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Thursday, May 2, 2019

ताकत यानी पावर का नाम है राजनीति!

समय के साथ राजनीति में आ रहे बदलावों पर क्या आपने ध्यान दिया है? कुछ साल पहले सायास और अनायास मुझे कुछ ऐसे लोगों से मिलने का मौका लगा, जो ऊँचे खानदानों से वास्ता रखते हैं और राजनीति में आना चाहते हैं। उन्होंने जो रास्ता चुना, वह जनता के बीच जाने का नहीं है। उनका रास्ता पार्टी-प्रवक्ता के रूप में उभरने का है। उन्हें मेरी मदद की दो तरह से दरकार थी। एक, राजनीतिक-सामाजिक मसलों की पृष्ठभूमि को समझना और दूसरे मुहावरेदार हिन्दी बोलने-बरतने में मदद करना। सिनेमा के बाद शायद टीवी दूसरा ऐसा मुकाम है, जहाँ हिन्दी की बदौलत सफलता का दरवाजा खुलता है।

पिछले एक दशक में राजनीतिक दलों के प्रवक्ता बनने का काम बड़े कारोबार के रूप में विकसित हुआ है। पार्टियों के भीतर इस काम के लिए कतारें हैं। मेरे विस्मय की बात सिर्फ इतनी थी कि मेरा जिनसे भी सम्पर्क हुआ, उन्हें अपने रसूख पर पूरा यकीन था कि वे प्रवक्ता बन जाएंगे, बस उन्हें होमवर्क करना था। वे बने भी। इससे आप राजनीतिक दलों की संरचना का अनुमान लगा सकते हैं। सम्बित महापात्रा का उदाहरण आपके सामने है। कुछ साल पहले तक आपने इनका नाम भी नहीं सुना था।

Sunday, March 24, 2019

दानिस्ता ने वीडियो न बनाया होता तो...?


21 मार्च को होली के दिन गुरुग्राम के भूपसिंह नगर के रहने वाले मोहम्मद साजिद के परिवार ने अपने आसपास के समाज का ऐसा भयानक चेहरा देखा जिससे वे ख़ौफ़ में हैं. इस खौफ के खिलाफ नागरिक समाज ने अपनी नाराजगी व्यक्त की है. यह नाराजगी इतनी असरदार नहीं होती या शायद होती ही नहीं, अगर इस हिंसा का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल न हुआ होता. इस वीडियो के कारण बड़ी संख्या में लोगों की अंतरात्मा को ठेस लगी. यह क्या हो रहा है?  

मीडिया का असर है कि हमारी भावनाएं भड़कने में देर नहीं लगती है. और हमें मानवीयता का एहसास भी किसी दूसरे वीडियो से होता है. नब्बे के दशक में जब महम की हिंसा का वीडियो पहली बार सामने आया था, तब हमें लगा कि राजनीति में यह क्या हो रहा है. वस्तुतः हमने पहली बार उसकी तस्वीरें देखी थीं, हो तो वह काफी पहले से रहा था. आरक्षण के विरोध में आत्मदाह करने की पहले वीडियो ने काफी बड़े वर्ग को व्यथित कर दिया था. फिर हाल के वर्षों में हमें दलितों की पिटाई के वीडियो देखने को मिले हैं. गोरक्षकों की हिंसा और मॉब लिंचिंग के वीडियो भी बड़ी संख्या में सामने आए हैं. इन वीडियो के राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए ऐसे फर्जी वीडियो भी सामने आए हैं, जिनका उद्देश्य किसी एक खास तबके की भावनाओं को भड़काना होता है. यह खेल अभी चलेगा, क्योंकि चुनाव करीब हैं.

Sunday, March 3, 2019

क्या यह सिर्फ मीडिया का स्वांग था?


http://epaper.haribhoomi.com/?mod=1&pgnum=1&edcode=75&pagedate=2019-03-03
पिछले पखवाड़े भारत-पाकिस्तान टकराव का एक और दौर पूरा हो गया। इस दौरान सीमा के दोनों तरफ के मीडिया का एक और चिंतनीय चेहरा सामने आया है। मीडिया ने हमारे विमर्श का एजेंडा तय करना शुरू कर दिया है, जबकि वह खुद संशयों का शिकार है। वह अपने थिएटरी निष्कर्षों को दर्शकों के दिलो-दिमाग में डाल रहा है। यह बात पिछले एक पखवाड़े के घटनाक्रम से समझी जा सकती है। शुक्रवार देर रात तक टीवी से चिपके लोगों को एंकर और रिपोर्टर समझाते रहे कि अभिनंदन अब आए, अब आने वाले हैं, आते ही होंगे वगैरह। बहरहाल जब वे आए वाघा सीमा पर मौजूद भीड़ से मुखातिब होने का मौका उन्हें नहीं मिला। क्यों हुआ इतना लम्बा ड्रामा? 

Sunday, November 5, 2017

स्वांग रचती सियासत


पिछले मंगलवार को संसद भवन में सरदार पटेल के जन्मदिवस के सिलसिले में हुए समारोह की तस्वीरें अगले रोज के अखबारों में छपीं। ऐसी तस्वीरें भी थीं, जिनमें राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के सामने से होकर गुजरते नजर आते हैं। कुछ तस्वीरों से लगता था कि मोदी की तरफ राहुल तरेर कर देख रहे हैं। यह तस्वीर तुरत सोशल मीडिया में वायरल हो गई। यह जनता की आम समझ से मेल खाने वाली तस्वीर थी। दुश्मनी, रंज़िश और मुकाबला हमारे जीवन में गहरा रचा-बसा है। मूँछें उमेठना, बाजुओं को फैलाना, ताल ठोकना और ललकारना हमें मजेदार लगता है।
जाने-अनजाने हमारी लोकतांत्रिक शब्दावली में युद्ध सबसे महत्वपूर्ण रूपक बनकर उभरा है। चुनाव के रूपक संग्राम, जंग और लड़ाई के हैं। नेताओं के बयानों को ब्रह्मास्त्र और सुदर्शन चक्र की संज्ञा दी जाती है। यह आधुनिक लोकतांत्रिक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं लगती, बल्कि महाभारत की सामंती लड़ाई जैसी लगती है। इस बात की हम कल्पना ही नहीं करते कि कभी सत्तापक्ष किसी मसले पर विपक्ष की तारीफ करेगा और विपक्ष किसी सरकारी नीति की प्रशंसा करेगा।

Monday, May 2, 2016

मीडिया की छीछालेदर भी ठीक नहीं

क्या पैसे से ‘मैनेज’ होता है हमारा मीडिया?
फाइल

अगस्ता वेस्टलैंड डील

क्या पैसे से ‘मैनेज’ होता है हमारा मीडिया?


