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Sunday, March 15, 2020

अपनी बखिया उधेड़ती कांग्रेस


ज्योतिरादित्य सिंधिया के पलायन पर शुरुआती चुप्पी रखने के बाद गुरुवार को राहुल गांधी ने कहा, ज्योतिरादित्य भले ने अलग विचारधारा का दामन थाम लिया है, पर वास्तविकता यह है कि वहां उनको न सम्मान मिलेगा न संतोष मिलेगा। वे जल्द ही इसे समझ भी जाएंगे। राहुल ने एक और बात कही कि यह विचारधारा की लड़ाई है। सिंधिया को अपने राजनीतिक भविष्य का डर लग गया। इसीलिए उन्होंने अपनी विचारधारा को जेब में रख लिया और आरएसएस के साथ चले गए।
राहुल गांधी की इस बात से कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहला यह कि सिंधिया को कांग्रेस में कुछ मिलने वाला था नहीं। आने वाले खराब समय को देखते हुए उन्होंने पार्टी छोड़ दी। दूसरा यह कि कांग्रेस पार्टी विचारधारा की लड़ाई लड़ रही है। तीसरी बात उन्होंने यह कही कि बीजेपी में (भी) उन्हें सम्मान और संतोष नहीं मिलेगा। राहुल के इस बयान के अगले रोज ही भोपाल में ज्योतिरादित्य ने कहा, मैंने अतिथि विद्वानों की बात उठाई, मंदसौर में किसानों के ऊपर केस वापस लेने की बात उठाई। मैंने कहा कि अगर इनके मुद्दे पूरे नहीं हुए तो मुझे सड़क पर उतरना होगा, तो मुझसे कहा गया उतर जाओ। जब सिंधिया परिवार को ललकारा जाता है तो वह चुप नहीं रहता।

Friday, March 13, 2020

राजनीति में बड़ा मोड़ साबित होगा सिंधिया प्रकरण


ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस पार्टी को छोड़कर जाना पहली नजर में एक सामान्य राजनीतिक परिघटना लगती है. इसके पहले भी नेता पार्टियाँ छोड़ते रहे हैं. पर इसका कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए विशेष महत्व है. वे कांग्रेस के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल रहे और अब बीजेपी की अगली कतार में होंगे. वे देश के महत्वपूर्ण भावी नेताओं में से एक हैं. यह एक नेता का पलायन भर नहीं है. पार्टी के भीतर एक अरसे से सुलग रही आग इस बहाने से भड़क सकती है. उसके भीतर के झगड़े अब खुलकर सामने आ सकते हैं. 
दूसरी तरफ बीजेपी के अंतर्विरोध भी खुलेंगे. ग्वालियर क्षेत्र में उसकी राजनीति केंद्र-बिंदु राजमहल का विरोध था. अब उसे सिंधिया परिवार के महत्व को स्थापित करना होगा. इतना ही नहीं मध्य प्रदेश के स्थानीय क्षत्रप एक नए शक्तिशाली नेता के साथ कैसे सामंजस्य बैठाएंगे, यह भी देखना होगा. एक अंतर है. बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व, कांग्रेस के नेतृत्व की तुलना में ज्यादा ताकतवर है. सवाल है, कितना और कब तक? 
अब सवाल केवल मध्य प्रदेश की सरकार का नहीं है, बल्कि कांग्रेस की समूची सियासत और उसके नेतृत्व का है. यह कहना जल्दबाजी होगी कि सत्ता के लोभ में सिंधिया पार्टी छोड़कर भागे हैं. वास्तव में वे पार्टी में खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे. यह प्रकरण इस बात को भी रेखांकित कर रहा है कि कुछ और युवा नेता भी ऐसा ही महसूस कर रहे हैं. इस स्तर के नेता को इस कदर हाशिए पर डालकर नहीं चला जा सकता था.
लोकसभा के लगातार दूसरे चुनाव में भारी पराजय से पीड़ित कांग्रेस जब इतिहास के सबसे बड़े संकट का सामना कर रही थी, इतने बड़े नेता का साथ छोड़ना बड़ा हादसा है. यह पलायन बता रहा है कि पार्टी के भीतर बैठे असंतोष को दूर नहीं किया गया, तो ऐसा ही कुछ और भी हो सकता है. अपनी इस दुर्दशा पर पार्टी अब चिंतन नहीं करेगी, तो कब करेगी?  वह नेतृत्व के सवाल को ही तय नहीं कर पाई है और एक अंतरिम व्यवस्था करके बैठी है.  

