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Wednesday, March 11, 2026
नेपाल में जेन-ज़ी की नई सरकार
पश्चिम एशिया-युद्ध में वैश्विक-मीडिया की भूमिका
पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई की स्थिति को समझने के लिए ज्यादातर लोग मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भर हैं। इंटरनेट के आगमन के बाद से मीडिया के स्वरूप में भारी बदलाव आया है।
युद्ध की कवरेज आसान नहीं होती। इसके दो कारण
हैं। एक तरफ मौत का खतरा और दूसरी तरफ सरकारों की बंदिशें। इस कवरेज में
पारदर्शिता नहीं होती। कोई देश पत्रकारों को छूट नहीं देता।
अलबत्ता मीडिया की टेक्नोलॉजी में बदलाव आने से
सूचनाओं की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ी है। पर सब सही तथ्य नहीं होते। अफवाहें और
प्रचार भी खबरों के लिफाफे में लपेट कर पेश किए जाते हैं। इस समय ऐसा ही हो रहा
है।
1991 के खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका की टाइम
पत्रिका ने वर्ष के व्यक्ति (मैन ऑफ द इयर) के रूप में मीडिया जगत के दिग्गज टेड
टर्नर को नामित किया, जिनके केबल न्यूज नेटवर्क (सीएनएन) ने युद्ध की लाइव कवरेज
करके मीडिया-कवरेज के एक नए आयाम का उद्घाटन किया था।
उसके बाद से समाचार की परिभाषा ‘किसी घटना के घटित हुआ था या उसकी विलंबित सूचना से बदलकर, जैसा घटित हो
रहा है, हो गई।’ टाइम पत्रिका ने लिखा, ‘घटनाओं की गतिशीलता
को प्रभावित करने और 150 देशों के दर्शकों को इतिहास का तात्कालिक गवाह बनाने के
लिए, रॉबर्ट एडवर्ड टर्नर को 1991 के लिए टाइम पत्रिका का 'मैन ऑफ द ईयर' चुना गया है।’
समाचार मीडिया के रूप में टेलीविजन के उदय ने
पत्रकारों के एक ताकतवर तबके का उदय भी किया। सीएनएन के लैरी किंग का टॉक शो
अमेरिकी राजनीति का सबसे महत्त्वपूर्ण शो बन गया और लैरी किंग को ‘किंग ऑफ किंग्स’ कहा गया।
एम्बैडेड
पत्रकारिता
1991 की लड़ाई
के बाद 2003 में पत्रकारिता की एक नई विधा का जन्म हुआ, जिसे एम्बैडेड पत्रकारिता
(Embedded Journalism) नाम दिया गया। उस दौरान कुछ पत्रकारों
ने युद्ध या सशस्त्र संघर्ष के दौरान सीधे मिलिट्री यूनिट के साथ रहते हुए रिपोर्टिंग
की।
बेशक उस कवरेज
में बहुत सी जानकारियाँ विश्वसनीय होती थीं, पर बहुत से वे बातें, जिन्हें सेना
छिपाना चाहती थीं, छिपा ली जाती थीं।
सूचनाओं की
रिपोर्टिंग के साथ पत्रकारिता की साख जुड़ी है। आज के सोशल मीडिया-युग में इस साख
को बनाए रखने के सवाल भी उभर कर सामने आ रहे हैं। ये सवाल पश्चिम एशिया में चल रही
लड़ाई के सिलसिले में भी उठे हैं।
इस बीच मैंने सामग्री की तलाश की तो तीन जानकारियाँ मुझे मिलीं, जिन्हें मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ। इनके पहले इसराइली व्यवस्था के आलोचक माने जाने वाले मीडिया हाउस हारेट्ज़ की एक रिपोर्ट साथ ही टाइम्स ऑफ इसराइल में प्रकाशित एक रिपोर्ट को भी पढ़ें। इस पूरे विवरण में मैंने भारतीय मीडिया को शामिल नहीं किया है। उसके लिए अलग से लिखना होगा।
Tuesday, March 10, 2026
कब और कैसे खत्म होगा ‘शह और मात’ का खेल?
पश्चिम एशिया में पहले से इस बात का इमकान था कि लड़ाई शुरू होने वाली है, पर आज कहना मुश्किल है कि वह कब और कैसे खत्म होगी. चौतरफा बयानबाज़ी से लगता है कि वह आसानी से तो खत्म नहीं होगी.
कुछ भरोसा ‘बैकरूम-विमर्श’ पर है, जो किसी न किसी स्तर पर चल रहा है. इसमें चीन ने पहल की है. चीनी
विदेशमंत्री वांग यी ने अपने 'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' के तहत मध्यस्थता की पेशकश की है.
'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा अप्रैल 2022
में प्रस्तावित एक सुरक्षा अवधारणा है, जो ‘अविभाज्य सुरक्षा’ के सिद्धांत पर आधारित है. इसका उद्देश्य
पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के नेतृत्व वाली
व्यवस्था की जवाबी वैश्विक सुरक्षा का ढाँचा तैयार करना है.
गहरी दरारें
इसके पहले भी
इस इलाके में 1991 और 2003 में लड़ाई हुई है, पर सही मानों में असली खाड़ी युद्ध इस बार ही हुआ है. फारस की खाड़ी से सटे सभी आठ देश, साथ ही आधा दर्जन से ज़्यादा दूसरे देश भी इसमें शामिल हैं.
