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Saturday, October 24, 2020

फिलहाल ‘ग्रे लिस्ट’ में ही रहेगा पाकिस्तान

पाकिस्तानी अखबार फ्राइडे टाइम्स से साभार

पाकिस्तान फिलहाल फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की
ग्रे लिस्ट से बाहर नहीं निकलेगा। उसे जो काम दिए गए थे, उन्हें पूरा करने का समय भी निकल चुका है। अब उसके पास फरवरी 2021 तक का समय है, जब उसे मानकों पर खरा उतरने का एक मौका और दिया जाएगा। गत 21 से 23 अक्तूबर तक हुई वर्च्युअल बैठक के बाद शुक्रवार शाम को एफएटीएफ ने बयान जारी किया कि पाकिस्तान सरकार आतंकवाद के खिलाफ 27 सूत्रीय एजेंडे को पूरा करने में विफल रही है। उसने संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधित आतंकवादियों के खिलाफ भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है।

सूत्रों के मुताबिक एफएटीएफ की बैठक में पाकिस्तान के बचाव के लिए तुर्की ने पुरजोर पैरवी की। उसने सदस्य देशों से कहा कि पाकिस्तान के अच्छे काम पर विचार करना चाहिए और 27 में छह मानदंडों को पूरा करने के लिए थोड़ा और इंतजार करना चाहिए। पर बाकी देशों ने तुर्की के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी सहित कई देश पाकिस्तान की  आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई से संतुष्ट नहीं हैं।

अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी

ग्रे लिस्ट में बने रहने से पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ), विश्व बैंक और यूरोपीय संघ से आर्थिक मदद मिलना मुश्किल हो जाएगा। विदेशी पूँजी निवेश में भी दिक्कतें पैदा होंगी, क्योंकि कोई भी देश आर्थिक रूप से अस्थिर देश में निवेश करना नहीं चाहता है। इसबार की बैठक में पाकिस्तान की फज़ीहत का आलम यह था कि 39 सदस्य देशों में से केवल तुर्की ने उसे ग्रे लिस्ट से बाहर निकाले जाने की वकालत की।

Thursday, October 22, 2020

कश्मीर का ‘काला दिन’

भारत सरकार ने इस साल से 22 अक्तूबर को कश्मीर का काला दिनमनाने की घोषणा की है। 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर हमला बोला था। पाकिस्तानी लुटेरों ने कश्मीर में भारी लूटमार मचाई थी, जिसमें हजारों लोग मारे गए थे। बारामूला के समृद्ध शहर को कबायलियों, रज़ाकारों ने कई दिन तक घेरकर रखा था। इस हमले से घबराकर कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्तूबर 1947 को भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे, जिसके बाद भारत ने अपने सेना कश्मीर भेजी थी। इस बात के प्रमाण हैं कि स्वतंत्रता के फौरन बाद पाकिस्तान ने कश्मीर और बलोचिस्तान पर फौजी कार्रवाई करके उनपर कब्जे की योजना बनाई थी।

Wednesday, October 21, 2020

कराची की सब्ज़ी मंडी में हरी मिर्च और शिमला मिर्च की क़ीमतें आसमान छूने लगीं


 पाकिस्तान के उर्दू डॉन अख़बार से देवनागरी में उर्दू का आनंद लें

20 अक्तूबर 2020। कराची में हरी मिर्च और शिमला मिर्च की क़ीमतें बुलंदी पर पहुँच गई हैं और ये 320 रुपये और 480 रुपये फ़ी किलो तक फ़रोख़्त हो रही हैं। डॉन अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ मार्केट ज़राए का कहना था कि हरी मिर्च और शिमला मिर्च की क़ीमतें रवां माह दबाव का शिकार रही, इस से क़बल शिमला मिर्च 180 से 200 रुपये फ़ी किलो जबकि हरी मिर्च 200 से240 रुपये फ़ी किलो में दस्तयाब थी। ताहम अब क़ीमतों में इज़ाफे़ के बाद मुख़्तलिफ़ सारिफ़ीन के लिए देसी खानों में इस्तेमाल होने वाली हरी मिर्च ख़रीदना मुश्किल हो गया है।

मार्केट में250 ग्राम यानी एक पाओ हरी मिर्च80 रुपये में दस्तयाब है जबकि बड़ी शिमला मिर्च40 से50 रुपये में फ़रोख़्त हो रही है। उधर कमिश्नर कराची की प्राइस लिस्ट के मुताबिक़ पीर को शिमला मिर्च के होलसेल और रिटेल रेट यक्म अक्तूबर के 130 और133 रुपये फ़ी किलो से बढ़कर 400 और 403 रुपये किलो तक पहुंच गए। इस से क़बल इतवार को शिमला मिर्च के होलसेल और रिटेल क़ीमतें330 और333 रुपये फ़ी किलो थीं। इसी तरह हर मिर्च की होलसेल और रिटेल क़ीमतों में भी इज़ाफ़ा हुआ और ये 110 और 113 रुपये फ़ी किलो से बढ़कर 240 और 243 रुपये फ़ी किलो तक पहुंच गईं।

वाज़ेह रहे कि मुल्क में चाइनीज़ और पैन एशियन रेस्टोरेंट्स की तादाद में इज़ाफे़ के बाइस गुज़श्ता कुछ बरसों में शिमला मिर्च की तलब में इज़ाफ़ा हुआ है। इस हवाले से डॉन से बात करते हुए एक रिटेलर का कहना था कि बैगन और लौकी मार्कीट में60 से70 रुपये किलो में दस्तयाब थी जबकि ईरान और अफ़्ग़ानिस्तान से सब्ज़ी के आने के बावजूद प्याज़ की क़ीमत 80 रुपये किलो से नीचे नहीं आ रही। उन्होंने कहा कि ज़्यादा-तर अश्या (चीजें) 100 रुपये फ़ी किलो से ऊपर फ़रोख़्त हो रही हैं जबकि दरआमदात (सप्लाई) के बावजूद टमाटर अब भी 160 रुपये किलो हैं।

