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Wednesday, September 9, 2026

राजनीति का नया फॉर्मूला ‘टार्गेट एम!’


भारतीय राजनीति में महिला मतदाता (साइलेंट वोटर) सबसे निर्णायक वोट बैंक बनकर उभरी हैं, जिसके कारण राजनीतिक दल उन्हें आकर्षित करने के लिए पारंपरिक उपहारों से लेकर बड़े पैमाने पर नकदी हस्तांतरण योजनाओं की घोषणाएँ कर रहे हैं। अतीत में मंगलसूत्र, कन्यादान, टीवी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी मुफ्त वस्तुएँ महिलाओं को लुभाने के चुनावी रणनीतियों का एक बड़ा हिस्सा रही हैं, जो समय के साथ आर्थिक और सामाजिक रूप से विकसित होती जा रही हैं। क्या यह प्रवृत्ति रेवड़ी संस्कृति को बढ़ा रही है, या यह सामाजिक-विकास में मददगार है? मोदी, मुसलमान, मंगलसूत्र (हिंदू वैवाहिक प्रतीक), और यहाँ तक ​​कि मटन और मछली भी चुनावी शब्दावली का हिस्सा बन चुके हैं। विरोधी दल अपनी दुर्दशा के लिए मीडिया, मार्केटिंग और मनी (तीन और 'एम') को कोस सकते हैं, वोटिंग मशीन को तो कोस ही रहे हं। सच्चाई यह है कि चुनावों में कम से कम एक 'एम' निर्णायक साबित हो रहा है। देश के चुनावी इतिहास में महिला वोट का महत्व बढ़ता जा रहा है।

हालाँकि कॉक्रोच आंदोलन के कारण देश का ध्यान जेन-ज़ी और युवा वर्ग की ओर गया है, पर चुनावी-राजनीति के विशेषज्ञ मानते हैं कि सभी दल महिला वोटरों को लुभाने से जुड़े कार्यक्रमों को वरीयता दे रहे हैं। उन्हें समझ में आ रहा है कि महिला वोटर एक ‘ब्लॉक’ है, जेन-ज़ी के बारे में फिलहाल कहना मुश्किल है कि वह ‘ब्लॉक’ के रूप में मतदान करेगा या नहीं। राजनीति-शास्त्रियों का कहना है कि जेन-ज़ी की भूमिका किसी के पक्ष में माहौल को बनाने या किसी के विरोध में माहौल बिगाड़ने में हो सकती है, पर जेन-ज़ी वोटर ब्लॉक नहीं है। इनमें से कुछ तो वोटर भी नहीं हैं।

Tuesday, April 21, 2026

स्त्रियों के साथ राजनीतिक-छल ज्यादा चलेगा नहीं


भारत में महिला आरक्षण को लेकर एक साथ कई सवाल हैं। संसद में संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो पाया, या उसे पास कराने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी? ऐसा लगता है कि बीजेपी का इरादा इस मसले को उठाना और विरोधियों को उत्तेजित करना था, ताकि वे शोर मचाएँ। सरकार जानती थी कि उसके साथ दो तिहाई सदस्य नहीं हैं और आज के राजनीतिक हालात में उसे कत्तई आशा नहीं करनी चाहिए थी कि विरोधी राजनीति का कोई धड़ा उसके समर्थन में आता। तब फिर क्यों बिल पेश किया?

भारतीय राजनीति विश्वसनीय नहीं है। इसमें जो कहा जाता है, ज़रूरी नहीं कि वैसा ही हो। फौरी तौर पर यह राजनीतिक तीर था, जो ‘नारी-शक्ति’ का लाभ उठाने के लिए चलाया गया था। संसद में जब बातें होती हैं, तब उन्हें गाँव-गाँव में सुना जाता है। विरोध में जितना शोर होगा, फायदा उतना ज्यादा होगा। उद्देश्य माहौल बनाने, नैरेटिव रचने या इसे जो भी कहें, उतना ही था। विरोधियों की दिलचस्पी भी कम से कम महिला आरक्षण में नहीं थी। परिसीमन को लेकर भी उनके तर्क विचित्र थे। इससे ज्यादा उनका इरादा भी कुछ नहीं था। बहरहाल इसका विपरीत-प्रभाव भी होगा, जो समूची राजनीति को अपनी चपेट में लेगा।

