अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने की सुगबुगाहट के साथ ही उन्हें मीडिया ने सलाह देना शुरू कर दिया है। उन्हें फर्स्ट पोस्ट ने सलाह दी है कि राहुल द्रविड़ की तरह बैटिंग करना। महाभारत की तरह अखिलेश को पहला विरोध घर के भीतर से ही झेलना पड़ा है। आज इंडियन एक्सप्रेस के एसपी वर्सेज एसपी शीर्षक सम्पादकीय में अखिलेश को सलाह दी गई है कि कानून व्यवस्था को सुधारना होगा। सम्पादकीय में लिखा है कि The emasculation of the superintendent of police was a defining feature of the last Mulayam government. In what has been described as its “goonda raj”, the independence and efficacy of the police administration was systematically chipped away to ensure political bosses held sway. For the aam aadmi, if he fell out of political favour, there was no recourse as the thana was virtually outsourced to ruling party toughies and strongmen. When Mayawati was voted to power in 2007, her mandate came riding not on the back of the innovative “social engineering” attributed to the BSP chief, but on the widely shared revulsion against a regime that
Saturday, March 10, 2012
अखिलेश को सलाह
अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने की सुगबुगाहट के साथ ही उन्हें मीडिया ने सलाह देना शुरू कर दिया है। उन्हें फर्स्ट पोस्ट ने सलाह दी है कि राहुल द्रविड़ की तरह बैटिंग करना। महाभारत की तरह अखिलेश को पहला विरोध घर के भीतर से ही झेलना पड़ा है। आज इंडियन एक्सप्रेस के एसपी वर्सेज एसपी शीर्षक सम्पादकीय में अखिलेश को सलाह दी गई है कि कानून व्यवस्था को सुधारना होगा। सम्पादकीय में लिखा है कि The emasculation of the superintendent of police was a defining feature of the last Mulayam government. In what has been described as its “goonda raj”, the independence and efficacy of the police administration was systematically chipped away to ensure political bosses held sway. For the aam aadmi, if he fell out of political favour, there was no recourse as the thana was virtually outsourced to ruling party toughies and strongmen. When Mayawati was voted to power in 2007, her mandate came riding not on the back of the innovative “social engineering” attributed to the BSP chief, but on the widely shared revulsion against a regime that
Friday, March 9, 2012
विदेशी टिप्पणियाँ
हाल के चुनाव परिणामों पर कुछ विदेशी पत्र-पत्रिकाओ में टिप्पणियाँ प्रकाशित हुईं हैं, उनमें से कुछ ने ध्यान खींचा है। इन्हें पढ़कर देखें। कृपया लिंक पर जाकर हर टिप्पणी को विस्तार से पढ़ें
After India’s equivalent of mid-term elections, prospects dim for Congress and economic reform. But Indian democracy is in rude health
Voters, too, seem to like it. Turnout soared everywhere. In UP it rose from 46% in 2007 to around 60%. Elsewhere it reached 80%. An extra 24m people voted in the five states. That undercuts populist supporters of Anna Hazare, an anti-graft campaigner, who last year suggested that elected politicians are discredited in India. It is encouraging, too, that women are ever keener to take part: in all five states, female voters substantially outnumbered males.
Thursday, March 8, 2012
उत्तर प्रदेश से रिकॉर्ड मुस्लिम विधायक
मुस्लिम राजनीति का अध्ययन करने वालों के लिए यह रोचक सूचना होगी। उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस बार 69 मुसलमान प्रत्याशी जीते हैं। यह संख्या पिछली बार (55) से ज्यादा है बल्कि अब तक का रिकॉर्ड है। अनुपात के रूप में कुल विधायकों में से 17.12 प्रतिशत विधायक मुसलमान हैं। इसका मतलब है कि प्रदेश की मुसलमान जनसंख्या के अनुपात में मुसलमान प्रत्याशी जीते हैं। इनमें से 43 विधायक समाजवादी पार्टी के, 16 बसपा के, 3 पीस पार्टी के, 2 कौमी एकता दल के, 4 कांग्रेस के और एक विधायक इत्तेहाद-उल-मिल्लत का है।
चुनाव के सबक
हर चुनाव का कोई सबक होता है और हर चुनाव ऐतिहासिक होता है। पार्टियों का व्यवहार बताता है कि सबक कितनी ईमानदारी से लिया गया। इस बार के चुनाव में खास तौर से उत्तर प्रदेश में एंटी इनकम्बैंसी का फायदा लेने के लिए सिर्फ सपा ही तैयार नज़र आई, कांग्रेस और भाजपा कभी इस दौड़ में दिखाई नहीं दी। इसी बीजेपी का गोवा नेतृत्व सत्ता हाथ में लेने को तैयार नज़र आया। पंजाब में अमरेन्द्र सिंह भी विकल्प के रूप में आगे नहीं बढ़े। देश के चुनींदा अखबारों की सम्पादकीय टिप्पणियाँ दो बातों की ओर इशारा कर रही हैं। एक तो यह कि ये परिणाम कांग्रेस के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा दुखद हैं और दूसरे सत्तापक्ष के बराबर ही विपक्ष की भूमिका होती है। उसका काम है सत्ता की कमज़ोरियों पर से पर्दा उठाना। लोकतंत्र का काम तभी पूरा होता है। हिन्दू के सम्पादकीय में इस बात की ओर इशारा किया गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की निगाह में इस चुनाव ने पहचान की राजनीति को परास्त किया है। कहना मुश्किल है कि सपा और बसपा ने इस संदेश को ग्रहण किया है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार समाजवादी पार्टी को अब कमान अखिलेश के हाथों में सौंप देनी चाहिए।
Wednesday, March 7, 2012
इस ‘जीत’ के पीछे है एक ‘हार’
दावे हर पार्टी करती है. पर सबको यकीन नहीं होता। समाजवादी पार्टी को यकीन रहा होगा, पर इस बात को खुलकर मीडिया नहीं कह रहा था। वैसे ही जैसे 2007 में नहीं कह पा रहा था। फिर भी यह चुनाव समाजवादी पार्टी की जबर्दस्त जीत के साथ-साथ बसपा, कांग्रेस और भाजपा की हार के कारण भी याद किया जाएगा। इन पराजयों के बगैर सपा की विजय-कथा अपूर्ण रहेगी। साथ ही इसमें भविष्य के कुछ संदेश भी छिपे हैं, जो राजनीतिक दलों और मतदाताओं दोनों के लिए हैं।
यह वोट बसपा की सरकार के खिलाफ वोट था। वैसे ही जैसे पिछली बार सपा की सरकार के खिलाफ था। जिस तरह मुलायम सिंह पिछली बार नहीं मान पा रहे थे लगता है इस बार मायावती भी नहीं मान पा रहीं थीं कि हार सिर पर मंडरा रही है। सरकार को बेहद मामूली काम करना होता है। सामान्य प्रशासन। उसके प्रचार वगैरह की ज़रूरत नहीं होती। और न आलोचनाओं से घबराने की ज़रूरत होती है। छवि को ठीक रखने के लिए सावधान रहने की जरूरत होती है।
यह वोट बसपा की सरकार के खिलाफ वोट था। वैसे ही जैसे पिछली बार सपा की सरकार के खिलाफ था। जिस तरह मुलायम सिंह पिछली बार नहीं मान पा रहे थे लगता है इस बार मायावती भी नहीं मान पा रहीं थीं कि हार सिर पर मंडरा रही है। सरकार को बेहद मामूली काम करना होता है। सामान्य प्रशासन। उसके प्रचार वगैरह की ज़रूरत नहीं होती। और न आलोचनाओं से घबराने की ज़रूरत होती है। छवि को ठीक रखने के लिए सावधान रहने की जरूरत होती है।
Friday, March 2, 2012
कुदानकुलम में नादानियाँ
हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की दो बुनियादी बातें थीं। पहली थी स्वतंत्रता और दूसरी आत्म निर्भरता। स्वतंत्रता का मतलब अंग्रेजों की जगह भारतीय साहबों को बैठाना भर नहीं था। स्वतंत्रता का मतलब है विचार-अभिव्यक्ति, आस्था, आने-जाने, रहने, सभाएं करने वगैरह की आज़ादी। इसमें लोकतांत्रिक तरीके से प्रतिरोध की स्वतंत्रता बेहद महत्वपूर्ण है। सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास तब तक सम्भव नहीं जब तक नागरिक को प्रतिरोधी स्वर व्यक्त करने की आज़ादी न हो। हमारे संविधान में मौलिक अधिकारों को जिस तरह कानूनी संरक्षण दिया गया है वह विलक्षण है, पर व्यवहार में वह बात दिखाई नहीं पड़ती। 1947 से आज तक यह सवाल बार-बार उठता है कि जनांदोलनों के साथ हमारी व्यवस्था और पुलिस जिस तरह का व्यवहार करती है क्या वह अंग्रेजी सरकारों के तरीके से अलग है?
