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Friday, August 16, 2013

प्रधानमंत्री बनाम मोदी पर मीडिया

प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश के जवाब में नरेन्द्र मोदी के भाषण के बारे में अखबारों की कवरेज में खासी विविधता है। स्वतंत्रता दिवस का अवकाश होने के कारण देश के कई इलाकों में अखबार नहीं निकले, इसलिए उस स्तर पर कवरेज नहीं हुई जितनी सामान्य दिनों में होती है। दो-तीन बातें मुझे समझ में आईं जिनका विवरण मैं देना चाहता हूँ।

1. इस विषय पर सम्पादकीय टिप्पणी केवल अंग्रेजी के कुछ अखबारों में देखने को मिली। हिन्दी के अखबार ऐसे विषयों पर सम्पादकीय लिखने से बचते हैं, जिनमें राजनीतिक जोखिम हो।

2. हिन्दी के अखबारों ने पेज एक पर खबर देने में भी सावधानी बरती है। अलबत्ता नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान ने लगभग एक जैसे शीर्षक के साथ खबर दी है। नवभारत टाइम्स की लीड है 'अटैक कर घिर गए मोदी।' हिन्दुस्तान में लीड के साथ जुड़ी खबर है 'पीएम पर टिप्पणी करके चौतरफा घिर गए मोदी।' दैनिक जागरण की लीड है 'जश्न के मौके पर सियासी जंग।'इन सभी अखबारों ने प्रधानमंत्री के संबोधन पर औपचारिक सम्पादकीय हैं।

3. बिजनेस दैनिक मिंट की लीड का शीर्षक है, 'Study in contrast/ I-day speeches set stage for 2014' मुम्बई के डीएनए की नीति सम्पादकीय पेज छापने की नहीं है। उसने दोनों के वक्तव्यों को आमने-सामने रखकर एक ग्रैफिक दिया है।



Tuesday, August 6, 2013

हिन्दी अखबार कैसा हो और क्यों हो?

नवभारत टाइम्स के लखनऊ संस्करण में मेरी दिलचस्पी इस कारण भी है, क्योंकि यह देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह का हिन्दी अखबार है। एक समय तक दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया से भी ज्यादा प्रसारित होता था। नब्बे के दशक में इसकी कीमत घटाकर एक रुपया कर देने के बाद दिल्ली में अंग्रेजी अखबार पढ़ने वाले पाठक बड़ी संख्या में इसकी ओर आकृष्ट हुए। उसके बाद इसके मनोरंजन परिशिष्टों ने युवा पीढ़ी का ध्यान खींचा। मुझे याद है सन 1998 में मेरी एकबार अमर उजाला के तत्कालीन प्रमुख अतुल माहेश्वरी से काफी लम्बी मुलाकात हुई। वे समीर जैन की व्यावसायिक समझ की बेहद प्रशंसा कर रहे थे।

Monday, August 5, 2013

NBT@ लखनऊ


सन 1983 में लखनऊ से नवभारत टाइम्स का औपचारिक रूप से पहला अंक अक्टूबर में निकल गया था, टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ। पर वास्तव में पहला अंक नवम्बर में निकला था। उस वक्त तक नवभारत भारत टाइम्स को लेकर टाइम्स ग्रुप में कोई बड़ा उत्साह नहीं था। हिन्दी की व्यावसायिक ताकत तब तक स्थापित नहीं थी। हालांकि सम्भावनाएं उस समय भी नजर आती थीं। बहरहाल इसी ब्रैंड नाम का अखबार फिर से लखनऊ से निकला है तो जिज्ञासा बढ़ी है। अखबार का अपने समाज से रिश्ता और उसका कारोबार दोनों मेरी दिलचस्पी के विषय हैं। मैं चाहता हूँ कि लखनऊ के मेरे मित्र नवभारत टाइम्स और हिन्दी पत्रकारिता पर मेरी जानकारी बढ़ाएं। आभारी रहूँगा।

पिछले साल अक्टूबर में टाइम्स हाउस ने कोलकाता से एई समय नाम से बांग्ला अखबार शुरू किया था। हिन्दी और बांग्ला के वैचारिक परिवेश को परखने में टाइम्स हाउस की व्यावसायिक समझ एकदम ठीक ही होगी। मेरा अनुमान है कि लखनऊ में टाइम्स हाउस ने पत्रकारिता को लेकर उन जुम्लों का इस्तेमाल नहीं किया होगा, जो कोलकाता में किया गया। हिन्दी इलाके के लोगों के मन में अपनी भाषा, संस्कृति, साहित्य और पत्रकारिता के प्रति चेतना दूसरे प्रकार की है। वे भविष्य-मुखी, करियर-मुखी और चमकदार जीवन-पद्धति के कायल हैं। कोलकाता में एई समय से पहले आनन्द बाजार पत्रिका ने एबेला नाम से एक टेब्लॉयड शुरू किया था। इसकी वजह वही थी जो लखनऊ में है। कोलकाता में भी टेब्लॉयड संस्कृति जन्म ले रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया बांग्ला टेब्लॉयड मनोवृत्ति का पूरी तरह दोहन करे उससे पहले आनन्द बाजार में चटख अखबार निकाल दिया।

Monday, October 15, 2012

टाइम्स ऑफ इंडिया का एई समय


 कुछ दिन पहले आनन्द बाज़ार पत्रिका ग्रुप ने कोलकाता से बांग्ला अखबार 'एबेला' यानी इस घड़ी  शुरू किया था। और अब दुर्गापूजा के उत्सव की शुरूआत यानी महालया के साथ टाइम्स ऑफ इंडिया ने 'एई समय' लांच किया है। दोनों में बुनियादी फर्क है। एबेला टेबलॉयड है और 'एई समय' ब्रॉडशीट अखबार है।

