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Sunday, November 1, 2020

खतरा कट्टरता की लहर का

एक महीने के भीतर फ्रांस में गला काटने की तीन घटनाओं ने दुनियाभर का ध्यान खींचा है। इन हत्याओं को लेकर एक तरफ फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कड़ी चेतावनी दी है, वहीं तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने फ्रांस पर मुसलमानों के दमन का आरोप लगाया है। दुनिया के मुसलमानों के मन में पहले से नाराजगी भरी है, जो इन तीन महत्वपूर्ण राजनेताओं के बयानों के बाद फूट पड़ी है।

दूसरे देशों के अलावा भारत में भी फ्रांस विरोधी प्रदर्शन हुए हैं। भारत सरकार ने फ्रांस के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है। हिंसक कार्रवाई का समर्थन किसी रूप में नहीं किया जा सकता। ऐसा पहली बार हो रहा है, जब तुर्की और पाकिस्तान सरकार खुलकर हिंसा का समर्थन कर रहे हैं। इससे उनके देशों के कट्टरपंथी तबकों को खुलकर सामने आने का मौका मिल रहा है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रदर्शनकारी अपने पैगम्बर के अपमान से आहत हैं। पर गर्दन काटने का समर्थन कैसे किया जाए?

Sunday, October 18, 2020

देश के भविष्य से जुड़ी खाद्य सुरक्षा

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की 75वीं वर्षगांठ और ‘विश्व खाद्य दिवस’ के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, आंगनबाड़ी-आशा कार्यकर्ताओं वगैरह को बधाई दी। महामारी के इस दौर में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि है हमारा अन्न भंडार। दूसरी उपलब्धि है देश का खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम, जो हर नागरिक को वहनीय मूल्यों पर अच्छी गुणवत्ता के अन्न की पर्याप्त मात्रा पाने का अधिकार देता है।

पहली नजर में ‘विश्व खाद्य दिवस’ एक औपचारिक कार्यक्रम है। गहराई से देखें, तो यह हमारी बुनियादी समस्या से जुड़ा है। चाहे व्यापक वैश्विक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें या निजी जीवन में। संयोग से कोरोना-काल में हमने मजबूरन अपने आहार-व्यवहार पर ध्यान दिया है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि जब विश्व कोविड महामारी से जूझ रहा था तो सरकार ने 80 करोड से अधिक लोगों के लिए पौष्टिक आहार उपलब्‍ध कराया। प्रधानमंत्री ने नवंबर तक देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देने की घोषणा की थी। यह कार्यक्रम अभी जारी है। इसे आगे बढ़ाने पर भी विचार किया जाना चाहिए।

Sunday, October 11, 2020

आज़ादी और उसकी मर्यादा-रेखा


इस हफ्ते देश में अचानक अभिव्यक्ति की आजादी और उससे जुड़ी बातें हवा में हैं। चैनलों के बीच टीआरपी की लड़ाई इसके केंद्र में है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी और एक फैसले ने ध्यान खींचा है। अदालत ने गुरुवार को अपनी एक टिप्पणी में कहा कि हाल के समय में बोलने की आजादी के अधिकार का ‘सबसे ज्यादा’ दुरुपयोग हुआ है। मार्च के महीने में लॉकआउट के वक्त तबलीगी जमात के मामले में मीडिया की कवरेज को लेकर दायर हलफनामे को ‘जवाब देने से बचने वाला’ और ‘निर्लज्ज’ बताते हुए न्यायालय ने केंद्र सरकार को आड़े हाथ लिया।

इसी हफ्ते अदालत ने शाहीनबाग आंदोलन से जुड़े एक मामले पर भी अपना फैसला सुनाया है। इन दोनों मामलों को मिलाकर पढ़ें, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आंदोलन की स्वतंत्रता से जुड़ी कुछ बातें स्पष्ट होती हैं। भारतीय संविधान नागरिक को स्वतंत्रताएं प्रदान करता है, तो उनपर कुछ विवेक सम्मत पाबंदियाँ भी लगाता है। हम अक्सर अपनी आजादी का सही अर्थ समझने में असमर्थ होते हैं। समय आ गया है कि अब हम स्वतंत्रता के साथ-साथ उन मर्यादाओं पर भी विचार करें, जिनके बगैर स्वतंत्रताओं का कोई अर्थ नहीं है। स्वतंत्रता और उसपर लागू होने वाली पाबंदियों के संतुलन के बारे में विचार करने की घड़ी अब आ रही है। खासतौर से मीडिया में इस वक्त जो आपसी मारकाट चल रही है, उसे देखते हुए मर्यादाओं और संतुलन के बारे में सोचना ही पड़ेगा। यह मारकाट किसी वैचारिक आधार पर न होकर शुद्ध कारोबारी आधार पर है और पत्रकार अपने मालिकों-प्रबंधकों के इशारे पर कठपुतली जैसा व्यवहार कर रहे हैं, इसलिए इस पूरे व्यवसाय के स्वामित्व से जुड़े प्रश्नों पर भी हमें सोचना चाहिए। 