सुप्रीम कोर्ट ने रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव के अनुयायियों पर हुए लाठी चार्ज की निन्दा करके और दिल्ली पुलिस पर जुर्माना लगाकर इस बात को रेखांकित किया है कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध लोकतंत्र का बुनियादी अधिकार है। उसके साथ छेड़खानी नहीं होनी चाहिए। संविधान में मौलिक अधिकारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध भी हैं, पर धारा 144 जैसे अधिकार सरकारों को खास मौकों पर निरंकुश होने का मौका देते हैं। रामलीला मैदान में सोते व्यक्तियों पर लाठी चार्ज बेहद अमानवीय और अलोकतांत्रिक था, इसे अदालत ने स्वीकार किया है। यह आंदोलन किस हद तक शांतिपूर्ण था या उसकी माँगें कितनी उचित थीं, यह विचार का अलग विषय है। शांतिपूर्ण आंदोलन की भी मर्यादाएं हैं। आंदोलन के अराजक और हिंसक होने का समर्थन नहीं किया जा सकता, पर सरकारी मशीनरी की अराजकता तो और भी भयावह है।
सुप्रीम कोर्ट ने रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव के अनुयायियों पर हुए लाठी चार्ज की निन्दा करके और दिल्ली पुलिस पर जुर्माना लगाकर इस बात को रेखांकित किया है कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध लोकतंत्र का बुनियादी अधिकार है। उसके साथ छेड़खानी नहीं होनी चाहिए। संविधान में मौलिक अधिकारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध भी हैं, पर धारा 144 जैसे अधिकार सरकारों को खास मौकों पर निरंकुश होने का मौका देते हैं। रामलीला मैदान में सोते व्यक्तियों पर लाठी चार्ज बेहद अमानवीय और अलोकतांत्रिक था, इसे अदालत ने स्वीकार किया है। यह आंदोलन किस हद तक शांतिपूर्ण था या उसकी माँगें कितनी उचित थीं, यह विचार का अलग विषय है। शांतिपूर्ण आंदोलन की भी मर्यादाएं हैं। आंदोलन के अराजक और हिंसक होने का समर्थन नहीं किया जा सकता, पर सरकारी मशीनरी की अराजकता तो और भी भयावह है।
Friday, February 17, 2012
पश्चिम एशिया के क्रॉस फायर में भारत
बुधवार को ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेज़ाद ने तेहरान के रिसर्च रिएक्टर में अपने बनाए नाभिकीय ईंधन के रॉड्स के इस्तेमाल की शुरूआत करके अमेरिका और इस्रायल को एक साथ चुनौती दी है। इस्रायल कह रहा है कि पानी सिर से ऊपर जा रहा है अब कोई कड़ी कारवाई करनी होगी। ईरान ने नाभिकीय अप्रसार संधि पर दस्तखत कर रखे हैं। उसका कहना है एटम बम बनाने का हमारा इरादा नहीं है, पर ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए हमारे एटमी कार्यक्रमों को रोका नहीं जा सकता। इसके साथ ही खबरें मिल रही हैं कि दिल्ली में इस्रायली दूतावास की कार पर हुए हमले का सम्बन्ध बैंकॉक की घटनाओं से जोड़ा जा सकता है।
दिल्ली में इस्रायली दूतावास की गाड़ी में हुआ विस्फोट क्या किसी बड़े वैश्विक महाविस्फोट की भूमिका है? क्या भारतीय विदेश नीति का चक्का पश्चिम एशिया की दलदल में जाकर फँस गया है? एक साथ कई देशों को साधने की हमारी नीति में कोई बुनियादी खोट है? इसके साथ यह सवाल भी है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी लचर क्यों है? दिल्ली के सबसे संवेदनशील इलाके में इस्रायल जैसे देश की अरक्षित कार को निशाना बनाने में सफल होना हमारी विफलता को बताता है। चिन्ता की बात यह भी है कि प्रधानमंत्री निवास काफी करीब था।
दिल्ली में इस्रायली दूतावास की गाड़ी में हुआ विस्फोट क्या किसी बड़े वैश्विक महाविस्फोट की भूमिका है? क्या भारतीय विदेश नीति का चक्का पश्चिम एशिया की दलदल में जाकर फँस गया है? एक साथ कई देशों को साधने की हमारी नीति में कोई बुनियादी खोट है? इसके साथ यह सवाल भी है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी लचर क्यों है? दिल्ली के सबसे संवेदनशील इलाके में इस्रायल जैसे देश की अरक्षित कार को निशाना बनाने में सफल होना हमारी विफलता को बताता है। चिन्ता की बात यह भी है कि प्रधानमंत्री निवास काफी करीब था।
Saturday, February 11, 2012
लोकतांत्रिक राह में असम्भव कुछ भी नहीं
अपनी चुनाव प्रक्रिया को देखें तो आशा और निराशा दोनों के दर्शन होते हैं। पिछले 60 साल के अनुभव ने इस काम को काफी सुधारा है। दो दशक पहले बूथ कैप्चरिंग चुनाव का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। चुनाव आयोग की मुस्तैदी से वह काफी कम हो गई। वोटर आईडी और ईवीएम ने भी इसमें भूमिका निभाई। गो कि इन दोनों को लेकर शिकायतें हैं। प्रचार का शोर कम हुआ है। पैसे के इस्तेमाल की मॉनीटरिंग सख्त हुई है। पार्टियों को अपराधियों से बगलगीर होने में गुरेज़ नहीं, पर जनता ने उन्हें हराना शुरू कर दिया है, जिनकी छवि ज्यादा खराब है। मतलब यह भी नहीं कि बाहुबलियों की भूमिका कम हो गई। केवल एक प्रतीकात्मक संकेत है कि जनता को यह पसंद नहीं।
प्रत्याशियों के हलफनामों का विश्लेषण करके इलेक्शन वॉच अपनी वैबसाइट पर रख देता है, जिसका इस्तेमाल मीडिया अपने ढंग से करता है। प्रत्याशियों की आय के विवरण उपलब्ध हैं। अब यह तुलना सम्भव है कि पिछले चुनाव से इस चुनाव के बीच प्रत्याशी के आय-विवरण में किस प्रकार की विसंगति है। जन प्रतिनिधि की शिक्षा से लोकतंत्र का बहुत गहरा नाता नहीं है। व्यक्ति को समझदार और जनता से जुड़ाव रखने वाला होना चाहिए। काफी पढ़े-लिखे लोग भी जन-विरोधी हो सकते हैं। कानूनों का उल्लंघन और अपराध को बचाने की शिक्षा भी इसी व्यवस्था से मिलती है। बहरहाल प्रत्याशियों से इतनी अपेक्षा रखनी चाहिए कि वह मंत्री बने तो अपनी शपथ का कागज खुद पढ़ सके और सरकारी अफसर उसके सामने फाइल रखें तो उस पर दस्तखत करने के पहले उसे पढ़कर समझ सके।
प्रत्याशियों के हलफनामों का विश्लेषण करके इलेक्शन वॉच अपनी वैबसाइट पर रख देता है, जिसका इस्तेमाल मीडिया अपने ढंग से करता है। प्रत्याशियों की आय के विवरण उपलब्ध हैं। अब यह तुलना सम्भव है कि पिछले चुनाव से इस चुनाव के बीच प्रत्याशी के आय-विवरण में किस प्रकार की विसंगति है। जन प्रतिनिधि की शिक्षा से लोकतंत्र का बहुत गहरा नाता नहीं है। व्यक्ति को समझदार और जनता से जुड़ाव रखने वाला होना चाहिए। काफी पढ़े-लिखे लोग भी जन-विरोधी हो सकते हैं। कानूनों का उल्लंघन और अपराध को बचाने की शिक्षा भी इसी व्यवस्था से मिलती है। बहरहाल प्रत्याशियों से इतनी अपेक्षा रखनी चाहिए कि वह मंत्री बने तो अपनी शपथ का कागज खुद पढ़ सके और सरकारी अफसर उसके सामने फाइल रखें तो उस पर दस्तखत करने के पहले उसे पढ़कर समझ सके।
Friday, February 10, 2012
हाइपर मीडिया और हमारे स्टार
अभी पिछले दिनों यह खौफनाक खबर आई कि युवराज के सीने में कैंसर पनप रहा है। साथ में दिलासा भी थी कि इस बीमारी का इलाज संभव है। एक बेहतरीन खिलाड़ी, जिसने देश का सम्मान कई बार बनाया और बचाया अचानक संकट में आ गया। हम सब हैरान और परेशान हैं। इस हैरानी के बरक्स अचानक युवराज खबरों में आ गए। युवराज ही नहीं उनके फिजियो, फिजियो की डिगरी, युवराज के पिताजी, जोकि खुद भी क्रिकेटर रह चुके हैं और डॉक्टर तमाम लोग टीवी पर शाम के शो में उतर आए। और उसके बाद? उत्तर प्रदेश में मतदान की खबरें आने लगीं। कैमरा पैन कर दिया गया। विषय बदल गया, सरोकार बदल गए। युवराज की खबर पीछे चली गई, और सियासी समर की खबरें परवान चढ़ने लगीं।
Friday, February 3, 2012
बढ़ता मतदान माने क्या?
पाँच राज्यों के चुनाव की प्रक्रिया में तीन राज्यों में मतदान का काम पूरा हो चुका है। अच्छी खबर यह है कि तीनों जगह मतदान का प्रतिशत बढ़ा है। यह सच है कि मणिपुर में परम्परा से अच्छा मतदान होता रहा है, पर इन दिनों यह प्रदेश जातीय हिंसा और लम्बे ब्लॉकेड के बाद मतदान कर रहा था। इसी तरह उत्तराखंड में मौसम का खतरा था। उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश और गोवा में भी बेहतर मतदान होगा। इस बेहतर मतदान का मतलब क्या निकाला जाए? सामान्यतः हम मानते हैं कि ज्यादा वोट या तो समर्थन में पड़ता है या विरोध में। यानी जनता निश्चय की भूमिका में आती है। हमारी चुनाव प्रक्रिया में पाँच साल बाद एक मौका मिलता है जब जनता अपनी राय रखती है। वह राय भी समर्थन या विरोध के रूप में कभी-कभार व्यक्त होती है। वर्ना आमतौर पर बिचौलियों की मदद से पार्टियाँ वोट बटोरती हैं। पूरे परिवार और अक्सर पूरे मोहल्ले का वोट एक प्रत्याशी को जाता रहा है। जाति और धर्म भी चुनाव जीतने के बेहतर रास्ते हो सकते हैं, यह पिछले तीन दशक में देखने को मिला। और यह प्रवृत्ति खत्म नहीं हो रही, बल्कि बढ़ रही है।
Tuesday, January 31, 2012
जनता की खामोशियों को भी पढ़िए
गणतंत्र दिवस के दो दिन बाद मणिपुर में भारी मतदान हुआ और आज शहीद दिवस पर पंजाब और उत्तराखंड मतदान करेंगे। इसके बाद उत्तर प्रदेश का दौर शुरू होगा। और फिर गोवा। राज्य छोटे हों या बड़े परीक्षा लोकतांत्रिक प्रणाली की है। पिछले 62 साल में हमने अपनी गणतांत्रिक प्रणाली को कई तरह के उतार-चढ़ाव से गुजरते देखा है। पाँच राज्यों के इन चुनावों को सामान्य राजनीतिक विजय और पराजय के रूप में देखा जा सकता है और सत्ता के बनते बिगड़ते समीकरणों के रूप में भी। सामान्यतः हमारा ध्यान 26 जनवरी और 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्वों या चुनाव के मौके पर व्यवस्था के वृहत स्वरूप पर ज्यादा जाता है। मौज-मस्ती में डूबा मीडिया भी इन मौकों पर राष्ट्रीय प्रश्नों की ओर ध्यान देता है। राष्ट्रीय और सामाजिक होने के व्यावसायिक फायदे भी इसी दौर में दिखाई पड़ते हैं। हमारी यह संवेदना वास्तविक है या पनीली है, इसका परीक्षण करने वाले टूल हमारे पास नहीं हैं और न इस किस्म की सामाजिक रिसर्च है। बहरहाल इस पिछले हफ्ते की दो-एक बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है, क्योंकि वह हमारे बुनियादी सोच से जुड़ी है।
Saturday, January 28, 2012
क्रिकेट में भारतीय धुलाई के पुराने मौके
When India got whitewashed
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India suffered a 4-0 rout with a Test defeat in Adelaide. It would be our worst away streak in a single season - 8 losses, counting the 4-0 in England last July. The previous worst streak was 7 straight Tests losses in 1967-68 (3 vs England and 4 vs Australia)
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Season
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Opponent
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Venue
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Result
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1959
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England
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England
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England won 5-0
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1961-62
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West Indies
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West Indies
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West Indies won 5-0
