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Tuesday, August 14, 2018

विरोधी-एकता के दुर्ग में दरार

राज्यसभा के उपसभापति चुनाव में पड़े वोटों के आधार पर राजनीति शास्त्र के शोधछात्र राहुल वर्मा का 2019 के चुनाव में बनने वाले सम्भावित गठबंधनों का अनुमान
राज्यसभा के उप-सभापति पद के चुनाव ने एकबारगी विरोधी दलों के अंतर्विरोधों को उजागर किया है। एनडीए प्रत्याशी हरिवंश की जीत इतनी आसानी से हो जाएगी, इसका अनुमान पहले से नहीं था। पिछले चार साल से विरोधी दल बीजेपी को केवल राज्यसभा में ही परेशान करने में सफल थे। पिछले कुछ समय से बीजेपी की स्थिति राज्यसभा में बेहतर हुई है, पर इतनी बेहतर वह फिर भी नहीं थी कि उसका प्रत्याशी आसानी से चुनाव जीत जाता। पिछले महीने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर एनडीए की जीत के बाद यह दूसरी जीत उसका आत्मविश्वास बढ़ाएगी।

कांग्रेस समेत विरोधी दलों की रणनीति अलग-अलग राज्यों में संयुक्त प्रत्याशी खड़े करने की है, ताकि बीजेपी-विरोधी वोट बँटने न पाएं। यह रणनीति उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और एक हद तक महाराष्ट्र में अब भी कारगर है, पर उसके जिरह-बख्तरों की दरारें भी नजर आने लगी हैं। साफ है सत्तारूढ़ दल ने इस चुनाव को कुछ समय के लिए टालकर बीजू जनता दल और टीआरएस के साथ विचार-विमर्श पूरा कर लिया। यह विमर्श केवल राज्यसभा के उप-सभापति चुनाव तक सीमित नहीं है। अब यह 2019 के चुनाव तक जाएगा। कांग्रेस ने इस चुनाव को या तो महत्व नहीं दिया या उसे भरोसा था कि यह चुनाव इस सत्र में नहीं होगा। कांग्रेस के दो सांसदों का वोट न देना भी उसके असमंजस को बढ़ाने वाला है।

Saturday, June 16, 2018

दिल्ली में ‘धरना बनाम धरना’


दिल्ली सचिवालय की इमारत में एक बड़ा सा बैनर लहरा रहा है, यहाँ कोई हड़ताल नहीं है, दिल्ली के लोग ड्यूटी पर हैं, दिल्ली का सीएम छुट्टी पर है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कहना है कि बीजेपी ने सचिवालय पर कब्जा कर लिया है। उप-राज्यपाल के दफ्तर में दिल्ली की कैबिनेट यानी पूरी सरकार धरने पर बैठी है। उधर मुख्यमंत्री के दफ्तर पर बीजेपी का धरना चल रहा है। आम आदमी पार्टी ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मिलने का समय माँगा है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, तमिलनाडु के फिल्म कलाकार कमलहासन, आरजेडी के तेजस्वी यादव, सीपीएम के सीताराम येचुरी और इतिहास लेखक रामचंद्र गुहा आप के समर्थन में आगे आए हैं। दोनों तरफ से युद्ध के नगाड़े बज रहे हैं।

Friday, May 25, 2018

मोदी का एक साल और...



मोदी सरकार के पिछले चार साल से ज्यादा महत्वपूर्ण है अगला एक साल। पिछले चार साल की बहुत सी बातें वोटर को याद रही हैं, बहुत सी भुला दी गई हैं। करीब की बातें ज्यादा याद रहती हैं। इसलिए देखना होगा कि आने वाले दिनों में ऐसी क्या बातें सम्भव हैं, जो मोदी सरकार के पक्ष में या विरोध में जा सकती हैं।

