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Saturday, January 5, 2019

कांग्रेस के इम्तिहान का साल



इस हफ्ते संसद में और संसद के बाहर राहुल गांधी के तीखे तेवरों को देखने से लगता है कि कांग्रेस पार्टी का आत्मविश्वास लौट रहा है। उसके समर्थकों और कार्यकर्ताओं के भीतर आशा का संचार हुआ है। इसे आत्मविश्वास कह सकते हैं या आत्मविश्वास प्रकट करने की रणनीति भी कह सकते हैं, क्योंकि पार्टी को वोटर के समर्थन के पहले पार्टी-कार्यकर्ता के विश्वास की जरूरत भी है। छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में सत्ता पर वापसी ने न केवल आत्मविश्वास बढ़ाया है, बल्कि संसाधनों का रास्ता भी खोला है। पर लोकसभा-चुनाव केवल सत्ता में वापसी के लिहाज से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को परिभाषित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। सवाल है कि कांग्रेस के पास दीर्घकालीन राजनीति की कोई समझ है या केवल राजकुमार को सिंहासन पर बैठाने की मनोकामना लेकर वह आगे बढ़ रही है?
इस साल लोकसभा के अलावा आठ विधानसभाओं के चुनाव भी होने वाले हैं। इनमें आंध्र, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में खासतौर से कांग्रेस की दिलचस्पी है। पार्टी चाहती है कि सन 2019 का वर्ष उसकी राजनीति को निर्णायक मोड़ दे। यह असम्भव भी नहीं है, तमाम किन्तु-परन्तुओं के बावजूद।

Saturday, December 15, 2018

राहुल की परीक्षा तो अब शुरू होगी!

सन 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी खुशखबरी इन तीन राज्यों में मिली सफलता के रूप में सामने आई है। नरेन्द्र मोदी ने पता नहीं कितनी गंभीरता से कांग्रेस मुक्त भारत की बात कही थी, पर लगने लगा था कि कहीं यह बात सच न हो जाए। इस सफलता के साथ कांग्रेस यह मानकर चल सकती है कि उसका वजूद फिलहाल कायम है और वह चाहे तो उसका पुनरुद्धार भी संभव है। उधर 2014 के बाद से बीजेपी अपराजेय लगने लगी थी। इन तीन राज्यों को चुनाव से बीजेपी की वह छवि भी टूटी है।
हालांकि इस साल कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में बीजेपी को अपनी कमजोर होती हैसियत का पता लग गया था, पर उस चुनाव में कांग्रेस को भी सफलता नहीं मिली थी। पर उत्तर के तीन राज्यों में इसबार बीजेपी को जो झटका लगा है, उसका श्रेय कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी को दिया जा सकता है। इस साल के शुरू में कांग्रेस की उपस्थिति केवल पंजाब, कर्नाटक, मिजोरम और पुदुच्चेरी में थी। इन चुनावों में उसने मिजोरम खोया है, पर राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को हासिल भी किया है।  
राहुल के नेतृत्व की सफलता का यह पहला चरण है। यह पूरी सफलता नहीं है। कांग्रेस एक नए बयानिया (नैरेटिव) के साथ वापसी करना चाहती है। राहुल गांधी अनुशासित और नवोन्मेषी राजनीति को बढ़ावा देना चाहते हैं। यह सफलता एक प्रकार के संधिकाल की सूचक है। वह न शिखर पर है और न अपने पराभव से पूरी तरह उबर पाई है। राहुल गांधी का राजनीतिक जीवन इस कांग्रेसी डोर से जुड़ी पतंग का है। फिलहाल यह ऊपर उठती नजर आ रही है, और शायद कुछ ऊँचाई और पकड़ेगी। पर कितनी? इस ऊँचाई के साथ जुड़े सवालों के जवाब लोकसभा चुनाव में मिलेंगे, पर कुछ जवाब फौरन मिलने जा रहे हैं। इन्हीं तीनों राज्यों में।

