Tuesday, October 20, 2026

रूस-अमेरिका और चीन के रिश्तों में बदलाव का भारत पर असर

कार्टून साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट से साभार

वैश्विक-राजनीति का पहिया अचानक उल्टी दिशा में घूमने लगा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक कार्यकारी आदेश पर दस्तखत करके रूसी अर्थव्यवस्था को निशाना बनाने वाले प्रतिबंधों के पैकेज को रोक दिया.

इस फैसले के पहले ट्रंप की रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के साथ हुई वार्ताओं से वैश्विक-संबंधों में आ रहे बदलाव का संकेत मिलने लगा था. अब इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. इसका भारत-अमेरिका रिश्तों पर भी असर पड़ेगा.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार सोमवार को रूस ने को कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग अगले महीने चीन में होने वाले एपेक शिखर सम्मेलन के दौरान एक त्रिपक्षीय बैठक कर सकते हैं.

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने वॉलस्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के बारे में पूछे जाने पर टिप्पणी की, जिसमें कहा गया था कि पुतिन ने यूक्रेन में संघर्ष को समाप्त करने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए ऐसी बैठक का प्रस्ताव रखा था.

ट्रंप की राजनीति

राष्ट्रपति ट्रंप ने जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ लंबी फोन बातचीत के बाद डीजल समझौते की घोषणा की, तो इसे अमेरिका के मध्यावधि चुनावों से पहले पेट्रोलियम की कीमतों को कीमतों में वृद्धि रोकने का एक प्रयास मानकर नज़रंदाज़ किया जा सकता था. पर बात इतनी ही नहीं है.

यह चुनाव परिणाम आने के बाद की राजनीति का संकेत भी है. ट्रंप ने यह फैसला ऐसे समय में किया है, जब यूक्रेन के शहरों पर रूसी हमले तेज़ हो रहे हैं. स्पष्ट है कि ट्रंप को यूरोप और यूक्रेन से दोस्ती की परवाह नहीं है.

रूस से डीज़ल आयात की घोषणा के एक दिन बाद, ट्रंप ने यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की को पद से हटाने की माँग शुरू कर दी. वे सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि युद्ध समाप्त करने में ज़ेलेंस्की मुख्य बाधा हैं, पुतिन ही वास्तव में शांति चाहते हैं.

Sunday, October 18, 2026

सोशल-मीडिया पर विमर्श


सोशल-मीडिया का जन्म किसी स्वस्थ विमर्श को बढ़ावा देने के लिए नहीं हुआ है। वह सामान्य संपर्क और यारी-दोस्ती के संपर्कों के लिए शुरू हुआ था। पर अब यह न केवल विमर्श, बल्कि सूचना-समाचार के माध्यम के रूप में भी तैयार हो गया है। यह विकास कहाँ तक जाएगा, अभी कहना मुश्किल है। पर इसके कथ्यों और तथ्यों पर विचार करना संभव है।

बहरहाल जब मेरे या आपके किसी विचार पर ध्यान देने के बजाय लोग उन्हें व्यक्त करने वालों की राजनीतिक वफादारी का अनुमान लगाने लगें, तब यकीनन खुले विमर्श की संभावनाएँ कम हो जाती हैं। बेशक व्यक्तिगत धारणाएँ किसी भी विमर्श या विश्लेषण को प्रभावित करती हैं, पर बौद्धिक वस्तुनिष्ठता का तकाज़ा होता है कि आप अपने तर्कों और तथ्यों को विवाद की संभावनाओं से जितना दूर रख सकें, उतना बेहतर है।

मतभेद, स्वस्थ समाज का परिचय देते हैं। इसमें आमराय हमेशा संभव नहीं है, पर आमराय भी होती है। यदि बात को सही तरीके से रखा जाए, तो कुछ लोग अपनी धारणाओं को बदलते भी हैं। अपने विचारों पर दृढ़ रहना या तो अत्यधिक समझे-सुलझे व्यक्ति के लिए संभव है या अल्पज्ञानी के लिए। परिधि पर खड़े लोगों के मन में संशय होते हैं। वे एकदम से किसी एक पक्ष के साथ नहीं जाते। अपेक्षाकृत अपनी वैचारिक दृढ़ता को परखने के लिए प्रतिस्पर्धी विचार को समझने की कोशिश भी होनी चाहिए।