  • राजनीति और पत्रकारिता दोनों साथ चलते हैं. नेता और पत्रकार का चोली-दामन का साथ है. वे एक-दूसरे के साथ मिल बैठकर बातें करते हैं, पर यह तेल-पानी का रिश्ता है.
  • अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में कथित रूप से 20 पत्रकारों को घूस देने के मामले में सत्ताधारी दल के नेता इशारों में पूरी मीडिया को निशाना बना रहे हैं.
  • यह सत्ताधारी नेताओं की जिम्मेदारी और ईमानदारी का तकाजा है कि वे दागी पत्रकारों के नाम उजागर करें न कि अपरोक्ष तरीके से पूरी मीडिया की बांह मरोड़ें.

अगस्ता-वेस्टलैंड मामले में एक दस्तावेज सामने आया है जो बताता है कि इतालवी कंपनी ने इस सौदे को मीडिया की नजरों से बचाने के लिए तकरीबन 50 करोड़ रुपए आवंटित किए थे.
दस्तावेज की प्रामाणिकता कितनी है पता नहीं, पर यह आरोप गम्भीर है. भाजपा की सांसद मीनाक्षी लेखी ने इस मामले को लोकसभा में उठाया. संसद के बाहर भी इसकी काफी चर्चा है.
बताया जा रहा है कि बीस पत्रकारों को लाभ दिया गया. एक पत्रकार से पूछताछ भी की गई है. क्या वास्तव में भारत के मीडिया को ‘मैनेज’ किया गया? क्या उसे ’मैनेज’ किया जा सकता है?
यह नए किस्म का आरोप है. भारतीय मीडिया के बारे में कई तरह की शिकायतें थीं, पर यह सबसे अलग किस्म की शिकायत है.
लगता नहीं कि मुख्यधारा की पत्रकारिता से इसका रिश्ता है. इस तरह की बातें मीडिया की साख कम करती हैं. बहरहाल इनका सच सामने आना चाहिए. सरकार पर इसकी जिम्मेदारी है. इसकी तह तक जाना जरूरी है. ऐसा न हो कि यह भी रहस्य बना रह जाए.
न जाने क्यों इसे लेकर मुख्यधारा के मीडिया में खामोशी है. जबकि सोशल मीडिया में शोर है. यह स्थिति अच्छी नहीं है. मीडिया को सवालों से भागना नहीं, जूझना चाहिए.
प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड और ब्रॉडकास्टिंग मीडिया के सम्पादकों की संस्थाओं को आगे बढ़कर पड़ताल करनी चाहिए. यह कुछ व्यक्तियों की बात नहीं मीडिया की प्रतिष्ठा का सवाल है.
हम उस दौर में हैं जब पत्रकारिता के लिए ‘प्रेस्टीट्यूड’ जैसे शब्द ईजाद हुए हैं. सम्भव है यह व्यक्तिगत कुंठा हो या राजनीति का हिस्सा हो. पर इससे समूची पत्रकारिता निशाने पर आ गई है.
आज पत्रकारिता के लिए ‘प्रेस्टीट्यूड’ जैसे शब्द ईजाद हो गए हैं
माना कि हाल के वर्षों में मूल्य-बद्ध पत्रकारिता में गिरावट आई है. पर सामान्य युवा पत्रकार ईमानदारी के साथ इस काम से जुड़ता है. इस पर होने वाले हमलों से उसका विश्वास टूटता है.
दरअसल राजनीति और समाज के समांतर मीडिया भी ध्रुवीकरण का शिकार हो रहा है. खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े लोगों की राजनीतिक वरीयताएं साफ दिखाई देने लगी हैं.
राजनीति और पत्रकारिता दोनों साथ चलते हैं. नेता और पत्रकार का चोली-दामन का साथ है. वे एक-दूसरे के साथ मिल बैठकर बातें करते हैं, पर यह तेल-पानी का रिश्ता है. दोनों को अलग-अलग रास्तों पर जाना होता है. यह पहला मौका नहीं है जब पत्रकारों पर ऐसे आरोप लगे हैं.
लोकतांत्रिक विकास के साथ पत्रकारिता एक स्वतंत्र पर्यवेक्षक के रूप में खुद सामने आई थी. उसे किसी राज-व्यवस्था ने स्थापित नहीं किया था. उसकी ताकत थी पाठक के मन में बैठी साख. राज-व्यवस्था और नागरिक–व्यवस्था के बीच सम्पर्क-सेतु है पत्रकारिता. उसके मूल्य खत्म होने वाले नहीं हैं. यह विचलन समय की बात है. इसे ठीक होना होगा.
आपराधिक गठजोड़ में पत्रकारिता का नाम जुड़ना एक खतरनाक स्थिति की तरफ इशारा करता है. पत्रकारिता के बुनियादी मूल्य जिन बातों का पर्दाफाश करने के पक्षधर हैं, उनमें ही पलीता लग गया है. यह सब एकतरफा नहीं है.
पिछले कुछ साल के घटनाक्रम पर गौर करें तो कुछ पत्रकारों और मीडिया हाउसों पर संगीन आरोप भी लगे हैं. बावजूद इसके समूची पत्रकारिता पर उंगली उठाना गलत है. राजनीतिक दलों ने पत्रकार को पर्यवेक्षक के बजाय दोस्त या दुश्मन समझना शुरू कर दिया है.
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उदय के साथ यह द्वंद्व बढ़ा है. वह सत्ता की सीढ़ी चढ़ने-उतरने का माध्यम बन गया है. पत्रकार राजनीति का भागीदार बनना चाहता है. नेताओं की तरह अमीर.
पिछले साल पेट्रोलियम मंत्रालय के कुछ गोपनीय दस्तावेजों के मामले को लेकर एक पत्रकार की गिरफ्तारी हुई थी. गिरफ्तार किए गए पत्रकार ने पेशी पर ले जाए जाते वक्त कहा था कि पेट्रोलियम मंत्रालय में 10 हजार करोड़ रुपए का घोटाला है.
यह भी कि उसे फंसाया जा रहा है. क्या हुआ उस मामले का? यह जिम्मेदारी मीडिया और सरकार दोनों की थी कि जनता को सच्चाई से अवगत कराते.
उसके पहले अगस्त-सितम्बर 2012 में कोयला खानों का मामला खबरों में था. उन दिनों सरकारी सूत्रों से खबर आई थी कि कोल ब्लॉक आबंटन में कम से कम चार मीडिया हाउसों ने भी लाभ लिया. इनमें तीन प्रिंट मीडिया और एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल बताया गया था.
उन्हीं दिनों एक व्यावसायिक विवाद में एक चैनल-सम्पादक की गिरफ्तारी हुई. ‘पेड न्यूज’ की प्रेत-बाधा ने पहले ही मीडिया को घेर रखा है. मीडिया के अपने अंतरविरोध हैं. उसकी साख गिर रही है. यह बात लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं है. 
मीडिया के अपने अंतरविरोधों की वजह से उसकी साख गिर रही है
देश में सन 2010 के बाद से भ्रष्टाचार के खिलाफ जो माहौल बना उसमें मीडिया की भी बड़ी भूमिका थी. मीडिया के असंतुलन की वजह से माहौल बना ‘सब चोर हैं.’
अन्ना हजारे का आंदोलन वस्तुतः मीडिया की लहरों पर खड़ा हुआ था. उस आंदोलन से निकली राजनीति को भी उसी मीडिया से शिकायत रही, जिसने उसे खड़ा किया. दो साल पहले अरविन्द केजरीवाल ने मीडिया वालों को जेल भेजने की धमकी दी थी.
बाद में उन्होंने अपनी बात को घुमा दिया, पर सच यह है कि राजनेता को मीडिया तभी भाता है, जब वह उसके मन की बात कहें. पर पत्रकार को अपने पाठक का भरोसा चाहिए नेता का नहीं.

