Sunday, April 11, 2021

क्या था ऑपरेशन गुलमर्ग?

 


।।चार।।

अगस्त 1947 में विभाजन के पहले ही कश्मीर के भविष्य को लेकर विमर्श शुरू हो गया था। कांग्रेस की इच्छा थी कि कश्मीर का भारत में विलय हो और मुस्लिम लीग का कहना था कि रियासत में रहने वाले ज्यादातर मुसलमान हैं, इसलिए उसे पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहिए। तमाम तरह के विमर्श के बावजूद महाराजा हरिसिंह अक्तूबर के तीसरे सप्ताह तक फैसला नहीं कर पाए। फिर जब स्थितियाँ उनके नियंत्रण से बाहर हो गईं, तब उन्होंने भारत में विलय का फैसला किया। उन परिस्थितियों पर विस्तार से हम किसी और जगह पर विचार करेंगे, पर यहाँ कम से कम तीन घटनाओं का उल्लेख करने की जरूरत है। 1.जम्मू में मुसलमानों की हत्या. 2.गिलगित-बल्तिस्तान में महाराजा के मुसलमान सैनिकों की बगावत और 3.पश्चिम से कबायलियों का कश्मीर पर हमला।

हाल में मेरी इस सीरीज के दूसरे भाग को जब मैंने फेसबुक पर डाला, तब एक मित्र ने बीबीसी की एक रिपोर्ट के हवाले से लिखा, कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि पाकिस्तान से आने वाले ये कबायली हमलावर थे या वे मुसलमानों की हिफ़ाज़त के लिए आए थे? जम्मू-कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक थे, जबकि उसके शासक महाराजा हरि सिंह हिंदू थे। 1930 के बाद से अधिकारों के लिए मुसलमानों के आंदोलनों में बढ़ोतरी हुई। अगस्त 1947 में देश के बंटवारे के बाद भी यह रियासत हिंसा की आग से बच नहीं पाई… जम्मू में हिंदू अपने मुसलमान पड़ोसियों के ख़िलाफ़ हो गए। कश्मीर सरकार में वरिष्ठ पदों पर रह चुके इतिहासकार डॉ. अब्दुल अहद बताते हैं कि पश्तून कबायली पाकिस्तान से मदद के लिए आए थे, हालांकि उसमें कुछ 'दुष्ट लोग' भी शामिल थे।… उधर, प्रोफ़ेसर सिद्दीक़ वाहिद इस बात पर सहमत होते हैं कि पाकिस्तानी कबायलियों का हमला जम्मू में जारी अशांति का जवाब था।

ऑस्ट्रेलिया के लेखक क्रिस्टोफर स्नेडेन ने अपनी किताब कश्मीर द अनरिटन हिस्ट्री में भी इस बात को लिखा है। हालांकि उनकी वह किताब मूलतः पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के बारे में है, पर उन्होंने किताब की शुरुआत में ही लिखा है कि इस सिलसिले में प्राप्त ज्यादातर विवरणों में बताया जाता है कि पाकिस्तान से आए पश्तून कबायलियों ने स्थिति को बिगाड़ा, इस किताब में बताया गया है कि जम्मू के लोगों ने इसकी शुरुआत की। विभाजन के बाद जम्मू के इलाके में तीन काम हुए। पहला था, पश्चिमी जम्मू प्रांत के पुंछ इलाके में मुसलमानों ने महाराजा हरिसिंह के खिलाफ बगावत शुरू की। दूसरे, पूरे जम्मू-प्रांत में साम्प्रदायिक हिंसा शुरू हो गई, तीसरे पश्चिमी जम्मू क्षेत्र में बागियों ने एक इलाके पर कब्जा करके उसे आज़ाद जम्मू-कश्मीर के नाम से स्वतंत्र क्षेत्र घोषित कर दिया। पूरी रियासत साम्प्रदायिक टुकड़ों में बँटने लगी। यह सब 26 अक्तूबर, 1947 के पहले हुआ और लगने लगा कि पूरे जम्मू-कश्मीर को किसी एक देश के साथ मिलाने का फैसला लागू करना सम्भव नहीं होगा। इस घटनाक्रम पर भी हम आगे जाकर विचार करेंगे, पर पहले उस ऑपरेशन गुलमर्ग का विवरण देते हैं, जिसका उल्लेख पिछले आलेख में किया था।   

