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Wednesday, August 16, 2023

खुशहाली की राहों में हम होंगे कामयाब


आज़ादी के सपने-09

कई साल से देश में एक कहावत चल रही है, सौ में नब्बे बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान.’ यह बात ट्रकों के पीछे लिखी नजर आती है. यह एक प्रकार का सामाजिक अंतर्मंथन है कि हम अपना मजाक उड़ाना भी जानते हैं. दूसरी तरफ एक सचाई की स्वीकृति भी थी. 

हताश होकर हम अपना मजाक उड़ाते हैं. पर हम विचलित हैं, हारे नहीं हैं. सच यह है कि भारत जैसे देश को बदलने और एक नई व्यवस्था को कायम करने के लिए 76 साल काफी नहीं होते. खासतौर से तब जब हमें ऐसा देश मिला हो, जो औपनिवेशिक दौर में बहुत कुछ खो चुका हो.

मदर इंडिया

फिल्म ‘मदर इंडिया’ की रिलीज के कई दशक बाद एक टीवी चैनल के एंकर इस फिल्म के एक सीन का वर्णन कर रहे थे, जिसमें फिल्म की हीरोइन राधा (नर्गिस) को अपने कंधे पर रखकर खेत में हल चलाना पड़ता है.

चैनल का कहना था कि हमारे संवाददाता ने महाराष्ट्र के सतारा जिले के जावली तालुक के भोगावाली गाँव में खेत में बैल की जगह महिलाओं को ही जुते हुए देखा तो उन्होंने उस सच को कैमरे के जरिए सामने रखा, जिसे देखकर सरकारें आँख मूँद लेना बेहतर समझती हैं.

1957 में रिलीज़ हुई महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ उन गिनी-चुनी फिल्मों में से एक है, जो आज भी हमारे दिलो-दिमाग पर छाई हैं. स्वतंत्रता के ठीक दस साल बाद बनी इस फिल्म की कहानी के परिवेश और पृष्ठभूमि में काफी बदलाव आ चुका है. यह फिल्म बदहाली की नहीं, बदहाली से लड़ने की कहानी है.

भारतीय गाँवों की तस्वीर काफी बदल चुकी है या बदल रही है, फिर भी यह फिल्म आज भी पसंद की जाती है. टीवी चैनलों को ट्यून करें, तो आज भी यह कहीं दिखाई जा रही होगी. मुद्रास्फीति की दर के साथ हिसाब लगाया जाए तो ‘मदर इंडिया’ देश की आजतक की सबसे बड़ी बॉक्स ऑफिस हिट फिल्म साबित होगी.  

इक्कीसवीं सदी में विदेश-नीति की बदलती दिशा


आज़ादी के सपने-08

भारत को आज़ादी ऐसे वक्त पर मिली, जब दुनिया दो खेमों में बँटी हुई थी. दोनों गुटों से अलग रहकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती थी. यह चुनौती आज भी है. ज्यादातर बुनियादी नीतियों पर पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की छाप थी, जो 17 वर्ष, यानी सबसे लंबी अवधि तक, विदेशमंत्री रहे.

राजनीतिक-दृष्टि से उनका वामपंथी रुझान था. साम्राज्यवादउपनिवेशवाद और फासीवाद के वे विरोधी थे. उनके आलोचक मानते हैं कि उनकी राजनीतिक-दृष्टि में रूमानियत इतनी ज्यादा थी कि कुछ मामलों में राष्ट्रीय-हितों की अनदेखी कर गए. किसी भी देश की विदेश-नीति उसके हितों पर आधारित होती है. भारतीय परिस्थितियाँ और उसके हित गुट-निरपेक्ष रहने में ही थे. बावजूद इसके नेहरू की नीतियों को लेकर कुछ सवाल हैं.

