Monday, March 23, 2026

हरीश राणा के मार्फत ‘इच्छामृत्यु’ से जुड़े सवाल


ग़ाज़ियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर परोक्ष इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) के लिए एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर विभाग में शिफ्ट कर दिया गया है। इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को पूरा होने में कई सप्ताह लग सकते हैं, क्योंकि इसमें कई चरण शामिल हैं। हालाँकि इस प्रक्रिया की व्यावहारिकता से जुड़े कई सवाल अभी हैं, पर अब बहस एक्टिव इच्छामृत्यु यानी दवा देकर या किसी दूसरे तरीके से मृत्यु देने पर भी होगी। सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि संसद इस विषय पर कानून बनाए। 2018 और 2026 के फैसलों के बावजूद संसद ने अभी तक समग्र कानून नहीं बनाया। कोर्ट ने कई बार विधायिका से कानून बनाने की अपील की है

पैलिएटिव केयर में ऐसी चिकित्सा देखभाल होती है, जिसका उद्देश्य गंभीर या असाध्य बीमारी से पीड़ित मरीज को आराम देना और बीमारी को पूरी तरह ठीक करने के बजाय मरीज के दर्द, साँस लेने में तकलीफ, घबराहट, बेचैनी या अन्य शारीरिक-मानसिक परेशानियों को कम करने पर ध्यान दिया जाता है। सक्रिय इच्छामृत्यु मृत्यु का एक नया कारण उत्पन्न करती है; निष्क्रिय इच्छामृत्यु पहले से ही चल रही प्राकृतिक मृत्यु में बाधा को दूर करती है। एक मृत्यु का कारण बनती है; दूसरी मृत्यु को स्वाभाविक रूप से होने देती है। एक्टिव इच्छामृत्यु यानी दवा या किसी दूसरे तरीके से मौत देना पूरी तरह अवैध है।

प्रश्न है कि संविधान के अनुच्छेद 21के तहत ‘जीने के अधिकार’ में ‘गरिमापूर्ण मरने का अधिकार’ शामिल है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अधिकार है, लेकिन सीमित परिस्थितियों में। हरीश राणा केस के फैसले के बाद भी, यह बहस अभी अपूर्ण है। इच्छामृत्यु के विरोध में जो तर्क है, उसके अनुसार जीवन ईश्वर का दिया हुआ है, उसमें मानवीय हस्तक्षेप गलत है। इच्छामृत्यु के अधिकार का दुरुपयोग होने का खतरा भी है। डॉक्टर ‘किलर’ बन जाएँगे। कोमा में पड़े लोगों को व्यर्थ समझ लिया जाएगा। कैथलिक चर्च, कई हिंदू संगठन और इस्लामी विद्वान इसे जीवन के खिलाफ मानते हैं।

Wednesday, March 18, 2026

ईरान-युद्ध और भारत का ‘डिप्लोमैटिक-कैलकुलेशन’


पश्चिम एशिया की लड़ाई अब तीसरे हफ्ते में है. इसके साथ जुड़े भारत के गहरे हित नज़र आने लगे हैं. वहाँ रहने वाले एक करोड़ भारतीयों के अलावा ऊर्जा आवश्यकताओं, पूँजी निवेश और रक्षा-तकनीक से जुड़े मसलों के कारण भी हमारी दिलचस्पी इस इलाके में रही है और रहेगी.

हमारी विदेश-नीति, सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता और नैतिकता के अलावा सकल राष्ट्रीय हितों से निर्धारित होती है. यह गणित यानी कैलकुलेशन है, जो दीर्घकालीन हितों पर आधारित होता है.  

इस गणित का सहारा सभी देश लेते हैं, और इसी गणित का परिणाम है कि जबर्दस्त फायर वर्क्स के बीच से पेट्रोलियम और एलपीजी के कुछ टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य पार करते हुए भारत आने में कामयाब हुए हैं. यही गणित हमें मुखर होने और कई बार खामोश रहने का सुझाव देता है.

हाल में अमेरिकी प्रशासन ने रूसी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को 30 दिन के लिए निलंबित करने का निर्णय ऐसे ही गणित के तहत ही किया है. ट्रंप के इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार को आकार देने में तेल समृद्ध रूस के महत्त्व के प्रति वाशिंगटन की व्यावहारिक समझ व्यक्त होती है.