लाल गलियारे की चुनौती


कॉरोना, बंगाल के चुनाव और आईपीएल की खबरों में उलझे देश के लिए माओवादी हिंसा ने जोरदार झटके का काम किया है। इन सभी खबरों के तार देश की राजनीति से जुड़े हैं। यह अपने आप में एक समस्या है। आमतौर पर राजनीतिक प्रतिक्रिया होती है, सुरक्षा-व्यवस्था ठीक नहीं थी, इंटेलिजेंस की विफलता है वगैरह। आम जनता की प्रतिक्रिया होती है कि बहुत हो गया, अब फौजी कार्रवाई होनी चाहिए। कुछ लोग हवाई हमले की बातें भी करते हैं।

माओवादियों के हमले आमतौर पर सुरक्षा बलों पर होते हैं, पर बस्तर की झीरम घाटी में 25 मई 2013 को हुए हमले में छत्तीसगढ़ कांग्रेस पार्टी की पहली कतार के ज्यादातर बड़े नेताओं समेत 29 लोग मारे गए थे। उस हमले से यह बात भी रेखांकित हुई थी कि माओवादियों का इस्तेमाल मुख्यधारा की राजनीति में भी परोक्ष रूप से होता है। राजनीतिक दलों के बीच तू-तू, मैं-मैं माओवादियों की मदद करती है। वे बच्चों और महिलाओं को ढाल बनाते हैं, ताकि सरकार के प्रति आदिवासियों का गुस्सा भड़के।

माओवादी रणनीति

बीजापुर में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में सुरक्षाबलों के 22 जवानों की मौत के बाद तमाम तरह के सवाल हवा में हैं। कहा जाता है कि उनकी पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की बटालियन नंबर 1 के कमांडर हिड़मा ने जंगल में होने की ख़बर प्रचारित की। सुरक्षाबलों के दो हज़ार से अधिक जवान इस बटालियन को घेरने के लिए निकले और माओवादियों के जाल में फँसते चले गए।

Friday, April 9, 2021

पाकिस्तान का कश्मीर पर पहला हमला अर्थात ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’

 


।।तीन।।

कश्मीर का विलय हो या नहीं हो और वह स्वतंत्र रहे या किसी के साथ जाए, इन दुविधाओं के कारण महाराजा हरिसिंह ने स्वतंत्रता के तीन दिन पहले 12 अगस्त 1947 को दोनों देशों के सामने एक स्टैंडस्टिल समझौते का प्रस्ताव रखा। पाकिस्तान ने इस समझौते पर दस्तखत कर दिए, पर भारत ने नहीं किए। भारत इसपर ज्यादा विचार चाहता था और इसके लिए उसने महाराजा को दिल्ली आकर बातचीत करने का सुझाव दिया। वीपी मेनन ने लिखा है, पाकिस्तान ने स्टैंडस्टिल समझौते पर दस्तखत कर दिए थे, पर हम इसके निहितार्थ पर विचार करना चाहते थे। हमने रियासत को अकेला ही रहने दिया …। भारत सरकार की तत्काल कश्मीर में बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। राज्य के सामने अपनी कई तरह की समस्याएं थीं। सच पूछो तो हमारे हाथ भी घिरे हुए थे। कश्मीर के बारे में सोचने का वक्त ही कहाँ था।1

उधर पाकिस्तान ने स्टैंडस्टिल समझौते पर दस्तखत करने के बावजूद कुछ समय बाद ही जम्मू-कश्मीर की आर्थिक और संचार से जुड़ी नाकेबंदी कर दी। हर तरह की आवश्यक सामग्री खाद्यान्न, नमक, पेट्रोल वगैरह की सप्लाई रोक दी गई। उधर भारत कश्मीर के महाराजा से इस बाबत कोई विचार-विमर्श कर पाता, हमला शुरू हो गया। परिस्थितियाँ तेजी से बदल गईं।