बांग्ला और हिन्दी समाज में भाषा का कितना फर्क है वह यहाँ देखा जा सकता है। कोलकाता के लिए आनन्द बाज़ार पत्रिका जीवन का एक हिस्सा है। उसके मुकाबले किसी गैर-बांग्ला समूह द्वारा बांग्ला अखबार निकालने की कोशिश अपने आप में दुस्साहस है। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह ने चेन्नई में हिन्दू के मुकाबले अंग्रेजी अखबार निकाला था, पर कोलकाता में वह बांग्ला अखबार के साथ सामने आए हैं। एक ज़माने में टाइम्स हाउस ने कोलकाता से हिन्दी का नवभारत टाइम्स भी निकाला था, जो चला नहीं।

Tuesday, October 2, 2012

न्यूयॉर्कर में समीर जैन और टाइम्स ऑफ इंडिया



बुनियादी तौर पर अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के जीवन और संस्कृति पर केन्द्रित पत्रिका न्यूयॉर्कर निबंध लेखन, फिक्शन, व्यंग्य लेखन, कविता और खासतौर से कार्टूनों के लिए विशिष्ट है। किसी ज़माने में हिन्दी में भी ऐसी पत्रिकाएं थीं, पर आधुनिकता की दौड़ में हमने सबको खत्म होने दिया। इधर पिछले कुछ वर्षों में भारत केन्द्रित लेख भी प्रकाशित हुए हैं। पत्रिका के ताज़ा अंक (8अक्टूबर,2012) में भारत के समीर जैन, विनीत जैन और टाइम्स ऑफ इंडिया के बारे में इसके प्रसिद्ध मीडिया क्रिटिक केन ऑलेटा का नौ पेज का आलेख छपा है। ऑलेटा 1992 से एनल्स ऑव कम्युनिकेशंस कॉलम लिख रहे हैं। सिटिज़ंस जैन शीर्षक आलेख में उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के विस्तार का विवरण दिया है। आलेख के पहले सफे के सबसे नीचे इसका सार इन शब्दों में दिया गया है, "Their success is a product of an unorthodox philosophy." 

Tuesday, June 26, 2012

जामे जमशेदः 180 साल पुराना अखबार


जामे जमशेद एशिया का दूसरा सबसे पुराना अखबार है जो आज भी प्रकाशित हो रहा है। विजय दत्त श्रीधर लिखित भारतीय पत्रकारिता कोश के अनुसार 1832 में मुम्बई से पारसी समाज के मुख पत्र के रूप में इसका प्रकाशन शुरू हुआ था। इस हिसाब से इसे इस साल 180 साल हो गए। इसके सम्पादक प्रकाशक पेस्तनजी माणिकजी मोतीवाला थे। यह साप्ताहिक था और 1853 में इसे दैनिक कर दिया गया।


मुंबई से सन 1822 में गुजराती भाषा में समाचार पत्र ' बम्बई समाचार ' का प्रकाशन प्रारंभ हुआ और वर्तमान में यह भारत में नियमित प्रकाशित होने वाला सबसे पुराना समाचार पत्र है। यह अखबार आज मुम्बई समाचार के नाम से निकल रहा है। 

Thursday, November 3, 2011

बयानबाज़ी के बजाय मीडिया आत्ममंथन करे

हर आज़ादी की सीमा होती है। पर हर सीमा की भी सीमा होती है। हमारे संविधान ने जब अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया था, तब सीमाओं का उल्लेख नहीं किया गया था। पर 1951 में संविधान के पहले संशोधन में इस स्वतंत्रता की युक्तियुक्त सीमाएं भी तय कर दी गईं। पिछले साठ वर्ष में सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों से इस स्वतंत्रता ने प्रेस की स्वतंत्रता की शक्ल ली। अन्यथा ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ शब्द संविधान में नहीं था और न है। उसकी ज़रूरत भी नहीं। पर अब प्रेस की जगह मीडिया शब्द आ गया है। ‘प्रेस’ शब्द ‘पत्रकारिता’ के लिए रूढ़ हो गया है। टीवी वालों की गाड़ियों पर भी मोटा-मोटा प्रेस लिखा होता है। अखबारों के मैनेजरों की गाड़ियों पर उससे भी ज्यादा मोटा प्रेस छपा रहता है।

इन दिनों हम पत्रकारिता को लेकर संशय में हैं। पिछले 400 वर्ष में पत्रकारिता एक मूल्य के रूप में विकसित हुई है। इस मूल्य(वैल्यू) की कीमत(प्राइस) या बोली लगा दी जाए लगा दी जाए तो क्या होगा? प्रेस काउंसिल के नए अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू की कुछ बातों को लेकर मीडिया जगत में सनसनी है। जस्टिस काटजू ने मीडिया की गैर-ज़िम्मेदारियों की ओर इशारा किया है। वे प्रेस काउंसिल के दांत पैने करना चाहते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मीडिया काउंसिल बनाने का सुझाव दिया है। ताकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इसमें शामिल किया जा सके। वे चाहते हैं कि मीडिया के लाइसेंस की व्यवस्था भी होनी चाहिए। वे सरकारी विज्ञापनों पर भी नियंत्रण चाहते हैं। उनकी किसी बात से असहमति नहीं है। महत्वपूर्ण है मीडिया की साख को बनाए रखना। प्रेस काउंसिल की दोहरी भूमिका है। उसे प्रेस पर होने वाले हमलों से उसे बचाना है और साथ ही उसके आचरण पर भी नज़र रखनी होती है। प्रेस की आज़ादी वास्तव में लोकतांत्रिक-व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, पर जब किसी न्यूज़ चैनल का हैड कहे कि दर्शक जो माँगेगा वह उसे दिखाएंगे, तब उसकी भूमिका पर नज़र कौन रखेगा? मीडिया काउंसिल का विचार पिछले कुछ साल से हवा में है। यह बने या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए अलग काउंसिल बने, इसके बारे में अच्छी तरह विचार की ज़रूरत है।

