्रह’ के राजनीतिक मायने

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 सितंबर से स्वच्छता ही सेवा अभियानशुरू किया है, जो 2 अक्टूबर तक चलेगा. इस 2 अक्टूबर से महात्मा गांधी का 150वाँ जयंती वर्ष भी शुरू हो रहा है. व्यापक अर्थ में यह गांधी के अंगीकार का अभियान है, जिसके सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ भी हैं. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने गांधी, पटेल और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं को अपने साथ जोड़ा है. उनके कार्यक्रमों पर चलने की घोषणा भी की है. यह एक प्रकार की 'सॉफ्ट राजनीति' है. इसका प्रभाव वैसा ही है, जैसा योग दिवस का है. मोदी ने गांधी को अंगीकार किया है, जिसका विरोध कांग्रेस नहीं कर सकती. 
अगले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 31 अक्टूबर को स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति) का प्रतिमा का अनावरण भी करेंगे, जो दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा है. पिछले चार साल में नरेंद्र मोदी सरकार ने न केवल कांग्रेस के सामाजिक आधार को ध्वस्त करने की कोशिश की है, बल्कि उसके लोकप्रिय मुहावरों को भी छीना है. उनके स्वच्छ भारत अभियान का प्रतीक चिह्न गांधी का गोल चश्मा है. गांधी के सत्याग्रह के तर्ज पर मोदी ने स्वच्छाग्रहशब्द का इस्तेमाल किया.

Sunday, September 16, 2018

‘आंदोलनों’ की सिद्धांतविहीनता

बंद, हड़ताल, घेराव, धरना और विरोध प्रदर्शन हमारी राजनीतिक संस्कृति के अटूट अंग बन चुके हैं। स्वतंत्रता आंदोलन से निकली इस राजनीति की धारणा है कि सार्वजनिक हितों की रक्षा का जिम्मा हरेक दल के पास है। ऐसा सोचना गलत भी नहीं है, पर सार्वजनिक हित-रक्षा के लिए हरेक दल अपनी रणनीति, विचार और गतिवधि को सही मानकर पूरे देश को अपनी बपौती मानना शुरू कर दिया है, जिससे आंदोलनों की मूल भावना पिटने लगी है। अक्सर वही आंदोलन सफल माना जाता है, जो हिंसा फैलाने में कामयाब हो। 
स्वतंत्रता आंदोलन से निकली राजनीति के अलावा देश की कम्युनिस्ट पार्टियों के पास रूस और चीन के उदाहरण हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों के पास मजदूर और किसान संगठन हैं, जिन्हें व्यवस्था से कई तरह की शिकायतें हैं। देश की प्रशासनिक व्यवस्था से नागरिकों को तमाम शिकायतें हैं। इनका निवारण तबतक नहीं होता जबतक आंदोलन का रास्ता अपनाया न जाए। यह पूरी बात का एक पहलू है। इन आंदोलनों की राजनीतिक भूमिका पर भी ध्यान देना होगा।

Tuesday, September 11, 2018

सामाजिक बदलाव में नागरिक समाज की भूमिका


धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ का फैसला आने के बाद सवाल पैदा होता है कि इसे क्या हम समलैंगिक रिश्तों की सर्वस्वीकृति मानें? क्या यह वास्तव में एक नई आजादी है, जैसाकि एक अंग्रेजी अखबार ने शीर्षक दिया है इंडिपेंडेंस डे-2 यानी कि यह दूसरा स्वतंत्रता दिवस है। इस किस्म की प्रतिक्रियाएं अंग्रेजी मीडिया में ज्यादा हैं। इनसे देखने से लगता है कि कोई बड़ी क्रांति हो गई है। इसके विपरीत परम्परावादियों की प्रतिक्रिया निराशा से डूबी है। उन्हें लगता है कि व्यवस्था ने पापाचार को वैध और सही मान लिया है। एक तीसरी प्रतिक्रिया भी सम्भव है कि ठीक है कि समलैंगिकता को आपराधिक दायरे से बाहर रखें, पर यह समाज को स्वीकार्य नहीं है।

Sunday, September 9, 2018

समलैंगिकता की हकीकत को स्वीकारें

धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ का फैसला आने के बाद तीन किस्म की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। एक प्रतिक्रिया इस फैसले के स्वागत में है और दूसरी इसके विरोध में। अंग्रेजी के कुछ अखबारों और चैनलों को देखने से लगता है कि कोई बड़ी क्रांति हो गई है। एक अखबार ने शीर्षक दिया है इंडिपेंडेंस डे-2 यानी कि यह दूसरा स्वतंत्रता दिवस है। इसके विपरीत शुद्धतावादियों की प्रतिक्रिया निराशा से डूबी है। उन्हें लगता है कि व्यवस्था ने पापाचार को वैध और सही मान लिया है। एक तीसरी प्रतिक्रिया है कि ठीक है कि समलैंगिकता को आपराधिक दायरे से बाहर रखें, पर यह समाज को स्वीकार्य नहीं है।
हमारे समाज को ही नहीं, अभी यह दुनिया के तमाम समाजों को स्वीकार नहीं है। सच यह है कि प्राकृतिक रूप से विषमलिंगी सम्बंध ही सहज हैं। पर यह भी सच है कि दुनिया के सभी समाजों में आज से नहीं हजारों साल से समलैंगिक सम्बंध होते रहे हैं। इन्हें रोकने के लिए अनेक देशों में कानून हैं और सजाएं दी जाती हैं। हमारे देश में कुछ समय से समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर लाने की मुहिम चल रही थी। इसके पीछे बुनियादी तर्क यह है कि यह व्यक्ति के निजी चयन का मामला है। इसे अपराध के दायरे से बाहर लाना चाहिए। हमारी इसी अदालत में 2013 में इस तर्क को अस्वीकार कर दिया, पर अब स्वीकार किया है, तो उसपर भी विचार करना चाहिए। हकीकत को सभी स्तरों पर स्वीकार किया जाना चाहिए।
व्यावहारिक सच यह है कि देर-सबेर यह फैसला होना ही था। पिछले साल हमारी सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेसी को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया था। उस निर्णय की यह तार्किक परिणति है। ऐसा नहीं है कि इस फैसले के बाद पूरा समाज समलैंगिक हो जाएगा। अंततः यह समाज पर निर्भर करेगा कि वह किस रास्ते पर जाना चाहता है। समाज की मुख्य धारा इसे स्वीकार नहीं करेगी, पर कोई इस रास्ते पर जाता है, तो उसे प्रताड़ित भी नहीं करेगी। भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के मुताबिक कोई किसी पुरुष, स्त्री या पशुओं से प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध संबंध बनाता है तो यह अपराध होगा। इस अपराध के लिए उसे उम्रकैद या 10 साल तक की सजा के साथ आर्थिक दंड का भागी होना पड़ेगा। इतनी भारी सजा के बोझ से वे लोग अब बाहर आ जाएंगे, जो इसके दबाव में थे। पर यह बहस जारी रहेगी कि समलैंगिकता प्राकृतिक गतिविधि है या नहीं।

