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Wednesday, August 12, 2026

पश्चिम एशिया में ‘सेंटो’ जैसा नया गठबंधन


अरसे से अनुमान था कि पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की पहल पर पचास के दशक में हुए बग़दाद पैक्ट या ‘सेंटो’ को फिर से जगाया जा सकता है, जिसे इस्लामिक ‘नेटो’ भी कहा गया था. कमोबेश उसी तर्ज पर एक नई संधि की शुरुआत पिछले हफ्ते हो गई है.   

सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में गत 7 अगस्त को क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का समझौते पर दस्तखत कर दिए हैं.

हालांकि मिस्र और क़तर ने शुरुआती चर्चाओं में भाग लिया था, लेकिन शुक्रवार को हुई चर्चा में उनका उल्लेख प्रतिभागी के रूप में नहीं किया गया. फिर भी, कुछ नए देशों के इसमें शामिल होने की संभावनाएँ खुली हुई हैं.

समझौते को दुनियाभर के विशेषज्ञों ने अलग-अलग नज़रों से देखा है. मसलन क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीति, सऊदी-ईरान और इसराइल रिश्ते, अमेरिका और दूसरी ताकतों की भूमिका और भारत का नज़रिया. मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी की सार्थकता को लेकर भी सवाल हैं.

समझौते पर हस्ताक्षर होने के 48 घंटे बाद ही उसे पहली गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा है. ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने जाज़ान में अरामको रिफाइनरी पर ड्रोन से हमला किया, जिससे आग लग गई. 

Wednesday, April 22, 2026

पाकिस्तान का ‘डिप्लोमैटिक-वज़न’ बढ़ने के मायने


अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ समझौता हुआ, तो उसपर दस्तखत करने मैं ख़ुद इस्लामाबाद जा सकता हूँ. उनकी इस बात से युद्ध को लेकर उनके दृष्टिकोण के अलावा पाकिस्तान के प्रति उनका झुकाव भी नज़र आता है.

मंगलवार को इस्लामाबाद में बातचीत का दूसरा दौर होने जा रहा है, जिसमें कम से कम ट्रंप नहीं आ रहे हैं. इसका मतलब है कि प्रगति तो हुई है, पर अभी समझौते की स्थिति नहीं है.

ब्रिटिश साप्ताहिक इकोनॉमिस्ट ने लिखा है कि ईरानी नेतृत्व के भीतर मतभेद उभर कर सामने आ रहे हैं. पिछले 10-11 अप्रेल को हुई बातचीत में अमेरिकी प्रतिनिधियों से बहस करने के बजाय ईरानी प्रतिनिधियों ने आपस में ही बहस कर डाली. उसे रोकने में ही पाकिस्तानी मध्यस्थों का समय लग गया.

मुनीर-शहबाज़ की तारीफ

जो ध्यान देने वाली बात है, वह यह कि ट्रंप पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की बार-बार तारीफ़ कर रहे हैं. उनकी इस तारीफ़ में भी प्रधानमंत्री के मुकाबले आसिम मुनीर की तारीफ़ का पुट ज्यादा है.

ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए हमें पाकिस्तान के वर्तमान नेतृत्व की संरचना को समझना होगा. आप इतना समझ लें कि ट्रंप की नज़रों में आसिम मुनीर काम के आदमी हैं. वे ट्रंप के फ़ेवरेट हैं. वे पहले भी कह चुके हैं कि मुनीर ईरान को 'ज़्यादातर लोगों से बेहतर' जानते हैं.

इस बात से मुनीर और शरीफ़ साहब और पाकिस्तानी विदेश-नीति के कर्णधार खुश ज़रूर हो सकते हैं, पर पाकिस्तान की राज्य-शक्ति का वज़न नहीं बढ़ेगा. बेशक उसकी डिप्लोमेसी की विज़िबिलिटी बढ़ी है, वज़न नहीं. वज़न तभी बढ़ेगा, जब उसके अपने पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधरेंगे.

शैलियों का अंतर

इस दौरान भारत और पाकिस्तान की डिप्लोमेसी का अंतर स्पष्ट हुआ है. पाकिस्तानी शैली में मौकापरस्ती और जोखिम उठाने का जज़्बाहै. भारत ने इस विवाद के दूरगामी परिणामों को देखते हुए सतर्कता का परिचय दिया है.

इस लड़ाई और उसके बाद की सामरिक-भौगोलिक स्थिति अभी अनिश्चित है. फिलहाल पाकिस्तान प्रासंगिक लग रहा है, सिर्फ वार्ता-स्थल के कारण. वह दोनों पक्षों में से किसी को प्रभावित नहीं कर सकता. उनसे अनुनय-विनय ही कर सकता है. आने वाले समय के आर्थिक और भू-राजनीतिक हालात में वह कहाँ खड़ा होगा, अभी कहना मुश्किल है.

Sunday, April 12, 2026

बात हुई, पर बनी नहीं

जेडी वेंस की इस्लामाबाद से वापसी

पश्चिम एशिया की लड़ाई, जितने नाटकीय तरीके से शुरू हुई, उतने ही नाटकीय तरीके से उसका युद्धविराम हुआ। चारों तरफ नाटकों की भरमार नज़र आ रही है। नाटकीय तरीके से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने किसी बाहरी स्रोत से प्राप्त
ड्राफ्ट को अपना कहकर एक्स पर जारी किया। उस सूचना की पर्याप्त फज़ीहत होती, उसके पहले ही शनिवार की शाम इस्लामाबाद वार्ताका नाटकीय पटाक्षेप हो गया। अब इस नाटक के दूसरे अंक की प्रतीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि समस्या जस की तस है। देखना यह भी होगा कि पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता जारी रहेगी या इस शतरंज की बिसात पर कोई नया मोहरा रखा जाएगा।

Wednesday, December 31, 2025

पाकिस्तान का ‘हाइब्रिड सिस्टम’ और सेना की ताकत


इस्लामी जम्हूरिया-ए-पाकिस्तान नाम से लगता है कि पाकिस्तानी राजव्यवस्था लोकतांत्रिक है. वहाँ चुनाव भी होने लगे हैं, संसद, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उच्चतम न्यायालय भी है. इसलिए मान लिया जाता है कि वहाँ असैनिक-शासन है.

बावज़ूद इन बातों के देश में पिछले 78 साल से सेना की घोषित-अघोषित भूमिका चली आ रही है, जिसे पनपाने, बढ़ावा देने और मजबूत करने में असैनिक-राजनीति की भी भूमिका है.

