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Tuesday, June 16, 2026

ईरान-समझौते के अटकते-खटकते निष्कर्ष


अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक-समझौता हो गया है, जिसके तहत 60 तक युद्धविराम लागू रहेगा और होर्मुज़ का रास्ता खुलेगा. समझौते पर दस्तखतों को लेकर अंतिम क्षण तक असमंजस बना रहा, पर अब बताया गया है कि दस्तखत 19 जून को होंगे.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अब हम ईरान की नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त कर देंगे, जो महीनों की बातचीत में सबसे बड़ी सफलता है.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के सरकारी टीवी का कहना है कि तेहरान ने अमेरिका को शांति समझौते को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया.

दोनों पक्षों ने समझौते का विवरण तुरंत जारी नहीं किया है, पर मीडिया में दोनों तरफ से आई बातों में अंतर्विरोध हैं. इसके अलावा ईरान के कट्टरपंथी और इसराइली सरकार अपने-अपने कारणों से नाराज़ हैं।

इस समझौते से दोनों पक्षों के बीच दोस्ती कायम नहीं हो जाएगी. सच यह है कि यह दो दुश्मनों के बीच सीमा रेखाएँ तय करने का समझौता है, जिसकी सफलता या विफलता का फैसला समय करेगा.

Wednesday, June 3, 2026

अमेरिका-ईरान: कभी हाँ, कभी ना की राजनीति


अनुमान है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता अब किसी भी क्षण हो सकता है. फिर भी दोनों ने अपने हाथ खींच रखे हैं. इसके पीछे दो कारण नज़र आते हैं.

एक तरफ अमेरिका चाहता है कि ईरान पर ज्यादा से ज्यादा दबाव बना ले, वहीं ईरान का नेतृत्व दो हिस्सों में बँटा हुआ है. वहाँ का अनुदार तबका छूट देना नहीं चाहता.

अमेरिका इसे और व्यापक आधार देना चाहता है, जिसमें इसराइल की समस्या का समाधान भी है. वह मुस्लिम देशों से इसराइल को मान्यता दिलाना चाहता है, जो इस लड़ाई की बुनियाद में है.

बहरहाल दोनों देशों की सहमतियों के बावज़ूद, समझौता अटका हुआ है. राष्ट्रपति ट्रंप ने शुक्रवार को वाइट हाउस के सिचुएशन रूम में अपने प्रमुख सलाहकारों के साथ बैठक की, लेकिन उन्होंने अंतिम फैसला टाल दिया.

इस कक्ष का इस्तेमाल बड़े संकटों से निपटने की रणनीति बनाने या चर्चा करने के लिए होता है. अभी स्पष्ट नहीं है कि समझौते की घोषणा कब होगी, होगी भी या नहीं.

ईरान के मुख्य वार्ताकार, जनरल मोहम्मद बग़ेर ग़ालिबफ़ ने दिन में  सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, तेहरान को वाशिंगटन पर भरोसा नहीं है. उनके किसी कदम के बिना, हम पहला कदम नहीं उठाएँगे.

Thursday, May 14, 2026

अमेरिका-ईरान ‘अनिर्णीत’ युद्ध


पश्चिम एशिया की लड़ाई को तीन महीने पूरे हो गए हैं, और वह पूरी तरह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। एक महीने से ज्यादा चली ताबड़तोड़ बमबारी से इस इलाके के देशों का काफी नुकसान हुआ है, पर समस्या का कोई स्थायी समाधान नज़र आता दिखाई नहीं पड़ रहा है। अमेरिका और ईरान दोनों ने होर्मुज़ जलसंधि मार्ग को बंद कर रखा है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति ठप्प होने का खतरा पैदा हो गया है। इस दौरान पाकिस्तान में दोनों पक्षों की वार्ता के बाद उसके दूसरे दौर की नौबत ही नहीं आई है। उधर अमेरिका का साथ देने वाले देशों की संख्या कम होती जा रही है।

राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार दावा कर रहे हैं कि हमने ईरान की कमर तोड़ दी है, पर वास्तविकता कुछ और नज़र आती है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिकी इंटेलिजेंस के हवाले से खबर दी है कि, इस महीने की शुरुआत में किए गए गोपनीय आकलन से पता चलता है कि ईरान ने अपने ज्यादातर मिसाइल स्थलों, लॉन्चरों और भूमिगत सुविधाओं तक दोबारा पहुँच हासिल कर ली है, और इस संबंध में ट्रंप प्रशासन द्वारा सार्वजनिक रूप से ईरान की सेना को बिखरी हुई स्थिति में चित्रित करना अमेरिकी खुफिया एजेंसियों द्वारा नीति निर्माताओं को बंद दरवाजों के पीछे बताई जा रही जानकारी से बिल्कुल विपरीत है।

रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के किनारे स्थित अपने 33 मिसाइल स्थलों में से 30 तक परिचालन पहुंच बहाल कर दी है, जिससे संकरे जलमार्ग से गुजरने वाले अमेरिकी युद्धपोतों और तेल टैंकरों को खतरा हो सकता है। इन सूचनाओं से अलग-अलग स्थलों पर हुए नुकसान के स्तर के आधार पर पता लगता है, कि ईरानी इन स्थलों के अंदर मौजूद मोबाइल लॉन्चरों का उपयोग करके मिसाइलों को अन्य स्थानों पर ले जा सकते हैं।

आकलनों के अनुसार, ईरान के पास अभी देश भर में लगभग 70 प्रतिशत मोबाइल लॉन्चर तैनात हैं और उसने युद्ध-पूर्व मिसाइल भंडार का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बरकरार रखा है। इस भंडार में बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं, जो क्षेत्र के अन्य देशों को निशाना बना सकती हैं, और क्रूज मिसाइलों की एक छोटी आपूर्ति भी है, जिनका उपयोग जमीन या समुद्र पर कम दूरी के लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है।

सीधा युद्ध

यों तो लंबे अर्से से इस इलाके में 'छाया युद्ध' चल रहा था, पर 28 फरवरी से शुरू हुए हमलों ने इसे 'छाया युद्ध' से सीधे युद्ध में बदल दिया है। इस दौरान अमेरिकी हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर खामनेई के मारे जाने के बाद तनाव और बढ़ गया है। लड़ाई के दौरान अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमले बोले, तो ईरान और उसके समर्थक हूतियों (यमन), हिज़बुल्ला (लेबनान), और अन्य समूहों ने इसराइल तथा अमेरिकी ठिकानों (कतर, बहरीन, कुवैत) को निशाना बनाया।

Wednesday, March 4, 2026

पश्चिम एशिया को इस ‘भँवर’ से निकालना मुश्किल होगा


अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ईरान पर हमला करके, जो लंबा दाँव खेला है, उसके कारण पश्चिम एशिया का भविष्य फिलहाल अनिश्चित नज़र आने लगा है. लगता है कि भानुमती के पिटारे की तरह एक के बाद एक नई चीजें सामने आ रही हैं और अभी आएँगी।

उनका यह ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' नए क्षेत्रीय संघर्षों को भी जन्म दे गया है, जिनमें अमेरिका फँसा तो उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा. ट्रंप ने एक वीडियो में ईरानी जनता को संबोधित करते हुए, कहा देश की सत्ता पर ‘आपको कब्ज़ा करना होगा. यह संभवतः पीढ़ियों के लिए आपको मिला एकमात्र मौका है.’

पर्यवेक्षकों का कहना है कि ईरान का इस्लामिक गणराज्य एक वैचारिक प्रणाली है, जिसमें बहुस्तरीय अभिजात वर्ग और समर्थन का आधार है. हो सकता है कि हाल के वर्षों में यह समर्थन कम हुआ हो, पर वह सत्ता बनाए रखने की ताकत रखता है. बमबारी से पस्त और घायल होने के बावज़ूद यह धार्मिक व्यवस्था खड़ी रहेगी.

इस आक्रमण के बाद जहाँ एकाध अपवाद को छोड़कर पूरा यूरोप, अमेरिका और इसराइल के साथ खड़ा नज़र आ रहा है, वहीं रूस और चीन ने आयतुल्ला खामनेई की हत्या की निंदा की है.

चीन ने इसे 'संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के ख़िलाफ़' बताया और कहा कि हम इसका सख़्त विरोध और कड़ी निंदा करते हैं. पर वे निंदा तक ही सीमित रह सकते हैं. वे जो भी करेंगे, दूर रहते हुए परोक्ष तरीकों से करेंगे, प्रत्यक्ष तरीके से नहीं.