कराची और इस्लामाबाद की शबर है कि दरआमदशुदा सब्ज़ियों की आमद से अवाम को कोई रिलीफ़ नहीं मिल सका क्योंकि टमाटर और प्याज़ की क़ीमतें 150-160 रुपये फ़ी किलो और 50-60 रुपये फ़ी किलो से बिलतर्तीब 200 रुपये फ़ी किलो और 80 रुपये फ़ी किलो की बुलंद तरीन सतह पर पहुंच गई हैं। डॉन अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ सारिफ़ीन पहले से ही दरआमदी अदरक के लिए 600 रुपये फ़ी किलो अदा कर रहे हैं, जबकि कुछ लालची ख़ुदरा फ़रोश उसको बेहतरीन मयार का क़रार देते हुए 700 रुपये फ़ी किलो का मुतालिबा कर रहे हैं। ख़ुदरा फ़रोशों का कहना है कि गुज़श्ता एक हफ़्ते के दौरान ईरानी टमाटर और प्याज़, जबकि अफ़ग़ान प्याज़ की आमद मोख़र होने की वजह से क़ीमतों में मज़ीद इज़ाफ़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि प्याज़ और टमाटर दोनों की बलोचिस्तान की फ़सलें अब तक नाकाफ़ी साबित हो चुकी हैं जिससे ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से उन अश्या की दरआमद की राह हमवार होगी।

 पाकिस्तान के उर्दू डॉन अख़बार को पढ़ने के लिए क्लिक करें

 

Tuesday, October 20, 2020

एफएटीएफ की 'ग्रे लिस्ट’ से पाकिस्तान का फिलहाल निकल पाना मुश्किल

 

फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की 21 से 23 अक्तूबर को होने वाली सालाना आम बैठक के ठीक पहले लगता है कि पाकिस्तान इसबार भी न तो ग्रे लिस्ट से बाहर आएगा और न ब्लैक लिस्ट में डाला जाएगा। भारत सरकार के सूत्रों का कहना है कि एफएटीएफ ने पाकिस्तान को जिन 27 कार्य-योजनाओं की जिम्मेदारी दी थी, उनमें से केवल 21 पर ही काम हुआ है। शेष छह पर नहीं हुआ।

इसके पहले एफएटीएफ के एशिया प्रशांत ग्रुप की रिपोर्ट गत 30 सितंबर को जारी हुई थी, जिसमें पाकिस्तान को दिए गए कार्य और उस पर अमल करने के उपायों की समीक्षा की गई। इसका सारांश है कि पाकिस्तान फिलहाल प्रतिबंधित होने वाली सूची से तो बच सकता है, लेकिन उसे अभी निगरानी सूची में ही रहना होगा। एफएटीएफ ने पाकिस्तान को गैरकानूनी वित्तीय लेन-देन, बाहर से आने वाली फंडिंग को रोकने, एनजीओ के नाम पर काम करने वाली एजेंसियों की गतिविधियों पर लगाम लगाने व पारदर्शिता लाने के लिए कार्यों की सूची सौंपी है।

पेरिस में क्या होगा?

पेरिस स्थित मुख्यालय में एफएटीएफ की 21-23 अक्टूबर को वर्च्युअल बैठक होगी। एफएटीएफ ने हाल के महीनों में पाकिस्तान सरकार की तरफ से उठाए गए कुछ कदमों की तारीफ भी की है। खासतौर पर जिस तरह से गैरसरकारी संगठनों की गतिविधियों को पारदर्शी बनाने के लिए कदम उठाए गए हैं, उनकी तारीफ की गई है। पाकिस्तान में नई व्यवस्था लागू की गई है, जिससे हजारों एनजीओ की फंडिंग की निगरानी संभव हो सकेगी।

Monday, October 19, 2020

कराची में पाकिस्तानी विपक्ष का भारी जलसा

 पाकिस्तान में इमरान खान सरकार के खिलाफ खड़ा हुआ आंदोलन ज़ोर पकड़ता जा रहा है। भारतीय मीडिया इस आंदोलन की खास कवरेज नहीं कर रहा है, क्योंकि उसकी दिलचस्पी स्थानीय मसलों में ज्यादा है। इस वक्त पाकिस्तान पर नजर रखने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि अभी जो कुछ हो रहा है उसका असर भविष्य में भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर पड़ेगा। पाकिस्तान की कवरेज के लिए मैं बीबीसी का सहारा लेता हूँ या फिर डॉन और एक्सप्रेस ट्रिब्यून का। नीचे मैंने पहले बीबीसी की हिंदी वैबसाइट से छोटा सा अंश लिया है। आप विस्तार से पढ़ना चाहें, तो वैबसाइट पर जाएं, जिसका लिंक साथ में है। मेरी दिलचस्पी उस शब्दावली में है, जो पाकिस्तान में इस्तेमाल हो रही है। वह बीबीसी की उर्दू सेवा में सुनने को मिलती है। मैंने बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट का देवनागरी में लिप्यंतरण करके अपेक्षाकृत विस्तार से लगाया है। लिप्यंतरण करते समय मैंने सब कुछ वैसे ही रहने दिया है, जैसी ध्वनि मूल आलेख से आ रही है। मसलन मरियम नवाज शरीफ को मर्यम लिखा गया है, तो मैंने वैसा ही रहने दिया है। पहले पढ़ें बीबीसी हिंदी की खबर का अंश:

इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ कराची में विपक्ष का जलसा, कुछ बदलेगा?

पाकिस्तान में इमरान ख़ान की सरकार के ख़िलाफ़ 11 पार्टियाँ संयुक्त मोर्चे पीडीएम (ऑल पार्टीज़ डेमोक्रेटिक मूवमेंट) के तहत गुजरांवाला में हुए पहले बड़े प्रदर्शन के बाद रविवार को कराची के जिन्ना-बाग़ में जलसा कर रही हैं. इस रैली में शामिल होने मरियम नवाज़, बिलावल भुट्टो समेत अन्य कई नेता पहुंचे हैं. मरियम नवाज़ पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की बेटी हैं और बिलावल भुट्टो पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के बेटे हैं. मरियम नवाज़ हवाई मार्ग से कराची पहुँचीं और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की मज़ार पर भी गईं.