Sunday, October 4, 2020

हाथरस से उठते सवाल

हाथरस कांड ने एकसाथ हमारे कई दोषों का पर्दाफाश किया है। शासन-प्रशासन ने इस मामले की सुध तब ली, जब मामला काबू से बाहर हो चुका था। तत्काल कार्रवाई हुई होती, तो इतनी सनसनी पैदा नहीं होती। इस बात की जाँच होनी चाहिए कि पुलिस ने देरी क्यों की। राजनीतिक दलों को जब लगा कि आग अच्छी सुलग रही है, और रोटियाँ सेंकने का निमंत्रण मिल रहा है, तो उन्होंने भी तत्परता से अपना काम किया। उधर टीआरपी की ज्वाला से झुलस रहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने आनन-फानन इसे प्रहसन बना दिया। रिपोर्टरों ने मदारियों की भूमिका निभाई।  

कुल मिलाकर ऐसे समय में जब हम महामारी से जूझ रहे हैं सोशल डिस्टेंसिंग की जमकर छीछालेदर हुई। बलात्कारियों को फाँसी देने और देखते ही गोली मारने के समर्थकों से भी अब सवाल पूछने का समय है। बताएं कि दिल्ली कांड के दोषियों को फाँसी देने और हैदराबाद के बलात्कारियों को गोली मारने के बाद भी यह समस्या जस की तस क्यों है? इस समस्या का समाधान क्या है?

Thursday, October 1, 2020

बाबरी-पटाक्षेप अभी नहीं

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई की विशेष अदालत का फैसला आने के बाद यह नहीं मान लेना चाहिए कि इस प्रकरण का पटाक्षेप हो गया है। फैसले से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि बाबरी मस्जिद को गिराया जाना अपराध नहीं था। पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर-मस्जिद विवाद के जिस दीवानी मुकदमे पर फैसला सुनाया था, उसमें स्पष्ट था कि मस्जिद को गिराया जाना अपराध था। उस अपराध के दोषी कौन थे, यह इस मुकदमे में साबित नहीं हो सका। इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपनी न्याय-व्यवस्था को कोसना शुरू करें। कुछ लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि मस्जिद गिरी ही नहीं, मस्जिद थी ही नहीं वगैरह।

हमारी धर्म निरपेक्षता, न्याय-व्यवस्था और प्रशासनिक के साथ यह राजनीति की परीक्षा की घड़ी भी है। मंदिर-मस्जिद विवाद को राजनीति से अलग करके नहीं देखना चाहिए। अभी इसके व्यापक निहितार्थ देखने को मिलेंगे। पर सबसे बड़ा असर सामाजिक जीवन में देखने को मिलेगा। कई बार हम सोचते हैं कि समय बड़े-बड़े घाव भर देता है। पर भावनाओं के मामले में समय घाव भरता नहीं उन्हें कुरेदता है।

Sunday, September 27, 2020

संजीदगी पर हावी राजनीतिक शोर

हाल में सम्पन्न हुआ संसद का मॉनसून सत्र पिछले दो दशकों का सबसे छोटा सत्र था। महामारी के प्रसार को देखते हुए यह स्वाभाविक भी था, पर इस जितने कम समय के लिए इसका कार्यक्रम बनाया गया था, उससे भी आठ दिन पहले इसका समापन करना पड़ा। बावजूद इसके संसदीय कर्म के हिसाब से यह सत्र काफी समय तक याद रखा जाएगा। इस दौरान लोकसभा ने निर्धारित समय की तुलना में 160 फीसदी और राज्यसभा ने 99 फीसदी काम किया। इन दस दिनों के लिए दोनों सदनों के पास 40-40 घंटे का समय था, जबकि लोकसभा ने करीब 58 घंटे और राज्यसभा ने करीब 39 घंटे काम किया। यह पहली बार हुआ जब सत्र के दौरान कोई अवकाश नहीं था। दोनों सदनों ने अपने दस दिन के सत्र में 27 विधेयक पास किए और पाँच विधेयकों को वापस लेने की प्रक्रिया पूरी की गई। इन विधेयकों में 11 ऐसे थे, जिन्होंने जून में जारी किए गए अध्यादेशों का स्थान लिया। 

