Wednesday, April 1, 2026

कहाँ जाकर रुकेगा पाक-अफ़ग़ान टकराव?


पश्चिम एशिया में युद्ध भड़क के बाद हमारा ध्यान यूक्रेन और अफ़ग़ानिस्तान से हट गया, जबकि वहाँ भी लड़ाइयाँ चल रही हैं. ईरान की लड़ाई रुक भी जाएगी, पर लगता है कि यूक्रेन की लड़ाई और पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान टकराव जल्द खत्म नहीं होगा.

पाकिस्तान ने पिछली 25 मार्च को कहा कि उसकी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ अभियान फिर से शुरू कर दिया है. क्या वजह है कि पाकिस्तान ने इस समय बड़ा फौजी अभियान चलाने का फैसला किया है? क्या इसका संबंध भी ईरान-युद्ध से है? क्या इसके पीछे अमेरिका की सहमति या उसकी ही योजना है?

ऐसे कुछ सवाल भी ज़ेहन में आते हैं. जो बाइडेन के कार्यकाल में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान के मामले में भारत को महत्त्व दिया था, पर इस समय ट्रंप प्रशासन का पाकिस्तान पर पूरा भरोसा है. ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी ने कहा है कि तालिबान हमलों के खिलाफ आत्मरक्षा करने का पाकिस्तान को पूरा अधिकार है.

अस्पताल पर हमला

हाल में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में एक नशा मुक्ति केंद्र पर पाकिस्तानी हवाई हमले में 400 से अधिक लोग मारे गए थे. पाकिस्तान का कहना है कि हमने ये हमले ‘फौजी ठिकानों और आतंकवादी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाते हुए’ किए थे.

बहरहाल ईद के मौके पर तुर्की, कतर और सऊदी अरब के अनुरोध पर युद्ध-विराम की घोषणा की गई थी. इसके बाद इस्लामाबाद में विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक ब्रीफिंग में प्रवक्ता ताहिर अंदराबी ने कहा, यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो जाते.

Thursday, March 26, 2026

युद्ध के दुष्प्रभावों से निपटने को तैयार भारत


जिन लोगों को आज से तीन दशक पहले की बातें याद हैं, उन्हें गैस एजेंसियों, सरकारी राशन और चीनी की दुकानों के आगे लगी कतारें भी याद होंगी. पश्चिम एशिया के युद्ध के साथ कुछ यादें ताज़ा हो गई हैं.

उसके पहले चीन युद्ध के बाद देश में खाद्य संकट पैदा हुआ था और हमें काफी समय तक अमेरिकी गेहूँ खाना पड़ा था. शायद वह काफी पुरानी बात हो गई, पर कोविड महामारी तो हाल की बात है, जब शहर-शहर गाँव-गाँव लॉकडाउन के कारण रोज़ी-रोज़गार पर तो संकट आया, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता भी चुनौती बन गई.

पश्चिम एशिया की लड़ाई ने हमें एकबार फिर से चौंकाया है. आपदाएँ किसी भी वक्त आ सकती हैं, पर भारत की विशेषता है कि वह संकटों का सामना आसानी से कर लेता है. आपको समझना ही है, तो इस समय अपने पड़ोसी देशों की स्थिति पर एक बार नज़र ज़रूर डालें.

कहना मुश्किल है कि लड़ाई जल्द खत्म होगी या देर से होगी. इसलिए मानकर चलिए कि समस्याएँ नए रूप में भी आ सकती है. ऐसे में आपके धैर्य, अनुशासन और एकजुटता की सबसे बड़ी ज़रूरत है. भाईचारा बनाकर रखें. बेशक संकट आया है, तो दूर भी होगा.

प्रधानमंत्री का बयान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई को लेकर संसद के दोनों सदनों में भारत के सामने खड़ी 'अप्रत्याशित चुनौतियों' का ज़िक्र करते हुए कहा है कि हम उनका सामना करने में समर्थ हैं. सच यह है कि देश अतीत में ऐसे संकटों का सफलतापूर्वक सामना कर चुका है.

अलबत्ता प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि इस टकराव का असर लंबे समय तक बने रहने की आशंका है. ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि महामारी और युद्ध का आगमन आगे-पीछे हुआ है. कोविड के दौरान भी सप्लाई चेन में संकट पैदा हुआ था और देश ने एकजुटता से उसका मुकाबला किया.

भारत में बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, गैस और उर्वरक जैसी अनेक ज़रूरी चीजें होर्मुज़ जलसंधि मार्ग से आती हैं. युद्ध के बाद से ही वहाँ से जहाज़ों का आना-जाना बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है. बावजूद इसके, हमारी सरकार का प्रयास रहा है कि पेट्रोल-डीज़ल और गैस की सप्लाई बहुत ज़्यादा प्रभावित न हो.

Wednesday, March 25, 2026

ट्रंप को अब युद्ध से निकलने के रास्ते की तलाश


ईरान-युद्ध शुरू होने के पहले से ही कहा जा रहा था कि लड़ाई शुरू हो गई, तो उसे खत्म करना मुश्किल हो जाएगा. यह बात अब सच साबित हो रही है. अब ट्रंप अपनी योजनाओं को लेकर किंतु-परंतु करने लगे हैं. पहले धमकी दी कि ईरानी ऊर्जा केंद्रों पर हमले करेंगे और फिर कहा कि 120 घंटे तक ऐसा नहीं करेंगे.