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Four-Test series
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1967-68
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Australia
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Australia
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Australia won 4-0
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2011
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England
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England
|
England won 4-0
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2011-12
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Australia
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Australia
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Australia lead 4-0
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Three-Test series
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1967
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England
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England
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England won 3-0
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1974
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England
|
England
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England won 3-0
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1999-00
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Australia
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Australia
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Australia won 3-0
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Tuesday, January 24, 2012
इस वैश्विक ऑनलाइन बगावत के वैचारिक माने भी हैं
पिछले साल जनवरी के इन्हीं दिनों में ट्यूनीशिया से जनतांत्रिक विरोध की एक लहर उठी थी, जिसने पूरे पश्चिम एशिया और बाद में यूरोप और अमेरिका को हिलाकर रख दिया था। सोशल मीडिया के सहारे उठीं बगावत की वे लहरें अब भी चल रहीं हैं। पर पिछले हफ्ते इस क्रांति का एक और रूप देखने को मिला। पिछले बुधवार को दुनिया के सबसे बड़े ऑनलाइन एनसाइक्लोपीडिया विकीपीडिया ने अपनी सेवाओं को एक दिन के लिए ब्लैकआउट कर दिया। गूगल ने अपनी साइट पर एक ऑनलाइन पिटीशन जारी की जिसका 70 लाख से ज्यादा लोगों ने समर्थन किया। इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन की पिटीशन को 10 लाख से ज्यादा लोगों का समर्थन मिला। सायबर संसार में विचरण करने वालों ने इंटरनेट पर जो बगावत देखी उसकी तुलना किसी और कार्य से नहीं की जा सकती।
Friday, January 20, 2012
नए गठबंधनों को जन्म देगा उत्तर प्रदेश
पिछले साल का राजनीतिक समापन राज्यसभा में लोकपाल बिल को लेकर पैदा हुए गतिरोध के साथ हुआ था। वह गतिरोध जारी है। यूपीए के महत्वपूर्ण सहयोगी तृणमूल कांग्रेस के साथ शुरू हुआ टकराव अनायास नहीं था। और यह टकराव लगातार बढ़ रहा है। आने वाले वक्त की राजनीति और नए बनते-बिगड़ते समीकरणों की आहट सुनाई पड़ने लगी थी। पाँच राज्यों के चुनाव के शोर में ये आहटें नेपथ्य में चली गईं है। पर लगता है कि इस साल राष्ट्रीय राजनीति में कुछ बड़े फेरबदल होंगे, जो 2014 के लोकसभा चुनाव में उतरने वाले गठबंधनों को नई शक्ल देंगे।
इस साल राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव होंगे, उसके बाद जून में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होना है। भाजपा अध्यक्ष पद पर नितिन गडकरी का कार्यकाल भी इस साल के अंत में पूरा हो जाएगा। और यदि कांग्रेस लोकसभा चुनाव में किसी नए नेतृत्व के साथ उतरना चाहती है तो शायद प्रधानमंत्री पद पर बदलाव भी हो। इन सारे बदलावों का एक-दूसरे से कोई रिश्ता नहीं, पर इनका मिला-जुला असर देश की राजनीति और व्यवस्था पर पड़े बगैर नहीं रहेगा।
Thursday, January 19, 2012
भारतीय उम्मीदों का 'आकाश'
दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने तय किया है कि वह अपने स्कूल के छात्रों को आकाश टेबलेट पीसी मुफ्त में देगा। एमसीडी के 1740 स्कूलों में इस वक्त 9,42,135 बच्चे पढ़ने जाते हैं। इस काम पर 45 करोड़ रुपया खर्च करने की योजना बनाई गई है। देश में इस वक्त तकरीबन 22 करोड़ बच्चे स्कूल या कॉलेजों में पढ़ते हैं। भारत सरकार की योजना है कि अगले कुछ साल में इन सभी को आकाश पर काम करने का मौका मिलेगा। जिन बच्चों के पास अपना कम्प्यूटर नहीं होगा तो उन्हें स्कूल या कॉलेज की लाइब्रेरी से इसे हासिल करने का मौका मिलेगा।
Monday, January 16, 2012
सिर्फ दो महीने का सदाचार क्यों?
पत्रकार अम्बरीष कुमार ने फेसबुक पर लिखा है,’ इस बार कहीं भी सार्वजनिक रूप से न तो खिचड़ी का भंडारा हुआ और न लखनऊ में जगह जगह होने वाला तहरी भोज का आयोजन हुआ। न ही नव वर्ष और मकर संक्रांति के मौके पर किसी की शुभकामनाओं के बोर्ड और होर्डिंग। वजह सिर्फ चुनाव आयोग की सख्ती। भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा-जब एक एक प्याली चाय का खर्चा उम्मीदवारों के खर्च में जोड़ दिया जा रहा है तो तहरी भोज जिसमे हजारों की संख्या में लोग आते है उसका खर्च चुनाव खर्च में जुड़वाने का जोखम कौन मोल लेगा।’ इस बार के चुनाव में प्रतिमाएं ढकने का प्रकरण सबसे ज्यादा चर्चा में है। मुसलमानों को आरक्षण देने की योजना और कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और चुनाव आयोग के बीच अधिकार को लेकर छोटी सी चर्चा ने भी मामले को रोचक बना दिया।
Friday, January 13, 2012
कसौटी पर पाकिस्तानी लोकतंत्र
इस वक्त भारत के पाँच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं और हैं और हम अपने लोकतंत्र के गुण-दोषों को लेकर विमर्श कर रहे हैं, पड़ोसी देश पाकिस्तान से आ रही खबरें हमें इस बातचीत को और व्यापक बनाने को प्रेरित करती हैं। भारत और पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति एक नज़र में एक-दूसरे को प्रभावित करती नज़र नहीं आती, पर व्यापक फलक पर असर डालती है। मसलन भारत और पाकिस्तान के रिश्ते सामान्य हो जाएं तो पाकिस्तान की राजनीतिक संरचना बदल जाएगी। वहाँ की सेना की भूमिका बदल जाएगी। इसी तरह भारत में ‘राष्ट्रवादी’ राजनीति का रूप बदल जाएगा। रिश्ते बिगड़ें या बनें दोनों देशों के नागरिक एक-दूसरे में गहरी दिलचस्पी रखते हैं। इसीलिए पिछले साल अगस्त में अन्ना हजारे के अनशन के बाद पाकिस्तान में भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की हवाएं चलने लगी थीं। भारत की तरह पाकिस्तान में भी सबसे बड़ा मसला भ्रष्टाचार का है। पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाएं मुकाबले भारत के अपेक्षाकृत कमज़ोर हैं और देर से विकसित हो रहीं हैं, पर वहाँ लोकतांत्रिक कामना और जन-भावना नहीं है, ऐसा नहीं मानना चाहिए। हमारे मीडिया में इन दिनों अपने लोकतंत्र का तमाशा इस कदर हावी है कि हम पाकिस्तान की तरफ ध्यान नहीं दे पाए हैं।
Thursday, January 12, 2012
ममता बनर्जी की भी दूरगामी राजनीति है
बंगाल में कांग्रेस सत्तारूढ़
पार्टी के बजाय मुख्य विपक्षी दल जैसी नज़र आने लगी है। मानस भुनिया से लेकर दीपा दासमुंशी
तक शिकायत कर रहे हैं। रायगंज कॉलेज के छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस और तृणमूल कार्यकर्ताओं
के बीच बाकायदा संघर्ष हुआ और गिरफ्तारियाँ हुईं। शनिवार को ममता बनर्जी ने सबके सामने
साफ कहा कि कांग्रेस चाहे तो बंगाल सरकार से अलग हो जाए। कांग्रेस की प्रतिक्रिया है
कि हम जनता की सेवा करने आए हैं, करते रहेंगे। भीतर की कहानी यह है कि इस वक्त कांग्रेस
बीजेपी को लेकर उतनी परेशान नहीं है, जितना ममता बनर्जी को लेकर है। लोकपाल बिल पर
हुई फजीहत को लेकर कांग्रेस के प्रवक्ता बीजेपी पर गुस्सा उतार रहे हैं, पर निजी बातचीत
में स्वीकार कर रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस के साथ समन्वय में कोई चूक हो गई है।
बैकरूम पॉलिटिक्स का जवाब है जागरूक वोटिंग
उत्तर प्रदेश के चुनाव
का माहौल पिछले छह महीने से बना हुआ है। एक ओर सरकार की घोषणाएं तो दूसरी ओर मंत्रियों
की कतार का बाहर होना। सन 2007 के चुनाव के ठीक पहले का माहौल इतना सरगर्म नहीं था।
हाँ इतना समझ में आता था कि मुलायम सरकार गई और मायावती की सरकार आई। मुलायम सरकार
के पतन का सबसे बड़ा कारण यह माना जाता है कि प्रदेश में आपराधिक तत्वों का बोलबाला
था। तब क्या जनता ने अपराध के खिलाफ वोट दिया था?
यह बात शहरों या गाँवों
में भी कुछ उन लोगों पर शायद लागू होती हो, जो मसलों और मुद्दों पर वोट देते हैं। पर
सच यह है कि उस चुनाव में समाजवादी पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ा था। सन 2002 के
25.37 से बढ़कर वह 2007 में 25.43 प्रतिशत हो गया था। फिर भी सीटों की संख्या 143 से
घटकर 97 रह गई। वह न तो मुलायम सिंह की हार थी और न गुंडागर्दी की पराजय। वह सीधे-सीधे
चुनाव की सोशल इंजीनियरिंग थी।
Monday, January 2, 2012
अंधेर नगरी का लोकतंत्र
नए साल का पहला दिन आराम का दिन था। आज काम का दिन है। हर नया साल चुनौतियों का साल होता है। पर हर साल की चुनौतियाँ गुणधर्म और प्रकृति में अनोखी होती हैं। हर दिन और हर क्षण पहले से फर्क होता है। पर जब हम समय का दायरा बढ़ाते हैं तो उन दायरों की प्रकृति भी परिभाषित होती है। पिछला साल दुनियाभर में स्वतः स्फूर्त जनांदोलनों का साल था। भारत में उतने बड़े आंदोलन नहीं हुए, जितने पश्चिम एशिया, उत्तरी अफ्रीका और यूरोप के देशों में हुए। संकट खत्म नहीं हुआ है, बल्कि और गहरा रहा है। इसके घेरे में अमेरिका भी है, जहाँ इस साल बराक ओबामा को राष्ट्रपति पद के चुनाव में फिर से उतरना है। ओबामा अमेरिका में नई आशा की किरण लेकर आए थे। पर यह उम्मीद जल्द टूट गई। यह साल उम्मीदों की परीक्षाओं का साल है। आर्थिक दृष्टि से भारत, चीन और कुछ अन्य विकासशील देश इस संकट से बाहर हैं। इन देशों में राजनीतिक बदलाव की आहटें हैं। इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक दुनिया के लिए नई परिभाषाएं गढ़ने वाला है। हमारे लिए भी इसमें कुछ संदेश हैं।
Friday, December 30, 2011
मुआ स्वांग खूब रहा
कानून सड़क पर नहीं संसद में बनते हैं। शक्तिशाली लोकपाल विधेयक सर्वसम्मति से पास होगा। देश की संवैधानिक शक्तियों को काम करने दीजिए। राजनीति को बदनाम करने की कोशिशें सफल नहीं होंगी। इस किस्म के तमाम वक्तव्यों के बाद गुरुवार की रात संसद का शीतकालीन सत्र भी समाप्त हो गया। कौन जाने कल क्या होगा, पर हमारा राजनीतिक व्यवस्थापन लोकपाल विधेयक को पास कराने में कामयाब नहीं हो पाया। दूसरी ओर अन्ना मंडली की हवा भी निकल गई। इस ड्रामे के बाद आसानी से कहा जा सकता है कि देश की राजनीतिक शक्तियाँ ऐसा कानून नहीं चाहतीं। और उनपर जनता का दबाव उतना नहीं है जितना ऐसे कानूनों को बनाने के लिए ज़रूरी है।
Tuesday, December 27, 2011
किसे लगता है 'लोकतंत्र' से डर?