Wednesday, March 11, 2026

नेपाल में जेन-ज़ी की नई सरकार


 

नेपाल की तीन साल पुरानी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने पिछले सप्ताह हुए संसदीय चुनाव में शानदार जीत हासिल की और अगली सरकार बनाने के लिए तैयार है। हर मायने में, यह चुनाव नेपाल के युवाओं ने जीता है। सितंबर में हुए जनरेशन जेड के विरोध प्रदर्शनों में इन्हीं युवाओं ने हिस्सा लिया था, तत्कालीन सरकार को गिराया था, आरएसपी को अपना पूरा समर्थन दिया था और 35 वर्षीय पूर्व रैपर बलेंद्र शाह को नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता संभालने का मार्ग प्रशस्त किया था ।

पड़ोसी देश बांग्लादेश के युवाओं ने भी अपने देश के हालिया राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, हालांकि पिछले महीने हुए चुनाव में मतदाताओं ने अंततः दो स्थापित पार्टियों में से एक, यानी पुराने नेताओं को ही देश का नेतृत्व करने के लिए चुना।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के लिए, बांग्लादेश का चुनाव चीजों को करने के एक पुराने और परिचित तरीके की ओर इशारा करता है, लेकिन नेपाल के नए नेतृत्व के भू-राजनीतिक निहितार्थों का विश्लेषण करने के लिए उन्हें एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता हो सकती है।

भारत उन देशों में से एक है जिन्हें नेपाल के प्रति इस तरह के नए दृष्टिकोण की आवश्यकता हो सकती है।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को अपने फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट किया कि उनकी आरएसपी नेताओं के साथ "सौहार्दपूर्ण टेलीफोन वार्ता" हुई और उन्होंने "अपनी शुभकामनाएं दीं", साथ ही दोनों पड़ोसी देशों की "आपसी समृद्धि, प्रगति और कल्याण" के लिए नई सरकार के साथ काम करने की भारत की प्रतिबद्धता का उल्लेख किया।

जनरेशन Z के कई प्रदर्शनकारियों और मतदाताओं को 2015 और 2016 की कड़वी यादें जरूर होंगी, जब दक्षिणी मैदानी इलाकों में सीमा नाकाबंदी लागू कर दी गई थी, जिससे भारत से खाद्य पदार्थों, दवाओं और ईंधन का आयात आधे साल तक रुक गया था। कमी का सामना करते हुए, काठमांडू और अन्य शहरों के कई भोजनालय केवल कुछ ही व्यंजन परोस पा रहे थे, जिन्हें स्थानीय लोग व्यंग्यपूर्वक "मोदी मेनू" कहते थे।

उस समय नई दिल्ली ने दावा किया था कि वह नाकाबंदी के पीछे नहीं थी, लेकिन काठमांडू को लगा कि भारत इसमें शामिल था और सरकार ने अंततः उन दबावों को कम करने और आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए चीन की ओर रुख किया।

फिलहाल, नई दिल्ली काठमांडू के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करना चाहती है। मोदी के इस बयान में यह इरादा स्पष्ट रूप से झलकता है: "मुझे विश्वास है कि हमारे संयुक्त प्रयासों से भारत और नेपाल के संबंध आने वाले वर्षों में नई ऊंचाइयों को छुएंगे।"

लेकिन सीमा विवाद जैसे लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे द्विपक्षीय संबंधों पर हमेशा ही नकारात्मक प्रभाव डालते रहेंगे। मोदी सरकार को नेपाल की नई पीढ़ी (जेनरेशन जेड) से निपटना भी सीखना होगा, जो देश की राजनीतिक व्यवस्था को बदलने की क्षमता से सशक्त हुई है । चीन सहित हिमालयी क्षेत्र के देशों को भी भू-राजनीतिक गणनाओं में इन नए बदलावों को ध्यान में रखना होगा।

निकी एशिया से साभार

 

पश्चिम एशिया-युद्ध में वैश्विक-मीडिया की भूमिका


पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई की स्थिति को समझने के लिए ज्यादातर लोग मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भर हैं। इंटरनेट के आगमन के बाद से मीडिया के स्वरूप में भारी बदलाव आया है।

युद्ध की कवरेज आसान नहीं होती। इसके दो कारण हैं। एक तरफ मौत का खतरा और दूसरी तरफ सरकारों की बंदिशें। इस कवरेज में पारदर्शिता नहीं होती। कोई देश पत्रकारों को छूट नहीं देता।

अलबत्ता मीडिया की टेक्नोलॉजी में बदलाव आने से सूचनाओं की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ी है। पर सब सही तथ्य नहीं होते। अफवाहें और प्रचार भी खबरों के लिफाफे में लपेट कर पेश किए जाते हैं। इस समय ऐसा ही हो रहा है।

1991 के खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका की टाइम पत्रिका ने वर्ष के व्यक्ति (मैन ऑफ द इयर) के रूप में मीडिया जगत के दिग्गज टेड टर्नर को नामित किया, जिनके केबल न्यूज नेटवर्क (सीएनएन) ने युद्ध की लाइव कवरेज करके मीडिया-कवरेज के एक नए आयाम का उद्घाटन किया था।