Saturday, October 29, 2011

फॉर्मूला-1 बनाम श्रीलाल शुक्ल

स्टीव जॉब्स इस दौर के के श्रेष्ठतम उद्यमियों में से एक थे, पर भारत के लोगों से उनका परिचय बहुत ज्यादा नहीं था। एपल के उत्पाद भारत में बहुत प्रचलित नहीं हैं, पर भारतीय मीडिया ने उनके निधन पर जो कवरेज की उससे लगता था कि हम प्रतिभा की कद्र करना चाहते हैं।  पर हिन्दी के किसी अखबार में फॉर्मूला-1 की रेस के उद्घाटन की खबर टॉप पर हो और श्रीलाल शुक्ल के निधन की छोटी सी खबर  छपी हो तो बात समझ में आती है कि दुनिया बदल चुकी है। जिस कॉलम में श्रीलाल शुक्ल की खबरहै उसके टॉप की खबर है नताशा के हुए गंभीर

Tuesday, May 17, 2011

टॉप गोज़ टु बॉटम

अखबार के मास्टहैड का इस्तेमाल अब इतने तरीकों से होने लगा है कि कुछ लोगों के लिए यह दिलचस्पी का विषय नहीं रह गया है। फिर भी 14 मई के टेलीग्राफ के पहले सफे ने ध्यान खींचा है। इसमें मास्टहैड अखबार की छत से उतर कर फर्श पर चला गया है।

अखबार के ब्रैंड बनने पर तमाम बातें हैं। पत्रकारों और सम्पादकों, खबरों और विश्लेषणों से ज्यादा महत्वपूर्ण है ब्रैंड। बाकी उत्पादों की बात करें तो ब्रैंड माने प्रोडक्ट की गुणवत्ता की मोहर। अखबार इस माने में हमेशा ब्रैंड थे। उन्हें पढ़ा ही इसीलिए जाता था कि उनकी पहचान थी। लेफ्ट या राइट। कंज़र्वेटिव या लिबरल। कांग्रेसी या संघी। दृष्टिकोण या पॉइंट ऑफ व्यू, खबरों को पेश करने का सलीका, तरीका वगैरह-वगैरह। एक हिसाब से देखें तो अखबारों ने ही सारी दुनिया को ब्रैंड का महत्व समझाया। दुनिया भर की खबरों को एक पर्चे पर छाप दो तो वह अखबार नहीं बनता। सिर्फ मास्टहैड लगा देने से वह अखबार बन जाता है। और इस तरह वह सिर्फ मालिक की ही नहीं पाठक की धरोहर भी होती है। बहरहाल...

हाल में बड़ी संख्या में अखबारों ने अपने मास्टहैड के साथ खेला है। हिन्दी में नवभारत टाइम्स तो लाल रंग में अंग्रेजी के तीन अक्षरों के आधार पर खुद को यंग इंडिया का अखबार घोषित कर चुका है। ऐसे में टेलीग्राफ ने अपने मास्टहैड के मार्फत नई सरकार का स्वागत किया है। अच्छा-बुरा उसके पाठक जानें, पर बाकी अखबार दफ्तरों में कुलबुलाहट ज़रूर होगी कि इसने तो मार लिया मैदान, अब इससे बेहतर क्या करें गुरू।

क्या कोई बता सकता है कि इसका मतलब कुछ अलग सा करने के अलावा और क्या हो सकता है?

Sunday, April 3, 2011

विश्व-विजय के अखबार

भारत की टीम क्रिकेट के मैदान में कुछ कर डाले तो समूचा मीडिया झूम पड़ता है। मार्केट की मजबूरी है कि इनमें एक से बढ़कर एक कुछ करने की ललक रहती है। अगली सुबह हर दफ्तर में लहक-लहक कर अपनी तारीफ और दूसरों की कमियों पर इशारा करने का माहौल रहता है। बहरहाल अखबारों के पहले सफे से माहौल का पता लगता हो तो कुछ तस्वीरे लगा रहा हूँ। एक कोलाज मीडिया ब्लॉग चुरुमुरी से लिया है।


Saturday, April 2, 2011

ब्लीडिंग ब्लू

31 मार्च के टाइम्स ऑफ इंडिया और दक्षिण के प्रसिद्ध अखबार हिन्दू के सारे शीर्षक नीले रंग में थे। दोनों अखबारों को जर्मन ऑटो कम्पनी फोक्स वैगन ने विशेष विज्ञापन दिया था। फोक्स वैगन इसके पहले पिछले साल 21 सितम्बर को दोनों अखबार फोक्स वैगन के विशेष टॉकिंग एडवर्टाइज़मेंट का प्रकाशन कर चुके थे।  उसमें अखबार के पन्ने पर करीब दस ग्राम का स्पीकर चिपका था। रोशनी पड़ते ही उस स्पीकर से कम्पनी का संदेश बजने लगता था।

फोक्स वैगन इन दिनों भारत के ऑटो बाज़ार में जमने का प्रयास कर रही है। उसके इनोवेटिव विज्ञापनों में कोई दोष नहीं है, पर अखबारों में विज्ञापन किस तरह लिए जाएं, इस पर चर्चा ज़रूर सम्भव है। 31 मार्च के थिंक ब्लू विज्ञापन का एक पहलू यह भी है कि टाइम्स ने उसके लिए अपने मास्टहैड में ब्लू शब्द हौले से शामिल भी किया है। हिन्दू ने मास्टहैड में विज्ञापन का शब्द शामिल नहीं किया।