विस्तार से पढ़ना चाहें, तो बीबीसी हिंदी की वैबसाइट पर जाएं

 अब पढ़ें बीबीसी उर्दू की खबर के लिप्यंतरण का संपादित अंश

 जो अवाम के वोटों को बूटों के नीचे रौंदता है हम उसे सलाम नहीं करते- मर्यम नवाज़

ग्यारह जमाती हुकूमत मुख़ालिफ़ इत्तिहाद, पीडीएम का जलसा कराची के जिनाह बाग़ में मुनाक़िद हुआ और इस मौके़ पर मर्यम नवाज़ ने कहा कि हम हलफ़ की पासदारी करने वाले फ़ौजीयों को सलाम करते हैं लेकिन जो अवाम के वोटों को बूटों के नीचे रौंदता है उसे सलाम नहीं करते।

इस जलसे से पीटीएम के मुहसिन दावड़, डाक्टर अबदुलमालिक बलोच, महमूद ख़ान अचकज़ई और अख़तर मीनगल समेत दीगर सयासी रहनुमाओं ने भी ख़िताब किया।

Sunday, October 18, 2020

नवाज शरीफ का फौज पर हल्ला बोल

पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार के खिलाफ लगी आग धीरे-धीरे तेजी पकड़ रही है। शुक्रवार 16 अक्तूबर को पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) का जबर्दस्त जलसा पंजाब के गुजराँवाला में हुआ। इस रैली के साथ यह आंदोलन अब देश के दूसरे इलाकों में फैलेगा। गुजराँवाला की रैली में जहाँ विरोधी नेताओं के हमलों का निशाना इमरान खान और उनकी सरकार थी, वहीं पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के लंदन जारी लाइव वीडियो भाषण में देश की सेना पर निशाना लगाया गया। इस रैली में नवाज शरीफ के अलावा, बिलावल भुट्टो, मौलाना फजलुर्रहमान और मरियम नवाज शरीफ के भाषण और हुए। उन भाषणों का महत्व अपनी जगह है, पर नवाज शरीफ ने जो बातें कही हैं, वे पाकिस्तान के इतिहास में अपनी खास जगह बनाएंगी।

पाकिस्तान के इतिहास में सम्भवतः सैनिक शासकों पर आजतक का यह सबसे भीषण हमला है। नवाज शरीफ लम्बे अर्से से खामोश थे। पर अब वे बगावत की मुद्रा में हैं। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने यह तीसरा भाषण दिया है। उनका हमला इमरान खान पर उतना नहीं था, जितना सेना पर था। उन्होंने सेनाध्यक्ष कमर जावेद बाजवा और आईएसआई के डीजी ले.जन. फैज़ हमीद का नाम लेकर कहा कि आपने मेरी सरकार गिराई और मेरे खिलाफ साजिश की। उन्होंने अदालत पर भी हमला बोला। उनका कहना है कि मैं अब वीडियो भी दिखाऊँगा। शरीफ ने क्या कहा इसे समझने के लिए बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट के इस अंश को उसी भाषा में पढ़ें:

ख़िताब में नवाज़ शरीफ़ का कहना था कि 'कुछ लोगों की ख़ाहिश है कि मेरी आवाज़ अवाम तक ना पहुंचे और उनकी आवाज़ मुझ तक ना पहुंचे, लेकिन वो अपने मज़मूम मक़ासिद में कामयाब नहीं होंगे।

नवाज़ शरीफ़ ने अपनी तक़रीर में कहा कि तमाम सियासतदानों को 'ग़द्दार कहलाया जाता है और शुरू से फ़ौजी आमिर सियासतदान जैसे फ़ातिमा जिनाह, बाचा ख़ान, शेख़ मुजीब अलरहमान और दीगर रहनुमाओं को ग़द्दार क़रार देते रहे हैं।

नवाज़ शरीफ़ ने सियासतदानों पर ग़द्दारी के इल्ज़ामात लगाए जाने पर कहा कि 'पाकिस्तान में मुहिब-ए-वतन कहिलाय जानेवाले वो हैं जिन्होंने आईन की ख़िलाफ़वरज़ी की और मुल्क तोड़ा।

Thursday, October 15, 2020

क्या हम पाकिस्तानी हरकतों को भूल जाएं?

 

फ्राइडे टाइम्स से साभार

इमरान खान के सुरक्षा सलाहकार मोईद युसुफ के भारतीय पत्रकार करन थापर से साक्षात्कार को न तो भारतीय मीडिया ने महत्व दिया और न भारत सरकार ने। इस खबर को सबसे ज्यादा महत्व पाकिस्तानी मीडिया में मिला। इसके अलावा भारत के कश्मीरी अखबारों में इस इंटरव्यू का उल्लेख हुआ है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अल जजीरा के अलावा किसी उल्लेखनीय प्लेटफॉर्म पर यह खबर देखने को नहीं मिली।

सोशल मीडिया पर जरूर इसका उल्लेख हुआ है, पर ज्यादातर पाकिस्तानी हैंडलों के मार्फत। रेडिट पाकिस्तान में मोईद युसुफ की तारीफ से जुड़ी कुछ टिप्पणियाँ देखने को मिली हैं। पाकिस्तानी अखबारों में सम्पादकीय टिप्पणियाँ भी जरूर होंगी। मैंने डॉन की टिप्पणी को देखा है, जिसमें वही घिसी-पिटी बातें हैं, जो अक्सर पाकिस्तान से सुनाई पड़ती हैं। इनमें सबसे ज्यादा महत्व इस बात को दिया गया है कि भारत ने पाकिस्तान से बातचीत की पेशकश की है। गुरुवार को भारतीय विदेश विभाग के प्रवक्ता ने इस बात को स्पष्ट कर दिया कि भारत की ओर से ऐसा कोई संदेश नहीं भेजा गया है। 

मान लिया कि ऐसी कोई पेशकश है भी तो यह कम से कम औपचारिक रूप से नहीं है। यदि यह बैकरूम गतिविधि है, तो मोईद साहब ने इसकी खबर देने की जरूरत क्यों समझी? यह किसी संभावना को खत्म करने की कोशिश तो नहीं है? इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि नवाज शरीफ ने बातचीत के पेशकश की थी, जिसमें पाकिस्तानी सेना ने न केवल अड़ंगा लगाया, बल्कि नवाज शरीफ के खिलाफ इमरान खान को खड़ा किया। इस वक्त उनका कठपुतली नरेश राजनीतिक संकट में है और लगता यही है कि इस खबर के बहाने पाकिस्तानी जनता का ध्यान कहीं और ले जाने की कोशिश है। फिर भी मोईद साहब की बातों पर गौर करने की जरूरत भी है।

अबतक क्या हुआ?