Tuesday, July 21, 2015

इमोजी यानी पढ़ो नहीं देखो, मन के भावों की भाषा

पढ़ना और लिखना बेहद मुश्किल काम है. इंसान ने इन दोनों की ईज़ाद अपनी जरूरतों के हिसाब से की थी. पर यह काम मनुष्य की प्रकृति से मेल नहीं खाता. भाषा का विकास मनुष्य ने किस तरह किया, यह शोध का विषय है. भाषाएं कितने तरह की हैं यह जानना भी रोचक है. पर यह सिर्फ संयोग नहीं कि दुनिया भर में सबसे आसानी से चित्र-लिपि को ही पढ़ा और समझा जाता है. सबसे पुरानी कलाएं प्रागैतिहासिक गुफाओं में बनाए गए चित्रों में दिखाई पड़ती हैं. और सबसे आधुनिक कलाएं रेलवे स्टेशनों, सार्वजनिक इस्तेमाल की जगहों और हवाई अड्डों पर आम जनता को रास्ता दिखाने वाले संकेत चिह्नों के रूप में मिलती हैं. इन्हें दुनिया के किसी भी भाषा-भाषी को समझने में देर नहीं लगती.

देखना मनुष्य की स्वाभाविक क्रिया है. कम्प्यूटर को लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका उसकी भाषा और मीडिया की है. पर कम्प्यूटर अपने साथ नई भाषा लेकर भी आया है. मीडिया हाउसों के लिए सन 1985 में ऑल्डस कॉरपोरेशन ने जब अपने पेजमेकर का पहला वर्ज़न पेश किया तब इरादा किताबों के पेज तैयार करने का था. उन्हीं दिनों पहली एपल मैकिंटॉश मशीनें तैयार हो रहीं थीं, जो इस लिहाज से क्रांतिकारी थीं कि उनकी कमांड स्क्रीन पर देखकर दी जाती थीं. ये कमांड की-बोर्ड की मदद से दी जा रहीं थीं और माउस की मदद से भी.

Monday, May 4, 2015

'स्क्रीन' के बंद होने पर विष्णु खरे का रोचक लेख

सिनेमा का साप्ताहिक अखबार 'स्क्रीन' भी  बंद हो गया. एक ज़माने में मुम्बई कारखाने से निकलने वाली ज्यादातर फिल्मों की सूचना तब तक खबर नहीं बनती थी, जबतक वह स्क्रीन में न छप जाए. स्क्रीन में कई-कई पेज के विज्ञापन देकर निर्माता अपने आगमन की घोषणा करते थे. बहरहाल समय के साथ चीजों का रूपांतरण होता है. अलबत्ता यह जानकारी 3 मई के नवभारत टाइम्स में विष्णु खरे के लेख से मिली. खरे जी का लिखा पढ़ने का अपना निराला आनन्द है. यह लेख नवभारत टाइम्स से निकाल कर यहाँ पेश है. लेख के अंत में वह लिंक भी है जो आपको अखबार की साइट पर पहुँचा देगा.
एक छपे रिसाले के लिए विलंबित मर्सिया                
विष्णु खरे 

आज से साठ वर्ष पहले अपने पैदाइशी कस्बे छिन्दवाड़ा में गोलगंज से छोटीबाज़ार जाने वाले रास्ते के नाले की बगल में एक नए खुले पान-बीड़ी के ठेले पर उसे झूलते देख कर मैं हर्ष विस्मित रह गया था. घर पर (एक दिन पुराना डाक एडीशन) ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’, ’इलस्ट्रेटेड वीकली’ और ‘धर्मयुग’ नियमित आते थे, हिंदी प्रचारिणी लाइब्रेरी में और कई हिंदी-अंग्रेज़ी पत्र-पत्रिकाएँ देखने-पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त था, लेकिन वह अंग्रेज़ी अखबार-सा दीखनेवाला जो एक रस्सी से लटका फड़फड़ा रहा था, एक युगांतरकारी, नई चीज़ थी. क्या किसी दैनिक से लगनेवाले इंग्लिश साप्ताहिक का नाम ‘’स्क्रीन’’ हो सकता था ? और जिसके हर एक पन्ने पर सिवा फिल्मों, सिनेमा, उनके इश्तहार ,एक्टर, एक्ट्रेस, उनके एक-से-एक शूटिंग या ग़ैर-शूटिंग फोटो वगैरह के और कुछ न हो ? खुद जिसका नाम सेल्युलॉइड की रील के टुकड़ों की डिज़ाइन में छपा हुआ हो ? मुझे पूरा यकीन है कि उसे सबसे पहले हासिल करने के लिए जिस रफ़्तार से दौड़ कर मैं घर से चार आने लाया था उसे तब रोजर बैनिस्टर या आज ओसैन बोल्ट भी छू नहीं पाए होंगे.