24 अक्तूबर, 1947 को गवर्नर जनरल और स्याम के विदेशमंत्री नई दिल्ली में पंडित जवाहर लाल नेहरू के घर पर रात्रिभोज के लिए आ रहे थे। लॉर्ड माउंटबेटन को पंडित नेहरू ने बताया कि खबरें मिली हैं कि कश्मीर पर पश्चिमोत्तर पाकिस्तान के कबायलियों ने हमला कर दिया है। स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए लॉर्ड माउंटबेटन ने अगली सुबह 11 बजे डिफेंस कमेटी की विशेष बैठक बुला ली। वहाँ भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ की आधिकारिक रिपोर्ट भी आ चुकी थी, जिन्हें पाकिस्तानी सेना के रावलपिंडी स्थित हैडक्वार्टर्स ने जानकारी दी थी, तीन दिन पहले पश्चिम से करीब 5000 कबायलियों ने कश्मीर में प्रवेश किया है और श्रीनगर की ओर बढ़ते हुए उन्होंने मुजफ्फराबाद शहर में लूटपाट और आगज़नी की है।2 सन 1947 में पाकिस्तानी हमले की यह पहली रिपोर्ट थी।

Thursday, April 8, 2021

कश्मीर समस्या का जन्म कैसे हुआ?


।।दो।। 
अविभाजित भारत में 562 देशी रजवाड़े थे। कश्मीर भी अंग्रेजी राज के अधीन था, पर उसकी स्थिति एक प्रत्यक्ष उपनिवेश जैसी थी और 15 अगस्त 1947 को वह भी स्वतंत्र हो गया। देशी रजवाड़ों के सामने विकल्प था कि वे भारत को चुनें या पाकिस्तान को। देश को जिस भारत अधिनियम के तहत स्वतंत्रता मिली थी, उसकी मंशा थी कि कोई भी रियासत स्वतंत्र देश के रूप में न रहे। बहरहाल कश्मीर राज के मन में असमंजस था।

इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के तहत 15 अगस्त 1947 को जम्मू कश्मीर पर भी अंग्रेज सरकार का आधिपत्य (सुज़रेंटी) समाप्त हो गया। महाराजा के मन में संशय था कि यदि हम भारत में शामिल हुए, तो राज्य की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी को यह बात पसंद नहीं आएगी और यदि पाकिस्तान में विलय करेंगे, तो हिंदू और सिख नागरिकों को दिक्कत होगी। 11 अगस्त को उन्होंने अपने प्रधानमंत्री रामचंद्र काक को बर्खास्त कर दिया। काक ने स्वतंत्र रहने का सुझाव दिया था। इससे पर्यवेक्षकों को लगा कि महाराजा का झुकाव भारत की ओर है।

पाकिस्तान ने कश्मीर के महाराजा को कई तरह से मनाने का प्रयास किया कि वे पकिस्तान में विलय को स्वीकार कर लें। स्वतंत्रता के ठीक पहले जुलाई 1947 में मोहम्मद अली जिन्ना ने महाराजा को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें हर तरह की सुविधा दी जाएगी। जिन्ना की मुस्लिम लीग ने रामचंद्र काक से भी सम्पर्क बनाया था। बहरहाल महाराजा ने भारत और पाकिस्तान के साथ स्टैंडस्टिल समझौते की पेशकश की। यानी यथास्थिति बनी रहे। भारत ने इस पेशकश पर कोई फैसला नहीं किया, पर पाकिस्तान ने महाराजा की सरकार के साथ स्टैंडस्टिल समझौता कर लिया। पर उसने समझौते का अनुपालन किया नहीं, बल्कि आगे जाकर कश्मीर की नाकेबंदी कर दी और वहाँ पाकिस्तान की ओर से जाने वाली रसद की आपूर्ति रोक दी।

Wednesday, April 7, 2021

क्या था मुशर्रफ का चार-सूत्री समझौता फॉर्मूला?

 


।।एक।।
भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर जमी बर्फ के पिघलने की सम्भावनाओं को लेकर जब हाल में हलचल थी, तब पिछले पाँच दशक में इस दिशा में हुए प्रयासों को लेकर कुछ बातें सामने आई थीं। इनमें शिमला समझौते का जिक्र भी होता है। यह समझौता विफल होने के कगार पर था कि अचानक ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के बीच कुछ बात हुई और समझौते के आसार बन गए देश के अनेक पर्यवेक्षकों का मत है कि भारत ने शिमला समझौता करके गलती की।

भारत-पाकिस्तान के समझौता-प्रयासों की पृष्ठभूमि पर नजर डालने की जरूरत है। कश्मीर के विवाद को लेकर हमें 1947 में वापस जाना पड़ेगा, पर कुछ बातें शिमला समझौते से भी समझी जा सकती हैं। इन बातों के लिए कई लेख लिखने होंगे। पर सबसे पहले मैं चार-सूत्री समझौते की पेशकश और फिर उसके खटाई में पड़ जाने की पृष्ठभूमि पर कुछ लिखूँगा।