चीन से दोस्ती

कश्मीर के अंतरराष्ट्रीयकरण और तिब्बत पर चीनी हमले के समय की उनकी नीतियों को लेकर देश के भीतर भी असहमतियाँ थीं. तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और नेहरू जी के बीच के पत्र-व्यवहार से यह बात ज़ाहिर होती है. उन्होंने चीन को दोस्त बनाए रखने की कोशिश की ताकि उसके साथ संघर्ष को टाला जा सके, पर वे उसमें सफल नहीं हुए.

तिब्बत की राजधानी ल्हासा में भारत का दूतावास हुआ करता था. उसका स्तर 1952 में घटाकर कौंसुलर जनरल का कर दिया गया. 1962 की लड़ाई के बाद वह भी बंद कर दिया गया. कुछ साल पहले भारत ने ल्हासा में अपना दफ्तर फिर से खोलने की अनुमति माँगी, तो चीन ने इनकार कर दिया.

1959 में भारत ने दलाई लामा को शरण जरूर दी, पर एक-चीन नीति यानी तिब्बत पर चीन के अधिकार को मानते रहे.  आज भी यह भारत की नीति है. तिब्बत को हम स्वायत्त-क्षेत्र मानते थे. चीन भी उसे स्वायत्त-क्षेत्र मानता है, पर उसकी स्वायत्तता की परीक्षा करने का अधिकार हमारे पास नहीं है.

सुरक्षा-परिषद की सदस्यता

पचास के दशक में अमेरिका की ओर से एक अनौपचारिक प्रस्ताव आया था कि भारत को चीन के स्थान पर संरा सुरक्षा परिषद की स्थायी कुर्सी दी जा सकती है. नेहरू जी ने उस प्रस्ताव को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि चीन की कीमत पर हम सदस्य बनना नहीं चाहेंगे.

उसके कुछ समय पहले ही चीन में कम्युनिस्टों ने सत्ता संभाली थी, जबकि संरा में चीन का प्रतिनिधित्व च्यांग काई-शेक की ताइपेह स्थित कुओमिंतांग सरकार कर रही थी. नेहरू जी ने कम्युनिस्ट चीन को मान्यता भी दी और उसे ही सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने का समर्थन भी किया.

Tuesday, August 15, 2023

आंतरिक और वाह्य-सुरक्षा की चुनौतियाँ


 आज़ादी के सपने-07

आज़ादी के बाद से भारत को एकता और अखंडता की बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. एक नव-स्वतंत्र देश के लिए इनसे निबटना बेहद मुश्किल काम था. पिछले 76 साल में भारतीय सेना को एक के बाद मुश्किल अभियानों का सामना करना पड़ा है. उसने चार बड़ी लड़ाइयाँ पाकिस्तान के साथ और एक बड़ी लडाई चीन के साथ लड़ी हैं. पिछले तीन दशक से वह जम्मू-कश्मीर में एक छद्म-युद्ध का सामना कर रही है.

सीमा पर लड़े गए युद्धों के मुकाबले देश के भीतर लड़े गए युद्ध और भी मुश्किल हैं. शुरुआती वर्षों में पूर्वोत्तर के अलगाववादी आंदोलनों ने हमारी ऊर्जा को उलझाए रखा. सत्तर के दशक से नक्सलपंथी आंदोलन ने देश के कई हिस्सों को घेर लिया, जो आज भी जारी है. अस्सी के दशक में पाकिस्तानी शह पर खालिस्तानी आंदोलन शुरू हुआ, जिसे बार-बार भड़काने की कोशिशें हुईं.

धमाके और हिंसा

कश्मीर में सीधे 1947 और 1965 की घुसपैठों में नाकाम होने के बाद पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के मुजाहिदीन की मदद से नब्बे के दशक में एक और हिंसक आंदोलन खड़ा किया. उस आंदोलन के अलावा देश के मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, वाराणसी और कोयंबत्तूर जैसे अनेक शहरों में बम धमाके हुए. दिल्ली में लाल किले और संसद भवन पर हमले किए गए.

