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Friday, August 13, 2010

ग्लोबल अपडेट

श्रीलंका से दो रोचक खबरें मिली हैं। एक तो लिट्टे के आतंक के खिलाफ लड़ी सेना के नायक जनरल सनत फोनसेका को वहाँ की फौजी अदालत ने अपने सेवाकाल में ही राजनीति में शामिल होने का दोषी पाया है। अब इस फैसले की पुष्टि सरकार कर देगी तो जनरल के पद और सारे अलंकरण छिन जाएंगे।

जनरल फोनसेका ने जनवरी में राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा था, जिसमें वे महीन्द्रा राजपक्षे से हार गए थे। न्हें इसके बाद गिरफ्तार कर लिया गया था। उनपर नागरिक सरकार का तख्ता पलटने की साज़िश का आरोप भी है।

सनकी मंत्री हटाया गया
श्रीलंका के एक उप राजमार्ग मंत्री मर्विन सिल्वा को पार्टी और पद से हटा दिया गया है। उन्होंने एक अफसर को रस्सी के सहारे पेड़ से बँधवा दिया था। अफसर पर आरोप था कि वह कुछ सरकारी बैठकों में शामिल नहीं हुआ।
लोकतंत्र का यह प्रयोग राष्ट्रपति महीन्द्र राजपक्षे को समझ में नहीं आया।

Wednesday, June 23, 2010

किर्गिस्तान में क्या हो रहा है?


किर्गीज़ माने होता है अपराजेय। सेंट्रल एशिया का यह दुरूह क्षेत्र हजारों साल से अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जूझता रहा है। रूस, चीन, ईरान, पाकिस्तान और भारत जैसे बड़े पड़ोसियों के अलावा अमेिरका के हित भी इस इलाके से जुड़े हैं। अफगानिस्तान में लड़ रही अमेरिकी फौजों के लिए रसद किर्गिस्तान से होकर जाती है। किर्गिस्तान की किंवदंतियों का नायक है मनस जिसने यहाँ के चालीस कबीलों को एकत्र कर शत्रु से लोहा तिया था। किगिर्स्तान के राष्ट्रीय ध्वज में 40 किरणों वाला सूर्य उसका प्रतीक है।

एक ज़माने में इस क्षेत्र पर बौद्ध प्रभाव था। अरबों के हमलों के बाद इस्लाम आया। बोल्शेविक क्रांति के बाद यह इलाका रूस के अधीन रहा। इस दौरान यहाँ की जातीय संरचना में बदलाव हुआ। इधर के लोग उधर भेजे गए। किर्गिस्तान के दक्षिण में उज्बेकिस्तान है। देश के दक्षिणी इलाके में उज्बेक आबादी ज्यादा है, हालांकि अल्पसंख्यक है। सोवियत संघ के विघटन के बाद इस इलाके में आलोड़न-विलोड़न चल रहा है।

किर्गिस्तान मे लोकतांत्रिक सरकार भ्रष्टाचार और अकुशलता के आरोपों से घिरी रही है। पिछले अप्रेल में सेना की मदद से एक सत्ता परिवर्तन हुआ है। इसके साथ ही अचानक जातीय दंगे शुरू हो गए। शायद सत्ता के प्रतिष्ठान से जुड़ी ताकतों का खेल है। इधर रूस का व्यवहार आश्चर्यजनक है। वह सैनिक हस्तक्षेप करने से कतरा रहा है। इस इलाके की सुरक्षा के लिए एक संधि है, जिसका प्रमुख रूस ही है। रूस की हिचक के कई माने हैं। अफगानिस्तान के अनुभव के बाद वह शायद कहीं अपनी सेना भेजने से डरता है। या फिर किर्गिस्तान की वास्तविकता को समझने में समय ले रहा है।

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