इस सत्र की जरूरत इसलिए भी थी, क्योंकि तमाम संसदीय कर्म अधूरे पड़े थे। इस सत्र के शुरू होने के पहले संसद के पास पहले से 46 विधेयक लंबित थे। इनके अलावा नए 22 विधेयक इस सत्र में लाए जाने थे। कुछ अध्यादेशों के स्थान पर विधेयकों को लाना था और कुछ विधेयकों को वापस लेना था। हमारी प्रशासनिक-व्यवस्था सफलता के साथ तभी चल सकती है, जब संसदीय कर्म कुशलता के साथ सम्पन्न होता रहे। संसदीय बहस, प्रश्नोत्तर और ध्यानाकर्षण प्रस्ताव सुनने में मामूली बातें लगती हैं, पर ये बातें ही लोकतंत्र को सफल बनाती हैं।

Sunday, September 20, 2020

क्यों नाराज हैं किसान?


पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत देश के कुछ हिस्सों में खेती से जुड़े तीन नए विधेयकों को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। किसान इनका विरोध कर रहे हैं, विरोधी दल सरकार पर निशाना साध रहे हैंसरकार कह रही है कि ये विधेयक किसानों के हित में हैं और विरोधी दल किसानों को बजाय उनका हित समझाने के गलत बातें समझा रहे हैं। किसानों की आशंकाओं से जुड़े सवालों के जवाब भी दिए जाने चाहिए। उनकी सबसे बड़ी चिंता है कि सरकारी खरीद बंद हुई, तो वे व्यापारियों के रहमो-करम पर होंगे।

इन कानूनों में कहीं भी सरकारी खरीद बंद करने या न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म करने की बात नहीं है। केवल अंदेशा है कि सरकार उसे खत्म करेगी। इस अंदेशे के पीछे भारतीय खाद्य निगम के पुनर्गठन की योजना है। शांता कुमार समिति का सुझाव है कि केंद्र सरकार अनाज खरीद का जिम्मा राज्य सरकारों पर छोड़े। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे के भीतर दूसरी बार किसानों को भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि एमएसपी की व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं होने जा रहा है।

Sunday, September 13, 2020

चीन क्या दबाव में है या दबेगा?

मॉस्को में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच पाँच सूत्री समझौता हो जाने के बाद भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि चीनी सेना अप्रेल-मई की स्थिति पर वापस चली जाएंगी। ऐसा मानने का सबसे बड़ा कारण यह है कि इस समझौते में न तो वास्तविक नियंत्रण रेखा का नाम है और न यथास्थिति कायम करने का जिक्र है। होता भी तो वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर चीन और भारत की अलग-अलग परिभाषाएं हैं। सन 2013 में जब चीनी सैनिकों की लद्दाख में घुसपैठ का मामला सामने आया, तब भी यही बात कही गई थी। 

भारत और चीन की सीमा पर कम से कम 20 जगहों के सीमांकन को लेकर दोनों देशों के बीच असहमतियाँ हैं। सन 1980 से लेकर अबतक दोनों के बीच वार्ताओं के कम से कम 20 दौर हो चुके हैं। चीन के सीमा विस्तार की रणनीति को ‘सलामी स्लाइस’ की संज्ञा दी जाती है। माना जाता है कि चीनी सेनाएं धीरे-धीरे किसी इलाके के में गश्त के नाम पर घुसपैठ बढ़ाती हैं और सलामी के टुकड़े की तरह उसे दूसरे देश से काटकर अलग कर देती हैं। चीन इस रणनीति को दक्षिण चीन सागर में भी अपना रहा है। इस इलाके में अंतरराष्ट्रीय सीमा तो स्पष्ट नहीं है, सन 1962 के युद्ध के बाद की वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर भी अस्पष्टता है।

सन 2013 में भारत के पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि चीन ने पूर्वी लद्दाख में इसी किस्म की गश्त से भारत का 640 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हथिया लिया है। श्याम सरन तब यूपीए सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अंतर्गत काम करने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष थे। सरकार ने उनकी बात को स्वीकार नहीं किया, पर यह बात रिकॉर्ड में मौजूद है। लगभग उसी अंदाज में इस साल सरकार ने शुरू में चीनी घुसपैठ की बात को स्वीकार नहीं किया था।