क्या महिलाओं को समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें छला जा रहा है? यह दीगर सवाल है कि इस विधेयक के परास्त होने का लाभ बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव में मिलेगा या नहीं। असल बात यह है कि देश की राजनीति ने पिछले तीन दशक से ‘नारी-शक्ति’ को छला है। उसे बहुत ज्यादा छला नहीं जा सकेगा। स्त्रियों की राजनीतिक अभिलाषाएँ आज उस सुप्तावस्था में नहीं हैं, जो नब्बे के दशक में थीं। साफ है कि यह विधेयक राजनीतिक-गतिविधि मात्र थी। जिस तरह से बिल के गिरते ही पोस्टर छपकर आ गए, और राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन की योजना बन गई, वह बताता है कि बीजेपी इसकी तैयारी के साथ आई थी।

सबसे पहले एचडी देवेगौड़ा सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक, 1996 के रूप में 12 सितंबर 1996 को महिला आरक्षण विधेयक, पेश किया था। विधेयक पेश तो हुआ, लेकिन राजनीतिक आम सहमति न बनने और गठबंधन सरकार के भीतर विरोध के कारण इसे संयुक्त संसदीय समिति को भेजना पड़ा और 11वीं लोकसभा भंग होने के साथ ही लैप्स हो गया। देश की राजनीति चाहती, तो देवेगौड़ा का बिल ही पास हो जाता।

सरकार ने इसबार जो विधेयक पेश किया था, वह संसदीय सीटों के परिसीमन पर केंद्रित था। उसके विरोधियों का कहना है कि परिसीमन देश को तोड़ देगा। वे कहते हैं कि 2023 के बिल को लागू करो। 2023 के महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, इसे परिसीमन के बगैर लागू नहीं किया जा सकता। यह कानून विशेष रूप से जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होने की शर्त से बँधा हुआ है। परिसीमन रुकेगा तो आरक्षण भी रुकेगा।

Friday, March 8, 2019

राजनीति के दरवाजे से बाहर क्यों हैं स्त्रियाँ?

http://inextepaper.jagran.com/2059095/Kanpur-Hindi-ePaper,-Kanpur-Hindi-Newspaper-InextLive/08-03-19#page/14/1
बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में भारत के तकनीकी-आर्थिक रूपांतरण के समांतर सबसे बड़ी परिघटना है सामाजिक जीवन में लड़कियों की बढ़ती भागीदारी. सत्तर के दशक तक भारतीय महिलाएं घरों तक सीमित थीं, आज वे जीवन के हर क्षेत्र में मौजूद हैं. युवा स्त्रियाँ आधुनिकीकरण और सामाजिक रूपांतरण में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहीं हैं. भूमिका बढ़ने के साथ उनसे जुड़े सवाल भी खड़े हुए हैं. पिछले साल जब ‘मी-टू’ आंदोलन ने भारत में प्रवेश किया था, तब काफी स्त्रियों ने अपने जीवन के ढके-छिपे पहलुओं को उजागर किया. न जाने कितने तथ्य अभी छिपे हुए हैं.

‘यत्र नार्यस्तु...’ के देश में स्त्रियों के जीवन की जमीन बहुत कठोर है. उन्हें अपनी जगह बनाने में जबर्दस्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. फिर भी वे इनका मुकाबला करते हुए आगे बढ़ रहीं हैं. दिसम्बर, 2012 में दिल्ली रेप कांड के बाद स्त्री-चेतना में विस्मयकारी बदलाव हुआ था. लम्बे अरसे से छिपा गुस्सा एकबारगी सामने आया. यह केवल स्त्रियों का गुस्सा नहीं था, पूरे समाज की नाराजगी थी. उस आंदोलन की अनुगूँज शहरों, कस्बों, गाँवों और गली-मोहल्लों तक में सुनाई पड़ी थी. उस आंदोलन से बड़ा बदलाव भले नहीं हुआ, पर सामाजिक जीवन में एक नया नैरेटिव तैयार हुआ.