इन हिंसक गतिविधियों के पीछे भारतीय राष्ट्र-राज्य की एकता और हमारे मनोबल को तोड़ने का इरादा था. ऐसी कोशिशें आज भी जारी हैं. अब इसमें सायबर हमले भी शामिल हो गए हैं. यह हाइब्रिड वॉर है. इससे लड़ने और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए नई टेक्नोलॉजी और रणनीतियों की जरूरत है.

कश्मीर-युद्ध

कश्मीर के पहले युद्ध में उतरने के कुछ ही समय में भारतीय सेना ने कश्मीर के दो-तिहाई हिस्से पर अपना नियंत्रण कर लिया. युद्ध विराम 1 अक्तूबर, 1949 को हुआ. यह मामला संयुक्त राष्ट्र में गया, जिसकी एक अलग कहानी है. अलबत्ता इस लड़ाई ने भविष्य की कुछ लड़ाइयों और भारतीय राष्ट्र-राज्य की आंतरिक-सुरक्षा से जुड़ी बहुत सी समस्याओं और युद्धों को जन्म दिया.

इस लड़ाई को जीतने के बाद 1962 में भारत ने दूसरा युद्ध चीन के साथ लड़ा. चीनी सेना ने 20 अक्टूबर, 1962 को लद्दाख और अन्य इलाकों में हमले शुरू कर दिए. इस युद्ध का अंत 20 नवंबर, 1962 को चीन की ओर से युद्ध विराम की घोषणा के साथ हुआ.

चंद्रयान पर सवार साइंस-टेक्नोलॉजी की सफलताएं


आजादी के सपने-06

चंद्रयान-3 ने चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश कर लिया है. अब वह धीरे-धीरे निकटतम कक्षा में उतरता जा रहा है और सब ठीक रहा, तो 23 या 24 अगस्त को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट-लैंडिंग करेगा. यह अभियान अपने विज्ञान-सम्मत कार्यों के अलावा दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने का काम करेगा.

चंद्रयान-3 के अलावा भारत इस साल सूर्य के अध्ययन के लिए अंतरिक्ष अभियान भेजने जा रहा है. आदित्य-एल1 भारत का पहला सौर अभियान है. यह यान सूरज पर नहीं जाएगा, बल्कि धरती से 15 लाख किलोमीटर की दूरी से सूर्य का अध्ययन करेगा. एल1 या लॉन्ग रेंज पॉइंट धरती और सूर्य के बीच वह जगह है जहां से सूरज को बग़ैर किसी ग्रहण के अवरोध के देखा जा सकता है. इसके कुछ समय बाद ही हम गगनयान मिशन के परीक्षणों की खबरें सुनेंगे. पहले मानव रहित परीक्षण होंगे और उसके बाद तीन अंतरिक्ष-यात्रियों के साथ वास्तविक उड़ान होगी.

एटमी शक्ति से चलने वाली भारतीय पनडुब्बी अरिहंत नौसेना के बेड़े में शामिल हो चुकी है. नए राजमार्गों का दौर शुरू हो चुका है. दिल्ली-मेरठ हाईस्पीड ट्रेन के साथ एक नया दौर शुरू होगा, जिसका समापन बुलेट ट्रेनों के साथ होगा. तबतक प्रायः सभी बड़े शहरों में मेट्रो ट्रेन चलने लगेंगी. देश की ज्ञान-आधारित संस्थाओं को जानकारी उपलब्ध कराने के लिए हाईस्पीड नेशनल नॉलेज नेटवर्क काम करने लगा है. इसके साथ सफलताओं की एक लंबी सूची है.

‘टॉप तीन’

जनवरी 2017 में तिरुपति में 104वीं भारतीय साइंस कांग्रेस का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत 2030 तकनीकी विकास के मामले में दुनिया के ‘टॉप तीन’ देशों में शामिल होगा. देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को ही केंद्र बनाकर चलें, तो ‘टॉप तीन’ तो ‘टॉप चार’ या ‘टॉप पाँच’ में अपने आपको शामिल कर सकते हैं, पर विज्ञान और तकनीक का विकास केवल अंतरिक्ष-कार्यक्रम तक सीमित नहीं होता.