भारत ने उसी साल चीन के साथ बॉर्डर डिफेंस कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बीसीडीए) पर हस्ताक्षर किए थे। बीसीडीए प्रस्ताव चीन की ओर से आया था। वह चाहता था कि चीन के प्रधानमंत्री ली खछ्यांग की भारत यात्रा के पहले वह समझौता हो जाए। इस समझौते के बावजूद उसी साल अप्रैल में देपसांग इलाके में चीनी घुसपैठ हुई और उसके अगले साल चुमार इलाके में। दरअसल चीन के साथ 1993, 1996, 2005 और 2012 में भी ऐसे ही समझौते हुए थे, पर सीमा को लेकर चीन के दावे हर साल बदलते रहे।

बहरहाल मॉस्को में हुआ समझौता दो कारणों से महत्वपूर्ण है। लगता है कि चीन को इस टकराव के दूरगामी परिणाम समझ में आए हैं, और वह दबाव में है। यह हमारा अनुमान है। वास्तव में ऐसा है या नहीं, यह कुछ समय बाद स्पष्ट होगा। हम मानते हैं कि वह फिर भी नहीं माना और टकराव बढ़ाने कोशिश करता रहा, तो उसे उसकी कीमत चुकानी होगी। सीमा विवाद को लेकर जिस पाँच सूत्री योजना पर सहमति बनी है, उसे पढ़ने से कोई सीधा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। असल बात भरोसे की और समझौते की शब्दावली को समझने की है। दूसरी बात यह है कि चीनी सेना की ताकत को लेकर दुनिया का भ्रम टूटा है। अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी देशों ने चीन को सैनिक महाशक्ति के रूप में दिखाना शुरू कर दिया है। चीन खुद भी ऐसा दिखाने का प्रयास करता है। वह भ्रम टूटा है और यदि गतिरोध बना रहा, तो और टूटेगा। 

सवाल है कि अप्रेल-मई से पहले की स्थिति पर चीन वापस जाएगा या नहीं? नहीं गया, तो हमारे पास उसे रास्ते पर लाने का तरीका क्या है? इस समझौते के सिलसिले में जो खबरें मिली हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय विदेशमंत्री ने कहा है कि अब भारतीय सेना तबतक पीछे नहीं हटेगी, जबतक वह चीनी सेना के पीछे हटने के बारे में आश्वस्त नहीं हो जाएगी। इसका मतलब है कि भारत अब दबकर नहीं, बल्कि चढ़कर बात करेगा। 

Sunday, September 6, 2020

अब दबाव में आया चीन


भारत और चीन के रक्षामंत्रियों के बीच मॉस्को में हुई बातचीत से भी लगता नहीं कि कोई निर्णायक परिणाम हासिल हुआ है, फिर भी पिछले सप्ताह की गतिविधियों से इतना जरूर नजर आने लगा है कि अब चीन दबाव में है। राजनाथ सिंह और वेई फेंग के बीच बातचीत चीनी पहल पर हुई है। इस बैठक में राजनाथ सिंह ने कड़े लहजे में कहा कि चीनी सेना को पीछे वापस जाना चाहिए। पिछले हफ्ते दक्षिण पैंगांग क्षेत्र की ऊँची पहाड़ियों पर अपना नियंत्रण बना लेने के बाद भारतीय सेना अब बेहतर स्थिति में है।

लद्दाख में भारतीय सेना का मनोबल ऊँचा है। इसके विपरीत चीनी सैनिक मानसिक दबाव में हैं। भारत के प्रधानमंत्री से लेकर रक्षामंत्री, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ और सेनाध्यक्ष सब लद्दाख जाकर सैनिकों का उत्साहवर्धन कर चुके हैं। इसके विपरीत चीन के राजनीतिक नेताओं की बात छोड़िए बड़े सैनिक अधिकारी भी सीमा पर नहीं पहुँचे हैं। गत 15 जून को गलवान में हुए टकराव में बड़ी संख्या में हताहत हुए अपने सैनिकों का सम्मान करना भी चीन ने उचित नहीं समझा। उन सैनिकों के परिवारों तक क्या संदेश गया होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