द वायर ने इस इंटरव्यू का वीडियो जारी करने के पहले करन थापर का लिखा एक कर्टेन रेज़र जारी किया था, जिसमें पहला वाक्य था कि पाकिस्तानी एनएसए ने यह रहस्योद्घाटन किया है कि भारत ने पाकिस्तान से बातचीत की पेशकश की है। साथ ही यह भी कहा कि हम तो बात तभी करेंगे, जब कश्मीरियों को तीसरे पक्ष के रूप में शामिल किया जाएगा। यहाँ यह याद दिलाना बेहतर होगा कि 2014 में जब नवाज शरीफ नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में आए थे, तब उन्होंने कश्मीरी प्रतिनिधियों से बात नहीं की थी। उसके बाद सुषमा स्वराज और सरताज अजीज की प्रस्तावित बात इसीलिए नहीं हो पाई थी, क्योंकि सरताज अजीज कश्मीरियों से बात करने के बाद ही उस वार्ता में शामिल होना चाहते थे।

Wednesday, October 14, 2020

करन थापर के मार्फत मोईद युसुफ पाकिस्तानी मंशा और खबरें ‘प्लांट’ कर गए

 


मंगलवार 13 अक्तूबर को भारतीय मीडिया हाउस द वायर ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विशेष सलाहकार मोईद युसुफ के साथ भारतीय पत्रकार करन थापर का एक इंटरव्यू प्रसारित किया, जिसे लेकर पाकिस्तान में जितनी चर्चा है, उतनी भारत में नहीं है। इंटरव्यू के प्रसारण के कुछ समय बाद ही पाकिस्तानी ट्विटर हैंडलों पर इसकी सूचनाएं प्रसारित होने लगीं। सामान्यतः खबरों की पाकिस्तानी वैबसाइट्स देर में अपडेट होती हैं, पर डॉन और ट्रिब्यून जैसी वैबसाइट में यह खबर फौरन लगी और लीड के रूप में लगी। अगली सुबह यानी आज डॉन के मुद्रित संस्करण में यह खबर लीड है। पाकिस्तानी मीडिया ने इस बात को उछाला कि भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ बातचीत की पेशकश की है, पर पाकिस्तान सरकार ने इस प्रस्ताव को यह कहकर नामंजूर कर दिया है कि जब तक कश्मीरियों को इस बातचीत में शामिल नहीं किया जाता, हम बात नहीं करेंगे।

Monday, July 20, 2020

पायलटों पर लगी वैश्विक पाबंदियों से गिरी पाकिस्तान की साख

गरीबी, अशिक्षा और कोरोना जैसी महामारी के दुष्प्रभाव से लड़ते जूझते दक्षिण एशिया में जब भारत और पाकिस्तान के रिश्तों पर नजर डालते हैं, तो बेहद निराशाजनक तस्वीर उभर कर आती है। हाल में खबरें हैं कि पाकिस्तान ने कश्मीर मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए अपने प्रयास बढ़ा दिए हैं। दूसरी तरफ वह एफएटीएफ की काली सूची में जाने से वह इसलिए बच गया, क्योंकि कोरोना के कारण दुनिया के पास इन बातों के लिए वक्त नहीं है। भारत के साथ रिश्तों को सुधारने की बात करने का मतलब पाकिस्तान में पाप माना जाता है, जबकि जरूरत इस बात की है कि दोनों देश मिलकर आर्थिक-सामाजिक बदहाली से लड़ाई लड़ें।

कुछ समय पहले इमरान खान ने ट्वीट किया कि हमने कोरोना महामारी के दौर में नौ हफ्तों में देश के एक करोड़ परिवारों को 120 अरब रुपये की सहायता पहुँचाई है। भारत चाहे, तो हम उसे मदद पहुँचाने का तरीका बता सकते हैं और पैसे से मदद भी कर सकते हैं। उनके इस ट्वीट का पाकिस्तान में ही काफी मजाक बना। दूसरी तरफ खबरें हैं कि पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था नीचे गिरने के नए प्रतिमान स्थापित कर रही है। वहाँ से सत्ता परिवर्तन की अफवाहें भी आती रहती हैं। खासतौर से इमरान खान के नेतृत्व को लेकर सवाल हैं। इसी संदर्भ में ‘माइनस वन’ फॉर्मूला भी चर्चित हुआ है। इसका मतलब है इमरान खान को हटाकर सरकार के वर्तमान स्वरूप को बनाए रखना।

गिरती साख

हाल में देश का बजट पेश हुआ। उसके पहले पेश की गई आर्थिक समीक्षा में चेतावनी दी गई कि नैया डूब रही है। विदेशी कर्जा जीडीपी का 88 फीसदी हो गया है। करीब 60 फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जाने का अंदेशा है। अर्थव्यवस्था लगातार विदेशी कर्ज के सहारे है। कब तक कर्ज मिलेगा? देश की साख वैश्विक मंच पर लगातार गिर रही है। ऐसे में एक खराब खबर नागरिक उड्डयन के क्षेत्र से मिली है। पाकिस्तानी पायलटों के विमान संचालन पर तकरीबन पूरी दुनिया में रोक लग गई है।