नरेन्द्र मोदी ने अपना राजनीतिक आधार तीन तरह के मतदाताओं के बीच बनाया है। एक, अपवार्ड मोबाइल शहरी युवा और स्त्रियाँ, जिन्हें एक नया आधुनिक भारत चाहिए। दूसरा मतदाता है, ग्रामीण भारत का, जो अपनी बुनियादी जरूरतों को लेकर परेशान रहता है। तीसरा मतदाता बीजेपी के राजनीतिक हिन्दुत्वका समर्थक है। इसे पार्टी का कोर वोटरकह सकते हैं।  पिछले चुनाव में पार्टी की मुख्य अपील विकास और बदलाव को लेकर थी।

Wednesday, May 16, 2018

फिलहाल बैकफुट पर है भाजपा

कर्नाटक चुनाव ने एक साथ कई विसंगतियों को जन्म दिया है। कांग्रेस पार्टी चुनाव हारने के बाद सत्ता पर काबिज रहना चाहती है। तीसरे नम्बर पर रहने के बाद भी एचडी कुमारस्वामी अपने सिर पर ताज चाहते हैं। जैसे कभी मधु कोड़ा थे, उसी तरह वे भी कांग्रेस के रहमोकरम पर मुख्यमंत्री पद की शोभा बढ़ाएंगे। कांग्रेस बाहर से राज करेगी या भीतर से, यह सब अभी तय नहीं है।  

मंगलवार की दोपहर लगने लगा कि बीजेपी न केवल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, बल्कि बहुमत के करीब पहुँच रही है. तभी सस्पेंस थ्रिलर की तरह कहानी में पेच आने लगा। उधर कांग्रेस हाईकमान ने बड़ी तेजी से कुमारस्वामी को बिना शर्त समर्थन देने का फैसला किया। सोनिया गांधी ने एचडी देवेगौडा से बात की और शाम होने से पहले राज्यपाल के नाम चिट्ठी भेज दी गई। इस तेज घटनाक्रम के कारण बीजेपी बैकफुट पर आ गई। 

Friday, May 11, 2018

कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा का सीन


दो महीने पहले जब कर्नाटक विधानसभा चुनाव का बिगुल बजना शुरू हुआ था, तब लगता था कि मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच है। पर अब लगता है कि जेडीएस को कमजोर आँकना ठीक नहीं होगा। चुनावी सर्वेक्षण अब धीरे-धीरे त्रिशंकु विधानसभा बनने की सम्भावना जताने लगे हैं। ज्यादातर विश्लेषक भी यही मानते हैं। इसका मतलब है कि वहाँ का सीन चुनाव परिणाम के बाद रोचक होगा।

त्रिशंकु विधानसभा हुई तब बाजी किसके हाथ लगेगी? विश्लेषकों की राय में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी, पर जरूरी नहीं कि वह सरकार बनाने की स्थिति में हो। वह सबसे बड़ी पार्टी बनने में कामयाब होगी, तो इसकी वजह राहुल गांधी या सोनिया गांधी की रैलियाँ नहीं हैं, बल्कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की चतुर राजनीति है। माना जा रहा है कि देश में मोदी को टक्कर देने की हिम्मत सिद्धारमैया ने ही दिखाई है। प्रचार के दौरान सिद्धारमैया अपना मुकाबला येदियुरप्पा से नहीं, मोदी से बता रहे हैं।  

इतना होने के बाद भी विश्वास नहीं होता कि बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह का चुनाव-मैनेजमेंट आसानी से व्यर्थ होगा। सच है कि इस चुनाव ने बीजेपी को बैकफुट पर पहुँचा दिया है। कांग्रेस अपने संगठनात्मक दोषों को दूर करके राहुल गांधी के नेतृत्व में खड़ी हो रही है। गुजरात में बीजेपी जीती, पर कांग्रेसी डेंट लगने के बाद। केन्द्र के खिलाफ एंटी इनकम्बैंसी भी बढ़ रही है। कर्नाटक के बाद अब बीजेपी को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की चिंता करनी होगी। 