व्यावहारिक नजरिए से अभी हम शिखर देशों में शामिल नहीं हैं. विश्व क्या एशिया में जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, ताइवान, इसरायल और सिंगापुर के विज्ञान का स्तर हमसे बेहतर नहीं तो, कमतर भी नहीं है. वैज्ञानिक अनुसंधान पर हमारे कुल खर्च से चार गुना ज्यादा चीन करता है और अमेरिका 75 गुना. फिर भी इसरो के वैज्ञानिकों को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने मंगलयान और चंद्रयान जैसे कार्यक्रम बहुत कम लागत पर तैयार करके दिखाया है.

नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन में ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह कही कि कल के विशेषज्ञ पैदा करने के लिए हमें आज अपने लोगों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर निवेश करना होगा. आज हमारे पास 23 आईआईटी और 31 एनआईटी हैं. तीन हजार से ज्यादा दूसरे इंजीनियरी कॉलेज, पॉलीटेक्नीक और स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर एंड प्लानिंग हैं. इनसे पढ़कर करीब पाँच लाख इंजीनियर हर साल बाहर निकल रहे हैं.

लोकतंत्र, कानून का शासन और राष्ट्रीय-एकता


 आजादी के सपने-05

 जिस समय हम 77वें स्वतंत्रता दिवस की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, जम्मू-कश्मीर से जुड़े अनुच्छेद 370 और 35ए को निष्प्रभावी बनाए जाने के फैसले की वैधानिकता पर देश के सुप्रीमकोर्ट की संविधान-बेंच सुनवाई कर रही है. केंद्र सरकार के इस फैसले और उसके निहितार्थ को लेकर 23 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं. फैसला जो भी हो, साबित क्या होगा?

साबित होगी भारतीय लोकतंत्र और उससे जुड़ी संस्थाओं और जनमत की ताकत. हमारे लोकतंत्र के सामने नागरिकों के हितों के अलावा न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना, बहुजातीय-बहुधर्मी-बहुभाषी व्यवस्था को संरक्षण देने के साथ राष्ट्रीय-एकता और अखंडता की रक्षा करने की चुनौती भी है. इस चुनौती को पूरा करने के लिए संविधान हमारा मार्गदर्शक है.

भारतीय संविधान

हमारे पास दुनिया का सबसे विषद संविधान है. दुनिया में सांविधानिक परम्पराएं तकरीबन साढ़े तीन सौ साल पुरानी हैं. लिखित संविधान तो और भी बाद के हैं. 1787 में अमेरिकी संविधान से इसकी शुरूआत हुई. ऑस्ट्रियो हंगेरियन संघ ने 1867 में ऑस्ट्रिया में संविधान लागू किया. ब्रिटिश संविधान तो लिखा ही नहीं गया, परंपराओं से बनता चला गया.

लोकतंत्र का दबाव था कि उन्नीसवीं सदी में अनेक सम्राटों एवं राजाओं ने अपने देशों में संविधान रचना की. भारतीय संविधान की रचना के समय उसके निर्माताओं के सामने नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा, लोकतंत्र, संघीय और राज्यों के कार्यक्षेत्र की स्पष्ट व्याख्या, सामाजिक न्याय और इस देश की बहुल संस्कृति की रक्षा जैसे सवाल थे.

लोकतांत्रिक-समाज

पिछले 76 साल के सांविधानिक अनुभव को देखें तो सफलता और विफलता के अनेक मंजर देखने को मिलेंगे. कभी लगता है हम लोकतंत्र से भाग रहे हैं. या फिर हम अभी लोकतंत्र के लायक नहीं हैं. या लोकतंत्र हमारे लायक नहीं है. या लोकतंत्र को हम जितना पाक-साफ समझते हैं, वह उतना नहीं हो सकता. उसकी व्यावहारिक दिक्कतें हैं. वह जिस समाज में है, वह खुद पाक-साफ नहीं है.