Friday, March 27, 2015

इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है

बिहार के जिस स्कूल में हो रही नकल की फोटो हाल में मीडिया ने प्रचारित की थी उसके बारे में आज के इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। इसके अनुसार 1700 छात्रों के स्कूल में गणित के केवल दो अध्यापक हैं। इस तस्वीर ने हमारी शिक्षा प्रणाली और मीडिया की भी बखिया उधेड़ कर रख दी है। बेशक मीडिया की सनसनी की प्रवृत्ति के कारण यह तस्वीर सामने आई, पर उसकी उदासीनता के कारण ही तो बरसों से यह हो रहा था। बावजूद इसके शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन की खराब स्थिति पर खबरें लगभग न के बराबर आती हैं।

हमारी शिक्षा की वास्तविक तस्वीर शिक्षा से सम्बद्ध वास्तविकता पर नजर रखने वाले संगठन प्रथम के सर्वेक्षणों से उजागर होती है। हम जितनी भयावह स्थिति समझते हैं वह उससे भी ज्यादा भयावह है। दूसरी ओर हमारा मीडिया इस तस्वीर के सनसनीखेज पहलू तक ही सीमित है। पता नहीं किसी और अखबार ने वास्तविकता को सामने लाने की कोशिश की या नहीं पर कम से कम इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता दीपू सेबास्टियन एडमंड्स ने तस्वीर के दूसरे पहलू को भी सामने रखा है। उन अखबारों ने क्या किया जिनके हाथ यह तस्वीर लग गई थी। फोटोग्राफर का नाम तक नहीं दिया गया।

What photo didn't show...
हिन्दू में फोटोग्राफर के बारे में खबर
शिक्षा की गुणवत्ता पर मेरी पुरानी पोस्ट

Wednesday, March 25, 2015

कांग्रेस का मीडिया मेकओवर

कांग्रेस ने मंगलवार 25 मार्च को 21 पार्टी प्रवक्ताओं की नई सूची जारी की। इनमें 17 प्रवक्ता और 4 सीनियर प्रवक्ता हैं। इसके अलावा 31 लोगों को मीडिया और टीवी चैनलों के पैनल में कोऑर्डिनेट करने की जिम्मेदारी दी गई है। पूर्व प्रवक्ता अजय माकन को सीनियर प्रवक्ता बनाए रखा है। मीडिया पैनलिस्ट में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी को शामिल किया गया है। वह टीवी चैनलों पर कांग्रेस का पक्ष रखेंगी। पार्टी ने हाल में रणदीप सुरजेवाला को अपने जनसम्पर्क विभाग का प्रमुख बनाया है। पार्टी की योजना अब बड़े स्तर पर जनसम्पर्क अभियान चलाने की है। इस टीम में मीडिया पैनेलिस्टों को छांटने में खासी मशक्कत की गई लगती है।

इतनी भारी-भरकम प्रवक्ता टीम पहली बार घोषित की गई है। इसमें बड़ी संख्या में राहुल गांधी के करीबी लोग शामिल हैं। इनकी औसत उम्र 40 साल है। टीम में दो महत्वपूर्ण नाम नहीं दिखाई पड़े। पहला नाम है जयराम रमेश का और दूसरा शशि थरूर का। शशि थरूर कई कारणों से विवादास्पद हो गए थे, पर जयराम रमेश तो अच्छे प्रवक्ता माने जाते रहे हैं। लगता है वे किसी और महत्वपूर्ण काम को सम्हालने जा रहे हैं। एक और महत्वपूर्ण नाम राशिद अल्वी का है जो इस सूची में नहीं है। सूची को देखने पर यह भी नजर आता है कि पार्टी अपने मेकओवर में प्रवक्ताओं को महत्व दे रही है। जितने संगठित तरीके से यह टीम घोषित की गई है यह पार्टी के इतिहास में पहली बार होता लगता है।

इन नामों पर गौर करें तो काफी बड़ी संख्या युवाओं की है, पर वरिष्ठ और अनुभवी नेता भी इनमें शामिल हैं। वरिष्ठ नेताओं की संतानों को भी इनमें जगह दी गई है। मसलन दीपेंद्र हुड्डा, आरपीएन सिंह, शर्मिष्ठा मुखर्जी, सलमान सोज़, परिणीति शिंदे, सुष्मिता देव, अमित देशमुख, रश्मिकांत, गौरव गोगोई वगैरह।

अजय माकन, सीपी जोशी, सत्यव्रत चतुर्वेदी और शकील अहमद को सीनियर प्रवक्ता के तौर पर शामिल किया है। इसके अलावा पार्टी के सीनियर प्रवक्ताओं में आनंद शर्मा, गुलाम नबी आजाद, मुकुल वासनिक, पी चिदंबरम और सलमान खुर्शीद पहले से ही शामिल हैं। इस सूची के घोषित होने के बाद मीडिया को अभी यह बताने वाला कोई नहीं है कि राहुल गांधी कहाँ हैं और कब आने वाले हैं।

यह है पूरी लिस्ट

सीनियर प्रवक्ता- आनंद शर्मा, गुलाम नबी आजाद, मुकुल वासनिक, पी चिदंबरम, सलमान खुर्शीद,अजय माकन, सीपी जोशी, सत्यव्रत चतुर्वेदी, शकील अहमद।

प्रवक्ता- अभिषेक सिंघवी, अजय कुमार, ज्योतिरादित्य सिंधिया, पी सी चाको, राज बब्बर, रीता बहुगुणा जोशी, संदीप दीक्षित, संजय झा, शक्ति सिंह गोहिल और शोभा ओझा की मौजूदा टीम के अतिरिक्त पार्टी प्रवक्ता होंगे भक्त चरणदास, दीपेंद्र हुड्डा, दिनेश गुंडूराव, गौरव गोगोई, खुशबू सुंदर, मधु गौड़, मीम अफजल, प्रियंका चतुर्वेदी, पीएल पुनिया, राजीव गौड़ा, राजीव सत्व, रजनी पाटिल, आरपीएन सिंह, सुष्मिता देव, टॉम वडक्कन, विजेंद्र सिंगला।

मीडिया पैनलिस्ट- अखिलेश प्रताप सिंह, आलोक शर्मा, एमी याग्निक, अमित देशमुख, अनंत गाडगिल, अशोक तंवर, बालचंद्र मुंगेरकर, ब्रजेश कलप्पा, चंदन यादव, चरण सिंह सापरा, सीआर केशवन, देवव्रत सिंह, हुसैन दलवी, जगवीर शेरगिल, जीतू पटवारी, मनीष तिवारी, मुकेश नायक, नदीम जावेद, नासिर हुसैन, प्रेमचंद मिश्रा, परणीति शिंदे, रागिनी नायक, राजीव शुक्ला, रंजीता रंजन, रश्मिकांत, सलमान सोज, संदीप चौधरी, संजय निरुपम, शर्मिष्ठा मुखर्जी, डॉ विष्णु।


Monday, March 9, 2015

बलात्कार को लेकर भारत के खिलाफ क्या कोई वैश्विक साजिश है?