30 जनवरी महात्मा गांधी की 64वीं पुण्यतिथि है। पंजाब और उत्तराखंड के वोटरों को ‘शहीद दिवस’ के मौके पर अपने प्रदेशों की विधानसभाओं का चुनाव करने का मौका मिलेगा। क्या इस मौके का कोई प्रतीकात्मक अर्थ भी हो सकता है? हमारे राष्ट्रीय जीवन के सिद्धांतों और व्यवहार में काफी घालमेल है। चुनाव के दौरान सारे छद्म सिद्धांत किनारे होते हैं और सामने होता है सच, वह जैसा भी है। 28 जनवरी से 3 मार्च के बीच 36 दिनों में पाँच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव होंगे। एक तरीके से यह 2012 के लोकसभा चुनाव का क्वार्टर फाइनल मैच है। 2013 में कुछ और महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव हैं, जिनसे देश की जनता का मूड पता लगेगा। उसे सेमीफाइनल कहा जा सकता है। क्योंकि वह फाइनल से ठीक पहले का जनमत संग्रह होगा। जनमत संग्रह लोकतंत्र का सबसे पवित्र शब्द है। इसी दौरान तमाम अपवित्रताओं से हमारा सामना होगा।
Saturday, December 24, 2011
एक अदद नौकरी की तलाश में भटकते युवा
युवा आबादी के लिहाज से भारत सबसे बड़ा देश है। इस बदलते देश के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण बात है। इतनी बड़ी युवा आबादी हमारे लिए बहुत उपयोगी है। देश का निर्णाण युवा हाथों से ही होता है। पर क्या हम अपनी इस सम्पदा का इस्तेमाल कर पा रहे हैं? युवा वर्ग चुस्त-दुरुस्त और ठीक से प्रशिक्षित है तो देश की शक्ल बदलने में देर नहीं लगेगी। पर यदि वह कुंठित, हताश और निराश है तो यह खौफनाक है। युवा पत्रकार गिरिजेश कुमार बेरोजगारी को लेकर कुछ सवाल उठा रहे हैं।
पटना की अमृता बदहवासी में अपना मानसिक संतुलन खोकर बक्सर पहुँच गई। उसकी शिक्षक पात्रता परीक्षा नामक महापरीक्षा खराब चली गई थी। बाद में जी आर पी बक्सर की मदद से उसे उसके परिवार वालों को सौंपा गया। यह खबर अखबार के चौदहवें पन्ने पर बॉटम में एक कॉलम में आई। कुछ अख़बारों ने इसे ज़रुरी भी नहीं समझा। हालाँकि, सवाल यह नहीं है कि इस खबर को किस
पन्ने पर छपना चाहिए, या छपना चाहिए भी या नहीं? सवाल यह है कि रोजगार की एक संभावना युवाओं की मनोदशा को जिस तरह से प्रभावित कर रहा है, वह समाज के लिए कितना हितकर है? शिक्षा जैसी चीज़ अगर पेट पालने का ज़रिया बन जाए तो समाज को शिक्षित करने का मूल उद्देश्य का खोना लाज़िमी है। लेकिन बेरोज़गारी के आलम में वे लोग क्या करें जिनपर पेट और परिवार की जिम्मेदारी है, यह भी बड़ा सवाल है?
विदित हो कि बिहार सरकार ने सरकारी प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में शिक्षक नियुक्ति के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित की थी। जो क्रमशः 20 और 21 दिसंबर को समाप्त हो गयी। राज्य भर में 1380 परीक्षा केन्द्रों पर आयोजित इस परीक्षा में तक़रीबन 30 लाख परीक्षार्थी शामिल हुए थे।
Friday, December 23, 2011
कांग्रेस की इस युद्ध घोषणा में कितना दम है?
कांग्रेस का मुकाबला अन्ना हजारे से नहीं भाजपा और वाम मोर्चे से है। उसका तात्कालिक एजेंडा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में सफलता हासिल करना है। उम्मीद थी कि संसद के इस सत्र में कांग्रेस कुछ विधेयकों के मार्फत अपने नए कार्यक्रमों की घोषणा करेगी। पिछले साल घोटालों की आँधी में सोनिया गांधी ने बुराड़ी सम्मेलन के दौरान पार्टी को पाँच सूत्री प्रस्ताव दिया था, पर अन्ना-आंदोलन के दौरान वह पीछे रह गया। सोनिया गांधी अचानक युद्ध मुद्रा में नजर आ रहीं हैं। क्या कांग्रेस इन तीखे तेवरों पर कायम रह सकेगी?
Monday, December 19, 2011
भेड़ों की भीड़ नहीं जागरूक जनता बनिए
सब ठीक रहा तो अब लोकपाल बिल आज या कल संसद में पेश कर दिया जाएगा। साल खत्म होते-होते देश पारदर्शिता के अगले पायदान पर पैर रख देगा। और कुछ नए सवालों के आधार तैयार कर लेगा। समस्याओं और समाधानों की यह प्रतियोगिता जारी रहेगी। शायद अन्ना हजारे की टीम 27 को जश्न का समारोह करे। हो सकता है कि इस कानून से असहमत होकर आंदोलन के रास्ते पर जाए। पर क्या हम अन्ना हजारे के या सरकार के समर्थक या विरोधी के रूप में खुद को देखते हैं? सामान्य नागरिक होने के नाते हमारी भूमिका क्या दर्शक भर बने रहने की है? दर्शक नहीं हैं कर्ता हैं तो कितने प्रभावशाली हैं? कितने जानकार हैं और हमारी समझ का दायरा कितना बड़ा है? क्या हम हताशा की पराकाष्ठा पर पहुँच कर खामोश हो चुके हैं? या हमें इनमें से किसी प्लेयर पर इतना भरोसा है कि उससे सवाल नहीं करना चाहते?
Friday, December 16, 2011
बहुत हुई बैठकें, अब कानून बनाइए
सरकार पहले कहती है कि हमें समय दीजिए। अन्ना के अनशन की घोषणा के बाद जानकारी मिलती है कि शायद मंगलवार को विधेयक आ जाएगा। शायद सदन का कार्यकाल भी बढ़ेगा। यह सब अनिश्चय की निशानी है। सरकार को पहले अपनी धारणा को साफ करना चाहिए।
लोकपाल पर यह पहली सर्वदलीय बैठक नहीं थी। इसके पहले 3 जुलाई को भी एक बैठक हो चुकी थी जब संयुक्त ड्राफ्टिंग समिति की बैठकों के बाद सरकार ने अपना मन लगभग बना लिया था। अगस्त के अंतिम सप्ताह में संसद की इच्छा पर चर्चा हुई तब भी प्रायः सभी दलों की राय सामने आ गई थी। बुधवार की बैठक में पार्टियों के रुख में कोई बड़ा बदलाव नहीं था। बहरहाल 1968 से अब तक के समय को जोड़ें तो देश की संसदीय राजनीति के इतिहास में किसी भी कानून पर इतना लम्बा विचार-विमर्श नहीं हुआ होगा। यह अच्छी बात है और खराब भी। खराब इसलिए कि केवल इस कानून के कारण देश का, मीडिया का और संसद का काफी समय इस मामले पर खर्च हो रहा है जबकि दूसरे मामले भी सामने खड़े हैं। अर्थ-व्यवस्था संकट में है, औद्योगिक उत्पादन गिर रहा है, यूरो और डॉलर के झगड़े में रुपया कमजोर होता जा रहा है। जनता को महंगाई और बेरोजगारी सता रही है। ऐसे में पार्टियाँ सत्ता की राजनीति के फेर में फैसले पर नहीं पहुँच पा रहीं हैं।
लोकपाल पर यह पहली सर्वदलीय बैठक नहीं थी। इसके पहले 3 जुलाई को भी एक बैठक हो चुकी थी जब संयुक्त ड्राफ्टिंग समिति की बैठकों के बाद सरकार ने अपना मन लगभग बना लिया था। अगस्त के अंतिम सप्ताह में संसद की इच्छा पर चर्चा हुई तब भी प्रायः सभी दलों की राय सामने आ गई थी। बुधवार की बैठक में पार्टियों के रुख में कोई बड़ा बदलाव नहीं था। बहरहाल 1968 से अब तक के समय को जोड़ें तो देश की संसदीय राजनीति के इतिहास में किसी भी कानून पर इतना लम्बा विचार-विमर्श नहीं हुआ होगा। यह अच्छी बात है और खराब भी। खराब इसलिए कि केवल इस कानून के कारण देश का, मीडिया का और संसद का काफी समय इस मामले पर खर्च हो रहा है जबकि दूसरे मामले भी सामने खड़े हैं। अर्थ-व्यवस्था संकट में है, औद्योगिक उत्पादन गिर रहा है, यूरो और डॉलर के झगड़े में रुपया कमजोर होता जा रहा है। जनता को महंगाई और बेरोजगारी सता रही है। ऐसे में पार्टियाँ सत्ता की राजनीति के फेर में फैसले पर नहीं पहुँच पा रहीं हैं।
Monday, December 12, 2011
नीति-अनीति और सत्ता की राजनीति
अन्ना हजारे के आंदोलन का अगला चरण सत्ता की राजनीति के अपेक्षाकृत ज्यादा करीब होगा। राहुल गांधी चाहते तो इस सभा में जाते और वही घोषणा करते जो एक-दो दिन बाद सरकार करने वाली है तो कांग्रेस के लिए वह बेहतर होता। बहरहाल कांग्रेस का गणित कुछ और है। या वह इतना अस्पष्ट है कि कांग्रेस को भी समझ में नहीं आ रहा। पर चिन्ता का विषय है समूची राजनीति का विचार और नीति से दूर होते जाना। लोकपाल विधेयक से बड़ा भारी बदलाव नहीं हो जाएगा। खराबी जन-प्रतिनिधित्व कानून में है और सामाजिक व्यवस्था में भी। इसके लिए अलग-अलग किस्म की राजनीति की दरकार है। हमारी पहली ज़रूरत है राजनीति को वैधानिकता प्रदान करना। एक अरसे से यह अपराधियों के चंगुल में फँसी है।
पिछले हफ्ते एक रोज पटना से दिल्ली जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस को अचानक रोक लिया गया। पता लगा कि कुछ सांसदों को प्रथम श्रेणी एसी की बर्थ नहीं मिल पाईं। ट्रेन से कुल 18 सांसद यात्रा करने वाले थे। उनमें से छह को प्रथम एसी में जगह मिल पाई। बाकी को सेकंड एसी में जगह दी गई है। ऐसा पहली बार हुआ। कुछ सासंदों की ट्रेन छूटी या कुछ देर से आए। संसदीय कार्यों में उनकी ठीक से शिरकत नहीं हो पाई। बहरहाल इसकी शिकायत रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी से की गई। उन्होंने सासंदों से माफी माँगी। कुछ सरकारी अफसरों का तबादला किया गया। साथ ही रेलमंत्री ने आश्वासन दिया कि भविष्य में सासंदों के रिजर्वेशन का काम सीधे रेल बोर्ड से किया जाएगा। रेलमंत्री ने एक जानकारी यह भी दी कि सरकारी सर्कुलर है कि कोई नया डिब्बा लगाने के लिए तीन दिन पहले से सूचना होनी चाहिए। वह सूचना नहीं थी इसलिए नया डिब्बा नहीं लग पाया।
Sunday, December 11, 2011
सरकार बनाम सरकार !!!