Thursday, March 12, 2020

राजनीतिक भँवर में घिरी कांग्रेस


ज्योतिरादित्य सिंधिया के हटने के बाद कांग्रेस के सामने दो बड़े सवाल हैं। एक, पहले से ही जर्जर नेतृत्व की साख को फिर से स्थापित कैसे होगी और दूसरा पार्टी के युवा नेताओं को भागने से कैसे रोका जाएगा? हताशा बढ़ रही है। उत्तर भारत के तीन और महत्वपूर्ण नेता पार्टी छोड़ने की फिराक में हैं। बार-बार मिलती विफलता और मध्य प्रदेश के ड्रामे ने कमर तोड़ दी। ज्योतिरादित्य के साथ 20 से ज्यादा विधायकों ने पार्टी छोड़ी है। राजनीतिक भँवर में घिरी कांग्रेस को यह जबर्दस्त धक्का और चेतावनी है। इस परिघटना का डोमिनो प्रभाव होगा। उधर बैकफुट पर नजर आ रही बीजेपी को मध्य भारत में फिर से पैर जमाने का मौका मिल गया है।
मध्य प्रदेश में सरकार बनाने के अलावा भाजपा राज्यसभा की एक अतिरिक्त सीट झटकने में भी कामयाब हो सकती है। राजनीतिक दृष्टि से केंद्र में युवा और प्रभावशाली मंत्री के रूप में ज्योतिरादित्य के प्रवेश का रास्ता खुला है। प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी सिंधिया अच्छे वक्ता हैं और समझदार राजनेता। पन्द्रह महीने पहले मध्य प्रदेश और राजस्थान ने कांग्रेस के पुनरोदय की उम्मीदें जगाई थीं, पर अब दोनों राज्य नकारात्मक संदेश भेज रहे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व पर सवालिया निशान हैं। इस परिघटना ने कुछ और युवा नेताओं के पलायन की भूमिका तैयार कर दी है। ज्यादातर ऐसे नेता राहुल गांधी के करीबी हैं, जो किसी न किसी वजह से अब नाराज हैं।

Sunday, February 16, 2020

‘आप’ की जीत पर कांग्रेस की कैसी खुशी?


दिल्ली में आम आदमी पार्टी की भारी जीत के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने ट्वीट किया, 'आप की जीत हुई, बेवकूफ बनाने तथा फेंकने वालों की हार। दिल्ली के लोग, जो भारत के सभी हिस्सों से हैं, ने बीजेपी के ध्रुवीकरण, विभाजनकारी और खतरनाक एजेंडे को हराया है। मैं दिल्ली के लोगों को सलाम करता हूं जिन्होंने 2021 और 2022 में अन्य राज्यों के लिए, जहां चुनाव होंगे मिसाल पेश की है।' इस ट्वीट के निहितार्थ को समझने के पहले कांग्रेस प्रवक्ता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुत्री शर्मिष्ठा मुखर्जी के दो ट्वीट पर भी ध्यान देना चाहिए।
चिदंबरम के ट्वीट के पहले उन्होंने ट्वीट किया, ''हम फिर से एक भी सीट नहीं जीत पाए. आत्ममंथन बहुत हो गया अब एक्शन लेने की ज़रूरत है। शीर्ष के नेताओं ने फ़ैसले लेने में बहुत देरी की। हमारे पास कोई रणनीति नहीं थी और न ही एकता थी। कार्यकर्ताओं में निराशा थी और ज़मीन से कोई जुड़ाव नहीं था। कांग्रेस पार्टी के संगठन का हिस्सा होने के नाते मेरी भी ज़िम्मेदारी है।''

Monday, January 6, 2020

यह साल कांग्रेस को मौके देगा


पिछले साल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की भारी पराजय और उसके बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में मिली आंशिक सफलता दो तरह के संदेश दे रही है। पराजय के बावजूद उसके पास वापसी का विकल्प भी मौजूद है। सन 2014 के बाद से कई बार कहा जा रहा है कि कांग्रेस फीनिक्स पक्षी की भांति फिर से जीवित होकर बाहर निकलेगी। सवाल है कि कब और कैसे?
देश के पाँच राज्यों में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैं और दो में वह गठबंधन में शामिल है। चिंता की बात यह है कि वह उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्यों में उसकी उपस्थिति कमजोर है। इस साल बिहार, दिल्ली और तमिलनाडु में चुनाव होने वाले हैं। इन तीनों राज्यों में अपनी स्थिति को सुधारने का उसके पास मौका है। बिहार और तमिलनाडु में उसके प्रमुख गठबंधन सहयोगी काफी हद तक तय हैं। क्या दिल्ली में वह आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन करेगी? आप भी क्या अब उसके साथ गठबंधन के लिए तैयार होगी?
पर ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि पार्टी के नेतृत्व का स्वरूप क्या बनेगा? सोनिया गांधी अस्थायी रूप से कार्यकारी अध्यक्ष का काम कर रहीं हैं, पर पार्टी को उनके आगे के बारे में सोचना है। क्या इस साल कोई स्थायी व्यवस्था सामने आएगी? पार्टी की अस्तित्व रक्षा के लिए यह सबसे बड़ा सवाल है। पिछले साल 26 मई को जब राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफे की घोषणा की थी, तो काफी समय तक पार्टी ने इस खबर को बाहर आने ही नहीं दिया। यह बात नेतृत्व को लेकर उसकी संवेदनशीलता और असुरक्षा को रेखांकित करती है।