Tuesday, September 1, 2020

राजनेता नहीं, श्रेष्ठ राजपुरुष


प्रणब मुखर्जी के बारे में निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता के बाद वे देश के सर्वश्रेष्ठ राजपुरुषों (स्टेट्समैन) में एक थे। विलक्षण राजनेता, योग्य प्रशासक, संविधान के ज्ञाता और श्रेष्ठ अध्येता के रूप में उनकी गिनती की जाएगी। उनका कद किसी भी राजनेता से ज्यादा बड़ा था, और उन्होंने बार-बार इस बात को रेखांकित किया कि राजनीति को संकीर्ण दायरे के बाहर निकल कर आना चाहिए।

बेशक उन्हें वह नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। व्यावहारिक राजनीति और सांविधानिक मर्यादाओं का उच्चतम समन्वय उनके व्यक्तित्व में देखा जा सकता है। विसंगतियों से मेल बैठाना व्यवहारिक राजनीति है। प्रणब मुखर्जी को इस बात का श्रेय मिलना ही चाहिए कि वे राजनीतिक दृष्टि में सबसे विकट वक्त के राष्ट्रपति बने। वे बुनियादी तौर पर कांग्रेसी थे, पर कांग्रेस की कठोरतम प्रतिस्पर्धी बीजेपी की मोदी सरकार के साथ उन्होंने काम किया और टकराव की नौबत कभी नहीं आने दी।

देश ने उन्हें राष्ट्रपति बनाया और भारत रत्न से सम्मानित भी किया, पर वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाए, जिसके वे अधिकारी थे। सामान्य परिस्थितियाँ होती, तो शायद सन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद ही उन्हें देश की बागडोर मिल जाती, पर कांग्रेस पार्टी ‘परिवार’ को अपनी नियति मान चुकी थी। उस वक्त उन्हें न केवल एक संभावना से वंचित रहना पड़ा हाशिए पर जाना पड़ा और कुछ समय के लिए पार्टी से बाहर भी रहे। सन 1991 में राजीव गांधी के निधन के बाद भी वे इस पद को पाने में वंचित रहे। तीसरा मौका सन 2004 में आया, जब परिवार से बाहर के व्यक्ति को यह पद मिला। तब भी उन्हें वंचित रहना पड़ा।

Sunday, August 30, 2020

नहीं बदलेगी कांग्रेस


पिछले दो-तीन हफ्ते के घटनाक्रम से लगता है कि कांग्रेस पार्टी के भीतर गम्भीर अंतर्मंथन चल रहा है। यह अंतर्मंथन सायास नहीं है। पार्टी हाल में राजस्थान के संकट से बाहर आई है। राजस्थान में कांग्रेस को विजयी मानें भी, तो यह भी मानना होगा कि सचिन पायलट के रूप में एक रुष्ट युवा राजनेता पार्टी के भीतर बैठा है। ऐसे नाराज नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है। 23 वरिष्ठ नेताओं का पत्र भी यही बता रहा है। इनमें से कुछ और ज्यादा नाराज होंगे और कुछ अपनी नाराजगी को छोड़कर जैकारा लगाने लगेंगे। इधर कपिल सिब्बल ने कहा है कि हमने क्या गलत बात की? हम एक प्रक्रिया की बात कर रहे हैं। बीजेपी पर हम आरोप लगाते हैं कि वह संविधान का पालन नहीं करती है। पर हम क्या करते हैं? हमने जो बातें कहीं, उनका जवाब नहीं दिया गया, बल्कि हमारी आलोचना की गई और किसी ने हमारे पक्ष में नहीं बोला।  

अब सवाल तीन हैं। क्या कांग्रेस सन 1969 के आसपास के दौर में आ गई है, जब पार्टी के भीतर दो साफ धड़े बन गए थे? क्या यह दौर भी गांधी परिवार के पक्ष में गया है? तीसरा सवाल है कि यदि धड़ेबाज़ी चलने वाली नहीं है और पार्टी एक ही रहेगी, तो वर्तमान असंतोष की तार्किक परिणति क्या है?  कुल मिलाकर नरेंद्र मोदी की बीजेपी का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के पास अब क्या बचा है? उसे कौन बचाने वाला है?

Sunday, August 23, 2020

फेसबुक के पीछे क्या है?