लड़ाई राजनीति में होनी चाहिए सरकारों में नहीं
नवम्बर के आखिरी हफ्ते में लखनऊ में हुई एक रैली में मायावती ने आरोप लगाया कि हमने केन्द्र सरकार से 80,000 करोड़ रुपए की सहायता माँगी थी, पर हमें मिला कुछ नहीं। यही नहीं संवैधानिक व्यवस्थाओं के तहत जो कुछ मिलना चाहिए वह भी नहीं मिला। संघ सरकार पर राज्य सरकार का करोड़ों रुपया बकाया है। इस तरह केन्द्र सरकार उत्तर प्रदेश के विकास को बंधक बना रही है। कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में अपनी खस्ता हालत को देखकर इस कदर डरी हुई है कि उसके महासचिव राहुल गांधी दिल्ली में सारे काम छोड़कर उत्तर प्रदेश में ‘नाटकबाजी’ कर रहे हैं।
उधर राहुल गांधी ने बाराबंकी की एक रैली में कहा कि लखनऊ में एक हाथी विकास योजनाओं का पैसा खा रहा है। पिछले बीस साल से उत्तर प्रदेश में कोई काम नहीं हुआ है। देश आगे जा रहा है और उत्तर प्रदेश पीछे। राहुल गांधी का कहना है कि मनरेगा और शिक्षा से जुड़ी जो रकम उत्तर प्रदेश को मिली उसका दुरुपयोग हुआ। दो साल पहले संसद में पूछे गए एक सवाल में बताया गया था कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में सबसे ज्यादा शिकायतें उत्तर प्रदेश से मिली हैं। हाल में केन्द्रीय रोजगार गारंटी परिषद के सदस्य संदीप दीक्षित ने कहा कि प्रदेश में मनरेगा के तहत 10,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का घोटाला है। हाल में केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने भी इसी किस्म के आरोप लगाए और इसकी सीबीआई जाँच की माँग भी की। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने इस घोटाले को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय पर सीधे आरोप लगाए हैं। उत्तर प्रदेश में ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के घोटालों को लेकर सीएजी की कोई रपट भी जल्द आने वाली है। प्रदेश में तीन वरिष्ठ डॉक्टरों की हत्या के बाद से उत्तर प्रदेश की ग्रामीण स्वास्थ्य योजना को लेकर कांग्रेस पार्टी लगातार आलोचना कर रही है।
नवम्बर के आखिरी हफ्ते में लखनऊ में हुई एक रैली में मायावती ने आरोप लगाया कि हमने केन्द्र सरकार से 80,000 करोड़ रुपए की सहायता माँगी थी, पर हमें मिला कुछ नहीं। यही नहीं संवैधानिक व्यवस्थाओं के तहत जो कुछ मिलना चाहिए वह भी नहीं मिला। संघ सरकार पर राज्य सरकार का करोड़ों रुपया बकाया है। इस तरह केन्द्र सरकार उत्तर प्रदेश के विकास को बंधक बना रही है। कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में अपनी खस्ता हालत को देखकर इस कदर डरी हुई है कि उसके महासचिव राहुल गांधी दिल्ली में सारे काम छोड़कर उत्तर प्रदेश में ‘नाटकबाजी’ कर रहे हैं।
उधर राहुल गांधी ने बाराबंकी की एक रैली में कहा कि लखनऊ में एक हाथी विकास योजनाओं का पैसा खा रहा है। पिछले बीस साल से उत्तर प्रदेश में कोई काम नहीं हुआ है। देश आगे जा रहा है और उत्तर प्रदेश पीछे। राहुल गांधी का कहना है कि मनरेगा और शिक्षा से जुड़ी जो रकम उत्तर प्रदेश को मिली उसका दुरुपयोग हुआ। दो साल पहले संसद में पूछे गए एक सवाल में बताया गया था कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में सबसे ज्यादा शिकायतें उत्तर प्रदेश से मिली हैं। हाल में केन्द्रीय रोजगार गारंटी परिषद के सदस्य संदीप दीक्षित ने कहा कि प्रदेश में मनरेगा के तहत 10,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का घोटाला है। हाल में केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने भी इसी किस्म के आरोप लगाए और इसकी सीबीआई जाँच की माँग भी की। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने इस घोटाले को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय पर सीधे आरोप लगाए हैं। उत्तर प्रदेश में ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के घोटालों को लेकर सीएजी की कोई रपट भी जल्द आने वाली है। प्रदेश में तीन वरिष्ठ डॉक्टरों की हत्या के बाद से उत्तर प्रदेश की ग्रामीण स्वास्थ्य योजना को लेकर कांग्रेस पार्टी लगातार आलोचना कर रही है।
Friday, December 9, 2011
असमंजसों से घिरे समाज का ठंडा बस्ता
खुदरा कारोबार में विदेशी पूँजी निवेश का मामला भले ही स्थगित माना जा रहा हो, पर यह एक तरीके से होल्डबैक नहीं रोल बैक है। यह मानने का सबसे बड़ा कारण है इस स्थगन की समय सीमा का तय न होना। यूपीए सरकार के खाते में यह सबसे बड़ी पराजय है। यूपीए-1 के दौर में न्यूक्लियर डील को लेकर सरकार ने वाम मोर्चे के साथ बातचीत के कई दौर चलाने के बाद सीधे भिड़ने का फैसला किया था। ऐसा करके उसने जनता की हमदर्दी हासिल की और वाम मोर्चा जनता की नापसंदगी का भागीदार बना। इस बार सरकार विपक्ष के कारण बैकफुट पर नहीं आई बल्कि सहयोगी दलों के कारण उसे अपना फैसला बदलना पड़ा। अब दो-तीन सवाल हैं। क्या सहयोगी दल भविष्य में इस बात को स्वीकार कर लेंगे? आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के संदर्भ में कांग्रेस और बीजेपी लगभग एक जैसी नीतियों पर चलते हैं। क्या बीजेपी खुदरा बाजार में विदेशी पूँजी के निवेश पर सहमत होगी? क्या अब कोई फॉर्मूला बनेगा, जिसके तहत विदेशी निवेश को चरणबद्ध अनुमति दी जाएगी? और क्या अब उदारीकरण पूरी तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
Monday, December 5, 2011
बंद गली में खड़ी कांग्रेस
कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद गुरदास दासगुप्त का कहना है कि रिटेल में एफडीआई के फैसले को स्थगित करने का फैसला भारत सरकार का है, बंगाल सरकार का नहीं। इसकी घोषणा बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने की। दो रोज पहले तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कह रहे थे कि यह फैसला सुविचारित है और इसे वापस लेने की कोई सम्भावना नहीं है। ममता बनर्जी ने वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी का हवाला देकर कहा है कि जबतक इस मामले में सर्वानुमति नहीं होती यह फैसला स्थगित रहेगा। प्रणब मुखर्जी का कहना है कि सरकार का दृष्टिकोण संसद में व्यक्त किया जाएगा। संसद का सत्र चल रहा है मैं कोई घोषणा नहीं कर सकता। बुधवार को पता लगेगा कि सरकार क्या कह रही है, पर लगता है कि यूपीए ने अपना मृत्युलेख लिख लिया है। क्या सरकार अपनी पराजय की घोषणा करने वाली है? मनमोहन सरकार के सबसे महत्वाकांक्षी सुधार कार्यक्रमों में से एक के ठंडे बस्ते में जाने के राजनीतिक संदेश साफ हैं। इसके आगे के सुधार कार्यक्रम अब सामने आ भी नहीं पाएंगे।
Friday, December 2, 2011
रिटेल बाजार खुलने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा
ऐसा नहीं कि हमारे खुदरा कारोबार में बड़े प्लेयर पहले से नहीं थे। बिग बाजार, स्पेंसर, मोर और ईजी डे के स्टोर पहले से खुले हुए हैं। ईज़ी डे का पार्टनर पहले से वॉलमार्ट है। दुनिया की कौन सी चीज़ हमारे उपभोक्ता को उपलब्ध नहीं है। फर्क अब यह पड़ेगा कि मल्टी ब्रांड स्टोर खोलने में विदेशी कम्पनियाँ भी सामने आ सकेंगी। परोक्ष रूप में भारती-वॉलमार्ट पहले से मौजूद है। क्या हम यह कहना चाहते हैं कि देशी पूँजी पवित्र और विदेशी पूंजी पापी है? बेशक हमें अपने उत्पादकों के हित भी देखने चाहिए। वॉलमार्ट अपनी काफी खरीद चीन से करके अमेरिकी उपभोक्ता को सस्ते में पहुँचाता है। हमारे उत्पादक बेहतर माल बनाएंगे तो वह भारतीय माल खरीदेगा। हमें उनसे नई तकनीक और अनुभव चाहिए। आप देखिएगा भारतीय कारोबारी खुद आगे आ जाएंगे। नए शहरों और छोटे कस्बों में इतना बड़ा बाजार है कि वॉलमार्ट उसके सामने बौना साबित होगा। वस्तुतः सप्लाई चेन का गणित है। यदि बिचौलिए कम होंगे तो माल सस्ता होगा और किसान को प्रतियोगिता के कारण बेहतर कीमत मिलेगी। इसके अलावा भी अनेक तर्क हैं। तर्क इसके विपरीत भी हैं, पर यह फैसला ऐसी आफत नहीं लाने वाला है जैसी कि साबित की जा रही है। हमें देखना यह चाहिए कि आर्थिक गतिविधियों का लाभ गरीबों तक पहुँचे। आर्थिक गतिविधियों को रोकने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। इन बातों के पीछे की राजनीति को भी पढ़ने की कोशिश करें। उत्तर प्रदेश सरकार ने रिलायंस फ्रेश स्टोर नहीं खुलने दिए बाकी खुलने दिए। इससे क्या हासिल हुआ? और क्या साबित हुआ?