पाकिस्तान के पूर्व विदेशमंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी ने अपनी किताब ‘नीदर ए हॉक नॉर ए डव’ में लिखा है कि परवेज़ मुशर्रफ और मनमोहन सिंह के कार्यकाल में दोनों देशों के बीच कश्मीर पर चार-सूत्री समझौता होने जा रहा था, जिससे इस समस्या का स्थायी समाधान हो जाता। इस समझौते की पृष्ठभूमि अटल बिहारी वाजपेयी और परवेज़ मुशर्रफ के आगरा शिखर सम्मेलन में ही तैयार हो गई थी। कहा तो यह भी जाता है कि आगरा में ही दस्तखत हो जाते, पर वह समझौता हुआ नहीं।

बताया जाता है कि मई 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद का कार्यभार संभाला था, तब मनमोहन सिंह ने एक फाइल उन्हें सौंपी थी, जिसमें उस चार-सूत्री समझौते से जुड़े विवरण थे। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने हाल में कसूरी का लिखा इस आशय का एक लेख भी प्रकाशित किया है। कसूरी के अनुसार इस चार-सूत्री समझौते की पेशकश की थी। इस समझौते के 11 या 12 महत्वपूर्ण कारक थे, जिनकी शुरुआत कश्मीर के प्रमुख शहरों के विसैन्यीकरण और नियंत्रण रेखा पर न्यूनतम सैनिक उपस्थिति से होती।

Tuesday, April 6, 2021

क्वाड के जवाब में रूसी-चीनी गठबंधन नहीं


रूस के विदेशमंत्री सर्गेई लावरोव ने आज दिल्ली में कहा कि चीन के साथ रूस कोई सैन्य समझौता नहीं होने जा रहा है। भारत की यात्रा पर आए विदेशमंत्री से सवाल पूछा गया था कि क्या रूस चीन के साथ कोई सैन्य समझौता करने की योजना बना रहा है? इसके जवाब में सर्गेई लावरोव ने कहा, नहीं।

हाल में इस आशय की खबरें थीं कि रूस और चीन ने क्वाड के जवाब में सैनिक गठबंधन बनाने का प्रस्ताव किया है। इसे 'क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद मंच' कहा गया था। यह प्रस्ताव दक्षिणी चीन के शहर गुइलिन में चीन के विदेश मंत्री वांग यी और सर्गेई लावरोव के बीच हुई बैठक के बाद आया। लावरोव ने पिछले दिनों भारत के क्वाड में शामिल होने पर आपत्ति भी व्यक्त की थी।

भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर और रूसी विदेशमंत्री सर्गेई लावरोव के बीच नाभिकीय, अंतरिक्ष और रक्षा-क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही भागीदारी सहित तमाम विषयों और भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन की तैयारियों को लेकर विस्तृत बातचीत हुई। लावरोव सोमवार की शाम को दिल्ली पहुँचे थे।

मंगलवार को दोनों विदेशमंत्रियों के संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में एस जयशंकर ने कहा,‘बातचीत व्यापक और सार्थक रही।’ उन्होंने कहा कि हमारी  ज्यादातर बातचीत इस साल के आखिर में होने जा रहे भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के बारे में हुई। गौरतलब है कि भारत और रूस का वार्षिक शिखर सम्मेलन पिछले वर्ष कोविड-19 महामारी के कारण नहीं हो सका था।

भारत-अमेरिका और रूस के रिश्ते कसौटी पर


भारत के अमेरिका के साथ रिश्तों के अलावा रूस के साथ रिश्ते भी इस समय कसौटी पर हैं। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव दो दिवसीय यात्रा पर सोमवार रात दिल्ली पहुंच गए। उनकी यह यात्रा तब हो रही है जब दोनों देशों के रिश्तों में तनाव के संकेत हैं। लावरोव के कुछ तीखे बयान भी हाल में सुनाई पड़े हैं। लावरोव की आज मंगलवार को विदेशमंत्री एस जयशंकर से मुलाकात हो रही है। इसमें तमाम द्विपक्षीय मुद्दों के अलावा ब्रिक्स, एससीओ और आरआईसी (रूस, भारत, चीन) जैसे संगठनों की भावी बैठकों को लेकर भी चर्चा होगी। एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 को लेकर भी चर्चा होगी।