Saturday, September 8, 2018

भारत-अमेरिका रिश्तों का अगला कदम

विदेशी मामलों को लेकर भारत में जब बात होती है, तो ज्यादातर पाँच देशों के इर्द-गिर्द बातें होती हैं। एक, पाकिस्तान,दूसरा चीन। फिर अमेरिका, रूस और ब्रिटेन। इन देशों के आपसी रिश्ते हमें प्रभावित करते हैं। देश की आंतरिक राजनीति भी इन रिश्तों के करीब घूमने लगती है। पिछले कुछ हफ्तों की गतिविधियाँ इस बात की गवाही दे रहीं हैं। कश्मीर में घटनाक्रम तेजी से बदला है। उधर पाकिस्तान में इमरान खान की नई सरकार समझ नहीं पा रही है कि करना क्या है। इस बीच न्यूयॉर्क टाइम्स ने खबर दी है कि पाकिस्तानी सेना ने भारत के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। आर्थिक मसलों को लेकर अमेरिका और चीन के रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं। भारत और अमेरिका के रिश्तों में भी कुछ समय से कड़वाहट है। दोनों देशों के बीच लगातार टल रही टू प्लस टू वार्ता अंततः इस हफ्ते हो जाने के बाद असमंजस के बादल हटे हैं।

जून के तीसरे हफ्ते मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के इस्तीफा देने के बाद से कश्मीर में घटनाक्रम तेजी से बदला है। इसके फौरन बाद कश्मीर में एक दशक से जमे जमाए राज्यपाल रहे एनएन वोहरा का कार्यकाल समाप्त हो गया। उनकी जगह अगस्त के तीसरे हफ्ते में सतपाल मलिक ने राज्य के राज्यपाल का पदभार ग्रहण किया। सतपाल मलिक इसके पहले बिहार के राज्यपाल थे। राज्य के पुलिस प्रमुख भी बदल दिए गए हैं। नए राज्यपाल के आने के पहले ही राज्य के शहरी और ग्रामीण निकाय चुनाव इस अक्तूबर और नवम्बर में कराने की घोषणा हो गई थी। उस घोषणा की प्रतिक्रिया में राजनीतिक लहरें बनने लगी हैं।
सवाल है कश्मीर को लेकर सरकार क्या कोई बड़ा फैसला करने वाली है? उधर लोकसभा चुनाव करीब हैं। चुनाव के पहले क्या कोई बड़ा फैसला करना सम्भव है?पर मन यह भी कहता है कि चुनाव के पहले बड़े नाटकीय फैसले सम्भव भी हैं। इस सिलसिले में दिल्ली में गुरुवार को भारत और अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों की बहुप्रतीक्षित टू प्लस टू वार्ताके निहितार्थों को समझने की कोशिश भी करनी चाहिए। भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण तथा अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने इस वार्ता में हिस्सा लिया।

Sunday, September 2, 2018

राफेल पर राजनीति की छाया

केन्द्र सरकार के लिए इस हफ्ते का आखिरी दिन खुशखबरी लेकर आया। खबर है कि इस वित्तीय वर्ष के पहली तिमाही में अर्थ-व्यवस्था में 8.2 फीसदी की दर से इजाफा हुआ है। इसका सबसे सकारात्मक पक्ष है मैन्यूफैक्चरिंग और फार्म सेक्टर का बेहतर प्रदर्शन। ये दोनों सेक्टर रोजगार देते हैं। लगता यह है कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण दबाव में आई अर्थव्यवस्था फिर से रास्ते पर आ रही है। इससे पहले 2015-16 की पहली तिमाही में जीडीपी में सबसे तेज वृद्धि दर्ज हुई थी। पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में जीडीपी वृद्घि दर 7.7 फीसदी रही थी। बहरहाल इस तिमाही में भारत एकबार फिर से सबसे तेजी से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बन गया है। चीन की वृद्घि दर पहली तिमाही में घटकर 6.7 फीसदी रह गई है।

इस खुशखबरी के बावजूद केन्द्र सरकार पर विरोधियों के हमले बढ़ जा रहे हैं। चुनाव नजदीक आ रहे हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के कारण सरकार दबाव में आई है। कांग्रेस ने राफेल विमान के सौदे को चुनाव का मुद्दा बनाने का फैसला किया है। राहुल गांधी ने कई बार कहा है कि राफेल-डील में कोई घोटाला है। क्या घोटाला है, यह पार्टी ने स्पष्ट नहीं किया है। पार्टी इतना जरूर कह रही है कि हमने जो सौदा किया था, उसके मुकाबले सरकार अब बहुत ज्यादा कीमत दे रही है। दूसरे इसके ऑफसेट में सरकार की पसंदीदा कम्पनियों को फायदा पहुँचाने का आरोप भी है।

Saturday, September 1, 2018

लोकतांत्रिक ‘सेफ्टी वॉल्वों’ पर वार

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और उसके बाद शुरू हुई ‘बहस’ और ‘अदालती कार्यवाही’ कई मानों में लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण है। एक तरफ देश में फासीवाद, नाजीवाद के पनपने के आरोप हैं, वहीं हमारे बीच ऐसे व्यक्ति और संगठन हैं, जो रात-रात भर अदालतों में गुहार लगा सकते हैं। ऐसे में इस व्यवस्था को फासिस्ट कैसे कहेंगे? हमारी अदालतें नागरिक अधिकारों के पक्ष में हस्तक्षेप कर रहीं हैं। मीडिया पर तमाम तरह के आरोप हैं, पर ऐसा नहीं कि इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ताओं के पक्ष को सामने रखा न गया हो। 

