
बहरहाल, न्यायालय 15 और 16 जुलाई को दलीलें सुनेगा। उसी समय इस आदेश को लागू किया जा रहा होगा। शैक्षिक-प्रश्न के अलावा यह राजनीतिक प्रश्न भी है। अपनी भाषा-नीति के अनुरूप डीएमके ने इस कदम का विरोध किया है, वहीं कांग्रेस ने बिना परामर्श के अधिसूचना जारी होने की आलोचना की है। दक्षिण भारत, खासतौर से तमिलनाडु में कहा जा रहा है कि सीबीएसई का यह आदेश हिंदी थोपने का प्रयास है। यह आदेश सीबीएसई बोर्ड के स्कूलों पर ही लागू होता है, जबकि राज्यों के बोर्डों के नियम अलग-अलग हैं। यदि यह ठीक से लागू हो गया, तो राज्यों में भी किसी न किसी रूप में दिखाई पड़ेगा।
हालाँकि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली के पीठ ने इस मामले में कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया है, पर उन्होंने केंद्र सरकार, सीबीएसई और एनसीईआरटी को नोटिस जारी करके दो सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब माँगा है। अदालत ने अलबत्ता यह कहा है कि बोर्ड का तीसरी भाषा को शामिल करने का निर्णय सिद्धांत रूप में ‘प्रशंसनीय’ हो सकता है, लेकिन इसे वर्तमान शैक्षणिक वर्ष से लागू करने में कुछ व्यावहारिक प्रश्न उठेंगे। शिक्षकों और पुस्तकों की कमी के मद्देनज़र इस नीति को लागू करने की तार्किक और तथ्यात्मक चुनौतियों को लेकर अदालत अधिक चिंतित है।