सोशल मीडिया में ट्रोल शब्द का चलन है, जिसमें उपहास या उपेक्षा का भाव है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि जो लोग एक-दूसरे को करीब से कम जानते हैं, या एकदम अपरिचित हैं, तब उनकी प्रतिक्रिया पथरीली होती है। ट्रोलिंग पथरीली प्रतिक्रिया है।

Saturday, October 17, 2026

कॉक्रोच आंदोलनकारी क्या चाहते हैं?


सीजेपी का आंदोलन सफल हुआ या विफल, इसे लेकर कई तरह के विचार और निष्कर्ष हैं। इसका भविष्य क्या है, यह भी इन निष्कर्षों का हिस्सा है। मुझे लगता है कि यह समूह अपनी गतिविधियों को ठीक से तय नहीं कर पाया है। इसके नेता खुद को प्रेशर ग्रुप बता रहे हैं। प्रेशर ग्रुप के कार्यों का दायरा फोकस्ड होता है। बिखरा हुआ नहीं। मसलन ये युवाओं की मनोकामना लेकर आगे आए हैं, तो वह मनोकामना क्या है?

हालाँकि बड़े निष्कर्ष अभी नहीं निकाले जा सकते हैं, पर ढाई महीने की गतिविधियों से कुछ अनुमान लगाए जा सकते हैं। इसे शुरुआती दो मौकों पर अनायास मिली सफलताएँ इनकी उपलब्धियाँ हैं और उनमें ही इनके पराभव के सूत्र छिपे हैं। पहली सफलता थी, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी आते ही सोशल मीडिया में इस समूह के जन्म की घोषणा का भारी स्वागत होना। दूसरी सफलता थी, 20 जुलाई का आंदोलन। सोशल मीडिया की सफलता के पीछे बॉट्स का हाथ हो सकता है, पर 20 जुलाई को समस्या वास्तविक थी और उससे प्रभावित किशोरों और उनके अभिभावकों की हताशा भी नकली नहीं थी।

उस आंदोलन के बाद इस समूह ने कुछ जगहों पर स्कूलों की दुर्दशा को उजागर करना शुरू किया। मेरी समझ से वह काम 20 जुलाई के कार्यक्रम से ज्यादा महत्त्वपूर्ण मुद्दे को लेकर था। इसके करता-धरता यदि इस कार्यक्रम को गैर-राजनीतिक बनाते तो और अच्छा होता। यानी कि वे राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे भाजपा शासित राज्यों के साथ पंजाब और कर्नाटक जैसे गैर-भाजपा शासित राज्यों के स्कूलों की दशा को भी सामने लाते, तो उनकी साख बनती। बहरहाल अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी।

इस आंदोलन के संचालकों की मंशा क्या है, इनका कोई संगठन है भी या नहीं और इनके संसाधन कहा से आ रहे हैं? ऐसे कुछ सवाल जरूर पूछे जाएँगे। यदि पारदर्शिता और ईमानदारी रही, तो देश की जनता इन्हें सिर-आँखों पर बैठा सकती है और जवाब साफ नहीं मिले, तो इन्हें भी इतिहास के कूड़ेदान में भेजा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि भारत में आंदोलन से बदलाव नहीं होता या होगा, पर आंदोलन की साख सबसे महत्त्वपूर्ण है। साख बनाने के लिए इन्हें खुद को सत्ता की राजनीति से अलग रखना होगा। और सत्ता की राजनीति करनी है, तो खुलकर वही करें। सवाल है कि क्या यह आम आदमी पार्टी के समांतर कोई नई पार्टी बनाना चाहते हैं? ऐसा है, तो जल्द से जल्द इस आशय की घोषणा करें।  

 

Tuesday, October 13, 2026

अब हूतियों से क्या दो-दो हाथ करेगा मक्का-पैक्ट?