इस मामले का 2019 की चुनावी राजनीति से कहीं न कहीं सीधा रिश्ता है। बीजेपी की सफलता के पीछे दलित और ओबीसी वोट भी है। बीजेपी-विरोधी राजनीति उस वोट को बीजेपी से अलग करना चाहती है। रोहित वेमुला प्रकरण एक प्रतीक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लम्बे अरसे से दलितों और खासतौर से जनताजातीय इलाकों में सक्रिय है। यह इस प्रकरण का आंतरिक पक्ष है। सवाल यह है कि बीजेपी ने उन लोगों पर कार्रवाई क्यों की जो सीधे उसके राजनीतिक प्रतिस्पर्धी नहीं हैं? दूसरा सवाल यह है कि यदि ये ताकतें बीजेपी को परास्त करने की योजना में शामिल हैं, तो यह योजना किसकी है? इन बातों पर अलग से विचार करने की जरूरत है। 

फिलहाल इस प्रकरण का सीधा वास्ता हमारी राजनीतिक-व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं से है, जो परेशान करने वाला है। साथ ही भारतीय राष्ट्र-राज्य की एकता और अखंडता के सवाल भी हैं, जिनकी तरफ हम देख नहीं पा रहे हैं। बदलते भारत और उसके भीतर पनपने वाले उदार लोकतांत्रिक समाज की परिकल्पना के बरक्स कई प्रकार की अंतर्विरोधी धाराओं का टकराव भी देखने को मिल रहा है।

अधिकारों की रक्षा और नागरिकों की सुरक्षा के सवाल बेहद महत्वपूर्ण हैं, पर यह मामला ज्यादा बड़े राजनीतिक विमर्श से जुड़ा है। इसके साथ 1947 की आजादी के बाद राष्ट्र-राज्य के गठन की प्रक्रिया और विकास की धारा से कटे आदिवासियों, दलितों और वंचितों के सवाल भी हैं। इस मामले के कानूनी, राजनीतिक और राष्ट्र-राज्य के संरक्षण से जुड़े तीन अलग-अलग पहलू हैं। तीनों गड्ड-मड्ड हो रहे हैं। उन्हें सही परिप्रेक्ष्य में समझने के जरूरत है।

सेफ्टी वॉल्व

इन दिनों शब्द चल रहा है अर्बन नक्सली। सच यह है कि बड़ी संख्या में लोग माओवादी, कम्युनिस्ट, नक्सवादी, लिबरल और वामपंथी वगैरह के अर्थ नहीं जानते। अक्सर सबको एक मानकर चलते हैं। सामाजिक जीवन से जुड़े वकील, अध्यापक, साहित्यकार या दूसरे कार्यकर्ता काफी खुले तरीके से सोचते हैं। क्या उनकी राजनीतिक असहमतियों को देश-द्रोह का दर्जा देना चाहिए? इस मामले के कुछ पहलुओं की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो रही है। जिस बेंच में सुनवाई हो रही है उसके एक सदस्य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है, ‘असहमति, लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व है। असहमति को अनुमति नहीं दी गई तो प्रेशर कुकर फट सकता है।’

पिछले 71 वर्षों में भारतीय लोकतंत्र ऐसे सेफ्टी वॉल्वों की वजह से सुरक्षित है। इसमें राष्ट्र-राज्य की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। क्या वर्तमान राजनीतिक सत्ता-प्रतिष्ठान के फैसले चरमपंथी हैं? क्या उसके पहले के सत्ता-प्रतिष्ठान की रीति-नीति फर्क थी? इस चर्चा के दौरान तथ्य सामने आएंगे। जिनके आधार पर हमें आमराय बनाने का मौका मिलेगा। लोकतांत्रिक विकास का यह भी एक दौर है। जरूरी है कि इस बहस को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाएं।

Wednesday, August 29, 2018

आक्रामक राहुल गांधी

राहुल गांधी ने हाल में जर्मनी और ब्रिटेन में कुछ ऐसी बातें कही हैं, जिन्हें लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने उनके बयानों को देश-विरोधी बताया है, वहीं किसी ने राहुल के खिलाफ मुकदमा भी दायर किया है. मुजफ्फरपुर में इस केस को दायर करने वाले का आरोप है कि राहुल ने देश का अपमान किया है. राहुल गांधी ने भाजपा और आरएसएस की तुलना कट्टरपंथी इस्लामी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से की थी. इसके जवाब में बीजेपी की ओर से कहा गया कि उन्हें भारत की अभिकल्पना के साथ धोखा बंद करना चाहिए. राहुल गांधी ने जर्मनी के हैम्बर्ग में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण बेरोज़गारी बढ़ी और लोगों के अंदर पनपे ग़ुस्से के कारण मॉब-लिंचिंग की घटनाएं होने लगी हैं. उनका यह भी कहना था कि विश्व में कहीं भी लोगों को विकास की प्रक्रिया से दूर रखा जाता है तो आईएस जैसे गुटों को बढ़ावा मिलता है.

पिछले एक साल में राहुल गांधी ने बीजेपी पर आक्रामक प्रहार किए हैं. हाल में संसद में पेश किए गए अविश्वास प्रस्ताव पर उनके भाषण और उसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गले लगने से बीजेपी दबाव में आई है. यह आक्रामकता स्वाभाविक है और उन्हें सरकार की आलोचना करने और उसकी गलतियों को उजागर करने का पूरा अधिकार है. अलबत्ता दो सवाल उनके बयानों के साथ जुड़े हुए हैं. पहला, वे अपनी बातों को कहने के लिए संसद और भारतीय मंचों का उपयोग करने के बजाय विदेशी मंचों का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं? और दूसरे, इस प्रकार की बातों से क्या विदेश में भारत की नकारात्मक छवि बनती है? उन्होंने डोकलाम और भारत-पाक रिश्तों के संदर्भ में कुछ बातें कही हैं. कुछ दशक पहले तक भारतीय राजनीति में विदेश नीति पर सहमति रहती थी. हम उस परम्परा से हट रहे हैं. क्या यह सही राजनीति है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

Sunday, August 26, 2018

जनता के भरोसे को कायम नहीं रख पाई ‘आप’