कांग्रेस के सामने खड़ी चुनौतियाँ

जीत के फौरन बाद तीन राज्यों में मुख्यमंत्रियों के चयन को लेकर पैदा हुआ असमंजस कुछ सवाल खड़े करता है. कांग्रेस एक नए बयानिया (नैरेटिव) के साथ वापसी करना चाहती है. राहुल गांधी अनुशासित और नवोन्मेषी राजनीति को बढ़ावा देना चाहते हैं. ऐसा कैसे होगा? क्या इसे उस राजनीति का नमूना मानें? तीनों राज्यों में मुख्यमंत्रियों के नाम को लेकर पार्टी कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए. समर्थन में नारेबाजी अनोखी बात नहीं है, पर यहाँ तो नौबत आगज़नी, वाहनों की तोड़फोड़ और सड़क जाम तक आ गई. प्रत्याशियों को अपने-अपने समर्थकों को समझाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा. कार्यकर्ताओं तक की बात भी नहीं है. लगता है कि नेतृत्व ने भी अपना होमवर्क ठीक से नहीं किया है.
इन पंक्तियों के प्रकाशित होने तक संभव है असमंजस दूर हो गए हों, पर अब जो सवाल सामने आएंगे, वे दूसरे असमंजसों को जन्म देंगे. सरकार का गठन असंतोषों का बड़ा कारण बनता है, यहाँ भी बनेगा. नेताओं के व्यक्तिगत रिश्ते, परिवार से नजदीकी, प्रशासनिक अनुभव, कार्यकर्ताओं से जुड़ाव, पार्टी के कोष में योगदान कर पाने और 2019 के लोकसभा चुनाव का अपने इलाके में बेहतर संचालन कर पाने की क्षमता वगैरह की अब परीक्षा होगी. 
कांग्रेस कार्यकर्ताओं को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि राजस्थान और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में सकल वोट प्रतिशत के मामले में बीजेपी और कांग्रेस की लगभग बराबरी है. लोकसभा चुनाव में एक या दो फीसदी वोट की गिरावट से ही कहानी कुछ से कुछ हो सकती है. यदि वे सरकार के गठन के साथ ही अराजक व्यवहार का प्रदर्शन करेंगे, तो उनकी छवि खराब होगी. 

Saturday, December 1, 2018

‘मंदिर शरणम गच्छामि’ का जाप भटकाएगा राहुल को


पिछले साल हुए गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी के जवाब में अपने हिन्दुत्व या हिन्दू तत्व का आविष्कार कर लिया है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ चुनाव के पहले उनके कैलाश-मानसरोवर दौरे का प्रचार हुआ। उसके पहले कर्नाटक-विधानसभा के चुनाव के दौरान वे मंदिरों और मठों में गए। गुजरात में तो इसकी शुरुआत ही की थी। चुनाव प्रचार के दौरान वे जिन प्रसिद्ध मंदिरों में दर्शन के लिए गए उनकी तस्वीरें प्रचार के लिए जारी की गईं। पोस्टर और बैनर लगाए गए।

छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में चुनाव पूरा होने के बाद अब तेलंगाना और राजस्थान की बारी है। प्रचार की शुरुआत में ही राजस्थान के पुष्कर तीर्थ में उनके गोत्र का सवाल उठा। खुद राहुल गांधी ने अपने गोत्र की जानकारी दी। पूजा कराने वाले पुजारी ने बताया कि उन्होंने अपने गोत्र का नाम दत्तात्रेय बताया। इस जानकारी को उनके विरोधियों ने पकड़ा और सोशल मीडिया पर सवालों की झड़ी लग गई। उनके दादा के नाम और धर्म को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। क्या उन्होंने धर्म-परिवर्तन किया था? क्या उनका विवाह हिन्दू पद्धति से हुआ था वगैरह। इन व्यक्तिगत बातों का कोई मतलब नहीं होता, पर सार्वजनिक जीवन में उतरे व्यक्ति के जीवन की हर बात महत्वपूर्ण होती है।

