अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ समझौता हुआ, तो उसपर दस्तखत करने मैं ख़ुद इस्लामाबाद जा सकता हूँ. उनकी इस बात से युद्ध को लेकर उनके दृष्टिकोण के अलावा पाकिस्तान के प्रति उनका झुकाव भी नज़र आता है.
मंगलवार को इस्लामाबाद में बातचीत का दूसरा दौर
होने जा रहा है, जिसमें कम से कम ट्रंप नहीं आ रहे हैं. इसका मतलब है कि प्रगति तो
हुई है, पर अभी समझौते की स्थिति नहीं है.
ब्रिटिश साप्ताहिक इकोनॉमिस्ट ने लिखा है कि
ईरानी नेतृत्व के भीतर मतभेद उभर कर सामने आ रहे हैं. पिछले 10-11 अप्रेल को हुई
बातचीत में अमेरिकी प्रतिनिधियों से बहस करने के बजाय ईरानी प्रतिनिधियों ने आपस
में ही बहस कर डाली. उसे रोकने में ही पाकिस्तानी मध्यस्थों का समय लग गया.
मुनीर-शहबाज़ की तारीफ
जो ध्यान देने वाली बात है, वह यह कि ट्रंप पाकिस्तान
के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की बार-बार तारीफ़ कर रहे
हैं. उनकी इस तारीफ़ में भी प्रधानमंत्री के मुकाबले आसिम मुनीर की तारीफ़ का पुट
ज्यादा है.
ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए हमें पाकिस्तान
के वर्तमान नेतृत्व की संरचना को समझना होगा. आप इतना समझ लें कि ट्रंप की नज़रों
में आसिम मुनीर ‘काम के आदमी’ हैं. वे ट्रंप के फ़ेवरेट हैं. वे पहले
भी कह चुके हैं कि मुनीर ईरान को 'ज़्यादातर लोगों से बेहतर'
जानते हैं.
इस बात से मुनीर और शरीफ़ साहब और पाकिस्तानी
विदेश-नीति के कर्णधार खुश ज़रूर हो सकते हैं, पर पाकिस्तान की राज्य-शक्ति का
वज़न नहीं बढ़ेगा. बेशक उसकी डिप्लोमेसी की विज़िबिलिटी बढ़ी है, वज़न नहीं. वज़न
तभी बढ़ेगा, जब उसके अपने पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधरेंगे.
शैलियों का
अंतर
इस दौरान भारत और पाकिस्तान की डिप्लोमेसी का
अंतर स्पष्ट हुआ है. पाकिस्तानी शैली में ‘मौकापरस्ती और जोखिम उठाने का जज़्बा’ है. भारत ने इस
विवाद के दूरगामी परिणामों को देखते हुए सतर्कता का परिचय दिया है.
इस लड़ाई और उसके बाद की सामरिक-भौगोलिक स्थिति अभी अनिश्चित है. फिलहाल पाकिस्तान प्रासंगिक लग रहा है, सिर्फ वार्ता-स्थल के कारण. वह दोनों पक्षों में से किसी को प्रभावित नहीं कर सकता. उनसे अनुनय-विनय ही कर सकता है. आने वाले समय के आर्थिक और भू-राजनीतिक हालात में वह कहाँ खड़ा होगा, अभी कहना मुश्किल है.