हाल में पहले आशुतोष और फिर आशीष खेतान के इस्तीफों की खबर मिलने के बाद आम आदमी पार्टी फिर चर्चा में है। दोनों नेताओं ने इस मामले में सफाई नहीं दी। आशुतोष ने इसे निजी मामला बताया और खेतान ने कहा कि मैं वकालत के पेशे पर ध्यान लगाना चाहता हूँ, इसलिए सक्रय राजनीति छोड़ रहा हूँ। न इस्तीफों पर अभी फैसला नहीं हुआ है। यानी कि किसी स्तर पर मान-मनौवल की उम्मीदें अब भी हैं। बहरहाल फैसला जो भी हो, आम आदमी पार्टी को लेकर तीन सवाल खड़े हो रहे हैं। बड़ी तेजी से बढ़ने के बाद क्या यह पार्टी अब गिरावट की ओर है? क्या इस गिरावट के कारण वैकल्पिक राजनीति के प्रयासों के धक्का लगेगा? तीसरे क्या वजह है, जो ऐसी नौबत आई?
 द प्रिंट में प्रकाशित इस लेख को भी पढ़ें 
पार्टी के हमदर्द कह सकते हैं कि गिरावट है ही नहीं और जो हो रहा है, वह सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है। सभी पार्टियों में ऐसा होता है। बात सही है, पर इसे क्या दूसरे दलों की तरह होना चाहिए? आने-जाने की भी कोई इंतहा है। पिछले कुछ समय में इसकी भीतरी खींचतान कुछ ज्यादा ही मुखर हुई है। पार्टी से हटने की प्रवृत्तियाँ अलग-अलग किस्म की हैं। कुछ लोग खुद हटे और कुछ हटाए गए। योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण और आनन्द कुमार का हटना बड़ी परिघटना थी, जिससे पार्टी टूटी तो नहीं, पर उससे इतना जाहिर जरूर हुआ कि इसकी राजनीति इतनी ‘नई’ नहीं है, जितनी बताई जा रही है। पार्टी ने इस प्रकार के प्रश्नों पर विचार करने के लिए जो व्यवस्था बनाई थी, वह विफल हो गई। वस्तुतः पार्टी की एक केन्द्रीय हाईकमान नजर आने लगी।

Thursday, August 23, 2018

नकारात्मक खबरें और बढ़ता ‘आप’ का क्षरण


अरविंद केजरीवालआम आदमी पार्टी के जन्म के साथ उसके भविष्य को लेकर अटकलों का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह रुकने के बजाय बढ़ता जा रहा है. उसके दो वरिष्ठ नेताओं के ताजा इस्तीफों के कारण कयास बढ़ गए हैं. 
ये कयास पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र, उसकी रीति-नीति, लतिहाव, दीर्घकालीन रणनीति और भावी राजनीति को लेकर हैं. इस किस्म की खबरों के बार-बार आने से पार्टी का पटरा बैठ रहा है.
पार्टी के उदय ने देश में नई राजनीति की सम्भावनाओं को जन्म दिया था. ये सम्भावनाएं ही अब क्षीण पड़ रहीं हैं. उत्साह का वह माहौल नहीं बचा, जो तीन साल पहले था. पार्टी का नेतृत्व खुद बहुत आशावान नहीं लगता.
पैरों में लिपटे भँवर
हाल में पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सात सीटों को लेकर एक सर्वेक्षण कराया है, जिसमें उसने सात में से चार सीटों पर सफल होने की उम्मीद जाहिर की है. यह उसका अपना सर्वे है. यह उसकी मनोकामना है.
पार्टी बताना चाहती है कि हम दिल्ली में सबसे बड़ी ताकत हैं. शायद वह सही है, पर उसे अपना क्षरण भी दिखाई पड़ रहा है. प्रमाण है उसके अपनों का साथ छोड़कर जाना. यह आए दिन का टाटा-बाई-बाई अच्छा संकेत नहीं है.
पार्टी की आशा और निराशा के ज्यादातर सूत्र दिल्ली की राजनीति से जुड़े हैं. उसकी लोकप्रियता की अगली परीक्षा लोकसभा चुनाव में होगी. पर उस चुनाव की तैयारी उसके अंतर्विरोधों को भी बढ़ा रही है. चुनाव लड़ने के लिए साधन चाहिए, जिनके पीछे भागने का मतलब है पुराने साथियों से बिछुड़ना. साथ ही चुनाव जीतने के लिए जाति, धर्म, क्षेत्र और इसी किस्म के दूसरे फॉर्मूलों पर भी चलना है, क्योंकि चुनाव जीतने के लिए वे जरूरी होते हैं. यह सब 'नई राजनीति' की अवधारणा से मेल नहीं खाता.
बीजेपी और कांग्रेस दोनों से पंगा लेने के कारण उसकी परेशानियाँ बढ़ी हैं. उसके आंतरिक झगड़े पहले भी थे, पर अब वे सामने आने लगे हैं. झगड़ों ने उसके पैरों को भँवर की तरह लपेटना शुरू कर दिया है.

Sunday, August 19, 2018

उदारता और सहिष्णुता की राजनीति

अटल बिहारी वाजपेयी करीब पाँच दशक तक देश की राजनीति में सक्रिय रहे। उनकी कुछ बातें उनकी अलग पहचान बनाती हैं। उन्हें पहचाना जाता है उनके भाषणों से, जो किसी भी सामान्य व्यक्ति को समझ में आते थे। इन भाषणों की शैली से ज्यादा महत्वपूर्ण वे तथ्य हैं, जिन्हें उन्होंने रेखांकित किया। उनकी लम्बी संसदीय उपस्थिति ने उन मूल्यों और मर्यादाओं को स्थिर करने में मदद की, जो भारतीय लोकतंत्र का आधार हैं।
अटल बिहारी ने जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, चंद्रशेखर, नरसिंहराव, देवेगौडा और गुजराल के प्रधानमंत्रित्व में विरोध की कुर्सियों पर बैठकर अपने विचार व्यक्त किए। उनके संसदीय भाषणों को पढ़ें तो आप पाएंगे कि उनमें कहीं कटुता नहीं है। विरोध में रहते हुए भी उन्होंने सत्तापक्ष की सकारात्मक गतिविधियों का समर्थन करने में कभी देर नहीं लगाई। नेहरू जैसे प्रखर वक्ता के मुकाबले न केवल खड़े रहे बल्कि उनकी प्रशंसा के पात्र भी बने।
अटल बहारी वाजपेयी की सबसे बड़ी सफलता इस बात में थी कि उन्होंने उदार और सहिष्णु राजनेता की जो छवि बनाई, वह विलक्षण थी। राजनीति की जटिलताओं को वे अपने लम्बे मौन से सुलझाते थे। उनके जीवन के तीन-चार बड़े फैसले एटमी परीक्षण, पाकिस्तान के साथ सम्बंध सुधारने की प्रक्रिया और अमेरिका के साथ रिश्तों को परिभाषित करने से जुड़े थे। उन्होंने आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया को न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि उसे तेज गति भी दी।