पाकिस्तान के नेता गर्व से इसे हाइब्रिड सिस्टम कहते हैं. इस साल वहाँ की संसद ने इस सिस्टम को सांविधानिक-दर्जा भी प्रदान कर दिया गया है.

पाकिस्तानी सेना और अमेरिका की लोकतांत्रिक सरकार के बीच अनोखा रिश्ता है, जो इस साल राष्ट्रपति ट्रंप और आसिम मुनीर के लंच से स्पष्ट हो गया था. कहा जाता है कि दूसरे देशों के पास अपनी सेना होती है, पाकिस्तान की सेना के पास एक देश है.   

सेना की भूमिका

देश में 1973 में बनाए गए संविधान के अनुच्छेद 243 के अनुसार संघीय सरकार का सशस्त्र बलों पर नियंत्रण और कमान होती है. देश के राष्ट्रपति सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर होते हैं. प्रधानमंत्री की सलाह पर सशस्त्र बलों के प्रमुखों (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, आदि) की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं.

2025 के 27वें संशोधन से इसमें महत्वपूर्ण बदलाव आया है. सेना प्रमुख (आर्मी चीफ) को चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) का पद दिया गया है, जिससे वह तीनों सेनाओं (आर्मी, नेवी और एयर फोर्स) पर पूर्ण कमान रखता है.

यह पद थलसेना प्रमुख के साथ जुड़ा हुआ है, और फाइव-स्टार रैंक (जैसे फील्ड मार्शल) वाले अधिकारी को आजीवन विशेषाधिकार और मुकदमे से छूट मिलेगी.

 राष्ट्रपति अब भी सिद्धांततः तीनों सेनाओं के कमांडर हैं, पर जब वे सेवा निवृत्त होंगे, तब उन्हें कानूनी-संरक्षण मिलना बंद हो जाएगा, जबकि वहाँ के फील्ड मार्शल को आजीवन संरक्षण मिलेगा, जो अब तीनों सेनाओं के वास्तविक कमांडर भी हैं.

समझा जा सकता है कि शासन किसका है और किसका नहीं है. हालाँकि अदालतों ने देश में तीन बार हुए फौजी तख्ता पलट के विरुद्ध कोई टिप्पणी नहीं की और सेना के अधिकार बढ़ाने के हर कदम को स्वीकार कर लिया, फिर भी 27वें संशोधन ने वहाँ सुप्रीम कोर्ट के ऊपर एक और अदालत बना दी है. वहाँ नागरिकों पर मुकदमे सैनिक अदालतों में चलते हैं, जिनकी कार्यवाही सार्वजनिक नहीं होती.

Wednesday, November 19, 2025

सेना की जागीर बनता पाकिस्तान


पाकिस्तान की संसद ने अपने थलसेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को असाधारण शक्तियां देने तथा देश के सुप्रीम कोर्ट को दूसरे दर्जे पर रखने के इरादे से तुर्त-फुर्त एक संविधान संशोधन किया है, जो फौरन लागू भी हो गया.

संविधान में 27वाँ संशोधन गुरुवार 13 नवंबर को राष्ट्रपति के दस्तखत होने के बाद कानून बन गया, जिससे देश की व्यवस्था बुनियादी तौर पर बदल गई है. पहले कहा जाता था कि दुनिया में पाकिस्तान की सेना ऐसी है, जो एक देश की मालिक है. अब कहा जा सकता है कि आसिम मुनीर ऐसे सेनाध्यक्ष हैं, जो पाकिस्तान के मालिक हैं.

पाकिस्तानी सेना ने लंबे समय से देश की वास्तविक सत्ता भोगी, कभी तख्तापलट के माध्यम से सत्ता पर कब्जा किया है तो कभी पर्दे के पीछे से प्रभाव डाला है. पर अब जो हुआ है, वह हैरतंगेज़ है.

सेना का नया पद

नेशनल असेंबली ने बुधवार 12 नवंबर को हंगामे से भरे सत्र के दौरान दो-तिहाई बहुमत से विवादास्पद 27वें संविधान संशोधन विधेयक को पास कर दिया. इस संशोधन का उद्देश्य रक्षा बलों के प्रमुख का एक नया पद सृजित करना और एक संवैधानिक न्यायालय की स्थापना करना है.

अब वहाँ के सेनाध्यक्ष देश के सबसे ताकतवर व्यक्ति बन गए हैं. एक और संशोधन के कारण सुप्रीम कोर्ट अब संविधान से जुड़े मुकदमों की सुनवाई नहीं कर सकेगा. उसकी जगह एक नए संघीय संवैधानिक न्यायालय का गठन शुरू हो गया है.  

Wednesday, June 4, 2025

भारत-पाक रिश्तों में अमेरिका के बदलते स्वर


ट्रंप-फैक्टरके अचानक शामिल हो जाने से भारत-पाकिस्तान और भारत-अमेरिका रिश्तों में उलझाव नज़र आने लगे हैं. कारोबारी कारणों और खासतौर से डॉनल्ड ट्रंप के तौर-तरीकों की वज़ह से ये गुत्थियाँ उलझ रही हैं.

डॉनल्ड ट्रंप ने हाल में भारत और पाकिस्तान को एकसाथ जोड़कर देखना शुरू कर दिया है, जबकि एक दशक पहले अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान को एकसाथ रखने की नीति को त्याग दिया था. क्या अमेरिका की नीतियों में बदलाव आ रहा है?

ट्रंप के बारे में माना जाता है कि वे शेखी बघारने में माहिर हैं, ज़रूरी नहीं कि उनकी नीतियों में बड़ा बदलाव हो. अलबत्ता भारतीय नीति-नियंताओं को सावधानी से देखना होगा कि भारत-पाकिस्तान को डिहाइफनेट करने की अमेरिकी-नीति जारी है या उसमें बदलाव आया है.

बदले स्वर

ट्रंप के बदले स्वरों की तबतक अनदेखी की जा सकती है, जबतक हमें लगे कि यह केवल बयानबाज़ी तक सीमित है. इसलिए हमें भारत-अमेरिका व्यापार-वार्ता के नतीज़ों का इंतज़ार करना चाहिए, जो इस महीने के तीसरे-चौथे हफ्ते में दिखाई पड़ेंगे.  

संभव है कि पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी-नीति में बदलाव हो रहा हो. उसके लिए भी हमें तैयार रहना होगा. शायद निजी स्वार्थों के कारण ट्रंप, पाकिस्तान के साथ रिश्ते बना रहे हों, जैसाकि बिटकॉइन कारोबार को लेकर कहा जा रहा है, जिसमें उनका परिवार सीधे जुड़ा है.