निर्भया मामले को लेकर बीबीसी की डॉक्यूमेट्री पर पाबंदी के विरोध में मेरे एक लेख का लिंक फेसबुक पर प्रकाशित करने पर कई पाठकों की प्रतिक्रिया से लगा कि वे इस देश की प्रतिष्ठा का प्रश्न मानते हैं। एक पाठक ने लिखा, 'जोशी जी कभी अपने समाज और देश के हित में भी सोचें। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि देश के खिलाफ बोलने लगें।'  इस आशय के विचार उन सब लोगों ने व्यक्त किए हैं जो डॉक्यूमेंट्री पर पाबंदी लगाने के पक्षधर हैं। मेरी धारणा शुद्ध रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल्यों पर आधारित है। मैं मानता हूँ कि यह स्वतंत्रता हमारे समाज के हित में है। 

इधर नीति सेंट्रल वैबसाइट ने एक विश्लेषण पेश किया है कि  क्या वजह है कि भारत में रेप की एक घटना सारी दुनिया में चर्चा का विषय बन जाती है। दिल्ली में एक कैब में हुआ बलात्कार न्यूयॉर्क टाइम्स की सुर्खी बन जाता है। वह भी तब जब दुनिया में बलात्कार के मामलों में भारत का स्थान काफी नीचा यानी 94 वें स्थान पर है, जबकि अमेरिका का नम्बर 14वाँ है। नीति सेंट्रल का विश्वास है कि यह सब वैश्विक ईसाई समुदाय से भारत के नाम पर चंदा वसूली के वास्ते हो रहा है। इस लेख के अनुसार भारत धर्मांतरण अभियान का महत्वपूर्ण देश है। इसने अपनी बात के पक्ष में वील ऑफ टियर्स फिल्म का हवाला भी दिया है।   

यह इस बात का एक दूसरा पहलू है। मेरे पास इस आरोप की पुष्टि या खंडन करने के आधार नहीं हैं और न मैं इस आरोप का समर्थन करता हूँ। बीबीसी की फिल्म पर पाबंदी लगाने के लिए यह उचित आधार भी नहीं है। अलबत्ता इस बात को पढ़ने और छानबीन करने लायक मानता हूँ। यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि नीति सेंट्रल, मीडिया क्रुक्स और अंग्रेजी दैनिक पायनियर बीजेपी के पक्षकार हैं। मैं यह भी नहीं कहता कि बीजेपी के पक्ष को पढ़ा या सुना नहीं जाना चाहिए। हमें अपनी जानकारी का स्तर बढ़ाना चाहिए और ऑब्जेक्टिव तरीके से चीजों को देखना चाहिए। इस विषय पर और भी पढ़ना चाहें तो कुछ लिंक नीचे दिए हैं।

नीति की साइट पर इस विषय को लेकर विश्लेषण

Thursday, June 26, 2014

पत्रकारों को निशाना बनाना खतरनाक है

बेहद खतरनाक है पत्रकारों को सजा देना, पढें वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी का विश्लेषण...

पश्चिम एशिया में लोकप्रिय अंग्रेजी चैनल अल-जजीरा के पत्रकारों को मिस्र में सजा सुनाए जाने के बाद दुनिया भर के पत्रकारों की पहली प्रतिक्रिया सदमे और सन्नाटे की है। इतने बड़े स्तर पर पत्रकारों को सजा देने का यह पहला मामला है।  बावजूद इसके हमारे देश में इस खबर पर ज्यादा चर्चा नहीं है। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह बात है कि हाल में भारतीय मीडिया के राजनीतिक झुकाव को लेकर उस पर हमले होने लगे हैं। उसकी साख को कायम रखने का सवाल है। दूसरी ओर पिछले तीन-चार साल में पत्रकारों की राजनीतिक और व्यावसायिक भूमिका को लेकर हमारे यहां ही नहीं दुनिया भर में जबर्दस्त टिप्पणियाँ हुईं हैं।

Friday, December 20, 2013

सूचना की आँधी, बहस का शोर

तमाम विफलताओं के बावजूद विस्तार की राह पर है मीडिया

दिल्ली में विधानसभा चुनाव की गतिविधियाँ तब शुरू ही हुईं थीं। एक दिन अचानक मोबाइल फोन की घंटी बजी। ‘हेलो मैं अरविंद केजरीवाल बोल रहा हूँ। फोन काटिए मत यह रिकॉर्डेड मैसेज है.....।’ अपनी बात कहने का यह एक नया तरीका था। यह एक शुरुआत थी। इसके बाद इस किस्म के तमाम फोन और एसएमएस आए। ऐसे फोन भी आए, जिनमें अरविंद केजरीवाल या उनकी पार्टी के खिलाफ संदेश था। इसमें दो राय नहीं कि इन चुनावों में ‘न्यू मीडिया’ का जबरदस्त हस्तक्षेप था। ईआरआईएस ज्ञान फाउंडेशन और भारतीय इंटरनेट एवं मोबाइल संघ द्वारा कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2014 में होने वाले अगले आम चुनाव में सोशल मीडिया लोकसभा की 160 सीटों को प्रभावित करेगा। यह बात इन विधानसभा चुनावों में दिखाई भी दी। अध्ययन में कहा गया है कि अगले आम चुनाव में लोकसभा की कुल 543 सीटों में से 160 अहम सीटों पर सोशल मीडिया का प्रभाव रहने की संभावना है, जिनमें महाराष्ट्र में सबसे हाई इम्पैक्ट वाली 21 सीटें और गुजरात में 17 सीटें शामिल है। आशय उन सीटों से है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में विजयी उम्मीदवार के जीत का अंतर फेसबुक का प्रयोग करने वालों से कम है अथवा जिन सीटों पर फेसबुक का प्रयोग करने वालों की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या का 10 प्रतिशत है।