टाइम्स इसके पहले कम से कम दो बार और मास्टहैड में विज्ञापन सामग्री जोड़ चुका है।


Wednesday, March 16, 2011

भारतीय भाषाओं के मीडिया की ताकत और बढ़ेगी




पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस में खबर थी कि आम बजट के रोज हर चैनल किसी न किसी वजह से नम्बर वन रहा। टैम के निष्कर्षों को सारे चैनल अपने-अपने ढंग से पेश करते हैं। कुछ ऐसा ही प्रिंट मीडिया के सर्वे के साथ होता है। औसत पाठक को एआईआर और टोटल रीडरशिप का फर्क मालूम नहीं होता। अखवार चूंकि सर्वेक्षण के नतीजों का इस्तेमाल अपने प्रचार के लिए करते हैं, इसलिए जो पहलू उनके लिए आरामदेह होता है वे उसे उठाते हैं। मसलन आयु वर्ग या आय वर्ग। किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में या किसी खास शहर में।

पाठक सर्वेक्षणों के बारे में चर्चा करने के पहले यह समझ लिया जाना चाहिए कि ये अनुमान हैं, वास्तविक संख्या नहीं। इनकी निश्चित संख्या से यह नहीं मान लेना चाहिए कि पाठक संख्या यही है। अखबारों के प्रिट ऑर्डर के एबीसी ऑडिट के आधार पर निष्कर्ष अलग तरह के होते हैं। भारत में एनआरएस और फिर आईआरएस के पीछे मूल विचार विज्ञापन उद्योग के सामने मीडिया के प्रसार और प्रभाव की तस्वीर पेश करना है। इस प्रक्रिया को पाठक के सामने रखने का उद्देश्य सिर्फ यह बताना हो सकता है कि कौन सा अखबार लोकप्रिय है। यों भी पाठक अपनी मर्जी का अखबार पढ़ता है। वह यह देखकर अखबार नहीं लेता कि उसे कितने पाठक और पढ़ रहे हैं।

Wednesday, March 2, 2011

इंटरैक्टिव हैडलाइन

अखबारों को पाठकों से जोड़ने की मुहिम में बिछे पड़े मार्केटिंग प्रफेशनलों को कन्नड़ अखबार कन्नड़ प्रभा ने रास्ता दिखाया है। इसबार 1 मार्च को कन्नड़ प्रभा की बजट कवरेज को शीर्षक दिया उनके पाठक रवि साजंगडे ने।

कन्नड़ प्रभा के नए सम्पादक विश्वेश्वर भट्ट के दिमाग में आइडिया आया कि क्यों न अपनी खबरों की दिशा पाठकों की सहमति से तय की जाय। इसकी शुरुआत उन्होंने 24 फरबरी को राज्य के बजट से की। उन्होंने अपने ब्लॉग, ट्विटर, एसएमएस वगैरह के मार्फत पाठकों से राय लेने की सोची। 24 की रात डैडलाइन 9.30 तक उनके पास 126 बैनर हैडलाइन के लिए सुझाव आ गए। इसके बाद उन्होंने रेलवे बजट के लिए सुझाव मांगे। इसके लिए 96 शीर्षक आए। आम बजट के दिन 60 शीर्षक आए।

Tuesday, March 1, 2011

बजट के अखबार

बज़ट का दिन मीडिया को खेलने का मौका देता है और अपनी समझदारी साबित करने का अवसर भी। आज के   अखबारों को देखें तो दोनों प्रवृत्तियाँ देखने को मिलेंगी। बेहतर संचार के लिए ज़रूरी है कि जटिल बातों को समझाने के लिए आसान रूपकों और रूपांकन की मदद ली जाए। कुछ साल पहले इकोनॉमिक टाइम्स ने डिजाइन और रूपकों का सहारा लेना शुरू किया था. उनकी देखा-देखी तमाम अखबार इस दौड़ में कूद पड़े। हालांकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास तमाम साधन हैं, पर वहाँ भी खेल पर जोर ज्यादा है बात को समझाने पर कम। अंग्रेजी के चैनल सेलेब्रिटी टाइप के लोगों और राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों को मंच देते हुए ज्यादा नज़र आते हैं, दर्शक  को यह कम बताते हैं कि बजट का मतलब क्या है। टाइम्स ऑफ इंडिया की परम्परा बजट को बेहतर ढंग से कवर करने की है। 


एक ज़माने में हिन्दी अखबार का लोकप्रिय शीर्षक होता था 'अमीरों को पालकी, गरीबों को झुनझुना'। सामान्य व्यक्ति यही सुनना चाहता है। अंग्रेजी अखबार पढ़ने वालों की समझदारी का स्तर बेहतर है। साथ ही वे व्यवस्था से ज्यादा जुड़े हैं। उनके लिए लिखने वाले बेहतर होम वर्क के साथ काम करते हैं। दोनों मीडिया में विसंगतियाँ हैं। 

Wednesday, February 2, 2011

क्या पाठक विचार पढ़ना नहीं चाहते?


सम्पादकीय पेज खत्म करने के बाद आज के डीएनए में उसके पाठकों की चिट्ठियाँ छपीं हैं। कुछ ने समर्थन किया है और कुछ ने असहमति जताई है। बेशक पाठक पसंद करें तो सब ठीक है, पर क्या अखबार ने सम्पादकीय पेज खत्म करने के पहले पाठकों से पूछा था?