Saturday, August 18, 2018

अटल ने बीजेपी की स्थायी 'विरोधी' छवि को तोड़कर उसे सत्तारूढ़ बनाया

बीजेपी सत्ता में नहीं होती तो शायद अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर इतना जबर्दस्त शोक-प्रदर्शन न हुआ होता. इस शोक प्रदर्शन में कई तरह के लोग हैं, पर मोटे तौर पर दो तरह के लोगों को पहचाना जा सकता है. पहले हैं भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी के समर्थक और दूसरे हैं भारतीय जनता पार्टी के विरोधी. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रशंसकों में बड़ी संख्या उनके विरोधियों की भी रही है, पर आज काफी लोग वर्तमान स्थितियों के संदर्भ में भी अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं. वे रेखांकित कर रहे हैं कि अटल क्यों गुणात्मक रूप से मोदी-व्यवस्था से भिन्न थे. यह फर्क अटल की समन्वयवादी रीति-नीति और देश की सामाजिक बहुलता के प्रति दृष्टि के कारण है. अटल बिहारी वाजपेयी ने यह साबित किया कि बीजेपी भी देश पर राज कर सकती है. उसे स्थायी विपक्ष के स्थान पर सत्ता-पक्ष बनाने का श्रेय उन्हें जाता है. उन्होंने वह सूत्र पकड़ा, जिसके कारण कांग्रेस देश की एकछत्र पार्टी थी. इस बात का विश्लेषण अभी लम्बे समय तक होगा कि देश की सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता की प्रतिनिधि पार्टी कांग्रेस है या बीजेपी, पर यह भी सच है कि आजादी के ठीक पहले तक कांग्रेस को हिन्दू पार्टी माना जाता था. तब बीजेपी थी भी नहीं. उनका निधन ऐसे मौके पर हुआ है, जब बीजेपी के सामने कुछ बड़े सवाल खड़े हैं. बेशक अटल के नाम पर बीजेपी को राजनीतिक लाभ मिलेगा. देखना यह भी होगा कि पार्टी अटल की उदारता और सहिष्णुता की विरासत को आगे बढ़ाने के बारे में सोचेगी या नहीं.

अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद रात के टेलीविजन शो में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी, जो अटल बिहारी वाजपेयी के कटु आलोचक हुआ करते थे, तारीफ करते नजर आए. उनकी राय थी कि अटलजी उदार और व्यावहारिक नेता थे. हालांकि इनमें से काफी लोग उन्हें तब भी फासिस्ट बताते थे. आज वे उन्हें उदार मान रहे हैं, तो इसके दो कारण हैं. हमारी संस्कृति में निधन के बाद व्यक्ति की आलोचना नहीं करते, पर यह राजनीति का गुण नहीं है. पिछले डेढ़ दशक की राजनीति के ठोस सत्य से रूबरू होने के बाद यह वास्तव में दिल की आवाज है.

अटल बिहारी वाजपेयी का बड़ा योगदान है बीजेपी को स्थायी विरोधी दल से सत्तारूढ़ दल में बदलना. पार्टी की तूफान से घिरी किश्ती को न केवल उन्होंने बाहर निकाला, बल्कि सिंहासन पर बैठा दिया. देश का दुर्भाग्य है कि जिस वक्त उसे उनके जैसे नेता की सबसे बड़ी जरूरत थी, वे सेवा निवृत्त हो गए और फिर उनके स्वास्थ्य ने जवाब दे दिया. दिसम्बर 1992 के बाद बीजेपी ‘अछूत’ पार्टी बन गई थी. आडवाणीजी के अयोध्या अभियान ने उसे एक लम्बी बाधा-दौड़ में सबसे आगे आने का मौका जरूर दिया, पर मुख्यधारा की वैधता और राष्ट्रीय स्वीकार्यता दिलाने का काम अटल बिहारी ने किया.

Thursday, August 16, 2018

‘आप’ में बार-बार इस्तीफे क्यों होते हैं?


आशुतोष, आम आदमी पार्टी, AAP, Aam Aadmi Party, Ashutosh
आम आदमी पार्टी से उसके वरिष्ठ सदस्य आशुतोष का इस्तीफा ऐसी खबर नहीं है, जिसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हों. इस्तीफे के पीछे व्यक्तिगत कारण नजर आते हैं. और समय पर सामने भी आ जाएंगे. अलबत्ता यह इस्तीफा ऐसे मौके पर हुआ है, जब इस पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. एक सवाल यह भी है कि इस पार्टी में बार-बार इस्तीफे क्यों होते हैं?
आशुतोष ने अपने इस्तीफे की घोषणा ट्विटर पर जिन शब्दों से की है, उनसे नहीं लगता कि किसी नाराजगी में यह फैसला किया गया है. दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल ने जिस अंदाज में ट्विटर पर उसका जवाब दिया है, उससे लगता है कि वे इस इस्तीफे के लिए तैयार नहीं थे.
गमसुम इस्तीफा क्यों?
आशुतोष ने अपने ट्वीट में कहा था, हर यात्रा का एक अंत होता है.आपके साथ मेरा जुड़ाव बहुत अच्छा/क्रांतिकारी था, उसका भी अंत आ गया है. इस ट्वीट के तीन मिनट बाद उन्होंने एक और ट्वीट किया, जिसमें मीडिया के दोस्तों से गुज़ारिश की, मेरी निजता का सम्मान करें. मैं किसी तरह से कोई बाइट नहीं दूंगा.
आशुतोष अरविंद केजरीवाल के करीबी माने जाते रहे हैं. पिछले चार साल में कई लोगों ने पार्टी छोड़ी, पर आशुतोष ने कहीं क्षोभ व्यक्त नहीं किया. फिर भी तमाम तरह के कयास हैं. कहा जा रहा है कि पार्टी की ओर से राज्यसभा न भेजे जाने की वजह से वे नाराज चल रहे थे. शायद वे राजनीति को भी छोड़ेंगे वगैरह.  
आम आदमी पार्टी के ज्यादातर संस्थापक सदस्यों की पृष्ठभूमि गैर-राजनीतिक है. ज्यादा से ज्यादा लोग एक्टिविस्ट हैं, पर आशुतोष की पृष्ठभूमि और भी अलग थी. वे खांटी पत्रकार थे और शायद उनका मन बीते दिनों को याद करता होगा.