Monday, October 14, 2013

इंटरनेशनल हैरल्ड ट्रिब्यून अब न्यूयॉर्क टाइम्स बना

अंतरराष्ट्रीय खबरों के लिए दुनिया के सबसे मशहूर अखबार इंटरनेशनल हैरल्ड ट्रिब्यून का आज आखिरी अंक प्रकाशित हुआ। कल यानी 15 अक्टूबर से यह नए नाम इंटरनेशनल न्यूयॉर्क टाइम्स नाम से निकलेगा। यह इस अखबार का पहली बार पुनर्नामकरण संस्कार नहीं हुआ ङै। न्यूयॉर्क हैरल्ड नाम के अमेरिकी अखबार ने सन 1887 में जब अपना यूरोप संस्करण शुरू किया तो उसका नाम रखा न्यूयॉर्क हैरल्ड ट्रिब्यून, जो बाद में इंटरनेशनल हैरल्ड ट्रब्यून बना।  इंटरनेशनल न्यूयॉर्क टाइम्स बनने का मतलब है कि यह अब पूरी तरह न्यूयॉर्क टाइम्स की सम्पत्ति हो गया है। कुछ साल पहले तक यह अखबार वॉशिंगटन पोस्ट के सहयोग से चल रहा था। इंटरनेशनल हैरल्ड ट्रिब्यून का एक भारतीय संस्करण हैदराबाद से निकलता था, जिसे डैकन क्रॉनिकल निकालता था। हालांकि भारत से विदेशी प्रकाशन को निकालना सम्भव नहीं है, पर कई प्रकार की जटिल जुगत करके इसे निकाला जा रहा था और इसके सम्पादक एमजे अकबर थे। यह संस्करण कल से नहीं मिलेगा। 

सन 2007 के वीडियो में देखिए किस तरह तैयार होता था इंटरनेशनल हैरल्ड ट्रिब्यून

Friday, August 16, 2013

प्रधानमंत्री बनाम मोदी पर मीडिया

प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश के जवाब में नरेन्द्र मोदी के भाषण के बारे में अखबारों की कवरेज में खासी विविधता है। स्वतंत्रता दिवस का अवकाश होने के कारण देश के कई इलाकों में अखबार नहीं निकले, इसलिए उस स्तर पर कवरेज नहीं हुई जितनी सामान्य दिनों में होती है। दो-तीन बातें मुझे समझ में आईं जिनका विवरण मैं देना चाहता हूँ।

1. इस विषय पर सम्पादकीय टिप्पणी केवल अंग्रेजी के कुछ अखबारों में देखने को मिली। हिन्दी के अखबार ऐसे विषयों पर सम्पादकीय लिखने से बचते हैं, जिनमें राजनीतिक जोखिम हो।

2. हिन्दी के अखबारों ने पेज एक पर खबर देने में भी सावधानी बरती है। अलबत्ता नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान ने लगभग एक जैसे शीर्षक के साथ खबर दी है। नवभारत टाइम्स की लीड है 'अटैक कर घिर गए मोदी।' हिन्दुस्तान में लीड के साथ जुड़ी खबर है 'पीएम पर टिप्पणी करके चौतरफा घिर गए मोदी।' दैनिक जागरण की लीड है 'जश्न के मौके पर सियासी जंग।'इन सभी अखबारों ने प्रधानमंत्री के संबोधन पर औपचारिक सम्पादकीय हैं।

3. बिजनेस दैनिक मिंट की लीड का शीर्षक है, 'Study in contrast/ I-day speeches set stage for 2014' मुम्बई के डीएनए की नीति सम्पादकीय पेज छापने की नहीं है। उसने दोनों के वक्तव्यों को आमने-सामने रखकर एक ग्रैफिक दिया है।



Tuesday, June 25, 2013

हनुमान मोदी?

हनुमान मोदी

नरेन्द्र मोदी ने क्या किसी चमत्कार से 15000 गुजरातियों को  उत्तराखंड की आपदा से बाहर निकाल लिया? या यह जन सम्पर्क का मोदी स्टाइल है? जब से यह खबर छपी है सब के मन में यह सवाल है। क्या है इस कहानी का सच? टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसका स्पष्टीकरण छापा नहीं। यह खबर मोदी या उनके किसी अफसर को उधृत करके दी नहीं गई। किसी पत्रकार ने इस बात की पुष्टि करने की कोशिश नहीं की कि सच क्या है। बहरहाल जो कुछ उपलब्ध है उसके अंश यहाँ पेश हैं। सबसे पहले वह खबर पढ़ें जिसमें मोदी के कारनामे का उल्लेख हैः-

Modi in Rambo Act, saves 15000

Dehradun: In the two days that Narendra Modi has been in Uttarakhand, he has managed to completely rile not just the Congress government of Vijay Bahuguna but also the administrative staff involved in rescue operations at Kedarnath, Badrinath and Uttarkashi. But above all, he has managed to bring home some 15,000 stranded Gujarati pilgrims. 
    The Gujarat CM, who flew in on Friday evening, held a meeting till late in the night with his crack team of five IAS, one IPS, one IFS and two GAS (Guja
rat Administrative Service) officers. Two DSPs and five police inspectors were also part of his delegation. They sat again with the nitty-gritty of evacuation in a huddle that a senior BJP leader said lasted till 1am on Saturday. Around 80 Toyota Innovas were requisitioned to ferry Gujaratis to safer places in Dehradun as were four Boeings. On Saturday, 25 luxury buses took a bunch of grateful people to Delhi. The efforts are being coordinated by two of the senior-most IAS officers of Gujarat, one currently stationed in Delhi and another in Uttarakhand. ‘Modi model works only for Gujaratis’ पूरी खबर पढ़ें


टाइम्स ऑफ इंडिया के ब्लॉग में प्रशांत पांडे का लेख

A Rambo act by Modi???? Or cheap dirty Politics....