सोमवार को ही अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत जॉन कैरी दिल्ली आए हैं। वे भारत सरकार, प्राइवेट सेक्टर व एनजीओ  के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे। कैरी 1 से 9 अप्रैल के बीच अबू धाबी, नई दिल्ली और ढाका की यात्रा पर निकले हैं। आगामी 22-23 अप्रैल के बीच जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका द्वारा आयोजित 'नेताओं के शिखर सम्मेलन' और इस वर्ष के अंत में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (सीओपी26) से पहले कैरी  विचार विमर्श के लिए इन देशों के दौरे पर हैं। 

इन दोनों विदेश मंत्रियों के दौरों के कारण आज दिल्ली में काफी गहमा-गहमी रहेगी। भारत की कोशिश होगी कि अफगानिस्तान में चल रही शांति समझौते की प्रक्रिया को लेकर रूस के पक्ष को समझा जाए। पिछले महीने मॉस्को में हुई बैठक में रूस ने भारत को नहीं बुलाया था। भारत की यात्रा के बाद लावरोव सीधे इस्लामाबाद जाएंगे। वर्ष 2012 के बाद रूस का कोई विदेश मंत्री पाकिस्तान की यात्रा पर जाएगा, लेकिन यह पहली बार है कि रूस का कोई बड़ा नेता भारत आने के बाद पाकिस्तान की यात्रा पर जा रहा है। ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने लावरोव की यात्रा का जो एजेंडा सोमवार को जारी किया, उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात का जिक्र नहीं है। ऐसा हुआ, तो यह बात हैरत वाली होगी, क्योंकि ज्यादातर देशओं के विदेशमंत्री दिल्ली आते हैं, तो प्रधानमंत्री से भी मिलते हैं।

Monday, April 5, 2021

बांग्लादेश पर चीनी-प्रभाव को रोकने की चुनौती

 


बांग्लादेश की स्वतंत्रता के स्वर्ण जयंती समारोह के सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा ने बांग्लादेश के महत्व पर रोशनी डाली है। मैत्री के तमाम ऐतिहासिक विवरणों के बावजूद पिछले कुछ समय से इन रिश्तों में दरार नजर आ रही थी। इसके पीछे भारतीय राजनीति के आंतरिक कारण हैं और चीनी डिप्लोमेसी की सक्रियता। भारत में बांग्लादेशी नागरिकों की घुसपैठ, नागरिकता कानून में संशोधन, रोहिंग्या और तीस्ता के पानी जैसे कुछ पुराने विवादों को सुलझाने में हो रही देरी की वजह से दोनों के बीच दूरी बढ़ी है।

पिछले कुछ समय से भारतीय विदेश-नीति में दक्षिण एशिया के देशों से रिश्तों को सुधारने के काम को महत्व दिया जा रहा है। म्यांमार में फौजी सत्ता-पलट के बाद भारत की संतुलित प्रतिक्रिया और संरा मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका विरोधी प्रस्ताव पर मतदान के समय भारत की अनुपस्थिति से इस बात की पुष्टि होती है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में बीजेपी ने बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर जो चुप्पी साधी है, वह भी विदेश-नीति का असर लगता है।  

भारत-बांग्‍लादेश सीमा चार हजार 96 किलोमीटर लंबी है। दोनों देश 54 नदियों के पानी का साझा इस्तेमाल करते हैं। दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा व्यापार-सहयोगी बांग्लादेश है। वर्ष 2019 में दोनों देशों के बीच 10 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था प्रगतिशील है और सामाजिक-सांस्कृतिक लिहाज से हमारे बहुत करीब है। हम बहुत से मामलों में बेहतर स्थिति में हैं, पर ऐतिहासिक कारणों से दोनों देशों के अंतर्विरोध भी हैं। उन्हें सुलझाने की जरूरत है। 

Sunday, April 4, 2021

औद्योगिक विनिवेश क्यों और कैसे?