अफगानिस्तान-पाकिस्तान में संभावित खनिज भंडार के दोहन का प्रलोभन भी ट्रंप को पाकिस्तान की ओर खींच भी सकता है. इन सभी बातों के निहितार्थ का हमें इंतज़ार करना होगा, पर उसके पहले हमें ट्रंप की टैरिफ-योजना पर नज़र डालनी चाहिए, जो उनके राजनीतिक-भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण है.

Wednesday, April 16, 2025

तहव्वुर राणा नहीं, ‘मास्टरमाइंड’ है पाकिस्तानी सेना


तहव्वुर राणा के प्रत्यर्पण के बाद भारत में उसपर मुकदमा चलाने की तैयारियाँ शुरू हो गई हैं, पर अब जो काम है, वह उसे सज़ा दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि मुंबई हमले कि साज़िश के पीछे पाकिस्तानी-भूमिका का पर्दाफाश करना है. 

सज़ा से ज्यादा महत्वपूर्ण वे तथ्य हैं, जिनसे पता लगेगा कि मुंबई में निर्दोष लोगों की हत्या क्यों की गई. हमारा मीडिया तहव्वुर राणा को उस हमले का ‘मास्टरमाइंड’ बता रहा है, पर गौर से देखेंगे, तो पता लगेगा कि उसकी भूमिका ‘प्यादे’ की थी. 

असली ‘मास्टरमाइंड’ पाकिस्तानी सेना है, जिसकी छत्रछाया में वह हमला हुआ. सवाल यह है कि क्या भारत में मुकदमे के दौरान पाकिस्तान और 26/11 की साज़िश के बीच सीधा संबंध स्थापित किया जा सकेगा? अजमल कसाब और जबीउद्दीन अंसारी उर्फ अबू जुंदाल के बाद यह भारत में इस प्रकरण का यह तीसरा व्यक्तिगत मुकदमा है. 

डेविड कोलमैन हेडली (दाऊद गिलानी) और तहव्वुर हुसैन राणा को अमेरिकी संघीय जाँच ब्यूरो (एफबीआई) द्वारा गिरफ्तार किए जाने और भारत में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) द्वारा उनके खिलाफ एफआईआर और आरोप-पत्र दायर करने के सोलह साल बाद, राणा को प्रत्यर्पित किया गया है. 

Thursday, March 28, 2024

जोखिमों से घिरी पाकिस्तान की नई सरकार


पाकिस्तान में नई सरकार बन जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान, ईरान की सीमा और बलोचिस्तान से चिंताजनक खबरें आई हैं. देश की स्थिरता के जुड़े कम से कम तीन मसलों ने ध्यान खींचा है. ये हैं अर्थव्यवस्था, विदेश-नीति और आंतरिक तथा वाह्य सुरक्षा. गत 26 मार्च को खैबर-पख्तूनख्वा में एक काफिले पर हुए हमले में पाँच चीनी इंजीनियरों की मौत ने भी पाकिस्तान को हिला दिया है.

इन सब बातों के अलावा सरकार पर आंतरिक राजनीति का दबाव भी है, जिससे वह बाहर निकल नहीं पाई है. शायद इसी वजह से पिछले हफ्ते 23 मार्च को पाकिस्तान दिवस समारोह में वैसा उत्साह नहीं था, जैसा पहले हुआ करता था. चुनाव के बाद राजनीतिक स्थिरता वापस आती दिखाई पड़ रही है, पर निराशा बदस्तूर है. इसकी बड़ी वजह है आर्थिक संकट, जिसने आम आदमी की जिंदगी में परेशानियों के पहाड़ खड़े कर दिए हैं.

कई तरह के संकटों से घिरी पाकिस्तान सरकार की अगले कुछ महीनों में ही परीक्षा हो जाएगी. इनमें एक परीक्षा भारत के साथ रिश्तों की है. हाल में देश के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने सभी राजनीतिक दलों से मौजूद समस्याओं से निपटने के लिए मतभेदों को दरकिनार करने का आग्रह किया है.

अब वहाँ के विदेशमंत्री मोहम्मद इसहाक डार ने कहा है कि हम भारत से व्यापार को बहाल करने पर ‘गंभीरता’ से विचार कर रहे हैं. यह महत्वपूर्ण इशारा है. ब्रसेल्स में परमाणु ऊर्जा शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद डार ने लंदन में शनिवार को एक संवाददाता सम्मेलन में बात कही. उन्होंने कहा, पाकिस्तानी कारोबारी चाहते हैं कि भारत के साथ व्यापार फिर से शुरू हो. हम इसपर विचार कर रहे हैं.

Wednesday, February 7, 2024

इमरान को सज़ा और पाकिस्तान के खानापूरी चुनाव


मंगलवार 30 जनवरी को पाकिस्तान की एक विशेष अदालत ने साइफर मामले में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान और पूर्व विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी को दस साल जेल की सजा सुनाई. उसके अगले ही दिन एक और अदालत ने उन्हें और उनकी पत्नी बुशरा बीबी को तोशाखाना मामले में 14 साल कैद की सजा सुना दी.

इतना ही काफी नहीं था. शनिवार को एक अदालत ने इमरान और बुशरा बीबी की शादी को गैर इस्लामिक करार दिया. इमरान खान इसके पहले आरोप लगा चुके हैं देश की सेना ने मेरे पास संदेश भेजा था कि तीन साल के लिए राजनीति छोड़ दूँ, तो शादी बच जाएगी. इमरान और बुशरा बीबी को इस मामले में सात साल सजा सुनाई गई है.

इंतक़ाम की आग

इन सज़ाओं के पीछे प्रतिशोध की गंध आती है. साबित यह भी हो रहा है कि पाकिस्तान क एस्टेब्लिशमेंट (यानी सेना) बहुत ताकतवर है. सारी व्यवस्थाएं उसके अधीन हैं. इन बातों के राजनीतिक निहितार्थ अब इसी महीने की 8 तारीख को हो रहे चुनाव में भी देखने को मिलेंगे.

स्वतंत्रता के बाद से पाकिस्तान में जो चंद चुनाव हुए हैं, उनकी साख कभी नहीं रही, पर इसबार के चुनाव अबतक के सबसे दाग़दार चुनाव माने जा रहे हैं. बहरहाल अब सवाल दो हैं. इसबार बनी सरकार क्या पाँच साल चलेगी? क्या वह सेना के दबाव और हस्तक्षेप से मुक्त होगी?

