अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ ने 2 अप्रैल को ऐतिहासिक आर्टेमिस 2 मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से सुबह 3:54 बजे (भारतीय समयानुसार) एसएलएस रॉकेट के जरिए चार अंतरिक्ष यात्री 10 दिनों की चंद्रमा यात्रा पर निकले हैं। 54 वर्षों में यह पहली मानवयुक्त चंद्र उड़ान है, जो चंद्रमा चक्कर लगाकर 10 अप्रैल को पृथ्वी पर लौटेगी। उधर चीनी अंतरिक्ष एजेंसी (सीएनएसए) को उम्मीद है कि वह 2030 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतार देगी। चीन पहले ही कई रोबोट चंद्रमा पर भेज चुका है और चंद्र नमूने वापस ला चुका है।
चीन इस साल
अपने नए मेंगझोऊ (ड्रीम शिप) अंतरिक्ष यान की परीक्षण उड़ान आयोजित करने जा रहा
है। पुराने शेनझोउ की जगह लेने वाला यह अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्र
कक्षा में ले जाएगा। संभव है कि चंद्रमा पर अमेरिकी यात्री पहले उतर जाए, पर इस
बात के आसार बन रहे हैं कि स्पेस साइंस में अब अमेरिका के साथ चीन बराबरी के स्तर
पर आने की होड़ में है।
अभी इसे बराबरी
कहना आसान नहीं है, पर एक क्षेत्र ऐसा है, जिसमें वह अमेरिका के बराबर आ गया है या
कुछ आगे निकल गया है। वह है स्पेस नेवीगेशन। चीन के ‘बेइदू’ ने अमेरिकी ‘जीपीएस’ को पीछे कर दिया है। इस बात को अमेरिकी
विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं। चीन को उम्मीद है कि वह 2035 तक चंद्रमा पर समानव
वैज्ञानिक बेस का एक बुनियादी संस्करण तैयार कर लेगा, जिसे इंटरनेशनल ल्यूनर रिसर्च स्टेशन (आईएलआरएस) कहा जाएगा।
यह बेस चंद्रमा
के दक्षिणी ध्रुव के पास बनाया जाएगा, जहाँ बर्फ के रूप
में पानी मौजूद होने की संभावना है। इस परियोजना में रूस भी चीन के साथ है। दूसरी
तरफ ट्रंप प्रशासन ने लगभग 20 अरब डॉलर की लागत से चंद्रमा पर एक बेस बनाने का कार्यक्रम
शुरू किया है।
इसके विपरीत, नासा का आर्टेमिस चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम लगातार पिछड़ रहा है। आर्टेमिस 2 समानव फ्लाई बाय यान है, लैंडिंगक्राफ्ट नहीं। कई बार स्थगित होने के बाद 2 अप्रैल को इसका प्रक्षेपण हो पाया। पहली अमेरिकी मानवयुक्त चंद्र लैंडिंग को आर्टेमिस 4 तक टाल दिया गया है, जो 2028 से पहले संभव नहीं। चीन का कार्यक्रम, जो तीन दशकों से अधिक समय से एक एकीकृत योजना पर आधारित है, काफी हद तक उस राजनीतिक उथल-पुथल से अछूता रहा है, जो अमेरिका में तल रही हैं।




