दिल्ली में गलगोटिया विवि के ‘रोबोटिक डॉग’ और ‘ड्रोन सॉकर एरीना’ के कारण हुई फज़ीहत के बाद कुछ लोग पूछ रहे हैं कि आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भारत वास्तव में क्या कुछ कर भी पाएगा? हमारे पास उसके लिए पर्याप्त तकनीकी आधार और टेलेंट है भी या नहीं? बहरहाल इस घटना ने सरकार समर्थित टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्मों पर स्वदेशी नवाचार की गलत व्याख्या की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया है। साथ ही हमारे प्रचार-प्रिय सूचना तंत्र की पोल भी खोली है, जिससे सारी दुनिया में हमारी भद्द पिटी। सोशल-मीडिया के लिए ऐसी घटनाएँ चटपटे मसाले की तरह होती हैं, कुछ समय तक याद रहती हैं और फिर बिसरा दी जाती हैं। बहरहाल इस घटना ने हमें इसकी उपयोगिता और अपनी उपलब्धियों पर विचार करने की सलाह भी दी है।
इसके पहले जनवरी में दावोस सम्मेलन में
अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की प्रबंध
निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जिवा की इस टिप्पणी को लेकर भी विवाद हुआ था कि भारत 'सेकंड-टियर' एआई पावर है। राजनीति-शास्त्री आयन ब्रेमर ने भी इस बात का हवाला देते हुए कहा
था कि नए उभरते देशों को अमेरिका या चीन के साथ तालमेल बिठाना चाहिए। इन दोनों
बातों का तीखा जवाब देते हुए भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी
मंत्री, अश्विनी वैष्णव ने कहा,
भारत एआई देशों की ‘साफ पहली कतार’ में है।
उन्होंने एआई आर्किटेक्चर की पाँच परतों के रूप में वर्णित भारत की प्रगति का विवरण दिया: एप्लीकेशन, मॉडल, चिप, बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा के सभी पाँच स्तरों पर ' भारत अच्छी प्रगति' कर रहा है। उन्होंने स्टैनफर्ड विवि की एक रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें भारत को एआई प्रवेश और तैयारियों में तीसरे स्थान पर और वैश्विक स्तर पर एआई प्रतिभा में दूसरे स्थान पर रखा गया है। बाद में आईएमएफ की चीफ ने इस विवाद को ठंडा करते हुए कहा कि संगठन भारत की एआई प्रगति के लिए भारी प्रशंसा करता है। उन्होंने इस गलतफहमी के लिए मॉडरेटर को दोषी ठहराया।