Wednesday, October 25, 2023

नवाज़ शरीफ़ की वापसी से पैदा हुईं सियासी-लहरें

मंगलवार 24 अक्तूबर को इस्लामाबाद हाईकोर्ट में पेशी के लिए जाते नवाज़ शरीफ़

पाकिस्‍तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की स्वदेश-वापसी, स्वागत और उनके बयानों से लगता है कि कानूनी दाँव-पेच में फँसे होने के बावजूद देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के इरादे से वे वापस आए हैं और उससे जुड़े हर तरह के जोखिमों का सामना करने के लिए वे तैयार हैं. उन्होंने वापस लौटकर कम से कम उन लोगों को ग़लत साबित किया है, जो कहते थे कि वे लौटकर नहीं आएंगे, राजनीतिक दृष्टि से वे हाशिए पर जा चुके हैं और अप्रासंगिक हो चुके हैं.

अदालतों ने उन्हें अपराधी और भगोड़ा घोषित कर रखा है. अब पहिया उल्टा घूमेगा या नहीं, इसका इंतज़ार करना होगा. उनकी वापसी के तीसरे दिन ही लग रहा है कि कानूनी बाधाएं ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी हैं. बहुत कुछ उनके और सेना के रिश्तों पर और अदालतों के रुख पर भी निर्भर करेगा. अतीत में वे कई बार कह चुके हैं कि उन्हें बेदखल करने में सेना का हाथ था.

अलबत्ता उनके साथ मुर्तज़ा भुट्टो जैसा व्यवहार नहीं हुआ, जो बेनजीर के प्रधानमंत्रित्व में 3 नवंबर, 1993 में कराची हवाई अड्डे पर उतरे थे और सीधे जेल भेजे गए थे. इसके बाद बेनज़ीर की सरकार बर्खास्त कर दी गई थी और तीन साल बाद मुर्तज़ा भुट्टो मुठभेड़ में मारे गए थे.

नए सपने

नवाज़ शरीफ़ का पहला भाषण आने वाले वक्त में उनकी राजनीति का प्रस्थान बिंदु साबित होगा. वे पाकिस्तान को नए सपने देना चाहते हैं, पर कहना मुश्किल है कि वे कितने सफल होंगे. भारत की दृष्टि से संबंधों को सुधारने की बात कहकर भी उन्होंने अपने महत्व को रेखांकित किया है.

Wednesday, August 23, 2023

पाकिस्तान में राजनीतिक-संशय और बढ़ता कट्टरपंथ


पाकिस्तानी राजनीति चुनाव की ओर बढ़ चली है. चुनाव-संचालन के लिए नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति हो गई है और तैयारियाँ चल रही हैं. अब सवाल है कि क्या वहाँ स्थिर असैनिक-सरकार और लोकतंत्र सफलता के साथ चलेगा?  कार्यवाहक सरकार बनते ही जो सबसे पहली घटना हुई है, उससे अंदेशा कम होने के बजाय बढ़ा है.

गत 9 अगस्त को भंग होने के पहले संसद ने कई कानूनों, उनमें संशोधनों और निर्णयों को पास किया था. इनमें आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम और आर्मी एक्ट (संशोधन) भी था. ये दोनों कानून लागू हो चुके हैं और अब अचानक राष्ट्रपति डॉ आरिफ़ अल्वी ने कहा है कि मैंने इन दोनों पर दस्तख़त ही नहीं किए हैं.

कानून बने

दूसरी तरफ कार्यवाहक क़ानून मंत्री ने कहा है कि ये दोनों बिल अब क़ानून की शक्ल ले चुके हैं और इनको नोटिफाई भी कर दिया गया है. इतनी बड़ी विसंगति कैसे संभव है?  सोशल मीडिया जारी बयान में आरिफ़ अल्वी ने कहा है, मैं अल्लाह को गवाह मानकर कहता हूं कि मैंने दोनों पर दस्तख़त नहीं किए. मैं इन क़ानूनों से सहमत नहीं था.

हैरत इस बात की है कि देश के राष्ट्रपति को नहीं पता कि इन कानूनों को नोटिफाई कर दिया गया है. और अब वे ट्विटर के माध्यम से बता रहे हैं कि मैंने दस्तखत नहीं किए हैं. ऐसा लगता है कि कोई शक्ति पूरी व्यवस्था को अपारदर्शी बनाकर रखना चाहती है. अखबार डॉन ने अपने संपादकीय में लिखा है कि डॉन ने अपने संपादकीय में लिखा है कि जब भी हमने राष्ट्रपति कार्यालय से पता करने का प्रयास किया, किसी ने स्पष्ट नहीं किया कि कितने विधेयकों पर दस्तखत कर दिए गए हैं.  

Thursday, August 10, 2023

एक नज़र करवट बदलते पाकिस्तान पर

पाकिस्तान से आई चार खबरों ने इस हफ्ते ध्यान खींचा है. पहली है पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को तोशाखाना मामले में मिली तीन तीन साल की कैद की सज़ा, गिरफ्तारी पाँच साल तक चुनाव लड़ने पर रोक. प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ की घोषणा कि नेशनल असेंबली 9 अगस्त को भंग कर दी जाएगी. इन दो खबरों से पहले शहबाज़ शरीफ का भारत से बातचीत की पहल से जुड़ा एक और बयान, तीसरी खबर है.

चौथी खबर राजनीति के बजाय, खेल के मैदान से है. पाकिस्तान सरकार ने इस साल भारत में अक्तूबर-नवंबर में हो रही एकदिनी क्रिकेट की विश्वकप प्रतियोगिता में अपनी टीम को भेजने की अनुमति दे दी है. इन दिनों चेन्नई में हो रही हॉकी की एशिया चैंपियन ट्रॉफी प्रतियोगिता में भी पाकिस्तान की टीम खेल रही है. खेल की खबरें भी बदलाव का संदेश दे रही हैं. सरकार ने जाते-जाते क्रिकेट का फैसला कुछ सोचकर किया है.    

नेशनल असेंबली को अपने समय से तीन दिन पहले भंग करने का मतलब है कि अब चुनाव 9 नवंबर तक कराने होंगे. संसद अपना कार्यकाल पूरा करती, तो नियमानुसार 12 अक्तूबर तक कराने होते. सरकार चुनाव कराने के लिए थोड़ा ज्यादा समय चाहती है.

