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Wednesday, August 16, 2017

सत्तर साल का आजाद भारत: कितने कदम चले हम?

करीब डेढ़ दशक पहले कहावत प्रसिद्ध हुई थी, ‘सौ में नब्बे बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान।’ यह बात ट्रकों के पीछे लिखी नजर आती थी। यह एक प्रकार का सामाजिक अंतर्मंथन था। कि हम अपना मजाक उड़ाना भी जानते हैं। यह एक सचाई की स्वीकृति भी थी।  
घटनाओं को एकसाथ मिलाकर पढ़ें तो विचित्र बड़े रोचक अनुभव होते हैं। हाल में उपराष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में 771 वोट पड़े। इनमें से 11 वोट अवैध घोषित हुए। उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य वोट डालते हैं। वोट डालने में यह गलती सांसदों ने की है। इसे बड़ी गलती न मानें, पर यह बात किस तरफ इशारा करती है? यही कि हमारे लोकतंत्र ने संस्थाओं की रचना तो की, पर उनकी गुणवत्ता को सुनिश्चित नहीं किया।

Sunday, May 21, 2017

‘महाबली’ प्रधानमंत्री के तीन साल

केंद्र की एनडीए सरकार के काम-काज को कम के कम तीन नजरियों से देख सकते हैं। प्रशासनिक नज़रिए से,  जनता की निगाहों से और नेता के रूप में नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत पहचान के लिहाज से। प्रशासनिक मामलों में यह सरकार यूपीए-1 और 2 के मुकाबले ज्यादा चुस्त और दुरुस्त है। वजह इस सरकार की कार्यकुशलता के मुकाबले पिछले निजाम की लाचारी ज्यादा है। मनमोहन सिंह की बेचारगी की वजह से उनके आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने अमेरिका में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि देश पॉलिसी पैरेलिसिस से गुजर रहा है। अब आर्थिक सुधार 2014 के बाद ही हो पाएंगे।

यह सन 2012 की बात है। तब कोई नहीं कह सकता था कि देश के अगले प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी को बैठना है। इस बयान के करीब एक साल बाद कांग्रेस के दूसरे नंबर के नेता राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस में मनमोहन सरकार के एक अध्यादेश को फाड़कर फेंका था। सही या गलत नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस की कमजोरी का फायदा उठाया। वे पॉलिसी पैरेलिसिस की प्रतिक्रिया के रूप में सामने आए हैं। यह साबित करते हुए कि वे लाचार नहीं, महाबली प्रधानमंत्री हैं। 
देश चाहता है ताकतवर नेता। इसीलिए उन तमाम वादों-इरादों के पूरा न होने के बावजूद, जो 2014 के पहले किए गए थे, मोदी सरकार के पहले तीन साल जनता को परेशान नहीं करते। जबकि स्थिति यह है कि मुद्रास्फीति के आँकड़ों में गिरावट के बावजूद खुदरा बाजार की महंगाई में कोई कमी नहीं है। बेरोजगारी बदस्तूर जारी है। इधर आईटी क्षेत्र में बड़ी संख्या में छँटनी होने की खबरें हैं। कानून-व्यवस्था जैसी लंगड़ी थी, वैसी है। काला धन अब भी तहखानों में बैठा है। पुराने की जगह नए नोटों की गड्डियाँ किस जादू से आती हैं, यह हमने हाल में देख लिया। बल्लीमारान और चाँदनी चौक का हवाला कारोबार जारी है। कश्मीरी आतंकवाद पत्थरबाजी की छत्रछाया में नए जोशो-जुनून के साथ उंगलियों का वीबनाकर वीडियो जारी कर रहे हैं। माओवादी हमले रुके नहीं हैं। साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ा है। 

Saturday, February 16, 2013

हिन्द महासागर में भारत-विरोधी हवाओं पर ध्यान दें


सिद्धांततः भारत को मालदीव की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, पर वहाँ जो कुछ हो रहा है, उसे बैठे-बैठे देखते रहना भी नहीं चाहिए। पिछले साल जब मालदीव में सत्ता परिवर्तन हुआ था वह किसी प्रकार से न्यायपूर्ण नहीं था। फौजी ताकत के सहारे चुने हुए राष्ट्रपति को हटाना कहीं से उचित नहीं था। और अब उस राष्ट्रपति को चुनाव में खड़ा होने से रोकने की कोशिशें की जा रहीं है। इतना ही नहीं देश का एक तबका परोक्ष रूप से भारत-विरोधी बातें बोलता है। वह भी तब जब भारत उसका मददगार है। दरअसल हमें मालदीव ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया और खासतौर से हिन्द महासागर में भारत-विरोधी माहौल पैदा करने की कोशिशों के बाबत सतर्क रहना चाहिए।  16 फरवरी 2013 के हिन्दी ट्रिब्यून में प्रकाशित मेरा लेखः-
Maldivian army and policemen face supporters of Mohamed Nasheed, who resigned Tuesday from his post as Maldivian President, during a protest in Male on Wednesday.
मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद की गिरफ़्तारी का वॉरंट जारी होने के बाद उनका माले में स्थित भारतीय दूतावास में आना एक महत्वपूर्ण घटना है। पिछले साल फरवरी में जब नाशीद का तख्ता पलट किया गया था तब भारत सरकार ने उस घटना की अनदेखी की थी, पर लगता है कि अब यह घटनाक्रम किसी तार्किक परिणति की ओर बढ़ेगा। शायद हम अभी इस मामले को ठीक से समझ नहीं पाए हैं, पर यह बात साफ दिखाई पड़ रही है कि नाशीद को इस साल वहाँ अगस्त-सितम्बर में होने वाले चुनावों में खड़ा होने से रोकने की पीठिका तैयार की जा रही है। इसके पहले दिसम्बर 2012 में मालदीव सरकार ने भारतीय कम्पनी जीएमआर को बाहर का रास्ता दिखाकर हमें महत्वपूर्ण संदेश दिया था। माले के इब्राहिम नासिर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की देखरेख के लिए जीएमआर को दिया गया 50 करोड़ डॉलर का करार रद्द होना शायद बहुत बड़ी बात न हो, पर इसके पीछे के कारणों पर जाने की कोशिश करें तो हमारी चंताएं बढ़ेंगी। समझना यह है कि पिछले एक साल से यहाँ चल रही जद्दो-जेहद सिर्फ स्थानीय राजनीतिक खींचतान के कारण है या इसके पीछे चीन और पाकिस्तान का हाथ है।