Sunday, July 1, 2018

'हवा का बदलता रुख' और कांग्रेस


हाल में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के धरने के वक्त विरोधी दलों की एकता के दो रूप एकसाथ देखने को मिले। एक तरफ ममता बनर्जी समेत चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने धरने का समर्थन किया, वहीं कांग्रेस पार्टी ने न केवल उसका विरोध किया, बल्कि सार्वजनिक रूप से अपनी राय को व्यक्त भी किया। इसके बाद फिर से यह सवाल हवा में है कि क्या विरोधी दलों की एकता इतने प्रभावशाली रूप में सम्भव होगी कि वह बीजेपी को अगले चुनाव में पराजित कर सके।

सवाल केवल एकता का नहीं नेतृत्व का भी है। इस एकता के दो ध्रुव नजर आने लगे हैं। एक ध्रुव है कांग्रेस और दूसरे ध्रुव पर ममता बनर्जी के साथ जुड़े कुछ क्षेत्रीय क्षत्रप। दोनों में सीधा टकराव नहीं है, पर अंतर्विरोध है, जो दिल्ली वाले प्रसंग में मुखर हुआ। इसके अलावा कर्नाटक सरकार की कार्यशैली को लेकर भी मीडिया में चिमगोइयाँ चल रहीं हैं। स्थानीय कांग्रेस नेताओं और जेडीएस के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के बीच मतभेद की बातें हवा में हैं। पर लगता है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी कर्नाटक में किसी किस्म की छेड़खानी करने के पक्ष में नहीं है। उधर बिहार से संकेत मिल रहे हैं कि नीतीश कुमार और कांग्रेस पार्टी के बीच किसी स्तर पर संवाद चल रहा है।

Thursday, June 7, 2018

क्या ‘आप’ से हाथ मिलाएगी कांग्रेस?


सतीश आचार्य का कार्टून साभार
भाजपा-विरोधी दलों की राष्ट्रीय-एकता की खबरों के बीच एक रोचक सम्भावना बनी है कि क्या राष्ट्रीय राजधानी में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का भी गठबंधन होगा? हालांकि दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन ने ऐसी किसी सम्भावना से इंकार किया है, पर राजनीति में ऐसे इंकारों का स्थायी मतलब कुछ नहीं होता.

पिछले महीने कर्नाटक में जब एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में अरविंद केजरीवाल और सोनिया-राहुल एक मंच पर खड़े थे, तभी यह सवाल पर्यवेक्षकों के मन में कौंधा था. इसके पहले सोनिया गांधी विरोधी दलों की एकता को लेकर जो बैठकें बुलाती थीं, उनमें अरविन्द केजरीवाल नहीं होते थे. कर्नाटक विधान-सौध के बाहर लगी कुर्सियों की अगली कतार में सबसे किनारे की तरफ वे भी बैठे थे.

Sunday, May 13, 2018

राहुल गांधी का पहला इम्तहान

कर्नाटक की रैलियों में नरेन्द्र मोदी ने कहा कि इस चुनाव के बाद कांग्रेस पीपीपी (पंजाब, पुदुच्चेरी और परिवार) पार्टी बनकर रह जाएगी। उधर राहुल गांधी ने कहा, हम मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे हैं और राज्य में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं। दो दिन बाद पता चलेगा कि किसकी बात सच है। बीजेपी के मुकाबले यह चुनाव कांग्रेस के लिए न केवल प्रतिष्ठा का बल्कि जीवन-मरण का सवाल है। कांग्रेस को अपनी 2013 की जीत को बरकरार रख पाई, तभी साल के अंत में चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में सिर उठाकर खड़ी हो सकेगी।