It’s interesting the way Modi jumps into the middle of every incident where the media is present in large numbers! His US based PR agency, APCO, is doing a wonderful job. Much better for sure than the CM himself is doing, considering that he has done pretty much nothing except generate publicity for himself.
Imagine this. The devastation of the floods is in the hills. The roads have been destroyed. Vehicular movement is proving to be impossible. The Army has been deployed like never before (more than 8500 in number). More than 60 army helicopters are being used in a never-before scale rescue operation. There is a food and drinking water supply problem. There is the fear of an epidemic break-out. All that can be done is being done. Yet, what does Modi do? He reaches the fringes, where there is no problem in any case. He deploys 80 Toyota Innovas (Vans….for god’s sakes!) to ferry 7 people per van = 560 people out. But out from where? From where they are already safe! After they have already been rescued! After all the army bravehearts have done their job, the Gujarat CM and PM aspirant of the BJP comes to the spot with his IAS, IPS and GPS officers in tow – and oh yes…. his PR agents as well – to corner the glory! पूरा लेख पढ़ें
मीडिया साइट द हूट में 
A reader asks about the TOI story 'Narendra Modi lands in Uttarakhand, flies out with 15,000 Gujaratis': "Did the paper verify facts such as 80 Innovas? How is it possible to rescue 15,000 Gujaratis from flood affected Uttarkhand in less than two or three days? Or was Modi some new age scientific Hanuman? How did he and his parochial team identify the 15,000 Gujaratis from over  a million people stranded by the floods? On the face of it, the report looks wonderful. But it defies common sense." हनुमान मोदी

रीडिफ डॉट कॉम में भाजपा प्रवक्ता अनिल बलूनी का स्पष्टीकरण
The evacuation of 15,000 Gujarati pilgrims following the visit to rain-devastated Uttarakhand by Chief Minister Narendra Modi has become the talk of the town. While the Bharatiya Janata Party cannot stop singing praises of its newly-appointed Lok Sabha poll campaign chief for this operation, the Congress, on the other hand, has termed it as an act of “opportunism and selfishness”. 
For the BJP unit in Uttarakhand, Modi's rescue mission has come as a shot in the arm. The manner in which the entire operation was planned and executed should be applied as a role model for other states, the party points out. रीडिफ डॉट कॉम पर पूरा पढ़ें


नरेन्द्र मोदी की वैबसाइट पर 15000 यात्रियों का जिक्र नहीं है। उनके अनुसार 6000 गुजराती वापस आ गए हैं।
Addressing a high-level meeting of disaster management here to take stock of the situation in the hill state, he said that about 6,000 pilgrims from Gujarat have already come back, while another 2,500 are on the way and the remaining about 100 persons still stranded there are being contacted for their safe return..नरेन्द्र मोदी की वैबसाइट में पढ़ें

सबसे दिलचस्प है 26 जून के टाइम्स ऑफ इंडिया के सम्पादकीय पेज पर अभीक बर्मन का लेख जिसमें मोदी के दावे का मज़ाक उड़ाया है। दिलचस्प इसलिए कि मोदी ने कब और कहाँ यह दावा किया, इसका कहीं ज़िक्र नहीं है। खबर टाइम्स ऑफ इंडिया ने छापी जिसमें किसी को कोट नहीं किया गया। टाइम्स ने इसका स्पष्टीकरण भी नहीं दिया। अभीक बर्मन का लेख यहाँ पढ़ें

इकोनॉमिक टाइम्स में मधु किश्वर का लेख

Sunday, June 2, 2013

पीपली लाइव!!!

Mediapersons are seen outside the Sheraton Park Hotel, venue of the crucial BCCI meeting, in Chennai on Sunday. Photo: V. Ganesan

चेन्नई के शेरेटन पार्क होटल के भीतर बीसीसीआई की बैठक चल रही है और बाहर पीपली लाइव लगा है। ऐसी क्या बात है कि मीडिया इस घटना के एक-एक दृश्य को लाइव दिखा देना चाहता है। दो हफ्ते पहले यही मीडिया कोलगेट को लेकर परेशान था। और सीबीआई की स्वतंत्रता को लेकर ज़मीन-आसमान एक किए दे रहा था। उसके पहले मोदी और राहुल के मुकाबले पर जुटा था। लद्दाख में दौलत बेग ओल्दी क्षेत्र में चीनी फौजों की घुसपैठ को लेकर ज़मीन-आसमान एक कर रहा था। और जब चीन के प्रधानमंत्री भारत आए तब उस खबर को भूल चुका था, क्योंकि आईपीएल में सट्टेबाज़ी की खबर से उसने खेलना शुरू कर दिया था। एक ज़माने में राजनीतिक दलों के एक या दो प्रवक्ता होते थे। अब राजनीतिक दलों ने अपने प्रवक्ताओं के अलावा टीवी पर नमूदार होने वाले लोगों के नाम अलग से तय कर दिए हैं। पत्रकारों से तटस्थता की उम्मीद रहा करती थी, पर अब पार्टी का पक्ष रखने वाले पत्रकार हैं। उन्हें पक्षधरता पर शर्म या खेद नहीं है। चैनलों को इस बात पर खेद नहीं है कि खबरें छूट रहीं हैं। उन्हें केवल एक सनसनीखेज़ खबर की तलाश रहती है। और चैनलों के सम्पादकों के कार्टल बन गए हैं जो तय करते हैं कि किस पर आज खेलना है। सारे चैनलों में लगभग एक सी बहस और कोट बदल कर अलग-अलग कुर्सियों पर बैठे विशेषज्ञ। बहस में शामिल होने के लिए व्याकुल 'विश्लेषक-विशेषज्ञों' को जिस रोज़ बुलौवा नहीं आता उस रात उन्हें भूख नहीं लगती। यह नई बीमारी है, जिसका इलाज़ मनोरोग विशेषज्ञ तलाश रहे हैं। देश में बढ़ती कैमरों की तादाद से लगता है कि सूचना-क्रांति हो रही है, पर चैनलों की कवरेज से लगता है कि शोर बढ़ रहा है। सूचना घट रही है। 

Wednesday, May 22, 2013

मीडिया को चाहिए हर रोज़ एक नया शिकार


विन्दु दारा सिंह की गिरफ्तारी की खबर ऐसी छाई कि मंगलवार को नरेन्द्र मोदी की दिल्ली यात्रा की खबर सामने आ ही नहीं पाई। कोलगेट, टूजी, सीबीआई वगैरह पीछे रह गए हैं।लद्दाख का मसला पिछले दिनों मीडिया पर छाया रहा, पर जब चीनी प्रधानमंत्री दिल्ली आए तो उसपर किसी ने ध्यान नहीं दिया। पाकिस्तान का चुनाव एक दिन का रोमांच पैदा कर पाए। मीडिया के मुँह में रोमांच का खून लग गया है। जंगल के शेर की तरह उसे हर रोज़ और हर समय रोमांच से भरा एक शिकार चाहिए। 