कुछ लोग मानते हैं कि बाज़ार तय करता है कि सही क्या है और गलत क्या है। पर बाज़ार क्या सोचता है इसका पता कैसे लगता है? मुम्बई में बाज़ार का लीडर तो टाइम्स ऑफ इंडिया है। करीब दसेक साल पहले टाइम्स ऑफ इंडिया के लखनऊ संस्करण में सम्पादकीय पेज खत्म कर दिया गया था। सिर्फ पेज खत्म किया था। सम्पादकीय किसी पेज में छपते थे, मुख्य लेख किसी और पेज में पाठकों के पत्र किसी और पेज में। खैर टाइम्स ने बाद में सम्पादकीय पेज अपनी जगह वापस कर दिया। टाइम्स के सम्पादकीय पेज आज भी श्रेष्ठ है।

Tuesday, February 1, 2011

सम्पादकीय पेज विहीन डीएनए


डीएनए ने हिम्मत दिखाई और घोषणा करके एडिट पेज बन्द कर दिया। साथ में यह कहा कि इसे बहुत कम लोग पढ़ते हैं, बोरिंग होता है, अपनी ज़रूरत खो चुका है, सिर्फ जगह भरने का काम हो रहा था।

Saturday, November 27, 2010

क्या हैं टू जी, थ्रीजी और सीएजी

जेपीसी क्या होती है? और पीएसी क्या होती हैदूरसंचार आयोग क्या काम करता  है? और इन दिनों चल रहे दूरसंचार घोटाले का मतलब क्या है? किसने क्या फैसला किया और क्यों किया? सीएजी क्या करता है? उसे रपट लिखने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? उसकी रपट में क्या है?

मैं अपने आपको एक आम हिन्दी पाठक की जगह रखकर देखता हूँ तो ऐसे तमाम सवाल मेरे मन में उठते हैं। उसके बाद सुबह का अखबार उठाता हूँ तो कुछ और सवाल जन्म ले लेते हैं। टीआरएआई, जीओएम, एडीएजी, एफसीएफएस, 2जी, 3जी वगैरह-वगैरह के ढेर के बीच एक बात समझ में आती है कि कोई घोटाला हो गया है। मामला करोड़ों का नहीं लाखों करोड़ का है।

Friday, November 5, 2010

अंधेरे सोच के बीच हैप्पी दिवाली


दिवाली पर चौतरफा खुशहाली-आज सुबह दिल्ली के  दैनिक भास्कर का यह मुख्य शीर्षक है। जयपुर का शीर्षक है घर-घर पधारिए माँ लक्ष्मी। दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका के बीच इन जिनों थ्री-डी अखबार देने की प्रतियोगिता है। पहले राजस्थान पत्रिका ने दिया, फिर दैनिक भास्कर ने। राजस्थान पत्रिका ने धनतेरस के दिन पाठकों से कहा, आज के अखबार को अपनी नाक के पास ले जाएं। इसमें स्ट्रॉबेरी की खुशबू आएगी।


आज के हिन्दुस्तान का शीर्षक है हैप्पी दिवाली। जागरण का शीर्षक है दिवाली धमाका। आमतौर पर फीलगुड फैक्टर का सबसे बड़ा पैरोकार नवभारत टाइम्स माने हिन्दी में NBT  ने शेयर बाजार और सोने वगैरह को लीड नहीं बनाया है। राष्ट्रीय सहारा ने भी NBT की तरह दफ्तर में आचरण के नए नियमों को तरज़ीह दी है।

अमर उजाला का शीर्षक है- सेंसेक्स और सोने ने बिखेरी चमक, बाजार रिकॉर्ड 20893 के स्तर पर बंद,  दिवाली और धनतेरस पर 200 अरब का सोना बिका।

हिन्दी इलाके के मध्यवर्ग की खुशी के रंग में भंग डालना अच्छा नहीं लगेगा, पर आज के हिन्दी अखबारों ने यूएनडीपी की मानवाधिकार रपट की खबर को महत्व देना पसंद नहीं किया, जिसके अनुसार भारत दुनिया में आर्थिक प्रगति की तेजी में टॉप के दस देशों में है, पर मानव विकास में पिछड़टा जा रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को टॉप पर लगाया है कि लैंगिक समानता के मामले में भारत का दर्जा पाकिस्तान से भी नीचा है।

देश की खुशहाली और जनता की अमीरी बढ़ते देखना अच्छा लगता है, पर खबरों के चयन में हिन्दी अखबारों का यह दृष्टिकोण समझ में नहीं आता। ऐसी खबरें टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस में छपती हैं, जबकि उनके पाठक अपेक्षाकृत उच्च वर्ग से आते हैं।



हिन्दी अखबारों की कवरेज को देखें तो लगता नहीं कि वे अपने इलाके का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इलाके की आर्थक संरचना को थोड़ी देर के लिए भूल भी जाएं तो इन अखबारों में संस्कृति भी कृत्रिम है। हम अपने पर्वों को किस तरह मनाते हैं, यह हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं रहा। इसकी जगह छिछली अंग्रेजियत ने ले ली है। न जाने क्यों हमारे स्वाभिमान को चोट नहीं लगती।

सम्भव है मेरी यह बातें पिछड़ापन और दकियानूसी लगें, पर मुझे मीडियामार्ग से प्रवाहित यह खुशी नकली और आत्मघाती लगती है। मेरी कामना है कि हम वास्तव सें सुखी हों, अकेले ही नहीं पूरे समुदाय के साथ। उन करोड़ों उदास और परेशान आँखों को याद करें जिनके लिए आपके घर की रोशनी कोई माने नहीं रखती।


Thursday, October 28, 2010

मीडिया-संकट पर एक आउटलुक


अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक कई मानों में अपने किस्म की अनोखी है। विनोद मेहता ने पायनियर को नए ढंग का अखबार बनाकर पेश किया था। वह आर्थिक रूप से सफल नहीं हुआ। पर आउटलुक आर्थिक रूप से भी सफल साबित हुआ। बावजूद इसके कि मुकाबला इंडिया टुडे जैसी पत्रिका से था जो उसके बीस साल पहले से बाज़ार में थी। आउटलुक न तो समाचार-केन्द्रित है और न विचार-पत्रिका है। बेशक वह भी बिजनेस के लिए मैदान में है, पर उन गिनी-चुनी पत्रिकाओं में से एक है, जिसके शीर्ष पर एक पत्रकार है। उसकी यूएसपी है विचारोत्तेजक और पठनीय सामग्री। वह सामग्री जिसकी भारतीय मीडिया इन दिनों सायास उपेक्षा कर रहा है। आउटलुक के 15 साल पूरे होने पर जो विशेषांक निकला है, वह हालांकि हिन्दी या भारतीय भाषाओं के पत्रकारों की दृष्टि से अधूरा है, पर पढ़ने लायक है।
 