Tuesday, August 14, 2018

विरोधी-एकता के दुर्ग में दरार

राज्यसभा के उपसभापति चुनाव में पड़े वोटों के आधार पर राजनीति शास्त्र के शोधछात्र राहुल वर्मा का 2019 के चुनाव में बनने वाले सम्भावित गठबंधनों का अनुमान
राज्यसभा के उप-सभापति पद के चुनाव ने एकबारगी विरोधी दलों के अंतर्विरोधों को उजागर किया है। एनडीए प्रत्याशी हरिवंश की जीत इतनी आसानी से हो जाएगी, इसका अनुमान पहले से नहीं था। पिछले चार साल से विरोधी दल बीजेपी को केवल राज्यसभा में ही परेशान करने में सफल थे। पिछले कुछ समय से बीजेपी की स्थिति राज्यसभा में बेहतर हुई है, पर इतनी बेहतर वह फिर भी नहीं थी कि उसका प्रत्याशी आसानी से चुनाव जीत जाता। पिछले महीने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर एनडीए की जीत के बाद यह दूसरी जीत उसका आत्मविश्वास बढ़ाएगी।

कांग्रेस समेत विरोधी दलों की रणनीति अलग-अलग राज्यों में संयुक्त प्रत्याशी खड़े करने की है, ताकि बीजेपी-विरोधी वोट बँटने न पाएं। यह रणनीति उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और एक हद तक महाराष्ट्र में अब भी कारगर है, पर उसके जिरह-बख्तरों की दरारें भी नजर आने लगी हैं। साफ है सत्तारूढ़ दल ने इस चुनाव को कुछ समय के लिए टालकर बीजू जनता दल और टीआरएस के साथ विचार-विमर्श पूरा कर लिया। यह विमर्श केवल राज्यसभा के उप-सभापति चुनाव तक सीमित नहीं है। अब यह 2019 के चुनाव तक जाएगा। कांग्रेस ने इस चुनाव को या तो महत्व नहीं दिया या उसे भरोसा था कि यह चुनाव इस सत्र में नहीं होगा। कांग्रेस के दो सांसदों का वोट न देना भी उसके असमंजस को बढ़ाने वाला है।

Sunday, August 12, 2018

गठबंधन-प्रति-गठबंधन

संसद के मॉनसून सत्र के पूरा होते ही राजनीतिक जोड़-घटाना शुरू हो गया है। जिस तरह महाभारत में युद्ध के पहले दोनों पक्षों की ओर से लड़ने वाले महारथियों के नाम सामने आने लगे थे, करीब उसी तरह राज्यसभा के उप-सभापति पद के चुनाव के बाद देश की राजनीतिक स्थिति नज़र आने लगी है। एनडीए प्रत्याशी हरिवंश की जीत की उम्मीद थी भी, तो इतनी आसान नहीं थी। सत्ता पक्ष ने पहले टाला और फिर अचानक चुनाव करा लिया। इस दौरान उसने अपने समीकरणों को ठीक कर लिया। फिलहाल एनडीए के चुनाव मैनेजमेंट की चुस्ती साबित हुई, वहीं विरोधी-एकता के अंतर्विरोध भी उभरे। अभी बहुत से किन्तु-परन्तु फिर भी बाकी हैं।

एनडीए जहाँ नरेन्द्र मोदी को आगे रखकर चुनाव मैदान में उतर रहा है वहीं विरोधी दलों का कहना है कि नेतृत्व का सवाल चुनाव परिणाम आने के बाद देखा जाएगा। कांग्रेस ने संकेत दिया है कि नेतृत्व को लेकर वह खुले मन से विचार कर रही है। उसे कोई दूसरा नेता भी स्वीकार हो सकता है। यानी कि ममता बनर्जी और मायावती के दावों को भी स्वीकार कर सकते हैं। अभी बातें संकेतों में हैं, जिन्हें स्पष्ट शब्दों में कहने के रणनीतिक जोखिम हैं। वस्तुतः अभी महागठबंधन की शक्ल भी साफ नहीं है। फिलहाल महागठबंधन का ‘कोर’ यानी कि केन्द्र नजर आने लगा है, पर यह भी करीब-करीब तय सा लग रहा है कि बीजद, टीआरएस और अद्रमुक इसके साथ नहीं है।

Saturday, August 11, 2018

तमिल-राजनीति में एक और ब्रेक


करीब पाँच दशक तक तमिलनाडु की राजनीति के शिखर पर रहने वाले एम करुणानिधि के निधन के बाद करीब बीस महीने के भीतर राज्य की राजनीति में बड़ा ब्रेक आया है. इसके पहले दिसम्बर 2016 में जे जयललिता का निधन पहली बड़ी परिघटना थी. गौर से देखें दोनों परिघटनाओं के इर्द-गिर्द एक नई तमिल राजनीति जन्म ले रही है. कालांतर में तमिल राजनीति दो ध्रुवों में बँट गई थी, पर इन दोनों ध्रुवों के नायकों के चले जाने के बाद सवाल पैदा हो रहे हैं, जिनके जवाब अब मिलेंगे. सन 2019 के चुनाव के लिए होने वाले गठबंधनों में उनकी तस्वीर नजर आएगी.
इन दो दलों के नजरिए से देखें तो द्रमुक की स्थिति बेहतर लगती  है, क्योंकि करुणानिधि ने विरासत का फैसला जीते जी कर दिया था, जबकि अद्रमुक में विरासत की लड़ाई जारी है. करुणानिधि ने पार्टी की कमान एमके स्टैलिन को सौंप जरूर दी है, पर वे उनकी कुव्वत का फैसला वक्त करेगा. वे अपने पिता की तरह कद्दावर नेता साबित होंगे या नहीं? इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या तमिलनाडु की स्थितियाँ पचास के दशक जैसी हैं, जब द्रविड़ आंदोलन ने अपने पैर जमाए थे? तमिल-राजनीति को ज्यादा बड़े फलक पर देखने की जरूरत है. पर उसकी पृष्ठभूमि को समझना भी उपयोगी होगा.

Sunday, August 5, 2018

ममता बनर्जी की राष्ट्रीय दावेदारी

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी साल के बारहों महीने किसी न किसी वजह से खबरों में रहती हैं। इन दिनों वे दो कारणों से खबरों में हैं। एक, उन्होंने असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) की प्रक्रिया का न केवल विरोध किया है, बल्कि कहा है कि इससे देश में गृहयुद्ध (सिविल वॉर) की स्थिति पैदा हो जाएगी। यह उत्तेजक बयान है और इसके पीछे देश के ‘टुकड़े-टुकड़े’ योजना के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं। दूसरे से वे अचानक दिल्ली पहुँचीं और विरोधी दलों की एकता को लेकर विचार-विमर्श शुरू कर दिया। वे जितनी तेजी से दिल्ली में सक्रिय रहीं, उससे अनुमान लगाया जा रहा है कि वे भी प्रधानमंत्री पद की दावेदार हैं।