वस्तुतः समाज ही अपने लोकतंत्र को बढ़ावा देता है और लोकतंत्र से समाज का विकास होता है. संविधान का मतलब है कानून का शासन. पिछले 76 वर्षों में इन दोनों बातों की परीक्षा हुई है. हम गर्व से कहते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत में है. हर पाँच साल में होने वाला आम चुनाव दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक गतिविधि है. चुनावों की निरंतरता और सत्ता के निर्बाध-हस्तांतरण ने हमारी सफलता की कहानी भी लिखी है.

Monday, August 14, 2023

बड़ी चुनौती, स्वस्थ और शिक्षित नागरिक



आज़ादी के सपने-04

भारत और चीन की यात्राएं समांतर चलीं, पर बुनियादी मानव-विकास में चीन हमें पीछे छोड़ता चला गया. बावजूद इसके कि पहले दो दशक की आर्थिक-संवृद्धि में हमारी गति बेहतर थी. जवाहर लाल नेहरू ने भारत में मध्यवर्ग को तैयार किया, दूसरी तरफ चीन ने बुनियादी विकास पर ध्यान दिया. समय के साथ सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य में चीन ने हमें पीछे छोड़ दिया. हमें इन दोनों के बारे में सोचना चाहिए.

कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी कम से कम तीन क्षेत्रों में नागरिकों को सबल बनाने की है. वे सबल होंगे, तो उनकी भागीदारी से देश और समाज ताकतवर होता जाएगा. ये तीन क्षेत्र हैं शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय.

सन 2011 में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन से डॉक्टरेट की मानद उपाधि ग्रहण करते हुए अमर्त्य सेन ने कहा, समय से प्राथमिक शिक्षा पर निवेश न कर पाने की कीमत भारत आज अदा कर रहा है. नेहरू ने तकनीकी शिक्षा के महत्व को पहचाना जिसके कारण आईआईटी जैसे शिक्षा संस्थान खड़े हुए, पर प्राइमरी शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण ‘निराशाजनक’ रहा.

शायद यही वजह है कि उच्च और तकनीकी शिक्षा में हमारा प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर है. सत्तर के दशक में दो ग़रीब देश, आबादी और अर्थव्यवस्था के हिसाब से लगभग सामान थे. इनमें से एक खेलों में ही नहीं जीवन के हरेक क्षेत्र में आगे निकल गया और दूसरा काफ़ी पीछे रह गया.

इस सच को ध्यान में रखना होगा कि चीन 'रेजीमेंटेड' देश है, वहाँ आदेश मानना पड़ता है. भारत खुला देश है, यहाँ ऐसा मुश्किल है. हमारे यहाँ जो भी होगा, उसे एक लोकतांत्रिक-प्रक्रिया से गुजरना होगा. देश के अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों से विमर्श के बाद ही फैसलों को लागू किया जा सकता है.

स्वास्थ्य-चेतना

महामारी के कारण पिछले तीन साल वैश्विक स्वास्थ्य-चेतना के वर्ष थे. इस दौरान वैश्विक स्वास्थ्य-नीतियों का पर्दाफाश हुआ. भारत के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार हमारे यहाँ बाल पोषण के संकेतक उत्साहवर्धक नहीं हैं. बच्चों की शारीरिक विकास अवरुद्धता में बड़ा सुधार नहीं है और 13 राज्यों मे आधे से ज्यादा बच्चे और महिलाएं रक्ताल्पता से पीड़ित हैं.