भारत में अपनी भूमिका को लेकर फेसबुक ने औपचारिक रूप से यह स्पष्ट किया है कि सामग्री को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, उसका निर्वाह सही तरीके से किया जा रहा है और वह एक खुला, पारदर्शी और पक्षपात- रहित मंच है। फेसबुक के भारत-प्रमुख अजित मोहन ने जो नोट लिखा है, उसके नीचे पाठकों की प्रतिक्रियाएं पढ़ें, तो लगेगा कि फेसबुक पर कम्युनिस्टों और इस्लामिक विचारों के प्रसार का आरोप लगाने वालों की संख्या भी कम नहीं है। फेसबुक ही नहीं ट्विटर, वॉट्सएप और सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म पर इन दिनों उन्मादी टिप्पणियों की बहुतायत है। क्यों हैं ये टिप्पणियाँ? क्या ये वे दबी बातें हैं, जिन्हें खुलकर बाहर आने का मौका सोशल मीडिया के कारण मिला है?  

ऐसे में सवाल दो हैं। क्या फेसबुक ने अपने आर्थिक हितों के लिए भारत में सत्ताधारी राजनीतिक दल से कोई गठजोड़ किया है या जो कुछ सामाजिक विमर्श में चलता है, वही सामने आ रहा है? सोशल मीडिया के सामने मॉडरेशन एक बड़ी समस्या है। एक तरफ सामाजिक ताकतें हैं, दूसरी तरफ राजनीतिक शक्तियाँ। कोई भी कारोबारी सरकार से रिश्ते बिगाड़ भी नहीं सकता। आज बीजेपी की सरकार है। जब कांग्रेस की सरकार थी, तब भी फेसबुक ने सरकार के साथ मिलकर काम किया ही था।

Saturday, August 15, 2020

आशंकाएं और उम्मीदें

स्वतंत्रता दिवस की 73 वीं वर्षगाँठ के मौके पर देश तीन तरह की परेशानियों का सामना कर रहा है। सीमा पर चीन ने चुनौती दी है। दूसरी तरफ कोरोना वायरस की महामारी से भारत ही नहीं पूरी दुनिया परेशान है। तीसरी चुनौती है अर्थव्यवस्था की। भारत वैश्विक महाशक्तियों की कतार में शामिल जरूर हो चुका है, पर हम अभी संधिकाल में है। इस संधिकाल को पूरा करने के बाद ही खुशहाली की राह खुलेगी। आशंका है कि इस साल हमारी अर्थव्यवस्था की विकास-गति शून्य से भी नीचे चली जाएगी।

इन सब चुनौतियों के अलावा स्वतंत्रता दिवस के ठीक दस दिन पहले अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू होने के साथ एक नए युग की शुरुआत हुई है। पर इसके साथ ही कुछ सवाल भी खड़े हुए हैं। क्या यह राष्ट्र निर्माण का मंदिर बन पाएगा? क्या यह एक नए युग की शुरुआत है? ये बड़े जटिल प्रश्न हैं। मंदिर का भूमि पूजन होने के एक दिन पहले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक लम्बे प्रेस नोट के साथ ट्वीट किया कि ‘बाबरी मस्जिद थी और हमेशा ही मस्जिद रहेगी। अन्यायपूर्ण, दमनकारी, शर्मनाक और बहुसंख्यक तुष्टीकरण के आधार पर किया गया फैसला इसे नहीं बदल सकता।’

Sunday, August 9, 2020

मंदिर से आगे की राजनीति

गत 5 अगस्त को शिलान्यास के फौरन बाद सोशल मीडिया पर यों तो कई तरह के प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, पर दो ट्वीट का जिक्र करना प्रासंगिक होगा। भूमि पूजन के पहले पर्सनल लॉ बोर्ड के अकाउंट से अंग्रेजी में ट्वीट किया गया कि बाबरी मस्जिद थी और हमेशा ही मस्जिद रहेगी। अन्यायपूर्ण, दमनकारी, शर्मनाक और बहुसंख्यक तुष्टीकरण के आधार पर किया गया फैसला इसे नहीं बदल सकता। इस ट्वीट को लेकर आपत्तियाँ उठाई गईं, तो इसे हटाकर 6 अगस्त को उर्दू में एक ट्वीट किया गया, जिसकी भाषा में कानूनी सावधानियाँ बरती गईं हैं, पर आशय वही है कि मस्जिद थी और रहेगी। अदालत ने फैसला किया है, पर न्याय को ठेस पहुँचाई गई है। पहले वाले ट्वीट में तुर्की की हागिया सोफिया मस्जिद का हवाला दिया गया था।