Sunday, March 11, 2018

चुनावी चिमगोइयों का दौर

लोकसभा चुनाव में एक साल से ज्यादा समय बाकी है, पर नेपथ्य में चुनाव के नगाड़े सुनाई पड़ने लगे हैं। पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में भाजपा का प्रवेश हो गया है। तीन राज्य पहले से उसकी झोली में हैं। सातवाँ राज्य मिजोरम है, जहाँ इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। पूर्वोत्तर का केवल सांकेतिक महत्व है। तुरुप के पत्ते तो उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्य हैं, जहाँ असली राजनीतिक घमासान होगा। इन्हीं राज्यों से ऐसे गठबंधन निकलेंगे, जो 2019 की जंग में निर्णायक साबित होंगे। आज हालात बीजेपी बनाम शेष के बन चुके हैं। पर यक्ष-प्रश्न है कि क्या शेषएकसाथ आएगा?

सब जानते हैं कि असली मुकाबला लोकसभा चुनाव में है, पर उसकी राहें विधानसभा चुनाव से ही खुलती हैं। इससे स्थानीय स्तर पर संगठन तैयार होता है और वोटर के बीच पैठ बनती है। इस लिहाज से पूर्वोत्तर पर बीजेपी का ध्वज लहराना सांकेतिक होने के साथ-साथ उपयोगी भी है। त्रिपुरा में वाममोर्चे और कांग्रेस दोनों का सफाया हो गया। इससे बीजेपी के हौसले बुलंद हुए हैं। उधर विरोधी दलों ने बीजेपी के इस विस्तार को खतरनाक मानते हुए पेशबंदी शुरू कर दी है। 

Monday, January 1, 2018

अब क्या होगा 2019 का मोदी मंत्र?

गुजरात के चुनाव के बाद अब 2018 में कर्नाटक के चुनाव की तैयारी है। उसके साथ मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा के चुनाव भी होंगे। साल के अंत में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के चुनाव हैं। एक सम्भावना यह भी है कि लोकसभा चुनाव समय से पहले हो जाएं। बहरहाल अगले साल हों या 2019 में असली परीक्षा लोकसभा चुनाव में ही होगी। लम्बे असमंजस के बाद कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी को सिंहासन पर बैठा दिया है, जिनके सामने ‘मोदी मैजिक’ को तोड़ने की बड़ी चुनौती है। 2015 में बिहार में बने महागठबंधन ब्रांड सोशल इंजीनियरी को हाल में कांग्रेस पार्टी ने गुजरात में आजमाया और यकीनन लोकसभा चुनाव में भी उसे आजमाएगी। सवाल है कि बीजेपी का मिशन 2019 क्या है? 

धुर-विरोधी भी मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी के भीतर ऊर्जा का भंडार है। उनकी पार्टी हर घड़ी चुनाव लड़ने को तैयार रहती है। और तीसरे अमित शाह चुनाव के कुशल प्रबंधक हैं। सन 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले जब अमित शाह को उत्तर प्रदेश का कार्यभार सौंपा जा रहा था, तो कुछ लोगों ने मजाक में पूछा था कि गुजराती नेता को उत्तर प्रदेश की क्या समझ? बहरहाल अमित शाह ने एकबार नहीं दो बार उत्तर प्रदेश के चुनावी शेरों को बिल्ली बनाकर रख दिया। कोई न कोई खूबी तो है, इस नेता में।

पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से बीजेपी लगातार जीत रही है। बिहार, दिल्ली और पंजाब को छोड़ दें तो उसे लगातार सफलताएं मिलती गईं हैं। सम्भावनाओं का नियम कहता है कि उसके खाते में विफलताएं भी होनी चाहिए। बहरहाल इन परिणामों से कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने ही मतदाताओं का दिल जीतने के सबक सीखे हैं। सोशल इंजीनियरी इसका एक पहलू है, पूरा आयाम नहीं। बिहार में ओबीसी, दलितों और मुसलमानों का महागठबंधन सफल साबित हुआ था। हाल में कांग्रेस ने गुजरात में ओबीसी, दलितों, मुसलमानों और राज्य के ताकतवर जातीय समूह पाटीदारों के बीच पटरी बैठाई। क्या यह पटरी लोकसभा चुनाव में भी बैठेगी?