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस के सिर पर पराजय का साया है। बेशक उसने इस बीच पंजाब में जीत हासिल की है, पर एक दर्जन से ज्यादा राज्यों से हाथ धोया है। सन 2015 में बिहार के महागठबंधन को चुनाव में मिली सफलता पिछले साल हाथ से जाती रही। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के बावजूद पार्टी सात सीटों पर सिमट गई। पिछले साल गुजरात के चुनाव में पार्टी तैयारी से उतरी थी, पर सफलता नहीं मिली। 

Tuesday, March 20, 2018

फिर से खड़ी होती कांग्रेस

कांग्रेस महासमिति का 84 वां अधिवेशन दो बातों से महत्वपूर्ण रहा। पार्टी में लम्बे अरसे बाद नेतृत्व परिवर्तन हुआ है। इस अधिवेशन में राहुल गांधी की अध्यक्षता की पुष्टि हुई। दूसरे यह ऐसे दौर में हुआ है, जब पार्टी लड़खड़ाई हुई है। अब कयास हैं कि पार्टी निकट या सुदूर भविष्य में किस रास्ते पर जाएगी। अध्यक्ष पद की सर्वसम्मति से पुष्टि के अलावा अधिवेशन के अंतिम दिन राज्यों से आए प्रतिनिधियों और एआईसीसी के सदस्यों ने फैसला किया कि कांग्रेस कार्यसमिति के मनोनयन का पूरा अधिकार अध्यक्ष को सौंप दिया जाए। अटकलें यह भी थीं कि शायद राहुल गांधी कार्यसमिति के आधे सदस्यों का चुनाव करा लें। ऐसा हुआ नहीं और एक दीर्घ परम्परा कायम रही। बहरहाल इस महाधिवेशन के साथ कांग्रेस ने एक नए दौर की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं। इतना नजर आता है कि कांग्रेस नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रीय आपदा साबित करेगी और पहले के मुकाबले और ज्यादा वामपंथी जुमलों का इस्तेमाल करेगी। पार्टी की अगली कतार में अब नौजवानों की एक नई पीढ़ी नजर आएगी।  

Thursday, February 15, 2018

क्या कांग्रेस के नेतृत्व में महागठबंधन बनेगा?

कांग्रेस पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव के सिलसिले में राष्ट्रीय स्तर पर विरोधी-दलों की एकता का प्रयास कर रही है। इस एकता के सूत्र उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति से भी जुड़े हैं। सन 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त बना महागठबंधन जुलाई 2017 में टूट गया, जब जेडीयू ने एनडीए में शामिल होने का निश्चय किया। उसके पहले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, पर वहाँ बहुजन समाज पार्टी ने इस गठबंधन को स्वीकार नहीं किया। सवाल है कि क्या अब उत्तर प्रदेश में तीन बड़े दलों का गठबंधन बन सकता है? इस सवाल का जवाब देने के लिए दो मौके फौरन सामने आने वाले हैं।

कांग्रेस इस वक्त गठबंधन राजनीति की जिस रणनीति पर काम कर रही है, वह सन 2015 के बिहार चुनाव में गढ़ी गई थी। यह रणनीति जातीय-धार्मिक वोट-बैंकों पर आधारित है। पिछले साल पार्टी ने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ इसी उम्मीद में गठबंधन किया था कि उसे सफलता मिलेगी, पर ऐसा हुआ नहीं। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा एकसाथ नहीं आए हैं। क्या ये दोनों दल कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन में शामिल होंगे? इस सवाल का जवाब उत्तर प्रदेश में इस साल होने वाले राज्यसभा चुनावों में मिलेगा।

