![]() |
| 1925 का एक अमेरिकी कार्टून, जो आज सच साबित हो रहा है |
हमारी दृष्टि में इन गतिविधियों में भारत की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है. खासतौर
से ऐसे समय में जब भारत-अमेरिका और भारत-चीन संबंध नए सिरे से परिभाषित हो रहे हैं.
संबंधों के अलावा अपनी अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करने के विचार
से भी यह समय महत्त्वपूर्ण है. भारत को तीन महत्त्वपूर्ण समूहों के साथ अपने
रिश्तों को संयोजित करना है.
ये तीन समूह हैं, जी7, जी20 और ब्रिक्स. इनके मार्फत बड़े देशों के बीच ऊर्जा
संसाधनों, टेक्नोलॉजी और वित्तीय
प्रभाव के मद्देनज़र बढ़ती प्रतिस्पर्धा की झलक नज़र आ रही है. देखना होगा कि भारत
को यह स्पर्धा कितना प्रभावित करेगी.
इनमें जी7 और ब्रिक्स दो ध्रुवों पर हैं और जी20 बीच में है, जिसमें अमेरिका
और चीन-रूस दोनों हैं. 12-13 सितंबर को ब्रिक्स के नई दिल्ली शिखर सम्मेलन और इस
साल जी20 की अमेरिकी अध्यक्षता के साथ इन गतिविधियों की आहट सुनाई पड़ने लगी है.
ब्रिक्स की सफलता
हालाँकि पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले जी7 का वित्त और उन्नत प्रौद्योगिकी
में अभी तक दबदबा है, पर जनसंख्या,
पीपीपी-आधारित
आर्थिक शक्ति, विनिर्माण और
बहुध्रुवीय विश्व का झंडा ब्रिक्स बुलंद कर रहा है.
ताज़ा खबर है कि विस्तारित
ब्रिक्स ब्लॉक ने पर्चेज़िंग पावर पैरिटी के आधार पर जी7 को आधिकारिक तौर पर पीछे
छोड़ दिया है. जहाँ पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएँ मात्र 1% की धीमी वार्षिक दर से आगे
बढ़ रही हैं, वहीं ब्रिक्स
ब्लॉक 4% से अधिक की दर से तेजी से आगे बढ़ रहा है, जो वैश्विक जीडीपी के लगभग 40% और विश्व की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता
है.
एक समय तक ब्रिक्स को उभरते बाजारों के लिए अनौपचारिक चर्चा मंच के रूप में देखा गया था, पर अब वह पश्चिमी आर्थिक वर्चस्व के खिलाफ एक दुर्जेय, बहु-महाद्वीपीय प्रति-संतुलनकारी ताकत के रूप में खड़ा हो रहा है.