2020 मे सुप्रीम कोर्ट के एक पीठ ने स्वास्थ्य को नागरिक का मौलिक अधिकार मानते हुए कुछ महत्वपूर्ण निर्देश सरकार को दिए थे. अदालत ने कहा, राज्य का कर्तव्य है कि वह सस्ती चिकित्सा की व्यवस्था करे. अदालत की टिप्पणी में दो बातें महत्वपूर्ण थीं. स्वास्थ्य नागरिक का मौलिक अधिकार है. दूसरे, इस अधिकार में सस्ती या ऐसी चिकित्सा शामिल है, जिसे व्यक्ति वहन कर सके.

महंगा इलाज

अदालत ने यह भी कहा कि इलाज महंगा और महंगा होता गया है और यह आम लोगों के लिए वहन करने योग्य नहीं रहा है. भले ही कोई कोविड-19 से बच गया हो, लेकिन वह आर्थिक रूप से जर्जर हो चुका है. इसलिए सरकारी अस्पतालों मे पूरे इंतजाम हों या निजी अस्पतालों की अधिकतम फीस तय हो. यह काम आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत शक्तियों को प्रयोग करके किया जा सकता है.

देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर 1983, 2002 और 2017 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियाँ बनाई गई हैं. 2017 की नीति से जुड़ा कार्यक्रम है आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन-आरोग्य योजना. इसके अलावा ग्रामीण भारत से जुड़ी कई सामाजिक परियोजनाओं को शुरू किया गया है, जो खासतौर से वृद्धों, महिलाओं और निराश्रितों पर केंद्रित हैं.

गरीबों की अनदेखी

सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर वैश्विक रणनीति का जिक्र अस्सी के दशक में तेजी से शुरू हुआ. 1978 में यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अल्मा-अता घोषणा की थी-सन 2000 में सबके लिए स्वास्थ्य! संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1974 में अपने विशेष अधिवेशन में नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की घोषणा और कार्यक्रम का मसौदा पास किया.

अल्मा-अता घोषणा में स्वास्थ्य को मानवाधिकार मानते हुए इस बात का वायदा किया गया था कि दुनिया की नई सामाजिक-आर्थिक संरचना में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी सरकारें लेंगी. इतनी बड़ी घोषणा के बाद अगले दो वर्षों में इस विमर्श पर कॉरपोरेट रणनीतिकारों ने विजय प्राप्त कर ली.

Saturday, August 12, 2023

नागरिक हैं ‘भारत के भाग्य विधाता’


आज़ादी के सपने-03

अगस्त का यह महीना चालीस के दशक की तीन तारीखों के लिए खासतौर से याद किया जाता है. सन 1942 की 9 अगस्त से शुरू हुआ ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो’ आंदोलन 15 अगस्त 1947 को अपनी तार्किक परिणति पर पहुँचा था. भारत आज़ाद हुआ.

1942 से 1947 के बीच 1945 के अगस्त की दो तारीखें मानवता के इतिहास की क्रूरतम घटनाओं के लिए याद की जाती हैं. 6 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा शहर पर एटम बम गिराया गया. फिर भी जापान ने हार नहीं मानी तो 9 अगस्त को नगासाकी शहर पर बम गिराया गया.

इन दो बमों ने विश्व युद्ध रोक दिया. इस साल दुनिया उस बमबारी की 78वीं सालगिरह मना रही है. इन दो घटनाओं ने वैश्विक नागरिक-समुदाय के सामने कई सवाल खड़े किए थे. राष्ट्रों के हित क्या नागरिकों के हित भी होते हैं?

नागरिकों की ताकत

जापान के नागरिकों को श्रेय जाता है कि उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की पराजय और विध्वंस का सामना करते हुए पिछले 77 साल में एक नए देश की रचना कर दी. वह दुनिया की तीसरे नम्बर की अर्थव्यवस्था है. भले ही चीन उससे बड़ी अर्थव्यवस्था है, पर तकनीकी गुणवत्ता में चीन उसके करीब नहीं हैं.

