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Friday, May 20, 2011

बुनियाद के पत्थरों को डरना क्या



चुनाव परिणाम आते ही पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि करके केन्द्र सरकार ने राजनैतिक नासमझी का परिचय दिया है। पेट्रोल कम्पनियों के बढ़ते घाटे की बात समझ में आती है, पर इतने दिन दाम बढ़ाए बगैर काम चल गया तो क्या कुछ दिन और रुका नहीं जा सकता था? इसका राजनैतिक फलितार्थ क्या है? यही कि वामपंथी पार्टियाँ इसका विरोध करतीं थीं। वे हार गईं। अब मार्केट फोर्सेज़ हावी हो जाएंगी।  इधर दिल्ली में मदर डेयरी ने दूध की कीमतों में दो रुपए प्रति लिटर की बढ़ोत्तरी कर दी। उसके पन्द्रह दिन पहले अमूल ने कीमतें बढ़ाईं थीं। इस साल खरबूजे 30 रुपए, आम पचास रुपए, तरबूज पन्द्रह रुपए और सेब सौ रुपए के ऊपर चल रहे हैं। ककड़ी और खीरे भी गरीबों की पहुँच से बाहर हैं।

Friday, March 25, 2011

नाच सही या आँगन टेढ़ा



सन 1957 के आम चुनाव राष्ट्रीय-पुनर्गठन के बाद हुए थे। केरल का जन्म भी उसी दौरान हुआ था। उस प्रदेश की विधानसभा का वह पहला चुनाव था। प्रदेश की 126 सीटों में से कम्युनिस्ट पार्टी 60 में जीती। कांग्रेस को 43, प्रजा समाजवादी पार्टी को 9 और निर्दलीय उम्मीदवारों को 15 सीटें मिलीं। पाँच निर्दलीय उम्मीदवारों की मदद से ईएमएस नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक पद्धति से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार सामने आई। कांग्रेस पार्टी इस अपमान को सहन नहीं कर पाई और बहुत जल्द इस सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। सरकार रही न रही, पर उसका बनना एक महत्वपूर्ण घटना थी। देश के आकाश पर लाल झंडा इसके बाद कई बार लहराया। खासतौर से बंगाल में 34 साल तक सरकार चलाकर वामपंथियों ने दूसरे किस्म का रिकॉर्ड बनाया, जो भारतीय राजनीति में ही नहीं दुनिया की राजनीति में अतुलनीय है।