Sunday, December 17, 2017

सी-प्लेन पर सवार सियासत

गुजरात विधानसभा के चुनाव-प्रचार के आखिरी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साबरमती नदी से मेहसाणा जिले के धरोई बांध तक सी-प्लेन में सफर करके एक नया राजनीतिक मोर्चा खोल दिया। भारतीय जनता पार्टी दिखाना चाहती है कि जिस विकास को कांग्रेस पार्टी पागल कहकर बदनाम कर रही है, वह जल,थल और आकाश तीनों जगह जा रहा है। यह है हमारा विकास। मोदी की इस यात्रा को तमाशा कहें या विकास, उम्मीद स बात की है कि 2019 की चुनाव सभाओं में नेतागण सी-प्लेन से यात्रा करते नजर आएँगे।  
प्रधानमंत्री ने सोमवार को अहमदाबाद में रोड शो की इजाज़त नहीं मिलने पर एक चुनावी रैली में ऐलान किया था कि आपने साबरमती नदी देखी होगी। पहले वहां सर्कस होता था, अब वहां रिवरफ्रंट है। यह विकास है, लेकिन कांग्रेस के लिए विकास केवल वही जिससे वो पैसे बना सकें। उन्होंने कहा, हर जगह एयरपोर्ट्स नहीं बना सकते, इसलिए अब जलमार्गों पर फोकस करेंगे।

Sunday, December 10, 2017

राजनीति के गटर में गंदी भाषा

गुजरात चुनाव का पहला दौर पूरा हो चुका है। जैसाकि अंदेशा था आखिरी दो दिनों में पूरे राज्य का माहौल जहरीला हो गया। मणिशंकर अय्यर अचानक कांग्रेस के लिए विलेन की तरह बनकर उभरे और पार्टी से निलंबित कर दिए गए। उनके बयानों पर गौर करें तो लगता है कि वे अरसे से अपने निलंबन की कोशिशों में लगे थे। इस वक्त उनके निलंबन के पीछे पार्टी की घबराहट ने भी काम किया।  उन्हें इस तेजी से निलंबित करने और ट्विटर के मार्फत माफी माँगने का आदेश देने से यह भी जाहिर होता है कि पार्टी अपने अनुशासन-प्रिय होने का संकेत दे रही है। वह अपनी छवि सुधारना चाहती है। ठीकरा मणिशंकर अय्यर के सिर पर फूटा है। सवाल है कि क्या पार्टी अब नरेन्द्र मोदी को इज्जत बख्शेगी? दूसरी ओर बीजेपी पर दबाव होगा कि क्या वह भी अपनी पार्टी के ऐसे लोगों पर कार्रवाई करेगी, जो जहरीली भाषा का इस्तेमाल करते हैं।

Sunday, November 26, 2017

अंततः राहुल का आगमन

अब जब राहुल गांधी का पार्टी अध्यक्ष बनना तय हो गया है, पहला सवाल मन में आता है कि इससे भारतीय राजनीति में क्या बदलाव आएगा? क्या उनके पास वह दृष्टि, समझ और चमत्कार है, जो 133 साल पुरानी पार्टी को मटियामेट होने से बचा ले? क्या अब वे कांग्रेस को इस रूप में तैयार कर पाएंगे जो बीजेपी को परास्त करे और फिर देश को तेजी से आगे लेकर जाए? पिछले 13 साल में राहुल की छवि बजाय बनने के बिगड़ी ज्यादा है। उन्होंने अपने नाम के साथ जाने-अनजाने विफलताओं की लम्बी सूची जुड़ने दी। अब वे अपनी छवि को कैसे बदलेंगे?
राहुल गांधी उन राजनेताओं में से एक हैं, जिन्हें मौके ही मौके मिले। माना कि 2004 में वे अपेक्षाकृत युवा थे, पर उनकी उम्र इतनी कम भी नहीं थी। सचिन पायलट, जितिन प्रसाद और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे उनके सहयोगी काफी कम उम्र में सक्रिय हो गए थे। सन 2004 से 2009 तक उन्होंने काफी अनुभव भी हासिल किया। और लोकसभा चुनाव में चुनाव प्रचार भी किया। फिर उन्होंने देर क्यों की?
यह भी सच है कि पिछले कुछ महीनों से मीडिया में इस बात की चर्चा है कि उनकी छवि में सुधार हुआ है। उनका मजाक कम बन रहा है। दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता में भी कमी आई है। इसके पीछे नोटबंदी, जीएसटी और अर्थ-व्यवस्था में गिरावट को जम्मेदार बताया जा रहा है। पर ये बातें भी मीडिया ही बता रहा है। पर भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा बैरोमीटर चुनाव होता है। लाख टके का सवाल है कि क्या राहुल गांधी चुनाव जिताऊ नेता साबित होंगे? 