Saturday, February 10, 2018

कांग्रेस को 'सिर्फ' गठबंधन का सहारा

खबरें मिल रहीं हैं कि इस साल के अंत में होने वाले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ लोकसभा चुनाव भी कराए जा सकते हैं। चालू बजट सत्र के पहले दिन अपने अभिभाषण में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी इस बात का संकेत किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इस बात का समर्थन किया। कांग्रेस सहित प्रमुख विरोधी दल इस बात के पक्ष में नजर नहीं आते हैं। कांग्रेस की कोशिश है कि अगले लोकसभा चुनाव के पहले समान विचारधारा वाले दलों की एकता कायम कर ली जाए, ताकि बीजेपी को हराया जा सके। पिछले साल राष्ट्रपति के चुनाव के पहले पार्टी ने इस एकता को कायम करने की कोशिश की थी। उसमें सफलता भी मिली, पर उसी दौर में बिहार का महागठबंधन टूटा और जेडीयू फिर से वापस एनडीए के साथ चली गई।
देश की राजनीति में सबसे लम्बे अरसे तक कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। गठबंधन की राजनीति उसकी दिलचस्पी का विषय तभी बनता है जब वह गले-गले तक डूबने लगती है। तीन मौकों पर उसने गठबंधन सरकारें बनाईं। दो मौकों पर उसने बाहर से गठबंधन सरकारों को समर्थन दिया। हर बार सहयोगी दलों को कांग्रेस से शिकायतें रहीं। जब उसने बाहर से समर्थन दिया तो बैमौके समर्थन वापस लेकर सरकारें गिराईं। सन 2004 में पहली बार यूपीए बना, तो 2008 में वामदलों के हाथ खींच लेने के कारण सरकार गिरते-गिरते बची। यूपीए-2 के दौर में उसे लगातार ममता बनर्जी, शरद पवार और करुणानिधि के दबाव में रहना पड़ा।

Saturday, January 13, 2018

कांग्रेस के लिए दिल्ली अभी दूर है

देश की राजनीति में बीजेपी के विकल्प की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस उस विकल्प को देने की दिशा में उत्सुक भी लगती है। कांग्रेस का यह उत्साह 2019 के चुनाव तक बना भी रहेगा या नहीं, अभी यह कहना मुश्किल है। पार्टी ने अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है, जिससे लगे कि अब उसकी बारी है। संसद के शीतसत्र में ऐसा नया कुछ नहीं हुआ, जिससे लगे कि यह बदली हुई कांग्रेस पार्टी है। पार्टी ने शीत सत्र देर से बुलाने को लेकर सत्तारूढ़ पक्ष पर जोरदार प्रहार किए थे। यदि यह सत्र एक महीने पहले भी हो जाता तो कांग्रेस किन बातों को उठाती?
कांग्रेस ने गुजरात चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी के एक बयान को लेकर संसद में जो गतिरोध पैदा किया, उससे लगता नहीं कि कांग्रेस की किसी चमकदार राजनीति का राष्ट्रीय मंच पर उदय होने वाला है। शीत सत्र में संसद के दोनों सदनों का काफी समय नष्ट हुआ। पीआरएस रसर्च के अनुसार इसबार के शीत सत्र में लोकसभा के लिए निर्धारित समय में से 60.9 फीसदी और राज्यसभा में 40.9 फीसदी समय में काम हुआ। इस वक्त भी राज्यसभा में कांग्रेस और विपक्ष का दबदबा है। समय का सदुपयोग नहीं हो पाने का मतलब है कि ज्यादातर समय विरोध व्यक्त करने में खर्च हुआ। दोनों सदनों की उत्पादकता क्रमशः 78 और 54 फीसदी रही।