Sunday, July 26, 2020

कांग्रेसी नेतृत्व का रसूख दाँव पर

राजस्थान में कांग्रेस पार्टी का जो संकट खड़ा हुआ है, वह है क्या? क्या यह कि अशोक गहलोत की सरकार बचे? या यह कि कांग्रेस बचे? अशोक गहलोत इसे अपने ऊपर आए संकट के रूप में भले ही देख रहे हों, पर यह संकट कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व और खासतौर से गांधी-नेहरू परिवार पर है। गहलोत सरकार बच भी गई, तो इस बात की गारंटी नहीं कि कांग्रेस का पराभव रुक जाएगा। पार्टी संकट में है। वह फिर से खड़ी होने की कोशिश में डगमगा रही है। और यह संकट केवल कांग्रेस पार्टी पर ही नहीं है, बल्कि यूपीए के गठबंधन पर भी है।

राजस्थान का विवाद जम्मू-कश्मीर के अब्दुल्ला परिवार के साथ किस तरह जुड़ गया, क्या हमने इसके बारे में सोचा है? महाराष्ट्र में एनसीपी कांग्रेस के साथ हैं, पर वह कब धोखा दे दे, इसका ठिकाना नहीं। हाल में चीन के संदर्भ में शरद पवार ने राहुल गांधी को सचेत किया कि मोदी की आलोचना ठीक नहीं। ये बातें संगठनात्मक कौशल के साथ-साथ वैचारिक भटकाव की ओर भी इशारा कर रही हैं। इनका दूरगामी असर यूपीए के स्वास्थ्य पर पड़ेगा।

Sunday, July 19, 2020

कांग्रेसी कश्ती में फिर दरार

कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई की एक बैठक में दिए गए राहुल गांधी के बयान को दो तरह से पढ़ा गया है। एक यह कि जो जाना चाहता है, वह जा सकता है। दूसरा यह कि जिसे पार्टी छोड़कर जाना है वह जाएगा ही, आप लोगों को घबराना नहीं है। जब कोई बड़ा नेता पार्टी छोड़कर जाता है तो आप जैसे लोगों के लिए रास्ते खुलते हैं। बाद में कांग्रेस पार्टी की ओर से कहा गया कि बैठक में ऐसी कोई बात नहीं हुई थी, पर खबर तो पार्टी के भीतर से ही आई थी। राहुल गांधी की बात में विसंगति है। युवाओं के लिए रास्ते तभी खुलते हैं, जब बुजुर्ग लोग उनके लिए रास्ते खोलते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट का प्रसंग बता रहा है कि पार्टी के युवा नेता नाराज हैं। यह पार्टी इतनी दुविधा और संशय में इसके पहले कभी नहीं रही। दूसरी तरफ उसके विरोधी खंडहर की ईंटें हिलाने का मौका छोड़ नहीं रहे हैं।

Sunday, July 12, 2020

जनता के रोष को पढ़िए

विकास दुबे की मौत की खबर आने के फौरन बाद एक पत्रकार ने ट्वीट किया, विकास दुबे नहीं मरता तो शायद ये होता, 1.डर के मारे कोई उसके खिलाफ गवाही नहीं देता, 2.अपने समाज का बड़ा नेता बन जाता, 3.सन 2022 में विधायक/मंत्री होता, 4.जो पुलिस उसे पकड़ के ला रही थी, वो उसकी सुरक्षा में होती, 5.और हमलोग उसके बंगले के गेट पर उसकी बाइट लेने खड़े होते इस ट्वीट का जवाब एक और पत्रकार ने दिया, प्रक्रिया हमें थकाती है, फ्रस्ट्रेट करती है, निराश भी करती है लेकिन किसी नागरिक को हमेशा क़ानूनी प्रक्रिया के साथ ही होना चाहिए क्योंकि वही प्रक्रिया उसकी सुरक्षा भी करती है…।
दोनों बातों में ज्यादा बड़ा सच क्या है? किसी ने लिखा, पकड़ा जाता तो कुछ लोगों के नाम बताता। इसके जवाब में किसी ने लिखा, सैयद शहाबुद्दीन, गाजी फकीर, मुन्ना बजरंगी और अतीक अहमद ने किसका नाम बताया? सच तो यह भी है कि विकास दुबे ने थाने में घुस कर एक राज्यमंत्री की सरेआम हत्या कर दी थी। तीस पुलिस वालों में से एक ने भी गवाही नहीं दी। जमानत पर छूटकर बाहर आ गया।
यूपी के इस डॉन की मौत किन परिस्थितियों में हुई, यह विचार का अलग विषय है। सच यह है कि बड़ी संख्या में लोग इस कार्रवाई से खुश हैं। उन्हें लगता है कि जब कुछ नहीं हो सकता, तो यही रास्ता है। पिछले साल के अंत में जब हैदराबाद में चार बलात्कारियों की मौत पुलिस मुठभेड़ में हुई, तब जनता ने पुलिस वालों का फूल मालाओं से स्वागत किया था। क्यों किया था? ऐसा नहीं कि लोग फर्जी मुठभेड़ों को सही मानते हैं। सब मानते हैं कि कानून का राज हो, पर कैसे? न्याय-व्यवस्था की सुस्ती और उसके भीतर के छिद्र उसे नाकारा बना रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि सरकारें पुलिस सुधार से बच रही हैं। राजनीतिक कारणों से मुकदमे वापस लिए जाते हैं और राजनीतिक कारणों से मुकदमे चलाए भी जाते हैं। सिर्फ न्यायपालिका को दोष देना भी गलत है। सरकार समझती है कि अपराधियों को ठोकने से काम चल जाएगा, तो वह गलत सोचती है।