लड़ाई रुकी भी, तो इस इलाके की शक्ल और भावनात्मक
रिश्ते पहले जैसे नहीं रहेंगे. अब्राहमिक धर्मों और समाज की ऐतिहासिक दरारें और
गहरी होंगी.
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने शनिवार को कहा कि हम अब अपने पड़ोसी देशों को तब तक निशाना नहीं बनाएँगे, जब तक कि हमले उनके क्षेत्र से न किए जाएँ. बावज़ूद इसके हमले अभी ज़ारी हैं. शायद पेज़ेश्कियान की बात अपने देश में उतनी नहीं मानी जाती, जितनी हम समझते हैं.
Friday, March 6, 2026
औद्योगिक-आत्मनिर्भरता के प्रवेशद्वार पर भारत
भारत ने हाल में कुछ ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों में प्रवेश किया है, जो अपेक्षाकृत नए हैं और जिनमें भारी पूँजी निवेश की ज़रूरत होती है। ये क्षेत्र हैं: आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, अक्षय ऊर्जा और रक्षा उत्पादन। इसके अलावा हमारा परंपरागत वस्त्र और परिधान-उद्योग, ऑटोमोबाइल्स, फार्मा और सॉफ्टवेयर उद्योग पहले से ज्यादा मजबूती के साथ अपने कदम बढ़ा रहा है। इन बातों का सकल परिणाम है: नई पूंजी+ नई तकनीक=औद्योगिक गुणवत्ता में सुधार। हमारे वस्त्र, ऑटो पार्ट्स, औषधियाँ, केमिकल ज़्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे। इससे निर्यात-आधारित उद्योगों को सीधा फ़ायदा मिलेगा। नतीजा: उत्पादन बढ़ेगा, रोज़गार बढ़ेगा, उद्योगों का विस्तार होगा।
इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए हमें दो
स्तरों पर काम करने की ज़रूरत है। एक स्तर छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों का है,
जो बड़ी संख्या में रोज़गार उपलब्ध कराते हैं और आम उपभोग की वस्तुएँ तैयार करते
हैं। ऐसे उद्योग भी तभी सफल होंगे, जब हमारे पास नवीनतम उच्चस्तरीय तकनीक होगी।
साथ ही हमें ऐसे सामाजिक विकास की ज़रूरत है, जो बड़ी संख्या में लोगों की समृद्धि
का कारण बने। जब लोगों के पास पैसा होगा, तभी वे अपनी ज़रूरत की चीज़ें खरीदेंगे।
जब उनका उपभोग बढ़ेगा, तब औद्योगिक विकास भी होगा।
भारी उद्योगों की भूमिका
हमने ऊपर जिन उद्योगों का ज़िक्र किया है, उनमें से ज्यादातर भारी उद्योगों की श्रेणी में आते हैं। भारी उद्योगों से आशय उन बड़े पैमाने के विनिर्माण उद्यमों से है, जिनमें भारी मात्रा में पूँजी, जटिल मशीनरी और कच्चे माल का उपयोग होता है। ये उद्योग, जैसे इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, मशीनरी, सीमेंट, पोत और विमान निर्माण और ऑटोमोबाइल आदि बुनियादी ढाँचे के विकास, अन्य उद्योगों के लिए मशीनें बनाने और अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
Wednesday, March 4, 2026
पश्चिम एशिया को इस ‘भँवर’ से निकालना मुश्किल होगा
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ईरान पर हमला करके, जो लंबा दाँव खेला है, उसके कारण पश्चिम एशिया का भविष्य फिलहाल अनिश्चित नज़र आने लगा है. लगता है कि भानुमती के पिटारे की तरह एक के बाद एक नई चीजें सामने आ रही हैं और अभी आएँगी।
उनका यह ऑपरेशन 'एपिक
फ्यूरी' नए क्षेत्रीय संघर्षों को भी जन्म दे गया है, जिनमें
अमेरिका फँसा तो उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा. ट्रंप ने एक वीडियो में ईरानी
जनता को संबोधित करते हुए, कहा देश की सत्ता पर ‘आपको कब्ज़ा
करना होगा. यह संभवतः पीढ़ियों के लिए आपको मिला एकमात्र मौका है.’
पर्यवेक्षकों का कहना है कि ईरान का इस्लामिक गणराज्य
एक वैचारिक प्रणाली है, जिसमें बहुस्तरीय अभिजात वर्ग और समर्थन का आधार है. हो
सकता है कि हाल के वर्षों में यह समर्थन कम हुआ हो, पर वह सत्ता बनाए रखने की ताकत
रखता है. बमबारी से पस्त और घायल होने के बावज़ूद यह धार्मिक व्यवस्था खड़ी रहेगी.
इस आक्रमण के बाद जहाँ एकाध अपवाद को छोड़कर पूरा
यूरोप, अमेरिका और इसराइल के साथ खड़ा नज़र आ रहा है, वहीं रूस और चीन ने आयतुल्ला
खामनेई की हत्या की निंदा की है.
चीन ने इसे 'संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के ख़िलाफ़' बताया और कहा कि हम इसका सख़्त विरोध और कड़ी निंदा करते हैं. पर वे निंदा तक ही सीमित रह सकते हैं. वे जो भी करेंगे, दूर रहते हुए परोक्ष तरीकों से करेंगे, प्रत्यक्ष तरीके से नहीं.