Sunday, November 5, 2017

स्वांग रचती सियासत


पिछले मंगलवार को संसद भवन में सरदार पटेल के जन्मदिवस के सिलसिले में हुए समारोह की तस्वीरें अगले रोज के अखबारों में छपीं। ऐसी तस्वीरें भी थीं, जिनमें राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के सामने से होकर गुजरते नजर आते हैं। कुछ तस्वीरों से लगता था कि मोदी की तरफ राहुल तरेर कर देख रहे हैं। यह तस्वीर तुरत सोशल मीडिया में वायरल हो गई। यह जनता की आम समझ से मेल खाने वाली तस्वीर थी। दुश्मनी, रंज़िश और मुकाबला हमारे जीवन में गहरा रचा-बसा है। मूँछें उमेठना, बाजुओं को फैलाना, ताल ठोकना और ललकारना हमें मजेदार लगता है।
जाने-अनजाने हमारी लोकतांत्रिक शब्दावली में युद्ध सबसे महत्वपूर्ण रूपक बनकर उभरा है। चुनाव के रूपक संग्राम, जंग और लड़ाई के हैं। नेताओं के बयानों को ब्रह्मास्त्र और सुदर्शन चक्र की संज्ञा दी जाती है। यह आधुनिक लोकतांत्रिक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं लगती, बल्कि महाभारत की सामंती लड़ाई जैसी लगती है। इस बात की हम कल्पना ही नहीं करते कि कभी सत्तापक्ष किसी मसले पर विपक्ष की तारीफ करेगा और विपक्ष किसी सरकारी नीति की प्रशंसा करेगा।

Sunday, October 29, 2017

‘मदर इंडिया’ के साठ साल बाद का भारत


फिल्म मदर इंडिया की रिलीज के साठ साल बाद एक टीवी चैनल के एंकर इस फिल्म के एक सीन का वर्णन कर रहे थे, जिसमें फिल्म की हीरोइन राधा (नर्गिस) को अपने कंधे पर रखकर खेत में हल चलाना पड़ता है। चैनल का कहना था कि 60 बरस बाद हमारे संवाददाता ने महाराष्ट्र के सतारा जिले के जावली तालुक के भोगावाली गाँव में खेत में बैल की जगह महिलाओं को ही जुते हुए देखा तो उन्होंने उस सच को कैमरे के जरिए सामने रखा, जिसे देखकर सरकारें आँख मूँद लेना बेहतर समझती हैं। गाहे-बगाहे आज भी ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देखकर शर्मिंदगी पैदा होती है। सवाल है कि क्या देश की जनता भी इन बातों से आँखें मूँदना चाहती है?

महबूब खान की मदर इंडिया उन गिनी-चुनी फिल्मों में से एक है, जो आज भी हमारे दिलो-दिमाग पर छाई हैं। यदि मुद्रास्फीति की दर के साथ हिसाब लगाया जाए तो मदर इंडिया देश की आजतक की सबसे बड़ी बॉक्स ऑफिस हिट फिल्म है। क्या वजह है इसकी? आजादी के बाद के पहले दशक के सिनेमा की थीम में बार-बार भारत का बदलाव केंद्रीय विषय बनता था। इन फिल्मों की सफलता बताती है कि बदलाव की चाहता देश की जनता के मन में थी, जो आज भी कायम है।