Sunday, July 5, 2020

लद्दाख से मोदी की गंभीर चेतावनी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लद्दाख यात्रा जितनी सांकेतिक है, उससे ज्यादा सांकेतिक है उनका वक्तव्य। यदि हम ठीक से पढ़ पा रहे हैं, तो यह क्षण भारतीय विदेश-नीति के लिए महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। मोदी के प्रतिस्पर्धियों को भी उनके वक्तव्य को ठीक से पढ़ना चाहिए। यदि वे इसे समझना नहीं चाहते, तो उन्हें कुछ समय बाद आत्ममंथन का मौका भी नहीं मिलेगा। बहरहाल पहले देखिए कि यह लद्दाख यात्रा महत्वपूर्ण क्यों है और मोदी के वक्तव्य की ध्वनि क्या है।

प्रधानमंत्री की इस यात्रा के एक दिन पहले रक्षामंत्री लद्दाख जाने वाले थे। वह यात्रा अचानक स्थगित कर दी गई और उनकी जगह अगले रोज प्रधानमंत्री खुद गए। सवाल केवल सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने का ही नहीं है, बल्कि देश की विदेश-नीति में एक बुनियादी मोड़ का संकेतक भी है। अप्रेल के महीने से लद्दाख में शुरू हुई चीनी घुसपैठ के बाद से अब तक भारत सरकार और खासतौर से प्रधानमंत्री मोदी के बयानों में तल्खी नहीं रही। ऐसा लगता रहा है कि भारत की दिलचस्पी चीन के साथ संबंधों को एक धरातल तक बनाए रखने की है। भारत चाहता था कि किसी तरह से यह मसला सुलझ जाए।

Sunday, June 28, 2020

सीमा पर चीन और घर में सियासी शोर!

मंगलवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरकार पर निशाना साधा और सवाल पूछा कि चीन ने जिस जमीन पर कब्जा कर लिया है, उसे वापस कैसे लिया जाएगा? लगता है कि पार्टी ने चीन के साथ वर्तमान तनातनी को लेकर सरकार पर हमले करने की रणनीति तैयार की है। राहुल गांधी ने भी एक वीडियो जारी करके कहा है कि चीन ने लद्दाख के तीन इलाकों में घुसपैठ की है। चीनी घुसपैठ और 20 जवानों की शहादत को लेकर राहुल गांधी लगातार सरकार से तीखे सवाल कर रहे हैं। उन्होंने जापान टाइम्स के एक लेख को ट्वीट कर लिखा है, ‘नरेंद्र मोदी असल में सरेंडर मोदी हैं।’

पार्टी ने शुक्रवार को भारत-चीन सीमा पर शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए ‘शहीदों को सलाम दिवस’ मनाया। इस मौके पर सोनिया गांधी ने वीडियो संदेश के जरिए कहा, देश जानना चाहता है कि अगर चीन ने लद्दाख में हमारी सरजमीन पर कब्जा नहीं किया, तो फिर हमारे 20 सैनिकों की शहादत क्यों और कैसे हुई? मनमोहन सिंह की टिप्पणी भी आई। कुछ फौजी अफसरों की टिप्पणियाँ भी सोशल मीडिया पर प्रकट हुईं, जिनमें सरकार से सवाल पूछे गए हैं। क्या ये टिप्पणियाँ अनायास थीं या किसी ने इशारा करके कराई थीं?