इमरान गिरफ्तार

सनसनी के लिहाज से ज्यादा बड़ी खबर है इमरान खान को दी गई तीन साल की सज़ा. लगता यह है कि उनकी गति नवाज़ शरीफ जैसी होने वाली है. उन्हें चुनाव की राजनीति से बाहर किया जा रहा है. वे सेना की मदद से बढ़े थे और सेना ही उन्हें निपटा रही है. अलबत्ता उनकी पार्टी तहरीके इंसाफ पाकिस्तान की लोकप्रियता में कमी दिखाई पड़ती नहीं है.

Wednesday, July 26, 2023

आम चुनाव की तरफ कदम बढ़ाता पाकिस्तान


पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत तीनों देश, अब आम-चुनावों की ओर बढ़ रहे हैं. इनमें सबसे पहले होगा पाकिस्तान, जो करीब पंद्रह महीने की राजनीतिक गहमा-गहमी के बाद चुनावी रंग में रंगने वाला है. शहबाज़ शरीफ के नेतृत्व में काम कर रही वर्तमान सरकार अब किसी भी वक्त  नेशनल असेंबली को भंग करने की घोषणा करने वाली है. वे कह चुके हैं कि सरकार नेशनल असेंबली का कार्यकाल 12 अगस्त को खत्म होने के पहले हट जाएगी.

इस घोषणा के बावजूद चुनाव के समय को लेकर असमंजस हैं. एक और बड़ा असमंजस इमरान खान और उनकी पार्टी तहरीके इंसाफ को लेकर है. उसे चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने दिया जाएगा या नहीं. चुनाव आयोग का कहना है कि मामला अदालत में है और वहीं से निर्देश आएगा.

इमरान खान के संवाददाता सम्मेलन की खबरों के प्रकाशन पर रोक लगा दी गई है. इमरान खान पर इतने केस चला दिए गए हैं कि वे उनमें उलझ गए हैं, फिर भी उनकी राजनीतिक शक्ति बनी हुई है. उनकी पार्टी के दर्जनों नेता उन्हें छोड़कर चले गए हैं. इसके पीछे सेना का दबाव बताया जाता है.

हालांकि उनकी पार्टी तकरीबन तोड़ दी गई है, फिर भी यह साफ है कि अवाम के बीच वे लोकप्रिय हैं. अपनी बदहाली के लिए इमरान खान खुद भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने अपने आप को खुद-मुख्तार मान लिया था, जबकि वे सेना की कठपुतली मात्र थे.   

Tuesday, July 4, 2023

खालिस्तानी आंदोलन के पीछे है पाकिस्तान

रविवार 2 जुलाई को अमेरिका में सैन फ्रांसिस्को स्थित भारतीय कौंसुलेट में कुछ खालिस्तान समर्थकों ने आग लगाने की कोशिश की। उधर कनाडा में भारतीय राजनयिकों के खिलाफ खालिस्तान-समर्थकों के पोस्टर लगे हैं। ऐसीी घटनाओं को लेकर भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर ने अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूके जैसे मित्र देशों से अनुरोध किया है कि वे खालिस्तानी तत्वों को स्पेस न दें। हाल में ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं। हाल में कुछ खालिस्तानी नेताओं की  रहस्यमय मौत भी हुई है। शायद उनके बीच आपसी झगड़े भी हैं।

बहुत से लोगों को लगता है कि खालिस्तानी आंदोलन भारत के भीतर से निकला है और उसका असर उन देशों में भी है, जहाँ भारतीय रहते हैं। गहराई से देखने पर आप पाएंगे कि यह आंदोलन पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान की देन है और वहाँ से ही इस आंदोलन को प्राणवायु मिल रही है। इस आंदोलन के प्रणेताओं ने अपने खालिस्तान का जो नक्शा बनाया है, उसमें लाहौर और ननकाना साहिब जैसी जगहें शामिल नहीं हैं, जो पाकिस्तान में हैं।

गत 6 मई को पाकिस्तान से खबर आई कि आतंकी संगठन खालिस्तान कमांडो फोर्स के मुखिया परमजीत सिंह पंजवड़ की लाहौर में हत्या कर दी गई। उसे जौहर कस्बे की सनफ्लावर सोसाइटी में घुसकर गोलियां मारी गईं। पंजवड़ 1990 से पाकिस्तान में शरण लेकर बैठा था और उसे पाकिस्तानी सेना ने सुरक्षा भी दे रखी थी। बताते हैं कि सुबह 6 बजे बाइक पर आए दो लोगों ने इस काम को अंजाम दिया और फिर वे फरार हो गए।

यह खबर दो वजह से महत्वपूर्ण है। पंजवाड़ का नाम आतंकवादियों की उस सूची में शामिल है, जिनकी भारत को तलाश है। दाऊद इब्राहीम की तरह वह भी पाकिस्तान में रह रहा था, पर वहाँ की सरकार ने कभी नहीं माना कि वह पाकिस्तान में है। भारत सरकार ने नवंबर, 2011 में 50 ऐसे लोगों की सूची पाकिस्तान को सौंपी थी, जिनकी तलाश है। गृह मंत्रालय ने 2020 में जिन नौ आतंकियों की लिस्ट जारी की थी, उनमें पंजवड़ का नाम आठवें नंबर पर था।

Wednesday, June 7, 2023

इमरान बनाम सेना बनाम पाकिस्तानी लोकतंत्र


पाकिस्तानी राजनीति में इमरान खान का जितनी तेजी से उभार हुआ था, अब उतनी ही तेजी से पराभव होता दिखाई पड़ रहा है. उनकी पार्टी के वफादार सहयोगी एक-एक करके साथ छोड़ रहे हैं. कयास हैं कि उन्हें जेल में डाला जाएगा, देश-निकाला हो सकता है, उनकी पार्टी को बैन किया जा सकता है वगैरह.

पाकिस्तान में कुछ भी हो सकता है. ऊपर जो बातें गिनाई हैं, ऐसा अतीत में कई बार हो चुका है. पहले भी सेना ने ऐसा किया था और इस वक्त इमरान के खिलाफ कार्रवाई भी सेना ही कर रही है. परीक्षा पाकिस्तानी नागरिकों की है. क्या वे यह सब अब भी होने देंगे?

कुल मिलाकर यह लोकतंत्र की पराजय है. इमरान खान ने सेना का सहारा लेकर प्रतिस्पर्धी राजनीतिक दलों को पीटा, अब वे खुद उसी लाठी से मार खा रहे हैं. पर उन्होंने अपनी इस गलती को कभी नहीं माना. 