Sunday, October 22, 2017

असमंजस के चौराहे पर देश

हम असमंजस के दौर में खड़े हैं। एक तरफ हम आधुनिकीकरण और विकास के हाईवे और बुलेट ट्रेनों का नेटवर्क तैयार करने की बातें कर रहे हैं और दूसरी तरफ खबरें आ रहीं हैं कि हमारा देश भुखमरी के मामले में दुनिया के 119 देशों में 100वें नम्बर पर आ गया है। जब हम देश में दीवाली मना रहे थे, तब यह खबर भी सरगर्म थी कि झारखंड में एक लड़की भात-भात कहते हुए मर गई। कोई दिन नहीं जाता जब हमें सोशल मीडिया पर सामाजिक-सांस्कृतिक क्रूरता की खबरें न मिलती हों।

हम किधर जा रहे हैं? आर्थिक विकास की राह पर या कहीं और? इसे लेकर अर्थशास्त्रियों में भी मतभेद हैं। कुछ मानते हैं कि हम सही राह पर हैं और कुछ का कहना है कि तबाही की ओर बढ़ रहे हैं। दोनों बातें सही नहीं हो सकतीं। जाहिर है कि दोनों राजनीतिक भाषा बोल रहे हैं। कुछ लोग इसे मोदी सरकार की देन बता रहे हैं और कुछ लोगों का कहना है कि हताश और पराजित राजनीति इन हथकंडों को अपनाकर वापस आने की कोशिश कर रही है। पर सच भी कहीं होगा। सच क्या है?

पब्लिक कुछ नहीं जानती

सवाल है कि पब्लिक पर्सेप्शन क्या है? जनता कैसा महसूस कर रही है? पर उससे बड़ा सवाल यह है कि इस बात का पता कैसे लगता है कि वह क्या महसूस कर रही है? पिछले साल नवम्बर में हुई नोटबंदी को लेकर काफी उत्तेजना रही। सरकार के विरोधियों ने कहा कि अर्थ-व्यवस्था तबाही की ओर जा रही है। कम से कम उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में जनता की नाराजगी दिखाई नहीं पड़ी। अब जीएसटी की पेचीदगियों को लेकर व्यापारियों ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की है, वह काफी उग्र है। व्यापारी अपेक्षाकृत संगठित हैं और इसीलिए सरकार ने उनके विरोध पर ध्यान दिया है और अपनी व्यवस्था को सुधारा है। टैक्स में रियायतें भी दी हैं।

Sunday, September 17, 2017

कांग्रेसी तुरुप का आखिरी पत्ता

अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय में राहुल गांधी ने पार्टियों में वंशवाद से जुड़े एक सवाल पर कहा कि पूरा देश ही इस रास्ते पर चलता है। उन्होंने इसके लिए अखिलेश यादव, डीएमके नेता स्टालिन से लेकर अभिनेता अभिषेक बच्चन तक के नाम गिनाए। यानी भारत में ज्यादातर पार्टियाँ वंशवाद पर चलती हैं, इसलिए हमें ही दोष मत दीजिए। अंबानी अपना बिजनेस चला रहे हैं और इन्फोसिस में भी यही चल रहा है।

राहुल गांधी ने तमाम सवालों के जवाब दिए। पर उनका उद्देश्य बीजेपी पर प्रहार करना था। उन्होंने कहा, देश ने बीते 70 साल में जितनी तरक्की हासिल की है, उसे सिर उठा रहे ध्रुवीकरण और नफरत की राजनीति रोकने का काम कर रही है। उदार पत्रकारों की हत्या की जा रही है, दलितों को पीटा जा रहा है, मुसलमानों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है। अहिंसा का विचार खतरे में है।

उनकी बर्कले वक्तृता उन्हें राजनीतिक मंच पर लाने की अबतक की सबसे बड़ी कोशिश है। शायद वे जल्द ही पार्टी अध्यक्ष पद भी संभालें। सन 2004 में यानी अब से 13 साल पहले जब उन्हें लांच करने का मौका आया था, तब उनकी उम्र 34 साल थी। तब शायद यह लगा होगा कि उनके लिए समय उपयुक्त नहीं है। पर उसके बाद जब भी उन्हें लांच करने का मौका आया, उन्होंने खुद हाथ खींच लिए।