लगता है संसद का शीत सत्र भी हंगामों की भेंट चढ़ जाएगा। खुदरा कारोबार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की सरकारी नीति के विरोध में खिंची तलवारें बता रही हैं कि इस मामले का समाधान जल्द नहीं निकलेगा। आर्थिक उदारीकरण के शेष बचे कदम उठाने की कोशिशें और मुश्किल हो जाएंगी। राजनीतिक भ्रम की यह स्थिति देश के लिए घातक है। उदारीकरण को लेकर हमारे यहाँ कभी वैचारिक स्पष्टता नहीं रही। दो दशक के उदारीकरण का अनुभव एक-तरफा संकटों और समस्याओं का भी नहीं रहा है। उसके दो-तरफा अनुभव हैं। इस दौरान असमानता, महंगाई और बेरोजगारी की जो समस्याएं उभरी हैं वे उदारीकरण की देन हैं या हमारी राज-व्यवस्था की अकुशलता के कारण हैं? इस राजनीतिक अराजकता में शामिल सभी दल किसी न किसी रूप में उदारीकरण की गंगा में स्नान कर चुके हैं, पर मौका लगते ही वे इसके विरोध को वैतरणी पार करने का माध्यम समझे बैठे हैं।
लगता है संसद का शीत सत्र भी हंगामों की भेंट चढ़ जाएगा। खुदरा कारोबार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की सरकारी नीति के विरोध में खिंची तलवारें बता रही हैं कि इस मामले का समाधान जल्द नहीं निकलेगा। आर्थिक उदारीकरण के शेष बचे कदम उठाने की कोशिशें और मुश्किल हो जाएंगी। राजनीतिक भ्रम की यह स्थिति देश के लिए घातक है। उदारीकरण को लेकर हमारे यहाँ कभी वैचारिक स्पष्टता नहीं रही। दो दशक के उदारीकरण का अनुभव एक-तरफा संकटों और समस्याओं का भी नहीं रहा है। उसके दो-तरफा अनुभव हैं। इस दौरान असमानता, महंगाई और बेरोजगारी की जो समस्याएं उभरी हैं वे उदारीकरण की देन हैं या हमारी राज-व्यवस्था की अकुशलता के कारण हैं? इस राजनीतिक अराजकता में शामिल सभी दल किसी न किसी रूप में उदारीकरण की गंगा में स्नान कर चुके हैं, पर मौका लगते ही वे इसके विरोध को वैतरणी पार करने का माध्यम समझे बैठे हैं।
Wednesday, November 30, 2011
मीडिया अपनी साख के बारे में सोचे, लोकपाल से न घबराए
हमारे देश में प्रेस की आज़ादी नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन की तरह प्रेस नाम की संस्था को मिले अधिकार से यह कुछ अलग है। पहली नज़र में यह अधिकार अपेक्षाकृत कमज़ोर लगता है, पर व्यावहारिक रूप से देखें तो जनता का अधिकार होने के नाते यह बेहद प्रभावशाली है। संविधान निर्माताओं ने इस अधिकार पर पाबंदियों के बारे में नहीं सोचा था। पर 1951 में हुए पहले संविधान संशोधन के माध्यम से इन स्वतंत्रताओं पर अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत युक्तियुक्त पाबंदियाँ भी लगाईं गईं। ये पाबंदियाँ अलग-अलग कानूनों के रूप में मौज़ूद हैं। भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ रिश्तों, लोक-व्यवस्था, शिष्टाचार और सदाचार, अश्लीलता, न्यायालय की अवमानना, मानहानि और अपराध उद्दीपन को लेकर कानून बने हैं। इसी तरह पत्रकारों की हित-रक्षा का कानून वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट बना है। इन कानूनों को लागू करने में कोई दिक्कत नहीं तो दायरा लोकपाल का हो या उच्चतम न्यायालय का इससे फर्क क्या पड़ता है?
Monday, November 28, 2011
अर्थनीति को चलाने वाली राजनीति चाहिए
सन 1991 में जब पहली बार आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को देश में लागू किया गया था तब कई तरह की आशंकाएं थीं। मराकेश समझौते के बाद जब 1995 में भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना तब भी इन आशंकाओं को दोहराया गया। पिछले बीस साल में इन अंदेशों को बार-बार मुखर होने का मौका मिला, पर आर्थिक उदारीकरण का रास्ता बंद नहीं हुआ। दिल्ली में कांग्रेस के बाद एनडीए की सरकार बनी। वह भी उस रास्ते पर चली। बंगाल और केरल में वाम मोर्चे की सरकारें आईं और गईं, पर उन्होंने भी उदारीकरण की राह ही पकड़ी। इस तरह मुख्यधारा की राजनीति में उदारीकरण की बड़ी रोचक तस्वीर बनी है। ज्यादातर बड़े नेता उदारीकरण का खुला समर्थन नहीं करते हैं, पर सत्ता में आते ही उनकी नीतियाँ वैश्वीकरण के अनुरूप हो जाती हैं। आर्थिक उदारी के दो दशकों का अनुभव यह है कि हम न तो उदारीकरण के मुखर समर्थक हैं और न विरोधी। इस अधूरेपन का फायदा या नुकसान भी अधूरा है।
नीतीश सरकार के छह साल
नीतीश सरकार के छः साल:न्याय के साथ
विकास की वास्तविक हकीकत
डेढ़ दशक तक जंगल राज भुगत चुके बिहार के लोगों के लिए 24 नवंबर 2005 की सुबह जब स्पष्ट बहुमत के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में आया तो लगा कि अब शायद बिहार का कायाकल्प हो जाएगा। बीमारू और सबसे पिछड़े राज्य के रूप में जाने जानेवाले बिहार की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पिछले पन्द्रह वर्षों के लालू-राबड़ी राज में जर्जर हो चुकी थी ऐसे में नयी सरकार के सामने दो चुनौतियाँ थी,एक जर्जर हो चुके सिस्टम को पटरी पर लाना और दूसरी जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतरना। इस नयी सरकार ने पिछले २४ नवंबर को 6 साल पुरे कर लिए। अपनी दूसरी पारी के एक साल पूरा होने पर नीतीश सरकार ने “न्याय के साथ विकास यात्रा” नामक रिपोर्ट कार्ड जारी किया। ज़ाहिर है सरकार अपनी रिपोर्ट कार्ड में अपनी कमियाँ नहीं गिनाती लेकिन आखिर कितना बदला बिहार? यह सवाल अब भी मौंजू है? यह सवाल राजनीतिक गलियारों में भी उठना लाजिमी था।और उठा भी लेकिन राजनीतिक रोटी की आँच तले गुम हो गया। मीडिया ने तारीफों के पुल बाँधे और लोगों ने जैसे खुली आँखों से बिहार के विकास की तस्वीर खींच ली। रिपोर्ट कार्ड में बिहार में समृद्धि और खुशहाली का दावा किया गया है और तरक्की की राह पर अग्रसर बताया गया है लेकिन दावों को आँकड़ों की कसौटी पर कसकर देखा जाए तो वास्तविक हकीकत सामने आ जायेगी।
युवा पत्रकार गिरजेश कुमार ने नीतीश सरकार की उपलब्धियों पर यह आलेख लिखा है। बिहार में नीतीश सरकार को विकास का श्रेय मिला है, पर व्यावहारिक अर्थ में यह विकास कैसा है? साथ ही वहाँ का मीडिया क्या कर रहा है? अपनी राय दें।
डेढ़ दशक तक जंगल राज भुगत चुके बिहार के लोगों के लिए 24 नवंबर 2005 की सुबह जब स्पष्ट बहुमत के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में आया तो लगा कि अब शायद बिहार का कायाकल्प हो जाएगा। बीमारू और सबसे पिछड़े राज्य के रूप में जाने जानेवाले बिहार की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पिछले पन्द्रह वर्षों के लालू-राबड़ी राज में जर्जर हो चुकी थी ऐसे में नयी सरकार के सामने दो चुनौतियाँ थी,एक जर्जर हो चुके सिस्टम को पटरी पर लाना और दूसरी जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतरना। इस नयी सरकार ने पिछले २४ नवंबर को 6 साल पुरे कर लिए। अपनी दूसरी पारी के एक साल पूरा होने पर नीतीश सरकार ने “न्याय के साथ विकास यात्रा” नामक रिपोर्ट कार्ड जारी किया। ज़ाहिर है सरकार अपनी रिपोर्ट कार्ड में अपनी कमियाँ नहीं गिनाती लेकिन आखिर कितना बदला बिहार? यह सवाल अब भी मौंजू है? यह सवाल राजनीतिक गलियारों में भी उठना लाजिमी था।और उठा भी लेकिन राजनीतिक रोटी की आँच तले गुम हो गया। मीडिया ने तारीफों के पुल बाँधे और लोगों ने जैसे खुली आँखों से बिहार के विकास की तस्वीर खींच ली। रिपोर्ट कार्ड में बिहार में समृद्धि और खुशहाली का दावा किया गया है और तरक्की की राह पर अग्रसर बताया गया है लेकिन दावों को आँकड़ों की कसौटी पर कसकर देखा जाए तो वास्तविक हकीकत सामने आ जायेगी।
Saturday, November 26, 2011
लहू पुकारता है इशरत जहां का
सन 2002 के गुजरात दंगे और उसके बाद की घटनाएं देश की न्याय-व्यवस्था और राजनीति के लिए कसौटी बन गई हैं। सितम्बर में जब उच्चतम न्यायालय ने इन दंगों में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका को लेकर फैसला सुनाया तब उसके दो मतलब निकाले गए। एक यह कि उन्हें क्लीन चिट मिल गई। और दूसरे यह कि उनके खिलाफ निचली अदालत में मुकदमे का रास्ता साफ हो गया है। सच यह है कि उन्हें क्लीन चिट नहीं मिली थी। पर उस फैसले को पेश इसी तरह किया गया। न्याय प्रक्रिया में देरी और जाँच में रुकावटें इस किस्म के भ्रम पैदा करती हैं। सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में कुछ पुलिस अफसरों की गिरफ्तारी के बाद से पहिया घूमा है और कई तरह के मामले सामने आ रहे हैं, जिनसे व्यवस्था के प्रति आश्वस्ति बढ़ती है। इनमें सबसे ताज़ा मामला है इशरत जहां का।
15 जून 2004 की सुबह अहमदाबाद के एक बाहरी इलाके में चार नौजवानों की लाशें पड़ी थीं। पुलिस का दावा था कि ये लश्करे तैयबा के आतंकी थे, जो मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या करना चाहते थे। पुलिस की विशेष टीम ने उन्हें मार गिराया। मरने वालों में एक मुम्बई की छात्रा इशरत जहाँ थी। उसकी उम्र 19 साल थी। उस पर किसी किस्म का आपराधिक मामला कभी दर्ज नहीं हुआ।
15 जून 2004 की सुबह अहमदाबाद के एक बाहरी इलाके में चार नौजवानों की लाशें पड़ी थीं। पुलिस का दावा था कि ये लश्करे तैयबा के आतंकी थे, जो मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या करना चाहते थे। पुलिस की विशेष टीम ने उन्हें मार गिराया। मरने वालों में एक मुम्बई की छात्रा इशरत जहाँ थी। उसकी उम्र 19 साल थी। उस पर किसी किस्म का आपराधिक मामला कभी दर्ज नहीं हुआ।