Thursday, June 25, 2020

इमरान खान की नजर में शहीद हैं ओसामा बिन लादेन


आतंकी हमलों को अंजाम देने वाले अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने 'शहीद' करार दिया है। उन्होंने गुरुवार 25 जून को यह बात तब कही, जब एक दिन पहले ही अमेरिका सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ कदम उठाने में कोताही की है। इमरान खान ने लादेन को शहीद साबित करने वाला बयान देश की संसद में दिया है। खान ने यह भी कहा कि पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ जंग में अमेरिका का साथ नहीं देना चाहिए था। उन्होंने कहा कि अमेरिकी फ़ोर्सेज़ ने पाकिस्तान में घुसकर लादेन को 'शहीद' कर दिया और पाकिस्तान को बताया भी नहीं। इसके बाद पूरी दुनिया पाकिस्तान की ही बेइज्जती करने लगी। इमरान के इस बयान की उनके ही देश में निंदा हो रही है।

खान ने कहा कि पाकिस्तान ने अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ जंग में अपने 70 हजार लोगों को खो दिया। जो पाकिस्तान देश से बाहर थे, इस घटना की वजह से उन्हें जिल्लत का सामना करना पड़ा। 2010 के बाद पाकिस्तान में ड्रोन अटैक हुए और सरकार ने सिर्फ निंदा की। उन्होंने कहा कि जब अमेरिका के एडमिरल मलन से पूछा गया कि पाकिस्तान पर ड्रोन हमले क्यों किए जा रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि सरकार की इजाजत से यह कार्रवाई की जा रही है।

Monday, May 18, 2020

कमजोर विकेट पर खड़े इमरान खान


जिस वक्त हम कोरोना वायरस के वैश्विक हमले को लेकर परेशान हैं, दुनिया में कई तरह की गतिविधियाँ और चल रही हैं, जिनका असर आने वाले वक्त में दिखाई पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, डॉलर को पदच्युत करने की चीनी कोशिशों और दूसरी तरफ चीन पर बढ़ते अमेरिकी हमलों वगैरह के निहितार्थ हमें कुछ दिन बाद सुनाई और दिखाई पड़ेंगे। उधर अफगानिस्तान में अंतिम रूप से शांति समझौते की कोशिशें तेज हो गई हैं। अमेरिका के विशेष दूत ज़लमय खलीलज़ाद दोहा से दिल्ली होते हुए इस्लामाबाद का एक और दौरा करके गए हैं। अमेरिका ने पहली बार औपचारिक रूप से कहा है कि भारत को अब तालिबान से सीधी बात करनी चाहिए और अपनी चिंताओं से उन्हें अवगत कराना चाहिए।

मई के दूसरे हफ्ते में एक और बात हुई। भारतीय मौसम विभाग ने अपने मौसम बुलेटिन में पहली बार पाक अधिकृत कश्मीर को शामिल किया। मौसम विभाग ने मौसम सम्बद्ध अपनी सूचनाओं में गिलगित, बल्तिस्तान और मुजफ्फराबाद की सूचनाएं भी शामिल कर लीं। इसके बाद जवाब में रविवार 10 मई से पाकिस्तान के सरकारी चैनलों ने जम्मू-कश्मीर के मौसम का हाल सुनाना शुरू कर दिया है। भारत के मौसम दफ्तर के इस कदम के पहले पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने गिलगित और बल्तिस्तान में चुनाव कराने की घोषणा की थी, जिसपर भारत सरकार ने कड़ा विरोध जाहिर किया था।

कश्मीर में मुठभेड़ें
कश्मीर में आतंकवादियों के साथ सुरक्षाबलों की मुठभेड़ें बढ़ गई हैं, क्योंकि यह समय घुसपैठ का होता है। उधर हिज्बुल मुज़ाहिदीन के कमांडर रियाज़ नायकू की मुठभेड़ के बाद हुई मौत से भी इस इलाके में खलबली है। इसबार सुरक्षाबलों ने नायकू का शव उनके परिवार को नहीं सौंपा। इसके पीछे कोरोना का कारण बताया गया, पर इसका साफ संदेश है कि सरकार अंतिम संस्कार के भारी भीड़ नहीं चाहती। बहरहाल खबरें हैं कि कश्मीर को लेकर पाकिस्तान अपनी रणनीति में बदलाव कर रहा है। हाल में पाकिस्तानी सेना की ग्रीन बुक से लीक होकर जो जानकारियाँ बाहर आईं हैं, उनके मुताबिक पाकिस्तानी सेना अब छाया युद्ध में सूचना तकनीक और सोशल मीडिया का इस्तेमाल और ज्यादा करेगी।

Monday, December 9, 2019

इमरान खान की कुर्सी डोल रही है


पाकिस्तान में जनरल कमर जावेद बाजवा का कार्यकाल सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने के लिए बढ़ा तो दिया है, पर इस प्रकरण ने इमरान खान की सरकार को कमजोर कर दिया है। सरकार को अब संसद के मार्फत देश के सेनाध्यक्ष के कार्यकाल और उनकी सेवा-शर्तों के लिए नियम बनाने होंगे। क्या सरकार ऐसे नियम बनाने में सफल होगी? और क्या यह कार्यकाल अंततः तीन साल के लिए बढ़ेगा? और क्या तीन साल की यह अवधि ही इमरान खान सरकार की जीवन-रेखा बनेगी? इमरान खान को सेना ने ही खड़ा किया है। पर अब सेना विवाद का विषय बन गई है, जिसके पीछे इमरान सरकार की अकुशलता है। तो क्या वह अब भी इस सरकार को बनाए रखना चाहेगी? सेना के भीतर इमरान खान को लेकर दो तरह की राय तो नहीं बन रही है?
सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी सुनवाई के दौर यह सवाल किया था कि आखिर तीन साल के पीछे रहस्य क्या है?  देश की सुरक्षा के सामने वे कौन से ऐसे मसले हैं जिन्हें सुलझाने के लिए तीन साल जरूरी हैं? पहले उन परिस्थितियों पर नजर डालें, जिनमें इमरान खान की सरकार ने जनरल बाजवा का कार्यकाल तीन साल बढ़ाने का फैसला किया था। यह फैसला भारत में कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए को निष्प्रभावी बनाए जाने के दो हफ्ते बाद किया गया था। संयोग से उन्हीं दिनों मौलाना फज़लुर रहमान के आज़ादी मार्च की खबरें हवा में थीं।

Tuesday, November 5, 2019

एफएटीएफ क्या रोक पाएगा पाकिस्तानी उन्माद?


फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की सूची में पाकिस्तान फिलहाल फरवरी तक ग्रे लिस्ट में बना रहेगा। पेरिस में हुई बैठक में यह फैसला हुआ है। इस फैसले में पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी भी दी गई है। कहा गया है कि यदि फरवरी 2020 तक पाकिस्तान सभी 27 कसौटियों पर खरा नहीं उतरा तो उसे काली सूची में डाल दिया जाएगा। यह चेतावनी आमराय से दी गई है। पाकिस्तान का नाम काली सूची में रहे या भूरी में, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। ज्यादा महत्वपूर्ण है जेहादी संगठनों के प्रति उसका रवैया। क्या वह बदलेगा?
पिछले महीने संरा महासभा में इमरान खान ने कश्मीर में खून की नदियाँ बहाने और नाभिकीय युद्ध छेड़ने की जो धमकी दी है, उससे उनकी विश्व-दृष्टि स्पष्ट हो जाती है। ज्यादा बड़ा प्रश्न यह है कि अब क्या होगा? पाकिस्तान की इस उन्मादी और जुनूनी मनोवृत्ति पर नकेल कैसे डाली जाएगी? एफएटीएफ ने पाकिस्तान को आतंकी वित्तपोषण और धन शोधन जैसे मुद्दों से निपटने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। क्या वह इनका अनुपालन करेगा?

Monday, October 14, 2019

पाकिस्तान में घहराती घटाएं


Image result for business community meet army chiefसंयुक्त राष्ट्र में इमरान खान के भावुक प्रदर्शन के बाद पाकिस्तान में सवाल उठ रहा है कि अब क्या? इस हफ्ते जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने नियंत्रण रेखा पर मार्च किया। शहरों, स्कूलों और सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं में कश्मीर को लेकर कार्यक्रम हुए। पर सवाल है कि इससे क्या होगा? पाकिस्तानी शासकों का कहना है कि हम इस मामले के अंतरराष्ट्रीयकरण में कामयाब हुए हैं। दूसरी तरफ एक और सवाल उठ रहा है कि क्या देश में एक और सत्ता परिवर्तन होगा? सवाल उठाने वालों के पास कई तरह के कयास हैं। जमीयत उलेमा—इस्लाम (फज़ल) के प्रमुख फज़लुर रहमान ने 31 अक्तूबर को ‘आज़ादी मार्च’ निकालने का ऐलान कर दिया है। इस मार्च का केवल एक उद्देश्य है सरकार को गिराना। क्या विरोधी दल एक साथ आएंगे? उधर तालिबान प्रतिनिधियों से इस्लामाबाद में अमेरिकी दूत जलमय खलीलज़ाद की हुई मुलाकात के बाद लगता है कि डिप्लोमेसी के कुछ पेच और सामने आने वाले हैं।

पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में बदलाव समर्थकों का अनुमान है कि इमरान के कुछ मंत्रियों पर गाज गिरेगी। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी की छुट्टी कर दी गई है। उन्हें हटाए जाने को लेकर भी चिमगोइयाँ हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह सामान्य बदलाव  है, पर इस फैसले के समय और तरीके को लेकर कई तरह के अनुमान हैं। कयास तो यह भी है कि इमरान साहब की छुट्टी भी हो सकती है। कौन करेगा छुट्टी? इसके दो तरीके हैं। देश का विपक्ष एकजुट होने की कोशिश भी कर रहा है। दूसरा रास्ता है कि देश की सेना उनकी छुट्टी कर दे।
भला सेना छुट्टी क्यों करेगी?  इमरान तो सेना के ही सिपाही साबित हुए हैं। सेना ने ही उन्हें स्थापित किया है। बाकायदा चुनाव जिताने में मदद की है। सबसे बड़ा सच यह है कि देश के सामने खड़ा आर्थिक संकट बहुत भयावह शक्ल लेने वाला है। अब लगता है कि सेना ने अर्थव्यवस्था को ठीक करने का जिम्मा भी खुद पर ओढ़ लिया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने जानकारी दी है कि हाल में सेनाध्यक्ष कमर जावेद बाजवा ने देश के प्रमुख कारोबारियों के साथ निजी तौर पर कई बैठकें की हैं। गत 2-3 अक्तूबर की रात हुई बैठक के बारे में तो सेना ने आधिकारिक रूप से विज्ञप्ति भी जारी की है।
व्यापारियों के साथ बैठकें
बिजनेस मीडिया हाउस ब्लूमबर्ग के अनुसार देश की व्यापारिक राजधानी कराची और सेना के मुख्यालय रावलपिंडी में कम से कम तीन बैठकें हो चुकी हैं। इन बैठकों की खबरें आने के पहले जुलाई में जब इमरान खान अमेरिका की यात्रा पर गए थे, तब उनके साथ सेनाध्यक्ष बाजवा और आईएसआई के चीफ फैज़ हमीद भी गए थे। उस वक्त माना गया कि शायद वे इसलिए गए होंगे, क्योंकि अफगानिस्तान में शांति समझौते के लिए तालिबान के साथ बातचीत चल रही थी। पाकिस्तानी सेना की तालिबान के साथ नजदीकियों से सब वाकिफ हैं।

Friday, September 27, 2019

भारत और पाकिस्तान का फर्क आज देखेगी दुनिया


संयुक्त राष्ट्र महासभा में आज भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के भाषण होने वाले है। दोनों देशों की जनता और मीडिया की निगाहें इस परिघटना पर हैं। क्या कहने वाले हैं, दोनों नेता?  पिछले कुछ वर्षों में इस भाषण का महत्व कम होता गया है। यह भाषण संबद्ध राष्ट्रों के वैश्विक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। इससे ज्यादा इसका व्यावहारिक महत्व नहीं होता।
दोनों देशों के नेताओं के पिछले कुछ वर्षों के भाषणों का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे, तो पाएंगे कि पाकिस्तान का सारा जोर कश्मीर मसले के अंतरराष्ट्रीयकरण और उसकी नाटकीयता पर होता है। शायद उनके पास कोई विश्व दृष्टि है ही नहीं। इस साल भी वही होगा। देखना सिर्फ यह है कि नाटक किस किस्म का होगा। इसकी पहली झलक गुरुवार को मिल चुकी है।

Thursday, September 12, 2019

कितने तमाचे खाएगा पाकिस्तान?


संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश के बयान से पाकिस्तान के मुँह पर जोर का तमाचा लहा है। अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाए जाने के बाद से भारतीय राजनय की दिलचस्पी इस मामले पर ठंडा पानी डालने और जम्मू कश्मीर में हालात सामान्य बनाने में है, वहीं पाकिस्तान की कोशिश है कि इसपर वितंडा खड़ा किया जाए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे उठाया जाए। उसका प्रयास है कि कश्मीर की घाटी में हालात सामान्य न होने पाएं। इसी कोशिश में उसने एक तरफ अपने जेहादी संगठनों को उकसाया है, वहीं अपने राजनयिकों को दुनिया की राजधानियों में भेजा है।
पाकिस्तान ने जिनीवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक में इस मामले को उठाकर जो कोशिश की थी वह बेकार साबित हुई है। एक दिन बाद ही संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश के बयान से पाकिस्तान को निराश होना पड़ा है। गुटेरेश का कहना है कि जम्मू-कश्मीर का मसला भारत-पाकिस्तान आपस में बातचीत कर सुलझाएं। उन्होंने इस मसले पर मध्यस्थता करने से इनकार कर दिया है। अब इस महीने की 27 तारीख को संयुक्त राष्ट्र महासभा में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के भाषण होंगे। उसके बाद पाकिस्तान को हंगामा खड़ा करने का कोई बड़ा मौका नहीं मिलेगा। वह इसके बाद क्या करेगा?

Monday, August 26, 2019

अंतरराष्ट्रीय फोरमों पर विफल पाकिस्तान


पिछले 72 साल में पाकिस्तान की कोशिश या तो कश्मीर को फौजी ताकत से हासिल करने की रही है या फिर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की रही है। पिछले दो या तीन सप्ताह में स्थितियाँ बड़ी तेजी से बदली हैं। कहना मुश्किल है कि इस इलाके में शांति स्थापित होगी या हालात बिगड़ेंगे। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि भारत-पाकिस्तान और अफगानिस्तान की आंतरिक और बाहरी राजनीति किस दिशा में जाती है। पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तानी डीप स्टेट का रुख क्या रहता है।
विभाजन के दो महीने बाद अक्तूबर 1947 में फिर 1965, फिर 1971 और फिर 1999 में कम से कम चार ऐसे मौके आए, जिनमें पाकिस्तान ने बड़े स्तर पर फौजी कार्रवाई की। बीच का समय छद्म युद्ध और कश्मीर से जुड़ी डिप्लोमेसी में बीता है। हालांकि 1948 में संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को लेकर भारत गया था, पर शीतयुद्ध के उस दौर में पाकिस्तान को पश्चिमी देशों का सहारा मिला। फिर भी समाधान नहीं हुआ।
चीनी ढाल का सहारा
इस वक्त पाकिस्तान एक तरफ चीन और दूसरी तरफ अमेरिका के सहारे अपने मंसूबे पूरे करना चाहता है। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तानी डिप्लोमेसी को अमेरिका से झिड़कियाँ खाने को मिली हैं। इस वजह से उसने चीन का दामन थामा है। उसका सबसे बड़ा दोस्त या संरक्षक अब चीन है। अनुच्छेद 370 के सिलसिले में भारत सरकार के फैसले के बाद से पाकिस्तान ने राजनयिक गतिविधियों को तेजी से बढ़ाया और फिर से कश्मीर के अंतरराष्ट्रीयकरण पर पूरी जान लगा दी। फिलहाल उसे सफलता नहीं मिली है, पर कहानी खत्म भी नहीं हुई है।

Monday, August 12, 2019

पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस 15 से 14 अगस्त क्यों हुआ?