ब्रिटिश पत्रिका इकोनॉमिस्ट ने लिखा है कि इमरान को पिछले साल अपदस्थ करने के बजाय, लँगड़ाते हुए ही चलने दिया जाता, तो अगले चुनाव में जनता उसे रद्द कर देती. लोकतंत्र में खराब सरकारों को जनता खारिज करती है. इसकी नज़ीर बनती है और आने वाले वक्त की सरकारें डरती हैं.

सेना का हस्तक्षेप

जनरलों ने किसी भी सरकार को पूरे पाँच साल काम करने नहीं दिया. पिछले साल इमरान को हटाने के पीछे भी जनरल ही थे, जिन्होंने एक विफल राजनेता को सफल बनने का मौका दिया. इमरान ने साजिशों की कहानियाँ गढ़ लीं, और उनके समर्थकों की तादाद बढ़ती चली गई.

Wednesday, May 17, 2023

केवल इमरान की देन नहीं है पाकिस्तानी कलह, पूरी व्यवस्था का हाथ है


इमरान खान की गिरफ्तारी, उसके बाद हुई हिंसा, अफरा-तफरी और फिर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इमरान खान की रिहाई होने के बावजूद स्थिति सामान्य नहीं हुई है, बल्कि कलह और ज्यादा खुलकर सामने आ गई है. देश की सेना, राजनीति और न्यायपालिका तीनों आरोपों के घेरे में हैं. सोमवार को सत्तारूढ़ पीडीएम के कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट बाहर धरना दिया और संसद ने अदालत की भूमिका की जाँच के लिए एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव पास किया है.

पाकिस्तान को इस वात्याचक्र से बाहर निकालने के लिए नए सिरे से अपनी शुरुआत करनी होगी. यह शुरुआत कैसे होगी और इसकी पहल कौन करेगा, कहना मुश्किल है. पिछले 76 साल में वहाँ जो कुछ हुआ है, वह इसके लिए जिम्मेदार है. स्वतंत्रता के बाद से वहाँ जो व्यवस्था कायम की गई है, वह सेना, सुरक्षा और युद्ध पर केंद्रित है. अब पहिया उल्टा घुमाना भी आसान नहीं है.

इरादा क्या है?

यह स्थिति न तो एक दिन में बनी है और न कोई एक व्यक्ति इसके लिए जिम्मेदार है. वहाँ के अवाम और राजनीति को विचार करना चाहिए कि पाकिस्तान की विचारधारा क्या है? वे चाहते क्या हैं?

इमरान खान लोकतंत्र और भ्रष्टाचार की बातें कर ज़रूर रहे हैं, पर उनके पास भी इस बीमारी का कोई इलाज़ नहीं है. वे धार्मिक नारों का इस्तेमाल कर रहे हैं. इनके सहारे वे एकबार को सत्ता में वापस आ भी जाएंगे, तो देश को संकट से बार किस तरह निकालेंगे, यह स्पष्ट नहीं है.

इमरान खान ने राजनीति में अपने विरोधियों को चोर-डाकू बताकर प्रवेश किया था. उन्होंने 2016 में पनामा पेपर्स ने देश के राजनेताओं की कारगुजारियों का पर्दाफाश किया. इसके सहारे इमरान ने सेना की मदद से नवाज़ शरीफ को जेल का रास्ता दिखाने में कामयाबी हासिल की, पर आज वे वैसे ही आरोपों के कठघरे में हैं. उन्हें लेकर दस्तावेजी सबूत भी हैं. सिर्फ आंदोलन और हंगामे की मदद से वे कैसे बचेंगे?

Thursday, May 11, 2023

इमरान खान को सेना से पंगा लेने की सजा मिलेगी


पाकिस्तान में जिस तरह की अफरा-तफरी में इमरान खान की गिरफ्तारी हुई है और उसके बाद जैसी अराजकता देश में देखने को मिल रही है, उससे दो-तीन बातें स्पष्ट हो रही हैं. पहली बात यह कि देश को इस अराजकता से बाहर निकालना काफी मुश्किल होगा.

इमरान खान को जिस तरीके से गिरफ्तार करके ले जाया गया, वह भी खराब ऑप्टिक्स था. उसके बाद जो हुआ, वह और भी खराब था. दोनों तरफ से तलवारें खिंच गई हैं, जिसकी पऱिणति सैनिक कार्रवाई के रूप में होगी. इमरान खान को सेना से पंगा लेने की सजा मिलेगी. वे अब कानूनी शिकंजे में फँसते चले जाएंगे, जिसकी शुरुआत अल-क़ादिर ट्रस्ट और तोशाखाना केस से हो गई है. 

दूसरी तरफ खबरें यह भी हैं कि इमरान को लेकर सेना के भीतर भी मतभेद हैं. जूनियर सैनिक अफसर इमरान के समर्थक हैं. पाकिस्तानी सेना के बारे में आयशा सिद्दीका की टिप्पणियाँ विश्वसनीय होती हैं. उन्होंने लिखा है कि 9 मई को सैनिक छावनी में तोड़फोड़ करने वालों में बहुत से लोग सर्विंग कर्नल और ब्रिगेडियर रैंक के अफसरों के रिश्तेदार थे.

सेना ने 9 मई को देश के इतिहास का काला अध्याय बताया है और कहा है कि हमने बहुत ज्यादा आत्मानुशासन बरता है, पर अब सख्त कार्रवाई करेंगे. दूसरी तरफ प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा है कि उपद्रवियों के साथ अब सख्ती बरती जाएगी. माना जा रहा है कि अब इमरान के समर्थकों पर शिकंजा कसा जाएगा.

अभी तक देखा गया है कि सत्ता-प्रतिष्ठान के एक तबके और अवाम के बीच इमरान खान का कद लगातार बढ़ रहा है. वे विक्टिम कार्ड खेलकर लोकप्रिय होते जा रहे हैं. उन्हें दबाने की कोशिशें उल्टी पड़ रही हैं.

देखना होगा कि सरकार अराजकता पर काबू पाने में कामयाब होती है या नहीं. अराजकता जारी रही, तो उसकी तार्किक परिणति क्या होगी? देश की संसद और न्यायपालिका के बीच भी टकराव है. क्या मार्शल लॉ की वापसी होगी? उससे क्या स्थिति सुधर जाएगी?

इमरान ही रोकें

फिलहाल इस अराजकता को रोकने में भी इमरान खान की भूमिका है. उनकी पार्टी में कोई दो नंबर का नेता नहीं है. आंदोलन का नेतृत्व अब भीड़ के हाथों में है. छिटपुट नेता है, वे आंदोलन को उकसा रहे हैं. इमरान खान ही जनता से हिंसा रोकने की अपील करें, तो कुछ हो सकता है. क्या वे ऐसा करेंगे?