Wednesday, November 23, 2011
गाँव-गाँव, गली-गली फैलती एक स्वप्न-क्रांति
सेकंडों में सुपर स्टार बनाने वाला जादू
लुधियाना के रविन्दर रवि साधारण पेंटर थे। घरों में पेंटिंग करके कमाई करते थे। खाली वक्त में गाना उसका शौक था। 17 अगस्त 2004 को सुबह साढ़े दस बजे लुधियाना से दिल्ली आने वाली बस का टिकट खरीदने के लिए उन्हें 300 रु उधार लेने पड़े थे। दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में इंडियन आयडल का ऑडीशन था। रविन्दर को इंडियन आयडल में जगह मिली। जब यह शो शुरू हुआ तब उनकी कहानी सुनने के बाद जनता की हमदर्दी ने इस प्रतियोगिता में काफी दूर तक पहुँचा दिया। अब वे प्रतिष्ठित गायक हैं।
मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की अजयगढ़ तहसील के महेन्द्र सिंह राठौर साधारण परिवार से आते हैं। वे जब बोलते हैं तो कभी-कभी हकला जाते हैं। यह कंठ-दोष उनकी निराशा का कारण बन गया। नौकरी की लिखित प्रतियोगिताओं में बार-बार सफल होने के बावज़ूद उन्हें इंटरव्यू में बाहर कर दिया जाता। आखिर उन्हें कांट्रैक्ट टीचर की नौकरी मिली। वह भी इसलिए कि उसमे लिखित परीक्षा थी, इंटरव्यू नहीं। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के ताज़ा दौर में इसी 3 नवम्बर को जैसे ही फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट में नाम घोषित हुआ उन्होंने हवा में उसी तरह मुक्का घुमाया जैसे खेल-चैम्पियन घुमाते हैं। दौड़ते हुए उन्होंने अमिताभ बच्चन को गोदी में उठा लिया, ‘सर जी बहुत इंतज़ार कराया आपने।‘ महेन्द्र सिंह ने बताया कि ज़िन्दगी के हर मोड़ पर मैं हारता आया हूँ। पिछले ग्यारह साल से वे इस कार्यक्रम में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं। इधर तो अपने मोबाइल फोन को हर रोज एक हजार रुपए से रिचार्ज करा रहे थे, वह भी उधारी पर। उनका दावा है कि आपके पास इतनी कॉल कहीं से नहीं आई होंगी। महेन्द्र सिंह के साथ सैट पर मौज़ूद तमाम लोगों की आँखों में आँसू थे।
लुधियाना के रविन्दर रवि साधारण पेंटर थे। घरों में पेंटिंग करके कमाई करते थे। खाली वक्त में गाना उसका शौक था। 17 अगस्त 2004 को सुबह साढ़े दस बजे लुधियाना से दिल्ली आने वाली बस का टिकट खरीदने के लिए उन्हें 300 रु उधार लेने पड़े थे। दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में इंडियन आयडल का ऑडीशन था। रविन्दर को इंडियन आयडल में जगह मिली। जब यह शो शुरू हुआ तब उनकी कहानी सुनने के बाद जनता की हमदर्दी ने इस प्रतियोगिता में काफी दूर तक पहुँचा दिया। अब वे प्रतिष्ठित गायक हैं।
मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की अजयगढ़ तहसील के महेन्द्र सिंह राठौर साधारण परिवार से आते हैं। वे जब बोलते हैं तो कभी-कभी हकला जाते हैं। यह कंठ-दोष उनकी निराशा का कारण बन गया। नौकरी की लिखित प्रतियोगिताओं में बार-बार सफल होने के बावज़ूद उन्हें इंटरव्यू में बाहर कर दिया जाता। आखिर उन्हें कांट्रैक्ट टीचर की नौकरी मिली। वह भी इसलिए कि उसमे लिखित परीक्षा थी, इंटरव्यू नहीं। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के ताज़ा दौर में इसी 3 नवम्बर को जैसे ही फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट में नाम घोषित हुआ उन्होंने हवा में उसी तरह मुक्का घुमाया जैसे खेल-चैम्पियन घुमाते हैं। दौड़ते हुए उन्होंने अमिताभ बच्चन को गोदी में उठा लिया, ‘सर जी बहुत इंतज़ार कराया आपने।‘ महेन्द्र सिंह ने बताया कि ज़िन्दगी के हर मोड़ पर मैं हारता आया हूँ। पिछले ग्यारह साल से वे इस कार्यक्रम में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं। इधर तो अपने मोबाइल फोन को हर रोज एक हजार रुपए से रिचार्ज करा रहे थे, वह भी उधारी पर। उनका दावा है कि आपके पास इतनी कॉल कहीं से नहीं आई होंगी। महेन्द्र सिंह के साथ सैट पर मौज़ूद तमाम लोगों की आँखों में आँसू थे।
हताशा से जूझते भारत का ज्ञान और सपने
पता नहीं कितने अखबारों में यह खबर थी कि 'कौन बनेगा करोड़पति' में पाँच करोड़ जीतने वाले मोतीहारी के सुशील कुमार ने श्रीमती सोनिया गांधी से भेंट की। यह सम्मान ओलिम्पिक मेडल जीतने वालों को मिलता रहा है। कल यानी इतवार के अखबारों ने इस बार के केबीसी की व्यावसायिक सफलता का गुणगान किया है। किस तरह उसने 'स्मॉल टाउन इंडिया' की भावनाओं को भुनाया। बहरहाल कुछ ज्ञान और कुछ भाग्य के सहारे चलने वाला खेल गाँव-गाँव, गली-गली सपने बिखेरने में कामयाब हुआ है। यह सायास था या अनायास पर 'कौन बनेगा करोड़पति' में कुछ नई बातें देखने को मिलीं। इसमें शामिल होने वालों की बड़ी तादाद बिहार, झारखंड और हिन्दी राज्यों के पिछड़े इलाकों से थी। कार्यक्रम के प्रस्तोताओं ने दुर्भाग्य के शिकार, हताश और विफलता से जूझते लोगों पर खासतौर से ध्यान दिया। उनकी करुण-कथाएं देश के सामने रखीं। अमिताभ बच्चन ने इन निराश लोगों के जीवन में खुशियाँ बाँटीं। सन 2000 में जब यह सीरियल जब शुरू हुआ था तब लोगों को करोड़पति बनने का यह रास्ता नज़र आया। यह रास्ता सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक की लॉटरी संस्कृति से बेहतर था। कम से कम लोगों ने जीके का रट्टा तो लगाया।
उत्तर प्रदेश में शोर ज़्यादा और मुद्दे कम
राजनीतिक दलों को समझदार माना जाता है। इतना तो ज़रूर माना जाता है कि वे जनता के करीब होते हैं। उन्हें उसकी नब्ज़ का पता होता है। बावज़ूद इसके वे अक्सर गलती कर जाते हैं। हारने वाली पार्टियों को वास्तव में समय रहते यकीन नहीं होता कि उनकी हार होने वाली है। उत्तर प्रदेश में हालांकि पार्टियाँ एक अरसे से प्रचार में जुटीं हैं, पर उनके पास मुद्दे कम हैं, आवेश ज्यादा हैं।
मुलायम सिंह ने बुधवार को एटा की रैली से अपने चुनाव अभियान की शुरूआत की। समाजवादी पार्टी का यकीन है कि मुलायम सिंह जब भी एटा से अभियान शुरू करते हैं, जीत उनकी होती है। एटा उनका गढ़ रहा है, पर 2007 के चुनाव में उन्हें यहाँ सफलता नहीं मिली। समाजवादी पार्टी इस बार अपने मजबूत गढ़ों को लेकर संवेदनशील है। एटा की रैली में पार्टी के महामंत्री मुहम्मद आजम खां ने कहा, ‘मैं यहाँ आपसे आपका गुस्सा माँगने आया हूँ। आप सबको मायावती के कार्यकाल में हुए अन्याय का बदला लेना है।‘ समाजवादी पार्टी घायल शेर की तरह इस बार 2007 के अपमान का बदला लेना चाहती है। मुलायम सिंह इस बार खुद मुख्यमंत्री बनने के लिए नहीं मायावती को हराने के लिए मैदान में हैं।
मुलायम सिंह ने बुधवार को एटा की रैली से अपने चुनाव अभियान की शुरूआत की। समाजवादी पार्टी का यकीन है कि मुलायम सिंह जब भी एटा से अभियान शुरू करते हैं, जीत उनकी होती है। एटा उनका गढ़ रहा है, पर 2007 के चुनाव में उन्हें यहाँ सफलता नहीं मिली। समाजवादी पार्टी इस बार अपने मजबूत गढ़ों को लेकर संवेदनशील है। एटा की रैली में पार्टी के महामंत्री मुहम्मद आजम खां ने कहा, ‘मैं यहाँ आपसे आपका गुस्सा माँगने आया हूँ। आप सबको मायावती के कार्यकाल में हुए अन्याय का बदला लेना है।‘ समाजवादी पार्टी घायल शेर की तरह इस बार 2007 के अपमान का बदला लेना चाहती है। मुलायम सिंह इस बार खुद मुख्यमंत्री बनने के लिए नहीं मायावती को हराने के लिए मैदान में हैं।
एक दाँव जो उल्टा भी पड़ सकता है
उत्तर प्रदेश विधान सभा में प्रदेश को चार हिस्सों में बाँटने वाला प्रस्ताव आनन-फानन पास तो हो गया, पर इससे विभाजन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। अलबत्ता यह बात ज़रूर कही जा सकती है कि यह इतना महत्वपूर्ण मामला है तो इस पर बहस क्यों नहीं हुई? सरकार ने साढ़े चार साल तक इंतज़ार क्यों किया? इस प्रस्ताव के पास होने मात्र से उत्तर प्रदेश का चुनाव परिदृश्य बदल जाएगा ऐसा नहीं मानना चाहिए।
और मुगल राज किसी न किसी रूप में इस ज़मीन से होकर गुजरा था। वाराणसी, अयोध्या, मथुरा, इलाहाबाद, मेरठ, अलीगढ़, गोरखपुर, लखनऊ, आगरा, कानपुर, बरेली जैसे शहरों का देश में ही नहीं दुनिया के प्राचीनतम शहरों में शुमार होता है। सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1947 की आज़ादी तक उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय आंदोलनों में सबसे आगे होता था। वैदिक, बौद्ध, जैन और सिख धर्मों के अनेक पवित्र स्थल उत्तर प्रदेश में हैं। सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से यह भारत का हृदय प्रदेश है।
Monday, November 14, 2011
कर ही क्या सकता था बन्दा खाँस लेने के सिवा
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| हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून |
Friday, November 11, 2011
राहुल गांधी को लेकर कुछ किन्तु-परन्तु