चार दिन पहले नया वित्तवर्ष शुरू हो गया है और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की गतिविधियों ने तेजी पकड़ी है। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर ने इसपर पलीता लगाने का इशारा भी किया है। विश्व बैंक का ताजा अनुमान है कि 2021-22 के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर 7.5 से 12.5 फीसदी रह सकती है। बैंक भी भ्रम की स्थिति में है, इसीलिए 7.5 फीसदी से लेकर 12.5 फीसदी की रेंज दी गई है।

अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के लिए सामाजिक कल्याण और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश की जरूरत है। ये संसाधन केवल कर-राजस्व से पूरे नहीं होंगे। यों भी आमतौर पर बजट के कर-राजस्व अनुमान सही साबित नहीं होते। इस साल के बजट में 22.17 लाख करोड़ रुपये के कर-राजस्व का लक्ष्य रखा गया है, जबकि इसके पिछले साल के यह लक्ष्य 24.23 लाख करोड़ का था। महामारी के कारण उस लक्ष्य में 22 फीसदी की कमी करके उसे 19 लाख करोड़ करना पड़ा। वास्तव में कर संकलन कितना हुआ, उसकी जानकारी आने दीजिए।

संसाधन कहाँ से आएंगे?

संसाधन जुटाने का दूसरा तरीका सार्वजनिक सम्पत्तियों के विनिवेश का है। इसबार के बजट में सरकार ने 1.75 लाख करोड़ रुपये के विनिवेश का लक्ष्य रखा है। यह विशाल लक्ष्य है। क्या सरकार इसे पूरा कर पाएगी? पिछले साल का लक्ष्य इससे भी बड़ा 2.1 लाख करोड़ का था। महामारी के कारण सरकार ने हाथ खींच लिए और लक्ष्य बदल कर 32 हजार करोड़ कर दिया गया। बहरहाल 31 मार्च तक सरकार ने इस मद में 32,835 करोड़ रुपये जुटाए।

नब्बे के दशक में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद सार्वजनिक उद्योगों के विनिवेश की बहस निर्णायक दौर में है। सरकारें निजीकरण शब्द का इस्तेमाल करने से घबराती रही हैं। इसके लिए विनिवेश शब्द गढ़ा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने कहा था, सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। सन 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल में भी उन्होंने यही बात कही थी। दूसरी तरफ कमांड-अर्थव्यवस्था के समर्थक इसका विरोध कर रहे हैं। हाल में बैंक कर्मचारियों ने दो दिन का आंदोलन करके आंदोलन का बिगुल बजा दिया है।

Saturday, April 3, 2021

नए वैश्विक-सच से पाकिस्तान का सामना


फरवरी 2019 में पुलवामा कांड से लेकर उसी साल अगस्त में अनुच्छेद 370 की वापसी ने भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को जिस ढलान पर उतार दिया था, वहाँ से पहिया उल्टी दिशा में घूमने लगा है। गत 26 फरवरी को दोनों देशों ने नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी रोकने के सन 2003 के समझौते को पुख्ता तरीके से लागू करने की घोषणा की थी। पता लगा कि तीन महीनों से दोनों देशों के बीच बैक-चैनल बात चल रही है।

पाकिस्तान ने बुधवार को भारत के साथ आंशिक-व्यापार फिर से शुरू करने की घोषणा करके इस उम्मीद को बल दिया था कि रिश्ते सुधरेंगे। उसके अगले ही दिन वहाँ की कैबिनेट ने इस फैसले को बदल दिया और कहा कि जब तक 370 की वापसी नहीं होगी, तब तक भारत के साथ व्यापार नहीं होगा।  इसके पहले इमरान खान और उनके सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने कहा था कि रिश्तों में सुधार होना चाहिए। इन बयानों के बाद नरेंद्र मोदी और इमरान खान के बीच एक रस्मी पत्राचार हुआ, जिसके बड़े डिप्लोमैटिक निहितार्थ दिखाई पड़ रहे हैं।

पीछे की कहानी

दोनों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव बहुत तेजी से आता है, इसलिए इन संदेशों की शब्दावली में बहुत ज्यादा पढ़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, अलबत्ता पीछे की पटकथा और वैश्विक परिस्थितियों को पढ़ने की जरूरत है। नई बात यह है कि पाकिस्तानी सरकार और सेना एक पेज पर हैं। पाकिस्तान एक कठोर सत्य से रूबरू है। फैसला उसे करना है। अतीत की भारत-पाकिस्तान वार्ताओं में ‘कांफिडेंस बिल्डिंग मैजर्स (सीबीएम)’ का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। इस सीबीएम का रास्ता आर्थिक है। दोनों के आर्थिक-सहयोग की जबर्दस्त सम्भावनाएं हैं, पर पाकिस्तान का ‘कश्मीर कॉज़’ आड़े आता है।