Saturday, September 2, 2017

चेतावनी है अन्ना का पत्र: जनता की उम्मीदों पर फिरता पानी

अन्ना हजारे ने लोकपाल, लोकायुक्त और किसानों के मुद्दे को लेकर मोदी सरकार को जो चेतावनी दी है, उसे संजीदगी से देखने की जरूरत है। इसलिए नहीं कि अन्ना हजारे सन 2011 जैसा ही आंदोलन छेड़ देंगे, बल्कि इसलिए लोकपाल की नियुक्ति में हो रही देरी सिर्फ एक उदाहरण है। दरअसल जनता की उम्मीदों पर पानी फिरता जा रहा है। जनता के मन में राजनीति के प्रति वितृष्णा जन्म ले रही है।

अन्ना ने मोदी सरकार को चार पेज का जो अल्टीमेटम दिया है, उसमें कहा गया है कि लोकपाल विधेयक पास होने के चार साल होने को हैं और सरकार कोई न कोई बहाना बनाकर उसकी नियुक्ति को टाल रही है, जबकि कानून बनाने की माँग करने वालों में बीजेपी भी आगे थी। लगता यह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले भ्रष्टाचार और काला धन एकबार फिर से महत्वपूर्ण मुद्दा बनेगा। 

Tuesday, August 29, 2017

आरक्षण पर एक और बहस का आगाज़

केंद्र सरकार ने ओबीसी की केंद्रीय सूची में उप-श्रेणियाँ (सब-कैटेगरी) निर्धारित करने के लिए एक आयोग बनाने का फैसला किया है। प्रत्यक्ष रूप में इसका उद्देश्य यह है कि आरक्षण का लाभ ज़रूरतमंदों को मिले। ओबीसी आरक्षण का लाभ कुछ खास जातियों को ज्यादा मिल रहा है और कुछ को एकदम कम। यानी सम्पूर्ण ओबीसी को एक ही श्रेणी या वर्ग में रखने के अंतर्विरोध अब सामने आने लगे हैं। अब आरक्षण के भीतर आरक्षण की व्यवस्था भी एक नई बहस को जन्म देगी। आयोग यह बताएगा कि ओबीसी के 27 फीसदी कोटा को किस तरीके से सब-कोटा में विभाजित किया जाएगा।

सिद्धांततः सम्पूर्ण ओबीसी में उन जातियों को खोजने की जरूरत है, जिन्हें सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों का लाभ कमतर मिला है। इसके साथ यह भी देखने की जरूरत है कि मंडल आयोग ने भले ही ओबीसी को जातीय दायरे में सीमित कर दिया था, सांविधानिक परिभाषा में यह पिछड़ा वर्ग (क्लास) है, जाति (कास्ट) नहीं।

Wednesday, August 23, 2017

सवाल है मुसलमान क्या कहते हैं?

सुप्रीम कोर्ट के बहुमत निर्णय के बाद सरकार को एक प्रकार का वैधानिक रक्षा-कवच मिल गया है। कानून बनाने की प्रक्रिया पर अब राजनीति होने का अंदेशा कम है। फिर भी इस फैसले के दो पहलू और हैं, जिनपर विचार करने की जरूरत है। अदालत ने तीन बार तलाक कहकर तलाक देने की व्यवस्था को रोका है, तलाक को नहीं। यानी मुस्लिम विवाह-विच्छेद को अब नए सिरे से परिभाषित करना होगा और संसद को व्यापक कानून बनाना होगा। यों सरकार की तरफ से कहा गया है कि कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं, त्वरित तीन तलाक तो गैर-कानूनी घोषित हो ही गया। 

देखना यह भी होगा कि मुस्लिम समुदाय के भीतर इसकी प्रतिक्रिया कैसी है। अंततः यह मुसलमानों के बीच की बात है। वे इसे किस रूप में लेते हैं, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये बातें सामुदायिक सहयोग से ही लागू होती हैं। सन 1985 के शाहबानो फैसले के बाद मुस्लिम समुदाय के प्रगतिशील तबके को दबना पड़ा था।