भारतीय मीडिया के चालू दौर को विकास और उत्साह का दौर भी कहा जा सकता है और संकट का भी। मीडिया के कारोबार और पाठक-दर्शक पर उसके असर को देखें तो निराश होने की वही वज़ह नहीं है जो पश्चिम में है। यही हैरत की बात है जिसकी ओर सुमीर लाल ने इस अंक में इशारा किया है। पश्चिम में मालिक, पत्रकार और पाठक तीनों गुणात्मक पत्रकारिता के हामी हैं, पर उसका आर्थिक आधार ढह रहा है। हमारे यहाँ आर्थिक आधार बन रहा है, पर गुणात्मक पत्रकारिता का जो भी ढाँचा था वह सायास ढहाया जा रहा है। 

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कंटेंट एंड फिल के जुम्ले को नोम चोम्स्की ने दोहराया है। इसमें कंटेंट माने खबर या पत्रकारीय सामग्री नहीं है, बल्कि विज्ञापन है। और फिल है खबरें। यानी महत्वपूर्ण हैं ब्रेक। ब्रेक और ब्रेक के बीच क्या दिखाया जाय इसे लोकर गम्भीरता नहीं है। अखबारों में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ होती है डमी। डमी यानी वह नक्शा जो बताता है कि विज्ञापन लगने के बाद एडिटोरियल कंटेट कहाँ लगेगा। इसमें भी दिक्कत नहीं थी। आखिर खबरें लाने वालों के वेतन का इंतज़ाम भी करना होता है। पर हमने इस तरफ ध्यान नहीं दिया कि खबरें फिलर बन गईं। दूसरी ओर ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो मीडिया पर विश्वास नहीं करते। 

आउटलुक के इस अंक का शीर्षक है द ग्रेट इंडियन मीडिया क्राइसिस। क्राइसिस माने क्या? पेड न्यूज़ और टीआरपी दो बदनाम शब्द हैं, पर क्या संकट इतना ही है? मीडिया से लोकतांत्रिक समाज बनता है या लोकतांत्रिक समाज अपना विश्वसनीय मीडिया बनाता है? मैकलुहान के अनुसार पहला औद्योगिक कारोबार मीडिया का ही था। यानी विश्वसनीयता का व्यवसाय। एक अर्से तक यह कारोबार ठीक से चला, भले ही उसमें तमाम छिद्र थे। और फिर लोभ और लालच ने पनीली सी विश्वसनीयता को खत्म कर डाला। नोम चोम्स्की के अनुसार अमेरिकी लिबरल के माने हैं स्टेट के समर्थक। राज्य की शक्ति के, राज्य की हिंसा के और राज्य के अपराधों के। नोम चोम्स्की अमेरिकी राज्यशक्ति के आलोचक हैं। उनकी धारणा है कि जो काम तानाशाही हिंसक शक्ति के मार्फत करती है वही काम लिबरल व्यवस्था अपने मीडिया के मार्फत करता है। 

मीडिया के मालिक आखिरकार अमीर लोग होते हैं वैल कनेक्टेड। पब्लिक रिलेशंस उद्योग का लक्ष्य है लोगों की मान्यताओं और व्यवहार को नियंत्रित करना। क्या कोई समाज ऐसा है जो इससे मुक्त हो? आप रोज़-ब-रोज़ एक खास तरह की राय पढ़ते हैं, टीवी पर देखते हैं तो काफी बड़ी संख्या में लोगों की वही राय बनती जाती है। यह बात राजनीति पर भी लागू होती है और उपभोक्ता बाज़ार पर भी। चोम्स्की के पास भारतीय मीडिया की जानकारी काफी सीमित है, पर उनसे इस बात पर असहमति नहीं हो सकती कि भारतीय मीडिया काफी बंदिशों से भरा, संकीर्ण, स्थानीय, जानकारी के मामले में सीमित है और काफी चीजों की उपेक्षा करता है। 

आउटलुक के इस अंक में काफी अच्छे नाम हैं। पर सीधे भारतीय संदर्भों में प्रणंजय गुहा ठकुरता, दीपांकर गुप्ता और रॉबिन जेफ्री ही हैं। बल्कि वास्तविक भारतीय संदर्भों में ये तीनों महत्वपूर्ण हैं। या फिर महत्वपूर्ण हैं रवि धारीवाल जिन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के उज्जवल पक्ष को रखा है। वे कहते हैं हमारा अखबार सम्पादक के लिए नहीं जनता के लिए निकलता है। कॉमन मैन के लिए। पर टाइम्स इंडिया का यह कॉमनमैन क्या आरके लक्ष्मण के कॉमन मैन जैसा है? धारीवाल के अनुसार टाइम्स के सम्पादक पार्टीबाज़ नहीं होते। वे जनता से संवाद करते हैं। कम से कम विचार या सिद्धांत में यह बात अच्छी है। सैद्धांतिक पत्रकारिता भी यही कहती है कि हमारा काम जनता के लिए होता है साधन सम्पन्नों या नेताओं के लिए नहीं। 