ममता बनर्जी लोकप्रिय नेता हैं और बंगाल में उनका दबदबा कायम है। पर उनकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल हैं। पिछले दो दशक में उनकी गतिविधियों में कई तरह के उतार-चढ़ाव आए हैं। केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने हाल में असमें में घुसपैठ को लेकर ममता के 4 अगस्त 2005 के एक बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने आज से उलट बातें कहीं थीं। राजनीति में बयान अक्सर बदलते हैं, पर ममता की विसंगतियाँ बहुत ज्यादा हैं। वे अपनी आलोचना तो बर्दाश्त करती ही नहीं हैं। दूसरे वे जिस महागठंधन के सहारे राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश करना चाहती हैं, उसे अपने राज्य में बनने नहीं देंगी। 

Thursday, August 2, 2018

असम के सवाल पर संयम की जरूरत

असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर तीन तरह की प्रतिक्रियाएं हैं. इनमें दो प्रतिक्रियाएं राजनीतिक हैं. तीसरी इस समस्या के समाधान को लेकर चिंतित नागरिकों की है. हालांकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह और असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल  ने स्पष्ट किया है कि जिन 40 लाख लोगों के नाम इस सूची में नहीं हैं, उन्हें चिंतित होने की जरूरत नहीं है, पर राजनीतिक स्तर पर हो रही बयानबाजी के कारण बेवजह का तनाव फैल रहा है. यह सब 2019 के चुनाव की पृष्ठपीठिका है. इससे ज़ाहिर यह हो रहा है कि राष्ट्रीय महत्व के सवालों पर भी राजनीति कितने निचले स्तर पर जा सकती है. अब तक की आधिकारिक स्थिति यह है कि सूची में नाम नहीं होने के कारण किसी को विदेशी नागरिक या घुसपैठिया नहीं माना जाएगा. सम्भव है कि आने वाले समय में कुछ नाम अलग हो जाएं, तब हम क्या करेंगे, इसपर विचार करना चाहिए. दिक्कत इस मसले के राजनीतिकरण के कारण खड़ी हो रही है. आग में में घी डालने का काम अमित शाह और ममता बनर्जी दोनों ने किया है. 
अभी तक किसी भी स्तर पर यह तय नहीं हुआ है कि असम में कितने अवैध नागरिक हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के निर्देशन में चल रही है. मंगलवार को अदालत ने एनआरसी से बाहर रह गए 40 लाख से ज्यादा लोगों से कहा है कि उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है. अदालत ने केंद्र को निर्देश दिया है इन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए. बाहर रह गए लोगों की आपत्तियां निष्पक्ष रूप से दर्ज करें और इसके लिए मानक परिचालन प्रक्रिया (एसओपी) का पालन किया जाना चाहिए. अदालत के सामने 16 अगस्त तक एसओपी की रूपरेखा पेश कर दी जाएगी. सांविधानिक दायरे में और मानवीय प्रश्नों को सामने रखकर ही अंततः कोई फैसला होगा.

Sunday, July 29, 2018

इमरान के इस ताज में काँटे भी कम नहीं

पाकिस्तान के चुनाव परिणामों से यह बात साफ हुई कि मुकाबला इतना काँटे का नहीं था, जितना समझा जा रहा था। साथ ही इमरान खान की कोई आँधी भी नहीं थी। उन्हें नए होने का फायदा मिला, जैसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी को मिला था। जनता नए को यह सोचकर मौका देती है कि सबको देख लिया, एकबार इन्हें भी देख लेते हैं। ईमानदारी और न्याय की आदर्श कल्पनाओं को लेकर जब कोई सामने आता है तो मन कहता है कि क्या पता इसके पास जादू हो। इमरान की सफलता में जनता की इस भावना के अलावा सेना का समर्थन भी शामिल है।
पाकिस्तान के धर्म-राज्य की प्रतीक वहाँ की सेना है, जो जनता को यह बताती है कि हमारी बदौलत आप बचे हैं। सेना ने नवाज शरीफ के खिलाफ माहौल बनाया। यह काम पिछले तीन-चार साल से चल रहा था। पाकिस्तान के इतिहास में यह पहला मौका था, जब सेना ने खुलकर चुनाव में हिस्सा लिया और नवाज शरीफ का विरोध और इमरान खान का समर्थन किया। वह खुद पार्टी नहीं थी, पर इमरान खान उसकी पार्टी थे। देश के मीडिया का काफी बड़ा हिस्सा उसके प्रभाव में है। नवाज शरीफ ने देश के सत्ता प्रतिष्ठान से पंगा ले लिया था, जिसमें अब न्यायपालिका भी शामिल है।

Tuesday, July 24, 2018

2019 की बहस का आग़ाज़


मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का गिरना खबर नहीं है, क्योंकि इसे पेश करने वाले भी जानते थे कि पास होने वाला नहीं. से लेकर तीन किस्म की जिज्ञासाएं थीं. एक, एनडीए के पक्ष में कितने वोट पड़ेंगे, दूसरे विरोधी दलों की एकता कितनी मजबूती से खड़ी दिखाई पड़ेगी और तीसरे, क्या लोकसभा चुनाव के लिए कोई मूमेंटम इससे बनेगा? शुक्रवार को इस बहस के लिए सात घंटे का समय रखा गया था, पर चर्चा 12 घंटे चली.
पूरी बहस का उल्लेखनीय पहलू है, दोनों तरफ की जबर्दस्त नाटकीयता और शोर. लगता है कि 2019 के चुनाव का अभियान शुरू हो गया है. यह अविश्वास प्रस्ताव तेलगु देशम की ओर से आंध्र को लेकर था, पर ज्यादातर वक्ताओं ने इस पर ध्यान नहीं दिया. सारा ध्यान बीजेपी और कांग्रेस पर रहा. राहुल गांधी का निशाना मोदी पर था और मोदी का राहुल पर.