Sunday, June 18, 2017

राष्ट्रपति चुनाव का गणित और राजनीति

गुरुवार को राष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना जारी होने के साथ राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हो गईं हैं। अब अगले हफ्ते यह तय होगा कि मुकाबला किसके बीच होगा। और यह भी कि मुकाबला होगा भी या नहीं। सरकार ने विपक्ष की तरफ हाथ बढ़ाकर इस बात का संकेत जरूर किया है कि क्यों न हम मिलकर एक ही प्रत्याशी का नाम आगे बढ़ाएं। बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह ने प्रत्याशी चयन के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। समिति में वेंकैया नायडू, अरुण जेटली और राजनाथ सिंह शामिल हैं। इस समिति ने विपक्ष सहित ज्यादातर राजनीतिक दलों से बातचीत शुरू कर दी है।  

एनडीए ने सन 2002 में प्रत्याशी का निर्णय करने के लिए समिति नहीं बनाई थी, बल्कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने खुद कांग्रेस अध्यक्ष से मुलाकात की थी। उन्होंने एपीजे अब्दुल कलाम का नाम सामने रखकर ऐसी स्थिति पैदा कर दी, जिसे कांग्रेस नकार नहीं पाई थी। इसके विपरीत सन 2012 में कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी का नाम घोषित करने के बाद मुख्य विपक्षी दल भाजपा से सम्पर्क किया था। 

Sunday, June 4, 2017

पशु-क्रूरता बनाम मांसाहार

राजनीति के चक्रव्यूह में घिरी सरकारी अधिसूचना

पर्यावरण मंत्रालय ने पशु क्रूरता निरोधक अधिनियम के तहत जो अधिसूचना जारी की है, उसके निहितार्थ से या तो सरकार परिचित नहीं थी, या वह विरोध की परवाह किए बगैर वह अपने सांस्कृतिक एजेंडा को सख्ती से लागू करना चाहती है। अधिसूचना की पृष्ठभूमि को देखते हुए लगता नहीं कि सरकार का इरादा देशभर में पशु-वध पर रोक लगाने का है। सांविधानिक दृष्टि से वह ऐसा कर भी नहीं सकती। यह राज्य-विषय है। केन्द्र सरकार घुमाकर फैसला क्यों करेगी? अलबत्ता इस फैसले ने विरोधी दलों के हौसलों को बढ़ाया है। वामपंथी तबके ने बीफ-फेस्ट वगैरह शुरू करके इसे एक दूसरा मोड़ दे दिया है। इससे हमारे सामाजिक जीवन में टकराव पैदा हो रहा है।

Saturday, May 20, 2017

क्या तैयारी है मोदी के मिशन 2019 की?

नरेन्द्र मोदी महाबली साबित हो रहे हैं। उनके रास्ते में आने वाली सारी बाधाएं दूर होती जा रही हैं। लोगों का अनुमान है कि वे 2019 का चुनाव तो जीतेंगे उसके बाद 2024 का भी जीत सकते हैं। यह अनुमान है। अनुमान के पीछे दो कारण हैं। एक उनकी उम्र अभी इतनी है कि वे अगले 15 साल तक राजनीति में निकाल सकते हैं। दूसरे उनके विकल्प के रूप में कोई राजनीति और कोई नेता दिखाई नहीं पड़ता है। यों सन 2024 में उनकी उम्र 74 वर्ष होगी। उनका अपना अघोषित सिद्धांत है कि 75 वर्ष के बाद सक्रिय राजनीति से व्यक्ति को हटना चाहिए। इस लिहाज से मोदी को 2025 के बाद सक्रिय राजनीति से हटना चाहिए। बहरहाल सवाल है कि क्या उन्हें लगातार सफलताएं मिलेंगी? और क्या अगले सात साल में उनकी राजनीति के बरक्स कोई वैकल्पिक राजनीति खड़ी नहीं होगी?