Sunday, December 29, 2019

कांग्रेस के आत्मघात का साल


कांग्रेस पार्टी हर साल 28 दिसंबर को अपना स्थापना दिवस मनाती है। इस साल पार्टी का 135 वाँ जन्मदिन शनिवार को मनाया गया। आज रविवार को पार्टी झारखंड की नई सरकार में शामिल होने जा रही है, पर वह इसका नेतृत्व नहीं कर रही है। इस सरकार के प्रमुख होंगे झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन। जिस पार्टी को देश के राष्ट्रीय आंदोलन के संचालन का श्रेय दिया जाता है, वह आज अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रही है। झारखंड के नतीजों ने पार्टी का उत्साह बढ़ाया जरूर है, पर भीतर-भीतर पार्टी के भीतर असमंजस है। यह असमंजस इस साल अपने चरम पर जा पहुँचा है।
कांग्रेस के जीवन में यह 134वाँ साल सबसे भारी पराजय का साल रहा है। पिछले हफ्ते पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने एक इंटरव्यू में कहा कि यह हमारे लिए संकट की घड़ी है। ऐसा संकट पिछले 134 साल में कभी नहीं आया। पाँच साल पहले हमारे सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हुआ था, जो आज भी है। कोई जादू की छड़ी हमारी पार्टी का उद्धार करने वाली नहीं है। पार्टी का नेतृत्व सोनिया गांधी के हाथों में है। ऐसा इसलिए करना पड़ा, क्योंकि इस साल की हार के बाद राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया। यह भी एक प्रकार का संकट है। अभी तक यह तय नहीं है कि पार्टी का भविष्य का नेतृत्व कैसा होगा।

Saturday, December 28, 2019

अपने जन्मदिन पर असमंजस में कांग्रेस


आज 28 दिसंबर को कांग्रेस पार्टी अपना 135 वाँ जन्मदिन मना रही है। जो पार्टी को देश के राष्ट्रीय आंदोलन के संचालन का श्रेय दिया जाता है, वह आज अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रही है। हालांकि झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पार्टी का उत्साह बढ़ा दिया है, पर सच यह है कि वहाँ वह झारखंड मुक्ति मोर्चा की सहयोगी के रूप में खड़ी है। बहरहाल इस सफलता से उत्साहित पार्टी के नेता कई तरह के दावे कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि भारतीय जनता पार्टी का पराभव शुरू हो गया है और कांग्रेस की वापसी में ज्यादा देर नहीं है। नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के अंदेशों से पैदा हुए प्रतिरोधी स्वरों ने पार्टी के उत्साह को और बढ़ाया है। 
हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव परिणाम पार्टी के आत्मविश्वास का आधार बने हैं। ऐसे में पार्टी के एक तबके ने फिर से माँग शुरू कर दी है कि राहुल गांधी को वापस लाओ। यहीं से इस पार्टी के अंतर्विरोधों की कहानी शुरू होती है। पार्टी का सबसे बड़ा एजेंडा आज भी यही है कि किसी तरह से राहुल गांधी को लाओ। पिछले हफ्ते पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने एक इंटरव्यू में कहा कि यह हमारे लिए संकट की घड़ी है। कोई जादू की छड़ी हमारी पार्टी का उद्धार करने वाली नहीं है।

Friday, December 6, 2019

नरसिम्हाराव पर तोहमत क्यों?


पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जब 2004 में प्रधानमंत्री बने थे, तब किसी ने उनके बारे में लिखा था कि वे कभी अर्थशास्त्री रहे होंगे, पर अब वे खाँटी राजनीतिक नेता हैं और सफल हैं। यह भी सच है कि उनकी सौम्य छवि ने हमेशा उनके राजनीतिक स्वरूप की रक्षा की है और उन्हें राजनीति के अखाड़े में कभी बहुत ज्यादा घसीटा नहीं गया, पर कांग्रेस पार्टी और खासतौर से नेहरू-गांधी परिवार के लिए वे बहुत उपयोगी नेता साबित होते हैं। उन्होंने 1984 के दंगों के संदर्भ में जो कुछ कहा है उसके अर्थ की गहराई में जाने की जरूरत महसूस हो रहा है। उन्होंने कहा है कि तत्कालीन गृहमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने इंद्र कुमार गुजराल की सलाह मानी होती तो दिल्ली में सिख नरसंहार से बचा जा सकता था। यह बात उन्होंने दिल्‍ली में पूर्व प्रधानमंत्री इन्द्र कुमार गुजराल की 100वीं जयंती पर आयोजित समारोह में कही।

मनमोहन सिंह ने कहा, 'दिल्‍ली में जब 84 के सिख दंगे हो रहे थे, गुजराल जी उस समय नरसिम्हाराव के पास गए थे। उन्होंने राव से कहा कि स्थिति इतनी गम्भीर है कि जल्द से जल्द सेना को बुलाना आवश्यक है। अगर राव गुजराल की सलाह मानकर जरूरी कार्रवाई करते तो शायद नरसंहार से बचा जा सकता था।' मनमोहन सिंह ने यह बात गुजराल साहब की सदाशयता के संदर्भ में ही कही होगी, पर इसके साथ ही नरसिम्हाराव की रीति-नीति पर भी रोशनी पड़ती है। यह करीब-करीब वैसा ही आरोप है, जैसा नरेन्द्र मोदी पर गुजरात के दंगों के संदर्भ में लगता है। सवाल है कि क्या मनमोहन सिंह का इरादा नरसिम्हाराव पर उंगली उठाना है? या वे सीधेपन में एक बात कह गए हैं, जिसके निहितार्थ पर उन्होंने विचार नहीं किया है?