एक बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि राहुल गांधी भविष्य में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता होंगे। इसी विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि यह कब होगा और वे किस पद से इसकी शुरूआत करेंगे। पिछले दिनों जब श्रीमती सोनिया गांधी स्वास्थ्य-कारणों से विदेश गईं थीं, तब आधिकारिक रूप से राहुल गांधी को पार्टी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अन्ना-आंदोलन के कारण वह समय राहुल को प्रोजेक्ट करने में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सका। बल्कि उस दौरान अन्ना को गिरफ्तार करने से लेकर संसद में लोकपाल-प्रस्ताव रखने तक के सरकारी फैसलों में इतने उतार-चढ़ाव आए कि बजाय श्रेय मिलने के पार्टी की फज़ीहत हो गई। राहुल गांधी को शून्य-प्रहर में बोलने का मौका दिया गया और उन्होंने लोकपाल के लिए संवैधानिक पद की बात कहकर पूरी बहस को बुनियादी मोड़ देने की कोशिश की। पर उनका सुझाव को हवा में उड़ गया। बहरहाल अब आसार हैं कि राहुल गांधी को पार्टी कोई महत्वपूर्ण पद देगी। हवा में यह बात है कि 19 नवम्बर को श्रीमती इंदिरा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर वे कोई नई भूमिका ग्रहण करेंगे।
Wednesday, November 9, 2011
भारत-पाक कारोबारी रिश्तों के दाँव-पेच
भारत-पाकिस्तान रिश्तों में किस हद तक संशय रहते हैं, इसका पता पिछले हफ्ते भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देने की घोषणा के बाद लगा। पाकिस्तान की सूचना प्रसारण मंत्री ने बाकायदा इसकी घोषणा की, पर बाद में पता लगा कि फैसला हो ज़रूर गया है पर घोषणा में कोई पेच था। घोषणा सही थी या गलत, भारत का दर्जा बदल गया है या बदल जाएगा। तरज़ीही देश या एमएफएन शब्द भ्रामक है। इसका अर्थ वही नहीं है, जो समझ में आता है। इसका अर्थ यह है कि पाकिस्तान अब हमें उन एक सौ से ज्यादा देशों के बराबर रखेगा जिन्हें एमएफएन का दर्जा दिया गया है। मतलब जिन देशों से व्यापार किया जाता है उन्हें बराबरी की सुविधाएं देना। उनमें भेदभाव नहीं करना।
Friday, November 4, 2011
भारत-पाक रिश्तों में कारोबारी बयार
Thursday, November 3, 2011
बयानबाज़ी के बजाय मीडिया आत्ममंथन करे
हर आज़ादी की सीमा होती है। पर हर सीमा की भी सीमा होती है। हमारे संविधान ने जब अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया था, तब सीमाओं का उल्लेख नहीं किया गया था। पर 1951 में संविधान के पहले संशोधन में इस स्वतंत्रता की युक्तियुक्त सीमाएं भी तय कर दी गईं। पिछले साठ वर्ष में सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों से इस स्वतंत्रता ने प्रेस की स्वतंत्रता की शक्ल ली। अन्यथा ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ शब्द संविधान में नहीं था और न है। उसकी ज़रूरत भी नहीं। पर अब प्रेस की जगह मीडिया शब्द आ गया है। ‘प्रेस’ शब्द ‘पत्रकारिता’ के लिए रूढ़ हो गया है। टीवी वालों की गाड़ियों पर भी मोटा-मोटा प्रेस लिखा होता है। अखबारों के मैनेजरों की गाड़ियों पर उससे भी ज्यादा मोटा प्रेस छपा रहता है।
इन दिनों हम पत्रकारिता को लेकर संशय में हैं। पिछले 400 वर्ष में पत्रकारिता एक मूल्य के रूप में विकसित हुई है। इस मूल्य(वैल्यू) की कीमत(प्राइस) या बोली लगा दी जाए लगा दी जाए तो क्या होगा? प्रेस काउंसिल के नए अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू की कुछ बातों को लेकर मीडिया जगत में सनसनी है। जस्टिस काटजू ने मीडिया की गैर-ज़िम्मेदारियों की ओर इशारा किया है। वे प्रेस काउंसिल के दांत पैने करना चाहते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मीडिया काउंसिल बनाने का सुझाव दिया है। ताकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इसमें शामिल किया जा सके। वे चाहते हैं कि मीडिया के लाइसेंस की व्यवस्था भी होनी चाहिए। वे सरकारी विज्ञापनों पर भी नियंत्रण चाहते हैं। उनकी किसी बात से असहमति नहीं है। महत्वपूर्ण है मीडिया की साख को बनाए रखना। प्रेस काउंसिल की दोहरी भूमिका है। उसे प्रेस पर होने वाले हमलों से उसे बचाना है और साथ ही उसके आचरण पर भी नज़र रखनी होती है। प्रेस की आज़ादी वास्तव में लोकतांत्रिक-व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, पर जब किसी न्यूज़ चैनल का हैड कहे कि दर्शक जो माँगेगा वह उसे दिखाएंगे, तब उसकी भूमिका पर नज़र कौन रखेगा? मीडिया काउंसिल का विचार पिछले कुछ साल से हवा में है। यह बने या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए अलग काउंसिल बने, इसके बारे में अच्छी तरह विचार की ज़रूरत है।
इन दिनों हम पत्रकारिता को लेकर संशय में हैं। पिछले 400 वर्ष में पत्रकारिता एक मूल्य के रूप में विकसित हुई है। इस मूल्य(वैल्यू) की कीमत(प्राइस) या बोली लगा दी जाए लगा दी जाए तो क्या होगा? प्रेस काउंसिल के नए अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू की कुछ बातों को लेकर मीडिया जगत में सनसनी है। जस्टिस काटजू ने मीडिया की गैर-ज़िम्मेदारियों की ओर इशारा किया है। वे प्रेस काउंसिल के दांत पैने करना चाहते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मीडिया काउंसिल बनाने का सुझाव दिया है। ताकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इसमें शामिल किया जा सके। वे चाहते हैं कि मीडिया के लाइसेंस की व्यवस्था भी होनी चाहिए। वे सरकारी विज्ञापनों पर भी नियंत्रण चाहते हैं। उनकी किसी बात से असहमति नहीं है। महत्वपूर्ण है मीडिया की साख को बनाए रखना। प्रेस काउंसिल की दोहरी भूमिका है। उसे प्रेस पर होने वाले हमलों से उसे बचाना है और साथ ही उसके आचरण पर भी नज़र रखनी होती है। प्रेस की आज़ादी वास्तव में लोकतांत्रिक-व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, पर जब किसी न्यूज़ चैनल का हैड कहे कि दर्शक जो माँगेगा वह उसे दिखाएंगे, तब उसकी भूमिका पर नज़र कौन रखेगा? मीडिया काउंसिल का विचार पिछले कुछ साल से हवा में है। यह बने या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए अलग काउंसिल बने, इसके बारे में अच्छी तरह विचार की ज़रूरत है।
Monday, October 31, 2011
फॉर्मूला रेस कुशलता की प्रतीक ज़रूर है, पर इसकी राष्ट्रीय प्रश्नों से विसंगति है
अक्सर स्पोर्ट्स चैनलों पर आपने देखी होंगी विशेष ट्रैकों पर दौड़ती एक सीट की कारें। ये कारें खासतौर से बनाई जाती हैं। दुनियाभर के अलग-अलग सर्किटों पर ये कार रेस होती हैं। इन्हें ग्रां-प्रि या अंग्रेज़ी में ग्रैंड प्राइज़ (जीपी) रेस कहते हैं। उनके रिज़ल्ट जोड़कर दो वार्षिक चैम्पियनशिप होती हैं। एक ड्राइवरों के लिए और दूसरी कंस्ट्रक्टर्स के लिए। कंस्ट्रक्टर यानी इंजन, पहिए, चैसिस वगैरह जोड़कर खास तरह की कार बनाने वाले। ये कारें 360 किलोमीटर प्रति घंटा तक की रफ्तार से दौड़ती हैं। इन रेसों को दुनियाभर में देखा जाता है। सन 2010 के सीज़न में 52 करोड़ 70 लाख दर्शकों ने टीवी पर इन रेसों को देखा।Saturday, October 29, 2011
फॉर्मूला-1 बनाम श्रीलाल शुक्ल
स्टीव जॉब्स इस दौर के के श्रेष्ठतम उद्यमियों में से एक थे, पर भारत के लोगों से उनका परिचय बहुत ज्यादा नहीं था। एपल के उत्पाद भारत में बहुत प्रचलित नहीं हैं, पर भारतीय मीडिया ने उनके निधन पर जो कवरेज की उससे लगता था कि हम प्रतिभा की कद्र करना चाहते हैं। पर हिन्दी के किसी अखबार में फॉर्मूला-1 की रेस के उद्घाटन की खबर टॉप पर हो और श्रीलाल शुक्ल के निधन की छोटी सी खबर छपी हो तो बात समझ में आती है कि दुनिया बदल चुकी है। जिस कॉलम में श्रीलाल शुक्ल की खबरहै उसके टॉप की खबर है नताशा के हुए गंभीर।
Friday, October 28, 2011
विचारों को व्यक्त होने का मौका तो मिले
ग्यारहवीं सदी में भारत आए ईरानी विद्वान अल-बिरूनी ने लिखा है कि प्राचीन हिन्दू वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष की अनेक परिघटनाओं की बेहतर जानकारी थी। उन्होंने खासतौर से छठी सदी के गणितज्ञ और खगोलविज्ञानी वराहमिहिर और सातवीं सदी के ब्रह्मगुप्त का उल्लेख किया है, जिन्हें वे महान वैज्ञानिक मानते थे। इन विद्वानों को इस बात का ज्ञान था कि सूर्य और चन्द्र ग्रहण क्यों लगते हैं। वराहमिहिर की पुस्तक वृहत्संहिता में इस बात का हवाला है कि चन्द्र ग्रहण पृथ्वी की छाया से बनता है और सूर्य ग्रहण चन्द्रमा के बीच में आ जाने के कारण होता है। साथ ही यह भी लिखा था कि काफी विद्वान इसे राहु और केतु के कारण मानते हैं।
अल-बिरूनी ने वराहमिहिर की संहिता से उद्धरण दिया है,‘ चन्द्रग्रहण तब होता है, जब चन्द्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश कर जाता है और सूर्य ग्रहण तब होता है जब चन्द्रमा सूर्य को ढँक कर हमसे छिपा लेता है। यही कारण है कि न तो चन्द्र ग्रहण कभी पश्चिम से परिक्रमा करता है और न सूर्य ग्रहण पूर्व से। लेकिन जन-साधारण जोर-शोर से यह मानता है कि राहु का शिर ही ग्रहण का कारण है।’ इसके बाद वराह मिहिर ने लिखा है, ‘यदि शिर उभर कर नहीं आता और ग्रहण का कारण न बनता तो ब्राह्मणों के लिए अनिवार्य रूप से उस समय स्नान का विधान न किया जाता।’ अल-बिरूनी को वराहमिहिर की यह बात अजीब लगी, पर उसने इसका कारण यह माना कि शायद वह ब्राह्मणों का पक्ष लेना चाहता था, जो वह खुद भी था।
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