इस अंक में हैरल्ड इवांस और टिम सेबस्टियन के बेहतरीन लेख भी हैं, पर उनके संदर्भ गैर-भारतीय हैं। भारतीय संदर्भों में पत्रकारिता कुछ अलग है। न जाने क्यों उसके संरक्षक ही उसकी समस्या बन गए हैं। भारतीय व्यवस्था में ऊँच-नीच कुछ ज़्यादा ही है। सुमीर लाल ने कुछ सम्पादकों का ज़िक्र किया है जो ए-लिस्टर होने की वज़ह से ही सम्पादक बने।अंग्रेजी अखबारों की बात की जाय तो शायद सम्पादक बनने की अनिवार्य शर्त राज-व्यवस्था और पार्टी-सर्कल से जुड़े होना है। यह अयोग्यता नहीं। विनोद मेहता भी बेहतर सम्पर्कों वाले और प्रवर वर्ग के हैं। यह लक्ष्मण रेखा हमारे जातीय-समाज को दिखाती है। 

आउटलुक के इस अंक में कई बार लगता है कि शायद अखबार के पारिवारिक घरानों को परोक्ष रूप में पत्रकारीय मूल्यों का संरक्षक माना गया है। भारत में तो ज्यादातर अखबार पारिवारिक नियंत्रण में हैं। हो सकता है परिवार अपनी प्रतिष्ठा के लिए ग़म खाते हों, पर इधर तो मुनाफे के लिए सभी में रेस है। इसे गलत भी क्यों माना जाय, पर न्यूज़पेपर ओनरशिप के किसी वैकल्पिक मॉडल की चर्चा नहीं है। भारतीय भाषाओं का काम केवल रॉबिन जेफ्री के लेख से निपटा लिया गया है। मीडिया के तमाम दूसरे फलितार्थ भी इसमें हैं। इसमें संजॉय हज़ारिका, शशि थरूर, मार्क टली वगैरह ने अच्छी टिप्पणियाँ की हैं। आउटलुक के बारे में दो बातों का जिक्र और किया जाना चाहिए। एक तो यह उन विरल पत्रिकाओं में से है, जिनमें पाठकों के पत्रों पर इतनी मेहनत की जाती है। दूसरे इसमें पठनीय लेख छपते हैं भले ही वे काफी लम्बे हों। खासतौर से अरुंधति रॉय के लेख जिनसे लोग कितने ही असहमत हों, पर पढ़ना चाहते हैं। पत्रिका का यह अंक कारोबार के लिहाज़ से भी बेहतर है।    


Friday, October 22, 2010

अपने आपको परिभाषित करेगा हमारा मीडिया

एक ज़माना था जब दिल्ली के अखबार राष्ट्रीय माने जाते थे और शेष अखबार क्षेत्रीय। इस भ्रामक नामकरण पर किसीको बड़ी आपत्ति नहीं थी। दिल्ली के अखबार उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हिमाचल-पंजाब-हरियाणा तक जाकर बिकते थे। इन इलाकों के वे पाठक जिनकी दिलचस्पी स्थानीय खबरों के साथ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों में होती थी, इन्हें लेते थे। ऐसे ज्यादातर अखबार अंग्रेज़ी में थे। हिन्दी में नवभारत टाइम्स ने लखनऊ, पटना और जयपुर जाकर इस रेखा को पार तो किया, पर सम्पादकीय और व्यापारिक स्तर पर विचार स्पष्ट नहीं होने के कारण तीनों संस्करण बंद हो गए। लगभग इसके समानांतर हिन्दुस्तान ने पहले पटना और फिर लखनऊ में अपनी जगह बनाई।

नवभारत टाइम्स के संचालकों ने उसे चलाना नहीं चाहा तो इसके गहरे व्यावसायिक कारण ज़रूर होंगे, पर सम्पादकीय दृष्टि से उसका वैचारिक भ्रम भी जिम्मेदार था। पाठक ने शुरूआत में उसका स्वागत किया, पर उसकी अपेक्षा पूरी नहीं हो पाई। नवभारत टाइम्स की विफलता के विपरीत हिन्दुस्तान का पटना संस्करण सफल साबित हुआ। संयोग है कि एक दौर ऐसा था जब पटना से नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान दोनों प्रकाशित होते थे। हिन्दुस्तान ने स्थानीयता का वरण किया। प्रदीप के उत्तराधिकारी के रूप में हिन्दुस्तान को बेहतर स्पेस मिला। पर प्रदीप का आधार बहुत व्यापक नहीं था। हिन्दुस्तान ने काफी कम समय में अपना लोकल नेटवर्क बनाया। प्रायः सभी प्रमुख शहरों में दफ्तर बनाए। वहाँ से खबरें संकलित कर मुजफ्फरपुर, भागलपुर और रांची जैसे प्रमुख शहरों के संस्करण छपकर आए तो पाठकों ने उनका स्वागत किया।

राजस्थान पत्रिका ने उदयपुर, बीकानेर और कोटा जैसे शहरों में प्रेस लगाकर संस्करण शुरू किए। उत्तर प्रदेश में आगरा के अमर उजाला ने पहले बरेली से संस्करण शुरू किया। कानपुर का जागरण वाराणसी में आज के गढ़ में प्रवेश कर गया और सफल हुआ। जवाब में आज ने कानपुर संस्करण निकाला। अमर उजाला मेरठ और कानपुर गया। मध्य प्रदेश में नई दुनिया के मुकाबले भास्कर और नवभारत ने नए संस्करण शुरू करने की पहल की। खालिस्तानी आंदोलन के दौरान पंजाब केसरी ने तमाम कुर्बानियाँ देकर पाठक का मन जीता। रांची में प्रभात खबर नए इलाके में ज़मीन से जुड़ी खबरें लेकर आया। उधर नागपुर और औरंगाबाद में लोकमत का उदय हुआ। ये अखबार ही आज एक से ज्यादा संस्करण निकाल रहे हैं। अभी कुछ नए अखबारों के आने की संभावना भी है।