Saturday, November 2, 2019

कांग्रेस को अब चाहिए क्षेत्रीय क्षत्रप


महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में अपेक्षाकृत बेहतर परिणामों से उत्साहित कांग्रेस पार्टी ने अपने पुनरोदय का एक कार्यक्रम तैयार किया है। इसमें संगठनात्मक बदलाव के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर जनता से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन छेड़ने की योजना भी है। हालांकि इन चुनाव परिणामों को बेहतर कहने के पहले कई तरह के किन्तु-परन्तु हैं, पर पार्टी इन्हें बेहतर मानती है। पार्टी का निष्कर्ष यह है कि हमने कुछ समय पहले जनांदोलन छेड़ा होता, तो परिणाम और बेहतर होते। लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के लिए यह संतोष का विषय है। उत्तर प्रदेश में पार्टी ने अपना सदस्यता कार्यक्रम लॉन्च करने की घोषणा भी की है।
पार्टी ने अपनी सफलता का नया सूत्र खोजा है क्षेत्रीय क्षत्रपों को बढ़ावा दो। यह कोई नई बात नहीं है। उसे समझना होगा कि क्षेत्रीय क्षत्रप दो रोज में तैयार नहीं होते। अपने कार्यकर्ताओं को बढ़ावा देना होता है। बड़ा सच यह है कि पार्टी ने राहुल गांधी के नेतृत्व को विकसित करने के फेर में अपने युवा नेतृत्व को उस स्तर का समर्थन नहीं दिया, जो उन्हें मिलना चाहिए था। पिछले साल राजस्थान और मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्रियों का चयन करते समय यह बात अच्छी तरह साफ हो गई थी। अब क्षेत्रीय क्षत्रपों से पार्टी का आशय क्या है?  पुराने नेता, लोकप्रिय नेता या युवा नेता?
वैचारिक अंतर्मंथन
केवल नेतृत्व की बात ही नहीं है। पार्टी को वैचारिक स्तर पर भी अंतर्मंथन करना होगा। बीजेपी केवल नरेंद्र मोदी के भाषणों के कारण लोकप्रिय नहीं है। उसने सामाजिक स्तर पर भी अपनी जगह बनाई है। बहरहाल कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर सुस्त अर्थव्यवस्था को मुद्दा बनाकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने जा रही है। इस मोर्चे की घोषणा के साथ खबर यह भी आई है कि पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी फिर विदेश दौरे पर चले गए हैं। वे कहाँ गए हैं, यह जानकारी तो नहीं दी गई है, पर इतना जरूर कहा गया है कि वे 'मेडिटेशन' के लिए गए हैं।

Sunday, October 6, 2019

चुनाव के पहले लड़खड़ाती कांग्रेस


इस साल हुए लोकसभा चुनाव के बाद के राजनीतिक परिदृश्य का पता इस महीने हो रहे महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनावों से लगेगा। दोनों राज्यों में सभी सीटों पर प्रत्याशियों के नाम तय हो चुके हैं, नामांकन हो चुके हैं और अब नाम वापसी के लिए एक दिन बचा है। दोनों ही राज्यों में एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते हौसलों की और दूसरी तरफ कांग्रेस के अस्तित्व-रक्षा से जुड़े सवालों की परीक्षा है। एक प्रकार से अगले पाँच वर्षों की राजनीति का यह प्रस्थान-बिंदु है।
कांग्रेस के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए कहीं न कहीं अपने पैर जमाने होंगे। ये दोनों राज्य कुछ साल पहले तक कांग्रेस के गढ़ हुआ करते थे। अब दोनों राज्यों में उसे अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इन चुनावों में उसकी संगठनात्मक सामर्थ्य के अलावा वैचारिक आधार की परीक्षा भी है। पार्टी कौन से नए नारों को लेकर आने वाली है? क्या वह लोकसभा चुनाव में अपनाई गई और उससे पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में तैयार की गई रणनीति को दोहराएगी?

Saturday, October 5, 2019

कांग्रेस के लिए अशनि संकेत



लोकसभा चुनाव में मिली भारी पराजय के बाद कांग्रेस पार्टी को संभलने का मौका भी नहीं मिला था कि कर्नाटक और तेलंगाना में बगावत हो गई। राहुल गांधी के इस्तीफे के कारण पार्टी के सामने केंद्रीय नेतृत्व और संगठन को फिर से खड़ा करने की चुनौती है। फिलहाल सोनिया गांधी को फिर से सामने लाने के अलावा पार्टी के पास कोई विकल्प नहीं था। अब पहले महाराष्ट्र और हरियाणा और उसके बाद झारखंड और फिर दिल्ली में विधानसभा चुनावों की चुनौती है। इनका आगाज़ भी अच्छा होता नजर नहीं आ रहा है।
महाराष्ट्र में संजय निरुपम और हरियाणा में अशोक तँवर के बगावती तेवर प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः की कहावत को दोहरा रहे हैं। महाराष्ट्र में संजय निरुपम भले ही बहुत बड़ा खतरा साबित न हों, पर हरियाणा में पहले से ही आंतरिक कलह के कारण लड़खड़ाती कांग्रेस के लिए यह अशुभ समाचार है। संजय और अशोक दोनों का कहना है कि पार्टी के वफादार कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हो रही है। दोनों की बातों से लगता है कि पार्टी में राहुल गांधी के वफादारों की अनदेखी की जा रही है।