 


अमेरिका-ईरान युद्ध में ठहराव आने के बाद सऊदी अरब और हूती लड़ाकों के बीच लड़ाई में तेजी आ रही है. इस लड़ाई के निहितार्थ वही नहीं हैं, जो ईरान युद्ध के थे.

ईरान की इसमें परोक्ष भूमिका होने की वजह से कई सवाल उठ रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल मक्का रक्षा-समझौते का है, जिसके हालिया फैसले से बड़ी लड़ाई भड़कने का अंदेशा है.

हालाँकि राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि हम हूतियों के खिलाफ कार्रवाई करने पर विचार करेंगे, पर लगता नहीं कि अगले महीने होने वाले चुनाव पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को देखते हुए वे फिलहाल कोई कार्रवाई करेंगे.

ईरान समर्थित हूती मिलिशिया ने शनिवार को सऊदी राजधानी में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मिसाइलों से हमला किया, जिसमें कम से कम 12 लोग मारे गए और 300 से अधिक लोग घायल हो गए हैं.  

इसके बाद रविवार को एक और हमला होने की सूचना है. एक वरिष्ठ हूती प्रवक्ता ने दावा किया कि हमला हमने किया है.

फरवरी में ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल युद्ध शुरू होने के बाद से किसी खाड़ी अरब देश में हुआ यह सबसे घातक हमला था. जवाब में यमन की राजधानी सना के हवाई अड्डे पर सऊदी हमले की सूचना भी है.

चुनाव आयोग को लेकर चल रहे आंदोलन क्या चुनावों पर असर डालेंगे?


मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में हाल में दिल्ली में इंडी गठबंधन और कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलनों को देखते हुए एक बात साफ हो गई है कि आंदोलनकारियों की योजना अब 2029 के लोकसभा चुनाव तक किसी न किसी रूप में लगातार आंदोलन चलाने की है। यह बड़ा संकल्प है? क्या वे ऐसा कर पाएँगे? महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि ज्ञानेश कुमार रहेंगे या जाएँगे। महत्त्वपूर्ण यह है कि आंदोलनकारी अपनी ताकत को कब तक बनाए रखेंगे और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार किस तरह से उसका सामना करेगी?

फिलहाल इन आंदोलनों के असर को अगले छह महीने में होने वाले पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के संदर्भ में देखना होगा। चुनावों को प्रभावित करने में ये आंदोलन विफल रहे, तो फिर उनका उसके आगे चलना निरर्थक हो जाएगा। सफल हुए तो उनकी रणनीति सफल साबित होगी। इसलिए परीक्षा अगले छह महीनों में ही होनी है। उसके पहले राहुल गांधी के ‘वोट चोरी आंदोलन’ की न्यायिक समीक्षा पर भी नज़र रखनी होगी, जो सुप्रीम कोर्ट में चलेगी। उन्होंने इस मामले को इतना ज्यादा तूल दिया है कि देश में ही नहीं विदेश में भी लोगों की निगाहें इस मामले पर हैं।  

हाल में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने इन प्रदर्शनों को लेकर सत्तारूढ़ पार्टी की प्रतिक्रिया को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर ‘लगभग चार वर्ग किलोमीटर का इलाका’ है, जबकि भारत 32,87,000 वर्ग किलोमीटर का है। जंतर-मंतर की कहानी पूरे भारत की कहानी नहीं है। उनके अनुसार ये विरोध प्रदर्शन विफल रहे और उन्होंने सिविल सोसायटी के प्रदर्शनकारियों और विपक्षी नेताओं को ‘अराजकतावादी’ करार दिया। बहरहाल पात्रा ने इस बयान के माध्यम से कुछ मूलभूत प्रश्नों को उठाया है, देश की राजनीति के बड़े फलक को संबोधित कर रहे हैं।