Saturday, November 25, 2017

‘ग्रहण’ से बाहर निकलती कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी के भीतर उत्साह का वातावरण है। एक तरफ राहुल गांधी के पदारोहण की खबरें हैं तो दूसरी ओर गुजरात में सफलता की उम्मीदें हैं। मीडिया की भाषा में राहुल गांधी ने फ्रंटफुट पर खेलना शुरू कर दिया है।  उनके भाषणों को पहले मुक़ाबले ज़्यादा कवरेज मिल रही है। अब वे हँसमुख, तनावमुक्त और तेज-तर्रार नेता के रूप में पेश हो रहे हैं। उनके रोचक ट्वीट आ रहे हैं। उनकी सोशल मीडिया प्रभारी दिव्य स्पंदना के अनुसार कि ये ट्वीट राहुल खुद बनाते हैं।
राहुल के पदारोहण के 14 दिन बाद गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव परिणाम आएंगे। ये परिणाम कांग्रेस के पक्ष में गए तो खुशियाँ डबल हो जाएंगी। और नहीं आए तो? कांग्रेस पार्टी हिमाचल में हारने को तैयार है, पर वह गुजरात में सफलता चाहती है। सफलता माने स्पष्ट बहुमत। पर आंशिक सफलता भी मिली तो कांग्रेस उसे सफलता मानेगी। कांग्रेस के लिए ही नहीं बीजेपी के नजरिए से भी गुजरात महत्वपूर्ण है। वह आसानी से इसे हारना नहीं चाहेगी। पर निर्भर करता है कि गुजरात के मतदाता ने किस बात का मन बनाया है। गुजरात के बाद कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे महत्वपूर्ण राज्य 2018 की लाइन में हैं। ये सभी चुनाव 2019 के लिए बैरोमीटर का काम करेंगे।

Sunday, November 5, 2017

पटेल को क्यों भूली कांग्रेस?

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के कम से कम तीन बड़े नेताओं को खुले तौर पर अंगीकार किया है। ये तीन हैं गांधी, पटेल और लाल बहादुर शास्त्री। मोदी-विरोधी मानते हैं कि इन नेताओं की लोकप्रियता का लाभ उठाने की यह कोशिश है। बीजेपी के नेता कहते हैं कि गांधी ने राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस को भंग कर देने की सलाह दी थी। बीजेपी की महत्वाकांक्षा है कांग्रेस की जगह लेना। इसीलिए मोदी बार-बार कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते हैं। आर्थिक नीतियों के स्तर पर दोनों पार्टियों में ज्यादा फर्क भी नहीं है। पिछले साल अरुण शौरी ने कहीं कहा था, बीजेपी माने कांग्रेस+गाय। 

Saturday, October 14, 2017

राहुल के पुराने तरकश से निकले नए तीर


कुछ महीने पहले तक माना जा रहा था कि मोदी सरकार मजबूत जमीन पर खड़ी है और वह आसानी से 2019 का चुनाव जीत ले जाएगी। पर अब इसे लेकर संदेह भी व्यक्त किए जाने लगे हैं। बीजेपी की लोकप्रियता में गिरावट का माहौल बन रहा है। खासतौर से जीएसटी लागू होने के बाद जो दिक्कतें पैदा हो रहीं हैं, उनके राजनीतिक निहितार्थ सिर उठाने लगे हैं। संशय की इस बेला में गुजरात दौरे पर गए राहुल गांधी की टिप्पणियों ने मसालेदार तड़का लगाया है।

पिछले कुछ दिन से माहौल बनने लगा है कि 2019 के चुनाव मोदी बनाम राहुल होंगे। राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष बनने को तैयार हैं। पहली बार लगता है कि वे खुलकर सामने आने वाले हैं। पर उसके पहले कुछ किन्तु-परन्तु बाकी हैं। सबसे बड़ा सवाल है कि क्या गुजरात में कांग्रेसी अभिलाषा पूरी होगी? यदि हुई तो उसका परिणाम क्या होगा और नहीं हुई तो क्या होगा?

Saturday, September 16, 2017

बर्कले द्वार से राहुल का आगमन

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया का कहना है कि कांग्रेस की वापसी अगले साल होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव से होगी। उनका यह भी कहना है कि देश की जनता राहुल गांधी को अपने नेता के रूप में स्वीकार करती है। सिद्धरमैया का यह बयान आम राजनेता का बयान है, पर इसके दो महत्वपूर्ण तथ्यों का सच समय पर ही सामने आएगा। पहला, कि क्या कांग्रेस की वापसी होगी? और दूसरा, क्या राहुल गांधी पूरे देश का नेतृत्व करेंगे, यानी प्रधानमंत्री बनेंगे?