Sunday, September 1, 2019

राहुल का कश्मीर कनफ्यूज़न


कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। ज्यादातर सरकारी फैसलों के दूसरे पहलू पर रोशनी डालने की जिम्मेदारी कांग्रेस की है, क्योंकि वह सबसे बड़ा विरोधी दल है। पार्टी की जिम्मेदारी है कि वह अपने वृहत्तर दृष्टिकोण या नैरेटिव को राष्ट्रीय हित से जोड़े। उसे यह विवेचन करना होगा कि पिछले छह साल में उससे क्या गलतियाँ हुईं, जिनके कारण वह पिछड़ गई। केवल इतना कहने से काम नहीं चलेगा कि जनता की भावनाओं को भड़काकर बीजेपी उन्मादी माहौल तैयार कर रही है।
कांग्रेसी नैरेटिव के अंतर्विरोध कश्मीर में साफ नजर आते हैं। इस महीने का घटनाक्रम गवाही दे रहा है। अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का आदेश पास होने के 23 दिन बाद राहुल गांधी ने कश्मीर के सवाल पर महत्वपूर्ण ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने लिखा, सरकार के साथ हमारे कई मुद्दों को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन साफ है कि कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है। पाकिस्तान वहां हिंसा फैलाने के लिए आतंकियों का समर्थन कर रहा है। इसमें पाकिस्तान समेत किसी भी देश के दखल की जरूरत नहीं है।
राहुल गांधी का यह बयान स्वतः नहीं है, बल्कि पेशबंदी में है। यही इसका दोष है। इसके पीछे संयुक्त राष्ट्र को लिखे गए पाकिस्तानी ख़त का मजमून है, जिसमें पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि कश्मीर में हालात सामान्य होने के भारत के दावे झूठे हैं। इन दावों के समर्थन में राहुल गांधी के एक बयान का उल्लेख किया गया है, जिसमें राहुल ने माना कि 'कश्मीर में लोग मर रहे हैं' और वहां हालात सामान्य नहीं हैं। राहुल गांधी को अपने बयानों को फिर से पढ़ना चाहिए। क्या वे देश की जनता की मनोभावना का प्रतिनिधित्व करते हैं?

Saturday, August 31, 2019

कश्मीर पर किस असमंजस में है कांग्रेस?


अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का आदेश पास होने के 23 दिन बाद राहुल गांधी ने कश्मीर के सवाल पर एक महत्वपूर्ण ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने लिखा, सरकार के साथ हमारे कई मुद्दों को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह साफ है कि कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है। पाकिस्तान वहां हिंसा फैलाने के लिए आतंकियों का समर्थन कर रहा है। इसमें पाकिस्तान समेत किसी भी देश के दखल की जरूरत नहीं है।
राहुल गांधी ने ऐसा बयान क्यों जारी किया, इस वक्त क्यों किया और अभी तक क्यों नहीं किया था। ऐसे कई सवाल मन में आते हैं। राहुल के बयान के पीछे निश्चित रूप से पाकिस्तान सरकार द्वारा संयुक्त राष्ट्र को लिखे गए एक ख़त का मजमून है। इसमें पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि कश्मीर में हालात सामान्य होने के भारत के दावे झूठे हैं। इन दावों के समर्थन में राहुल गांधी के एक बयान का उल्लेख किया गया है, जिसमें राहुल ने माना है कि 'कश्मीर में लोग मर रहे हैं' और वहां हालात सामान्य नहीं हैं।
बड़ी देर कर दी…
हालात सामान्य नहीं हैं तक बात मामूली है, क्योंकि देश में काफी लोग मान रहे हैं कि कश्मीर में हालात सामान्य नहीं है। सरकार भी एक सीमा तक यह बात मानती है। पर 'कश्मीर में लोग मर रहे हैं' कहने पर मतलब कुछ और निकलता है। तथ्य यह है कश्मीर में किसी आंदोलनकारी के मरने की खबर अभी तक नहीं है। पाकिस्तानी चिट्ठी में नाम आने से राहुल गांधी का सारा राजनीतिक गणित उलट गया है। उन्होंने अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करने में देर कर दी है। कहना मुश्किल है कि आने वाले दिनों में उनकी राजनीति की दिशा क्या होगी।