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता महमूद कुरैशी ने देशवासियों से कहा है कि वे सड़कों पर उतर आएं. खैबर-पख्तूनख्वा के कुछ शहरों, कराची और लाहौर सहित दूसरे कुछ शहरों से हिंसा और आगज़नी की खबरें हैं. पूरे देश में मोबाइल इंटरनेट पर रोक लग जाने के बाद संवाद टूट गया है.

पीडीएम सरकार कोशिश कर रही है कि चुनाव फौरन नहीं होने पाएं, पर इन कोशिशों का फायदा इमरान खान को मिलेगा. लगता है कि इमरान की गिरफ्तारी के पीछे सेना का हाथ है, पर इस दौरान सेना की जैसी फज़ीहत हो रही है, वह भी अभूतपूर्व है.

Tuesday, May 9, 2023

इमरान की गिरफ्तारी से पाकिस्तान में अराजकता की लहर आने का खतरा

 


पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद देश में अराजकता की लहर फैलने का अंदेशा पैदा हो गया है। इमरान की तहरीके इंसाफ पार्टी के नेता महमूद कुरैशी ने देशवासियों से कहा है कि वे सड़कों पर उतर आएं। खैबर-पख्तूनख्वा के कुछ शहरों, कराची और लाहौर सहित दूसरे कुछ शहरों से हिंसा और आगज़नी की खबरें हैं।

देशभर में मोबाइल ब्रॉडबैंड सेवा स्थगित कर दी गई है। सरकार का दावा है कि हालात काबू में हैं, पर अगले कुछ दिनों में स्थिति स्पष्ट होगी। ज़ाहिर है कि जब देश आर्थिक संकट से जूझ रहा है, इस प्रकार की अस्थिरता खतरनाक है।

इस्लामाबाद पुलिस के मुताबिक़ साबिक़ वज़ीर-ए-आज़म इमरान ख़ान को नेशनल एकाउंटेबलिटी ब्यूरो (नैब) ने अल-क़ादिर ट्रस्ट केस में गिरफ़्तार किया है। देश में भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों की पकड़-धकड़ के लिए नैब एक स्वायत्त और संवैधानिक संस्था है।

नैब ने भी इस सिलसिले में बयान जारी करते हुए बताया है कि उन्हें नैब ऑर्डिनेंस और क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया गया है। नैब ने कहा है, नैब हैडक्वॉर्टर रावलपिंडी ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को अल क़ादिर ट्रस्ट में कदाचार करने के जुर्म में हिरासत में लिया है।

Wednesday, April 12, 2023

पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान में आपसी टकराव से बढ़ता असमंजस


देस-परदेश

पाकिस्तान में सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सरकार के बीच तलवारें खिंच गई हैं. मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में तीन जजों की बेंच ने पंजाब में चुनाव कराने का आदेश दिया है, जिसे मानने से सरकार ने इनकार कर दिया है. चुनाव दो सूबों में होने हैं, पर सुप्रीम कोर्ट ने केवल पंजाब में 14 मई को चुनाव कराने का निर्देश दिया है. खैबर पख्तूनख्वा के बारे में कोई निर्देश नहीं दिया है.

देश में असमंजस का माहौल है. सोमवार को संसद के दोनों सदनों के विशेष सेशन में सरकार ने चुनाव खर्च से जुड़ा विधेयक पेश कर दिया है. अब संसद के फैसले पर काफी बातें निर्भर करेंगी. संभव है कि संसद पूरे देश में चुनाव एकसाथ कराने का फैसला करे. 

सोमवार को नेशनल असेंबली विदेशमंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा कि पाकिस्तान के इतिहास में निडर जज भी हुए हैं. ऐसे भी जज थे जो ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को मौत की सजा देने के फैसले से असहमत थे. उसके विपरीत ऐसे न्यायाधीश भी, जो तब भी साजिश में शामिल थे और आज भी न्यायपालिका में मौजूद हैं.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतिक्रिया में गुरुवार 6 अप्रेल को राष्ट्रीय असेंबली ने प्रस्ताव पास करके प्रधानमंत्री से कहा है कि इस फैसले को मानने की जरूरत नहीं है. उसके अगले ही दिन नेशनल सिक्योरिटी कमेटी (एनएससी) ने देश की पश्चिमी सीमा पर आतंकवाद के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करने का फैसला करके इस बात का संकेत दे दिया है कि चुनाव नहीं, अब लड़ाई पश्चिमी सरहद पर लड़ाई होगी. सरकार ने 10 अप्रेल को संविधान दिवस मनाया और अब से हर साल यह दिवस मनाने की घोषणा भी की है. 10 अप्रेल 1973 को देश का वर्तमान संविधान लागू हुआ था.   

अवमानना का खतरा

सवाल यह भी है कि हुकूमत यदि सुप्रीमकोर्ट के फ़ैसले को तस्लीम नहीं करेगी, तो क्या उसे तौहीन-ए-अदालत की बिना पर वैसे ही हटाया जा सकता है, जैसे यूसुफ़ रज़ा गिलानी को सादिक़ और अमीन ना होने की वजह से तौहीन-ए-अदालत पर जून 2012 में हटा दिया गया था? पर जजों के बीच आपसी मतभेद हैं. पूरी न्यायपालिका एकसाथ नहीं है.

उधर रविवार 9 अप्रेल को छुट्टी के दिन कैबिनेट की बैठक बुलाई गई, जिसमें वित्त मंत्रालय से कहा गया है कि चुनाव के खर्चों का ब्योरा तैयार करे, ताकि उसे संसद के सामने रखा जा सके. सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि सरकार 10 अप्रेल तक 21 अरब रुपया चुनाव आयोग को दे, ताकि चुनाव कराए जा सकें. सरकार कानूनी स्थितियों का भी गंभीरता से अध्ययन कर रही है. संसद से धनराशि की स्वीकृति नहीं मिलने पर जो वैधानिक स्थिति बनेगी, वह हालात को और जटिल बनाएगी.