Sunday, July 22, 2018

राजनीतिक अंताक्षरी राउंड वन


अविश्वास प्रस्ताव ने देश की राजनीति में अचानक करेंट पैदा कर दिया। बहरहाल उसकी औपचारिकता पूरी हो गई, अब इसके निहितार्थ के बारे में सोचिए। पहला सवाल है कि इसे लाया ही क्यों गया? लोकसभा चुनाव के पहले विरोधी-एकता की यह पहली बड़ी कोशिश है। सरकार के खिलाफ पिछले चार साल से पैदा हो रही शिकायतों को मुखर करने और बीजेपी के अंतर्विरोधों पर प्रहार करने का यह अच्छा मौका था। इस प्रस्ताव के सहारे इन पार्टियों को आपसी समन्वय स्थापित करने में सफलता मिलेगी। कांग्रेस इस मुहिम के साथ है, इसलिए उसे भी इसका राजनीतिक लाभ मिलना चाहिए।
सवाल है कि क्या ऐसा हुआ? इस मुहिम लाभ किसे मिला? कांग्रेस को, शेष विपक्ष को या बीजेपी को? जवाब फौरन देने में दिक्कतें हैं, पर इतना साफ है कि इसके परिणाम का पता सबको पहले से था। सबकी दिलचस्पी इस बात में थी कि माहौल कैसा बनता है। यह भी कि शेष सत्र में सत्तारूढ़ दल और विपक्ष की रणनीति क्या होगी। कहीं लोकसभा चुनाव वक्त से पहले न हो जाएं। उधर साल के अंत में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में चुनाव हैं। सत्रावसान के बाद नेताओं और विश्लेषकों की निगाहें इधर मुड़ जाएंगी। इस लिहाज से मॉनसून सत्र और खासतौर से अविश्वास प्रस्ताव की बहस देर तक और दूरतक याद रखी जाएगी।  

हमला अग्निवेश पर नहीं, देश पर है


शुक्रवार की राज संसद में लाए गए अविश्वास प्रस्ताव का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तमाम बातों के अलावा मॉब लिंचिंग की घटनाओं का जिक्र भी किया है। उन्होंने कहा, मॉब लिंचिंग की घटनाएं निंदनीय हैं। इसके पहले गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में कहा कि यह सच है कि देश के कई भागों में लिंचिंग के घटनाओं में कई लोगों की जान गई, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। लिंचिंग के कारण जिनकी भी मौत हुई उसकी मैं सरकार की ओर से कड़ी निंदा करता हूं।
अखबारों के पन्नों में लगभग रोज मॉब लिंचिंग की खबरें दिखाई पड़ रहीं हैं। पर सामाजिक कायर्कर्ता स्वामी अग्निवेश पर झारखंड में हुए हमले ने परेशान कर दिया है। यह हमला निजी रंजिश के कारण नहीं, वैचारिक कारणों से हुआ था। ज्यादातर हिंसा अफवाहों के कारण हो रहीं हैं, पर यह हिंसा अफवाह के कारण नहीं थी। इस मामले में पुलिस की बेरुखी भी चिंता का बड़ा कारण है। हमले के बाद अग्निवेश ने कहा कि उनके आने की सूचना पुलिस और प्रशासन को दी गई थी। 79 साल के एक बुजुर्ग व्यक्ति की पगड़ी उतार कर पीटा गया। कपड़े तार-तार कर दिए गए। यह कैसा देश है और कैसी संस्कृति और समाज है, जो यह सब होते हुए देख रहा है? 

Thursday, July 19, 2018

संसदीय कर्म की दिशाहीन राजनीति


लोकसभा चुनाव समय से हुए तो संसद के तीन सत्र उसके पहले हो जाएंगे. इन तीनों सत्रों में सत्तापक्ष और विपक्ष की जोर-आजमाइश अपने पूरे उभार पर देखने को मिलेगी. इसका पहला संकेत बुधवार से शुरु हुए मॉनसून सत्र में देखने को मिल रहा है और अभी मिलेगा. इसकी शुरुआत मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस से हुई है. राज्यसभा में नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद और लोकसभा में कांग्रेस के सदन के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी के फैसले का ऐलान करते हुए कहा था कि 15 पार्टियां हमारे साथ हैं. लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने इसे विचार के लिए स्वीकार कर लिया है. प्रस्ताव पर चर्चा शुक्रवार 20 जुलाई को होगी. लगता है कि यह सत्र ही नहीं अगले चुनाव तक देश की राजनीति इस प्रस्ताव के इर्द-गर्द रहेगी.

इस पहल की केंद्रीय राजनीति जरूर विचारणीय है. यह नोटिस तेदेपा की ओर से दिया गया है और इसके पीछे आंध्र को विशेष राज्य के दर्जे से वंचित किए जाने को महत्वपूर्ण कारण बताया गया है. अविश्वास प्रस्ताव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है और इसके बहाने देश के सामने खड़े महत्वपूर्ण सवालों पर चर्चा भी होती है. यह नोटिस क्षेत्रीय राजनीति की ओर से दिया गया है. बेहतर होता कि यह राष्ट्रीय सवालों को लेकर आता और कांग्रेस इसे लाती. बेशक सवाल राष्ट्रीय उठेंगे, पर इसकी प्रेरणा क्षेत्रीय राजनीति से आई है. आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देने से ज्यादा बड़े सवाल हैं अर्थव्यवस्था, सामाजिक जीवन में बढ़ती कटुता और मॉब लिंचिंग जैसी अराजकता. बहरहाल इसके पीछे की जो भी राजनीति हो, हमें अच्छी संसदीय बहस का इंतजार करना चाहिए. 

Sunday, July 15, 2018

रास्ते से भटक क्यों रहा है हमारा लोकतंत्र?

लोकतांत्रिक व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर हाल में दो खबरों से दो तरह के निष्कर्ष निकलते हैं। पिछले हफ्ते तरह केन्द्र ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि देश भर में अदालती कार्यवाही का सीधा प्रसारण किया जा सकता है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने सभी पक्षकारों से कहा कि वे अदालत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण के लिए दिशा निर्देश तैयार करने के बारे में अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल को अपने सुझाव दें। अटार्नी जनरल ने इससे पहले न्यायालय से कहा था कि अदालती कार्यवाही का सीधा प्रसारण दुनिया के अनेक देशों में एक स्वीकार्य परंपरा है। शीर्ष अदालत ने न्यायिक कार्यवाही में पारदर्शिता लाने के इरादे से पिछले साल प्रत्येक राज्य की निचली अदालतों और न्यायाधिकरणों में सीसीटीवी लगाने का निर्देश दिया था।

इस खबर के विपरीत  राज्यसभा के निवृत्तमान उप-सभापति पीजे कुरियन ने कहा कि संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण बंद कर देना चाहिए, क्योंकि इससे सदन की छवि खराब होती है। कुरियन का कहना था कि सदन की कार्यवाही के दौरान भले ही पीठासीन अध्यक्ष असंसदीय शब्दों को रिकॉर्ड के बाहर कर देते हों, लेकिन डिजिटल मीडिया के इस दौर में ये बातें आसानी से जनता तक पहुंच जाती हैं। इस वजह से सदन में शालीनता और व्यवस्था कायम रखने की कोशिशें बेमतलब हो जाती हैं। उपरोक्त दोनों बातों को मिलाकर पढ़ें, तो क्या निष्कर्ष निकलता है?