Tuesday, August 27, 2019

क्या कहते हैं मोदी को लेकर बढ़ते कांग्रेसी अंतर्विरोध


जैसे-जैसे कांग्रेस पार्टी की कमजोरियाँ सामने आ रही हैं, वैसे-वैसे उसके भीतर से अंतर्विरोधी स्वर भी उठ रहे हैं। अगस्त के पहले हफ्ते में अनुच्छेद 370 को लेकर यह बात खुलकर सामने आई थी। नरेंद्र मोदी के प्रति नफरत को लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने जयराम रमेश और अभिषेक मनु सिंघवी की बातों का समर्थन करके पार्टी की सबसे महत्वपूर्ण रणनीति पर सवालिया निशान लगाया है। सन 2007 के गुजरात विधान सभा चुनाव में सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर बताते हुए इस रणनीति का सूत्रपात किया था।
गुजरात-दंगों में मोदी की भूमिका का मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया था, जिसके पीछे पार्टी का समर्थन कोई छिपी बात नहीं थी। मोदी का अमेरिकी वीज़ा रद्द हुआ, तब भी कहीं न कहीं पार्टी का समर्थन भी था। फिर अमित शाह की गिरफ्तारी हुई और उनके गुजरात प्रवेश पर रोक लगी। सारी बातें व्यक्तिगत रंजिशों की याद दिला रही थीं। फिर जब 2013 में मोदी को बीजेपी ने प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया, तो सोशल मीडिया पर अघोषित युद्ध छिड़ गया।
कांग्रेस और बीजेपी की प्रतिद्वंद्विता अपनी जगह है, पर मोदी के प्रति अलग किस्म की नफरत कांग्रेसी नेतृत्व के मन में है। यह वैचारिक मतभेद से कुछ ज्यादा है। ऐसे में पार्टी के भीतर से अलग स्वरों का सुनाई पड़ना कुछ सोचने को मजबूर करता है। एक पुस्तक विमोचन समारोह में जयराम रमेश ने गुरुवार को कहा, मोदी के कार्यों को भी देखना चाहिए, जिनकी वजह से वे मतदाताओं का समर्थन हासिल करके सत्ता हासिल कर पाए हैं।  

Wednesday, August 14, 2019

चिदंबरम खुद तो डूबेंगे…


कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने जम्मू-कश्मीर से जुड़े सरकारी फैसलों को सांप्रदायिक रंग देकर न तो अपनी पार्टी क हित किया है और न मुसलमानों का। और कुछ हो न हो, कांग्रेस को एक धक्का और लगा है। उन्होंने रविवार को चेन्नई में कहा कि मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला इसलिए लिया क्योंकि वहां मुसलमान बहुसंख्यक हैं। अगर वहां हिंदू बहुसंख्यक होते तो यह फैसला नहीं होता।
संयोग से मंगलवार के अखबारों में चिदंबरम के इस बयान के साथ-साथ वरिष्ठ लेखिका नयनतारा सहगल का भी बयान छपा है। उन्होंने कहा है कि सरकार को एक मुस्लिम बहुल राज्य फूटी आँखों नहीं सुहाता, इसलिए यह फैसला हुआ है। सन 2015 में पुरस्कार वापसी अभियान की शुरुआत नयनतारा सहगल ने की थी। तब भी कहा गया था कि इस मुहिम के पीछे राजनीतिक कारण ज्यादा है, अभिव्यक्ति से जुड़े कारण कम। यह राजनीति तबसे लेकर अबतक कई बार मुखर हुई है।
चिदंबरम कांग्रेस पार्टी की दृष्टि से कोई बयान देते, तो इसमें गलत कुछ नहीं है, पर सवाल है कि क्या कांग्रेस का यही नजरिया है? है तो इस बात को पार्टी कहे और उसके निहितार्थ को भुगते। सच है कि पाकिस्तान की कोशिश है कि कश्मीर में नागरिकों की धार्मिक भावनाओं का दोहन किया जाए। पर भारतीय मुसलमान धर्मनिरपेक्ष-व्यवस्था के समर्थक हैं। विभाजन के समय उन्होंने भारत में रहना इसीलिए मंजूर किया था। कश्मीर को धार्मिक-राज्य बनाने की कोशिश होगी या साम्प्रदायिक जुमलों से आंदोलन चलाया जाएगा, तो भारत के राष्ट्रवादी मुसलमान उसका समर्थन नहीं करेंगे।  

Saturday, August 10, 2019

370 के चक्रव्यूह में फँसी कांग्रेस


कांग्रेस पार्टी कर्नाटक के पचड़े और राहुल गांधी के इस्तीफे के कारण पैदा हुए संकट से बाहर निकली भी नहीं थी कि अनुच्छेद 370 को लेकर विवाद पैदा हो गया है। यह विवाद पार्टी के भीतर का मामला है और एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रश्न पर पार्टी के भीतर से निकल रहे दो प्रकार के स्वरों को व्यक्त कर रहा है। एक मायने में इसे अच्छे स्वास्थ्य का लक्षण कहा जा सकता है, क्योंकि मतभेद होना कोई गलत बात तो नहीं। अलबत्ता कांग्रेस की परम्परा, नेतृत्व शैली और आंतरिक संरचना को देखते हुए यह अटपटा है।
पिछले सोमवार को अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिली स्वायत्तता को समाप्त करने का समाचार मिलने के बाद पूर्व सांसद जनार्दन द्विवेदी ने जब राम मनोहर लोहिया को उधृत करते हुए अपना समर्थन व्यक्त किया, तो इसमें ज्यादा हैरत नहीं हुई। द्विवेदी इस वक्त अपेक्षाकृत हाशिए पर हैं और इससे पहले आरक्षण को लेकर अपनी स्वतंत्र राय व्यक्त कर चुके हैं। हैरत ज्योतिरादित्य सिंधिया के ट्वीट पर हुई, जिसमें उन्होंने कहा, मैं जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर किए गए फैसले का समर्थन करता हूं। साथ ही भारत में इसके पूर्ण एकीकरण का भी समर्थन करता हूं।
अनेक असहमतियाँ
उन्होंने लिखा कि बेहतर होता कि सांविधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाता, तब इस मामले पर कोई भी सवाल नहीं उठाया जा सकता था। फिर भी, यह हमारे देश के हित में है और मैं इसका समर्थन करता हूं। सिंधियाजी राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं और यह बात हवा में है कि पार्टी अध्यक्ष के सम्भावित उम्मीदवारों में उनका नाम भी है। उनसे पहले मिलिंद देवड़ा, अनिल शास्त्री और दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी करीब-करीब ऐसी ही राय व्यक्त की थी।

