पिछला हफ्ता वैश्विक घटनाक्रम के लिहाज से बहुत महत्त्वपूर्ण था. संयुक्त राष्ट्र महासभा के कारण यों भी यह हफ्ता हर साल महत्त्वपूर्ण होता है, पर अमेरिका-चीन रिश्तों में आ रहे बदलाव और यूक्रेन तथा ईरान-युद्ध से जुड़े घटनाक्रमों ने इसे और ज्यादा महत्त्व प्रदान किया है.
इस पूरे घटनाक्रम
में सबसे महत्त्वपूर्ण है अमेरिका और चीन के रिश्तों में आ रहा बदलाव, जिसके पीछे
भू-राजनीति नहीं है, बल्कि शुद्ध व्यावसायिक कारण हैं.
सवाल है कि
कारोबारी हित-रक्षा और भू-राजनीतिक हितों में टकराव हुआ, तो क्या होगा? अलबत्ता इस घटनाक्रम में भारत के
लिए भी कुछ संकेत हैं, जिनमें से कुछ की ओर विदेशमंत्री एस जयशंकर ने संयुक्त
राष्ट्र महासभा के अपने वक्तव्य में इशारा किया है.
वैश्विक
अस्थिरता
यह सब ऐसे समय में
हो रहा है, जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी अस्थिरता जारी है. पिछले कुछ हफ्तों में
रूस की तेल रिफाइनरियों पर यूक्रेनी हमले हुए हैं, रूस ने नाटो क्षेत्र में घुसपैठ की चेतावनी दी है,
कृत्रिम मेधा (एआई) को लेकर दुनिया
में दहशत और उम्मीदें दोनों एकसाथ पैदा हो रही हैं और पश्चिम एशिया में हमले बढ़े
हैं.
ऐसे में उम्मीद थी
कि संरा महासभा में नेताओं के वक्तव्यों और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की
अमेरिका-यात्रा के दौरान वैश्विक-संकटों के समाधान दिखाई पड़ेंगे. पर दोनों के
परिणाम कम से कम विश्व-व्यवस्था के लिहाज से सार्थक नहीं रहे. अलबत्ता इस बीच रूस
की ओर से यूक्रेन-युद्ध को रोकने की एक पेशकश ज़रूर सामने आई है.
पिछले हफ्ते रूस ने कहा कि यूक्रेन में साढ़े चार साल से चल रहे संघर्ष को समाप्त करने के प्रयासों पर चर्चा करने के लिए अमेरिका, रूस और यूक्रेन के बीच त्रिपक्षीय बैठक जल्द ही हो सकती है.