भारत और पाकिस्तान अपने स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। दोनों के स्वतंत्रता दिवस अलग-अलग तारीखों को मनाए जाते हैं। सवाल है कि भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ, तो क्या पाकिस्तान उसके एक दिन पहले आजाद हो गया था? इसकी एक वजह यह बताई जाती है कि माउंटबेटन ने दिल्ली रवाना होने के पहले 14 अगस्त को ही मोहम्मद अली जिन्ना को शपथ दिला दी थी। दिल्ली का कार्यक्रम मध्यरात्रि से शुरू हुआ था।
शायद इस वजह से 14 अगस्त की तारीख को चुना गया, पर व्यावहारिक रूप से 14 अगस्त को पाकिस्तान बना ही नहीं था। दोनों ही देशों में स्वतंत्रता दिवस के पहले समारोह 15 अगस्त, 1947 को मनाए गए थे। सबसे बड़ी बात यह है कि स्वतंत्रता दिवस पर मोहम्मद अली जिन्ना ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा, स्वतंत्र और सम्प्रभुता सम्पन्न पाकिस्तान का जन्मदिन 15 अगस्त है।
14 अगस्त को पाकिस्तान जन्मा ही नहीं था, तो वह 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाता है? 14 अगस्त, 1947 का दिन तो भारत पर ब्रिटिश शासन का आखिरी दिन था। वह दिन पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस कैसे हो सकता है? सच यह है कि पाकिस्तान ने अपना पहला स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त, 1947 को मनाया था और पहले कुछ साल लगातार 15 अगस्त को ही पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया। पाकिस्तानी स्वतंत्रता दिवस की पहली वर्षगाँठ के मौके पर जुलाई 1948 में जारी डाक टिकटों में भी 15 अगस्त को स्वतंत्रता पाकिस्तानी दिवस बताया गया था। पहले चार-पाँच साल तक 15 अगस्त को ही पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता था।
अलग दिखाने की चाहत
अपने को भारत से अलग दिखाने की प्रवृत्ति के कारण पाकिस्तानी शासकों ने अपने स्वतंत्रता दिवस की तारीख बदली, जो इतिहास सम्मत नहीं है। पाकिस्तान के एक तबके की यह प्रवृत्ति सैकड़ों साल पीछे के इतिहास पर भी जाती है और पाकिस्तान के इतिहास को केवल इस्लामी इतिहास के रूप में ही पढ़ा जाता है। पाकिस्तान के अनेक लेखक और विचारक इस बात से सहमत नहीं हैं, पर एक कट्टरपंथी तबका भारत से अपने अलग दिखाने की कोशिश करता है। स्वतंत्रता दिवस को अलग साबित करना भी इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है।
11 अगस्त, 2016 को पाक ट्रिब्यून में प्रकाशित अपने लेख में सेवानिवृत्त कर्नल रियाज़ जाफ़री ने अपने लेख में लिखा है कि कट्टरपंथी पाकिस्तानियों को स्वतंत्रता के पहले और बाद की हर बात में भारत नजर आता है। यहाँ तक कि लोकप्रिय गायिका नूरजहाँ के वे गीत, जो उन्होंने विभाजन के पहले गए थे, उन्हें रेडियो पाकिस्तान से प्रसारित नहीं किया जाता था। उनके अनुसार आजाद तो भारत हुआ था, पाकिस्तान नहीं। पाकिस्तान की तो रचना हुई थी। उसका जन्म हुआ था।    

Friday, April 19, 2019

पाकिस्तान क्यों है इस चुनाव का बड़ा मुद्दा?


भारतीय चुनावों में पाकिस्तान का मुद्दा कभी इतना महत्वपूर्ण बनकर नहीं बना,  जितना इसबार नजर आ रहा है. इसकी एक वजह 14 फरवरी के पुलवामा हमले को माना जा रहा है. इसके पहले 1999 के करगिल कांड और 2008 के मुम्बई हमले के बाद भी चुनाव हुए थे, पर तब इतनी शिद्दत से पाकिस्तान चुनाव का मुद्दा नहीं बना था, जितना इस बार है. 1999 के लोकसभा चुनाव करगिल युद्ध खत्म होने के दो महीने के भीतर हो गए थे, इसबार चुनाव के दो दौर पूरे हो चुके हैं फिर भी पाकिस्तान और आतंकवाद अब भी बड़ा मसला बना हुआ है. 
यह भी सच है कि नरेन्द्र मोदी और बीजेपी को पाकिस्तानी फैक्टर से लाभ मिल रहा है, पर सवाल है कि यह इतना महत्वपूर्ण बना ही क्यों? कुछ लोगों को लगता है कि पुलवामा कांड जानबूझकर कराया गया है. यह अनुमान जरूरत से ज्यादा है. यों तो 26 नवम्बर 2008 के मुम्बई हमले के पीछे भी भारतीय साजिश का एंगल लोगों ने खोज लिया था, पर उसे 2009 के चुनाव से नहीं जोड़ा था. इस बार के चुनाव में पाकिस्तान कई ऐतिहासिक कारणों से महत्वपूर्ण बना है. सबसे महत्वपूर्ण यह कि इस बार पाकिस्तान खुद एक कारण बनना चाहता है. 
हाल में पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा, हमारे पास विश्वसनीय जानकारी है कि भारत हमारे ऊपर 16 से 20 अप्रैल के बीच फिर हमला करेगा. 16 अप्रैल की तारीख निकल गई, कुछ नहीं हुआ. भारत में अंदेशा था कि शायद पुलवामा जैसा कुछ और न हो जाए. दूसरी तरफ इमरान खान का बयान था कि भारत में नरेंद्र मोदी दूसरा कार्यकाल मिला तो यह पाकिस्तान के लिए बेहतर होगा और कश्मीर के हल की संभावनाएं बेहतर होंगी. पाकिस्तानी नेताओं मुँह से पहले कभी इस किस्म के बयान सुनने को नहीं मिले.

Sunday, February 17, 2019

जैश को भुगतना होगा




पुलवामा कांड पर देश में दो तरह की प्रतिक्रियाएं हैं। पहली है, निंदा नहीं, एक भी आतंकी जिंदा नहीं चाहिए...याचना नहीं, अब रण होगा...आतंकी ठिकानों पर हमला करो वगैरह। दूसरी है, धैर्य रखें, बातचीत से ही हल निकलेगा। दोनों बातों के निहितार्थ समझने चाहिए। धैर्य रखने का सुझाव उचित है, पर लोगों का गुस्सा भी गलत नहीं है। जैशे मोहम्मद ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है, जिसमें उसने बिलकुल भी देर नहीं लगाई है। उसके हौसले बुलंद हैं। जाहिर है कि उसे पाकिस्तान में खुला संरक्षण मिल रहा है। नाराजगी के लिए क्या इतना काफी नहीं है? अब आप किससे बात करने का सुझाव दे रहे हैं? जैशे-मोहम्मद से?

पुलवामा कांड में हताहतों की संख्या बहुत बड़ी है, इसलिए इसकी आवाज बहुत दूर तक सुनाई पड़ रही है। जाहिर है कि हम इसका निर्णायक समाधान चाहते हैं। भारत सरकार ने बड़े कदम उठाने का वादा किया है। विचार इस बात पर होना चाहिए कि ये कदम सैनिक कार्रवाई के रूप में होंगे या राजनयिक और राजनीतिक गतिविधियों के रूप में। सारा मामला उतना सरल नहीं है, जितना समझाया जा रहा है। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के पुनरोदय से भी इसका रिश्ता है।