राहुल गांधी ने अमे‍रिका के बर्कले विश्वविद्यालय में जो बातें कहीं हैं, उन्हें कई नजरियों से देखा जाएगा। राष्ट्रीय राजनीति की प्रवृत्तियों, संस्कृति-समाज और मोदी सरकार वगैरह के परिप्रेक्ष्य में। पर कांग्रेस की समग्र रीति-नीति को अलग से देखने की जरूरत है। राहुल ने बर्कले में दो बातें ऐसी कहीं हैं, जिनसे उनकी व्यक्तिगत योजना और पार्टी के भविष्य के कार्यक्रम पर रोशनी पड़ती है। उन्होंने कहा, मैं 2019 के आम चुनावों में पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के लिए पूरी तरह से तैयार हूँ।

असमंजस के 13 साल

पहली बार राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से ऐसी बात कही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मेरी तरफ से इसे सार्वजनिक करना उचित नहीं है, क्योंकि पहले पार्टी को इसे मंजूर करना है। राहुल ने कश्मीर के संदर्भ में एक और बात कही, जिसका वास्ता उनकी राजनीतिक-प्रशासनिक दृष्टि से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि मैंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम और जयराम रमेश के साथ मिलकर नौ साल तक जम्मू-कश्मीर में शांति स्थापना पर काम किया। यानी सन 2004 से प्रशासन में वे सक्रिय थे।

Sunday, August 13, 2017

बीजेपी की अगस्त क्रांति

पिछले तीन साल में नरेंद्र मोदी सरकार न केवल कांग्रेस के सामाजिक आधार को ध्वस्त किया है, बल्कि उसके लोकप्रिय मुहावरों को भी छीन लिया है। गांधी और पटेल को वह पहले ही अंगीकार कर चुकी है। मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का प्रतीक चिह्न गांधी का गोल चश्मा है। गांधी के सत्याग्रह के तर्ज पर मोदी ने स्वच्छाग्रह शब्द का इस्तेमाल किया। सरदार वल्लभ भाई पटेल को वे पहले ही अपना चुके हैं। इस साल 9 अगस्त क्रांति दिवस संकल्प दिवस के रूप में मनाने का आह्वान करके मोदी ने कांग्रेस की एक और पहल को छीन लिया।
अगस्त क्रांति के 75 साल पूरे होने पर बीजेपी सरकार ने जिस स्तर का आयोजन किया, उसकी उम्मीद कांग्रेस पार्टी ने नहीं की होगी। मोदी ने 1942 से 1947 को ही नहीं जोड़ा है, 2017 से 2022 को भी जोड़ दिया है। यानी मोदी सरकार की योजनाएं 2019 के आगे जा रही हैं। भारत छोड़ो आंदोलन की याद में संसद में आयोजित विशेष बैठक में मोदी ने जिन रूपकों का इस्तेमाल किया, उनसे उन्होंने सामान्य जन-भावना को जीतने की कोशिश की। दूसरी ओर सोनिया गांधी ने उस आंदोलन को कांग्रेस पार्टी के आंदोलन के रूप में ही रेखांकित करने की कोशिश की। साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी वार किया। इससे उन्हें वांछित लाभ मिला या नहीं, कहना मुश्किल है। बेहतर होता कि वे ऐसे मौके को राष्ट्रीय पर्व तक सीमित रहने देतीं।

Sunday, August 6, 2017

किधर जा रही है कांग्रेस?