Sunday, July 28, 2019

संसद या सड़क? कांग्रेस के धर्मसंकट


राज्यसभा में सरकार ने गुरुवार को विपक्षी एकजुटता के चक्रव्यूह को तोड़कर कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष के सामने चुनौती पैदा कर दी है।  इसके एक दिन पहले ही कांग्रेस ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) संशोधन और तीन तलाक सहित सात विधेयकों का रास्ता राज्यसभा में रोकने की रणनीति तैयार की थी। यह रणनीति पहले दिन ही धराशायी हो गई। सत्तारूढ़ दल ने विरोधी-एकता में सेंध लगाने में कामयाबी हासिल कर ली।
लोकसभा चुनाव में भारी पराजय का सामना करने के बाद विरोधी, दलों खासतौर से कांग्रेस के सामने चुनौती है कि अब क्या किया जाए। पार्टी के पास संसद के भीतर आक्रामक मुद्रा अपनाने का मौका है, पर कैसे? दूसरी तरफ उसके सामने संसद से बाहर सड़क पर उतरने का विकल्प है, पर कैसे? सवाल नेतृत्व का है और विचारधारा का। पार्टी के सामने केवल नेतृत्व का संकट नहीं है। उससे ज्यादा विचारधारा का संकट है। पार्टी अब ट्विटर के भरोसे है।
राज्यसभा में घटता रसूख
लोकसभा में कुछ किया नहीं जा सकता। केवल राज्यसभा में ही संख्याबल के सहारे सत्तारूढ़ दल पर एक सीमा तक अंकुश लगाया जा सकता है, पर इसके लिए क्षेत्रीय दलों के साथ सहमति तैयार करनी होगी। फिलहाल लगता है कि कांग्रेस को इसमें सफलता नहीं मिल रही है। बीजू जनता दल, तेलंगाना राष्ट्र समिति, अद्रमुक और वाईएसआर कांग्रेस का रुझान केन्द्र सरकार के पक्ष में नजर आ रहा है। यह समर्थन लोकसभा चुनाव के दौरान भी नजर आ गया था।

Sunday, July 21, 2019

कर्नाटक में गुब्बारा फूटने की घड़ी


कर्नाटक में अब धैर्य की प्रतीक्षा है। सत्तारूढ़ गठबंधन के अंतर्विरोध बढ़ते जा रहे हैं और गुब्बारा किसी भी समय फूट सकता है। पर इस दौरान कुछ सांविधानिक प्रश्नों को उत्तर भी मिलेंगे। बड़ा सवाल दल-बदल कानून को लेकर है, जो अंततः अब और ज्यादा स्पष्ट होगा। यह काम सुप्रीम कोर्ट में ही होगा, पर उसके पहले राजनीतिक अंतर्विरोध खुलेंगे। चुनाव-पूर्व और चुनावोत्तर गठबंधनों की उपादेयता पर भी बातें होंगी। प्रतिनिधि सदनों में सदस्यों की भूमिका राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के रूप में है। यह भूमिका बनी रहेगी, पर सवाल यह तो उठेगा कि दो राजनीतिक दल जो जनता के सामने वोट माँगने गए, तब एक-दूसरे के विरोधी थे। वे अपना विरोध मौका पाते ही कैसे भुला देते हैं?
सन 2006 में जब मधु कोड़ा झारखंड के मुख्यमंत्री बने थे, तबसे यह सवाल खड़ा है कि जनादेश की व्याख्या किस तरह से होगी? यही सवाल अब कर्नाटक में है कि 225 के सदन में 37 सदस्यों का नेता मुख्यमंत्री कैसे बन सकता है? जो लोग इस वक्त बागी विधायकों को लेकर नैतिकता के सवाल उठा रहे हैं उन्हें यह भी देखना चाहिए कि राजनीतिक नैतिकता अंतर्विरोधी है। पिछले साल मई के महीने में जब कांग्रेस-जेडीएस सरकार बन रही थी, तब प्रगतिशील विश्लेषक उसे साम्प्रदायिकता के खिलाफ वैचारिक लड़ाई के रूप में देख रहे थे। वे नहीं देख पा रहे थे कि राजनीतिक सत्ता अपने आप में बड़ा प्रलोभन है। उसे किसी भी तरीके से हथियाने का नाम विचारधारा है।

Saturday, July 20, 2019

हंगामा है क्यों बरपा…यानी कांग्रेस को हुआ क्या है?