उनका यह भी कहना है कि ईरान से बात चल रही है. पाकिस्तान के हाथों 15 सूत्री प्रस्ताव भेजा है.  उधर ईरान के नेता कह रहे हैं कि हमारी कोई बात नहीं हो रही है.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि जब से राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान-युद्ध में ‘प्रवेश’ किया है, तब से वे इस सवाल से रूबरू हैं कि इसे समाप्त कब करेंगे? सच यह है कि युद्ध के उनके कई घोषित लक्ष्य अब भी अधूरे हैं.

ट्रंप ने ईरान-युद्ध के लिए ‘भ्रमण’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया है, ताकि लगे कि कोई बड़ी परेशानी की बात नहीं है, लेकिन व्यावहारिक रूप से लगता है कि वे फँस गए हैं.

अब वे परेशान हैं. पिछले शुक्रवार शाम को जब ट्रंप फ्लोरिडा के लिए रवाना हुए, तो ऐसा लग रहा था कि वे शायद लड़ाई को कोई मोड़ देकर एक्ज़िट यानी हाथ खींचने की घोषणा करेंगे.

बहरहाल अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है. दूसरी तरफ उनकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था की परेशानियाँ बढ़ती जा रही हैं. पेट्रोल की औसत कीमतें आसमान छूने की तैयारी कर रही है. फारस की खाड़ी में बुनियादी ढाँचा खंडहर में तब्दील हो चुका है, वहीं ईरान की कमजोर धार्मिक सत्ता की पकड़ मजबूत होती जा रही है.

Monday, March 23, 2026

हरीश राणा के मार्फत ‘इच्छामृत्यु’ से जुड़े सवाल


ग़ाज़ियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर परोक्ष इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) के लिए एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर विभाग में शिफ्ट कर दिया गया है। इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को पूरा होने में कई सप्ताह लग सकते हैं, क्योंकि इसमें कई चरण शामिल हैं। हालाँकि इस प्रक्रिया की व्यावहारिकता से जुड़े कई सवाल अभी हैं, पर अब बहस एक्टिव इच्छामृत्यु यानी दवा देकर या किसी दूसरे तरीके से मृत्यु देने पर भी होगी। सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि संसद इस विषय पर कानून बनाए। 2018 और 2026 के फैसलों के बावजूद संसद ने अभी तक समग्र कानून नहीं बनाया। कोर्ट ने कई बार विधायिका से कानून बनाने की अपील की है

पैलिएटिव केयर में ऐसी चिकित्सा देखभाल होती है, जिसका उद्देश्य गंभीर या असाध्य बीमारी से पीड़ित मरीज को आराम देना और बीमारी को पूरी तरह ठीक करने के बजाय मरीज के दर्द, साँस लेने में तकलीफ, घबराहट, बेचैनी या अन्य शारीरिक-मानसिक परेशानियों को कम करने पर ध्यान दिया जाता है। सक्रिय इच्छामृत्यु मृत्यु का एक नया कारण उत्पन्न करती है; निष्क्रिय इच्छामृत्यु पहले से ही चल रही प्राकृतिक मृत्यु में बाधा को दूर करती है। एक मृत्यु का कारण बनती है; दूसरी मृत्यु को स्वाभाविक रूप से होने देती है। एक्टिव इच्छामृत्यु यानी दवा या किसी दूसरे तरीके से मौत देना पूरी तरह अवैध है।

प्रश्न है कि संविधान के अनुच्छेद 21के तहत ‘जीने के अधिकार’ में ‘गरिमापूर्ण मरने का अधिकार’ शामिल है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अधिकार है, लेकिन सीमित परिस्थितियों में। हरीश राणा केस के फैसले के बाद भी, यह बहस अभी अपूर्ण है। इच्छामृत्यु के विरोध में जो तर्क है, उसके अनुसार जीवन ईश्वर का दिया हुआ है, उसमें मानवीय हस्तक्षेप गलत है। इच्छामृत्यु के अधिकार का दुरुपयोग होने का खतरा भी है। डॉक्टर ‘किलर’ बन जाएँगे। कोमा में पड़े लोगों को व्यर्थ समझ लिया जाएगा। कैथलिक चर्च, कई हिंदू संगठन और इस्लामी विद्वान इसे जीवन के खिलाफ मानते हैं।

Wednesday, March 18, 2026

ईरान-युद्ध और भारत का ‘डिप्लोमैटिक-कैलकुलेशन’


पश्चिम एशिया की लड़ाई अब तीसरे हफ्ते में है. इसके साथ जुड़े भारत के गहरे हित नज़र आने लगे हैं. वहाँ रहने वाले एक करोड़ भारतीयों के अलावा ऊर्जा आवश्यकताओं, पूँजी निवेश और रक्षा-तकनीक से जुड़े मसलों के कारण भी हमारी दिलचस्पी इस इलाके में रही है और रहेगी.

हमारी विदेश-नीति, सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता और नैतिकता के अलावा सकल राष्ट्रीय हितों से निर्धारित होती है. यह गणित यानी कैलकुलेशन है, जो दीर्घकालीन हितों पर आधारित होता है.  

इस गणित का सहारा सभी देश लेते हैं, और इसी गणित का परिणाम है कि जबर्दस्त फायर वर्क्स के बीच से पेट्रोलियम और एलपीजी के कुछ टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य पार करते हुए भारत आने में कामयाब हुए हैं. यही गणित हमें मुखर होने और कई बार खामोश रहने का सुझाव देता है.

हाल में अमेरिकी प्रशासन ने रूसी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को 30 दिन के लिए निलंबित करने का निर्णय ऐसे ही गणित के तहत ही किया है. ट्रंप के इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार को आकार देने में तेल समृद्ध रूस के महत्त्व के प्रति वाशिंगटन की व्यावहारिक समझ व्यक्त होती है.