Wednesday, November 28, 2012

कुछ भी हो साख पत्रकारिता की कम होगी

ज़ी़ न्यूज़ के सम्पादक की गिरफ्तारी के बारे में सोशल मीडिया में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। इसमें कई तरह की व्यक्तिगत बातें भी हैं। कुछ लोग सुधीर चौधरी से व्यक्तिगत रूप से खफा हैं। वे इसे अपनी तरह देख रहे हैं, पर काफी लोग हैं जो मीडिया और खासकर समूची  पत्रकारिता की साख को लेकर परेशान हैं। इन दोनों सवालों पर हमें दो अलग-अलग तरीकों से सोचना चाहिए।

एक मसला व्यावसायिक है। दोनों कारोबारी संस्थानों के कुछ पिछले विवाद भी हैं। हमें उसकी पृष्ठभूमि अच्छी तरह पता हो तब तो कुछ कहा भी जाए अन्यथा इसके बारे में जानने की कोशिश करनी चाहिए। फेसबुक में एक पत्रकार ने टिप्पणी की कि यह हिसार-युद्ध है। इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए। जहाँ तक सीडी की सचाई के परीक्षण की बात है, यह वही संस्था है जहाँ से शांति भूषण के सीडी प्रकरण पर रपट आई थी और वह रपट बाद में गलत साबित हुई। फिर यह सीडी एक समय तक इंतज़ार के बाद सामने लाई गई। हम नहीं कह सकते कि कितना सच सामने आया है। पुलिस की कार्रवाई न्यायपूर्ण है या नहीं, यह भी नहीं कह सकते। बेहतर होगा इसपर अदालत के रुख का इंतज़ार किया जाए।

Saturday, November 24, 2012

किन खबरों का गुड डे?

मीडिया ब्लॉग सैंस सैरिफ ने इनोवेटिव विज्ञापन की विसंगतियों की ओर ध्यान दिलाया है। शुक्रवार के टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले सफे पर मास्टहैड के बीच में अंग्रेजी के अक्षर ओ की जगह पीले रंग के गोले में गुडडे लिखा था। नीचे कुछ खबरों के बीच में यही गोला आयलैंड के रूप में था। बेस पर गुडडे बिस्कुट का विज्ञापन था। हर घंटे, एक तोला सोना खांके। आप गुडडे बिस्कुट खरीदें तो रैपर में 12 अंकों का कोड मिलेगा। बिस्कुट कम्पनी हर घंटे 10 ग्राम सोने का सिक्का इनाम में देगी। ग्राहक को दिए गए नम्बरों पर यह नम्बर एसएमएस करना है।

बहरहाल यह कारोबार का मामला है। अखबारों में इनोवेटिव विज्ञापनों के नाम पर अब ऐसे विज्ञापनों की भरमार है। इनमें इनोवेशन भी अब दिखाई नहीं पड़ता। पर एक बात ध्यान खींचती है। जैसा कि बिस्कुट का नाम है, उसे अपने गुड डे के साथ पाठक और समाज का गुड डे देखने की कोशिश भी करनी चाहिए थी। कम से कम ये सोने के बिस्कुट ऐसी खबरों के बीच लगते जो गुड न्यूज़ होतीं।

बहरहाल टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में सबसे ऊपर की जिस खबर के बीच से यह बिस्कुट झाँक रहा है वह है पाकिस्तानी तालिबान ने कसाब की मौत का बदला लेने की धमकी दी। मुम्बई में यह बिस्कुट हत्या की खबर के बीच में है और बेंगलुरु में जिस खबर क साथ है वह कहती है कि एमबीए के प्रति छात्रों का आकर्षण खत्म हो रहा है। कोलकाता में एनएसजी कमांडो की, जिसे उसके देय नहीं मिले हैं, खबर के साथ हैं। 
खबरें सभी रोचक हैं, पर गुड न्यूज़ नहीं हैं। सैंस सैरिफ में पढ़ें

Thursday, November 1, 2012

गौरी भोंसले के नाम पर क्या यह खबर भी सीरियल की पब्लिसिटी थी?

इस बात पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने ध्यान दिया। खबर में खास बात नहीं थी, पर लगता है कि कुछ बड़े अखबार इस खबर के लपेटे में आ गए। हाँ इससे एक बात यह भी साबित हुई कि लगभग सभी अखबार पुलिस की ब्रीफिंग का खुले तरीके से इस्तेमाल करते हैं और हर बात ऐसे लिखते हैं मानो यही सच है। पत्रकारिता की ट्रेनिंग के दौरान उन्हें बताया जाता है कि सावधानी से तथ्यों की पुष्टि करने के बाद लिखो, पर व्यवहार में ऐसा होता नहीं।

पहले आप यह विज्ञापन देखें जो कुछ दिन पहले कई अखबारों में छपा, जिसमें गौरी भोंसले नामक लड़की के लंदन से लापता होने की जानकारी दी गई थी। विज्ञापन देखने से ही पता लग जाता था कि यह किसी चीज़ की पब्लिसिटी के लिए है। इस सूचना की क्लिप्स लगभग खबर के अंदाज़ में एबीपी न्यूज़ में आ रहीं थीं। हालांकि एबीपी न्यूज़ का स्टार टीवी से सम्बन्ध अब नहीं है, पर विज्ञापन क्लिप्स खबर के अंदाज़ में आना क्या गलतफहमी पैदा करना नहीं है? पर स्टार के पास इसका जवाब है कि विज्ञापन को खबर के फॉ्र्मेट में देना मार्केटिंग रण नीति है। बहरहाल पहले से लग रहा था कि स्टार पर कोई सीरियल आने वाला है, जिसमें इस किस्म की कहानी है। अचानक 31 अक्टूबर को दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस, मेल टुडे और हिन्दू ने खबर छापी कि वह लड़की उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के एक गाँव से बरामद की गई है। हिन्दू ने खबर में लड़की का नाम नहीं दिया, जबकि बाकी दोनों अखबारों ने उसका नाम गौरी भोंसले, वही विज्ञापन वाला नाम।