आठवें, नवें और दसवें दशक तक संचार-टेक्नॉलजी अपेक्षाकृत पुरानी थी। सिर्फ डाक और तार के सहारे काम चलता था। ज्यादातर छपाई हॉट मेटल पर आधारित रोटरी मशीनों से होती थी। इस मामले में इंदौर के नई दुनिया ने पहल ली थी। पर उस वक्त तक ट्रांसमीशन टेलीप्रिंटर पर आधारित था। इंटरनेट भारत में आया ही नहीं था। नब्बे के दशक में मोडम एक चमत्कारिक माध्यम के रूप में उभरा। अस्सी के दशक में भारतीय ऑफसेट मशीनें सस्ते में मिलने लगीं। संचार की तकनीक में भी इसके समानांतर विकास हुआ। छोटे-छोटे शहरों के बीच माइक्रोवेव और सैटेलाइट के मार्फत लीज़ लाइनों का जाल बिछने लगा। सूचना-क्रांति की पीठिका तैयार होने लगी।

हिन्दी अखबारों के ज्यादातर संचालक छोटे उद्यमी थे। पूँजी और टेक्नॉलजी जुटाकर उन्होंने अपने इलाके के अखबार शुरू किए। ज्यादातर का उद्देश्य इलाके की खबरों को जमा करना था। राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित ज्यादातर बड़े प्रकाशन अंग्रेजी अखबार निकालते थे। हिन्दी अखबार उनके लिए दोयम दर्जे पर थे। इसके विपरीत हिन्दी इलाके की छोटी पूँजी से जुटाकर निकले अखबार के पास सूचना संकलन के लिए बड़ी पूँजी नहीं थी। पत्रकारीय कौशल और मर्यादा को लेकर चेतना नहीं थी। वह आज भी विकसित हो पाई है, ऐसा कहा नहीं जा सकता। पत्र स्वामी के इर्द-गिर्द सेठ जी वाली संस्कृति विकसित हुई। पत्रकार की भूमिका का बड़ा हिस्सा मालिक के हितों की रक्षा से जुड़ा था। ऐसे में जो पत्रकार था वही विक्रेता, विज्ञापन एजेंट और मैनेजर भी था। स्वाभाविक था कि संचालकों की पत्रकारीय मर्यादाओं में दिलचस्पी वहीं तक थी जहाँ तक वह उनके कारोबार की बुनियादी ज़रूरत होती।

खबर एक सूचना है, जिसका साँचा और मूल्य-मर्यादा ठीक से परिभाषित नहीं हैं। विचार की अवधारणा ही हमारे समाज में अधकचरी है। हिन्दी इलाके की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनैतिक संरचना भीषण अंतर्विरोधों से ग्रस्त है। पाठक भी नया है। उसे सूचना की ज़रूरत है। उस सूचना के फिल्टर कैसे होते हैं, उसे पता नहीं। अचानक दस-पन्द्रह वर्ष में मीडिया का जबर्दस्त विस्तार हुआ इसलिए ट्रेनिंग की व्यवस्था भी विकसित नहीं हो पाई। ऐतिहासिक परिस्थितियों में जो सम्भव था वह सामने है। जो इससे संतुष्ट हैं उनसे मुझे कुछ नहीं कहना, पर जो असंतुष्ट हैं उन्हें रास्ते बताने चाहिए।

हिन्दी अखबारों का कारोबारी मॉडल देसी व्यपारिक अनुभवों और आधुनिक कॉरपोरेट कल्चर की खिचड़ी है। दूसरे शब्दों में पश्चिम और भारतीय अवधारणाओं का संश्लेषण। हिन्दी अखबारों में कुछ समय पहले तक लोकल खबरों को छापने की होड़ थी। आज भी है, पर उसमें अपवार्ड मोबाइल कल्चर और जुड़ गया है। सोलह से बीस पेज के अखबार में आठ पेज या उससे भी ज्यादा लोकल खबरों के होते हैं। इसमें सिद्धांततः दोष नहीं, पर लोकल खबर क्रिएट करने के दबाव और जल्दबाज़ी में बहुत सी निरर्थक सामग्री प्रकाशित होती है। इसके विपरीत एक पनीली आधुनिकता ने और प्रवेश किया है। इसकी शुरुआत भाषा में अंग्रेजी शब्दों के जबरन प्रवेश से हुई है। पुरानी हिन्दी फिल्मों में जॉनी वॉकर हैट लगाए शहरी बाबू बनकर आता था तकरीबन उसी अंदाज़ में आधुनिकता गाँवों और कस्बों में आ रही है। यह जल्द गुज़र जाएगी। इसका अगला दौर अपेक्षाकृत गम्भीर होगा। इसमें महत्वपूर्ण भूमिका शिक्षा की होगी।

शिक्षा-प्राप्त व्यक्ति जब अपने ज्ञान का इस्तेमाल करेगा तो स्वाभाविक रूप से उसकी दिलचस्पी जीवन के व्यापक फलक को समझने में होगी। अभी ऐसा लगता है कि हमारा समाज ज्ञान के प्रति उदासीन है। यह भी अस्थायी है। वैचारिक-चेतना के लिए वैश्विक गतिविधियों से जुड़ाव ज़रूरी है। मीडिया इसकी सम्भावनाएं बढ़ा रहा है। आज की स्थितियाँ अराजक लगतीं हैं, पर इसके भीतर से ही स्थिरता निकल कर आएगी। अखबारों और खबरिया मीडिया की खासियत है कि इसे अपनी आलोचना से भी रूबरू होना पड़ता है। यह आलोचना व्यापक सामाजिक-विमर्श का हिस्सा है। इनके बीच से ही अब ऐसे मीडिया का विकास होगा जो सूचना को उसकी गम्भीरता से लेगा। उच्छृंखल और लम्पट मीडिया का उदय जितनी तेजी से होता है, पराभव भी उतना तेज़ होता है। इंतज़ार करें और देखें।