भारत और जापान की संसदें दो तरह के अनुभवों से गुजर रही हैं. जापान की संसद पिछले 76 साल के इतिहास का सबसे लंबा विमर्श कर रही है, वहीं हमारी संसद में शोर है. यह राजनीति है और इसकी ताली भी दो हाथ से बजती है. एक नेता की, दूसरी जनता की.

शोर ही सही, पर क्या हमारे विमर्श में गम्भीरता है? क्या हम भविष्य को लेकर सचेत हैं? हम माने कौन? देश के संविधान की उद्देशिका का पहला वाक्य है: ‘हम, भारत के लोग…और अंतिम वाक्य है: ‘,अपनी संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं.’  कौन हैं भारत के वे लोग, जिन्होंने संविधान को आत्मार्पितकिया है?

भारत भाग्य विधाता

रघुवीर सहाय की कविता है:- राष्ट्रगीत में भला कौन वह/ भारत भाग्य विधाता है/ फटा सुथन्ना पहने जिसका/ गुन हरचरना गाता है. कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं:- कौन-कौन है वह जन-गण-मन/ अधिनायक वह महाबली/ डरा हुआ मन बेमन जिसका/ बाजा रोज़ बजाता है.

वह भारत भाग्य विधाता इस देश की जनता है. क्या उसे जागी हुई जनता कहना चाहिए? जागने का मतलब आवेश और तैश नहीं है. अभी हम या तो खामोशी देखते हैं या भावावेश. दोनों ही गलत हैं. सही क्या है, यह सोचने का समय आज है. आप सोचें कि 9 और 15 अगस्त की दो क्रांतियों का क्या हुआ.

15 अगस्त, 1947 को जवाहर लाल नेहरू ने कहा, ‘इतिहास के प्रारंभ से ही भारत ने अपनी अनंत खोज आरंभ की थी. अनगिनत सदियां उसके उद्यम, अपार सफलताओं और असफलताओं से भरी हैं…हम आज दुर्भाग्य की एक अवधि पूरी करते हैं. आज भारत ने अपने आप को फिर पहचाना है.’

इस भाषण के दो साल बाद 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में भीमराव आंबेडकर ने कहा, ‘राजनीतिक लोकतंत्र तबतक विफल है, जबतक उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र नहीं हो.’ इस सामाजिक-लोकतंत्र के केंद्र में है भारतीय जनता, जो जागती है, तो बहुत कुछ बदल जाता है.

Friday, August 11, 2023

ग्रामीण-विकास और खेती की चुनौतियाँ


 आज़ादी के सपने-02

भारत सरकार ने गत 20 जुलाई को चावल के निर्यात को लेकर एक बड़ा फैसला किया. गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई. भारत के इस फ़ैसले के पीछे कारण है आने वाले त्योहार के मौसम में बढ़ने वाली घरेलू माँग और क़ीमतों पर नियंत्रण रखना.

भारत के इस फैसले से दुनिया भर के खाद्य बाज़ार में चावल के दाम बढ़ने की आशंका है. भारत आज दुनिया में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है. चावल के वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी 42 प्रतिशत है. विश्व व्यापार में साढ़े चार करोड़ टन चावल की बिक्री होती है, जिसमें 2.2 करोड़ टन भारतीय चावल होता है.

आत्मनिर्भर भारत

निर्यात-प्रतिबंधों का दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा, वह विचार का अलग विषय है. हमें केवल इस बात को रेखांकित करना है कि खाद्यान्न के मामले में अब हम आत्मनिर्भर हैं. भारत 140 से अधिक देशों को चावल निर्यात करता है.

इस परिस्थिति की तुलना करें साठ के दशक से जब भारत को विदेशी खाद्य सहायता पर निर्भर रहना पड़ा था. पीएल-480 समझौते के तहत, भारत ने अमेरिका से गेहूं का आयात किया. उसके तहत ऐसे गेहूँ को स्वीकार करना पड़ा, जो जानवरों को खिलाने लायक था.