Friday, April 7, 2023

पाकिस्तान में सांविधानिक-संकट का खतरा


पाकिस्तान में सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सरकार के बीच तलवारें खिंच गई हैं। मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में तीन जजों को बेंच ने 14 मई को पंजाब में चुनाव कराने का आदेश दिया है, जिसे मानने से सरकार ने इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल पंजाब में चुनाव कराने की तारीख दी है, खैबर पख्तूनख्वा के बारे में कोई निर्देश नहीं दिया है, जबकि वहाँ भी चुनाव होने हैं। गुरुवार 6 अप्रेल को राष्ट्रीय असेंबली ने प्रस्ताव पास करके प्रधानमंत्री से कहा है कि इस फैसले को मानने की जरूरत नहीं है।

चुनाव आयोग ने हुकूमत के एतराज़ के बावजूद चुनाव का कार्यक्रम जारी कर दिया है। उधर सुप्रीम कोर्ट के भीतर न्यायाधीशों की असहमतियाँ भी खुलकर सामने आ रही हैं, जिनसे लगता है कि पाकिस्तान की न्यायपालिका पर राजनीतिक रंग चढ़ता जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान की न्यायपालिका की भूमिका अतीत में बदलती रही है, पर ऐसा पहली बार हो रहा है, जब उसके फैसले को सरकार ने मानने से इनकार कर दिया है।

इसके पहले 4 अप्रेल को मुख्य न्यायाधीश उमर अता बंदियाल की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पीठ ने पंजाब में 14 मई को चुनाव कराने का निर्देश दिया था।  पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) द्वारा दायर याचिका पर फैसले की घोषणा करते हुए, शीर्ष अदालत ने 30 अप्रैल से 8 अक्टूबर तक पंजाब और केपी में चुनाव स्थगित करने के पाकिस्तान के चुनाव आयोग (ईसीपी) के फैसले को अमान्य और शून्य घोषित कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि 22 मार्च, 2023 को ईसीपी के आदेश को असंवैधानिक घोषित किया गया है। पाकिस्तान के उर्दू मीडिया के शब्दों में अदालत ने इलेक्शन कमीशन के आठ अक्तूबर को इंतख़ाबात करवाने के 22 मार्च के हुक्मनामे को 'गैर-आईनी क़रार देते हुए कहा है कि इलेक्शन कमीशन ने अपने दायरा इख़्तियार से तजावुज़ (सीमोल्लंघन) किया। चुनाव आयोग ने पंजाब में 8 अक्‍टूबर को चुनाव कराने का ऐलान किया था। इस दौरान वर्तमान पाकिस्‍तानी राष्‍ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बंदियाल दोनों ही अपनी कुर्सी से हट जाएंगे। ये दोनों ही इमरान खान के समर्थक माने जाते हैं।

संघीय कैबिनेट के सूत्रों ने कहा, सुप्रीम कोर्ट का फैसला अल्पमत का फैसला है, इसलिए कैबिनेट इसे खारिज करती है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन) की वरिष्ठ उपाध्यक्ष और मुख्य आयोजक मरियम नवाज ने ट्विटर पर लिखा कि आज का फैसला उस साजिश का आखिरी झटका है, जो पीठ के चहेते इमरान खान को संविधान को फिर से लिखकर और पंजाब सरकार को थाली में पेश करके शुरू किया गया था। अब देश में मार्शल लॉ का खतरा फिर से मंडराने लगा है।

पाकिस्‍तानी मीडिया का कहना है कि सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर अभी चुनाव कराने के पक्ष में नहीं हैं। ऐसे में अब कई विश्लेषक आशंका जता रहे हैं कि देश में या तो आपातकाल लग सकता है या फिर मार्शल लॉ। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के एक दिन पहले विदेशमंत्री बिलावल भुट्टो ने कहा था कि देश में मार्शल लॉ लग सकती है। सेना जल्‍द चुनाव के लिए तैयार नहीं है, तो चुनाव कराना असंभव होगा। पाकिस्‍तानी अखबार डॉन के अनुसार जनरल मुनीर जल्दी या अलग-अलग चुनाव कराने के पक्ष में नहीं हैं। वे चाहते हैं कि पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा के चुनाव शहबाज़ शरीफ सरकार का कार्यकाल खत्म होने के बाद एक साथ कराए जाएं।

चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बावजूद अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान के सबसे बड़े सूबे में इंतख़ाबात मुकर्रर वक़्त पर हो पाएँगे या नहीं। संघीय सरकार मानती है कि अदालत ने यह फैसला 10 सदस्यों की पूर्ण पीठ के माध्यम से किया होता, तब उसे स्वीकार किया जा सकता था, पर जिस तरीके से मुख्य न्यायाधीश ने इस मसले को स्वतः संज्ञान (अज़खु़द नोटिस) में लिया और बेंच में रद्दोबदल किया, उससे न्यायालय पर से विश्वास उठ गया है। शासन मानता है कि देश में सभी चुनाव एकसाथ होने चाहिए।

वस्तुतः पद से हटाए जाने के बाद से इमरान खान की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। सरकार को डर है कि वे फिर से चुनाव जीतकर आ जाएंगे। अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि इमरान खान चुनाव लड़ पाएंगे या नहीं। उनपर गिरफ्तारी की छाया है। इतना ही नहीं पिछले साल अक्तूबर में चुनाव आयोग ने उन्हें पाँच साल तक के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया था। इमरान ने इस फैसले के खिलाफ अदालत में याचिका दायर की है। इमरान खान पर देश की सेना को बदनाम करने और आर्थिक-संकट पैदा करने वगैरह के आरोप भी हैं।

सरकार की रणनीति है कि यदि सूबों के चुनाव चल जाएं, तो फिर राष्ट्रीय असेंबली के चुनाव टालना आसान हो जाएगा। इस साल जनवरी में पंजाब विधानसभा भंग हो गई थी। संविधान के अनुसार इसके बाद 90 दिन के भीतर चुनाव होने चाहिए, पर देश का चुनाव आयोग मानता था कि किन्हीं कारणों से चुनाव टालने होंगे। इसपर सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यों की बेंच ने 14 मई को चुनाव कराने का आदेश दिया है। इस साल मध्य-अक्तूबर के पहले राष्ट्रीय असेंबली के चुनाव भी होने हैं। पिछले साल अप्रेल में सरकार से बाहर हुए पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान फौरन चुनाव कराने की माँग करते रहे हैं। पंजाब विधानसभा पर भी उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीके इंसाफ (पीटीआई) का बहुमत था। केंद्र पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने पंजाब विधानसभा को समय से पहले भंग करा दिया था। पंजाब के अलावा खैबर पख्तूनख्वा सूबे में भी चुनाव होने हैं।

मंगलवार 4 अप्रेल को जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, संघीय सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि हम इस फैसले को नहीं मानेंगे। यह इमरान खान समर्थक जजों का फैसला है। यह केवल तीन जजों की बेंच थी। छह जज इसमें शामिल होने से इनकार कर चुके थे।