उसके बाद से समाचार की परिभाषा किसी घटना के घटित हुआ था या उसकी विलंबित सूचना से बदलकर, जैसा घटित हो रहा है, हो गई।’ टाइम पत्रिका ने लिखा, घटनाओं की गतिशीलता को प्रभावित करने और 150 देशों के दर्शकों को इतिहास का तात्कालिक गवाह बनाने के लिए, रॉबर्ट एडवर्ड टर्नर को 1991 के लिए टाइम पत्रिका का 'मैन ऑफ द ईयर' चुना गया है।’

समाचार मीडिया के रूप में टेलीविजन के उदय ने पत्रकारों के एक ताकतवर तबके का उदय भी किया। सीएनएन के लैरी किंग का टॉक शो अमेरिकी राजनीति का सबसे महत्त्वपूर्ण शो बन गया और लैरी किंग को किंग ऑफ किंग्स कहा गया।

एम्बैडेड पत्रकारिता

1991 की लड़ाई के बाद 2003 में पत्रकारिता की एक नई विधा का जन्म हुआ, जिसे एम्बैडेड पत्रकारिता (Embedded Journalism) नाम दिया गया। उस दौरान कुछ पत्रकारों ने युद्ध या सशस्त्र संघर्ष के दौरान सीधे मिलिट्री यूनिट के साथ रहते हुए रिपोर्टिंग की।

बेशक उस कवरेज में बहुत सी जानकारियाँ विश्वसनीय होती थीं, पर बहुत से वे बातें, जिन्हें सेना छिपाना चाहती थीं, छिपा ली जाती थीं।

सूचनाओं की रिपोर्टिंग के साथ पत्रकारिता की साख जुड़ी है। आज के सोशल मीडिया-युग में इस साख को बनाए रखने के सवाल भी उभर कर सामने आ रहे हैं। ये सवाल पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई के सिलसिले में भी उठे हैं।

इस बीच मैंने सामग्री की तलाश की तो तीन जानकारियाँ मुझे मिलीं, जिन्हें मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ। इनके पहले इसराइली व्यवस्था के आलोचक माने जाने वाले मीडिया हाउस हारेट्ज़ की एक रिपोर्ट साथ ही टाइम्स ऑफ इसराइल में प्रकाशित एक रिपोर्ट को भी पढ़ें। इस पूरे विवरण में मैंने भारतीय मीडिया को शामिल नहीं किया है। उसके लिए अलग से लिखना होगा। 

Tuesday, March 10, 2026

कब और कैसे खत्म होगा ‘शह और मात’ का खेल?

 


पश्चिम एशिया में पहले से इस बात का इमकान था कि लड़ाई शुरू होने वाली है, पर आज कहना मुश्किल है कि वह कब और कैसे खत्म होगी. चौतरफा बयानबाज़ी से लगता है कि वह आसानी से तो खत्म नहीं होगी.

कुछ भरोसा बैकरूम-विमर्श पर है, जो किसी न किसी स्तर पर चल रहा है. इसमें चीन ने पहल की है. चीनी विदेशमंत्री वांग यी ने अपने 'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' के तहत मध्यस्थता की पेशकश की है.  

'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा अप्रैल 2022 में प्रस्तावित एक सुरक्षा अवधारणा है, जो अविभाज्य सुरक्षा के सिद्धांत पर आधारित है. इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के नेतृत्व वाली व्यवस्था की जवाबी वैश्विक सुरक्षा का ढाँचा तैयार करना है.

गहरी दरारें

इसके पहले भी इस इलाके में 1991 और 2003 में लड़ाई हुई है, पर सही मानों में असली खाड़ी युद्ध इस बार ही हुआ है. फारस की खाड़ी से सटे सभी आठ देश, साथ ही आधा दर्जन से ज़्यादा दूसरे देश भी इसमें शामिल हैं.

लड़ाई रुकी भी, तो इस इलाके की शक्ल और भावनात्मक रिश्ते पहले जैसे नहीं रहेंगे. अब्राहमिक धर्मों और समाज की ऐतिहासिक दरारें और गहरी होंगी.

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने शनिवार को कहा कि हम अब अपने पड़ोसी देशों को तब तक निशाना नहीं बनाएँगे, जब तक कि हमले उनके क्षेत्र से न किए जाएँ. बावज़ूद इसके हमले अभी ज़ारी हैं. शायद पेज़ेश्कियान की बात अपने देश में उतननहीं मानी जाती, जितनी हम समझते हैं.