Friday, April 2, 2021

भारत-पाकिस्तान: यू टर्न बनाम यू टर्न


भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में कितनी तेजी से उतार-चढ़ाव आता है इसका नमूना दो दिन में देखने को मिला है। पाकिस्तान ने बुधवार को भारत के साथ आंशिक-व्यापार फिर से शुरू करने की घोषणा करके इस उम्मीद को बल दिया था कि रिश्ते सुधरेंगे। उसके अगले ही दिन वहाँ की कैबिनेट ने इस फैसले को बदल दिया और कहा कि जब तक भारत जम्मू-कश्मीर में 370 की वापसी नहीं करेगा, तब तक उसके साथ व्यापार नहीं होगा। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच रिश्तों की बहाली की ताजा कोशिशों पर फिलहाल ब्रेक लग गया है। अब इंतजार करना होगा कि इस ब्रेक के बाद होता क्या है।

भारत से कपास और चीनी के आयात का फैसला पाकिस्तान के नए वित्त मंत्री हम्माद अज़हर द्वारा बुधवार को की गई उस घोषणा के बाद आया जिसमें उन्होंने बताया कि उनकी अध्यक्षता में हुई आर्थिक समन्वय समिति (ईसीसी) की बैठक में आयात का फैसला किया गया था। इसके बाद गुरुवार को देश के मंत्रिमंडल ने इस फैसले को खारिज कर दिया।

इस मुद्दे के राजनीतिक निहितार्थ को लेकर पाकिस्तान में गुरुवार दोपहर बाद से ही कयास लग रहे थे लेकिन अधिकारी खामोश थे। अंतत: फैसले को लेकर पहली टिप्पणी मानवाधिकार मामलों की मंत्री शीरीन मज़ारी की तरफ से आई जिन्हें कश्मीर को लेकर उनके कट्टर रुख के लिए जाना जाता है। एक बात साफ है कि आयात का फैसला इमरान खान की जानकारी में हुआ था। पर देश के कुछ कट्टरपंथी तबकों के विरोध को देखते हुए उन्होंने पलटी मारना बेहतर समझा। मज़ारी ने कहा कि 20 मार्च को कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद से पहली बार मंत्रिमंडल की बैठक की अध्यक्षता कर रहे प्रधानमंत्री इमरान खान ने, “(यह) स्पष्ट किया (कि) भारत के साथ रिश्ते तब तक सामान्य नहीं हो सकते जब तक वे पांच अगस्त 2019 को कश्मीर में की गई कार्रवाई को वापस नहीं ले लेते।”

Thursday, April 1, 2021

बांग्लादेश में भारत-विरोधी हिंसा


प्रधानमंत्री की बांग्लादेश  यात्रा के दौरान हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम संगठन के नेतृत्व में हुई हिंसा ने ध्यान खींचा है। यह संगठन सन 2010 में खड़ा हुआ था और परोक्ष रूप से प्रतिबंधित संगठन जमाते-इस्लामी के एजेंडा को चलाता है।  इस संगठन से जुड़े लोगों ने न केवल सरकारी सम्पत्ति, रेलवे स्टेशन, रेल लाइन, ट्रेन, थानों और सरकारी भवनों को नुकसान पहुँचाया गया। हिंदू-परिवारों पर और मंदिरों पर भी हमले बोले गए। खुफिया रिपोर्ट यह भी बताती हैं कि जमात, हिफाजत और विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी शेख हसीना की सरकार को गिराने की साजिश रच रहे हैं।

हिंसा की शुरुआत ढाका के बैतूल मुकर्रम इलाके से हुई थी, पर सबसे ज्यादा मौतें ब्राह्मणबरिया जिले में हुईं। इसके अलावा चटगाँव में भी हिंसा हुई, जहाँ हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम का मुख्यालय है। ब्राह्मणबरिया प्रशासन, पत्रकारों और चश्मदीदों के मुताबिक़ हिंसा सुबह 11 बजे से शुरू हुई थी। ज़िला मुख्यालय, नगर पालिका परिषद, केंद्रीय पुस्तकालय, नगरपालिका सभागार, भूमि कार्यालय और प्रेस क्लब समेत टी-ए रोड के दोनों तरफ स्थित अनेक सरकारी इमारतों को आग लगा दी गई थी।