हाल में सोशल मीडिया में एक चुटकुला लोकप्रिय हो रहा था कि अमित शाह को मौका लगे तो बीजिंग में भी बीजेपी की सरकार बनवा दें। यह मजाक की बात है, पर सच यह है कि बीजेपी के पार्टी अध्यक्ष ने सन 2019 के चुनाव के सिलसिले में राज्यों के दौरे शुरू कर दिए हैं। सवाल है कि कांग्रेस क्या कर रही है? हाल में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव के पहले सोनिया गांधी ने 17 दलों को एकसाथ लाने का दावा किया था। चुनाव के दिन तक ये 16 ही रह गए। दूसरी ओर बीजेपी के प्रत्याशी का 40 पार्टियों ने समर्थन किया।

बेशक इन 40 दलों का लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ गठबंधन होगा, ऐसा मान लेना उचित नहीं है, पर सच यह है कि पार्टी लगातार अपनी पहुँच का दायरा बढ़ा रही है। अब खबरें हैं कि बीजेपी ने अद्रमुक को भी अपने साथ जोड़ लिया है। दो दिन बाद गुजरात में राज्यसभा के चुनाव हैं। वहाँ अहमद पटेल को जिताने लायक विधायक कांग्रेस के पास थे, पर अचानक शंकर सिंह वाघेला की बगावत से कहानी बदल गई है। 

Sunday, March 19, 2017

बैसाखियों पर कांग्रेस

गोवा और मणिपुर में कांग्रेस से भाजपा में आए विधायकों को पुरस्कार मिले हैं। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भी मिलेंगे। दिग्विजय सिंह इसे खरीदना कहते हैं, पर भारतीय राजनीति में यह प्रक्रिया लम्बे अरसे से चल रही है। संयोग से कांग्रेस पार्टी ही इसकी प्रणेता है। देश की राजनीति के ज्यादातर मुहावरे उसके नाम हैं। गोवा में कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका गोवा फॉरवर्ड पार्टी ने दिया है। उसके तीन विधायक भाजपा सरकार के मंत्री बन गए हैं। तीनों कांग्रेस से आए हैं। तीनों के खिलाफ कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किए थे, क्योंकि उसे लगता था कि चुनाव के बाद ये लोग काम आएंगे। ऐसा नहीं हुआ। यह बात केवल गोवा में ही नहीं देशभर में कांग्रेस की दुर्दशा को रेखांकित करती है।

Saturday, January 28, 2017

बेदम हैं यूपी में कांग्रेसी महत्वाकांक्षाएं

सुदीर्घ अनिश्चय के बाद कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को राजनीति के सक्रिय मैदान में उतारने का फैसला कर लिया है। प्रियंका अभी तक निष्क्रिय नहीं थीं, पर पूरी तरह मैदान में कभी उतर कर नहीं आईं। अभी यह साफ नहीं है कि वे केवल उत्तर प्रदेश में सक्रिय होंगी या दूसरे प्रदेशों में भी जाएंगी। उत्तर प्रदेश का चुनाव कांग्रेस के लिए बड़ा मैदान जीतने का मौका देने वाला नहीं है। वह दूसरी बार चुनाव-पूर्व गठबंधन के साथ उतर रही है। यह गठबंधन भी बराबरी का नहीं है। गठबंधन की जीत हुई भी तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बनेंगे। कांग्रेस के लिए इतनी ही संतोष की बात होगी। और उससे बड़ा संतोष तब होगा, जब उसके विधायकों की संख्या 50 पार कर जाए। बाकी सब बोनस।   

Sunday, January 22, 2017

असमंजस में कांग्रेस

जिस तरह पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए मध्यावधि जनादेश का काम करेंगे उसी तरह वे कांग्रेस को भी अपनी ताकत को तोलने का मौका देंगे। सन 2014 के बाद से उसकी लोकप्रियता में लगातार गिरावट आई है। यह पहला मौका है जब पार्टी को सकारात्मकता दिखाई पड़ती है। उसे पंजाब में अपनी वापसी, उत्तराखंड में फिर से अपनी सरकार और उत्तर प्रदेश में सुधार की संभावना नजर आ रही है। गोवा में भी उसे अपनी स्थिति को सुधारने का मौका नजर आता है। पर उसके चारों सपने टूट भी सकते हैं। जिसका मतलब होगा कि 2019 के सपनों की छुट्टी। रसातल में जाना सुनिश्चित।