कांग्रेस पार्टी के संकट को दो सतहों पर देखा जा सकता है। राज्यों में उसके कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर भाग रहे हैं। दूसरी तरफ पार्टी केन्द्र में अपने नेतृत्व का फैसला नहीं कर पा रही है। कर्नाटक में सांविधानिक संकट है, पर उसकी पृष्ठभूमि में कांग्रेस का भीतर का असंतोष है। पार्टी छोड़कर भागने वाले ज्यादातर विधायक कांग्रेसी हैं। वे सामान्य विधायक भी नहीं हैं, बल्कि बहुत सीनियर नेता हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि वे पैसे के लिए पार्टी छोड़कर भागे हैं। ज्यादातर के पास काफी पैसा है। यह समझने की जरूरत है कि रोशन बेग जैसे कद्दावर नेताओं के मन में संशय पैदा क्यों हुआ। रामलिंगा रेड्डी जैसे वरिष्ठ नेता अपना रुख बदलते रहते हैं, पर इतना साफ है कि उनके मन में पार्टी नेतृत्व को लेकर कोई खलिश जरूर है। कांग्रेस से हमदर्दी रखने वाले विश्लेषकों को भी अब लगने लगा है कि पार्टी ने इच्छा-मृत्यु का वरण कर लिया है।
केवल कर्नाटक की बात नहीं है। इसी गुरुवार को गुजरात में कांग्रेस के पूर्व विधायक अल्पेश ठाकोर और धवल सिंह जाला गुरुवार को भाजपा में शामिल हो गए। दोनों ने राज्यसभा उपचुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवारों के खिलाफ वोट देने के बाद 5 जुलाई को ही विधायक पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। कर्नाटक में कांग्रेस के साथ जेडीएस के विधायकों ने भी इस्तीफे दिए हैं, पर बड़ी संख्या कांग्रेसियों की है। इसके पहले तेलंगाना में कांग्रेस के 18 में से 12 विधायक केसीआर  की पार्टी टीआरएस में शामिल हो गए। ये विधायक दो महीने पहले ही जीतकर आए थे। गोवा में तो पूरी पार्टी भाजपा में चली गई। यह दल-बदल है, पर इसके पीछे के कारणों को भी समझने की जरूरत है। ज्यादातर कार्यकर्ताओं के मन में असुरक्षा का भाव है।
संकट केन्द्र में है
राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद केन्द्र में अराजकता का माहौल है। यह सब लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद से शुरू हुआ है, पर वास्तव में इसकी शुरूआत 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद ही हो गई थी। पार्टी को उम्मीद थी कि एकबार पराजय का क्रम थमेगा, तो फिर से सफलता मिलने लगेगी। उसकी सारी रणनीति राहुल को स्थापित करने के लिए सही समय के इंतजार पर केन्द्रित थी। वह भी हो गया, पर संकट और गहरा गया। 

Sunday, July 14, 2019

कांग्रेस यानी धुरी से टूटा पहिया



कांग्रेस पार्टी का संकट बढ़ता जा रहा है। जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है, संकट वहाँ है। कर्नाटक में सरकार अल्पमत में आ गई है। किसी तरह से वह चल रही है, पर कहना मुश्किल है कि मंगलवार के बाद क्या होगा। कर्नाटक में संकट चल ही रहा था कि गोवा में कांग्रेस के 15 में से 10 विधायक बीजेपी में शामिल हो गए। इसके बाद अल्पमत में बीजेपी सरकार मजबूत स्थिति में पहुंच गई है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में गुनगुनाहट है।

हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में इसी साल चुनाव होने हैं। इन राज्यों में क्या पार्टी वापसी करेगी? वापसी नहीं हुई, तो इन वहाँ भी भगदड़ मचेगी। यों भगदड़ इस वक्त भी है। तीनों राज्यों में कांग्रेस अपने आंतरिक संकट से रूबरू है। तेलंगाना में पार्टी लगभग खत्म होने के कगार पर है। मजबूत हाईकमान वाली इस पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व इस वक्त खुद संकटों से घिरा है। पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी है सड़कों पर उतर पाने में असमर्थता। यह पार्टी केवल ट्विटर के सहारे मुख्यधारा में बनी रहना चाहती है। कार्यकर्ता कठपुतली की भूमिका निभाते रहे हैं। उनमें प्राण अब कैसे डाले जाएंगे?

पार्टी ने विचारधारा के स्तर पर जो कुछ भी किया हो, पर सच यह है कि वह परिवार के चमत्कार के सहारे चल रही थी। उसे यकीन था कि यही चमत्कार उसे वापस लेकर आएगा। परिवार अब चुनाव जिताने में असमर्थ है, इसलिए यह संकट पैदा हुआ है। धुरी फेल हो गई है और परिधि बेकाबू। संकट उतना छोटा नहीं है, जितना दूर से नजर आ रहा है। नए नेता की परीक्षा इस बात से होगी कि वह परिवार का वफादार है या नहीं। परिवार से अलग लाइन लेगा, तो संकट। वफादारी की लाइन पर चलेगा, तब भी संकट।