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Thursday, April 2, 2026

बंगाल माँगे एक और ‘पोरिबोर्तोन!’

पिछले सात-दशक के घटनाक्रम पर नजर डालें, तो साफ दिखाई पड़ता है कि पश्चिम बंगाल में हिंसा का नाम राजनीति और राजनीति के मायने हिंसा हो गए हैं।  2011 में अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को जबर्दस्त जीत दिलाकर जब ममता बनर्जी सत्ता के रथ पर सवार हुईं थीं, तब उनका ध्येय-वाक्य था ‘पोरिबोर्तोन।’ आज भारतीय जनता पार्टी का भी यही ध्येय-वाक्य है। वे परिवर्तन का नारा लेकर सफल हुई थीं, क्योंकि बंगाल की जनता वामपंथी तौर तरीकों से परेशान हो गई थी। वह बदलाव चाहती थी।

ममता बनर्जी कम से कम तीन कारणों से अपना रौब-दाब कायम रखने में अब तक सफल हुई हैं: एक, जुझारू छवि, दो, कल्याणकारी कार्यक्रम और तीन, सांप्रदायिक झुकाव। अपनी जुझारू छवि क उन्होंने केंद्र से विरोध को जोड़कर रखा है। मतदाता सूचियों में गहन संशोधन की प्रक्रिया का जिस स्तर का विरोध उन्होंने किया है, वह अभूतपूर्व है। इसके अलावा उन्होंने राज्य में केंद्र सरकार द्वारा घोषित कल्याण कार्यक्रमों का प्रवेश वस्तुतः पूरी तरह रोक रखा है।

आगामी चुनाव में वे भवानीपुर सीट से खड़ी हुई हैं, जहाँ उनके मुकाबले बीजेपी के सुवेंदु अधिकारी खड़े हैं, जिन्होंने 2021 में उन्हें नंदीग्राम से अपमानजनक हार दी थी। इस वर्ष रमज़ान और नवरात्र एक साथ थे। दोनों प्रत्याशियों ने अपने अभियान की शुरुआत अपने-अपने सांकेतिक तरीकों से की। ममता बनर्जी कोलकाता के रेड रोड पर ईद-उल-फ़ित्र की नमाज में शामिल हुईं, और सुवेंदु अधिकारी कालीघाट मंदिर गए।

ममता बनर्जी के पिछले 15 साल के कार्यकाल को देखें, तो यह बात आसानी से समझ में आ जाएगी। इनमें से पहले से चली आ रही कुछ बातों को उन्होंने अपनाया और कुछ का आविष्कार किया। उनकी राजनीति की शुरुआत शहरों से हुई थी। बंगाल के शहरों में रहने वाला मध्य वर्ग, वामपंथी राजनीति से आजिज़ आ गया था। वही मध्यवर्ग आज ममता से नाराज़ नजर आता है, क्या गाँवों में भी यही स्थिति है?

अब जब विधानसभा चुनाव सिर पर आ गए हैं, सवाल किया जा रहा है कि क्या भारतीय जनता पार्टी, राज्य में एक और बड़े परिवर्तन की सूत्रधार बनेगी? क्या परिस्थितियाँ 2011 जैसी हैं? वामपंथी दलों के 34 साल के शासन की अभेद्य नज़र आने वाली दीवार को ममता ने तोड़ा था। अब ममता के शासन के भी 15 साल हो रहे हैं। क्या उनकी विदाई होगी? क्या ऐसा संभव है?