भारत के प्राण उसके गाँवों में बसते हैं. देश का विकास तभी होगा, जब गाँवों का विकास होगा. गाँवों के साथ भारतीय खेती का वास्ता है. कृषि और ग्रामीण विकास के भारतीय कार्यक्रमों की लंबी कहानी है. इसमें पंचायती-राज और 73वें संविधान संशोधन की भी भूमिका है.

पंचायती राज

जनवरी 2019 तक की जानकारी के अनुसार देश में 630 जिला पंचायतें, 6614 ब्लॉक पंचायतें और 2,53,163 ग्राम पंचायतें हैं। इनमें 30 लाख से अधिक पंचायत प्रतिनिधि हैं. इनके पास कुछ वित्तीय अधिकार भी हैं. 2021-26 की अवधि के लिए बने 15वें वित्त आयोग ने ग्रामीण निकायों के लिए 2,36,805 करोड़ की धनराशि के आबंटन की सिफारिश की है.

Thursday, August 10, 2023

हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के…

 


आज़ादी के सपने-01

वैबसाइट आवाज़ द वॉयस में 6 से 14 अगस्त, 2023 को प्रकाशित नौ लेखों की सीरीज़ का पहला लेख

पिछले साल इन्हीं दिनों जब हम अपनी स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे कर रहे थे, तब हमारे मन में स्वतंत्रता के 100वें वर्ष की योजनाएं जन्म ले रही थीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2022 को लालकिले के प्राचीर से जो भाषण दिया, उसमें भविष्य के भारत की परिकल्पना थी.

उन्होंने 2047 का खाका खींचा, जिसके लिए अगले 25 वर्षों को ‘अमृत-काल’ बताते हुए कुछ संकल्पों और कुछ संभावनाओं का जिक्र किया. एक देश जिसने अपनी स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे किए हैं, और जो 100 वर्ष की ओर बढ़ रहा है, उसकी महत्वाकांक्षाओं और इरादों को उसमें पढ़ना होगा.

उसके पहले एक नज़र उन वर्षों पर भी डालनी चाहिए, जिनसे गुज़र कर हम यहाँ तक आए हैं. 15 अगस्त, 1947 को जब हम स्वतंत्र हो रहे थे, तब हमने कुछ सपने देखे थे. पिछले 76 साल में कुछ पूरे हुए और कुछ नहीं हुए.

सपना क्या था?

उस भव्य भारतवर्ष की पुनर्स्थापना, जो कभी वास्तव में सच था. नागरिकों की खुशहाली. क्या हैं क्या हैं हमारी 76 साल की उपलब्धियाँ? और अगले 25 साल में ऐसा क्या हम कर पाएंगे, जो हमें अपने सपनों को साकार करने में मददगार बने?

भारत के नीति आयोग ने संयुक्त राष्ट्र मल्टी डायमेंशनल पोवर्टी इंडेक्स (एमपीआई) के आधार पर हाल में जानकारी दी है कि मार्च 2021 को पूरे हुए पाँच वर्षों में देश में करीब 13.5 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से ऊपर आए हैं.

इसके कुछ साल परले संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और ऑक्सफोर्ड गरीबी एवं मानव विकास पहल (ओपीएचआई) के आँकड़ों के अनुसार 2005-06 से 2015-16 के दौरान भारत में 27.3 करोड़ लोग गरीबी के दायरे से बाहर निकले.

हम कहाँ हैं?

नॉमिनल जीडीपी के आधार पर इस समय भारत, दुनिया की पाँचवीं और पर्चेज़िंग पावर पैरिटी (पीपीपी) के आधार पर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से ही देश की औसत सालाना संवृद्धि 6 से 7 फीसदी की रही है. सन 2016 में नोटबंदी और 2017 में गुड्स एंड सर्विस टैक्स लागू होने के कारण और 2020 से 2022 तक कोविड के कारण अर्थव्यवस्था को झटके भी लगे हैं.